July 31, 2018

अमलतास के पीले गीत




कभी हम इस तरह प्यार में पड़ जाते हैं कि हर समय उनके साथ मिलते हैं। मेरे दफ़्तर की टेबल, मेरे अधलेटे पढ़ने का बिस्तर और जिन कोनों में बैठकर लिखता हूँ उनके आस पास हमेशा पेंसिलें, इरेजर और शार्पनर रहते हैं।

स्कूल जाने के पहले-पहले दिनों में इन्होंने मुझे मोह लिया था। इतने लम्बे जीवन में कोई गैज़ेट इसको रिप्लेस नहीं कर पाया।

कभी अचानक तुम सामने आकर बैठ जाओ तब मैं हैरत से भरकर इनको भूल जाता हूँ। तुम्हारे जाने के बाद ख़याल आता है कि तुमको ठीक से देखा ही नहीं।

बुझ चुकी शाम में अंगुलियां बहुत देर तक पेंसिल से खेलती रहती हैं। मन सोचता रहता है कि क्या ऐसा लिख दूँ -"तुम आया करो" फिर होंठ मुस्कुरा उठते हैं कि तुम कब बोले जो अब कुछ बोलोगे।
* * *

इन रातों में बादल छाये रहते हैं. कुछ एक रात से चाँद के होने का अहसास आता है और बुझ जाता है. रात के दस बजे के आस-पास पड़ोस की छत पर रखे रेडियो की आवाज़ ज़रा तेज़ हो जाती है. फ़िल्मी गीत बजने लगते हैं.

गीत के ख़याल में गुम होकर अक्सर हम कुछ सोचने लगते हैं. किसी रेस्तरां में दोपहर के खाने की याद, किसी सिटी बस के सफ़र में हुई अबखाई, कभी बिस्तर में पड़े हुए गीत की आवाज़ सुनते हुए जागना, कभी किसी को लिखकर भेजे गीत के मुखड़े, कभी बेहद बेसुरे रेंके गए गीत, कभी किसी को गाते हुए चुप सुनने की शाम और भी जाने क्या-क्या याद आता है.

मैं कभी-कभी उसके बारे में सोचता हूँ जो रेडियो पर गीत प्ले कर रहा होता है.
* * *

अमलतास के पीले फूलों के पार स्याह बादल देखते हुए. २० जुलाई २०१८ जेएनयू परिसर, नई दिल्ली.

July 25, 2018

पीले पन्नों के झड़ जाने से पहले



एक बन्द डायरी थी। उसे किसी को पढ़ाना नहीं था। वह केवल लिख देना भर था कि लिखने से मन थोड़ा सा मुक्त हो जाता। एक बार का ऐसा लगता कि एड़ी से कोई कांटा निकालकर दूर फेंक दिया है।

अब इस डायरी को सहेजना भी एक काम हो गया और फिर इन कांटों का किसी से सीधा वास्ता न रहा। उस पर ये पीले पड़ते पन्ने जाने कब फट जाएं, जाने कब स्याही के अक्षर धुल जाएं। इसलिए तुम भी पढ़ लो कि हो सकता है कोई बात तुम्हारे काम की निकले। तुमको भी ऐसे ही किसी की याद आए और ये सोचकर मुस्कुरा सको कि तुमने जो जीया है, वैसा और भी लोग जीते हैं।

26 March 2013 ·

वह एक नया रिश्ता बनाते हुए इस सोच में गुम रहता है कि पुराने रिश्ते उघड़ तो नहीं रहे।

24 May ·2013

हम अपनी कांटेक्ट लिस्ट में दानों से भरी बालियाँ जमा करते जाते हैं लेकिन चुपके से सारे दाने कहीं चले जाते हैं और भूसा बचा रह जाता है.

17 July 2013 ·

टीन की छतें बरसात में बादलों का तबला हो जाती हैं। जैसे किसी पुरानी याद में हम खाली कासा हो जाते हैं। बांसुरी की आवाज़ से भरा हुआ एक खाली कासा।

3 November 2014 ·

पेड़ों के पत्ते चुप हैं। पंछी दृश्य की परिधि से गायब हैं। ऐसी ही थी वह दोपहर जब मुझे लौट जाना था।

तुम इस दोपहर में इसी समय खूब याद हो।

10 February 2015·

टूटने से पहले प्याला कई बार भरता और खाली होता है। कुछ एक ही बदनसीब होते हैं जो पहले प्यार में चटक जाते हैं।

21 June 2015 ·

रास्ते हमेशा के लिए नहीं होते। कभी बारिशें, कभी आंधियां रोक लेती हैं।

28 November 2015 ·

पत्ते बारिशों के जाते ही सूख जायेंगे मगर मन का जाने क्या होगा।

21 May 2016 ·

वहम एक यही तकलीफ भरा था कि दिल सोचता था तुम किसी के तो हो।।

15 July 2016 ·

मेरे पास जो कुछ बचा हुआ है। वह तुम्हारे फरेब उधेड़ता है।

11 August 2016 ·

उद्विग्न सांसें, उत्तेजन पूर्ण आलोड़न, भुजाओं के कसाव, लयबद्ध देह प्रवाह और प्रश्नपूर्ण नयन।

तुम्हारे लिए ये कोई एक और के साथ होने का परीक्षण मात्र था।

19 October 2016 ·

वनलता अपनी ही किसी भाषा में खिली है। तुम वहां अपना नाम न खोजना।

23 December 2016 ·

ये हरापन देख रहे हो?

सोचो अब तक कहाँ छुपा था। मिट्टी में था। नमी में था। बारिश में था। हवा में था। या फिर अचानक आई धूप की कड़ी चुभन में था।

दूर तक हरीतिमा। लेकिन कल तक आँखे पीले धूसर उजाड़ से थक गयी थीं। एक ही गंध उड़ती रहती थी। सूनेपन और तन्हाई की गंध। एक ही उजास था, नंगा उजास।

सुनो, तुम उदास न होना।

मगर कहो तो ये हरापन कब तक रहेगा?

16 January 2017

बाहर दीवारों पर
फूल और बेलें मांड रखी थी।
भीतर एक कंटीला उजाड़ फैला था।

रास्ता कभी बन्द नहीं करना चाहिए।


19 April 2017 ·

कह दिया होता
कि बदन एक उपकरण है
प्रेम मगर तुमसे है।

बहुत सी चीज़ें बची रहती।

3 June 2017 ·

बारिशें न हों तो भी
तुम्हारा एक ख़याल काफी है भीगने को.

11 September 2017 ·

तुम अपनी धूप लिए रहना
मैं अपना इंतज़ार रखूं.

सीले मौसम में भी एक रोज़ ढल जाती है ज़िन्दगी.


20 October 2017 ·

वो दुःख तुम्हारा कभी पीछा न छोड़ेगा। जो तुम्हारे लालच से जन्मा है।

लालच ख़त्म हो जाने के बाद भी।

25 November 2017 ·

लम्बे समय बाद कभी-कभी पुराना ग्राहक लौट आता.दुःख सबसे अच्छे ग्राहक हैं। वे कभी पेढ़ी को खाली नहीं रहने देते।

शुक्रिया। 🍸


July 17, 2018

घसियारा मन



क्या हम गुज़र चुकी बारिश को आवाज़ देते हैं।
या नई बारिशों का इंतज़ार करते हैं, ज़रा कहो?

इस समय अचानक बादल बरसने लगे हैं। बोरोसिल के ग्लास में भरी बकार्डी की रम में बारिश की बूंदें गिर रही है मगर मन जाने कहाँ खोया है? किसे होना था और कौन नहीं है, कुछ समझ नहीं आता।

वैसे नासमझी एक अच्छी शै है।

घास की तरह
उग आते हैं बीते दिन
बैठे-चलते मन
घसियारा हो जाता है।

एक बस छोटी बात
लिखना चाहता है दिल
मगर बात के साथ
गुँथ जाते हैं मौसम।

मैं पहुंच जाता हूँ
कहीं का कहीं
और कहीं छूट जाता हूँ मैं।

July 9, 2018

हरे पेचों को छूकर आती हवा


खिड़की के रास्ते गरम चुभन से भरी सीली हवा का झोंका आता है। बरसात कब की जा चुकी मगर यहाँ-वहाँ उग आये हरे पेचों से सीलापन हवा के साथ उड़ता रहता है।

एक बेहद हल्की ख़ुशबू आती है। जैसे कोई मन चटक कर खिल रहा हो।

बिल्ली मुझे देखती है। मैं उसे पूछता हूँ कि जिस तरह स्वप्न चटक कर खिलता है और मौसम में घुलकर अदृश्य हो जाता है, उसी तरह मन भी बह जाता होगा?

लघुत्तम मौन के बाद बिल्ली कूद कर खिड़की में बैठ जाती है। अगली छलांग में वह गायब हो जाती है। जैसे एक स्वप्न।

तेरी ओर तेरी ओर

सुरों की पेटी खोलने वाला क्या सुरों को ठीक रास्ता बता सकता है? क्या कहीं बीच में ही झर जाते हैं सुर जैसे आकाश को ताकती लता के फूल ज़मीन पर गिरते रहते हैं।

हम स्वप्न में किसी फूल को देखते हैं तब क्या फूल को भी ऐसा कोई स्वप्न आता है?

स्वप्न अलोप होता हुआ एक रेखाचित्र है। कभी वह लिखित संदेशे नहीं छोड़ता।

मगर क्यों?

हवा का झोंका फिर आता है।

एक गीत का मिसरा उलझकर सांसों में टँग जाता हैं। पीठ को पीछे की ओर किये खिड़की से बाहर देखते जाना कि एक बार बारिश कितनी हरियाली फैला देती है।

उसने क्या पहना था? एक गहरा रंग। रंग के साथ कोई हल्की किनारी? कुछ याद नहीं। जिसे देखना हो उसे सलीके से देखा नहीं जाता।

कुछ कत्थई फूल खिल उठते हैं। गीत कहीं दूर चला जाता है जाने किसकी ओर।

स्वप्न, फूल, बारिश, हरियाली, प्रतीक्षा और गरम-सीली हवा आवाज़ हो जाती है। अक्सर दुविधा के पायदानों पर चुप बैठी हुई आवाज़। इसलिए कि कुछ भी आसान नहीं होता।

इस चुप्पी में होठों पर रखी अंगुलियां मीठी लगने लगती हैं। इस मिठास में ख़याल टूट जाता है। कितना कुछ बचा रहता है। जैसे कहना बचा रह जाता है।

कहना एक लकीर है। इसके दोनों और के संसार अलग हैं। कह देने या न कहने के सुख और दुख दोनों हैं।

कहना।
* * *

शुक्र है कि तुम्हारे इतना करीब होना हो पाता पाता है कि तुम्हारे चेहरे पर बने छोटे गड्ढे देखने को मिल जाते हैं। लेकिन हर बार तुम जब भी मिलते हो बाल क्यों छँटवा लेते हो? वे लंबे अच्छे दिखते हैं। उनमें अंगुलियां फेरने का मन बाक़ी रह जाता है। 

इस बार बाल बचाये रखना।
* * *

मैं फिर एक स्वप्न से जागता हूँ और सोने चला जाता हूँ।
* * *

July 3, 2018

बाक़ी कामों से भरी जिंदगी




ज़िन्दगी में काम पेंडिंग पड़े रहें इससे अच्छी बात सिर्फ एक ही होती है कि उन कामों को भुला ही दिया जाए। काम पूरे हो जाएंगे तो क्या करेंगे? लेकिन मन कई बार होता है कि कुछ काम पूरे कर लिए जाएं। उन कामों में लगते ही कुछ रोज़, कुछ घण्टे या कुछ ही देर में मन उचट जाता है।

हर काम के होने का कोई मतलब होता है। जैसे कुछ काम पेंडिंग होने को ही होते हैं। कुछ कभी न होने के लिए होते हैं।

कुछ किया, कुछ न किया। ज़िन्दगी चलती रही। फेसबुक को फोन से नहीं हटाया, मन से हटा दिया। क्या हमारे समय का इतना सा मोल रह गया है कि स्क्रॉल करें, अपडेट करने को सोचें या फिर इनबॉक्स किये जाएं। असल में फेसबुक ज़िन्दगी की एक बहुत मामूली सी बात है। ज़िन्दगी का विस्तार इतना है कि हम अचरज भरे उचक सकते हैं, चौंक कर ठहर सकते हैं या फिर कुछ न करने के परमानंद को पा सकते हैं।

अब बस मेल पर बात कर लेना ठीक लगता है। और कहने सुनने लायक बात हो तो फोन पर कर लेता हूँ। मेल का पता yourkc@yahoo.com हैं। यहीं से सब बातें हो जाती हैं।

आज लोक संगीत रिकॉर्ड कर रहा था। मुल्तान ख़ाँ साहब ने नौजवानी भरा गीत गाया। मैं उनको कहने लगा कि आपको कौन कहेगा कि दिल के दो झटके लगे हैं। असल में आज आप दिलों को झटके दे रहे हैं। इसके बाद मैं फोन लेकर स्टूडियो में गया और कहा- "आपको आज अपने फोन में दोस्तों के लिए सहेज लूँ।" उन्होंने कहा- "हमें भी दिखाना" इस बात पर ख़याल आया कि पेज पर शेयर कर आता हूँ।

भपंग पर रौशन, ढोलक पर सवाई, खड़ताल भुंगर ख़ाँ, गायक मुल्तान ख़ाँ और उनका गायन में सहयोग जेते ख़ाँ कर रहे हैं। ये किसी रिकॉर्डिंग का हिस्सा नहीं है मेरे अनुरोध पर गाया है।

इन मीठे प्यारे कलाकारों का शुक्रिया। ❤

July 2, 2018

वो जो दिल ने सोचा



घर में एक पेड़ है। हर सुबह एक चिड़िया आती है। वह सबसे ऊंची शाख पर झूलती है। शाख लचकती है। चिड़िया इस लचक के साथ गाना गाती है। मैं दोनों को देखता हूँ। 

अचानक मोगरे का नया फूल मुझसे पूछता है। "तुम क्या देख रहे हो?" मैं अचरज से भरा हुआ मोगरे के फूल से पूछता हूँ- "तुमको कैसे पता कि मैं कुछ देख रहा हूँ?" 

"तो क्या कर रहे हो?" 

"मैं सुन रहा हूँ" 

"क्या चिड़िया का गाना?" 

"नहीं उसकी बातें" 

"अच्छा तुमको कैसे समझ आता है कि वह गा नहीं रही।"

"मुझे नहीं समझ आता मगर मेरे भीतर एक चिड़िया है वह समझती है" 

मोगरे के नए फूल ने अपनी ठोडी पर एक पत्ती रखी और कहा- "तो बताओ चिड़िया ने क्या कहा?"

मैने कहा- "चिड़िया पेड़ से कहती है कि तुम हर सुबह बड़ा होने का स्वप्न लिए जागते हो।" 

मोगरे का फूल कुछ सोचने लगा तभी एक बुलबुल मुझसे बोली- "तुम उसकी बातें नहीं समझते हो" 

मैंने पूछा- "तुमको कैसे पता?" 

"इसलिए कि मैंने सुना था चिड़िया रोज़ उससे कहती है कि तुम पेड़ नहीं हो। तुम एक झूला हो" 

मोगरे का फूल चुप था। मैं भी चुप हो गया। बुलबुल भी इससे आगे कुछ न बोली। 

सुबह की हवा में मोगरे की सुगन्ध थी। बुलबुल की रंगत घुली थी। तभी पेड़ की शाख तेज़ी से लहराई। चिड़िया उड़ी और हमारे पास टंगे एक मृदा पात्र पर बैठ गयी। उसमें भरा पानी कुछ बूंदें बनकर हम सबकी ओर छलका। 

चिड़िया ने कहा- "मैं पेड़ से कहती हूँ कि तुम एक चिड़िया हो और मैं एक शाख हूँ जो तुमको गुदगुदी करने आती है।" 

जून के आख़िरी दिनों में बरसात होती रही। रेगिस्तान भीगने की गमक से भरा रहा। कभी फुहार गिरती तो याद आता कि किसके साथ भीगे थे। मोगरा महकता तो उस घर की याद आती जहाँ बंदनवार की तरह बेल झूमती थी। यादें हर बात में थी। अचानक गर्म दिन आ जाये और हवा के साथ धूल उड़ने लगे तो उस मौसम की भी यादें बेहिसाब हैं। 

दोपहर तक मोगरे का फूल दूजे फूलों में खो गया। बुलबुल उड़ गयी। चिड़िया दो फुर्र की आवाज़ करते हवा में सर्फिंग करते हुए उड़ गई। बादल गायब हो गया। 

मैंने रेत पर लिखा "प्रेम" 

परसों शाम उसने मुड़कर देखा था। आज हमने एक से रंग पहने मगर हम नहीं समझते कि कुदरत क्या कहती है? या समझने लायक कोई बात ही नहीं होती और हम बेवजह सोचते रहते हैं। जैसे चिड़िया, बुलबुल, मोगरे का नन्हा फूल वही बात समझता है, जो वो अपने दिल में सोचता है। 

और मैं? जाने दें। 

प्रेम की भाषा नहीं होती केवल सुगन्ध होती है। 

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.