October 22, 2018

उसके होने का भ्रम रहे



किसी को जानो तो 
बस इतना ही जानना 
कि कोई और भी दिखे तो उसके होने का भ्रम होता रहे।

उस गांव में दूर तक खेत फैले थे। उनके बीच कुछ रास्ते थे। कुछ सड़कें थीं। कुछ ऊंची इमारतें थीं। मौसम बिछड़ जाने का था। मौसम ने फूलों वाली प्रिंट के हल्के कुर्ते पर पतला स्वेटर डाल रखा था।


मैं एक ही ख़याल से भरा हुआ मौसम की हथेली में अपनी हथेली रखे हुए चलता रहा। हमारे पास रास्ते पर कितनी दूर जाना है? ये सवाल नहीं था। हमारे पास सवाल था कि अब कितना समय बचा है। इस बचे समय में जितनी दूर चला जा सके, चलो।

अचानक नहीं वरन धीरे-धीरे समय समाप्त हुआ। जैसे अजगर की कुंडली में फंसे जीव का दिल धड़कना बन्द करता है।

इन्हीं दिनों की तन्हाई में व्हाट्स एप के कॉन्टेक्ट्स देखने लगा। एक गोरा दिखा। अंगुली ने उसकी डीपी को छुआ। बड़ी होकर भी तस्वीर एक अजाने गोरे की ही रही। मैं शिथिल हतप्रभ सोचने लगा कि मैं कब इस आदमी से मिला। क्योंकर इसका नम्बर सेव किया।

फिर याद आया कि उसने अपना नम्बर बदल लिया है।
आज सुबह इंस्टा से कॉन्टेक्ट्स सिंक्रोनाइज किये तो एक गोरी दिखी। इस बार सोचना न पड़ा। मैं मुस्कुरा सकता था कि ये उसका दूसरा नम्बर होगा जो उसने छोड़ दिया होगा।

उस गोरी के इंस्टा की एक तस्वीर पर लिखा- "ये सुंदर है" फिर लगा कि उसे क्या समझ आएगा। इसलिए मिटा दिया। उन्हीं तस्वीरों के बीच एक कसाई की तस्वीर दिखी। मुझे याद आया कि एक रोज़ मैं लिख रहा था "अपनी रूह की खाल उतरवाने के लिए मैंने कितनी जगहों की यात्रा की, कितने ही कसाइयों से अर्ज़ की मगर कोई न माना। मुझे क्या पता था कि मैं मोहब्बत में पड़ जाऊं तो तुम तुरन्त मेरा ये काम कर दोगे"

तुमको पता है केसी? एक बहुत पुराने हादसे की थकान कभी छीजती नहीं। वह हादसा जब भी याद आता है, हम फिर से उसी थकान से भर जाते हैं।

कल अपराजिता पर जो नीले फूल खिले थे, वे आज बन्द पड़े हैं। जाने क्या बात है।

October 21, 2018

हर कोने तक रोशनी

सड़क किनारे के बुझे लैम्पपोस्ट पर नज़र गयी तो लगा कि अभी वो सो गया होगा। जाने कितने ही दिनों की थकान उसे जगाए हुए है। अगला लैंपपोस्ट देखते ही ख़याल आया कि जाग ही रहा होगा कि जब ज़िन्दगी में रिश्तों के धागे ज़रा उलझे हों तो वे फंदे हो जाते हैं। वे सुलझ जाएं तो सुलझाने में जली अंगुलियां भूलने नहीं देती कि ऐसा था।

फिर दूर तक लैम्पपोस्ट नहीं थे। इस खालीपन से सिहरकर अंगुलियां आपस में कस गईं। ऐसा तो नहीं न कि उसके होने का केवल भ्रम था। वह नहीं है। मौसम से अक्टूबर की शीतलता गुम हो जाती है। हवा की मुसलसल छुअन के बाद भी बेचैनी बढ़ती जाती है।


अचानक चाहता हूँ कि रोशनी की कतारें जगमगा उठें। सड़क पर दूर तक रोशनी फैली हो और बीते दिनों की सब तस्वीरें, बातें और लिखावट सामने आ खड़ी हों। सन्नाटा कुछ नहीं बोलता मगर सन्न सन्न की आवाज़ का ओसिलेटर ऑन हो जाता है। अनवरत।

रात स्याह स्याह बीत जाती है।

सुबह कमरे की सब खिड़कियां खोलकर बैठे होने पर रोशनी महरम बन जाती है। हर कोने तक रोशनी। बहुत सारे रंग खिलने लगते हैं। उतने रंग जो पैरहन में बसे हुए थे। अचानक सोचता हूँ हमारी कितनी छोटी सी चाहना होती है मगर उसके उस पार अकेलेपन का भयावह विस्तार होता है। इस पार अपराजिता पर नीले फूल खिल आते हैं। बिल्कुल लिखने वाली नीली स्याही जैसे।

October 20, 2018

अगर मैं यहां नहीं हूँ तो



सायबान के नीचे खड़ी गाड़ी में बैठा हुआ था। गाड़ी की चाबी अंगुलियों के बीच उलझी थी। जैसे कहीं जाना न था। या मैं जो इस गाड़ी में बैठा था असल में यहां न होकर कहीं और जा चुका था।

जब मैं लौटकर आया तो देखा कि मेरी कोहनियां स्टीरिंग का सहारा लिए थी। मेरी आंखें बन्द थी। मैंने एक सांस ली। ये उस माहौल की ख़ुशबू का पता करना था, जहां से मैं लौटा था। धीरे से आँखे खोलते हुए मैंने सुना कि उसने कहा- "तुम जो चाहो, वही"

मुझे वो रास्ता याद है। ऑफिस से घर आते समय गाड़ी अपने आप चलती है। वह सारे मोड़, स्पीडब्रेकर और रास्ते की रुकावटों को पहचानती है। मैं केवल गाड़ी में होता हूँ। अक्सर नहीं भी होता। कल जब हैंडब्रेक लगाया तो समझ आया कि घर आ चुका है। दरवाज़ा खोलने से पहले फिर उसी तरह गाड़ी में बैठा रहा, जैसे सायबान के नीचे खड़ी गाड़ी में बैठा था।


हवा में थोड़ी ठंडक है। शॉवर को देखते हुए हाथ को प्लग की ओर बढ़ा देता हूँ।

रात का कौनसा पहर है? क्या कोई सोचता होगा कि मैं इस समय क्यों नहा रहा हूँ। इधर उधर रखी छोटी शीशियों से सुगंधित तरल हथेली में लिए हुए भीगा खड़ा होता हूँ। पानी मद्धम बहता रहता है। कोई ख़ुशबू फैल रही होती है।

मैं एक लम्बी सांस लेकर कहता हूँ। शुक्रिया।

हल्की सिहरन, कंपकपी और थोड़ी तेज़ी से बिस्तर में घुस जाता हूँ। हथेलियां ख़ुशबू से भरी है। एसी की ठंडक बाहर वाली ठंडक से अलग है। पतली रजाई में कभी अचानक तेज़ हो जाने वाली सांस से चौंकता हूँ।

मैं कहाँ हूँ? सचमुच हर समय मैं कहाँ होता हूँ। अगर मैं यहां नहीं हूँ तो तो जो यहां छूट जाता है उस आदमी को क्या चीज़ बचाये हुए है। ये मेरे बिना कैसे जी रहा है।

October 18, 2018

मगर मुझे मेरा लगता नहीं



एक शाम उसने मेरा कुर्ता पहन लिया। आनंद में, छेड़ के लिए या शायद प्रेम में आकंठ डूब जाने पर उसे कुर्ता पहनने की सूझी होगी। हो सकता है, उसने ये सब सोचा ही न हो। बेसबब उसकी अंगुलियों ने छूकर देखा। उसकी बाहों ने पहन लिया। उसके सीने पर जब लिनेन की छुअन आई होगी तो उसने क्षण भर आँखें बंद कर सोचा होगा ये मैं हूँ या वो मैं हो गयी हूँ।

मन हो तो ही छुअन अच्छी लगती है कपड़े हों कि वो ख़ुद हो।

मेरे साथ कभी ऐसा न हुआ कि मैं अपने लिए जो कपड़े लाया, वे मुझे अपने न लगे हों। लेकिन पिछले बरस एक नीला आसमानी चेक वाला कमीज खरीदा था। उसे पहनते ही लगा कि ये मेरा नहीं है। ये किसी और के लिए बना है। मैंने ख़ुद को देखा तो पाया कि मैं कोई और हूँ कमीज कोई और है। उस कमीज़ में कुछ तस्वीरें ली। उन तसवीरों को मैं देखता और ध्यान हटा लेता। लेकिन फिर वापस देखता। इस तरह हर बार मुझे लगता कि ये मेरी तस्वीर नहीं है। इसे फ़ोटोशोप किया गया है। ये चेहरा किसी और व्यक्ति का है और कमीज़ किसी और का।


एक रोज़ उसने कहा कि आप हाफ़ स्लीव्ज क्यों नहीं पहनते?

मैंने बहुत पीछे के सालों तक सोचा। क्या मैं कभी आधी बाहों वाले कमीज़ पहनता था? मेरी याद में ऐसा कोई कमीज़ न आया। मैं लंबी बाहों वाले कमीज़ क्यों पहनता हूँ। जबकि हर बार बाहें फ़ोल्ड कर लेता हूँ। एक बार बिना किसी योजना के भद्र लोगों के बीच बैठ गए थे। टेबलों पर शीशे के बर्तन सजे थे। उनके बीच अनेक ऐसी चीज़ें थी, जिनका खाने से सम्बंध तो जान पड़ता था लेकिन वे सजावटी अधिक थी। उसने मुझे इशारा किया। बहुत बारीक इशारे ही उस संसार की सभ्यता थी। मुझे बहुत देर से समझ आया कि वह इशारा था, बाहों के फ़ोल्ड खोल लो।

हम बाहर आए तो उसने मेरे कमीज की बाहों को वापस वैसा ही कर दिया। वह अपने हाथों से कफ़ को इस तरह छू रही थी जैसे अपने ही बच्चे को डांट देने के बाद हम उसे प्रेम करने लगते हैं।

वह कमीज़ मुझे मेरा ही लगता था। उस कमीज़ को मैंने बहुत सालों तक पहना। मुझे उस कमीज़ के साथ अक्सर याद आता रहा कि एक सलेटी रंग की जींस होनी चाहिए। एक मॉल में जींस दिखी, जो सलेटी नहीं थी लेकिन उसमें स्याह और सलेटी के बीच की झाईं महक रही थी। वह हम ले आए। मैं उस जींस को पहनता रहा। अब वह बहुत फेड हो चुकी है। वह शायद अधिक समय और न चलेगी। उस जींस को जब भी पहना मुझे वह सफ़ेद कमीज़ याद आता रहा।

मैं कई बार सोचता हूँ कि आधा दर्जन सफ़ेद कुर्ते जैसे कमीज़ सिलवा लूँ। जाने क्यों?

रिश्ते नहीं चलते तब लोग कहने लगते हैं, निभ जाएगा। निभाओ। मैं सोचता हूँ कि कभी कुछ कपड़े भी हमें हमारे अपने नहीं लगते और लोग रिश्तों के बारे में कहते हैं थोड़ा सब्र करो, कोशिश करो। मुझे लगता है कि ऐसा करने से हो जाएगा। लेकिन ये उन लोगों के लिए वैसा ही होता होगा जैसा मुझे वो नीला-आसामनी चैक वाला कमीज़ पहनने से होता है। मेरा अपना है मगर मुझे मेरा लगता नहीं।

ये वाली तस्वीर एक साल पुरानी होने को है। इसे देखता हूँ तो सोचता हूँ कि मैं हाफ स्लीव्ज वाले कमीज़ क्यों खरीद लाया था?


October 16, 2018

वो भी जाने कहाँ?

पहले दिल इज़राइल था। गलती तो गलती, न की हुई गलती को भी माफ नहीं करता था। फिर थोड़ा यूरोप हुआ, थोड़ा जर्मनी। अपने घावों को देखता और दूजों के दुख समझ कर दिल में जगह देने लगा। इसके बाद दिल इंडिया हो गया। जो आ गया उसी को अपना लिया। अपने आप को पुराने और असली नागरिक कहने वाले हड़तालें करने लगे मगर राम राज्य आए बिना दिल का राम राज्य चलता रहा। कुछ मालूम न था कि दिल में कौन रहता है। दिल ने अपने संविधान में लिखा "सब आधार निरधार है, चार दिन की जिंदगी है सबकी कटने दो"

एक रोज़ बहुत दूर आकाशगंगा के पार व्योम मंडलों के बेड़े से कोई आया उसने कहा "दूरियाँ भूगोल की बात है। दिल की बात नहीं है" दिल रेगिस्तान ने कहा "तुम सर्द मौसम में आते तो भूल जाते कि कहाँ आए हो। मैं तुमको यहीं बाहों में छुपाकर रख लेता। उसने पूछा- "क्या सर्द मौसम में आना पक्का कर लूँ?" दिल होठों में बुझा सिगार दबाये क्यूबा के एक नौजवान डॉक्टर की मोटरसाइकिल पर सवार हो गया। जैसे वह उसे लेने जाता हो। इस वक़्त मैं कहा हूँ और वो भी जाने कहाँ? कुछ मालूम नहीं। वो जिसने कहा था आपके लिए लिखने को दिल हो आया है।


अब दिल छोटे देशों और दुनियाओं से बड़ी चीज़ है।


October 15, 2018

तुम अभी थोड़ी देर पहले यहीं थे



हरे, पथरीले पहाड़ी या मैदानी रास्तों पर चलते हुए मैं उन रास्तों को पहचान लेता हूँ, जहां से तुम गुज़रे थे।

पदचिन्ह ही अकेली चीज़ नहीं होती जिससे किसी के गुज़रने का पता मिलता हो। ख़ुशबू को भी हवा अक्सर उड़ा ले जाती है। पेड़ों के तनों पर खुरचे गए नाम और निशान भी बेढ़ब हो जाते हैं। इन सब के बिना, बिना कुछ देखे मुझे अचानक लगता है कि तुम यहां से गुज़रे थे। तुम पूछोगे कैसे तो मैं उलझन में घिर जाऊंगा कि क्या कहूँ कैसे मालूम होता है? मगर होता है।

कभी ये भी लगता है कि तुम अभी थोड़ी देर पहले यहीं थे। मैं ठहरकर तुम्हारे होने को महसूस करने लगता हूँ।



October 13, 2018

चिड़िया - इतना काफी है।

माँ का अचानक ध्यान गया। "भा भा। कित्ता फूटरा है। ओंरे मो तो बायरो आण री जिग्या ई है।" माँ मिट्टी से बने चिड़ियाघर देख रही थी। जब लोहे का जाल बनवाया तब यही सोचा था कि इस पर फूलों और छाया वाली लताएँ पसर जाएंगी। उनकी छांव में परिंदे बैठ सकेंगे। हम उनके लिए घोंसले बनाने की जगह भी बना देंगे।

मैंने प्लाई के टुकड़ों से चिड़ियाघर बनाने का सोचा था। एक दोपहर ख़याल आया कि मिट्टी के चिड़ियाघर अच्छे रहेंगे। सड़क किनारे बैठे कुम्भकार को कुछ आमदनी होगी। जिसने मिट्टी सानी, गूंथी और चाक पर चिड़ियाघर बनाया, उस तक भी एक दो रुपया पहुंचेगा। सम्भव है कि वह सोच ले कि कुम्भकारी का हुनर बचाये रखा जाए। इसलिए मैं मिट्टी के चिड़ियाघर ले आया।

आज इन चिड़ियाघरों में कलरव है।

जिस दिन इन चिड़ियाघरों को टांगा था उस दिन आभा ने मानु को इनकी तस्वीर भेजी तो उसने पूछा- "मम्मा क्या इनमें चिड़ियां घोंसला बनाएंगी?" आभा ने कहा- "ये फ्लैट्स फर्स्ट कम फर्स्ट सर्व बेसिस पर अलोटेड हैं। रहना है तो आओ, नहीं रहना तो दाना चुगो और मौज करो"

माँ ने इन घोंसलों को गहरे मन से देखा। "तें तो हैंग पुण् लियो रो" मैंने कहा- "माँ पाप-पुण्य इत्तो ही है के कोई कोम कर मन राज़ी होवे तो पुण, पण जे चिंता होवे, डर लागे तो पाप। है जको इत ही है। आगे कण देख्यो। चिड़कलियों हैं रामजी री। बैठी बापड़ी"

जितना बड़ा लोहे का जाल बना है उसके एक कोने का दृश्य है। कुछ महीनों बाद हमारे घर में हम सौ एक सदस्य हो जाएंगे। पांच पांडव तो दुनिया के पांच श्रेष्ठ हुनर लेकर आये थे। हम तो कौरव हैं। साधारण इच्छाओं से भरे। मामूली काम करते। अपने बच्चों के लिए जीते हुए। उनकी ही चिंता करते हुए। इसके बीच महाज्ञानी होने से अलग कुछ छोटे से काम कर लें कि अपने आस पास चींटी, चिड़िया, चूहे को जीने दें। हमारे लिए इतना काफी है।

किसी और के लिए कुछ कीजिये। आपका मन तो मन चेहरा भी सुंदर दिखने लगेगा।








October 12, 2018

कोई यायावर अचानक पास आ बैठा



दो टहनियां हवा के साथ आपस में एक दूजे से लिपटी।
चर्र की हल्की आवाज़ आई। जैसे सावन के मौसम में भीगी चारपाई पर कोई आकर बैठ गया।
जैसे किसी ने आधी रात चुपके से उढके हुए दरवाज़े को खोला।
"क्या सचमुच अब किसी के दबे पांव चलने की आवाज़ आएगी?"
मेरे इतना सोचने भर से अंधेरे में रूमान झरने लगा। सहसा कंधे पर छुअन जगी।
आह! ये पेड़ से झड़ी दो सूखी पत्तियां थीं।
जितना मेरा कासा सूखा था, जितनी मेरे मुंह में प्यास थी, जितना किसी का होना, न होने में बदल गया था।
ठीक वैसा था सूखी पत्तियों का स्पर्श।
डब-डब की चार-छह आवाज़ों से मैंने कासे में गीलापन उड़ेल दिया।
जैसे कोई यायावर अचानक पास आ बैठा है और मैं उसके चोर दांत देख रहा हूँ।

October 11, 2018

चूरमें रा गटका

ननिहाल में देग चढ़े, कड़ाह चढ़े। सारणों के घर डोगीयाल, बिनियाल, डूडी, लेगा, जाखड़ सब आये। राजपूत, रेबारी, कुम्हार, मेघवाल, ढाढ़ी और नाई भी आये। सबने चाय की बटकी खाली की। चक्की नुक्ती खाई। बुझी हुई बीड़ी को देखा। गीली मूंछों को पोंछा। अंगूछे को बगल दबाया। मामा के घर से मुझे मौसा ने साफा बंधाया। मैंने भरपेट साग-रोटी खाई और नानी को कहा- "नानी तू इस चरके में ही ज़्यादा मीठी लगती हो"

उस लोक में नानी के मेंढे-भेड़ें बराबर मिल गए होंगे वरना अब तक वह बगल में थैली दबाए, पगरखी पहने स्वर्ग लोक से रूठकर आ चुकी होती। यहां लौटते ही गालियों के धमके उठ रहे होते "आक दूँ ओंरे, डीकरा काले-पिरुं सैढा भोंगे हा। आज चूरमें रा गटका करे हैं।"

एक वही तो दोस्त थी। जिसके सामने मैं संजीदा नहीं रहता था। मैं ऑफिस से घर लौटते ही आवाज़ देता। "माँ जीवता हो?" नानी कहती "लैर है" इस पर मैं कहता- "जीवता हो तो झोली कराओ"

सुबह शाम हम दोनों खुले आंगन में बैठे बटकी भरके चाय पीते। सब दुःख चिंताएं मिट जाती थी।
मेरे पिताजी मृत्युभोज के कड़े विरोधी थे। उन्होने हमेशा कहा कि ये एक कुरीति है। गरीब की दुश्मन बीमारी है। इस बीमारी के लगने पर निजात मुश्किल काम हो जाती है। वे अपने घर परिवार में भी इसका विरोध करते रहे मगर उन्होने विरोध को कोरा आदर्शवादी नहीं रखा। वे भाइयों के बीच बैठे रहे। आप लोग केएचआरसीएच करना चाहते हैं और मेरी बात नहीं मानते तो कोई बात नहीं। मैं अपने यहीं हूँ और दाल रोटी ज़रूर खाऊँगा। आपकी मिठाई मुझे नहीं चाहिए। 

जब पिताजी का देहावसान हुआ तो मेरे ताया जी ने साफ कहा कि मेरे भाई ने मृत्युभोज न किया और न करवाना चाहा इसलिए ये सब इस घर में नहीं होगा। हम बच्चों को उनके निर्णय से आसानी हुई। हम भी नहीं चाहते थे कि ये कुरीति हमारे द्वारा पोषित हो। दुख की घड़ी में हम अपने कड़े निर्णयों को ढील दे देते हैं। हमको लगता है कि जीवन हमारे बस की बात नहीं है तो बाकी बातों के लिए क्या मुंह फेरा जाए। लेकिन हमने उस घड़ी में भी पिताजी के बताए रास्ते को नहीं छोड़ा।   

नानी के यहाँ यही सब होना था। इसकी आयोजक भी हमारी माएं ही थी। मैंने चाचा मौसा को कहा कि ये सब मत करिए। उन्होने कहा तुम्हारी माएं ही कर रही है। हमने तो मना कर दिया है। मैं माँ को इस उम्र में कोई सीख नहीं देना चाहता हूँ। इसलिए मैंने कहा कि मैं इससे अलग हूँ। जो करके खुश हो रहा है वह मेरे हिसाब से समझदार नहीं है। 

मैं वहीं था। खाने के समय मैंने मना कर दिया कि मैं ये मीठा नहीं खा रहा। उन्होने पूछा क्या व्रत उपवास है? मैं उनको झूठ कह सकता था कि हाँ ऐसा ही है लेकिन मैंने उनसे साफ कहा कि मैं मृत्युभोज नहीं करता। अपने घर की रोटी ज़रूर खा लेता हूँ। 

लोग धोती तेवटा झाड़कर उठते गए। औरतें थालियाँ माँजती रही। चक्की नुकती की खुशबू से बंधे कुछ कुत्ते खेत में बैठे रहे। वे कब तक बैठे रहते। शाम होते ही कुत्ते-कोवे सब अपने मार्ग चल दिये। 

नानी ये सोचा मिठाई की खुशबू उड़ जाएगी। कल तो चाय पत्ती और लालमिर्च-नमक की घर में ज़रूरत रहेगी। उस लोक में बैठी नानी ने अपनी बुगची देखी। बुगची में जाने क्या था क्या नहीं। वे बहुत देर तक देखती रही। 

October 6, 2018

ख़ैर हो।

मैं सब मित्रों को कहता हूँ 
इनबॉक्स में लपर-चपर मत करो। 
लेकिन समझता कौन है?

मैंने मित्रों को फेसबुक मैसेंजर में काफी हताश किया है लेकिन उनको इस बात के लिए प्रोत्साहित किया कि वाल पर बहादुरी का प्रदर्शन करें। इसका काफी अच्छा परिणाम मिला। दो तीन बरस से अनिश्चितकाल के लिए सुकून है। अब व्हाट्स एप पर आचार संहिता लागू करनी पड़ेगी।

मैं दस साल से फेसबुक पर होने के बावजूद फेसबुक को कम जानता हूँ। इसलिए आज ही मालूम हुआ कि चेतन भगत का फेसबुक पेज भी है। इसे लाखों लोगों ने लाइक किया है। इस पेज की अधिकतर पोस्ट्स पर सौ डेढ़ सौ और कुछ पर तीन चार सौ लाइक है। वे पोस्ट जिन पर हज़ार से अधिक लाइक हैं उनको अवश्य ही प्रमोट किया गया होगा।

फेसबुक की आय का पहले नम्बर का बड़ा स्रोत अभी अज्ञात है। दूजे नम्बर पर विज्ञापन है और तीसरे नम्बर लाइक और कमेंट का प्रमोशन है।

क्या लाखों लोग चेतन भगत का पेज लाइक करके सो गए? केवल दो तीन सौ जागते रहे। ये बात जचती नहीं है। इसका अर्थ है कि लाइक पैड हैं या फेसबुक पेज की विड्थ को खत्म करके रखता है। विड्थ वाला मामला फेसबुक के बस की बात है सिर्फ वायरल होने के सिवा।

मैंने कभी पेज को सीरियसली नहीं लिया। आज चेतन भगत के एक माफीनामे पर पांच घण्टे बाद हज़ार एक रिएक्शन आये हैं। इतने गंभीर और साथ ही लोकचाव के विषय पर इतना कम रिएक्शन अजीब लग रहा है। हो सकता है कि आहिस्ता से ये वायरल हो जाये।

मैं तो आज ही सोच रहा था कि मेरे पेज का क्या उपयोग है?

अब समझ आया है कि अपनी भूलें स्वीकार करने और घुटनों के बल बैठकर माफ़ी मांगने के लिए पेज बहुत उपयोगी माध्यम है। इस पर बने रहना चाहिए। पब्लिक से मन की बात कर सकें और बाकी घर में जो जूतम पैजार होनी है, वह तो होगी ही। उसे किन्हीं अपरिहार्य कारणों से नहीं टाला जा सकता।

निजी जीवन एक लकीर ही है। इसके इस पार और उस पार के बीच बहुत कम दूरी है। 

ख़ैर हो। शुभरात्रि। ❤

October 3, 2018

उपेक्षित और प्रताड़ित - दुख

जिंदगी यूं भी झाड़ू चीज़ है। इससे आप किसी के दुखों को बुहार सकते हैं। इसे आप तिनका-तिनका करके गंवा भी सकते हैं। एक रोज़ आपके हाथ में टुंडीया रह जाएगा। जिसे या तो 'मोरा' करके जला दिया जाएगा या फिर कूड़े में दफन कर दिया जाएगा।

दो बरस पहले नानी लू लगा बैठी। भरी गर्मी के दिन थे। माँ और मौसी ने उनको अस्पताल दिखाया। दवा दिलाई। मैं घर आया तब वे चारपाई पर लेटी हुई थी। मैंने उनकी कलाई पकड़ी और छूकर देखा कि कितना ताप है। नानी ने आँख खोल दी। मैंने इशारा किया क्या हाल नानी? नानी ने कहा- "पड़या हों" मैंने कहा- "पड़या रो। पण जाण री हर मत करियो" नानी के पास इस दुनिया से कूच करने के जुड़े सभी सवालों का एक पक्का जवाब होता। "मने आगे ठौड़ कित बेटा"

नानी से दवा, खाने-पानी का पूछ कर मैं रसोई में गया। अपने लिए खाने की प्लेट बनाई और नानी की चारपाई के पास कुर्सी लगाकर बैठ गया। "नोनी एक मूरियो लो?" नानी ने सर हिलाते हुए ना कहा- "तेरे सीरो कराऊँ। मूरिए हूँ काला के होई?" नानी ने मुझे कहा कि मैं चली जाऊँगी और मेरे पीछे तुझे हलुआ खाने को मिलेगा। मैंने नानी की ठोड़ी को अपने हाथों से छुआ और कहा- "माँ ए ! म्हे नैना टाबर हों। म्होरे सोमे झाक। एड़ी लू में बल जैहों। कोई दूजे टैम देखी माँ"

नानी को थोड़ी सरधा हुई। उन्होने अपनी नासका खोजी। थोड़ी वे उठ बैठी। मैं खाना खाता रहा।

मेरे दो मामा थे। पहले बड़े चल बसे। उसके बाद नाना जाते रहे। अचानक से छोटी मामी चल बसी। उसके बाद मेरे पापा गुज़र गए। फिर साल भर बाद मेरे छोटे मामा भी न रहे। नानी अपनों को खोने के दुख उठाती रही। तीन चार साल किसी एक प्रिय को भूलें तो दूजा दुख उनको तैयार मिला। संसार दुखों की खान है। बुद्ध ने ये कहा और नानी ने इस बात को सलीके से जीया।

मैंने खाना खाते हुए नानी से कहा। "नोनी सियालों तोई ठीक है। गुदड़ा ओढ़ न पड़या रों। हमके सियाले मोरत काढ़ लों।" अगली सर्दी में नानी सचमुच फिर से जाम होकर आ गयी। मौसी और माँ ने फिर उनको डॉक्टर को दिखाया। मैं आया तब तक वे काफी ठीक थी। मैंने कहा- "नोनी टिकट ली री?" नानी हँसने लगी। "ना रे बीनों भाड़े" मैंने उनसे कहा था कि क्या नानी आपने इस बार जाने की टिकट पक्की करा ली है? उनका कहना था नहीं बेटिकट ही तैयारी की है। सचमुच ऐसा ही हुआ। उनको जीवन से दूर ले जाने वाली गाड़ी से उतार दिया गया।

उसके साल भर बाद एक शाम मैं दफ्तर से आया। नानी चारपाई पर बैठी थी। मैंने कहा- "चलो दिलदार चलो, चाँद के पार चलो।" नानी ने कहा- "लरड़िया घेटिया बधार दिया, हालो भाई जित हालनों है" नानी ने उन्हीं दिनों अपने मेढ़े और भेड़ें बेची थी। उनके दिल में गहरा दुख था कि प्रिय जानवर बेचने पड़े। वे उनके संगी साथी थे। नानी उनसे अपने दुख कहती थी। उनको डांटती थीं। उनकी रक्षा करती थी। इससे अधिक प्रिय क्या होता। ऐसे प्रिय का त्याग कितना बड़ा दुख होता है। कौन जाने?

खैर आठ महीने नानी चारपाई पर रही। नानी ने जिस बच्चे के परिवार के लिए जीवन सौंपा उन्होने मुंह फेर लिया। जिस बहू को नज़र में दूसरे दर्जे पर रखा, उनके बच्चों ने कष्ट भरे दिनों में उनके दुख अपने समझ कर उठाए। माँ ने कहा कि नानी कह रही है मुझे अपने पास ले जा। मैंने कहा- "माँ ले आओ। जैसा होगा वैसा करेंगे।" तीन दिन पहले माँ ये तय करके गयी की नानी को ले आएंगी। मैं दिल्ली गया हुआ था। मेरे भीतर एक ऐब है कि यात्रा के समय केवल ज़रूरी बात कर सकता हूँ। किसी को फोन नहीं करता। किसी को बताता नहीं कि कहाँ हूँ। माँ जानती है। वे कभी फोन नहीं करती। लेकिन परसों उनका फोन आया। "तू कद आई?" मैंने पूछा- "हें माँ हमके घणि गड़बड़ है?" माँ ने कहा- "अजी धके है" मैं समझ गया कि अब नानी कूच करने को है। मैंने माँ से कहा- "नोनी ने कईयो दो दिन जैपर पार्टी करन आऊँ, तकड़ मत करियो।"

मैं कल सुबह दिल्ली जयपुर की यात्रा से आया। शाम को पौधों से प्यार करते हुए अचानक मौसी का रुदन सुनाई दिया। मैं समझ गया कि मेरी नानी चल बसी है। मैंने कार को पौंछना शुरू किया। आभा आई और बोली- "शायद?" मैंने कहा हाँ यही लगता है। कार साफ हुई तब तक चाचा जी ने आवाज़ दे दी। "भाई किशोर तेरी नोनी गी परी" मैंने कहा- "हाँ अभी चलते हैं"

हमारे यहाँ मृत्यु दुख से अधिक सीख का विषय है। रोने वालों के पास असंख्य उपहासक बैठे रहते हैं। दुख के अवसर पर आने वाली औरतें सौ दो सौ गज दूर से गला फाड़ कर रोती हैं। "माउ ए, बाबा ए" घर में घुसने के दो मिनट बाद सबसे कुशल क्षेम पूछने लगती हैं। पाँच मिनट बाद मुस्कुराने लगती हैं। दस मिनट बाद मसखरी करने लगती हैं। जैसे मृत्यु एक प्रहसन है। ऐसा ही हाल आदमियों का भी होता है। वे सस्ते अनुभव बांटते हैं। वे अपने आस-पास के लोगों की खिल्ली उड़ाते हैं। दुख बेचारा उपेक्षित और प्रताड़ित किसी कोने में खड़ा रहता है।

आप आइये कभी। गला फाड़ फाड़ कर माँ-माँ करने वाली थोड़ी देर में पूछ रही होती है- "मरग्या रे बे तो आया कोनी। खूटुड़ा।" फिर शहरी रिश्तेदारों की खीली निकालने लग जाएंगी। आ कैड़ी है बा कैड़ी है। मृत्यु को लगता है कि वह अपने आप पर रोने के लिए है। मुझे रेगिस्तान के लोगों की यही खूबी बहुत अच्छी लगती है। वे दुख को उपहास में शून्य कर देते हैं। आपको अचानक अहसास होता है आप नानी-नाना, दादी-दादा को रोने आए थे या किसी और काम से?

आज सुबह से मेरा फोन ऑफ था। मैं रानीगांव था। तेज़ सुसू लगी तो दुख के डेरे से उठकर बाहर सड़क पर चला आया। सोचा फोन ऑन कर लूँ। जैसे ही ऑन किया। धमकियाँ डिलीवर हो गई। आप कल शाम से गायब हैं। जवाब भी नहीं दे रहे। धमकियाँ देने वाली ये क़ौम एक नए जमाने की क़ौम है। जिनको अपने साथ रहने से अधिक दूजे के साथ रहने में सुकून हैं। मैंने उनको जवाब दिया। "भाई नानी चें बोल गयी हैं। उनको ठिकाने लगा कर आते हैं। फिर बात करेंगे।"

उन्होने कहा- "आपकी भाषा कितनी हल्की है। ऐसे कोई बोलता है? " मैं उनसे कहना चाहता था कि कभी दुख और जीवन को समझना। कभी सोचना कि तुम झाड़ू हो या झाड़ू के तिनके हो गए हो। मगर मुझे एक बात पता है कि ईसा, बुद्ध और महावीर से लेकर नानी तक न कोई समझा है न समझेगा कि जीवन क्या है? इसका अंत कैसा हो? और मैं क्या कर रहा हूँ। इसलिए कुछ न कहा।

ये तस्वीर एक ऐसी शाम की है जब नानी की चारपाई पर लेट गया।

दो सूखे पत्ते नम मिट्टी में

एक रोज़ कोई कोंपल खिली जैसे नज़र फेरते ही किसी ने बटुआ पार कर लिया हो। एक रोज़ उससे मिला। फिर उससे ऐसे बिछड़ा जैसे खाली बटुए को किसी ने उदासी ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने या खूबसूरत स्त्री को इरादतन चूमने जितना ही अवैध है.