June 21, 2018

सपने में गश्त पर प्रेम






होता तो कितना अच्छा होता कि हम रेगिस्तान को बुगची में भरकर अपने साथ बड़े शहर तक ले जा पाते पर ये भी अच्छा है कि ऐसा नहीं हुआ वरना घर लौटने की चाह खत्म हो जाती. 
 
अक्सर मैं सोचने लगता हूँ कि
क्या इस बात पर विश्वास कर लूँ?

कि जो बोया था वही काट रहा हूँ.
* * *

मैं बहुत देर तक सोचकर
याद नहीं कर पाता कि मैंने किया क्या था?

कैसे फूटा प्रेम का बीज
कैसे उग आई उस पर शाखाएं
कैसे खिले दो बार फूल
कैसे वह सूख गया अचानक?
* * *

कभी मुझे लगता है
कि मैं एक प्रेम का बिरवा हूँ
जो पेड़ होता जा रहा है.

कभी लगता है
कि मैं लकड़हारा हूँ और पेड़ गिरा रहा हूँ.
मुझे ऐसा क्यों नहीं लगता?

कि मैं एक वनबिलाव हूँ
और पाँव लटकाए, पेड़ की शाख पर सो रहा हूँ.
* * *

प्रेम एक फूल ही क्यों हुआ?
कोमल, हल्का, नम, भीना और मादक.

प्रेम एक छंगा हुआ पेड़ भी तो हो सकता था
तक लेता मौसमों की राह और कर लेता सारे इंतज़ार पूरे.
* * *

जब हम बीज बोते हैं
तब एक बड़े पेड़ की कल्पना करते हैं.

प्रेम के समय हमारी कल्पना को क्या हो जाता है?
* * *

प्रेम
उदास रातों में तनहा भटकता
एक काला बिलौटा है.

उसका स्वप्न एक पेड़ है
घनी पत्तियों से लदा, चुप खड़ा हुआ.

जैसे कोई महबूब बाहें फैलाए खड़ा हो.
* * *

मैं सपने में गश्त करता हूँ
फिर लौट आता हूँ.

सुबह जागते ही पाता हूँ
कि कई गलियों की धूल पैताने पड़ी है.

जैसे प्रेम के बारे में सोचते ही
वह ख़ुद हमारे पास चला आता है.
* * *

मैं कभी-कभी खो जाता हूँ
बीती बातों की याद में
लौटते ही मुझे इस बात पर विश्वास होने लगता है
कि मुझे उससे प्रेम था ही नहीं.

वरना कभी तो उसकी याद से मुंह कड़वा होता
कभी तो भर आती आँख भी.

मैं फिर खो जाता हूँ कि
तब हम दोनों क्यों एक दूजे के पास बैठे रहते थे
क्यों बेचैनी होती थी कि कब मिलेंगे.
* * *

June 4, 2018

तुम्हारी नियति


ये ज़रूरी नहीं है कि
काग़ज़ के फूल काग़ज़ से ही बने हों।

ताज़ा फूल थे। महकते, लुभाते फूल। गमले में रख दिए।
हवा ने या वक़्त ने उनकी नमी सोख ली। उन सूखे फूलों को देखकर लगता था कि वे काग़ज़ के फूल हैं।

अचानक हाथ सूखे फूलों के गुच्छे पर गया तो काग़ज़ की छुअन महसूस हुई। काग़ज़ सी आवाज़ आई। वे फूल अगर छांव में न रखे होते तो धूप में काग़ज़ की तरह जल सकते थे।

प्रेम भी एक दिन सूखा हुआ काग़ज़ फूल हो जाता है?

नहीं। तुमने कभी देखा है कि तितली, भँवरे, चिड़ियाँ किसी मुरझाए फूल के पास उदास बैठी है? नहीं न। तितलियां और पंछी जानते हैं कि फूलों का काग़ज़ हो जाना, प्रेम का स्मृति में ढल जाना नियति है। इसलिए नए फूल तक उड़ो।

तुम्हारी नियति एक नये क्षण की ओर चलते जाना।

June 2, 2018

फूलों का मौसम न था

फासलों की वजह काश उम्र ही हो.
गहरे रंग वाले फूल ने धूप ज़्यादा सही। बारिशों का लम्बा इंतज़ार किया। उसने जाना कि इस पल जो पास खिला है, उसे नाज़ुकी से छू लो। ये पल किसी प्रतीक्षा के लिए नहीं है।
एक हल्के रंग के फूल ने चटकते ही मादक गन्ध महसूस की। उस ख़ुशबू का ख़यालों में पीछा किया। सपनों की दुनिया गढ़ी। ऐसा होगा, वैसा होगा मगर दुनिया का हिसाब सही न था। फूल के पास आशाओं की गीली कूचियां थी जबकि समय के पास ऊब की उदास धूप थी।
उम्र के फासले को कुतर कर एक दिन छोटा फूल बड़े फूल से सटकर बैठ गया। छोटे ने पूछा- “हमारा क्या होगा?” बड़े ने कहा- “तुमको दुख हो सकता है और मुझे शायद न हो” छोटे ने विस्मय किया- “ऐसा क्यों?” बड़े ने कहा- “उम्र की एक लकीर के उस पार पहुंच जाने पर तुमको ये समझ आएगा कि जीवन को न जियोगे तो भी बीत जाएगा।”
छोटे फूल ने पूछा- “क्या तुमको कभी दुःख न हुआ?” बड़े ने कहा- “एक दिन सब छोटे ही होते हैं” छोटे ने खुले मुंह उसे देखा- “दुःख न होने का कोई रास्ता है?” बड़े फूल ने कहा- “नहीं। मगर किसी का होने की हिम्मत करना। होकर पछताना नहीं। ऊब जब उदास करने लगे वहाँ से कहीं और चले जाना”
छोटे फूल ने शब्दों पर ज़ोर देते हुए दोहराया- “कहीं और चले जाना?”
बड़े फूल ने कहा- “फ़िलहाल तुम इसे मेरा जवाब समझ रहे हो. जब तक कि ये तुम्हारा जवाब न हो जाये, ये किसी काम का जवाब नहीं है. एक रोज़ किसी घने स्याह लम्हे में तुम ख़ुद से कहोगे, बहुत हुआ. अब चलो”
छोटा फूल इस बात पर यकीन करने की जगह अब भी अपने हिसाब से करना चाहता था. जब दुःख आयेंगे. दुखों के पार ऐसी समझ आयेगी तब देखेगा. छोटे फूल को चुप देखकर बड़े ने कहा- “पहाड़ भी चलते हैं.” इस बात को सुनकर छोटा फूल अपने भीतर की यात्रा से बाहर आया. “कैसे?” बड़े ने कहा- “पिछले बरस पहाड़ की तलहटी में हम खिले थे. इस बरस उससे दूर खिले हैं. इसका मतलब है कि पहाड़ अब वहां नहीं रहा. वह दूर जा चुका है”
छोटे फूल ने कहा- “हो सकता है हम ही कहीं और दूर जाकर खिले हों’
“ऐसा नहीं हो सकता. पहाड़ की तलहटी के फूल पहाड़ की तलहटी में खिलते हैं. दिमाग के फूल दिमाग में और दिल के फूल दिल में ही खिलते हैं.”
* * *

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[ Image courtesy : irisflowermart.com ]

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.