October 28, 2017

क्या होगा सोचकर

उसकी आँखें, रेत में हुकिए का बनाया कुआं थी. मैं किसी चींटी की तरह उसे खोजता रहता था. प्रेम पूर्वक उस भुरभरी रेत पर फिसल जाना चाहता था. उसके दांतों से मुक्ति मेरी एक कामना थी.

उसके होंठ बंद रहते थे, मैं देर तक चुप उनको देखता था. कि हंसी की उफनती लहर आएगी और मैं एक पतली नौका की तरह उसमें खो जाऊँगा. मगर जिस रोज़ मैंने जाना कि वह किसी के प्रेम है. उसी रोज़ मैं रेगिस्तान की रेत के नीचे छुप गया.

यहाँ रेत के नीचे सीलन है, अँधेरा है पर यहाँ भी कभी-कभी उसकी आँखें याद आती हैं, यहाँ भी उसके बंद होठ दीखते हैं.


इसके आगे मैं नहीं सोचता हूँ. क्या होगा सोचकर...

[हुकिया समझते हैं? आंटलायन]



October 26, 2017

बेपरवाह जीना



दालान और मुंडेरों पर परिंदों के कुछ पंख गिरे रहते हैं. जैसे वे छोड़ गए हों अपने होने की चिट्ठी. लेकिन तुम सबसे अच्छे निकले कि जाते-जाते सब रिश्ते भी बुहार ले गए.

जाने से पहले कुछ देर तक 
तुम रुके होवोगे खिड़की के पास.

ऐसा लगता है.
* * *

शाखों से बिछड़े पत्ते
हो सकता है
मिट्टी के दीवाने हों।
* * *


रेखाएं जब मिटी तो कुछ नई बन गई
रंग कितने भी उतरे कुछ नए आ ही गए।
* * *

बंद खिड़कियों की कतार में आखिरी खिड़की खुली रहती है। जब भी इन खिड़कियों के पास से निकलता हूँ तो कबाड़ की तरह पड़ा एक चरखा दिखाई देता है। मैं सोचता हूँ कि शायद और भी चरखे होंगे। चरखे अनुपयोगी और उदासीन पड़े हैं। एक रोज़ इसी तरह हर कोई चलन से बाहर हो जाता है। लेकिन जीवन रास्ता तलाश लेता है कि भवन की छत की मुंडेर से एक पौधा उग आता है।

जीवन कितना अद्भुत है कि कभी लाख जतन किये फलता नहीं और कभी बेपरवाह खिलता जाता है। बगीचे सूख जाते हैं, जंगल अपनी मौज में बढ़ता है।


October 25, 2017

याद करते हुए एक बरस

शाम के ढलने से कुछ पहले बची हुई कच्ची धूप में लम्बी परछाइयां सामने की दीवार को ढक लेती थी। इयरफोन से झरती बातों को सुनते हुए आर्म गार्ड रूम के पास तक के चक्कर काटते हुए, एक ढलती दोपहर को देखा कि बेरी पर लाल-पीले रंग मुस्कुरा रहे हैं। उस पहली बार देखने से ही लगा कि तुमसे मिलने का यही मौसम है।

दफ़्तर के भीतर आने पर मालूम होता कि कमीज़ की बायीं जेब में या कुर्ते के दाएं बाए या कभी जीन्स की अगली जेब में कच्चे हरे, आधे पीले या लाल बेर रखे हैं। बेर की ख़ुशबू से स्टूडियो भर जाता। कभी कुछ बेर घर तक साथ चले आते थे।

वे कभी टेबल, कभी छोटी अलमारी के ऊपर या बिस्तर पर पड़ी किताबों पर रखे मिलते। ऐसा लगता कि हमारी बातों के बचे हुए रंगीन छोटे कंचे रखे हैं।

एक रोज़ बातें ख़त्म हो गईं।

बेर मगर हर साल आते रहे। बेरी पर उनका रंग हंसता रहा। जैसे वो याद दिलाने का रंग बन गया कि यही तो वो मौसम था, जब उतरती धूप का मतलब था, तुम्हारा फोन आना। देर तक टहलते हुए बच्चों के बारे में सुनना। आर्ट क्लास में बीती दोपहर। सुबह छूट गई बस। खुले पैसे। और ये शिकवे भी कि दुनिया इतनी बड़ी क्यों है। लोग इतने दूर घर क्यों बनाते हैं।

कोई रूठकर चला जाये कहीं तो क्या होता है?

बेरियां फिर लद जाती हैं कच्चे बेरों से 
याद करते हुए एक बरस और बीत ही जाता है।
* * *


October 24, 2017

जोगी ही बन जाएँ मगर

अंगुली की मुद्रिका, कानों के कर्णफूल, गले का हार, जेब में रखा बटुआ और साथ चलने वाला हमें अत्यधिक प्रिय ही रहते हैं।

हम ही उनको चुनते हैं। अनेक बार नई मुद्रिका की ओर हमारा ध्यान जाता है। उसे दूसरी अंगुलियां बार-बार स्पर्श करके देखती है। गले मे बंधे हार का आभास होता रहता है। जेब को नया बटुआ अपने होने का संदेश देता रहता है। नए साथी की ओर बारम्बार हमारा ध्यान जाता है। उसके पास होने भर से सिहरन, लज्जा, मादकता जैसी अनुभूतियाँ हमारे भीतर अग्निशिखा की तरह लहराती रहती है।

समय के अल्पांश में मुद्रिका, कर्णफूल, हार और साथी हमारा हिस्सा हो जाते हैं। हम इस तरह उनके अभ्यस्त हो जाते हैं कि उनका होना ही भूल जाते हैं। कभी सहसा चौंकते हैं कि मुद्रिका है या नहीं। गले को स्पर्श कर पता करते हैं कि हार वहीं है न। कर्णफूल को स्पर्श कर आराम में आते हैं। साथी को असमय अपने पास न पाकर विचलित हो जाते हैं। भय के छोटे-छोटे टुकड़े हमें छूते हैं और सिहरन भर कर चले जाते हैं।


एक दिवस। मुद्रिका की याद नहीं रहती। कर्णफूल, हार और वह सब जिसे हमने चुना था। उसके होने की अनुभूति मिट जाती है। जेब में पड़ा बटुआ चुभना बंद हो जाता है। पास में बैठे साथी को सोचने पर भी कुछ नहीं होता। उसके छू लेने पर भी वह स्पर्श जो हमें ज्वाला की तरह नृत्य में धकेल सके, गायब रहता है। सब कुछ का होना, न होने जैसा हो जाता है।

हमें आभास ही नहीं होता कि मुद्रिका पहनी है। कर्णफूल सजे हैं। हार दमक रहा है। बटुआ भरा-भरा जेब में रखा है। वो यहीं है, मेरे पास।

मुद्रिका, कर्णफूल, हार और बटुआ हमारे जीवन को आसान करने वाली वस्तुएं हैं। ये जीवन व्यापार में एक प्रकार का बीमा है। कहीं किसी कठिनाई में काम आती हैं। हमारा साथी जब साथ होता है तब एक आश्वस्ति साथ चलती है। हमारे पास मन बांटने को एक ठीया होता है लेकिन फिर किस प्रकार ऐसा हो जाता है कि इन अनमोल वस्तुओं और सम्बन्ध को हमारी चेतना इस प्रकार अंगीकार करती है कि उनका होना ही बिसरा देती है।

इनका होना कितना महत्वपूर्ण है। ये कोई भी समझ सकता है। किंतु प्रभायुक्त मुद्रिका, सौंदर्यवान कर्णफूल, अनमोल हार, धन से भरा बटुआ और योग्य साथी पर अक्सर चोर दृष्टि पड़ती ही है। हर कोई इन सबको पाना ही चाहता है। इनके पीछे कितने लोग लगे हैं, ये हम कभी जान नहीं पाते हैं। इनको बचाने के लिए हम अपना क्या गंवा सकते हैं, सोचना कठिन है।

इब्ने इंशा साहब कहते हैं कूचे को तेरे छोड़कर जोगी बन जाएँ मगर तो क्या साधु बन जाएं। त्याग दें कीमती, सुंदर वस्तएं। त्याग दें सुंदर योग्य साथी। या हठी होकर इन सबकी सुरक्षा के लिए रात और दिन अर्पित कर दें?

जीवन हर हाल में कठिन ही नहीं दुश्वार भी है। 
* * *

इक गांठ समझ नहीं आती कि आगे और दिखने लगती हैं। चीयर्स।

October 23, 2017

उसकी आमद का ख़याल

शाम और रात के बीच एक छोटा सा समय आता है। उस समय एक अविश्वसनीय चुप्पी होती है। मुझे कई बार लगता है कि मालखाने के दो पहरेदार अपनी ड्यूटी की अदला बदली कर रहे हैं। 

उन्होंने मालखाने के ताले पर गहरी निगाह डाली है। इसके बाद चाबियों के गुच्छे की खनक के साथ चुप्पी टूट जाती है। दूर तक एक बीत चुके दिवस की स्मृति पसर जाती है।
जैसे खाली प्याले के भीतर चाय की याद।
* * *

मेरे गालों पर लाल लकीरें खींचने फिर सर्दी आएगी।

दस्तानों में अंगुलियां डालते मुझे एक गार्ड देख रहा होगा। जाने कितनी ही बार की कोशिश के बाद स्टार्ट होगा स्कूटर। तब तक शिफ्ट के बाकी लोग पहुंच चुके होंगे पास की कॉलोनी में अपने घर।

पहले मोड़ पे छूकर गुज़रेगी बर्फ। मैं सोचूंगा कि क्या इस वक़्त भी कोई क़ैदी जागता होगा जेल में। कुछ दूर आगे एसपी साहब की हवेली से आती होगी व्हाइट स्पायडर लिली के फूलों की मादक गंध। जिलाधिकारी के घर से दिख जाएंगे आदमकद स्वामी विवेकानन्द, अस्पताल जाने वालों को निर्विकार देखते अपने हाथ बांधे हुए।

मैं स्कूटर धीरे चलाऊंगा। मैं लम्बी सांसें लूंगा। मैं देखूंगा दूर तक कि कोई नहीं है और रास्ते सूने पड़े हैं। रात के सन्नाटे ज़िंदा कर देंगे, तन्हा सूना रेगिस्तान। मैं उसे बाहों में भर लूंगा आधी रात को।

हर बार जब भी सर्दियां आएंगी भीड़ छंट जाएगी जल्दी-जल्दी। मुझे रेगिस्तान में भीड़ अच्छी नहीं लगती।

October 22, 2017

तुम्हारे लिए हमेशा

"तुम आ जाओ। तुम्हारा इंतज़ार है।" ऐसा कहने वाले ने आने का रास्ता भी रखा हो, ये ज़रूरी नहीं होता। उसने किसी पुरानी बात को याद करके महज इसलिए कह दिया होगा कि वह ख़ुद को ग़लत साबित न करना चाहता होगा।

हम इस लम्हे को सच जानते हैं। किसी आवेश में कह देते हैं कि तुम्हारे लिए हमेशा हूँ। एक घड़ी में हमारा मन बदल जाता है। फिर हम कभी इतने सच्चे और हिम्मती नहीं होते कि उसे कह दें। अब वो मन न रहा। जाने किस मोह में मैंने ऐसा सोच लिया कि सबकुछ हमेशा के लिए हो सकता है।

बातें और रिश्ते कभी-कभी पारदर्शी कांच बन जाते हैं। उनके आगे का संसार दिखता तो है मगर वहां तक जाने का कोई रास्ता नहीं होता।

हम सम्बन्ध की इति को नहीं स्वीकारते और भँवरे की तरह बन्द रास्ते के पार पहुंचने की आस में वहीं टूट बिखर जाते हैं।

October 20, 2017

इत्ती सी बात है

शाम बुझ गयी है
मैं छत पर टहलता हूँ
अपने चप्पलों से
एड़ी को थोड़ा पीछे रखे हुए।

सोचता हूँ कि
समय से थोड़ा सा पीछे छूट रहा हूँ।

हालांकि फासले इतने बढ़ गए हैं
कि नंगे पांव रुककर
इंतज़ार करूँ, तो भी कुछ न होगा।
* * *

कितना अच्छा होता
कि जूते और चप्पल समय के साथ चले जाते
हम वहीं ठहरे रह जाते, जहाँ पहली बार मिले थे।

फिर सोचता हूँ कि न हुआ ऐसा
तो अच्छा ही हुआ
तुम वैसे न थे, जैसा पहली बार सोचा था।
* * *

क्या होगा अगर हम मिले?
जिस तरह रेल के इंतज़ार में
फाटक बंद रहता है
मन उसकी प्रतीक्षा करता है।

रेल के आने पर
रात में पटरियां चमकती हैं
एक धड़क सुर साधती है।

तपी हुई पटरियां धीरे से ठंडी हो जाती है।

इसी तरह हम क्या करेंगे मिलकर।
कोई रेल की तरह आगे निकल जायेगा
कोई पटरी की तरह इंतज़ार में पड़ा रहेगा।
* * *

मुझे तुम्हारी हंसी पसन्द है
हंसी किसे पसन्द नहीं होती।

तुम में हर वो बात है
कि मैं पानी की तरह तुम पर गिरूं
और भाप की तरह उड़ जाऊं।

मगर हम एक शोरगर के बनाये
आसमानी फूल हैं
बारूद एक बार सुलगेगा और बुझ जाएगा।

इत्ती सी बात है।
* * *

पता नहीं वह कौनसा शहर था
शायद मुम्बई ही होगा
मगर ये याद है
कि तुमने कहा था, रम अच्छी है
ये हमारी मदद करेगी।

मुझे रम बिल्कुल नहीं पसन्द
मैंने सब जाड़े व्हिस्की के साथ बिताए।

कैसी बात है न
फिर भी मुस्कुराता हूँ
कि तुम रम पिये हो और मेरे साथ हो।
* * *

October 17, 2017

प्रिय को बदलते हुए देखकर

धीरे से बादल चले आये. दोपहर में शाम का भ्रम होने लगा.

बाहर निगाह डाली. खिड़की से दीखते सामने वाले घर की दीवार पर छाया उतरी हुई थी. एक गिलहरी ज़मीन की ओर मुंह किये लटकी थी. वह चुप और स्थिर थी मगर उसे इस तरह नीचे देखते हुए देखकर लगा कि वह है. उसे देखकर तसल्ली आई कि अभी सबकुछ ठहरा नहीं है.

शहतीर के नीचे उखड़े प्लास्टर में बने घरोंदे से झांकते तिनके हवा के साथ हिल रहे थे. लोहे के जंगले पर बैठी रहने वाली चिड़ियाँ गुम थी. इस तरह बाहर झांकते हुए लगने लगा कि ये कोई स्वप्न है. वही स्वप्न जिसमें ज्यादातर खालीपन पसरा होता है. दफ़अतन कुछ हमारे सामने आता है और हम उससे टकराने के भय से भरकर सिहर जाते हैं.

मन भी ऐसे ही सिहर गया. अचानक लगा तुम खिड़की के आगे से गुज़रे.

इस दौर में हमारे पास कितना साबुत मन बचा है. उसकी उम्र क्या है. इसलिए कि हम जल्दी-जल्दी लिखकर, तेज़-तेज़ बोलकर, कैमरा पर फटाफट देखकर, बाहों में भर लेने जैसा सबकुछ सच्चा-सच्चा लगने सा जी लेते हैं. और शिथिल होकर बैठ जाते हैं.

ठीक वैसे जैसे बादलों ने एक कड़ी दोपहर को छाँव से भर दिया हो.

आँखें सामने दिखती दीवार को देखती रहती है. कान, दूर तक जाकर किसी आहट का पता कर आते हैं. चुप्पी है. आँखें मुंदने लगती हैं. कोई साया आहिस्ता से सीढियों को चढ़ता, खुली पतली बालकनी की ओर मुड़ जाता है.

आंखें खुलकर खिड़की को एकटक देखने लगती हैं. कि वह साया दोबारा यही से गुज़रेगा. कोई नहीं गुज़रता. मन कहीं बहुत दूर किसी पुराने भव्य किले के द्वार पर जा बैठता है. बादल गुम गए हैं. दूर तक कड़ी धूप पसरी है. लम्बे दालान का फर्श गरम हो गया है. झरोखे खाली हैं. मेहराबें सूनी है. और कोई नहीं है.

कोई नहीं.

मन सोचता है यहाँ से उठ जाऊं. सामने सूने पड़े आस्ताने तक चला जाऊं. वहां जाकर बैठ जाऊं. एक थकान रगों के रास्ते पूरे बदन में फैल जाती है. कि वहां बैठकर किसका इंतज़ार करना होगा. शाम कब तक आएगी. उसके बाद क्या होगा. क्यों कोई आएगा. कोई आया तो वो कौन होगा. क्या वह मेरे पास किसी खम्भे से पीठ टिकाकर बैठेगा.

गिलहरी अब भी चुप है. नीचे देख रही है. जैसे हम अपने किसी प्रिय को बदलते हुए देखकर, हताशा में ठहर जाते हैं.

October 16, 2017

इतवार का स्वाद

मैं कहता हूँ- "तुम्हारे जैसे स्ट्रीक्स मेरे बालों में होते तो कितना अच्छा लगता." भावना मुझे थोड़ी ज्यादा आँखें खोलकर देखती है. मैं उसे समझाता हूँ कि ये जो तुम्हारे बाल हैं. इनमें दो रंग हैं. ऐसे बाल रंगवाने के लिए लोग पैसे खर्च करते हैं. भावना पूछती है- "कित्ते?" मैं कहता हूँ- "तीन हज़ार से तीस हज़ार रूपये" वह ऐसे हंसती हैं जैसे ऐसा हो ही नहीं सकता.

मैं कहता हूँ- "मुझे चोटी बनाने जित्ते लम्बे बाल अच्छे लगते हैं." भावना कहती है कि उसके भी चोटी बनती थी. अपने सर पर बालों को ऊपर की ओर लम्बा तानते हुए अंदाजा लगाती है- "इत्ती लम्बी तो थी." मैं कहता हूँ- "मैं इससे भी लम्बी चोटी और ऐसे स्ट्रीक्स वाले बाल बनाऊंगा." वह हंसती है. उसे लगता है कि मैं केवल उससे बातें बना रहा हूँ.

मैं अपने फेसबुक प्रोफाइल में अपनी चोटी वाली तस्वीर खोजने लगता लगता हूँ. वह अपनी ताई से कहती है- "ये क्या सब्जी है? उबलते-उबलते ही सौ घंटे लग जायेंगे." ताई कहती हैं- "ये तो अभी बन जाएगी. तेरी मम्मी बनाती है, सौ घंटे में ?" भावना कहती है- "पापा बनाते हैं."

"तो फिर पापा सब्जी बनाने का कहकर सो जाते होंगे."

भावना और ताई के सवाल जवाब सुनते हुए मुझे याद आया कि मेरे पापा तो कभी रसोई में नहीं जाते थे. उन्होंने मुझे बताया था कि कभी एक दो बार उन्होंने रोटी बनाई थी. उन्होंने साग कभी नहीं बनाया था. मगर पापा बाल बनवाने के मामले में बड़े सख्त थे. वे एक ऐसे नाई के पास ले जाते थे. जिसने मेरे दादा जी के भी बाल बनाये थे. प्रताप हेयर ड्रेसर वाले प्रताप चंद, हमारे सर को टेढ़ा नीचा करके बाल बनाना भूल जाते थे.

जब वहां से छूट जाते थे तो लगता था कि ज़िन्दगी कितनी खूबसूरत है. इस मुक्ति के बाद इतवार का स्वाद, इस दुनिया का सबसे मीठा स्वाद होता था.

October 14, 2017

दफ़्तर के चूहे, बिल्ली और सांप

सांप चूहे खा जाते हैं। इसलिए बिल्लियां उनको पसन्द नहीं करती। वे उनको मार डालती हैं।

हमारा आकाशवाणी वन विभाग के छोर पर बना है तो बहुत सारे सांप आते रहते हैं। विषैले और विषहीन। इधर बिल्लियां भी रहती हैं। वे अक्सर ड्यूटी रूम के सोफे पर सोई मिलती हैं। उनके बच्चे भी सोफे को बहुत पसंद करते हैं। ड्यूटी रूम में आने वाले मेहमानों को अक्सर याद दिलाना पड़ता है कि देखिए बिल्ली के बच्चे हैं। उन पर न बैठ जाना।

एक शाम को उद्घोषक डरी हुई बाहर गेट तक चली आई। सर प्ले बैक स्टूडियो के दरवाज़े पर मैंने सांप देखा। गार्ड ने कहा कि अभी देखते हैं। सांप कहीं इधर-उधर हो गया। वह लौट कर अंदर जाने लगी तो जनाब फिर से दरवाज़े पर रास्ता खोज रहे थे। वह वापस भागी। सांप को फिर हटा दिया गया। वे स्टूडियो में डर रही थी। उनको कहा कि आप मैं तेरी दुश्मन गीत प्ले कीजिये। अमरीश साहब के आने का सोचकर सांप खिसक लेगा।

एक शाम एक उद्घोषक की उद्घोषणा अधूरी रह गयी। माइक से दरवाज़ा खुलने की आवाज़ भर आई। वे बाहर आये और बोले। सर स्टूडियो के कंसोल पर फेडर्स के बीच एक बिच्छू आ बैठा है। उनको सुझाव दिया कि बिछुआ मोरे साजन का प्यार गीत चला लें। रूमान से भरकर बिच्छू लौट सकता है।

इधर कोबरा का एक परिवार रहता था। एक को ड्राइवर ने मार डाला। बाकायदा अंधविश्वास की जै जैकार करते हुए उसे अग्नि को समर्पित किया गया। एक कोबरा का हमारे इंजीनियर साथी ने बेहद क्रूरता से अंत कर दिया था। मुझे उसका भी गहरा दुख हुआ।

मैं एक शाम स्कूटर के पास पहुंचा तो कोई चीज़ तेज़ी से हिली। कैरेत फेमिली का छोटा सा बच्चा चेतावनी दे रहा था। दूर रहना प्यारे कहानीकार वरना सारी कहानियां यहीं धरी रह जायेगी। मैंने गार्ड को बुलाया और उनसे कहा कि अपना ख़याल रखियेगा। ये छोटे साहब इधर शिकार पर निकले हैं। इनके भाई बहन भी आस पास होंगे।

रेगिस्तान की रात में उमस के बढ़ते ही बिल में दुबके विषधर बाहर चले आते हैं। कई बार उनको स्टूडियो के बाहर तफरीह करते। बिल्लियों से लड़ते हुए, जान बचाकर भागते हुए देखा जाता है। इधर हैज़हॉग भी बहुत सारे हैं। ये झाऊ चूहे कभी पकड़ में आ जाते हैं तो फिर कोई उनसे बहुत देर तक खेलता रहता है। सावधानी से उठाने पर उनके कांटे नहीं चुभते। वे थोड़ी देर बाद अपनी थूथन को बाहर निकाल कर देखते हैं कि कहां फंस गए हैं। तब थ्री इडियट्स का डायलॉग ज़रूरी होता है। तू अंदर ही रहना चैम्प। बाहर बहुत सर्कस है।

इस सांप को कल रात अपनी जान गंवानी पड़ी है। सुबह से स्टूडियो के दरवाजे के पास इसकी देह पड़ी है। मैं इसकी तस्वीर उतार अंदर आकर बैठ गया। देर तक ख़याल रहे। क्या कुदरत है। कैसा जीवन है। मृत्यु जाने कहाँ प्रतीक्षा में बैठी है। इसी सोच में अभी थोड़ी देर पहले बिल्ली भी ड्यूटी रूम की खिड़की से अंदर आई। जैसे ही उसने मुंह अंदर घुसाया तो मैंने उससे कहा- "हत्यारिन कहाँ से आ रही हो?" उसने मुझे इग्नोर किया है और सोफे पर बैठ गयी है।

जालमा तू बड़ा वो है...

October 11, 2017

दूर से आते हुए पिता

पहले तो दिख जाते थे
दूर से आते हुए पिता।

अब धुंधला जाती हैं आंखें
भरी-भरी गली में
नहीं दिखता उनका आना।

कभी-कभी
इससे भी अधिक उदास हो जाता हूँ।

उन पिताओं के बारे में सोचकर
जो इसी तरह जा चुके बच्चों का
भूल से करने लगते होंगे, इंतज़ार।
* * *

मैं सो नहीं सकता हूँ
कि मैं सो गया तो
कौन जागेगा तुम्हारी याद के साथ?

तुम्हारे बिना
इस खाली-खाली दुनिया मे
कितनी तन्हा हो जाएगी तुम्हारी याद।
* * *

October 8, 2017

बिछड़ने के बाद के नोट्स

बाद बरसों के देखते हुए 
हालांकि हमें ज्यादा कुछ याद नहीं होता। 
फिर भी लगता है कि 
उसके चेहरे पर ऐसी उदासी पहले कभी न देखी थी।
* * *

वह हमेशा उल्लास से भरी रहती। एक जगह एक ही भाव में रुकना उसका हिस्सा न था। जब हमने तय किया कि अब आगे हम एक साथ नहीं हो सकते। तब भी उसने ज़रा सी देर चुप रहने की जगह गहरी सांस ली। कुर्सी से उठी और जल्दी में कुछ खोजने लगी।

बाद बरसों के देखा कि वह टेबल पर झुकी कुछ पढ़ रही थी। वह क्या पढ़ रही थी, ये नहीं जाना जा सकता था। इतनी एकाग्रता से उसे पढ़ते हुए कभी नहीं देखा था। वह जो जेब से बाहर दिखते पेन को पसन्द न करती थी, उसी ने पेन को दांतों में दबा रखा था। उसके बाएं गाल पर बहुत ऊपर का बड़ा तिल अब और बड़ा हो गया था। उसके बाल अब भी पहले की ही तरह उलझे थे, यही एक बात नहीं बदली थी।

मैंने अपने पैरों की तरफ देखा। मैंने काले फॉर्मल शू पहने हुए थे। मैंने याद करना चाहा कि सेंडिल पहने घूमना कब बन्द कर दिया था। मैं बदल गया था। मैं बदलना नहीं चाहता था। मैं उसके लिए वैसा ही रहना चाहता था केजुअल सेंडिल, जीन्स और सफेद कमीज वाला।

इससे पहले कि वह मेरे जूते देख लेती, मैंने पीठ फेर ली। मुझे लगा कि मैंने किसी अजनबी के जूते पहन लिए हैं। उन काले फॉर्मल जूतों के साथ तेज़ क़दम मैं उससे बहुत दूर निकल आया।

हालांकि हमारे बीच का सम्बंध बहुत साल पहले से ख़त्म था।
* * *

हम एक रोज़ दोबारा कभी नहीं मिलने के लिए बिछड़ गए थे।

फिर एक सुबह नियति ने हमें एक ही वेटिंग रूम में लाकर छोड़ दिया। बैंच के किनारों पर बैठे हुए दोनों ने शायद कई बार सोचा कि उठ जाएं। मगर जाने क्या बात थी कि कोई नहीं उठ पाया।

मैंने जैसे ही बैकपैक की पट्टियों को पकड़ा, उसने आंखें बंद कर ली। वह मुझे जाते हुए नहीं देखना चाहती थी या मेरे चले जाने के लिए आंखें मूंदे थी। मैं नहीं जानता। मगर उन बन्द आंखों को देखते हुए वेटिंग रूम से बाहर आना आसान था। 
* * *

बंद रास्ते अच्छे होते हैं। हम जानते हैं कि लौट जाना है। किन्तु खुले रास्तों पर हताश मन को कभी समझ नहीं आता कि वह किधर जाए।
* * *

October 7, 2017

आस्ताने में दुबकी छाँव

धीरे से बादल चले आये. दोपहर में शाम का भ्रम होने लगा. 

बाहर निगाह डाली. खिड़की से दीखते सामने वाले घर की दीवार पर छाया उतरी हुई थी. एक गिलहरी ज़मीन की ओर मुंह किये लटकी थी. वह चुप और स्थिर थी मगर उसे इस तरह नीचे देखते हुए देखकर लगा कि वह है. उसे देखकर तसल्ली आई कि अभी सबकुछ ठहरा नहीं है. 

शहतीर के नीचे उखड़े प्लास्टर में बने घरोंदे से झांकते तिनके हवा के साथ हिल रहे थे. लोहे के जंगले पर बैठी रहने वाली चिड़ियाँ गुम थी. इस तरह बाहर झांकते हुए अचानक लगने लगा कि ये कोई स्वप्न है. वही स्वप्न जिसमें ज्यादातर खालीपन पसरा होता है. अचानक कुछ हमारे सामने आता है और हम उससे टकराने के भय से भरकर सिहर जाते हैं. 

मन भी ऐसे ही सिहर गया. अचानक लगा तुम खिड़की के आगे से गुज़रे.
इस दौर में हमारे पास कितना साबुत मन बचा है. उसकी उम्र क्या है. इसलिए कि हम जल्दी-जल्दी लिखकर, तेज़-तेज़ बोलकर, कैमरा पर फटाफट देखकर, बाहों में भर लेने जैसा सबकुछ सच्चा-सच्चा लगने सा जी लेते हैं. और शिथिल होकर बैठ जाते हैं. 

ठीक वैसे जैसे बादलों ने एक कड़ी दोपहर को छाँव से भर दिया हो. 

आँखें सामने दिखती दीवार को देखती रहती है. कान, दूर तक जाकर किसी आहट का पता कर आते हैं. चुप्पी है. आँखें मुंदने लगती हैं. कोई साया आहिस्ता से सीढियों को चढ़ता, खुली पतली बालकनी की ओर मुड़ जाता है. 

आँखें अचानक खुलकर खिड़की को एकटक देखने लगती हैं. कि वह साया दोबारा यही से गुज़रेगा. कोई नहीं गुज़रता. मन कहीं बहुत दूर किसी पुराने भव्य किले के द्वार पर जा बैठता है. बादल गुम गए हैं. दूर तक कड़ी धूप पसरी है. लम्बे दालान का फर्श गरम हो गया है. झरोखे खाली हैं. मेहराबें सूनी है. और कोई नहीं है. 

कोई नहीं. 

मन सोचता है यहाँ से उठ जाऊं. सामने सूने पड़े आस्ताने की तक चला जाऊं. वहां जाकर बैठ जाऊं. एक थकान रगों के रास्ते पूरे बदन में फैल जाती है. कि वहां बैठकर किसका इंतज़ार करना होगा. शाम कब तक आएगी. उसके बाद क्या होगा. क्यों कोई आएगा. कोई आया तो वो कौन होगा. क्या वह मेरे पास किसी खम्भे से पीठ टिकाकर बैठेगा. 

गिलहरी अब भी चुप है. नीचे देख रही है. जैसे हम अपने किसी प्रिय को बदलते हुए देखकर, हताशा में ठहर जाते हैं.

October 6, 2017

चश्मे के पीछे छुपी उसकी आँखें

छोटे बच्चे की तरह 
अँगुलियों पर जाने क्या गिनता रहता है मन.

उसने कहा- "किशोर सर, स्मार्ट फोन में एक एप है. जो हमारे बोलने को लिखता है और लिखे हुए को पढ़कर सुनाता है. ये कितना अच्छा है" उसकी आवाज़ में उत्साह था. प्रसन्नता भी थी. उसकी ख़ुशी सुनकर मेरी आँखें मुस्कुराने लगी. हालाँकि उसे लिखना आता था. कुछ साल पहले उससे मिला था तब उसने कागज़ पर मेरा नाम उकेर कर दिया था. अपनी अंगुली से अपने ही लिखे उस नाम को पढ़ा, किशोर चौधरी. और फिर ऐसे हामी में सर हिलाया जैसे काम सही हो गया हो.

स्टूडियो में उसने पूछा. "क्या मेरे सामने माइक्रोफोन रखा है?" मैंने कहा- "हाँ आपके सामने है." उसने कहा- "माइक्रोफोन को छूना तो अच्छा नहीं होता न?" मैंने कहा- "आप चाहें तो छू सकती हैं" उसने अपने हाथ को चेहरे की सीध में लाने के बाद सामने बढ़ाया. मुझे लगा कि वो माइक को देख पा रही हैं. इतने सधे तरीके से माइक को छूना, मुझे एक ठहराव से भरने लगा. बेहद नाज़ुकी से उसकी अँगुलियों ने माइक की जाली की बुनावट को चारों तरफ से छुआ. उसके चेहरे पर संतोष था. अचानक कहा- "तो ये है वो माइक जिससे रेडियो पर बोला जाता है"

एलईडी की रोशनी से भरे स्टूडियो की दीवारों पर लगे आवाज़ सोखने वाले परदे चुप थे. हरे रंग की मेज चुप थी. नीला कालीन चुप था. काले चश्मे के पीछे छुपी उसकी आँखें शायद कुछ बोल रही होंगी कि उसके होठों पर मुस्कान थी.

"किशोर सर, यहाँ बैठने के लिए और कुर्सी है तो आप बैठ जाइए. मैं आपसे सुनना चाहती हूँ, ये आल इण्डिया रेडियो है. अब हमारी सभा आरम्भ होती है." मैं हंसने लगा.

इसके बाद मैंने बहुत देर तक उससे बातें की. वे बातें पढने, लिखने और स्याही से भरी ज़िन्दगी को जीने के बारे में थी. मैंने पूछा- "आपको कैसे मालूम होता है कि दिन है या रात?" उसने कहा- "मैं तापमान से पता कर लेती हूँ. दिन और रात में हर समय का तापमान अलग होता है. मुझे उसी से पता चलता है कि सुबह होने को है या शाम ढलने को है या दोपहर में आज कितनी कड़ी धूप है"

उसने कहा- "सर आप रेडियो पर कितना अलग बोलते हैं. ऐसा लगता है जैसे कोई बहुत बड़ा आदमी बोल रहा है. और आप फोन पर तो ऐसे नहीं बोलते."

मैंने कहा- " फोन पर बोलने के पैसे नहीं मिलते इसलिए..."

हम देर तक हँसे.

एक अक्टूबर की सुबह उगते सूरज की तस्वीर खींची थी. उस तस्वीर को देखकर भी उसकी याद आई. कि वह अपने घर में इस उगते हुए सूरज को महसूस कर रही होगी. हम कितने अभागे हैं कि खुली आँखों से कुछ नहीं देखते, कुछ महसूस नहीं कर पाते.

October 3, 2017

तुमसे कभी नहीं मिलना चाहिए था

बेचैनी के पांव नहीं थे। उसके आने की आहट नहीं सुनाई दी। आहिस्ता से हर चीज़ का रंग बदलने लगा। कमरे में खालीपन भरने लगा। पेशानी में और बल पड़े कि शायद बालकनी में भी एक चुप्पी आ बैठी होगी। तुम एक लकीर की तरह होते तो भी मिटाया न जा सकता था। कि तुम्हारे होने को अंगुलियां किस तरह छूती।

कोरे मन पर एक स्याह लकीर को छूना सबसे अधिक डरावना लगता है।

न इंतज़ार, न कोई आमद का ख़याल कि सब कुछ ठहरा हुआ। दुख भी कुछ नहीं। बस एक ठहरी हुई ज़िन्दगी। छू लो तो जाने किस जानिब चल पड़े, यही सोच कर अंगुलियां आपस में बांध ली।

आवाज़ के नन्हे टुकड़े फेंकती एक चिड़िया के फुर्र से उड़ जाने के बाद गिलहरी की लंबी ट्वीट से सन्नाटा टूट गया। एक सिहरन सब चीजों पर उतर गई। दोपहर का एक बजा होगा। शायद एक।

ये किस मौसम की दोपहर है। हल्की धूप है। कमरे में सर्द सीली गन्ध है। गुनगुनी छुअन वक़्त में कहीं नीचे दब गई है। अपने घुटने पेट की तरफ मोड़ते हुए लगता है कि मेरा होना थोड़ा और सिमट गया है।

कि अब खालीपन कम-कम छुएगा।

खिड़की से दिखते पहाड़ पर सब्ज़ा उग आया है। काश ऐसे ही इस अकेलेपन को भेदते हुए किसी आवाज़ के बूटे उग आएं। बेजान मन दो कदम दरवाज़े तक जाकर जूते देखने लगा। उनका रंग उड़ गया है या बारीक गर्द ने ढक लिया है।

थप-थप...

हवा में कोई बेचैनी फिर से उड़ी। सांस न लेने के लिए ख़ुद को रोक लिया। एक पत्थर की तरह कुछ पल खड़े रहकर जूते नीचे रख दिए। वाशरूम की दीवारों पर पीलापन पसर रहा है। सर पर गिरता पानी खालीपन को भर रहा है।

अचानक। घुटन के फंदे से बाहर आने को हाथ शॉवर को बंद करने के लिए दीवार को बेतरह छूते हैं। बिना हलचल की छटपटाहट पीछे की दीवार की ओर धकेल देती है। एक लंबी और डरावनी सांस आती है। दिल की धड़कन लम्बी सांस के सबसे ऊंचे शिखर पर अटक जाती है। शॉवर से पानी गिर रहा है।

मुझे तुमसे कभी नहीं मिलना चाहिए था।

कभी नहीं।
* * *

कहानियां कहना अच्छा होता है कि बहुत सी बातों को हम कहानी कहकर छिपा लेते हैं। देर तक किसी के सामने मुस्कुरा सकते हैं। उसी खालीपन में लौट जाने से पहले।

[Painting image courtesy : James McNill Whistler]

दो सूखे पत्ते नम मिट्टी में

एक रोज़ कोई कोंपल खिली जैसे नज़र फेरते ही किसी ने बटुआ पार कर लिया हो। एक रोज़ उससे मिला। फिर उससे ऐसे बिछड़ा जैसे खाली बटुए को किसी ने उदासी ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने या खूबसूरत स्त्री को इरादतन चूमने जितना ही अवैध है.