October 26, 2017

बेपरवाह जीना



दालान और मुंडेरों पर परिंदों के कुछ पंख गिरे रहते हैं. जैसे वे छोड़ गए हों अपने होने की चिट्ठी. लेकिन तुम सबसे अच्छे निकले कि जाते-जाते सब रिश्ते भी बुहार ले गए.

जाने से पहले कुछ देर तक 
तुम रुके होवोगे खिड़की के पास.

ऐसा लगता है.
* * *

शाखों से बिछड़े पत्ते
हो सकता है
मिट्टी के दीवाने हों।
* * *


रेखाएं जब मिटी तो कुछ नई बन गई
रंग कितने भी उतरे कुछ नए आ ही गए।
* * *

बंद खिड़कियों की कतार में आखिरी खिड़की खुली रहती है। जब भी इन खिड़कियों के पास से निकलता हूँ तो कबाड़ की तरह पड़ा एक चरखा दिखाई देता है। मैं सोचता हूँ कि शायद और भी चरखे होंगे। चरखे अनुपयोगी और उदासीन पड़े हैं। एक रोज़ इसी तरह हर कोई चलन से बाहर हो जाता है। लेकिन जीवन रास्ता तलाश लेता है कि भवन की छत की मुंडेर से एक पौधा उग आता है।

जीवन कितना अद्भुत है कि कभी लाख जतन किये फलता नहीं और कभी बेपरवाह खिलता जाता है। बगीचे सूख जाते हैं, जंगल अपनी मौज में बढ़ता है।


सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.