April 24, 2017

सबसे छोटी दोपहर

जिस वक्त उदघोषकों की कांफ्रेंस में कागज़ के प्यालों में ठंडी हो चुकी चाय थी। ठीक उसी वक़्त सबसे पिछली कतार में बैठे एक शायर को महबूब के गरम-गरम बुलावे आ रहे थे।

उसकी आवाज़ से लगता था कि इंतज़ार में एक पींपा बीयर पी जा चुकी होगी। ये सच ही था कि उससे होटल का नाम ही भूल गया था। होटल के उस कमरे तक जाने को जब हम निकले तब जयपुर पर अप्रेल की कड़ी धूप थी। ऐसी ही धूप उस बरस भी थी। जिस बरस अम्बर टॉवर से एमआई रोड की ओर एक लड़की को थके कदम जाते हुए देखा था।

उस होटल के रास्ते मे एक ऑटो वाले ने पूछा- सर वुड यू... हमने उसकी बात को नज़र अंदाज़ कर दिया।

होटल के कमरे की एक कुर्सी में फंसा महबूब उठ सकने के हाल में न था। इसलिए उसने आंखे और हाथ उठाकर आह्वान किया। आओ प्यारे इस ज़िन्दगी को मार गिराएं।

मैं अचानक चौंक उठा कि मेरी ज्यादातर महबूबाओं के नाम आर अक्षर से शुरू होते हैं और ये भी कैसी बात ठहरी कि उस कमरे में जो दो लोग थे। उनके नाम राजू याग्निक और राजेश चड्ढा थे।

उस कमरे में बीयर की इतनी बोतलें थी कि हर हरकत पर वे आपस मे टकराने लगतीं। टकराने पर ऐसी आवाज़ आती। जैसी शायर हरमन के कहे किसी शेर में, दिल मे आती थी।

रेगिस्तान की कुख्यात लम्बी दोपहरों में ये सबसे छोटी दोपहर थी।
***

कल उसने मुझे कहा।

सफेद कुर्ता पहने तुम
विश्व पुस्तक मेला दो हज़ार सोलह में
उस लड़की को चूम रहे थे बेहिसाब।

हरा कुर्ता पहने तुम
उसी बरस के अक्टूबर माह में
हो गए थे सर्वांग नग्न।

नीला कुर्ता पहने तुम
मेरे साथ सोये रहते थे हर तीन महीने बाद।

मैं अपना कुर्ता उतारने के लिए
नहीं कर रही हूं दोबारा बात
मैं वह सब नहीं चाहती हूं अब तुमसे।
तुम ऐसा कुछ मत समझना।

घर लौटते हुए अचानक मुझे ख़याल आया है
कि बैग बेहद हल्का हो गया है
मेरे सब कुर्ते शायद उन औरतों ने पहन लिए हैं
जिनको अक्सर मुझसे कोई लज्जा न थी।

सफ़र हालांकि कोई भी आसान न था मगर
आज का सफ़र बड़ा खराब है
रेल की खिड़की से धूल उड़ उड़कर आ रही है
मेरी आंखों में गिरने को।

कि रेगिस्तान की धूल जानती है
साल भर से रोया नहीं हूँ मैं
साल भर से मैंने थूका भी नहीं है किसी के नाम पर
* * *

April 21, 2017

ख़ामोशी से भरा घर

हवा ने कितनी ही थपकियाँ दी होंगी. आज सुबह मैं उस दरवाज़े के सामने खड़ा था. दरवाज़ा चुप था. ऐसे चुप जैसे कोई किसी अपने के लौट आने पर हतप्रभ चुप खड़ा होता है.वह पूछना भी नहीं चाहता कि अब किसलिए आये हो? जब गए थे तब सोचा न था कि जाने के बाद क्या होगा. घर, रिश्ते, चीज़ें सब एकांत में छीजने लगते हैं. मैं झुकर थैले के आगे वाली जेब में चाबी खोजता हूँ. 

ख़ामोशी से भरा घर हमें पुकारता होगा?

ना. मैं अपने आप से ना कहता हूँ. इसलिए कि घर तब तक है जब तक कोई उसके लिए है. जब वहां कोई नहीं है तब घर एक निर्जीव चीज़ है. अपने पक्ष में इस तरह की तकरीर करते हुए चाबी निकाल लेता हूँ. घर के दरवाज़े पर लगी कुण्डी का अन्दर वाला एक स्क्रू गिर गया है. असल में कई बार उसे कसा मगर पेच बचा नहीं था. अक्सर रिश्तों के, प्रेम के, नफरत के, ईर्ष्या के और लगभग हर अनुभूति के पेच मर जाते हैं. 

उन पेचों को हम बार-बार कसना चाहते हैं मगर चूड़ी होती नहीं है. इसी तरह मैंने हत्थी के पेच को कई बार कसा मगर कुछ रोज़ बाद फिर से ऊपर की तरफ से ढीला हो जाता. की-होल में चाबी आसानी से घूमती नहीं है. कुण्डी को पकड़ के बाहर की ओर खींचो तब एक बार फिर और खींचो तब दूसरी बार घूमती है. अंगुलियाँ हत्थी से हटती तब तक पक्का सोचा कि इस बार बदलवा लूँगा. 

रेल की खिड़कियों से आई गर्द में सने कपडे. हाथों में लोहे और पसीने की मिली जुली गंध. बाल चिपके हुए. दरवाज़ा खुलते ही गर्द की एक बारीक चादर के पार रखे हुए सोफे. आहिस्ता से आगे बढ़ने पहले मैं स्विच ऑन करता हूँ. छोटा पिट्ठू थैला आँगन पर रखूं? फिर ठहर जाता हूँ. एक कमरे का दरवाज़ा खोलकर बिस्तर पर रखता हूँ. चादर पर एक कवर बिछा है. कवर पर भी बारीक गर्द है. कवर हटाते हुए चादर पर अंगुलियाँ फेरता हूँ. वह चादर भी बारीक धूल से भरी है. ज़रा सा झुक कर सूंघता हूँ कि पिछली बार हमारे यहाँ होने की गंध कितनी बची है. वहां हमारी गंध नहीं है. बस गर्द है. 

तुम हमारे किसी तरह न हुए 
वरना दुनिया में क्या नहीं होता. 

शायर मोमिन खां मोमिन की तरह बेचैनी छुपाये हुए शिकवे को सरल करता हूँ. सादगी से कहता हूँ कि तुम्हारा ही होने को जी चाहता है. मगर हर बार घर से निकलता हूँ. इस घर ही नहीं, जहाँ कहीं रहता हूँ. वहां से कहीं न कहीं निकलना होता है. 

अब लौट आया हूँ तो जी चाहने लगा कि बैठ जाऊं. सोफ़ा पर डाले हुए कवर हटा दूँ. चाय के लिए इन्डक्शन ऑन कर लूँ. सेंडल खोलकर चप्पल पहन लूँ. कोई दूसरा टी पहन लूँ, कोई शोर्ट डाल लूँ. मगर सोचता हूँ करता कुछ नहीं. जिस सोफ़ा से कवर हटाया था उसपर बैठ जाता हूँ. 

किस काम को कहाँ से शुरू करूँ, ये बात समझ नहीं आती. 

अचानक देखता हूँ कि दोपहर के बारह बजने को आये. दो बार चाय बन गयी. घर से डस्टिंग क्लीनिंग हो गयी. बर्तन धुल गए. थैला खुल गया. कपड़े बिस्तर पर फ़ैल गए. चादरें धुल कर बाहर सूखने गयी. वह जो कुछ घंटे पहले उदास घर था, अब उदास नहीं रहा. एक बात सुनो. कुछ एक घंटों में इतना कुछ बदल जाता है. तो किसी के चले जाने के बाद ज़िन्दगी कितनी बदल चुकी होती होगी. 

एक चिड़िया जाली पर बैठकर घर के अन्दर झांकती है. मैं देखता हूँ कि उसके गुलाबी पैर बहुत सुन्दर है. 

April 20, 2017

दो झपकी के ख़याल में

शाम जाने कैसी बीते? हो सकता है सात बजे तक आने वाले धुंधलके के बाद गरमी छंट जाये. हलकी ठंडी हवा चलने लगे. गरम दिन में यही एक ख़याल ऐसा था, जिसके भरोसे मैंने तत्काल में रिजर्वेशन लिया और स्लिपर कोच में चढ़ गया. पिछले दस एक रोज़ से वायरल बुखार था. आधी रात या भरी दोपहर में बुखार अचानक से आता. बदन तपने लगता और फिर नीम बेहोशी छाने लगती. दवा लो तो कुछ देर बाद पसीना होता और भीग कर मैं जाग जाता था. ऐसे में लगता नहीं था कि जयपुर की यात्रा कर सकूंगा. इसलिए पहले टिकट न ली. क्या कभी हम इस तरह कुछ स्थगित कर सकते हैं? 

शिथिल मन और थकन से भरा बदन कहता है- जाने दो. जो जिस तरह बीतता है बीते. निश्चेष्ट पड़े रहो. जैसे भोर के बाद बड़े वाला उल्लू पड़ा होता है. उसे कुछ दीखता नहीं है. वह उड़कर सुरक्षित जगह नहीं जा सकता है. मगर ऐसा भी नहीं है कि वह जीना नहीं चाहता है. रौशनी ने उससे रास्ता छीन लिया है. इसी तरह बुखार में हम करना बहुत कुछ चाहते हैं. लेकिन ये करना सम्भव नहीं होता. इसलिए उसी उल्लू की तरह रौशनी के अँधेरे में ठोकरे खाते हुए अपने अनुकूल समय की प्रतीक्षा करते हैं. 

शाम को चलने वाली रेल से उतनी उम्मीद ही की जा सकती है, जितना किसी के वादे पर भरोसा करना. 

मैं अपने आस-पास बैठे लोगों से परिचय नहीं करता हूँ. मैं उनके यात्रा प्रयोजन से अनभिग्य ही रहना चाहता हूँ. मैं चाहता हूँ कि कुछ छूटे हुए ब्लॉग पढ़ लूं. मगर रेल के शोर खिडकियों से आती धूल, यात्रियों की ऊँची आवाज़, चाय वालों का आना जाना, मुझे ब्लॉग पढने नहीं देता. मैं फेसबुक देखता रहता हूँ. एक पोस्ट, एक तस्वीर एक कोई अजनबी चेहरा. 

जैसे रेल आगे बढती जाती है. यात्री आपसी सम्बन्ध में बंधने लगते हैं. वे चेहरों और हावभाव से पहचान गढ़ते हैं. वे अजनबियत को खोने लगते हैं. उनमें एक भाव जागता है कि हम साथ सफ़र कर रहे हैं, साथी हैं. आहिस्ता से सब सामान्य होने लगता है. बदन की अकड़, सख्त ठहरी हुई ऑंखें, सीधे रखे हुए पाँव. अक्सर दो तीन घंटे के सफ़र में यात्री एक दूजे के इस तरह से अपने हो जाते हैं कि सामान की हिफाज़त के लिए कह कर रेल कोच से बाहर चले जाते हैं. 

ज़िन्दगी भी ऐसी ही नहीं? पहली मुलाकात में सख्त, अकड़ी और चुप. बाद में आहिस्ता से वह हमारे कन्धों पर सवार हो जाती है. हम जीने की जगह जीने का बोझ ढ़ोने लगते हैं. हर समय इसी हिफाज़त में लग जाते हैं कि जिंदगी को कुछ हो न जाए. इसलिए खिड़की से बाहर की दुनिया में झांकते हुए जिस तरह सामान पर नज़र रखते हैं, वैसे ही ज़िन्दगी के साथ पेश आते हैं. एक ऐसा सामान जो खो ही जाना है, उसी की हिफाज़त में जीते जाना. 

मेरे कूपे के सब यात्री गांधीनगर स्टेशन पर उतरने वाले हैं. 

रात ठंडी हो जाती है. मौसम में लू की हलकी सी चुभन बाकी रह जाती है. एक बेडशीट बिछाए हुए करवटें लेते जाना और सोचना कि महीनों बाद घर जाने पर साफ़ सफाई में पूरा दिन ही गुज़र जायेगा. शायद इसीलिए कई बार कुछ रिश्ते लौटने से डरते हैं. कहाँ से बुहारेगे, कहाँ से फटकेंगे, किस तरह बारीक गर्द को धोयेंगे. 

जिस तरह छूटा हुआ घर पूरी तरह कभी खत्म नहीं होता. वैसे ही न लौटने पर भी रिश्ते तो रहते ही हैं.  

एक छोटा सा ख्वाब अचानक टूटता है. रेलगाड़ी चलकर रुक गयी है. मैं फिर से करवट लेता हूँ, दिन के उजाले में फंसे उल्लू की तरह. कि जहाँ, जब जाना होगा, जाएगी ज़िन्दगी. चुप लेटे रहो. रात के खत्म होने तक दो झपकी ले लो.
* * *

[Painting courtesy ; Natalie Graham]

April 19, 2017

तुम बहुत पहले से मेरे दिल मे हो

भंवरा गुनगुनाता है
पिछली गर्मियों का गीत।

हवा पिरोती है
सीमेंट की जाली के कान में
उसी गीत की और सतरें।

रेगिस्तान की दोपहर में
गिरते हैं आवाज़ के टुकड़े।

पहली बार सुनते हैं
हम कोई आवाज़
और उसमें कोई अजनबीपन नहीं होता।

तुम बहुत पहले से मेरे दिल मे हो
जैसे रेगिस्तान में वीराना रहता है।
* * *

बात करना
गमलों में फूल रोपने जैसा है।

तुम जो मिल जाओ
वह जाने कैसा होगा।
* * *

April 10, 2017

करने से होने वाली चीज़ें

कोई पल जो बेहद भारी लगता है, वह कुछ समय के बाद एक गुज़री हुई बात भर रह जाता है. 

रात की हवा में शीतलता थी. दिन गरम था. साँझ के झुटपुटे में मौसम जाने किससे गले मिला कि सब तपिश जाती रही. हवा झूलने की तरह झूल रही थी. रह-रहकर एक झोंका लगता. आसमान साफ़. तारे मद्धम. कोलाहल गुम. रात का परिंदा आसमान की नदी में बहता जाता है. इसी सब के बीच आँखें अबोध सी शांत ठिठकी हुई. 

बदन के रोयों पर शीतल हवा की छुअन से लगता कि हरारत भर नहीं तपिश भी है. जिसे बहुत सारी शीतलता चाहिए. नींद की लहरें आँखों को छूने लगतीं. धीमे से सब बुझ जाता. 

एक बेकरारी की मरोड़ जागती है. करवट दर करवट. रात की घड़ी से एक हिस्सा गिरा. दूसरी करवट के बाद दूसरा. तीसरी करवट के समय अचानक उठ बैठना. सोचना कि हुआ क्या है? क्यों नींद ठिठकी खड़ी है. किसलिए बदन करवटें लेता जा रहा है. समय का पहिया आगे नहीं बढ़ता. 

बिस्तर ठंडा जान पड़ता है. हाथ सूती कपडे से छूते हैं तो सुहाना लगता है. बुखार अपने चरम पर आता. जहाँ सबकुछ एक सामान तपिश से भर जाता है. दवा लेकर आँख बंद किये सोचता हूँ. होठ गुलाबी हो गए हैं. कच्चे, एकदम कच्चे. वे जगह जगह से फट गए हैं. जैसे किसी ने नन्हे बच्चे के होठों को बार-बार काट खाया हो. जीभ घुमाता हूँ. होठों पर पपड़ियाँ उभर आई हैं. होठों में दर्द भी है. अचानक बुखार में अध दिमाग बहक गया है. गुलाबी होठ भूलकर दूर तक एक गुलाबी रंग देखने लगता हूँ. जैसे किसी ने बेहद कच्चे गुलाबी रंग के खेत उगाये हैं. मैं उनके भीतर जाने के ख़याल भर से डर जाता हूँ. कि ये गुलाबी खेत भी मेरे होठों की तरह नाज़ुक और कटे-फटे हो गए होंगे. इनको छूते ही दर्द की कच्ची सी लहर उठेगी. 

नींद खुलती है तो पाता हूँ कि पसीने ने मुझे भिगो दिया है. एक लाल रंग का टी पहने हुए हूँ. इसे कई महीनों तक बचाए हुए रखा था. इसलिए कि बेहद प्यारा था. फिर इसे जाने कब से घर में पहनना शुरू कर दिया याद नहीं. वही टी इस तरह भीग चुका था जैसे पानी की बाल्टी से निकाला है. जरा घबराया हुआ ज़रा चौंक से भरा समझता हूँ कि दवा लेते ही मुझे गहरी नींद आ गयी थी. इसी नींद में पसीना हुआ है. बिस्तर भीग गया है. बड़ा पलंग है इसलिए भीगी जगह से दूर सरक कर फिर से सो जाता हूँ. 

बुखार की चौथी रात है. इसकी सुबह होने वाली है.
मैं अकसर नहीं समझ पाता हूँ कि मन कहाँ गया है? ये क्यों नहीं लिखना चाहता? इसे क्या ऐसा चाहिए कि लिखने की गत पकडे. किसी से दिल लगा लो. कोई नशा कर लो. कोई तलब जगा लो. मगर करने से होने वाली चीज़ें ज्यादा बेअसर ठहरती हैं. इसलिए इस शांति को भोगो. कुछ न करने को जीयो. जीवन यूं भी जा ही रहा है. 

April 9, 2017

वो जाने क्या शै थी?



छतरी के जैसे खिले हुए दो फूल याद आते रहे.

रात चाँद था. खुली छत पर गरम मौसम की सर्द हवा थी. बदन की हरारत पत्थरों की तरह टूटती रही. भारीपन और बेअसर करवटें. दवा नाकाम. जाग में नींद का इंतज़ार. इंतज़ार में कुछ करने की चाह. इस चाह में कुछ न कर पाने की बेबसी. जैसे किसी योद्धा का का गर्व चूर होता है. सब कुछ ठोकरों पर रखे हुए. जीवन के उड़नखटोले पर बेखयाली में गुजरते दिनों पर कोई प्रेत का साया गिरा. मन एक भीगा हुआ फाहा होकर सब उड़ना भूल गया.

क्यों और अच्छा लगता जाता है आपको?

फिर इसी सवाल पर बहाने बनाते हुए. झूठी दलीलें देते हुए. सोचना- "तुम कह क्यों नहीं देते कि कई बार वहीँ होने का मन होता है. जहाँ छुअन एक सम्मोहन से परे बड़ी ज़रूरत हो." इधर आ जाओ. ये सुनकर मैं कहता हूँ- "आज मैं खुद मुझे अच्छा नहीं लग रहा" सुबह से बिस्तर पर पड़े हुए कभी सीधे कभी औंधे लेटे हुए. ये देखते हुए कि क्या बजा है. ये सोचकर हताश होते हए कि समय रुक गया है.

बहुत दूर कहीं. किसी जगह जहाँ गायों के गले में बंधी घंटियों का हल्का स्वर सुनाई देता है. जहाँ शाम ढले एक अलाव हर मौसम में जलाता है. जैसे असमाप्य बिछोह की अमरजोत जलती हो. उसी बहुत दूर की जगह के बारे में ख़याल आता है. क्या सचमुच हम कभी ये सोचते हैं कि ज़िन्दगी में क्या कुछ कहाँ रखा है. क्या हम दूरियां देखते हैं? क्या हम समय के लम्बे रास्ते पर कोई ऐसा विश्राम स्थल सोचते हैं जहाँ दूरियां एक बार के लिए मिट जाती हों. शायद नहीं. 

रेगिस्तान के वीराने में हवा गाती रहती है एक गीत तुम्हारे आने तक.

बादलों की छतरी तले
सोने जैसी रेत पर
खिल उठता है बैंगनी फूल.

जैसे
एक रात का मुसाफिर
सोया न हो रात भर.

हल्का उजास होने को होता है. मुरकियों और गिरहों से भरे शब्द समझ नहीं आते. एक ही पंक्ति सुनकर उसी के साथ आँख मूंदे देखना कि रौशनी बढती जा रही है. गली में आवाज़ें तेज़ हो रही हैं. मैं उठकर बाहर जाता हूँ. बालकनी से देखता हूँ कि सामने के घर का एक बच्चा दरवाज़े के आगे बनी सीढी पर बैठा है. वह बुद्ध की तरह शांत है. रात पीछे छूट गए जीवन से बेख़बर जाने क्या सोचता है.

मैं तेज़ी से घर के सब काम करता हूँ. आभा मंडी से बहुत सी सब्जियां ले आये तब तक सब गर्द पौंछ दूँ. घर की चीज़ें करीने से रख दूँ. वे चीज़ें जो पिछले तीन दिन में बिखर गयी थीं. पीठ में अचानक एक सेंटीपीड रेंगता है. मैं रुक कर उसे महसूस करता हूँ और अगले काम पर लग जाता हूँ.

क्यों किया है इतना सारा काम?

इसलिए कि प्रेम केवल बाँहों में भर लेने को नहीं कहते हैं.

एक गीत अचानक जाने किस वजह से याद आया, मैं समझ नहीं पाता हूँ. तेईस साल की उम्र में जब रेडियो की नौकरी करने लगा था तब इसे ख़ूब प्ले किया करता था. आज सोचा है कि इसे फिर से खोजूंगा. एक छोटे से रेडियो स्टेशन पर गीत कम होते हैं मगर वे इतने होते हैं कि आप जी भरके प्रेम में डूबे रह सकते हैं.

गुंचे लगे हैं कहने, फूलों से भी सुना है, तराना प्यार का... 
* * *

[Doodle courtesy : http://weeklydoodles.blogspot.in]

April 7, 2017

इतने सारे दुःख उगाने के लिए


ईर्ष्या मत कीजिये 
इतने सारे दुःख उगाने के लिए 
मैंने बहुत सारी चाहनाएँ बोईं थीं.

धूल भरी आंधियां चलने लगीं. रेलवे स्टेशन पर किसी नये ब्रांड का लेबल था. पानी की ख़ुशबू बोतलों में बंद थी. अचानक मन ने कहा- “अच्छा हुआ.” धूल भरी आंधी. गरमी को पौंछने लगीं थी. एक तकलीफ गयी तो दूसरी आ गयी. पहले बदन पसीने से तर था. अब बदन को धूल ने संवारना शुरू कर दिया. बिखरे बालों के बीच बची हुई जगह पर बारीक धूल भरने लगीं. रुमाल उदासा जेब में पड़ा रहा. कई बार हाथ जेब तक गया मगर खाली लौट आया. क्या होगा इतना सा पौंछ देने से?

जब बहुत सा कुछ आता हो तो उसे रोकने के लिए बहुत थोड़ा काम में नहीं लेना चाहिए.

कभी-कभी बहुत सी खुशियाँ आती हैं. अचानक. लहराती. हरहराती. अचम्भित करती हुई. उस वक़्त पीछे छूट गए छोटे-बड़े दुखों का बांध बनाना बेकार है. दो रोज़ पहले कुछ एक घंटे की यात्रा बाकी थी तब कोच सहायक चादरें समेटने लगा था. उसने हमारे कूपे के परदे में जरा सा झाँका. उसकी शर्मीली झाँक में ख़याल रहा होगा कि काश ये चादरें भी समेट ली जाएँ. वह नहीं रुका. जो चीज़ें जहाँ जाकर खत्म होती हैं. उन्हें वहां तक जाने देना चाहिए. मैंने सोचा कि इस सहायक को मालूम होना चाहिए कि ये यात्रा अवश्य खत्म होगी. ये यात्री कुछ देर में उतर जायेंगे. मगर शायद उसे कोई जल्दी थी. जैसे किसी टूटते हुए रिश्ते में लोग इंतज़ार नहीं करते. वे उसे टूटता जानकर उसी पल तोड़ देना चाहते हैं.

कहाँ जा रहे हो? जब भी कोई मुझसे पूछता है तो मेरे पास एक पक्का जवाब होता है. जब भी ये सवाल मैं ख़ुद से पूछता हूँ तो चिंता में घिरने लगता हूँ. मैं अपने प्रयोजन और किसी दिशा में चलते जाने को सोचने लगता हूँ. किसी और के पूछने पर बताते हुए जो काम बेहद सार्थक लगता है. वही ख़ुद के पूछने पर निरर्थक जान पड़ता है. जब भी कोई मुझसे पूछता है कि कहानियां क्यों लिखते हो तो मैं उसे बताता हूँ- “कहानियां लिखने से मेरे मन को आराम आता है” जब यही सवाल मैं ख़ुद से पूछता हूँ तो अपने भीतर खोज में दौड़ने लगता हूँ कि कहानी लिखने से जो आराम आना था, वह कहाँ रखा है? मैं थकने लगता हूँ. मुझे अपना आराम कहीं नहीं मिलता.

मैं सोचने लगता हूँ कि कहानी लिखना कहीं ऐसा तो नहीं कि एक भंवरा कमरे में बंद हो गया है. वह बाहर जाने के लिए खिड़की से आती रौशनी की ओर उड़ता है. जाली से टकराता है और गिर पड़ता है. वह कोई दूसरा रास्ता नहीं तलाशता. वह एक बार रुककर चारों तरफ नहीं देखता. कहीं कोई झिरी. कोई छेद. कोई खुला दरवाज़ा. वह कुछ नहीं देखता. उसकी मति भ्रष्ट हो चुकी होती है. एक ही तरफ जाने को कहती है. क्या मैं कहानियां लिखकर जिस आराम को सोचता हूँ. ये कहीं ऐसा ही कुछ तो नहीं.

लेकिन

अतीत की दस्तकें जब लिख दी जातीं है तो उनका शोर कम हो जाता है. ये अच्छी बात है.

लौटते हुए. ऐसा कहना ठीक नहीं है. वापसी कहना अच्छा है. लौटने के लिए मन भी चाहिए होता है. वापसी में केवल उसी स्थान तक जाना होता है जहाँ से चले थे. ये बात आधी रात को याद आई. एक युवती किसी दूसरे पेसेंजर से कह रही थी कि क्या आप अपनी बर्थ बदल लेंगे. मेरे पिता बेहद बीमार हैं. मेरी माँ का वजन बहुत ज्यादा है. वह व्यक्ति बर्थ बदलने को राज़ी हो गया और हमारे कूपे में ऊपर वाली बर्थ पर आ गया. रात पौने तीन बजे हमें उतर जाना था. इसी गरज में मैंने कोच के दरवाजे तक का फेरा दिया. बूढा आदमी अपनी साइड लोवर पर बैठा हुआ था. उसने पर्दे के बीच से अपना सर गैलेरी में निकाल रखा था. वह कातर आँखों से चलती रेल के बंद कोच में कुछ देख लेना चाहता था. गाड़ी लेट थी. मैं वापस अपनी जगह आया. मैंने अपनी तरफ के पर्दे को ज़रा सा हटा दिया कि उस आदमी को देख सकूं.

वह आदमी आठ दस मिनट के अंतराल से अपने पाँव सीट से नीचे करता. कुछ सोचता और फिर वापस ऊपर कर लेता. युवती की माँ गहरी नींद सो रही थी. युवती को मैंने देखा नहीं था. उसके वहां होने का कोई आभास भी न था. मुझे केवल सोयी हुई भारी बदन वाली औरत दिख रही थी. उसी औरत के साथ उम्र गुज़ार देना वाला आदमी जीवन से कोई स्थायी हल चाहता था. उसके चेहरे पर एक जानी-पहचानी बेचैनी थी. जैसी कभी मुझमें हुआ करती थी. मैं नयी जगह जाना चाहता था. ताकि तकलीफ कम हो जाये. लेकिन वहां पहुँचते ही तकलीफ सामने खड़ी होती थी. मैं उस आदमी को अँधेरे में देख रहा कि अचनक मुस्कुराने लगा. मैंने ख़ुद से कहा- “कितनी बेकार और दूर की सोचते रहते हो. संभव है कि इस आदमी को मानसिक परेशानी हो ही नहीं. हो सकता है केवल लघुशंका के अनियत हो जाने से परेशान हों.

कई-कई बार बहुत से रिश्ते वहां खत्म हो जाते हैं जहाँ कुछ नहीं होता.

गरम मौसम की रात बेहद ठंडी थी. मैं दरवाज़े पर खड़ा हुआ प्रतीक्षा कर रहा था कि अगला स्टेशन आये. जान लूँ कि कहाँ तक पहुंची है. मैं दरवाज़ा बंद कर देता हूँ. फिर वही सवाल कि कहाँ जा रहा हूँ. किसी के दरवाज़ा पीटने की आवाज़ से चौंकता हूँ. कोई रिजर्व कोच में आना चाहता है. मैं तुरंत दरवाज़ा खोल देता हूँ. लेकिन वहां कोई नहीं होता. दरवाज़ा पीटने की आवाज़ मुसलसल आती रहती है. दूर तक देखता हूँ. नावां सिटी स्टेशन पर पसरे हुए वीराने में एक अधेड़ और किशोरी तीसरे कोच के पास खड़े हुए प्रतीक्षा करते हैं कि दरवाज़ा खुल जाए. उनकी बेचैनी इस तरह बढ़ी होती है कि उनके पाँव लगातार आगे पीछे होते रहते है. मैं उनकी तरफ हाथ से इशारा करता हूँ. शायद वे समझ जाएँ कि कोई दरवाज़ा खुला है. 
रेल चल पड़ती है. मैं ये नहीं देखना चाहता हूँ कि वे चढ़ पाए या नहीं. मैं ये देख नहीं सकता हूँ कि उनकी गाड़ी छूट गयी है. छूटना मुझे हताश करता है. मुझे रुलाता है. इसलिए मैं वाशबेसिन के शीशे में देखने लगता हूँ. वहां पर मुझे वही बूढा आदमी दीखता है. मुझे देखकर अचानक पलट जाता है. मुझे फिर अफ़सोस होने लगता है कि इस आदमी को सचमुच लघुशंका की तकलीफ नहीं है.

मैं सिहर जाता हूँ.

एक बार एक लड़का मिला था. उसने अपनी अँगुलियों पर ब्लेड से चीरे लगा रखे थे. मैं अजनबियों से बात नहीं करता हूँ. मुझे इसमें कोई ख़ुशी नहीं मिलती. उनसे बात करना ऐसा है जैसे किसी दूसरे के दुखों में झांक लेना. लेकिन उस लड़के ने मुझसे किताब मांग ली थी. आठ दस पन्ने पढ़कर लौटा दी. मैंने पूछा- “पसंद नहीं आई?” उसने कहा- “पसंद आने पर भी पढ़ नहीं सकूँगा” मैंने पूछा- “आपकी अँगुलियों में लगे चीरों में दर्द के कारण?” वह बोला- “नहीं. ये मैं खुद लगाता हूँ. कभी स्मैक पीता था. न मिलने पर तकलीफ होती थी. इसलिए एक चीरा भरते ही दूजा लगा लेता हूँ ताकि दर्द पर ध्यान रहे.”

मैं उसे कहना चाहता था लेकिन नहीं कहा. कि अच्छा हुआ स्मैक ही पी थी. प्रेम नहीं किया था. 
* * *

तुमने सोच लिया है न ?
* * *

[Painting image courtesy : Saatchi art]

दो सूखे पत्ते नम मिट्टी में

एक रोज़ कोई कोंपल खिली जैसे नज़र फेरते ही किसी ने बटुआ पार कर लिया हो। एक रोज़ उससे मिला। फिर उससे ऐसे बिछड़ा जैसे खाली बटुए को किसी ने उदासी ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने या खूबसूरत स्त्री को इरादतन चूमने जितना ही अवैध है.