June 16, 2017

वक़्त के रिसायकिल बिन में

हवा हो जाते हैं गीले बोसे
खो जाती हैं सलवटें बिस्तरों से।

गुलाबी रंगतें
मिट जाती है किसी याद के साथ।

वक़्त के रिसायकिल बिन में
गुम हो जाती है पूरी ज़िन्दगी।

मगर ऐ दोस्त !
उस दिन से पहले।

बिना इंतज़ार की कब सुबह होती है
कब मोहोब्बत की आखिरी शाम आती है।
* * *

एक बात अलसाई हुई
जाती हुई इस सांझ में।

बैठी है खिड़की में दो तरफ पांव डालकर।

तुम्हारी कसम।
* * *

दिल जला तो जल गया, जाने दो
अब होठों को जलाकर क्या होगा?

बाबू, बर्फ़ ज़रा सी ही रखना।
* * *

जाल नया था मछुआरे का
पर मछली वही पुरानी थी।

वो इश्क़ को वापस छोड़ आता था और इश्क़ उसे फिर खोज लेता था।
* * *

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.