August 27, 2017

प्रेम का जाने क्या होता है

सायकिल के कॅरियर पर बैठे
उनींदे बच्चे के पांव से गिरे
कच्चे हरे नीले रंग के जूते की तरह।

अक्सर कहीं पीछे छूट जाता है, प्रेम।
* * *

मैं चलते हुए अचानक रुक गया. जैसे कोई चिट्ठी जेब से गिर गयी. मुझे बहुत सालों से किसी ने चिट्ठी लिखी न थी. मैंने रेत में चारों तरफ देखा. वहां कोई चिट्ठी न थी. कोई कागज़ का टुकड़ा भी न था. एक काला मोती, सोने जैसी रेत में पड़ा था. अचानक मुझे याद आया कि उसके नाक पर बेढब तरीके से बैठा काला तिल सुन्दर दिखता है. उसके बच्चे बड़े हो गए हैं. मगर वह तिल उतना ही वहीँ ठहरा हुआ है.

मैंने कभी उससे नहीं कहा कि तुम्हारे नाक पर ये तिल कैसा लगता है. उसका वहां होना ही ठीक था. जैसे हम दोनों का एक साथ होते हुए भी एक साथ न होना ठीक था. ऐसे ही रेत में पड़ा काला मनका रेत के साथ होने पर ही सुन्दर था.

जाने क्यों प्रेम भी काले मोती की तरह रेत में सुन्दर दीखता तो है मगर बहुत जल्द खो जाता है.
* * *


छोटी नीली चिड़िया को
चाहिए होती है जितनी जगह
एक पतली सी टहनी पर।

सबको
बस उतना सा प्यार चाहिए होता है।
* * *

मेरी ज़रूरतें बहुत कम है
और तुम बहुत से अधिक हो।

मेरे लिए
तुम्हारा थोड़ा सा साथ
काफी से बढ़कर होता है।
* * *

शुक्रिया कहने का सलीका
नहीं सीखा जा सका, मुझसे।

मेरे पास तुम्हारे लिए, सदा भीगे होठ रहे।
* * *

तुमसे जो भी मिला
वह चाहना से ज्यादा निकला।

मिलने की बेचैनी बहुत गहरी रही
तुमसे बिछड़कर आंसू टूटकर बहे।
* * *

ठेलों पर पड़े
पुराने कपड़ों की तरह
पुराना प्रेम
बचा रहा स्मृति के खटोले पर।
* * *

समय रुक नहीं जाता था
घड़ी के बंद हो जाने पर।

इसलिए हम चाबी भरते रहे।

रुक गए प्रेम को
आगे बढ़ाने की जुगत न मिली।
* * *

पंछी उड़कर
फिर लौट आता है घोंसले पर।

कभी अचानक
हमेशा के लिए नहीं भी आता।

प्रेम का जाने क्या होता है।
* * *

धूप में पड़ी कुर्सी
एक दिन मर गयी।

दिल मे छुपाकर रखा प्रेम भी नहीं बचा।
* * *


प्रेम नदी के बीच का सफेद भंवर न था. वह भूरे पहाड़ की स्याह उपत्यका भी न था. उसने कहा- "आप मिलने के बाद भूल जाते हो" मैंने बहुत देर तक सोचा. मैं कितना खराब आदमी हूँ. इस तरह साथ होता हूँ जैसे इसके सिवा कहीं का नहीं हूँ. फिर इस तरह चला जाता हूँ कि जैसे कुछ था ही नहीं.

कमसिन लड़कियां और लड़के कभी नहीं समझ पाते कि उनकी ज़रूरत क्या है.

मैं जो समझता हूँ, वह तुम न समझो तो अच्छा है. प्रेम-प्रेम करना बड़ा रूमानी काम है. लेकिन दोस्त मुझे सिर्फ तुम्हारी ज़रूरत होती है. इतना समझ आता है. इसमें कितना प्रेम है? इस बारे में मैंने कभी सोचा नहीं.

तुम भी अगर न सोचोगे तो सुख पाओगे.
* * *

August 18, 2017

सराह एप - ओट से चलते बाण

असल में ऐप के पीछे छुपा हुआ शुभचिंतक आपकी हर तरह से हत्या का इरादा रखता है। आप समझ नहीं रहे।

मेरे पिता के ज़माने के लोग कहा करते थे कि अपनों को मुंह पर डांटते रहिये, पीठ के पीछे उनकी प्रसंशा कीजिये। एक ऐंटी सोशल एप ने बुजुर्गों की ये बात याद दिला दी है। अब चुपके से बिना नाम बताए ढेर तारीफें फेंकी जा रही हैं।

लेकिन मेरा एक डर अभी बाकी है। ये अदृश्य लोग कितने ख़तरनाक हैं। ये आपकी अच्छाइयों को आपके सामने स्वीकारते नहीं हैं। ये लोग आपके सामने प्यार और इज्ज़त से देखते नहीं लेकिन पसमंज़र में आपके लिए दिल उछाले जा रहे हैं। आपको अपना क्रश बता रहे हैं। आपको डेट पर चलने के न्योते दे रहे हैं।

किसी भी व्यक्तित्व को सम्मान और प्रेम चाहिए होता है। वह आपके मुख से अपने बारे में दो मीठी बातें सुनकर ख़ुश भी रहना चाहता है। हम ऐसा नहीं करते हैं।

एप पर आये संदेशे अगर आपने ख़ुद ख़ुदको नहीं भेजे हैं तो सावधान रहिये।

मैंने एप का उपयोग नहीं किया। अगर किया होता और कोई मुझे गुप्त तरीके से कहता कि आप अच्छी कहानियां लिखते हैं। तो ये हौसला अफ़ज़ाई क्या सचमुच होती? ऐसा क्यों है कि आप किसी को अच्छा कहने के लिए मुंह छुपाये रखना चाहते हैं। क्या किसी को सामने अच्छा कहने से आपका मुंह काला हो रहा है?

एप के पीछे छिपे लोग, आप जिन बातों के लिए डिजर्व करते हैं, उन गुणों के हत्यारे हैं।

August 16, 2017

जेएनयू परिसर की एक दोपहर


उदासी का कोई कवर नहीं होता। मगर वह धुंधली होकर मिट जाती है।

August 12, 2017

मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 

पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 

दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो. 
* * *

मेरी आँखों में
मेरे होठों पर
मेरे चश्मे के आस पास
तुम्हारी याद की कतरनें होनी चाहिए थी.
लेकिन नहीं है.

ऐसा हुआ नहीं या मैंने ऐसा चाहा नहीं
जाने क्या बात है?
* * *

मैं नहीं सोचता हूँ
गुमनाम ख़त लिखने के बारे में.
मेरे पास कागज़ नहीं है
स्याही की दावत भी
एक अरसे से खाली पड़ी है.

एक दिक्कत ये भी है
कि मेरे पास एक मुकम्मल पता नहीं है.
* * *

कल रात तुम्हें शुभ रात कहने के
बहुत देर बाद तक नींद नहीं आई.

मैं सो सकता था
अगर
मैंने ईमान की किताबें पढ़ीं होती

मुझे किसी कुफ़्र का ख़याल आता
मैं सोचता किसी सज़ा के बारे में
और रद्द कर देता, तुम्हें याद करना.

मैं अनपढ़ तुम्हारे चेहरे को
याद में देखता रहा
न कुछ भूल सका, न सो पाया.

कल रात तुम्हें शुभ रात कहने के बहुत देर बाद तक.
* * *

तुमको
पहाड़ों से बहुत प्रेम था.

तुम अक्सर मेरे साथ
किसी पहाड़ पर होने का सपना देखती थी

ये सपना कभी पूरा न हो सका
कि पहले मुझे पहाड़ पसंद न थे
फिर तुमको मुझसे मुहब्बत न रही.

आज सुबह से सोच रहा हूँ
कि तुम अगर कभी मिल गयी
तो ये किस तरह कहा जाना अच्छा होगा?

कि मैं
एक पहाड़ी लड़की के प्रेम पड़ गया हूँ.

फिर अचानक डर जाता हूँ
अगर तुमको ये बात मालूम हुई
तो एक दूजे से मुंह फेरकर जाते हुए
हम ऐसे दिखेंगे
जैसे पहाड़ गिर रहा हो
रेत के धोरे बिखर रहे हों
समन्दर के भीतर कुछ दरक रहा हो.

और आखिरकार मैं पगला जाता हूँ
कि मैंने उस पहाड़ी लड़की को अभी तक कहा नहीं है
कि मैं तुमसे प्रेम करता हूँ.

हमारे बीच बस इतनी सी बात हुई है
कि एक रोज़
वह मेरे घुटनों पर अपना सर रखकर रोना चाहती है.
* * *

मैं कितना नादान था।

हर बात को इस तरह सोचता रहा
जैसे हमको साथ रहना है, उम्रभर।

दफ़अतन आज कुछ बरस बाद
हालांकि तुम मेरे सामने खड़ी हो।

तुमको देखते हुए भी
नहीं सोच पा रहा हूँ
कि एक रोज़ तुम अपने नए प्रेमी के साथ
इस तरह रास्ते मे मिल सकती हो।

तुम पूछा करती थी
क्या हम कभी एक साथ हो सकते हैं?

मैं हंसकर कहता-
कि क्या नहीं हो सकता इस दुनिया में।

अब सोचता हूँ
कि सचमुच क्या नहीं हो सकता इस दुनिया में।

मैं कितना नादान था।

[Painting courtesy : Jean Haines]

इस रुत


तुरई के पीले फूलों पर
भँवरे मंडराते रहे
बेरी में घोंसला बनाती रही नन्ही काली चिड़िया
बेशरम की बेल चढ़ गई नीम की चोटी तक
मन, ख़रगोश घर के बैकयार्ड में खोया रहा।

इस रुत कहीं जाने का मन न हुआ।


August 9, 2017

और कोई प्रेम नहीं तुमको

सघन दुःख की भाषा में ठीक से केवल हिचकियाँ लगीं होती हैं.

दुःख जब घना होता है तब हम जिस भाषा में प्रखर होते हैं, उसी भाषा में अल्प विराम ( , ) अर्द्ध विराम ( ; ) पूर्ण विराम ( । ) विस्मयादिबोधक चिह्न ( ! ) प्रश्नवाचक चिह्न ( ? ) योजक चिह्न ( - ) अवतरण चिह्न या उद्धरणचिह्न ( '' '' ) लोप चिह्न (...) लगाना भूल जाते हैं.

ठीक वाक्य विन्यास और बात सरलता से समझ आये, ये तो कठिन ही होता है. 

* * *

दुःख के सामने घुटने मत टेको. दुःख को उबालो और खा-पी जाओ. 

आलू, अंडे और कॉफ़ी की एक पौराणिक कथा है. एक बेटी ने पिता से कहा- "पापा मेरे सामने असंख्य समस्याएं हैं. मैं दुखी हो गयी हूँ." पिता उसे रसोई में ले गए. तीन मर्तबानों में पानी डाला और उनको आंच पर रख दिया. एक मर्तबान में आलू डाला, दूजे में अंडा और तीसरे में कॉफ़ी. कुछ देर आंच पर रखने के बाद पिता ने कहा- "देखो, इन तीन चीज़ों के सामने एक सी विषम परिस्थिति थी. इस आंच को सहने के बाद, आलू जो कि सख्त था. वह नरम हो गया है. अंडा जो कि एक कच्चे खोल में तरल था, वह सख्त हो गया है. और कॉफ़ी ने तो पूरे पानी को ही, अपने जैसा कर लिया है."बेटी ने अपना सर हिलाया और कहा- "हाँ" पिता ने कहा- "मुश्किलें कैसी भी हों. हम उनका सामना करके क्या बनते हैं? ये महत्वपूर्ण है. हमें कॉफ़ी की तरह दुखों को ख़ुद में घोल लेना चाहिए.उन पर हावी हो जाना चाहिए" 

मैं होता तो बेटी से कहता- "तुम क्या पहले खाना पसंद करोगी? आलू या अंडा?" 

इसलिए कि ज्यादा फर्जी ज्ञान अच्छा नहीं होता. ज्ञान के नाम पर किसी को बरगलाने से अच्छा है कि तुमको जो अच्छा लगे वह पहले खा लो मगर ध्यान रखो कि कॉफ़ी ठंडी न हो जाये. वर्ना दोबारा गर्म करनी पड़ेगी. 
* * *

महाभारत में धर्म और न्याय के नाम पर जितनी मनुष्यता की क्षति हुई, उसमें तेरहवें दिन की क्षति सबसे भारी थी. हरेक युद्ध मनुष्यता की राह का रोड़ा है. लेकिन चक्रव्यूह के भीतर भी नियम तोड़ दिए जाएँ तो ये अति की पराकाष्ठा है. अभिमन्यु ने चक्रव्यूह में प्रवेश किया लेकिन राजा जयद्र्थ ने पांड्वो को अंदर आने से रोक दिया था. चक्रव्यूह में अभिमन्यु ने असंख्य योद्धाओ को मार गिराया. इनमें वृह्द्व्ला, कोसल और करथा के राजा, भोजराज , शल्य पुत्र रुक्मरथ शामिल थे. इनके अलावा उसने दुर्योधन के पुत्र को भी मार दिया. दुर्योधन ने क्रोधित होकर दुशाशन के पुत्र दुर्माशन को अभिमन्यु को मारने भेजा किन्तु वो स्वयं मारा गया.

इस पर क्रोधित दुर्योधन ने अपने सभी योद्धाओ को एक साथ आक्रमण करने को कहा. अभिमन्यु अपना रथ, घोड़ा,तलवार और कवच तक खो चुका था. उस पर कई बाणों के साथ वार किया गया लेकिन अभिमन्यु अकेला, उन महारथियों पर रथ का पहिया लेकर टूट पड़ा. अपनी अंतिम सांस तक लड़कर, अभिमन्यु वीरगति को प्राप्त हो गया. 

इसी तरह हिंदी का पाठक हर असाहित्यिक युद्ध के चौथे, पांचवें या तेरहवें दिन मारा जाता है. गुरु-शिष्य, प्रवचनकर्ता-श्रोता या गडरिये-भेड़ के खोल से कांव-कांव करते पक्षी बाहर आते हैं. अपमानित स्त्री के पक्ष में अपमान करने वाले की स्त्री को नोचना चाहते हैं. बेटी को इस कीच में घसीटना चाहते हैं.
साहित्य की इस कुमति बेल ने अकूत वंश वृद्धि कर ली है. अब हर कोई किसी न किसी की ज़ुबान से गिर पड़ता है. 
* * *

प्रगतिशील. जनवादी, लोक कल्याणकारी, स्त्रीवादी होने में, देखना-सोचना-समझना भूल गए हो. प्रिये तुम अपने सारे वाद एक बार उतार कर नीचे रख दो. ये बोझ हो गए हैं. तुम कहना कुछ चाहते हो और तुम्हारे मुंह से निकल कुछ और रहा है. तुम जिसके विरोध में हो, उसी के पाले में खड़े हो. नीचे देखो. लाइन कहाँ हैं? 

और कोई प्रेम नहीं तुमको. 
* * *

अपनी समस्त खामियों के लिए क्षमा याचना करते हुए.

दो सूखे पत्ते नम मिट्टी में

एक रोज़ कोई कोंपल खिली जैसे नज़र फेरते ही किसी ने बटुआ पार कर लिया हो। एक रोज़ उससे मिला। फिर उससे ऐसे बिछड़ा जैसे खाली बटुए को किसी ने उदासी ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने या खूबसूरत स्त्री को इरादतन चूमने जितना ही अवैध है.