June 30, 2017

चुड़ैल तू ही सहारा है

रेगिस्तान में चुड़ैलों के कहर का मौसम है. वे चुपके से आती हैं. औरतों की चोटी काट देती हैं. इसके बाद पेट या हाथ पर त्रिशूल जैसा ज़ख्म बनाती हैं और गायब हो जाती हैं.

सिलसिला कुछ महीने भर पहले आरम्भ हुआ है. बीकानेर के नोखा के पास एक गाँव में चोटी काटने की घटना हुई. राष्ट्रीय स्तर के एक टीवी चैनल ने इस घटना को कवर किया. पीड़ित और परिवार वालों के इंटरव्यू रिकॉर्ड किये. कटी हुई चोटी दिखाई. बदन पर बनाया गया निशान दिखाया. गाँव के बाशिंदों की प्रतिक्रिया दर्ज की. पुलिस वालों के मत लिए. इसके बाद इसे एक कोरा अंध विश्वास कहा. घटना के असत्य होने का लेबल लगाया. टीवी पर आधा घंटे का मनोरंजन करने के बाद इस तरह सोशल मिडिया के जरिये फैल रही अफवाह को ध्वस्त कर दिया.

इसके बाद इस तरह की घटनाओं का सिलसिला चल पड़ा. बीकानेर के बाद जोधपुर जिले की कुछ तहसीलों में घटनाएँ हुईं. जोधपुर से ये सिलसिला बाड़मेर तक आ पहुंचा. सभी जगहों पर एक साथ पांच-सात स्त्रियों के साथ ऐसी घटनाएँ हुईं. उनकी कटी हुई चोटी का साइज़ और काटने का तरीका एक सा सामने आया. शरीर पर बनने वाले निशानों की साइज़ अलग थी मगर पैटर्न एक ही था.

बाड़मेर के महाबार गाँव में तीन औरतों के साथ एक साथ ऐसा हुआ. ये समाचार शहर और जिले भर में तुरंत फैल गया. इसे कुछ समाचार चैनल के संवाददाताओं ने आगे राज्य स्तर और राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया. समाचार ने एक भय मिश्रित कौतुक जगाया लोग अस्पताल की ओर भागे. उपचार के लिए भर्ती की गयी इन पीड़ित महिलाओं को देखने पुलिस-प्रशासन के अधिकारी और जन प्रतिनिधि पहुंचे.

चुड़ैल की शिकार सभी महिलायें गहरे सदमें में थी. सदमें की वजह चोटी काटने के बाद आने वाला संकट था. ज़ुबानी, सोशल और अन्य माध्यमों में ये प्रचारित है कि जिस महिला के साथ इस तरह का हादसा पेश आता है, उसकी तीसरे रोज़ मौत हो जाती है.

परसों रात कोई एक बजा होगा कि लोहे के चद्दर से बने दरवाज़ा पीटने के शोर और लाठियों के ज़मीन पर पटकने के शोरगुल से आँख खुली. मैं किसी बुरे स्वप्न में था. शोर सुनकर मैं तेज़ी से चारपाई से उठा. नींद में ही तेज़ कदम रेलिंग के उस छोर पर पहुँच गया, जिस तरफ से आवाज़ें आ रही थी. मोहल्ले भर के लोग जाग गए थे. ज्यादातर छतों पर ही सो रहे थे बाकी छत पर चले आये. शोरगुल पांच सात मिनट चला और उसके बाद लोगों के ऊँचे स्वर में बतियाने की आवाजें आने लगी. कहीं-कहीं आवाज़ में हलकी हंसी के साथ थोड़ा उपहास भी था.

मैं चौंका की इस तरह नींद में रेलिंग तक चले आना खतरनाक था. मुझे हड़बड़ी में जागते ही ऐसा न करना चाहिए था. तीसरी मंजिल से अगर गिरता तो चुड़ैल मेरी चोटी काटने की जगह हाथ-पाँव तो तोड़ ही देती. या चुड़ैल को कहानियां सुनना प्रिय होता और वह एक लेखक को ख़रगोश या चूहा बनाकर अपने साथ ही ले जाती.

पड़ोस की तीसरी गली में शोरगुल थम गया था. छतों पर खड़े लोग सामान्य हो रहे थे. मैं वापस चारपाई पर लेट गया. चुड़ैल की वापसी हो चुकी थी. मोहल्ले में घंटे भर बाद सन्नाटा छा गया था.

मुझे हलकी नींद आई और मैं भी चौंक पड़ा. अपना सर ऊपर किया और देखने लगा कि छत पर कोई है तो नहीं. सीढियों के पीछे कोई छुपा तो नहीं है. कहीं ऐसा तो नहीं कि चुड़ैल चारपाई के नीचे ही रेंग रही हो. मुझे ख़याल आया कि चुड़ैलों को शराब पीनी चाहिए या सिगरेट. इससे उनकी उपस्थिति का पता चल सकता है. एल्कोहल की महक या जलती हुई चिंगारी देख कर पहचाना जा सकता है. लेकिन जिस तरह मनुष्य समाज भले लोगों से भरा है. जो शराब और सिगरेट से दूर रहते हैं. उसी तरह संभव है कि चुड़ैल समाज भी सभ्य चुड़ैलों से भरा हों. ऐसे ख़यालों के बीच मुझे नींद आ गयी थी.

सुबह मालूम हुआ कि भूराराम के घर पर सो रही उसकी बच्ची चिल्लाते हुए जगी. उसने कहा कि चुड़ैल आ गयी है. वह मेरे बाल काटने ही वाली थी कि मेरी आँख खुल गयी. मेरे जागते ही वह कहीं छुप गयी है. परिजनों ने दरवाज़ा पीटना और शोर मचाना शुरू किया. लड़की की नींद उड़ चुकी थी. कुछ जागरूक नौजवान गली भर में डंडा बजाते हुए घूमे कि देखो चुड़ैल डरकर भाग चुकी है.

जिला अस्पताल में उपचार को आई एक महिला को डॉक्टर ने दो-चार थप्पड़ लगा दिए. डॉ साहेब जाने किस भोपे, तांत्रिक या झाड़ागर से एमबीबीएस करके आये थे. उन्होंने विधिवत अगरबत्ती जलाई और हाथ उठाया. आस पास उपस्थित लोगों ने इसका विडिओ बनाया. आज के अख़बार में ख़बर है कि उन डॉ साहेब को सेवा से निलम्बित कर दिया गया. जयपुर के बड़े भोपों ने उनको हाजरी देने अपने पास बुला लिया है.

महाबार मेरा प्रिय गाँव है. लेकिन बाड़मेर शहर की सीमा से लगा महाबार गाँव महज एक गाँव नहीं है. ये एक अघोषित राष्ट्र है और इसका संविधान अलिखित है. यहाँ की अनूठी और विरल जीवन शैली से रोचक तथ्य सामने आते रहते हैं. कभी महाबार से कच्ची शराब की आपूर्ति हुआ करती थी. कभी चोरी गए माल को महाबार और आगे के गांवों के धोरों से बरामद किया जाता था. कभी सिलसिले से लोग अकाल मृत्यु को प्राप्त होते थे. कभी संस्कृति एवं पर्यटन को बढ़ावा देने को महाबार के धोरों पर जमूरे इक्कठे हुआ करते थे. सरकारी लवाजमा आता. बेरिकेडिंग होती. शहर भर के लोग आते. नाच गाना होता. कभी मुम्बैया सिने संसार के गवैये आते.

मुझे कोई आश्चर्य न हुआ कि बाड़मेर में चुड़ैल का प्रकोप इस गाँव से शुरू हुआ. गाँव में चर्चा थी कि सत्तर-अस्सी साधुओं का एक दल आया हुआ है. वे तीन चार लोगों के समूह में बंटकर घूमते हैं. वे इस तरह की घटनाओं के लिए ज़िम्मेदार है. वे भिक्षा के लिए घर घर जाते हैं. जो कोई अन्न देता है. उसका कुछ नहीं होता. जिस परिवार ने दस बीस रुपये दिए थे. उनके घरों में ही चोटी कटने की घटनाएँ हुई.

मैं जब दस बारह साल का था तब पिताजी ने लुहारों के बास में एक कच्चा घर बनाया था. वह घर लुहारों के घरों से ज्यादा विलासी दीखता था. कि उसकी छत भी थी. लुहारों के पास घास फूस की छत वाले पड़वे थे. उनके पास आग की छोटी भट्टियाँ थीं. वे खेती बाड़ी में काम आने वाले औजार बनाते थे. साथ ही घर के लिए ज़रूरी चीज़ों का निर्माण भी करते थे. ये गाडोलिया लुहार नेहरू जी के आदेश से बसाए गए थे. इसलिए मोहल्ले का नाम नेहरू नगर रखा गया था.

एक दोपहर हल्ला हुआ कि आग लग गयी है. मैं भी भागा. मैंने देखा कि पड़ोस के एक झोंपड़े में आग लगी है. आग घास फूस की छत वाली चोटी में लगी थी. उसे तुरंत बुझा दिया गया. इसके बाद ये सिलसिला चल पड़ा कि हर दिन किसी न किसी झोंपड़े में आग लगती. इस आग से लपटें उठती. इसे तुरंत काबू कर लिया जाता. किसी भी प्रकार की हानि नहीं होती. इस जादुई आग के पीछे कहा जाने लगा कि एक लुहारण किसान बोर्डिंग के आगे सामान बेच रही थी. वहां कोई साधू चिमटा खरीदने आया. ग्राहक और दुकानदार के बीच अप्रिय संवाद हुआ. दुकानदार को साधू ने श्राप दिया कि जिस तरह तुमको तपना पड़ता है उसी तरह अब जलते भी रहना. आखिरकार इस श्राप से बाहर आने को बाबा रामदेव से विनती की गयी. उनकी कृपा से आग लगनी बंद हो गयी. बाबा रामदेव ने साधू के श्राप को डीएक्टिवेट कर दिया. उनके इस उपकार के बदले एक मन्दिर का निर्माण किया गया. बाबा रामदेव के ये मंदिर अब भी मोहल्ले में उपस्थित है लेकिन एक निजी संपत्ति हो गया है.

कुछ साल बाद मैंने सुना कि कोई प्रेतात्मा आ गयी है. वह क़स्बों में लोगों के घरों के बाहर दरवाज़े पर लाल स्याही की चौकड़ी बनाकर चली जाती है. जिस घर के दरवाज़े पर चौकड़ी बनती है. उसके किसी सदस्य की मृत्यु हो जाती है. लोग भय से भर गए थे. वे चौकड़ियाँ किसने बनायीं और बाद में उनका क्या हुआ याद नहीं. मगर अब सोचता हूँ. जिस तरह ये चोटी काटने वाली घटनाएँ याद के किसी कोने में दब जाएँगी वैसा ही कुछ उनके साथ भी हुआ होगा.

आपने मॉस साय्कोजेनिक इलनेस के बारे में सुना है? इसे समाज की सामूहिक बीमारी भी कहा जाता है. ये बहुत जटिल है. इसके अनेक रूप हो सकते हैं. इसके फैलने की गति अविश्वसनीय हो सकती है. किसी समूह या स्थान के लोग एक साथ इस बीमारी की चपेट में आते हैं. हम हर तरह की छानबीन करते हैं. तथ्य जुटाते हैं. जो कुछ भी जाना जा सकता है हम जानते हैं. लेकिन फिर भी हम कोई ठीक-ठीक कारण नहीं जान पाते हैं. हमको पहली नज़र में लगता है कि मरीजों द्वारा की जाने वाली हरकतें लगभग एक सी हैं. उनके ख़ुद के द्वारा किया जाना संभव है. किन्तु तर्क और सबूतों से आगे इन बीमारों की बढती तादाद हमको भ्रमित करने लगती है. हम तुरंत अपने ज्ञान को एक तरफ रखकर अलौकिक शक्तियों के संसार की बातों की तरफ अपना ध्यान लगा देते हैं.

इंग्लेंड के मनोविज्ञानी साइमन वेस्सेली कहते हैं कि सामूहिक उद्विग्नता माने इज़्तराब माने एंजायटी बचपन से ही हमारे भीतर घर कर लेती है. हम अपनी कल्पना शक्ति से भयावह स्थितियों के दृश्य बुनने लगते हैं. ये सामूहिक उद्विग्नता किसी भी क्षेत्र, उम्र के लोगों में आ सकती है. नाचते हुए कपड़े उतार देना. नाचते हुए हंसना. भीड़ में कोई डरावना दृश्य बनाना, करतब करना.

सोलहवीं शताब्दी में यूरोप में नाचना एक मेनिया हो गया था.

युवा से अधेड़ होने की उम्र की ओर बढती औरतें इस सामाजिक हिस्टीरिया का सर्वाधिक शिकार होती हैं. अपने बाल खोल लेना. कपड़े फेंक देना. हुमक हुमक कर बेतहाशा नाचना. लगातार चिल्लाना. राग निकाल कर रुदन करना. लगातार गोल गोल झूमते जाना. ऐसी क्रियाएं अनवरत दुनिया के हर कोने में होती हैं. ज्यादातर ऐसा करने वाली औरतें होती हैं. कहीं कहीं पुरुष भी ऐसा करते हैं. वे गालियाँ देते हैं. अलग मोटी, भारी या बारीक आवाजें निकालते हैं. धमकियाँ देते हैं. हमला करने पर उतारू हो जाते हैं. ये व्यक्तिगत हिस्टीरिया है. यही बातें सिलसिले से अनेक घरों में होने लगे तो इसे मॉस हिस्टीरिया कहा जाता है.

असल में हमारा अकेलापन, असंतोष, बेचैनी और घुटन इन क्रियाओं के मूल में है.

रेगिस्तान में ही नहीं वरन हर जगह औरतों के पास अपना कुछ नहीं है. वे किसी एक पुरुष के अधीन हैं. ऐसा पुरुष जो उसे अपनी प्रोपर्टी के रूप में देखता, समझता और परोटता है. दूसरे पुरुष इसी समझ के पहरेदार बने रहते हैं. अपना घर छोड़कर दूसरे घर में बसने वाली औरत से धीरे से सब सुख छूट जाते हैं. वह एक ऐसे परिवार के सुखों का कन्धा बनती है, जिनमें उसका योगदान शून्य गिना जाता है. घर की चारदीवारी में क़ैद जीवन. चौबीस घंटे की नौकरी. झिड़की, पहरे और उलाहनों से भरे दिन रात. ऐसे में जीवन कितना कठिन हो जाता है ये समझना उस आदमी के बस की बात नहीं है. जो आदमी औरत का मालिक कहा जाता है.

मैं मनोविज्ञान का विद्यार्थी नहीं हूँ. मुझे जादू भी नहीं आता है. लेकिन इतना ज़रूर लगता है कि ऐसे में सोशल हिस्टीरिया ही इकलौता सहारा है. कि हमारी तरफ भी देखो.

ओ वीर बहादुर आदमियों 
औरतों की ये कटी हुई चोटियाँ 
तुम किसी मैडल की तरह 
अपने साफे-टोपी में क्यों नहीं टांग लेते?

June 29, 2017

अपने जानने से परे

बारिश के इंतज़ार में कभी बारिश आ जाती है। हम बीज बोने के बाद नन्हे पौधे की प्रतीक्षा करते हैं। एक दिन वहीं टहनियां बन जाती हैं। हम सोचते हैं फूल खिल आएं। किसी सुबह कोई फूल खिला होता है। कभी हम सोचते हैं कि ज़िन्दगी गुज़र जाए तो अच्छा। एक रोज़ पाते हैं कि ज़िन्दगी गुज़र चुकी है। हम सचमुच जानते हैं कि क्या होना है। हम बस अपने जानने को मानना नहीं चाहते।

जीवन की दिव्य दृष्टि के समक्ष हमारा ज्ञान सबसे बड़ी बाधा है।
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June 16, 2017

वक़्त के रिसायकिल बिन में

हवा हो जाते हैं गीले बोसे
खो जाती हैं सलवटें बिस्तरों से।

गुलाबी रंगतें
मिट जाती है किसी याद के साथ।

वक़्त के रिसायकिल बिन में
गुम हो जाती है पूरी ज़िन्दगी।

मगर ऐ दोस्त !
उस दिन से पहले।

बिना इंतज़ार की कब सुबह होती है
कब मोहोब्बत की आखिरी शाम आती है।
* * *

एक बात अलसाई हुई
जाती हुई इस सांझ में।

बैठी है खिड़की में दो तरफ पांव डालकर।

तुम्हारी कसम।
* * *

दिल जला तो जल गया, जाने दो
अब होठों को जलाकर क्या होगा?

बाबू, बर्फ़ ज़रा सी ही रखना।
* * *

जाल नया था मछुआरे का
पर मछली वही पुरानी थी।

वो इश्क़ को वापस छोड़ आता था और इश्क़ उसे फिर खोज लेता था।
* * *

June 12, 2017

वही बरसों का वीराना.

मेरे पहलू में आकर के 
अभी से तुम क्या बैठोगे।
अभी तुमको कितने ही काम बाकी है
शादी है, मिन्नतें हैं, तल्खी है उदासी है।
* * *

वही इक रात का सौदा
वही बरसों का वीराना.

जो आ जाओ तो क्या है, ना ओओगे तो क्या होगा. 
* * *

अंगुलियां एक अक्षर लिखती है
और दिल दो-दो बार धड़कता है।
यही इक बात है जिस पर, अभी तक प्यार आता है।
* * *

सोचते थे कि
बड़ी कीमती शै है ज़िन्दगी।
मगर क्या पता था
कि कुछ पी लेंगे, किसी को चूम लेंगे 
और यही करते हुए मर जाएंगे।
* * *
अब तक बना लिया होता दूसरा पेग
और बालकनी धुएं से भर गई होती।
अब तक
इनबॉक्स में ये लिखकर मिटा भी दिया होता 
कि तुम्हारी याद आती है।
तुम गए तो ज़िन्दगी चलती रही मगर
एक व्हिस्की न हो तो सब काम ठहर जाते हैं।
* * *

June 9, 2017

वजह कुछ भी हो सकती थी


अच्छा क्या परेशां होते हो?

नहीं

क्यों?

इसलिए कि इतनी दूर से जब तुम अपना मन कहते हो. तब मुझे समझ आता है कि ये अभी की ज़रूरत है. इस वक़्त मुझे होना चाहिए. मैं चुपचाप लगातार सुनूँ.

क्यों?

कि ये लम्हा इसी लम्हे के लिए है. बाद में नहीं रहेगा.

अच्छा जो कुछ सुना कहा जाता है उससे बाद में रिग्रेट नहीं होता?

कभी कभी होता है कि आदमी औरत का मन ऐसा क्यूँ बनाया है. चाहनाएँ वन लताओं की तरह उलझी-उलझी क्यों उगती हैं.

इसलिए कि तुम सुलझाओ.

कबूतर के पंखों की आवाज़ आई. कबूतर जानबूझकर अपने पंखों को आपस में टकराकर बजाता है. इसलिए कि उसे लगता है कुछ गलत होने वाला है.

लड़के ने सोचा क्या गलत होगा. अब तक कितनी ही लड़कियां और अधेड़ होने को भागी जाती औरतों को वह जानता है. एक-एक के कितने कितने सम्मोहन. कितने-कितने रिश्ते. वे मानती नहीं थी. मगर उसने ख़ुद देखा है. वे संदेशे भेजकर छेड़ में लगी रहती थी.

एक रोज़ लड़की ने कहा- “ये ट्राय एंड एरर मेथड है. चाबी को हर ताले में ट्राय करो. जो खुल जाये सो अच्छा. इसी तरह तुम मेरे आस आये थे न?” वह भौंचक था. इसलिए नहीं कि ये बात सच थी. उसके पास तो बीसियों न्योते रखे होते. इत्ते साफ कि कहो तो मर जाएँ. उन न्योतों पर ही ही ही का वर्क लगा होता था. ये वर्क इसलिए होता कि अपनी असल चाहना को हंसी से कुछ अलग रंग दिया जाये.

लड़की का पहला सवाल था- “मुझसे पहले कितनी थी?”

जवाब में लड़के ने कहा- “तुम बीसवीं हो?”

इसके बाद लड़की ने बीसियों के बारे में जानना चाहा. किन्तु लड़का केवल दो के बारे में बातें किया करता था. दो के बारे में बताने के पीछे एक कारण ये हो सकता था कि लड़का एक निर्लज्ज कामी व्यक्ति कहलाने की जगह थोडा ख़राब प्रेमी सा कहलाये. एक और वजह हो सकती थी कि वास्तव में ऐसा कुछ कभी हुआ ही न हो. 
* * *

अचानक एक शाम लड़के का फोन गिर गया. उस फोन पर बहुत से स्क्रेच आ गये. उसने थके मन से फोन को उठाया. वह वास्तव में कुछ महीनों से फोन को बदल लेना चाहता था. उसने सोचा कि फोन के स्क्रीन पर आखिरी बार अंगुली घुमाए. लेकिन उसने ऐसा किया नहीं.

रात हो चुकी थी. सड़क पर कम लोग थे. 
* * *

एक कठिन मौसम होता है घर से भाग जाने का लेकिन ख़ुद से दूर भाग जाने का मौसम सबसे कड़ा होता है.
* * *

June 7, 2017

भाग जाने के मौसम की याद

औरत ने एक लम्बा कोट पहना हुआ था. गरदन को मफलर से ढका हुआ था. हाथ कोट की आगे वाली जेबों में थे. आदमी एक फॉर्मल कोट में था. उसके सफ़ेद शर्ट पर गहरी नीली टाई बाँध रखी थी. टाई का जरा सा ऊपरी हिस्सा और गांठ दिख रही थी. उन्होंने हाथ मिलाये. दोनों के हाथ एक से गर्म थे लेकिन सख्ती की तासीर अलग थी. 

“कभी सोचा न था इस तरह?” आदमी के चेहरे पर मुस्कान थी. 

औरत की आँखों में हलकी चमक थी- “मुझे मालूम था कि हम किसी शहर में फिर से एक साथ होंगे.” 

टेबल का टॉप गहरे भूरे रंग का था. उस पर एक गुलदान रखा था. उसमें दो टहनियों के सिरे पर लगे दो फूल रखे थे. आदमी ने उसे अपने दायें हाथ से किनारे कर दिया. उसे ऐसा करते हुए औरत ने देखा. और आदमी ने जब औरत को देखते हुए देखा तो पूछा- “क्या..” 

“क्या करते हो?

“कुछ नहीं करता.”

औरत की आँखों में जो मुस्कान थी. वह अब उसके होठों पर आ गयी- “कुछ नहीं करने के लिए दिन भर क्या करना पड़ता है?”

“सीरियसली... कुछ नहीं. आज सुबह इसी ख़याल में जागा था कि हमको मिलना है. फिर पता है मैं दो घंटे तक कुर्सी पर बुद्ध हुआ बैठा रहा.” इतना कहकर आदमी फिर बुद्ध होने की तरह हो गया. औरत ने एक बार आहिस्ता से मुड़कर देखा. सब टेबल खाली थी. एक कोने में बैठे अकेले लड़के के सिवा. अपनी नज़र को लौटाकर औरत ने कहा- “पूछो मुझे क्या याद आया?”

“क्या?”

“मुझे वह शाम याद आई, जब मैं बास्केटबाल की प्रेक्टिस के लिए आई थी. तुम स्कूल की दीवार पर बैठे थे. मैंने पूछा था कि यहाँ क्या कर रहे हो. तो तुमने कहा था कुछ नहीं. और इसके बाद कुछ और पूछा तो तुमने सीरियसली कहा था. तुमने आज भी कहा- सीरियसली” 

आदमी अचानक असहज होने लगा. उसे लगा कि कोट धूल में बदल कर झरने लगा है. टाई का कसाव गुम हो रहा है. ऐसा कभी हो नहीं सकता था कि कपडे अचानक धूल होकर झरने लगें. लेकिन फिर भी उसने अपने सीने की तरफ देखा. उसने टाई को छुआ. उसके चेहरे पर एक बेहद फीकी सी मुस्कान आई. वह शर्मिंदा होने लगा कि जाने क्या समझेगी. 

उसने देखा कि औरत दीवार की तरफ देख रही है. 

गले को आवाज़ किये बिना साफ़ करते हुए उसने औरत से पूछा- “क्या हुआ...”

औरत ने दीवार की तरफ देखते हुए ही कहा- “तुम हंस पड़ोगे.”

“बताओ”

“नहीं”

“पक्का नहीं हसूंगा” 

औरत की आँखों में वही हलकी चमक आने लगी- “मुझे लगा कि खूँटी पर टंगा मेरा ओवर कोट रेत होकर बिखर रहा है” 

हँसना तो दूर, आदमी मुस्कुराया भी नहीं. उसने कहा- “हमारी उम्र मौसमों के टुकड़ों से बनी है.”

औरत उसे देख रही थी. उसे अचम्भा था कि मेरे बेतुके ख़याल को सुनकर इसे ज़रा भी हंसी न आई. और ये उम्र के मौसमों की बात करने लगा. 

आदमी ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा- “तुम्हें याद है केन्टीन के आगे वाली खुली जगह. जहाँ चौकोर पत्थर लगे थे. वहां एक सायकिल स्टेंड था. जिन शामों को स्कूल में स्पोर्ट्स प्रेक्टिस नहीं होती थी न, उन सब शामों को मैं वहां जाया करता था. उस खाली पड़े रहने वाले स्टेंड पर बैठा रहता था. वहां कोई नहीं आता था.”

“कोई नहीं आता था तो ?”

“तो भी मुझे लगता था कि जैसे कोई आएगा”

औरत को इस बात पर एतबार नहीं हुआ. उसे लगा कि वह कहानी बना रहा है. औरत ने कहा- “मैंने तुम्हें कभी वहां नहीं देखा. तुम्हें पता है न उस जगह के सामने ई ब्लॉक है. हमारा क्वाटर वहीँ था.”

आदमी ने कहा- “सीरियसली” 

“क्या सीरियसली...”

“वो जो बचपन के बाद का मौसम था न, वह बस वही था. उस रुत में जो फूल खिलते थे न, वे उदास होते थे. उस मौसम में लगता था कि कहीं भाग जाएँ. उसी मौसम में ये मालूम न था कि भाग कर जायेंगे कहा?” 

औरत के चेहरे पर कोई सलवट नहीं आई थी. मगर उसे लग रहा था कि उसके चेहरे पर सलवटें उतर रही हैं. और ये आदमी जाने क्या सोचने लगा होगा. ये कैसे हो सकता है कि उस दिनों मैं भी भाग जाने का सोचा करती थी. मुझे भी घर उदास करता था और मैं बाहर खुले में बैठना चाहती थी. 

“कुछ सोच रही हो?”

“हाँ कि तुम सही कहते हो. वह एक उम्र का टुकड़ा होने से अधिक एक मौसम था.” 

आदमी ने पूछा- “तुम क्या करती हो?”

“एक स्कूल में काउंसलर हूँ. बच्चों से बातें करती हूँ. उनकी दोस्त हूँ?”

इतने में दो कप कॉफ़ी और एक छोटा सा केक का टुकड़ा चला आया. बाहर ठंडी हवा चल रही थी. दोपहर के तीन बजे थे. मौसम का एक और टुकड़ा उन दो लोगों को लिख रहा था. 

जब वे बाहर आ रहे थे तब औरत ने कहा- “स्कूल के उस आखिरी साल की बात करते हुए अचानक मुझे लगा कि मैंने कुछ ज्यादा गरम कपड़े पहन लिए हैं.” आदमी उसकी ओर देख रहा था. औरत ने कहा- “ऐसा न समझो कि तुमसे मिलने के लिए ऐसे कपड़े पहने हैं. मैं इतने सारे ही कपड़े पहनती हूँ. मुझे बहुत ठण्ड लगती है.”

आदमी ने कहा- “एक मज़ेदार बात बताता हूँ. हँसना मत”

“हाँ बताओ” 

“मैं कोट और टाई कम पहनता हूँ. इनको पहनने से मुझे स्कूल का पासिंग आउट डिनर याद आता है. फिर जी उदास होने लगता है.”

वे दोनों अभिवादन करके अलग हो गए थे. 

आदमी पता नहीं क्या सोचता हुआ गया मगर औरत ने सोचा कि उसने मनोविज्ञान में मास्टर्स करने के दिनों में क्या पढ़ा था? जब वह अपने प्रेक्टिकल के लिए प्रश्नावली लिए यूनिवर्सिटी के हर डिपार्टमेंट में घूमती थी. लड़के और लड़कियों से सवाल-जवाब वाले फॉर्म भरवाती थी. उनमें क्या सवाल होते थे? 

उसकी आँखों में चमक आई. उसने तय किया कि वह अगली बार से सीनियर विंग के बच्चों की पर्सनल काउंसलिंग में ये ज़रूर पूछेगी कि क्या वे घर से भाग जाना चाहते हैं?
* * *

मौसम कहीं जाते नहीं है. वे केवल रुख बदल लेते हैं. आपके पास तहें खोलने का समय और मन हो तो वे आस पास मिल जाते हैं. 

June 5, 2017

कोई ज़रूरी है कि सबकुछ कहूँ?

कोई दीवार ही होते तो कितना अच्छा होता
मौसमों के सितम सहते और चुप रहते.

इक दिन बिखर जाते, बिना किसी से कोई शिकवा किये हुए.
***

"आपके आसपास अदृश्य आवरण है. मुझे नहीं पता कि इसे कैसे कहूँ. इस औरा के भीतर आने का रास्ता नहीं मिलता. या कई बार मन चाह कर भी भीतर आने से मुकर जाता है. दूर बैठकर देखता रहता है.

मुझे आपसे बहुत कुछ कहना है. मेरी चाहना है कि आप सुनें. आप मेरे पास बैठे रहें. नहीं, मैं आपके पास रहूँ. आप कितने बंद-बंद से हैं. आपकी ओर से कभी ऐसा फील नहीं आता कि लगे आपने मेरे बारे में सोचा. आपने चाहा हो कि मैं कुछ कहूँ. आपने कभी आगे होकर कोई बात नहीं की. कई बार मैंने इंतज़ार किया. थकान हुई और फिर बंद कर दिया.

मुझे लगता है कि मिल लेना, पास बैठ लेना. बात कर लेना जैसी छोटी-छोटी बातें भी कितनी दुश्वार हैं. बाकी ज़िन्दगी का तो क्या कहूँ. कितनी थकान होती है. कभी डिप्रेशन आने लगता है और भी जाने क्या- क्या? जाने दीजिये आप नहीं समझेंगे."

एक चुप्पी आ बैठी. वह देर तक बैठी रहती इससे पहले मैंने तोड़ दिया. "ऐसा थोड़े ही होता है कि जो जैसा दिखे वैसा ही हो. कई बार हो सकता है कि जिसे आप आवाज़ देना चाहते हैं, वह आपका इंतज़ार कर रहा हो."

आसमान को देखते हुए ख़याल आया कि शायद चाँद वाली दसवीं रात होगी. हवा मद्धम थी. दो रोज़ पहले की बरसात की ख़ुशबू बाक़ी थी. या शायद कहीं आस पास कुछ बरसा होगा. हवा उस ख़ुशबू को अपने साथ ले आई होगी.

जाने क्यों इतना इंतज़ार करना रास आता है. कितनी सरल सी बात है. साफ़ कह देनी चाहिए, तुम्हारे पास होना है. बस.

क्या होगा? इस पर कभी नहीं सोचना चाहिए. कि ज़िन्दगी बहुत कुछ को बहुत जल्दी भुला देने का हुनर जानती है.
* * *

अचानक लगा
कि घिर आई है शाम.

फिर लगा कि ये तुम हो.

कभी भरे-पूरे घर में खालीपन उतरते देखा है? कि आँखें बुझती जा रही है. कि साँस भारी हो गयी है. कि थकान ने मार गिराया है, मन, देह और आत्मा को. साँस एक मरोड़ बनकर ठहर जाये. गले के बीच अटकी हुई. सीने में कोई पत्थर बढ़ता हुआ. 

उस वक़्त जब लगे कि अगले पल जाने क्या होगा. अगला पल कैसे आएगा?
* * *

कोई ज़रूरी है कि सबकुछ कहूँ? इतना कहना काफ़ी होता है कि अभी आ जाओ.
* * *

June 2, 2017

वह उसी औरत में ढल गया

उसकी अंगुली को पहली बार छुआ था तब शाम होने को थी. शायद हो चुकी होगी. एक जरा आधे हाथ का फासला था. इससे कुछ देर पहले एक रेस्तरां में बैठे थे. बीयर की छोटी बोतल के पास से कोई नन्हीं बूँद फिसलती और टेबल तक पहुँच जाती.

आदमी की जामातलाशी ली जाती तो उसके पास से ऐसी कोई चीज़ बरामद नहीं होती जिससे उसके अतीत का पता चलता. अक्सर वह जहाँ से उठता सबकुछ पीछे छोड़ आता था. जैसे कि थोड़ी देर बाद वे दोनों बीयर की खाली बोतलों और खाने की प्लेट्स को छोड़कर उठते. बाहर आने के बरसों बाद भी उस औरत को याद रहता कि वह बीयर पी रही है. उसने आदमी के सामने बैठे अपनी प्लेट में खाया है. कोई एक चीज़ थी जो दोनों ने आखिर में बांटकर खायी.

मगर

वह आदमी उस बीयर का, खाने का, उस लम्हे का शुक्रिया कहता. अगले पल सोचता कि अब कहाँ जायेगा? वह कहीं भी जा सकता था. अक्सर वह ऐसे ही गया जब भी गया. जिस तरह बीयर खत्म हो गयी थी. जिस तरह खाना पूरा हो गया था. उसी तरह अगर औरत का इस साथ से मन पूरा हो गया होता तो? आदमी हाथ मिलाता. वह पास आती तो उसे गले लगाता और फिर किसी सराय की तलाश में चल देता. बिना ये सोचे कि इससे आगे वह कहाँ जायेगा.

मोहोब्बत कुछ नहीं होती. अगर कुछ हुई होती यो उसके पास क्या न था. शादी थी. शादी से पहले के रिश्ते थे. शादी के बाद के रिश्ते थे. खत्म हुए रिश्ते थे. उदासीन रिश्ते थे. बिछड़े हुए रिश्ते थे. ज़िन्दा रिश्ते थे. दफ्तर के रिश्ते थे. लम्बी दूरी के रिश्ते थे. इस सब में थे ही सच था. बाक़ी शाम होने और सिगरेट पीने की तलब के सिवा कोई नई चीज़ न थी.

एक रोज़ आदमी ने पाया कि वह उसी औरत में ढल गया है.

शाम होने पर एक दो बार सिगरेट पीने लगा है. दूर तक अकेले टहलते हुए अचानक चौंकता है. उसे सुनाई देता है- “लेट्स डू इट” फिर मुस्कुराने लगता है. हाँ सबकी सज़ाएं होती हैं. उस आदमी की भी यही सज़ा है.

अगर लिखना हो कि उसके जीवन का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या रहा? तो वह लिखेगा ज़रा ठहरो, ज़िन्दगी अभी बाक़ी है. जाने कोई गुनाह बाकी ही हो.

दो सूखे पत्ते नम मिट्टी में

एक रोज़ कोई कोंपल खिली जैसे नज़र फेरते ही किसी ने बटुआ पार कर लिया हो। एक रोज़ उससे मिला। फिर उससे ऐसे बिछड़ा जैसे खाली बटुए को किसी ने उदासी ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने या खूबसूरत स्त्री को इरादतन चूमने जितना ही अवैध है.