January 28, 2018

बातें करने का स्वप्न

बीते कल की शाम से कोई सपना देख रहा हूँ। सपने में बातें किये जा रहा हूँ। एक बार बात रुकती है तो फिर चल पड़ती है। बेरी के सूखे पत्ते बेचने वाली टाल वाले बा कहते थे कि तीसरा फल पककर गिरता है। मेरे ख़यालों में पेड़ पर मिमझर उतरती है। उनसे फूल बनते हैं। फूलों से फल। वे बेहिसाब हैं। उनमें तीसरा फल कौनसा है? सही जवाब न मिलने पर रेलवे फ़ाटक की ढलान से दूर आ जाता हूँ। 

फिर से आहट होती है और सपना आरम्भ हो जाता है। इस बात के लिए कि हमने बात यहीं छोड़ी थी, अब फिर शुरू होती है। सपना लगातार चलता है। जाने पहचाने लोगों के रेखाचित्र खींचते हुए। भूली हुई पहचान को फिर से गढ़ते हुए सपना अचानक रुक जाता है। 

सुबह पौने छः बजे लिफ्ट के ग्राउंड फ्लोर पर आते ही बिल्ली इंतज़ार करती मिलती है। मैं और बेटी मुस्कुराते हैं। मैं पूछता हूँ दिल्ली जाओगी? बिल्ली भाग जाती है। बिल्ली को किसी और से वास्ता रहा होगा। हम गाड़ी स्टार्ट करके गांधीनगर रेलवे स्टेशन की ओर चल देते हैं। स्टेशन के बाहर पार्किंग की लंबी कतार थी। मानु स्टेशन को गयी और मैं गाड़ी पार्क करने पीछे लौटा। दीवार पर बैठी एक और बिल्ली ने जम्हाई ली। उसने जाने क्या कहा। 

शैलेश इंतज़ार कर रहे थे। कहते हैं- "आप दिल्ली में तो दो घण्टे पहले स्टेशन दौड़ जाते हैं। आज आप जयपुर में केवल पांच मिनट पहले आये?" मैं देखता हूँ शैलेश के हाथ मे ट्रॉली बैग है। मेरे पास पर्स नहीं है इसलिए प्लेटफॉर्म टिकट के अभाव में उनके साथ अंदर नहीं जाता। बस इतना कहता हूँ कि आप सी टू में है और मानु सी थ्री में मिल लीजियेगा। 

कार में बैठते ही सपने की याद आती है। मैं बातें कर रहा था। हाथ जाने किस तरह हिलता है कि किसी एफएम पर सुबह के भजन चलने लगते हैं। मैं उनके अर्थ लगाना चाहता हूँ। प्रवचनकर्ता कहता है कि तुम इसे अपना शरीर समझते हो इसलिए दुख पाते हो। मैं सोचता हूँ कि किसी दूसरे के शरीर में कैसे घुस जाऊं? 

दोपहर की धूप की ओर मोढ़ा की पीठ किये पानी पीता जाता हूँ। अचानक फिर प्रवचनकर्ता की याद आती है। मैं कहता हूँ बाबा दारू पियोगे? ये शरीर अपना तो है नहीं इसमें जो चाहो सो ठूंस दो। लेकिन बाबा सुबह छह बजे में पीछे छूट गए थे इसलिए जवाब नहीँ आता। नींद की एक थपकी राग देस की तरह बजती है। राग देस फूल की तरह बजता है। फूल पराग की तरह बजता है। पराग मधुमक्खी की राग में बजता है। शायद कोई मधुमक्खी ही हो। 

आंख खुलती है तो फिर पाता हूँ कि सपना चल रहा है। मैं बातें कर रहा हूँ। 

उचक कर देखता हूँ कि जिस तरह बाँधकर सामान लाया था, वह उसी तरह ड्रेसिंग टेबल के पास रखा है। दिन कितने झड़ गए अंगुलियों पर गिनता हूँ। कब वापस जाऊंगा ये गिनने लगता हूँ। घर खाली है। मगर खाली कहाँ है? एक सपना चल रहा है कि बातें कर रहा हूँ। किसलिए, क्यों? 

अक्षयपात्र के गुम्बद के पीछे सूरज डूब रहा है। चाय का प्याला रखा है। सपना भी कहीं आस-पास होगा। शायद।
* * *

[Image courtesy John Dillon, Dublin, Ireland]

January 23, 2018

तुम्हारे होते हुए भी तुम्हारा न होना

मैंने जब किसी से सुना 'लव यू' तब मुड़कर उसकी जामातलाशी नहीं ली. मैं मुस्कुराया कि अभी उसमें ज़िन्दगी बाक़ी है. उसके आस-पास के लोग ख़ुश रहते होंगे. मैंने जब कभी कोई सस्ता फ़िकरा सुना तो दुखी हुआ कि उस व्यक्ति को कितने दुःख और कुंठाएं घेरे हुए हैं. वह जहाँ होता होगा, उसके आस-पास सब कैसा होता होगा?

हालाँकि मेरी खामी ये ठहरी कि मैं लव यू कहने वालों को भूल गया और नफ़रत वालों को भुला न सका.

कुछ एक असहज टिप्पणियाँ नई दिल्ली नाम के तंगहाल शहर की भीड़ भरी गलियों से.

एक

फ़रवरी का महीना इतना ठंडा न था कि बंद कमरे में रजाई ओढ़कर दो लोग सो सकें. इसलिए रजाई पांवों पर पड़ी थी. तकिये पुश्त से टिके थे. हमारी पीठ उनका सहारा लिए थी. एक तरफ कार्नर वाला स्टूल रखा था दूजी तरह कॉफ़ी टेबल थी. दोनों पर लम्बी गिलासें रखीं थीं. दोनों में हंड्रेड पाइपर्स नाम वाली व्हिस्की के साथ पानी मिला हुआ था. स्टार टीवी के सिनेमा चैनल पर बर्फ़ से भरा भूभाग था. स्क्रीन के कोने में एक लड़की स्नो-शूज में नज़रें गड़ाए बैठी थी. उसके जैकेट का कॉलर जब भी हिलता वह नज़रें उठाकर देखती लेकिन दृश्य में आता हुआ कोई नहीं दीखता था.

उसने कहा- "एक कविता पढ़कर सुनाती हूँ."

उससे कुछ दूर पड़े हुए ही उसकी तरफ देखा. वह कविता सुनाने लगी. कविता का कथ्य था कि जीवन में किसी के लिए कुछ करना. वही तुम्हारा होना होगा वरना क्या होना.

कुछ महीने बाद उसने फ़ोन कॉल रिकॉर्ड किये और लोगों को मेल किये.

दो

वहाँ ज़्यादा भीड़ न थी लॉन में आधी जगह बाक़ी थी. फ़ोन उठाया और ये बोलने को ही था कि हम किस तरफ बैठे हैं तभी वह आती हुई दिखी. उसके भारी कूल्हों पर बंधी कीमती साड़ी बेमिसाल लग रही थी. मैं अपने स्वभाव के विपरीत इस बार जामातलाशी ले रहा था. उसको देखने के असर में कुछ तो जनवरी की धूप थी और कुछ उसकी आँखों से बरसती मुस्कान का असर था कि उसकी कोहनियों तक से उजाला झाँक रहा था. जबकि मेरी कोहनियों को माँ रगड़-रगड़ कर लाल कर देती थी लेकिन वे कभी साफ़ न हुई.

मेरा मन बिंध गया था.

हम सूखी दूब वाले लॉन में मिट्टी पर बैठे हुए एक दूजे की आँखों में देखते और फिर कोई एक आँखें चुरा लेता. हम समझदार लोग थे. इसलिए उतना ही देख पाते थे जितना देखना अफोर्ड हो सकता था. अचानक इस ठहरी हुई बात से उकता कर हम एक रेस्तरां की ओर चल दिए. साथ चलने के एकांत में उसने कहा- "तुम बेहद प्यारे आदमी हो"

"अच्छा. तुम कुछ खाओगी?" मेरे इस प्रश्न पर उसने कहा- "मैं घर से खाकर आई हूँ. जो तुम खाना चाहो वही लो"

लोगों की भीड़ यहाँ पर ज़्यादा थी. सैंकड़ा भर कुर्सी लगी थीं मगर सब पर लोग थे. कुछ देर उसके साथ कोई मेज़ तलाशने के बाद हम बाहर आ गए. उसे अपनी ओर देखते हुए देखकर मैंने कहा- "क्या?" उसने कहा- "तुमको देखना था" मेरे हाथ में मोमोज की प्लेट थी. उनके साथ की चटनी में दम था. मेरे मुँह में आग थी, आँखों में पानी था. उसके चेहरे पर मुस्कान थी.

दो एक महीने बाद उसने मेरी दोस्त से कहा- "तुम कोई और दोस्त खोज लो, वह अच्छा आदमी नहीं है.

तीन

मुझे एक मैसेज मिला. "भाई जी मेले में मिलोगे?" मैंने जवाब दिया था- "हाँ ज़रूर मिलूँगा. आप को खोज लूँगा" मैं और बेटी भीड़ भरे गलियारों के बीच लोगों के ठेलम-ठेल में गुज़र रहे थे. वो दोस्त सामने बैठा हुआ दिख गया. उसके हाथ में खाना था. उसने दोनों बाहें फैलाई और कोमल प्रेम भरा हग करते हुए कहा- "आप मेरी जान हो. क्या लिखते हो. जी चाहता है आपके पास बैठकर आपको सुनता रहूँ." मैंने बेटी से उनका परिचय करवाया. ये फलाँ हैं. इनका लिखना मुझे पसंद है. उन्होंने बेटी के सर पर हाथ फेरा.

कुछ समय बाद मैंने सुना कि उन्होंने अपनी मित्र को कहा- "आपने आने में देर कर दी. अभी कुछ देर पहले लाल कारपेट पर अट्ठारह-बीस कवयित्रियाँ बेहोश होकर गिरी पड़ी थी. उन्होंने अपने सामने से केसी को गुज़रते हुए देख लिया था."

कुंठा आत्मघाती होती है. मुझे दुःख है कि वह आदमी नहीं रहा.

चार

सड़क के किनारे खड़े हुए एक लड़की से बात कर रहा था. लड़की सिविल सर्विस के लिए तैयारी कर रही थी. मैं उससे पूछ रहा था कि स्टडी मेटेरियल और अध्ययन योजना के बारे में हम कब बात कर सकते हैं. तभी दिल्ली विश्वविद्यालय के दो तीन शिक्षक और एक नवेले प्रकाशक अपने दल के साथ पास से गुज़रे.

प्रकाशक बाबू ने जाने किस वजह से छूट ली होगी कि उन्होंने अपने समूह को सम्बोधित करते हुए कहा- "केसी जहाँ खड़े हों वहाँ चार औरतें न हो ऐसा नहीं हो सकता." उसका कहना मेरे लिए कोई अचरज की बात न था. अक्सर हलके-चतुर लोग इस तरह की ही बातें कहते हैं कि अपमान और मित्रता के बीच का फासला अस्पष्ट रहे.

उनके चले जाने के बाद वहीं खड़े हुए मैं सोचता रहा कि नारीवादी प्रोफ़ेसर साहिबा इस बात पर मुस्कुराई क्यों थी?

पाँच

अकसर फील में पोश्चर का ख़याल कहीं खो जाता है. अजाने ही किसी के कंधे से कंधा छू जाता है. किसी के कंधे पर मित्रता भरा हाथ ठहर जाता है. कभी हाथ पकड़े हुए खड़े रह जाते हैं. कभी हाथों में हाथ लिए दूर तक साथ चल लेते हैं. कोई फर्क नहीं पड़ता. मित्रता की सफेदी में हवस की स्याही नहीं लगती.

इस बार उससे मिलना हुआ और इस एक वजह से जान पाया कि मित्र कहलाने के हक़ जताने वाले लोग उस दिन से ही आपका खाका खराब किये जाते हैं जिस दिन पहली बार आपने उनका हाथ अपने हाथ में लिया होता है. "उसने मेरा हाथ इस तरह पकड़ा कि छोड़ने का नाम तक न लिया. मुझे समझ न आया कि मैं क्या करूँ? मुझे कहता है पब्लिसिटी से दूर रहो और देखो उसे... जहाँ देखो बस औरतें उनके साथ तस्वीरें, चाय, और खाना और... "

उसने और भी इतना कुछ कहा था कि मेरी सोच और समझ तार-तार हो गयी.

रात को देर तक एक जाम में फंसा रहा. एक दोस्त गाड़ी चला रही थी. उसकी एक दोस्त पीछे की सीट पर थी. मैं और वह एक दूजे के लिए अजनबी थे लेकिन सहज थे. मैं उनसे बातें करते हुए बार-बार खोया जा रहा था? दोस्त ने पूछा - "हमारी गाड़ी पसंद न आई?" मैंने चौंकते हुए कहा- "हाँ बहुत सुन्दर एसयूवी है. मुझे ये गाड़ी बाहर से तो पसंद थी ही इसका इंटीरियर बहुत ख़ूबसूरत है."

जाम ऐसा था कि गाड़ियाँ रेंग भी नहीं रही थी. हम कोई नयी बात खोजते और वह बात जल्द खत्म हो जाती.

दो बेहद प्यारे लोगों के साथ बैठे हुए भी मैं उस बात से बाहर नहीं आ पा रहा था. मैं सोच रहा था कि क्या दोस्तों का इंटीरियर भी देखा जा सकता है?

छः

बात कहने का मन नहीं हो रहा. कुछ खुलासे इसलिए अच्छे नहीं होते कि उनका असर जाता नहीं है. किसी संत ने कहा कि विश्वास की आड़ में किये गए धोखे किसी को न सुनाना कि इससे लोग विश्वास करना छोड़ने लगते हैं. इसी तरह मैं किसी भूखे और भोजन की कहानी में आई खराबी नहीं सुनाना चाहता हूँ कि इसे सुनकर जाने कौन कल भूखा रह जाये और जाने किसका खिलाने का मन मर जाये.

असल बात ये है कि कोई अच्छा लेखक, शिल्पकार, चित्रकार, नाट्यकर्मी या किसी भी कला का कलाकार है तो जब आप उससे रूठ जाएँ तो गाली देने की जगह ये खोजना सीखना कि उसमें कुछ अच्छाई भी कहीं होगी.

सात

आख़िरकार खत्म हो जाता है 
शराब का कड़वापन.

जैसे तुम्हारे होते हुए भी तुम्हारा न होना. 
* * *

शाम ढले अक्सर लिखता हूँ लेकिन ये पोस्ट मुल्तवी होती रही. इसलिए कि शाम को इसे लिखने का ख़तरा ये बना रहता कि अगली सुबह ख़ुद को कोस रहा होता कि किस झौंक में लिख दिया. इसे लिखने की ज़रूरत क्या थी. दुनिया और लोग जैसे हैं वैसे हैं?

दिन में लिखने का फायदा ये है कि मैं पूछ सकता हूँ - "केसी, तुम ख़ुद कौनसे कम हो?"
* * *

[Picture credits : watercolour study by Bakuma]

January 20, 2018

ख़ुशी की गोली

उसने आमंत्रण भरी एक मतवाली करवट ली. उसकी पीठ से थोड़ा नीचे कूल्हे पर हाथ रखते ही डर की लहर दौड़ पड़ी. आंगन पर अधलेटे हुए दिखा कि टेबल के ऊपर से शीशे के उस तरफ चार-पाँच लोग किसी काम में लगे हैं. उनमें से दो आदमी कमर के ऊपर नंगे थे. उन दो बिना बनियान वाले लोगों में से एक उस पार के कमरे के ठीक बीच में खड़ा था. जबकि दूजा दाईं तरफ के दरवाज़े की ओर जा रहा था. 

उनको देखते ही इस तरफ देखा तो मालूम हुआ कि दोनों ने कपड़े न पहन रखे थे. एक दूजे के बदन से सटे हुए उत्तेजना की फिसलन पर थे. अचानक देख लिए जाने का, पकड़े जाने का भय पसर गया. इसी भय में कपड़े तलाश किये. वे जाने कहाँ गुम थे. हड़बड़ी में खड़े होकर दरवाज़े की ओर लपककर हत्थी पकड़ कर खींची और बाहर आ गया. 

उस दरवाज़े से बाहर आने ने बेहद हल्का कर दिया था मगर उसी पल दस एक आदमी आये. जिस कमरे से भागा था, वापस उसी कमरे खड़े पाया. नया काम होने लगा. वे लोग कालीन उखाड़ रहे थे. उनसे कहा- "इस कालीन को पूरा ही उखाड़ दो." उन्होंने कबूतरी कालीन उखाड़ा तो नीचे एक गहरे हरे रंग का कालीन चिपका हुआ दिखने लगा. 

ऐसा लगा कि गहरे हरे रंग वाला कालीन ही सबसे पहले इस कमरे में लगा था. लेकिन याद में वही प्लास्टिक की टाइल्स वाला आँगन था जिस पर फर्राश महीने दो महीने में पोलिश करता था. वह चिकना आँगन कुछ दिन चिपचिपा सा दिखता और फिर जाने कहाँ से बंद कमरे में गर्द उतरती रहती. आँगन पर एक धूसर पपड़ी जमने लगती. कभी जमादार आता था तो झाड़ू लगा देता था. लेकिन झाड़ू से लकीरें बन जाती. 

कमरे में जगह बन आई. कामगारों से कहा कि इस टेबल को पीछे धकेल दो ताकि इसके आगे भी लोग बैठ सकें. आमने-सामने बैठकर बात कर सकें. वहां इतनी जगह बन आई थी कि अब आराम से कुर्सियां लग सकती थीं और आस-पास खाली जगह भी बची थी. 

वह सुनील नहीं था. उसका कद बराबर था. उसने कुछ हँसते हुए कहा. उसको जवाब देने के लिए मन में छुपे डर पर साहस बांधकर कहा कि तुम अपने बाप की उम्र के आदमी से मजाक करते हो. कल के लड़के हो और इस तरह कंधे पर हाथ रखकर चलने कि हिम्मत कैसे हुई? दाढ़ी वाले लड़के ने हार मान ली थी. उसने झगड़ा करने की जगह स्वीकार कर लिया कि ऐसा नहीं करना चाहिए था. 

रेगिस्तानी क़स्बो में नए मोहल्लों की बसावट जैसा रास्ता था कि हितेश के हाथ से सिगरेट गिर पड़ी. वह आधी टूट चुकी थी. उसे झुककर उठाता उससे पहले ही देख लिया कि बाकी की सिगरेट अब काम की नहीं रही है. बाईं तरफ कोई दूकान न थी. लगा कि अब यहाँ कहाँ सिगरेट मिलेगी. अचानक दाईं तरफ एक भरा पूरा किराणा का स्टोर दिखा. बोरियों में भरा अन्न और मसाले. कोने में रखे झाड़ू. एक ख़ास गंध में डूबा हुआ सबकुछ. उसी दढ़ियल नौजवान ने सिगरेट आगे की. सिगरेट लेते हुए पाया कि ये वही ब्रांड है. जिसकी तलब थी. उसे कैसे मालूम हुआ?
* * *
जागते ही पाया कि वह नंगे बदन औरत कहाँ गयी? वे सारे काम क्या हुए? माँ और बच्चों के साथ चलते हुए दफ़्तर के लोग अचानक कैसे साथ हो लिए. 

पड़ोस में एक आदमी दो दिन से शैय्या पर है. उसके परिवार वाले जुट गए हैं. वे चारपाई के आस-पास बैठे रहते हैं. मोहल्ले में एक बात चुपचाप घूम रही है कि गले का केंसर है और मरने वाला है. मैंने भी आते-जाते दो तीन बार उस पर नज़र डाली. लेकिन वह जाग नहीं रहा था. उसका सर या तो चादर से ढका होता या उसकी आँखें बंद होती. 
* * *

मैं अपने आपको हाथ पकड़ कर कहीं ले जाता हूँ. यहाँ बैठो. इसे देखो. इसे पढो. मैं अपना कहा नहीं मानता. मैं उठकर उधर चल देता हूँ जिधर उलझनें हैं. जिधर एक ही बात रखी है कि किसलिए कुछ करना चाहिए. मरना है तो मर जायेंगे. मरने के मामले एक ही भयावह बात है कि जब भी ऐसा गहरा ख़याल आता है तब लगता है कि ये सब पीछे छूट जायेगा. यहाँ कभी लौटना न होगा. 

साँस उखड़ जाती है. पसीना होने लगता है. लगता है सीने के आस-पास किसी ने कुंडली मार ली है. बदहवास उठकर बिस्तर पर बैठ जाना और चलाकर बाहर आ जाना. इसके सिवा कोई रास्ता नहीं होता. सामान्य होने में बहुत देर लगती है.
* * *

उसने कहा था- "ये ख़ुशी की गोली है." उसे सुनकर देर तक मुस्कुराया. जो कोई दवा कुछ भुला देती है वह सबके लिए ख़ुशी की गोली है.

January 13, 2018

ओ शैदाई !

शैदा का अर्थ है जो किसी के प्रेम में डूबा हो.

सोचता हूँ कि मैं किसका शैदाई हूँ. सतरंगी तितलियों, बेदाग़ स्याह कुत्तों, चिट्टी बिल्लियों, भूरे तोतों, कलदुमी कबूतरों, गोरी गायों, चिकने गधों, ऊंचे घोड़ों, कसुम्बल ऊँटों से भरे इस संसार में कोई ऐसा न था, जिसके लिए जागना-सोना किया. पढने-लिखने में कोई तलब इस तरह की न थी जिसके बारे में बरसों या महीनों सोचा हो कि ऐसा हो सका तो वैसा करेंगे. रास्ता कोई ऐसा याद नहीं पड़ता जिस पर चलने के लिए बेक़रार रहा. मंज़िल भी कोई ऐसी न थी जहाँ पहुँच जाने लिए टूट कर चाहता रहा हूँ. हाँ कभी-कभी जहाँ जाना चाहा वह मेरे नाना का घर था.

मेरे नाना के घर में बहुत सारी बिल्लियाँ थीं.

उनके पास एक चिलम थी. एक ज़र्दा रखने की तिकोनी पोटली थी. चिलम को उल्टा करते तो एक काला पत्थर उसके मुंह से बाहर गिरता था. नाना उसे दो-तीन बार आँगन पर पटकते, अँगुलियों से सहलाते और वापस चिलम के मुंह में रख देते थे. उस चिलम की गंध नाना के कपड़ों से आया करती थी. नाना और चिलम की गंध एक ही थी. मुझे लगता था कि नाना चिलम के शैदाई हैं.

नाना ने किसी रोज़ चिलम को किनारे रख दिया. उनकी बंडी की अगली जेब में एक पुड़िया रखी रहने लगी. उसमें अमल रखा रहता था. नाना ने अमल से मोहब्बत कब की मुझे याद नहीं. इसलिए कि ये उनके आख़िरी बरस थे और तब तक मैं बाहर पढने और फिर नौकरी करने चला गया था. मुझे उन बरसों के नाना बिलकुल याद नहीं है. मैं पिछले बरसों की याद में लम्बी सफ़ेद दाढ़ी, तेवटा, बंडी और कुरता देख पाता हूँ. उनका पोतिया अक्सर ढीला रहता था. वे उसके साथ बेरुखी से पेश आते थे.

नाना एक विवाह में गए. सुबह जब नहाकर आये तो पाया कि बंडी की अगली जेब से अमल का मेणीया गायब है. नाना ने गहरे गुस्से में डेरे पर उद्घोष किया- "सगों के घर में मुझ सत्तर साल के आदमी से कोई मजाक करे ये हद है. आज के बाद इस अमल के पीछे सात धोबे धूड़" उन्होंने उस दिन के बाद से न कभी अमल लिया न चिलम की ओर मुंह किया.

वे बहुत उदास हो गए थे और उनका जी दुनिया से उचट गया था. अक्सर अकेले रहते. कम बोलते और खेतों के दूर तक चक्कर लगाया करते. वे ऐसे ही उदास गुज़र गए.

सोचता हूँ कि कभी नाना चलते-चलते जब अचानक रुक जाते होंगे तब उनको चिलम की पुकार सुनाई पड़ती होगी- "ओ शैदा मुंह लगाओगे या नहीं"

मैं किसका शैदाई था? दुबली सी लड़की या विल्स नेविकट की खराश, सुघड़ व्हिस्की से उठती मादक गंध या फिर उदासी से भरा कोई एकांत या रोने के लिए बनी खुली जगह? ऐसी कौनसी चीज़ थी जिसके लिए मैं शैदाई रहा होऊंगा. मैं अतीत में फिसलता हूँ मगर याद नहीं आता. जो कुछ याद आता है उसमें जिस किसी से मोहब्बत थी और वह जब मेरी शर्त से बाहर हुई तो उसे ठुकरा दिया.

दो रोज़ से बेचैन हूँ. मुझे समझ ही नहीं आता कि मैं कर क्या कर हूँ? ज़रा रूककर सोचता हूँ कि देखो कितने लोग इस रास्ते से आये और सदा के लिए चले गए. दुनिया मगर इसी तरह चल रही. क्या इसी तरह ऐसा नहीं हो सकता कि मैं सीख जाऊं कि कितने ही अफ़सोस इस दिल में आये और चले गए. दिल पहले की तरह चलता रहेगा. लेकिन मैं अपनी प्रिय चीज़ों से दूर भागता हूँ. उनको सदा के लिए ठुकरा देने के ख़याल से भरा अजगर की तरह अपने मन को कुंडली बनाये रगड़ता रहता हूँ. मैं जानता हूँ कि इस तरह एक बार फिर वैसा हो जाऊँगा. नीम पागल, बेचैन, बेक़रार और उदासी के बतुलिये में उड़ते आक के टूटे पत्ते सा... मगर क्या करूँ?

अली अकबर नातिक़ की लोककथाओं सरीखी दो कहानियों में नायक अपनी पालतू कुतिया और दो कुत्तों के शैदाई हैं. वे उनके लिए जीते हैं और उनके लिए मरते हैं. जीवन का ऐसा खाका केवल वे बातपोश खींच सकते हैं जिन्होंने अपने नाना-नानी से कहानियां सुनी हो. जिन्होंने मजदूरी और खेती की हों.

मुझे भी कभी नसीब हो कि ऐसे किसी लोककथा से प्रेम में पड़ जाऊं. कोई पूछे- "शैदा अब क्या होगा?" कोई जवाब न देकर मैं चुप देखता रहूँ कि घर की बाखल में हवा भंवर खा रही है. झोकाणे में ऊंट शांत बैठा है. भेड़ों के गले बंधी पीतल की घंटियाँ बज रही हैं. गुडाल के किसी कोने में बिल्लियाँ ऊंघ रही हैं. बच्चे किसी खेल में रमे हैं. ज़िन्दगी की भागदौड़ खत्म हो गयी है.

मैं इस तेज़ रफ़्तार ज़िन्दगी को शाप देता हूँ.

आमीन.

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.