September 29, 2018

नई दिल्ली एक दीवार पर ऊंट

रेगिस्तान में ऊंट भिक्षु नहीं एक साधु था। उसने हमारे दुःख ढोये। उसने रास्ता दिखाया। रेगिस्तान वालों ने अपने लोकगीतों में ऊंट को जी भर गाया। गहरे मन से नवाजा। "घोड़लो बँधावां गढ़ री भींत, करियो बँधावां हाँ जी कोटड़ी।" अश्व तो गढ़ की दीवार के पास बंधे रहें लेकिन हमारा नौजवान ऊंट कोटड़ी यानी मेहमानख़ाने के पास ही बंधेगा।

जिस तरह प्रेम एक स्मृति और प्रतीक्षा है, उसी तरह रेगिस्तान के दिल में ऊंट है।


September 24, 2018

जहां से आगे पटरी कहीं नहीं जाती

अक्सर ज़्यादा लेना चाहा 
और तुम्हारे दिल को कम-कम तोला।

मेरा मन एक बे ईमान का तराजू था। 
* * *


अब लैपटाप के किनारों पर पड़ी बारीक गर्द को देखते हुये सोचता हूँ कि कब से इसे पोंछा नहीं है। ठीक ऐसे ही कभी-कभी सोचता हूँ कि हम आख़िरी बार कब मिले थे।

नींद से जागता हूँ तो याद आता है कि एक संदशे में लिखा था। "आप अच्छे आदमी हैं।" अगली नींद से जागते ही याद आता है कि कोई मेल था। "एक आदमी को स्टेज पर गाते हुये देखा तो अचानक आपकी याद आई। उसकी तस्वीर भेज रही हूँ। देखना" उसकी अगली नींद से जागते ही याद आता है कि कौन था जिससे कुछ बात हुई। जवाब न देने के बारे बात।

स्कूल के रास्ते में एक रेलवे ठोकर थी। माने जहां से आगे पटरी कहीं नहीं जाती। वहाँ तक रेल का इंजन आया करता था। उसे वापसी की दिशा में मुड़ना होता था। उस ठोकर पर बैठने से रेलवे फाटक की ढलान और बहुत सारे कच्चे घर दिखते थे। वो बहुत अजीब जगह थी कि जहां से बहुत कुछ देखा जा सकता था मगर आगे जाने का रास्ता बंद था।

जैसे ये उम्र है। यहाँ से कुछ अधिक दिखाई देता है लेकिन कहीं जाया नहीं जाता। 
* * *
बाद के दिनों में वो ठोकर नहीं रही। रेल इंजन दोनों दिशाओं में समान रूप से काम करने लगे। वे ठोकर तक नहीं आते थे। जहां खड़े होते वहीं से मुड़ जाते थे। रेल के डिब्बों के गहरे लाल रंग पर नए रंग चढ़ गए थे। हमने भी रेलगाड़ी को प्रेम की जगह एक ज़रूरत समझ लिया। हम रेलगाड़ी तक जाते थे लेकिन केवल अपनी जगह खोजते थे। हमने रुक कर रेल गाड़ी को कभी नहीं देखा। जब हमें रेलगाड़ी में नहीं जाना होता था तब तक के लिए हमने उसे भुला दिया।

एक रोज़ हमें प्रेम करने की भूल के लिए माफी मांग लेनी चाहिए।

मुझे उन संदेशों का क्या कोई जवाब देना चाहिए था। या मेरा हर बात पर एक स्माइली बना देना अच्छा है। कभी और अधिक कहने को हुआ तो कह देना कि आप अच्छी हैं। और भी बात हो जाए तो कहना, हम कभी ज़रूर बात करेंगे। लेकिन मैंने सोचा कि मैं एक लालची आदमी हूँ। मेरा मन अब भी वैसा ही है। मैं एक रेल की ठोकर की तरह खड़ा हूँ और इसकी अब ज़रूरत नहीं है। 
* * *

September 22, 2018

अकेलेपन की बारूदी सुरंगें

किसी के एकांत में अपनी इच्छाओं के बीज मत फेंकना.

एक लड़का तीन बार फ़ोन कर चुका था. उसे मुझसे अपने उपन्यास के बारे में बात करनी थी. एक बार मेरे पास समय न था बाकी दोनों बार मेरा मन न था. मैं छोटी-छोटी बातों से रेस्टलेस होने लगता हूँ. इसके बाद सामान्य होने में बहुत समय लगता है. कई बार तो वह बात मेरे मन से जाती ही नहीं कि ऐसा क्यों हुआ. अपने आप को समझा लो, डांट लो, कोस लो लेकिन छीजने की अपनी प्रक्रिया है और वह उसी तरह से होता है. मैं उसे समय न दे पाया. दो तीन दिन बाद माँ ने आवाज़ दी कि कोई मिलने आया है. दोपहर के दो बजे थे. मैं दरवाज़े तक गया तो पाया कि एक लड़का खड़ा है. उसने अभिवादन किया. "सर मेरे को आज वापस अहमदाबाद जाना है. आपसे मिले बिना जाने का मन न था इसलिए चला आया."

हम अपने लिविंग रूम में बैठ गये. उस कमरे में माँ का छोटा पलंग है. रजाई और गरम कपड़े रखने का बड़ा संदूक है. एक सोफ़ा से बिछड़े हुए दो कुर्सी जैसे सोफे हैं. एक तरफ दीवार में बनी अलमारियों में कुछ एक किताबें रखीं हैं. उन दो अलमारियों के बीच पिताजी की तस्वीर टंगी है. पिताजी की मोनालिसा मुस्कान को घेरे हुए प्लास्टिक के फूलों की माला है. उस पर बारीक गर्द जमी रहती है.

मैं उसके लिए पानी लेकर आया तब उसे कमरे का मुआयना करते हुए पाया. वह चीज़ों को देख रहा था. उसे इस तरह देखते हुए मुझे अच्छा लगा. मैं आश्वस्त होने लगा कि ये लड़का ज़रूर कहानी कह सकेगा. इसके पास एक दृष्टि है, जिससे ये आस-पास को देख सकता है. फिर मैंने सोचा कि कितना देखता है? इस बात पर मेरी आशा जाती रही. असल में वस्तुओं को देखना और वस्तुओं के भीतर तक देखना दो अलग बातें हैं. इससे पहले वस्तु को देखना और वस्तु को समग्र देखना भी एक अलग बात है. क्या इसने इस कमरे में रखी वस्तुओं को पहले खुली आँखों से और फिर बंद आँखों से भीतर तक देखा है?

"सर मैं एक उपन्यास लिख रहा हूँ. उसके बारे में आपसे बात करनी थी. मैंने जो लिखा है वह आपको दिखाना चाहता हूँ"

मैंने कहा- "एक पंक्ति में कथानक बताओ"

उसने कहा- "सर मेरी कहानी यहाँ से आरम्भ होती है. इसके मैंने तीस पन्ने लिखे हैं"

मैंने कहा- "आप मेरी बात समझे नहीं. किसी भी कथा को पहले एक पंक्ति में कहा जाना चाहिए. जैसे मैंने एक कहानी कही "अंजली तुम्हारी डायरी से बयान मेल नहीं खाते" इस कहानी के बारे में मुझे कोई पूछे तो मैं कहूँगा कहानी में कहना है कि स्त्री शोषण को पुरुष समुदाय एक राय ही नहीं वरन एकजुट भी रहता है"

उस लड़के ने कहा- "आप मेरा लिखा हुआ पढ़ लें तो आपको समझ आएगा. आगे मैं आपको बताऊंगा." सहसा रुक कर उसने थोड़ी अधिक उत्सुकता से कहा- "मुझे ये जानना है कि मैं ठीक लिख रहा हूँ या नहीं."

मैं मुस्कुराया. "आप ज़रूर ठीक ही लिख रहे हैं इसलिए कि आप लेखन को लेकर इतने प्रतिबद्ध हैं कि तीन बार फ़ोन पर हाँ नहीं कहने के बाद भी आप यहाँ तक आये."

"तो सर आप पढेंगे"

"हाँ ज़रूर पढूंगा मगर सौ पन्ने लिखकर भेजना."

मैंने पूछा- "चाय पियेंगे?" इसका जवाब मिला नहीं. फिर कुछ देर उसने मुझे मेरी कहानियों के बारे में बताया. लेकिन ध्यान उसका अपने उपन्यास में ही था. अचानक पूछता है- "सर मैं उपन्यास लिख लूँगा तो लोग पढेंगे?"

मैंने भी प्रश्न ही किया- "आप क्या चाहते हैं? लिखना या लोगों का पढना?"

वह मुस्काने लगा- "सर हम लिखें और लोग पढ़े भी, तभी अच्छा लगता है?"

कहानी कहना, कहानी का छपना और पाठकों का प्यार मिलना, फिर कभी-कभी जीवित रहते हुए लेखन से धन बना लेना प्रकाशन बाज़ार के काम हैं. इस संसार में गम्भीर लेखन भी हो रहा है लेकिन अधिकतर लेखक पुरानी किताबें साथ लिए बैठे रहते हैं. वे उनके हिस्से अपनी भाषा में लिखते हैं फिर अपने लिखे को उसमें समायोजित करते हैं. फिर कहानी कैसे बन रही है? ये देखते हैं. अकथा वाले तो अधिकारपूर्वक कंटेंट की सत्यता के लिए बिब्लियोग्राफी भी करते हैं. उनको ऐसा ही करना चाहिए. इस तरह कहानी रची, छपी और बिकी जा रही है तो इस पर किसी को क्यों आपत्ति होनी चाहिए. रोज़मर्रा में उपयोग आने वाली वस्तुएं बनती हैं. उनको हम खरीदते और उपयोग करते हैं, उसी तरह प्रकाशन भी है. लिखो या छापो और धन कमाओ. प्रकाशन समाजसुधार के लिए चल रहा अव्यसायिक आयोजन थोड़े ही है. किसी की आवश्यकता है तभी वह खरीद रहा है. उसे कोई धमका कर या भयादोहन करके तो किताब नहीं बेचता. इसलिए ऐसे बाज़ार पर सवाल करना ठीक नहीं है.

सवाल ये है कि लिखना क्यों चाहते हो?

बहुत से कारण विद्वानों ने सोचे हैं. जैसे सम्मान, यश, नौकरी, विचार प्रसार, धन आदि. यहाँ आपको अधिकतर लेखक ऐसे ही मिलेंगे जिनको अपने लेखक होने की पहचान अधिक प्यारी लगती है. अखिल भारतीय सेवा के एक सेवानिवृत अधिकारी को निजी काम था. जिनसे काम था उनके घर मैं साथ गया. वे अधिकारी कहीं बाहर गए हुए थे. उनकी बेटी जो कि शिक्षा विभाग की राजपत्रित अधिकारी है उन्होंने कहा- "अंदर आइये." हम बड़े हाल में सोफों पर बैठ गए. मैंने उनसे परिचय करवाया कि आप फलां सज्जन हैं. आपको ही पापा से काम है" उन्होंने पूछा- "आप क्या करते हैं?" मैं जिनके साथ गया था उन्होंने जवाब दिया- "मैं लेखक हूँ" वह पूछती है- "लेखक हो ये तो ठीक है मगर काम क्या करते हो?"

मैंने पुनः इस सत्य को पाया कि कुछ भी स्थायी नहीं है. लेखक जीते जी सम्मान नहीं पा रहा है और वह आशा करता है कि उसका यश मृत्यु के बाद भी बढ़ता जाये.

मेरे पास ऐसी प्रतिभा नहीं है कि किताबों के ढेर से कुछ पढूं और उसे अपनी कल्पनाशक्ति से नयी भाषा में लिख दूँ. लिखना अच्छा होता है लेकिन मैं लिखने को लिखता रहूँ, लोग वाह-वाह करें और अपने मन को राज़ी कर सकूं. ऐसा हो नहीं पाता.

आपका कितना सारा समय एक ढंग का वाक्य लिखने में चला जाता है, इसको सोचा है? फिर आप लिखने वालों की सोहबत और उनकी प्रशंसा में कितना समय गंवा देते हैं. फिर साहित्यिक आयोजनों में जाने की लालसा, मंच पर बैठने की हुलस, यश पाने के लिए हर साधारण-असाधारण के आगे कमर को झुकाते हुए कितना समय और जीवन नष्ट हो रहा है इस बारे में सोचते हो? मैं ये सोचता था. अब नहीं सोचता कि मुझे ये सब नहीं करना है. और इस सब काम से मुझे मोहब्बत भी न रही. जब किसी तकलीफ से बाहर आने को लिखना अच्छा लगेगा केवल तब ही लिखूंगा.

लिखते क्यों हैं ये ही नहीं सोचते तो जीवन का क्या करना है, ये कैसे कोई सोचे?

एक ख़राब कहानी और औसत गद्य से निम्न कविता कहने से अच्छा है बर्तन धोना सीखना. साग बघारना जानना. कपड़े धोना. झाड़ू लगाना. ऐसे अनेक काम हैं, वे काम करना ताकि पार्टनर को आराम आये. उसकी पीठ पर हम जो एक अदृश्य गधे की तरह सवार हैं, इससे उसे मुक्ति मिल सके. हम किसी के कष्टों के न्यूनतम कारण रह सकें. ये इस जीवन का काफी अच्छा उपयोग है. इसके साथ किसी व्यक्ति से प्रेम से मिल सको तो दुनिया के सबसे बड़े लेखक से बड़े आदमी हो. किसी को प्रेम करके उसकी प्रतीक्षा में चुप बैठ सको, तो ये सबसे गहरी उदास कविता रचना है. किसी से झूठ ही कह दो "हाँ हम मिलेंगे" ये आशा की बड़ी रचना है.

साल भर हो चुका है और वह लड़का अभी तक लौटकर आया नहीं है. उसके उपन्यास का क्या हुआ मालूम नहीं. मैंने भी पिछले तीन साल में जो लिखा वह ऐसे ही बिखरा और अधूरा पड़ा हुआ है. लेकिन मेरी इच्छाएं पूरी हो रही है. मेरे सर के बालों में अब सफेद बाल झांकने लगे हैं जल्द ही मैं साल्ट एंड पेप्पर लुक में दिखने लगूंगा. दो तीन साल पहले ऐसे बाल मेरी एक दोस्त के थे. उससे पूछा था- "मेरे बाल ऐसे कब दिखेंगे?" उसने झूठ बोलकर पीछा छुड़ा लिया था कि आपके बाल तो सबसे सुन्दर है. इस गुस्ताखी पर मैंने उसे ज्ञान दे दिया था. मोमोज खाते-खाते ही उससे कहा- "इस दुनिया के लोगों और चीज़ों के बारे में सोचना ही हमें बचाए रखता है. हम ख़ुद के बारे में सोचने लेगें कि जीवन क्या है और हम इसका क्या करें तो कब के पागल हो जाएँ"

मैंने जो पहला वाक्य लिखा उससे मेरा अभिप्राय है कि किसी के अकेलेपन में अपने लालच मत बोना. तुम्हारा लालच उसके गले का फंदा बन जायेगा. वह फिर जी न सकेगा और उसी फंदे को तुम्हारी गर्दन में डालना चाहेगा. अब दुनिया बहुत बदल गयी है. कुछ तो लोगों के पास अकेलापन है कुछ ने इसे अपनी समझ से बना लिया है. इसलिए ध्यान रखो.

तुम अकेलेपन की बारूदी सुरंगों वाले मैदान में चल रहे हो. कहीं सुरंग पर पांव पड़ गया तो समझ लो अंजाम क्या होगा. 
* * *

इस पोस्ट के लिए तस्वीर खोज रहा था कि इन्स्टा पर एक नयी फोलोवर दिखी- मनचली जोगण. उसी के इन्स्टा से ये सार्थक तस्वीर ले ली.



तस्वीर सौजन्य : instagram.com/introspectivegirl

September 17, 2018

और मुमकिन है तेरा ज़िक्र कर दे ख़ुदा भी



चार पांच दिन बड़े बेकार गुज़रे हैं. मुंह छालों से भर गया. मैं अपने चारागर अमर लाल जी को याद करता रहा. अमर जी बाड़मेर के पहले प्रेस फ़ोटोग्राफ़र हैं. आजकल कहाँ है पता नहीं. उनको लम्बे समय से देखा नहीं. ईश्वर करे जहाँ कहीं हों आराम से देसी सूंत रहे हो.

रात के नौ बज गए थे महफ़िल जमी हुई थी. दो तीन लोग सीधे बैठे थे, इतने ही लोग कुर्सी पर लटके हुए सांप की तरह थे. उनकी मुंडी टेबल के नीचे से ऊपर की और आती और ग्लास को मुंह लगाकर वापस नीचे चली जाती. सूचना और जनसम्पर्क विभाग में सहायक निदेशक प्रदीप चौधरी कॉलेज दिनों की अनाम प्रेमिका की याद में गीत गा रहे थे. अनाम प्रेमिका इसलिए कहना पड़ता है कि हमारी भाभी न हो सकी लड़की का नाम प्रदीप जी कोई चार पांच पेग के बाद लेते थे. उस वक़्त तक हम भी रसायन के प्रभाव में सूफी हो चुके होते. इसलिए अल्लाह मिया के सिवा कुछ याद न रहता.

चाँद आहें भरेगा फूल दिल थाम लेंगे. हुस्न की बात चली तो...

इतने में अमर लाल जी आ गए. कोई फोटो देने आये थे. प्रदीप जी का गीत रुक गया. "आओ अमर जी." प्रदीप जी ने अभिवादन किया. अभिवादन के जवाब में अमर जी ने कहा- "ये लिफाफा रख रहा हूँ इसमें फोटो हैं." प्रदीप जी बोले- "ठीक है रख दो. उधर रसोई में ग्लास रखी है. ले आओ" अमर जी ने मौका मुआयना किया. अंग्रेजी की बोतलें देखकर मुंह बिचका लिया. "लो, ये आप लो. मैं लेकर आया."

आकाशवाणी जोधपुर में एक म्यूजिक कम्पोजर थे. मैं उनका नाम भूल जाता हूँ बस पंवार साब याद रहता है. उनके सुपुत्र भी बाड़मेर आये हुए थे और महफ़िल में उपस्थित थे. संगीत साधना उनके खून में थी. इसलिए वे प्रदीप जी के ठीक-ठाक सुर पर प्रसन्न थे. प्रदीप जी ने कहा कि इस गीत में एक और अंतरा है लेकिन वो ग्रामोफोन में शामिल नहीं है. मैं जब आकाशवाणी में फ़िल्म संगीत प्ले कर रहा होता हूँ तब बड़ा दुःख होता है कि गीत को काटकर एलपी में डाल दिया. लेकिन फ़िल्म के गीत में वो अंतरा आता है. इतना कहते ही छोटे पंवार साहब ने शुरू कर दिया. "चुप न होगी हवा भी, कुछ कहेगी घटा भी..." प्रदीप जी ने और गहरा सुर लगाया "और मुमकिन है तेरा ज़िक्र कर दे ख़ुदा भी...."

अमर जी ने ख़ुदा को इतना बेबस होने से बचा लिया और कहा- "तू क्यूँ गोगड़ मिन्नो होवे ज्यू बैठो है?"

दीने ने कहा- "म्हारे मूंडे में छाला होयाड़ा है"

अमर जी ने सांत्वना देते हुए कहा- "छाला मूंडे आला ही भला."

सारे गायक और श्रोता किसी खोयी हुई तासीर से बाहर आये. कोने में चुप बैठा दीना नाराज़ हो गया. "अमर लाल थारे लेवणों होवे तो ले, नई तो आगो बळ"

अमर जी ने कहा- "मजाक नी करूँ. एक बार करने देख. देसी रो एक पव्वो ला. बिना पाणी रे कुल्लो कर अर पी जा. सुबह तक छाला ठीक नी हुवे तो म्हारो नाम अमर लाल नी"

प्रदीप जी ने अपनी अंगुलियाँ टेबल पर मारी और शुरू हो गए. "होठ गंगा के साहिल. आह आह किशोर जी मैं खड़ा हुआ गा रहा और सब लड़के-लड़कियां लान में बैठे हुए. आगे वह भी बैठी. मेरी ओर देखे जाये. मैं अंतरा शुरू करूँ तो उसकी ओर अपने हाथ से हल्का इशारा करूँ और गाने लगूं. ऐसा चेहरा है तेरा जैसे रोशन सवेरा... वह मुझे देखे और दूब कुचरती जाये."

ये स्क्रीन प्ले और गीत इसी तरह से लगभग हर पार्टी में चलता था. इस बीच दूसरा जो गीत गाया जाता था उसका नम्बर तीन पेग के ठीक बाद आता था. गीत था- कसमें वादे प्यार वफ़ा सब बातें हैं बातों का क्या. इस गीत में विशेष ज़ोर या खरज का सुर तब लगाया जाता था जब आता कि तेरा अपना खून ही आखिर तुझको आग लगाएगा. मैं बेसुरा चुप सुनता रहता था. हमारी महफ़िल नियम से एक बजे समाप्त कर दी जाती. इसकी उद्घोषणा भी प्रदीप जी स्वयं करते. "भाइयों अब बस करते हैं. हम समझदार, परिवार वाले, इज्ज़तदार लोग हैं. इतनी रात को कलक्टर या एसपी साहब रास्ते में मिल गए तो अच्छा नहीं लगेगा कि हम दारू पीकर घूम रहे. आओ चलते हैं"

इस उद्घोषणा में आया इज्ज़तदार शब्द सबको अटेंशन में ले आता था. लेकिन हम सब बोतलों की ओर देखते. जाँच परख होती कि कुछ बच तो नहीं गया? कल सुबह कोई देखेगा तो क्या कहेगा. सात आठ लोग मिलकर तीन बोतल दारु न पी सके. हमको ऐसे देखते हुए प्रदीप जी कहते- "देखो बोतलें खाली होने के साथ गिलासें भी ठिकाने पर जमा कर रखनी हैं. धोना भले ही मत. कल धो लेंगे"

मुझे तीन दिन से अमर जी की बड़ी याद आई. अब तो सरकार ने आकाशवाणी बाड़मेर के मुख्य द्वार के ठीक सामने देसी का ठेका लगवा दिया है. माने आप ज्यों ही थके-हारे, शोषित, उपेक्षित, फ़िल्म संगीत प्ले करने के दौरान बीती हुई ज़िन्दगी को याद करके घबराए हुए स्टूडियो से बाहर आयें तो आपकी ताज़गी के लिए ठेका स्वागत में खड़ा मिले. मैं अमर जी को ही याद करता रहा. देसी का पव्वा न खरीद सका. गेट से बाहर निकलते ही गाड़ी की स्पीड धीमे की लेकिन कांच नीचे न किया और उदास आगे निकल गया. ठेका पीछे छूट गया.

तिलक बस स्टेंड पर एक खोखा है. यहाँ नए धुँआ प्रेमी आते हैं. वे खोखे में छिपकर सिगरेट फूंकते हैं. कुछ सीनियर लोग बाहर ही बैठते हैं. उनसे भी सीनियर लोग रेलवे वालों की बनाई बाउंड्री पर ग्लास साथ लेकर बैठते हैं. रेगिस्तान के जीवट वाले लोग हैं, बड़ी मेहनत करके कड़ी दोपहरें बुझा देते हैं.

मैं खोखे के आगे खड़ा होकर सिगरेट सुलगा रहा था कि एक परिचित ने पूछा- "क्या हाल भाई साब?"

मैंने कहा- "मुंह में छाले हो गए."

"भाई साहब एक दवा आती है. जल्दी ठीक हो जाते हैं."

मैंने कहा- "मुझे दवाओं पर यकीन नहीं है. एक अल्कोहल है जिससे केंसर नहीं होता है. उसी से इलाज करेंगे."

"वो आप कुल्ला करने की तो नहीं सोच रहे?"

"मैंने कहा- "और कोई रास्ता नहीं है. वैसे भी पानी मिलाकर पीते-पीते बोर हो जाते हैं. वही ग्लास भरो खाली करो. होता कुछ है नहीं."

दोस्त ने कहा- "भाई साहब मुंह छिल जायेगा. जलन होगी और पक्का छाले ठीक न होंगे."

मैंने कहा- "ठीक है गोली मारो. अमर जी का कहना है मुंह के छाले ही अच्छे होते हैं. इसलिए पड़े मरने देते हैं"

कल शाम कुछ काम था नहीं. दारु का प्याला भरो, प्याला खाली करो. जंगली आदमी की तरह सेब चबाओ. इस बीच सोचा कि फेसबुक पर आई फ्रेंड रिक्वेस्ट एक्सेप्ट कर लूँ. फेसबुक ने फ्रेंड रिक्वेस्ट में अब सीनियरिटी हटा दी है. एक बार रिक्वेस्ट आई और आप देखकर किसी दूजे काम में लग गये तो रिक्वेस्ट पुरानी रिक्वेस्ट के ढेर में कहीं खो जाएगी. आपको पता न चलेगा कि नयी रिक्वेस्ट कौनसी है. प्याले भरने की लम्बी फुर्सत में कल रात चार सौ से अधिक रिक्वेस्ट एक्सेप्ट कर ली. आठ सौ और कुछ रिक्वेस्ट थी. अब चार सौ इकहत्तर पेंडिंग रही है.

कुछ प्रोफाइल के दो एक फोटो देखे. कुछ का कुछ न देखा. प्रोफाइल पिक्चर और बायो बड़े महत्वपूर्ण होते हैं. अधिकतर रिक्वेस्ट का अंजाम उसी से तय होता है. कल बिना सोचे समझे ऐसी रिक्वेस्ट एक्सेप्ट करी जिनमें नदी और तालाब किनारे गर्मी के दिनों से एक अधोवस्त्र में बैठे नौजवान थे, जिनमें किसी माल में रेलिंग पकड़े खड़ी नवयुवतियां थी. कुछ एक जिन्होंने कवि पाश और कामरेड चे के फ़ोटो लगा रखे थे. मुझे कल मालूम हुआ कि अटल बिहारी वाजपेयी जी ने दस बारह अलग-अलग अकाउंट बनाकर रिक्वेस्ट भेज रखी है. पता नहीं वे क्यों किसी भी तरह से मेरी प्रोफाइल में घुसना चाहते हैं. इस मृत्यु लोक को त्याग देने के बाद भी उनको चैन नहीं है. हार नहीं मानूंगा... मैंने भी सोच लिया. भेजते रहो अटल जी मैं भी अटल हूँ.

अचानक प्रदीप जी की आवाज़ आई. "हम इज्ज़तदार लोग हैं. कायदे से चलना रहना चाहिए." मैंने घड़ी देखी तो बारह बज चुके थे. सोचा कि अमरीका में अब क्या समय हुआ होगा? क्या प्रदीप जी ने बीयर खोल ली होगी. क्या वे गुनगुनाना शुरू कर चुके हैं. चाँद आहें भरेगा... मैं याद भरे क़दमों से चारपाई से उठा. आधे चाँद को निहारा. मैंने परम्परा अनुसार ग्लास को बिना धोये सही जगह पर रखा और सो गया.

छाले वैसे ही हैं पर काम चल रहा है. ये तस्वीर ठीक उन्हीं दिनों की है. तब ज़िन्दा होने की थोड़ी अकड़ बाक़ी थी. एक गीत और गाया जाता था. हम छोड़ चले हैं महफ़िल को, याद आये कभी तो मत रोना...

September 14, 2018

शब्द और रेखाओं से जनवाणी रचने वाला आदमी - रविकुमार स्वर्णकार

इससे पहले कि
हमारे मुख़ालिफ़ीन
सफ़्फ़ाकी से मुक़र्रर करें
हमारे लिए
सज़ा-ए-मौत

हम रूहों में तब्दील हो जाएंगे

०००००
रवि कुमार

वह एक सच्चा आदमी था. मैंने कल शाम उसके न रहने की ख़बर पढ़ी. मैंने अपने दायें बाएं देखा कि क्या वह चला गया है? पाया कि वह मेरे आस पास है. लेकिन जो प्रियजन उसे देख पाते थे वे उसकी छुअन से वंचित हो गए हैं. अब उसकी बाँहों के घेरे बेटे और बेटी को केवल स्मृतियों में ही मिल पाएंगे. उसके भीगे होंठ एक याद बनकर रह गए हैं. साथियों के कन्धों पर रखा रहने वाला हाथ एक भरोसा भर रह गया है.

मन तो कहीं न जा सकेगा लेकिन छुअन चली गयी है. 
* * *

अड़-अड़ के वाणी हुई, अडियल, चपल, कठोर।
सपने सब बिखरन लगे, घात करी चितचोर॥
चित्त की बात निराली
तुरुप बिन पत्ते खाली
चेला चाल चल रहा
गुरू अब हाथ मल रहा
सुनो भाई गप्प-सुनो भाई सप्प।

नाटककार कवि और संस्कृतिकर्मी शिवराम का निधन दो हज़ार दस में हुआ. उनके निधन के कुछ एक साल बाद अड़ अड़ कर आती वाणी कोमा में चली गयी, चेला ने गुरु को गुड़ कर दिया और ख़ुद शक्कर हो गया. एक दूरदर्शी ने इतनी सच्ची गप कही कि ज़माने ने दांतों तले अंगुली दबा ली.

शिवराम अक्टूबर दो हज़ार दस के पहले दिन गुज़रे थे. अभी हम उनको याद करते उससे पहले ही रवि कुमार न रहे.

मैं एक अद्वितीय व्यक्ति की याद से भर कर ठहर गया.

इसी तेज़ गति के संचार माध्यम फेसबुक में रवि कुमार से परिचय हुआ. रवि एक अद्भुत पाठक थे. वे किताबों के साथ-साथ आधुनिक माध्यमों पर गहरी नज़र रखते और अपनी सक्रियता बनाये रखते. यहीं से उनके बहुत सारे चाहने वाले बने कि रवि सदा बिना किसी आग्रह के अपनी रूचि से मेल खाती और एक प्रगतिशील समाज के उपयोगी पोस्ट्स को शेयर करते रहते थे. उन्होंने मेरी भी पोस्ट शेयर की तो उनसे बात हो गयी.

आप कोटा से हैं? 
हाँ रावतभाटा रहता हूँ 
अच्छा 
आप रावतभाटा से परिचित हैं? 
हाँ वहां थर्मल में हंसराज चौधरी काम करते हैं. वे मेरे प्रिय जनकवि हैं. मैं उनसे बहुत बार मिला हूँ. 
अहा ! - एक विस्मयबोधक उग आया. 
थोड़ा रुक कर रवि ने पूछा- कोटा में किसे जानते हैं? 
मैंने कहा - शिवराम जी को. 
रवि को और अधिक अचरज होने लगा. उन्हने मुस्कुराते कहा- "वे मेरे पिता हैं."

हमारे बाड़मेर शहर में नाटकों की लम्बी परम्परा रही है. हालाँकि देश में शायद ही कोई ऐसा क़स्बा होगा जहाँ नाटक न खेले जाते रहे हों. यहाँ बाड़मेर में एक बहुत बड़ी और दीवाना टीम काम करती रही. इनमें गोपी किशन शर्मा ऐसे नाट्य निर्देशक और अभिनेता थे, जिन्होंने शहर को एक ऐसा नाटक कभी भूलने न दिया जो इमरजेंसी से पहले लिखा गया. जनता पागल हो गयी है.

समय के साथ उम्र घेरे डालती रही और बाड़मेर में कलाकार अस्वस्थ होते गए, उनका मन टूटता गया लेकिन गोपीकिशन जी लोहे के बने हुए थे. उन्होंने इतने गंभीर नाटक को जनता की स्मृतियों से लोप न होने दिया. उन्होंने अपने स्वास्थ्य की, सरकारी काम की और परिवार की चिंता न की. इसलिए मेरे मन में गोपी जी के लिए सदा गहरा आदर बना रहा. गोपी जी ने शिवराम जी की स्मृति और लेखन को ज़िन्दा रखा.

जनता पागल हो गयी है, लिखने वाले शिवराम की वट छाया में बड़े होना कठिन काम था. ये असम्भव ही था कि इतने बड़े लेखक और जन संस्कृतिकर्मी और आन्दोलनकारी के घर में जन्म लेकर अपनी अलग पहचान बना सके. लेकिन रवि एक बेहतरीन चित्रकार थे. सुंदर और मन को छू लेने वाली कविताएँ लिखते थे. वे आत्मा के द्वार को खटखटाने वाले शब्द उकेरते रहते थे. साहित्यिक और सामाजिक आंदोलनों में अथक कम करते थे. उनकी अपनी प्रतिभा इतनी बड़ी थी कि वे पिता के ऊंचे कद के साथ बड़े होते गये. उनकी अपनी छवि और पहचान बनती गयी. ये भी सच है कि मैं रवि से प्रेम इस कारण नहीं करता था कि वे शिवराम जैसे बड़े आदमी के बेटे हैं. बल्कि इसलिए कि वे ख़ुद बड़े हैं. मुझे तो ये बहुत बाद में मालूम हुआ था कि रविकुमार स्वर्णकार के पिता कौन हैं.

फेसबुक पर कविता पोस्टर एक तरह का जन आन्दोलन ही है. अनेक लोग कविता पोस्टर बना रहे हैं. ये सब लोग सोच से रूढ़ीवाद के विरोधी हैं. स्त्री अधिकारों के समर्थक हैं. ये गरीब के लिए न्याय की बात करने वाले हैं. इसलिए ऐसे लोगों के चाहने वाले भी असंख्य हैं. रवि के बनाये पोस्टर अनगिनत लोगों की वाल पर शेयर होते गए. रवि से प्रेम करने वाले भी बेहिसाब हुए.

रवि ने शिवराम के लेखन को डिजिटल किया. एक पिता को अपने पुत्र के लिए कभी आभारी नहीं होना पड़ता है लेकिन रवि ने शिवराम जी के काम को इस तन्मयता से डिजिटल किया कि अब इस काम को आगे ले जाने में अगली पीढ़ी को कोई विशेष परिश्रम न करना पड़ेगा. ये सब देखकर शिवराम जी की आत्मा संतोष से भर गयी होगी. उन्होंने अक्सर लम्बी और सुख भरी साँसे ली होंगी कि रवि जैसा पुत्र होना उनके जीवन का सबसे बड़ा उपहार रहा.

मैं एक हड़बड़ी में बहुत कुछ लिखना चाहने के कारण बेतरतीब होता जा रहा हूँ. मुझे जो कुछ अचानक याद आ रहा है लिख देना चाहता हूँ लेकिन कितना कुछ लिखा जा सकता है.

एक ऐसे समय में
जब लगता है कि कुछ नहीं किया जा सकता
दरअसल
यही समय होता है
जब कुछ किया जा सकता है

जब कुछ जरूर किया जाना चाहिए.

रवि की इस कविता को पहले भी पढ़ा था. आज भी पढ़ा है कि इस दुनिया में दो ही तरह के लोग होते हैं. वे वैसे ही रहते हैं. एक ज़िन्दा और एक मुर्दा. उनकी पहचान जीवन और जीवन के बाद भी यही रहती है. तुम ज़िन्दा इन्सान थे, तुम अब भी ज़िन्दा ही हो.

मैं जीवन पर भरोसा नहीं करता हूँ. इस बात पर अवश्य करता हूँ कि जब तक जीवन है, प्यार करते रहो और समाज को आगे ले जाने वाली बातों के साथ खड़े रहो. जातिवादियों, धार्मिक उन्मादियों और आतंकवादियों के नाश के लिए अपना योगदान देते रहो. कि ये दुनिया रामजी की है और हम सब रामजी की चिड़िया हैं. दाना चुगकर उड़ जाएँ उससे पहले सब प्रेम और भाईचारे से रह सकें.
रवि का जीवन ध्येय था एक बेहतर मनुष्य बनना. वो आदमी बेहतर मनुष्य ही था, रवि के लिए कोई अंतिम सलाम नहीं है. मेरा दिल जब तक धड़केगा इस आदमी को सलाम बजाता रहेगा.
 
मुझे रवि के परिवार की इस तस्वीर को ही साझा करना चाहिए कि बेहतर मनुष्य बनना इसलिए आवश्यक हैं कि हम अपने परिवार और समाज से समान रूप से प्रेम कर सकें. रवि ने सामाजिक कार्यों में अपना जो समय दिया है ,उससे परिवार में जो कम समय बचा, उसी समय की एक मीठी तस्वीर है. मैं रवि को याद करते हुए अचानक उन दो छोटे बच्चों में बदल गया हूँ जो अभी पिता को याद कर रहे हैं. जिनके दिल में आंसू लबालब भरे हैं. जिनकी रुलाई रुक नहीं रही.

September 10, 2018

कालू जी खत्री साकीन नेहरू नगर बाड़मेर



"बीपी रो की है? बे-तीन दिन सुई रह्यो. आराम करो. गरम होयोड़ी मशीन ठंडी होव्ते ही तेल फेंकणों अपने आप बंद करे. ऐ ईज है बीजो डॉक्टर होस्पिटल जाए खोटी होव्णों" - कालू जी खत्री, साकीन नेहरू नगर बाड़मेर.

पिताजी की पोस्टिंग जब रेलवे स्कूल में थी तब अमरी बाई जी भी वहीं पोस्टेड थी. कभी किसी स्कूल के काम से वे घर आई. उन्होंने मुझे देखकर पूछा- "माड़सा है? जा के अमरी बुआ आई" पिताजी आये और उन्होंने कहा- "आओ अमरी बाईजी" मैं अमरी बाई जी को स्कूल में देखता था लेकिन घर पर पहली बार देखा था. इसके बाद से हमारे पास उनके लिए उम्र भर का एक सम्बोधन आ गया, अमरी बुआ.

नेहरू नगर में स्टेडियम के पास नीलकंठ फैक्ट्री के नाम से एक कारखाना बना हुआ था. सालेचा परिवार के इस विशालकाय उपक्रम में बेंटोनाईट यानी मेट माने पीली चिकनी मिट्टी के ढेलों को पीसा जाता था. मोहल्ले की औरतें अपने बालों को चिकनी मिट्टी से धोने के लिए इसी कारखाने से मेट लाया करती थी. मेरी माँ ने भी कई बार मेरे बाल मेट से धोये थे. गर्मी के दिनों में चेहरे पर फुंसियाँ होते ही या सर में दाने पड़ने पर बच्चों को मेट के लेप से पोत कर बिठा दिया जाता. वानर बना हुआ बच्चा दूसरे बच्चों के उपहास का पात्र बनता लेकिन कुदरत का न्याय इतना समान था कि इस उपचार से कोई बच नहीं नहीं पाता था. एक दिन हर किसी को ये रूप धारण करना ही पड़ता था.

फैक्ट्री के सामने बायीं तरफ ढलान में अमरी बाई जी का घर था और दो गली ऊपर हमारा घर. आस पास छोटी बसावटें थीं. लगभग सौ के आस भील, इतने ही मेघवाल, लुहार घर थे और इनके बीच दो चार राजपूत, आठ दस जाट, दो एक कुम्हार परिवार रहते थे. सौ एक घर सिन्धी परिवारों के थे. जिसे वे नेहरू नगर न कहकर नेहरू नगर की सिन्धी कॉलोनी कहते थे. जिस तरह छद्म राष्ट्रवादी एक अविभक्त भारत की कल्पना करते हैं, उसके उलट नेहरू नगर वाले सिन्धी कॉलोनी को अपने राज्य में मिलाने का स्वप्न नहीं देखते थे. वे उसे सिन्धी कॉलोनी ही रहने देना चाहते थे. शायद वे नहीं चाहते थे कि आपस में घुलना मिलना हो. इसकी कई वजहें हो सकती थी लेकिन मुझे कभी समझ न आई. मुझे बस एक यही फर्क समझ आता था कि धुले हुए कपड़े सिंधियों के घरों के आगे और बाक़ी लोगों के घरों के पिछवाड़े में सूखते रहते थे.

खत्रियों का वास तो शहर में नरगासर के आस पास है लेकिन अमरी बाई जी का परिवार नेहरू नगर में कब और कैसे आकर बसा ये मुझे याद नहीं है. पहली बार उनके घर मैं खीचिये लेने गया था. रेगिस्तान के खाखरों के मुकाबले पाकिस्तानी पंजाब और सिंध के लोगों का खीचिया पापड़ मुझे काफी फीका और बेस्वाद लगता रहा था. मोठ और मूंग जैसी दालों से बनने वाले खाखरे पापड़ स्वाद में सदा बीस ही लगे. दादी के कठोंन्तरे में ऐसे सूखे पापड़ रखे रहते थे. मेरी याद में रहा है कि जब कभी गाँव जाना हुआ तब ही खाखरे देखने और सुनने को मिले. असमय लगने वाली भूख के लिए ये सर्वोत्तम भोजन है. खीचिया भी ऐसा ही है लेकिन ये चावल के आटे से बनाया जाता है. अमरी बाई जी के घर खीचिया बनाने का कुटीर उद्योग था. मांग और आपूर्ति में काफी फर्क था. कभी-कभी ऑर्डर देकर खीचिये रिजर्व करने होते थे. हमारे घर में खीचिये इसलिए मंगवाए जाते थे कि वे आगे किसी ने मंगवा रखे होते थे. इस तरह हम अमरी बाई जी के यहाँ बने खीचियों के छोटे कुरियर थे.

अमरी बाई जी का कद ऐसा था कि मोहन जी को हम जानते ही नहीं थे. मैंने उनको बहुत कम देखा. वे जब भी दिखे एक छड़ी के सहारे धीरे चलते हुए दिखे. उनका परिवार बड़ा हो गया था लेकिन काल असमय पंजे मारता रहा. मोहल्ले भर में अमरी बाई जी के दुःख भी बड़े कहे जाते रहे. बाद बरसों के उस परिवार में सबसे बड़े बचे कालू जी माने पुरुषोत्तमदास खत्री.
दरमियाना कद का सीधा तनकर चलता हुआ मुस्कुराता हुआ आदमी, यही उनकी पहचान थी. सर पर पीछे की ओर मुड़े बालों का सुघड़ घेरा इस पहचान को पक्का करता था. वे पैदल कम ही चलते थे. साढ़े तीन सौ सीसी की बाइक की सवारी करना उनको पसंद था. कभी-कभी मैंने उनको कार में भी देखा. इन दिनों कालू जी की उम्र क्या रही होगी मुझे ठीक नहीं मालूम मगर वे साठ बासठ के होंगे. इसलिए कि वे मेरे पिताजी से दस बारह साल छोटे और मुझसे इतने ही बड़े रहे होंगे. अमरी बुआ थी मगर कालू जी मुझसे बहुत बड़े थे इसलिए हमारे बीच कोई स्थायी सम्बोधन न बन सका. वे मुझे देखकर आँखों से मुस्कुराते थे. मैं उनको नमस्ते करके आगे बढ़ जाता था.

नेहरू नगर में जिन दिनों रेलवे ओवर ब्रिज न बना था तब फाटक की ढलान से उतरना हर तरह के अनुभव देता था. इसमें रोमांच था, आनंद था और जब गाड़ी ने अधिक हाइड्रोलिक ले रखा हो तब कठिनाई भी थी. ब्रेक तेज़ी से लगते थे और दुर्घटना का खतरा बढ़ जाता था. ठेकों से, ढाबों की दोपहर की महफ़िलों से या रेलवे पटरी के पास उगे बबूलों की छाया में हाइड्रोलिक लेकर आने वाली तमाम सवारियां रेल फाटक की ढलान में जीरो स्पीड में आ जाती थी. एक दोपहर ऐसी ही स्पीड में कालू जी उतर रहे थे. पटवार घर के पास मैंने अपनी बाइक धीरे की, उनके पास रुका. वे मेरे आशय को समझ गए और बाइक पर सवार हो गए. मैं घर तक आया तो बोले "ठीक है. आगे रैण दे.?" मैं उनको एक गली आगे घर तक पहुंचा आया. वे बाइक से उतरे और प्रबुद्ध गौतम की तरह तरह मुस्कुरा कर अपने घर की सीढी चढ़ गए.

कालू जी के जीवन में बहुत सारी चीज़ें थी. वे सब लगभग आसान थी या जीवन को आसान बनाये रखने का रास्ता बनती थीं. उनके बड़े बेटे हेमंत से अब मेरी गहरी मित्रता है तब केवल पहचान थी. हेमंत की शादी हो रही थी. खत्रियों में एक वैवाहिक परम्परा है कि शादी से पहले जनेऊ पहना हुआ लड़का घर से रूठ कर निकल जाता है. पिताजी उसको मनाकर घर लाते हैं. घर लौटने से पहले दूल्हा एक शर्त रखता है. उसे मानने पर वह घर लौट आता है. कालू जी हेमंत को मनाने गए. हेमंत ने कहा "हूँ कोनी हालों" कालू जी ने कहा- "चाईजे की? ओ कै" हेमंत ने कहा- "दारु पीणी छोडो" कालू जी ने कहा- "हऊआ इत्ती बात. छोड्यो हाल" हेमंत शादी करके आ गया. तीसरे दिन कालू जी शादी समारोह की थकान उतार रहे थे. हेमंत ने पूछा - "ऐ की है?" कालू जी ने कहा- "बीयर है दारु थोड़ो ईज है"

स्थायी और अधिक फलदायी रोज़गार के अभाव में और अनिश्चित कल के बावजूद कालू जी के चेहरे की मुस्कान को कोई चीज़ मिटा नहीं पाई. जब कठिनाई आई तो कहा. आई है तो बैठी रहेगी. अपने आप थककर चली जायेगी. हम इसके आने से जीना स्थगित नहीं कर सकते. चलो काम पर. काम किया. शाम को मूड बनाया. खाना खाया सो गए. घर में असामयिक निधन होते गये. कालू जी बिना घबराए. वैसे ही दीखते रहे. घरवाले शिकायतें करते कि मनमौजी आदमी है. जो करना अपने मन का करना. कालू जी इससे बेपरवाह रहते. अक्सर जवाब नहीं देते. घर में उनका स्वभाव कैसा था नहीं मालूम मगर उनको नए के प्रति आकर्षण केवल इतना था कि बाइक पावरफुल होनी चाहिए. वासु से कहते- "बढ़िया गाडी लईजे, म्हे हूँ ऐ छोटके को च्लाईजे" इन दिनों कोई डेढ़ एक लाख कीमत वाली बाइक पर दीखते थे. कुल चार चीज़ें दिख पाती थी. एक तगड़ी बाइक दूजी ऊँची मूंछें, फिर स्थिर मुस्कान और शांत चेहरा.

कालू जी साल भर पहले तक दल्लू जी की रेलवे स्टेशन के सामने वाली नई दुकान पर नियमित जाया करते. विकास को देखते ही कहते- "थने ठा है? आज म्हारो बर्थडे है" विकास पूछता - "तो" कालू जी कहते -"तो थने ठा है" विकास उनकी पसंद की मावे की बर्फी के दो पीस देता. कालू जी मावे का स्वाद लेकर तृप्त हो जाते. वे विकास से कहते- "म्हनें दाळ रो सीरो बढ़िया लागे. सौ डेढ़ सौ ग्राम खाऊं तो बीपी बढे री. पछे तीन दिन सुउणों पड़े" विकास कहता- "पछे खावो ईईज क्यों?" कालू जी विकास को देखकर मुस्कुराते. "बीपी रे कारण दाळ रो सीरो छोडों पो?"

कालू जी के बच्चे धंधे लग गये. बढ़िया काम करने लगे. व्यवहार अच्छा था तो हेमंत की पान की दूकान का कारोबार जम निकला. साइड में कुछ छोटे मोटे जमीन के काम किये. धीरे से घर बड़े मकान और कार तक आ गया. हमारे यहाँ कहते हैं कि खत्रियों को कत्थे और कत्थई रंग के धंधों का वरदान कुलदेवी ने दिया हुआ है. लगभग खत्री पान और प्रिंटिंग का कारोबार करते हैं. कुछ एक का व्यापार विदेशों तक पसर गया है. वे बड़ी कोठियों वाले ज़मीदार लोग हो गए हैं. कुछ एक अब भी गरीबी की निचली रेखा के नीचे खींची हुई रेखा के पास जीवन बिता रहे हैं. इधर कालू जी के घर के आगे बड़े फ्रीज़ जमा होने लगे. स्टेडियम जाते समय ख़राब डीप फ्रीजर उनपर गिरे पड़े छोटे फ्रीज़ दिखने लगे. ये काम उन्होंने कब शुरू किया होगा मुझे याद नहीं लेकिन इतना मालूम हो गया था कि वासु इस काम को करते हैं. पापा उसका साथ देते हैं. बढ़िया काम है. तीन चार महीने के सीजन में माल छाप लेते हैं. बढ़िया कमाई देने वाले भी शराब के ठेके वाले हैं. जिनके यहाँ बीयर ठंडी करने को डीप फ्रीज़र हमेशा ओके चाहिए. वे मेहनत मजदूरी चुकाने में भी हील हुज्जत नहीं करते.

ज़िन्दगी आसानी से बिताने के लिए बड़ा हुनर चाहिए होता है. ये हुनर है गाँठ का भार कम रखो. कालू जी ने कभी गाँठ बाँधी ही नहीं. ख़राब दिन को भुला दिया और अच्छे दिन की जी हजुरी नहीं की. अभी कुछ समय से तबियत ख़राब थी. डॉक्टर के पास जाने के नाम पर महाआलस उन पर सवार हो जाता. बच्चे कहते- "पापा हालो" वे कहते- "हालों घंटे भर बैठ" बच्चों का अपना काम उनकी अपनी जिद. महींने भर पहले अधिक तबियत खराब हुई तो वासु ले गया. दो चार दिन बाद लौटने पर मालूम हुआ कि अब पापा ओके हैं. कुशल क्षेम पूछने वालों को कहने लगे- "है की डॉक्टरों गोढ़ी? कैण सारु गोता खावों. मशीन रुकी तो इयों रे काके हूँ कोनी बंधे. उवेरी बंध्योड़ी ओ ईज जोणे" प्रियजन कहते- "तो ई ध्योन तो राखो" कालू जी मुस्कुराते "माथाफोड़ी नी करणी. छोकरियां आपरे घरे राज़ी, छोरा ठीक धंधे लाग्या"

कल सुबह तीन बजे के आस पास कालू जी को एक उल्टी हुई. डॉक्टरों ने कहा कि रेस्पिरेटरी सिस्टम चौक हो गया. इस कारण साँस नहीं ले पाए. दोपहर से शाम तक कालू जी के घर के बाहर उनके प्रियजन जमे रहे. मुझे लगता रहा कि वे अभी आयेंगे और कहेंगे "म्हे कयो हतो नीं, कईं ठा नी पड़े. आपां आयल फेंकण री चिंता करता ऐ तो एयर पाईप चौक होयो."

हेमंत को मैंने कुछ एक बार चिंता की सलवटें लिए देखा लेकिन कल वह पिता की स्मृति से भीगा हुआ खड़ा था. उसके हृदय में कोई रुलाई थी जो फूट न सकी. मैंने कुछ महीने पहले एक कहानी कही थी. हमारे बचपन की कहानी. उसमें मेरा दोस्त कहता है कि काका भले ही पीटते मारते डांटते हों पर होने चाहिए. मेरे जीवन से तो बहुत पहले मगर कल वह डांट हेमंत और वासु के जीवन से चली गयी.

कालू जी के लिए रेस्ट इन पीस और उनकी आत्मा को शान्ति मिले लिखने की ज़रूरत नहीं है कि वे जहाँ होंगे शांति उनके चेहरे से झलक रही होगी. वे परमानन्द के साथ जिस तरह जीए वैसे ही मस्तमौला आगे भी रहेंगे.

"हमें की? आगे जोवो, काम करो. हालो"

September 3, 2018

आदमी से बेहतर


के सी मेरी फेसबुक प्रोफ़ाइल है। ये बस इस काम आती है कि वहां से सुंदर चेहरे देख पाता हूँ। वहीं से मन के अपशिष्टों की कथाएँ सुनाई देती हैं। वहीं से देख पाता हूँ कि राष्ट्रवाद की जय करने वाले असल में राष्ट्रवादी होने से पहले जातिवादी हैं।

मैं अपने फेसबुक पेज पर मैं अपना मन लिखता हूँ मगर कभी-कभी दूसरों का मन देखने को चाहूँ तो अपनी प्रोफाइल पर चला जाता हूँ। आज श्री कृष्ण जन्माष्टमी है, ऐसा मुझे व्हाट्स एप पर मिले सन्देशों से पता चला। मुझे कृष्ण भक्त कवियों की याद आई। मैंने कुम्भनदास जी को याद करते हए एकपोस्ट लिख दी। ये मन की बात थी।

इस पोस्ट के साथ लगी तस्वीर में नन्हा बिलौटा मेरी ओर देख रहा है। हमारा रिश्ता ये है कि उसे समझ आया है कि वह मेरे पास रहेगा तो उसे खाना मिलेगा। वह हर शाम आता है। मैं अपना प्याला भरे बैठा होता हूँ तो वह प्याले को सूंघता है। उसे सूंघकर बुरा मुंह नहीं बनाता। मुझे उसकी इस सहृदयता पर प्रेम आता है। मैं उसे दूध का कटोरा भर देता हूँ।

लालची और स्वार्थी मनुष्यों से हटकर वह दूध स्वीकार लेने के बाद भी मेरे पास बैठा रहता है। वह हरदम चौकन्ना होने के हाव भाव लिए होता है। मैं उसे कहता हूँ- 'हर वक़्त अटेंशन में मत रहा कर इससे दिल पर बोझ बढ़ता है' वह मेरी बात सुनता है और अटेंशन से बाहर आ जाता है। एक आश्वस्ति से भर उठता है। ऐसा मुझे लगता है।

उसके लिये मैं एक खाना देने वाला जीव हूँ जिस पर वह भरोसा करता है। मेरे लिए वह इस दुनिया का एक जीव है जिसे खाना खाने के बाद भी प्रेम करना याद रहता है। वह उन दोस्तों जैसा नहीं है जिन्होंने गहरे प्रणय निवेदन के पश्चात किनारा कर लिया।

इस तस्वीर में हम प्रूफ रिडिंग नहीं कर रहे हैं। मैं उसे बता रहा हूँ कि मेरी एक कहानी बिल्लियां में बिलौटा निर्दयी है कि सहवास की चाहना में बिल्ली के बच्चों को मार डालता है। हालांकि फिर भी वह आदमी से अच्छा है।

बिलौटा इस किताब में इसलिए झांक रहा है कि उसे लगता है यहां भी कुछ खाने लायक है।


September 2, 2018

बहुत दूर चले जाना।

विरह के प्रेम में जो सुख है वह बाहों में बसे रहने से अधिक मीठा है। ये मीठी टीस दूर होने पर खिलती है। दूर होने पर बदन में शिथिलता आ जाती है। हृदय एक भरे हुए चड़स की तरह आहिस्ता हिलता है। हाथों की अंगुलियां प्रेम नाम लिखने में स्वयं को असमर्थ पाती है। आंखें सूने आकाश और धूसर धरती की रेख को देखती हुई सो जाती हैं।

इसी तरह आधी नींद और जाग में उसके बदन से उठते मादक वर्तुल अचानक हम पर गिर पड़ते हैं तो अधीर और व्याकुल होकर खालीपन के प्रेम तरल में डूब जाते हैं। मन उसके पास जाना चाहता है कि याद आता है असल चाहना तो दूर रहने से ही है। ये गहराई विरह की कुदाल से बनी है। ये धूल का ऊंचा वर्तुल बिछोह से बना है।

इसलिए दूर रहना ठीक है।

कृष्ण भक्त कवियों में कुम्भनदास कृष्ण प्रेम में विरह के कवि थे। एक बार बादशाह अकबर के बुलावे पर चले गए तो उम्र भर पछताते रहे। अकबर से उन्होंने कहा "संतन को कहाँ सीकरी सों काम, आवत जावत पहनिया टूटी बिसरी गयो हरिनाम" वे कुम्भनदास गोकुल के आस पास ही रहते थे लेकिन कृष्ण प्रेम में वहां कम ही जाते थे। उनको कृष्ण के यहां लिए चलने को आतुर लोग अक्सर निराश हो जाते कि कृष्णप्रेम में विरह का कवि कैसे अपनी कथनी और करनी से फिर जाता।

केते दिन जु गए बिनु देखैं।
तरुन किसोर रसिक नँदनंदन, कछुक उठति मुख रेखैं।।
स्याम सुँदर सँग मिलि खेलन की आवति हिये अपेखैं।
‘कुंभनदास’ लाल गिरिधर बिनु जीवन जनम अलेखैं।।

ओ कान्हा तुमको देखे बिना कितने दिन बीत गए हैं। तरुण किशोर तुम रस प्रिय, नंद के नंदन, तुम्हारा दर्शन दुर्लभ हो गया है। सलोने श्याम के साथ मिलकर खेलने के स्मृति हृदय में पैठ जाती है। तुम्हारे बिना इस कुम्भन का जीवन कुछ कहने जैसा नहीं है।

विरह के काव्य में मिलने की आशा की कविता अनगिनत कवियों/कवयित्रियों ने कही है किन्तु ये प्यारा कवि उस चाहना से हटकर है। इसी कवि की तरह मुझे बिछोह की कहानियां लिखने में सुख है। लेकिन जब-जब मैं आस-पास होता हूँ कहानियां कहने का मन मर जाता है।


सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.