December 30, 2018

कविता चाहे जैसी करें जगह का ध्यान रखें

मित्रो अभिवादन। 
कार्यक्रम के मुख्यअतिथि का काम होता है कि वह अतिथि की तरह आए। मुख्यता से आयोजन में उपस्थित रहे। अंत में चाय भोजन आदि ग्रहण करके चला जाए। लेकिन मुझे कहा गया है कि मैं इस कवि सम्मेलन के अध्यक्ष महोदय के कविता पाठ और उद्बोधन से पूर्व बोलूँ।

डॉ तातेड़ सर ने अभी कहा कि आजकल सब लाइव हो जाता है। मुझे इस बात की गहरी चिंता रहती है। कोई भी व्यक्ति आपके कहे को, बातचीत को और आपकी उपस्थिती को अपने फोन में रेकॉर्ड कर सकता है वह उसे लाइव भी कर सकता है। हम किसी भी कार्यक्रम मे अपनी तैयारी और अध्ययन के बिना जाने के अभ्यस्त हैं। इसका एक कारण है कि अधिसंख्य आयोजन और बुलावे तात्कालिक होते हैं। आमंत्रण निजी सम्बन्धों के आधार पर दिये जाते हैं। ऐसे प्रेम भरे आमंत्रणों और आयोजनों में अक्सर मैं अनियोजित और असंगत बातें बोल जाता हूँ। मुझे अभी तक ये सीखना है कि संतुलित, सारगर्भित और विषय से संबन्धित बात कैसे कही जाये।

आज का विषय कवि सम्मेलन है तो इसके बार में कोई पूर्व तैयारी नहीं की जा सकती थी कि किस तरह कम शब्दों में अच्छी बात कही जा सके। लेकिन मुझे इस महविद्यालय में आना सदैव रोमांचित करता है। इसलिए कि मैंने अपनी पढ़ाई यहीं से की है। मैं एक उदण्ड छात्र माना जाता रहा था। शिक्षा के प्रति अरुचि मेरे नाम के साथ जोड़ दी जाती थी। इससे भी बड़ी बात की मेरी गिनती साधारण छात्रों में हुआ करती थी। आज मैंने दो और साधारण लोगों को पुनः देखा है। एक हैं प्रोफेसर कवि डॉ बंशीधर तातेड़ और दूजे प्रोफेसर, हिन्दी साहित्य के आलोचक और सैन्य अधिकारी डॉ आदर्श किशोर। ये दोनों इसलिए साधारण है कि इनसे कोई भी मिल सकता है। ये किसी का भी साथ देने, राह दिखाने, मदद करने और अपने प्रयासों से छात्रहित में जुटे रहते हैं। इन दोनों का इतना साधारण होना मुझे भाता है। इसलिए कि साधारण होना इस दुनिया में एक असाधारण बात है।

मैं किंडर गार्टन के लिए बीएसएफ़ स्कूल गया। प्राथमिक शिक्षा रेलवे स्कूल से हुई और माध्यमिक शिक्षा हाई स्कूल से। इसलिए जीवन में ये चारों जगहें मेरी अब तक सबसे प्रिय जगहे हैं। यहाँ आकर मुझे अच्छा तो लगता है लेकिन जब हम कविता के रूप में राजनीतिक चुटकले, स्त्रियॉं का जाने-अजाने किया जाने वाला उपहास और सामाजिक रिश्तों का मखौल बनाते हैं तो मुझे अच्छा नहीं लगता। शायर राजेश चड्ढा की दो पंक्तियाँ जो मुझे ठीक से याद नहीं हैं मगर जैसी याद है उस हिसाब से वे कहती है।

शर्त पर आपने हाथों में मेरे हाथ दिया 
शर्त के टूटने तक कायदे से साथ दिया। 
इस मंच से आपने किस मंच की तारीफ की 
भीड़ ख़मोश है किस आदमी का साथ दिया।

आप इसका भाव समझ सकते हैं। जब हम पाँच साल के बच्चों से बात करते हैं तो हम अलग तरीके से बात करते हैं। इसी तरह हर उम्र और लिहाज से बात करने का एक सलीका होता है। राजकीय स्कूल और कॉलेज में छात्रों को जब आप कविता सुनाएँ तो मैं अपेक्षा रखता हूँ कि वह कविता जीवन के मोल को, मेहनत को, लगन को, लक्ष्य को, हार-जीत के भाव को सामने रखे ताकि छात्र कविता से प्रेरणा लें। न कि आपके राजनीतिक चुटकले सुनें, हँसे और अपना कीमती समय व्यर्थ करें।

हुस्न और इश्क़ की शायरी होनी चाहिए मगर उसकी एक जगह है। राजनीति की शायरी होनी चाहिए मगर उसकी एक जगह है। लेकिन आदमी के सुख-दुख और अधिकार की शायरी हर जगह की जा सकती है। इसलिए मुझे ऐसी शायरी, कवितायें प्रिय हैं। मैं शायर का नाम और सही शेर भूल रहा हूँ। मेरी याद में कुछ ऐसा है कि हरजोत सिंह से कहा।

सच किराए के घर में रहा उम्र भर 
झूठ बंगले पे बंगले बदलता रहा। 
जिसके तलवे छिले वो तो चुप है मगर 
जिसको कुछ न हुआ वह उछलता रहा।

ये शेर, ये कविताई हमेशा के लिए हैं। हमारे समय में थी, हमारे बाद भी रहेगी। मैं कुछ अधिक तल्ख़ हो गया हूँ मगर मुझे ये ज़रूरी लगता है।

आप सब भीतर से मजबूत बनना। मुझे किसी ने एक बात बताई थी कि फोर्ड कंपनी के मालिक हेनरी फोर्ड अपनी कंपनी की मीटिंग में जा रहे थे। उनके कोट की एक जेब की सिलाई उधड़ी हुई थी। उनके सहायक ने कहा-"सर कोट बादल लेते हैं। सिलाई थोड़ी से उधड़ी हुई है। इस पर फोर्ड साहब ने कहा- "जो मुझे जानता है कि मैं फोर्ड कंपनी का मालिक हूँ वह जानता होगा कि मैं ऐसे कितने नए कोट ले सकता हूँ। और जो मुझे नहीं जानता, उससे मुझे क्या फर्क और उसे क्या फ़र्क?" तो मित्रों बाहर के दिखावे को भुला दो। भीतर से योग्य बनो कि आपकी पहचान आपके कपड़े न हों। आपका ओढा हुआ आवरण न हो। आप खुद हों।

शायरी कविता सीखो तो ऐसी सीखना कि आम आदमी के दुख को उकेरती हो। प्रेम की टूटन को लिखती हो। उदासी का शृंगार करती हो। चापलूसी और नफरत की शायरी करना मत सीखना।

मित्रो मुझे इसी कॉलेज में लेक्चर सुनते हुये। कार्यशालाओं में बैठा दिये जाने से, या किन्हीं आयोजनों में आपकी तरह शामिल कर दिये जाने पर बहुत बोरियत होती थी। मैं थक जाता था। इसलिए आपका समय अधिक नहीं लूँगा। महाविद्यालय के छात्र संघ के अध्यक्ष जगदीश पुनिया, प्रिय प्रदीप राठी, प्रोफेसर आदर्श किशोर सर और आदरणीय डॉ तातेड़ सर सहित आप सबका भी आभार। हार्दिक अभिवादन। 
* * *

December 25, 2018

हम जाने कहाँ चले गए



संसार है एक नदिया दुःख सुख दो किनारे हैं

स्टूडियो की ख़ुशबू आकाशवाणी के दरवाज़ों तक साथ चली आती है। सर्द सुबहों की हल्की धूप में बुझते अलाव के पास बैठे हुए लगता है कि टर्न टेबल पर ग्रामोफ़ोन रिकॉर्ड अभी घूम रहा है। निडल नोट्स को सस्वर पढ़ रही है। स्पीकर के अलावा रिकॉर्ड के पास से भी एक महीन आवाज़ आ रही है। वायलिन प्लेयर आंखें मूंदे हुए बजाए जा रहा है।

लेकिन ग्रामोफ़ोन रिकार्ड्स अब लाइब्रेरी की सीलन में चुप पड़े हैं। आधी नींद में उद्घोषणाएं करने वाले उदघोषक बूढ़े हो चले हैं। चाय ताज़ा है मगर उसका परमानंद खो चुका है। सुबह-सुबह के लतीफ़े सूखे पत्तों की तरह झड़ चुके हैं। हम बीती रात की कारगुज़ारियों पर न हंसते न उदास होते हैं। कम ओ बेश शक्ल वही है पर हम जाने कहाँ चले गए।


प्ले लिस्ट में बैठे वे ही पुराने गाने अब नए अर्थों में पीछा कर रह रहे हैं।

December 24, 2018

हिलारिए कुंभटिये अकेसिया सेनेगल



रेगिस्तान में सूखी सब्ज़ियाँ हर घर में मिल जाती है। हालांकि अब यातायात के साधन बढ़ने से हरी सब्ज़ियाँ आसानी से मिलने लगी है। इन हरी सब्ज़ियों के कारण सूखी सब्ज़ियों के प्रति लगाव कम हुआ है। अब भी काफी घरों में सांगरी, केर, कुम्भटिये, काचर आदि को पानी में उबालकर सुखा लिया जाता है। ये सूखी सब्ज़ियाँ साल भर कभी भी काम ली जाती हैं।

ये हिलारे हैं। इनको कुछ लोग कुम्भटिये कहते हैं। रेगिस्तान में पाए जाने वाले पेड़ कुंभट के बीज हैं। कुंभट के फलियां लगती हैं। उनमें से ये बीज निकलते हैं। राजस्थान की प्रसिद्द पंचकूटा की सब्ज़ी में अगर हिलारिये नहीं है तो सब्ज़ी अधूरी है।

कुंभट एक कम पानी की आवश्यकता वाला पेड़ है। इसे अंग्रेजी में अकेसिया सेनेगल कहा जाता है। कुंभट के पेड़ के तने से गोंद निकलता है। इस गोंद का उत्पादन बढ़ाने के लिए जोधपुर स्थित काजरी में एक इंजेक्शन तैयार किया गया है। इस इंजेक्शन से प्राप्त गोंद की गुणवत्ता भी स्तरीय है। इस इंजेक्शन के पेड़ पर साइड इफेक्ट भी होते हैं, ऐसा कृषकों का कहना है।

दो दिन पहले गोंद बेचने के लिए गांव से एक लड़का आया था।

"भाई के जातियो है?" 
"सारण" 
"अरे हूँ ही सारण हूँ।" 
"हेंन ऐ?" 
"आ मेरी बैन है" 
"सगा?" 
"हाँ"
"भुआ भाव तो तीन सौ रुपिया है थे ढाई सौ ही दइयो"

ढाई सौ रुपये किलो के भाव से मौसी, माँ, चाची और पड़ोसियों ने आठ किलो गोंद खरीदा है। इस गोंद से लड्डू बनेंगे। बाज़ार में इसका भाव चार सौ रुपये के आस पास है। एक पड़ोसी मौसी ने कहा "मैंने तो दो सौ रुपये किलो लिया है।"

"पचा रुपयों रो कै है। हो तो लाई भतीज ई"

ये हिलारिये उबल चुके हैं। अब इनको सुखा दिया गया है। इनका भाव सौ रुपये किलो है। सूखे हुए हिलारिये बाज़ार में डेढ़ सौ से ढाई सौ रुपये किलो बेचे जाते हैं। पंचकूटा की सब्ज़ियाँ औसत ढाई सौ से साढ़े चार सौ रुपये किलो बिकती है।

मौसी की पापड़ी उपड़ गई है। एक हाथ से काम करने पर पीठ की मांसपेशियां अकड़ जाने को पापड़ी उपड़ना कहते हैं। योगागुरु चाची मालिश करके इलाज कर रही है।

चाची ने कहा -"बाबा रामदेव आळी दवाई लगाई है। फट दण सावळ हो जेहो"

बाबा रामदेव की फिटनेस पर सवाल खड़ा कर दिया गया है। "बो बाडियो बाबो साकलो कूदणो सरु होवे तो ही गदे आळी पखाल जितो पेट आउड़ो पड़यो है"

इन हिलारियों से बनेगी पंचकूटा की सब्ज़ी और कभी कढ़ी। आखातीज के आस पास सांगरियां आएंगी। उनको भी ऐसे ही सुखाया जाएगा।

December 22, 2018

यूनान का गरीब ब्राह्मण आर्किमिडीज़

#भंगभपंग - 5

हनु भा जोशी ने श्यामपट्ट पर लिखा उत्प्लावन बल।

"किसी भी क्रिया के परिणाम से उत्पन्न प्रतिक्रिया से प्राप्त परिणाम को उत्प्लावन बल कहते हैं।" एक सांस लेकर कहा- "क्रिया और प्रतिक्रिया का अर्थ है कि कुकरिये को भाटा मारना एक क्रिया है और कुकरिए का पूंछ दबा कर भाग जाना प्रतिक्रिया"

हनु भाय्या ने आगे बताया-"क्रिया और प्रतिक्रिया अलग-अलग पदार्थों पर अलग-अलग होती है। कैसे होती है, कोई बता सकता है?"

सबसे पिछली पंक्ति में बैठे लड़के ने ऊंची आवाज़ में कहा- "सर कुकरिया लोंठा हो तो पूंछ दबाने की जगह बाका भी भर सकता है"

"शाबाश। अब आपको समझ आ गया कि क्रिया और प्रतिक्रिया में केवल इतना फर्क है कि पहले भाटा मारा जाना क्रिया है। उसके जवाब में पूँछ दबाना या बाका भर लेना प्रतिक्रिया है।"

हनु भाय्या ने कहा- "उत्प्लावन बल का सिद्धान्त है कि क्रिया के कर्ता का जितना भार होता है, वह उस भार के बराबर अगले को विस्थापित कर देता है।"

"माड़सा जैसे भाटा जित्ते ज़ोर से भाया उतना..."

"ज़्यादा लपर चपर नहीं। जितना बताऊं समझो, जितना पूछूं उतना उत्तर दो" ये कहते हुये उन्होने श्याम पट्ट पर लिखा। आर्किमिडीज़ का सिद्धान्त।

"आर्किमिडीज़ यूनान के एक गांव में रहने वाले गरीब ब्राह्मण थे। वे गणित के अध्यापक थे किन्तु उनका वंशानुगत अर्थोपार्जन का माध्यम था हलवाई का काम। एक दिन उनको विचार आया कि काले गुलाब जामुन चाशनी पर कैसे तैर रहे हैं। कौनसी ताकत उनको डूबने नहीं दे रही। उन्होंने झारा लेकर काले गुलाब जामुन के नीचे से घुमाया। झारा गुलाब जामुनों के नीचे से निकल गया। उन्होने गुलाब जामुन के आकार का एक गोल भाटा लिया और चाशनी में रखा तो वह तैरने की जगह डूब गया। तब उन्होंने पाया कि चाशनी की ताकत गुलाब जामुन और भाटे के लिए अलग-अलग है। अगले दिन उन्होंने प्रतिदिन की तुलना में दुगने गुलाब जामुन बनाये और उतनी ही चाशनी में रखे। दुगने गुलाब जामुन होने पर कड़ाही की चाशनी अपनी जगह से हटकर ऊपर तक आ गयी। इससे सिद्ध हुआ कि कोई वस्तु अपने भार के बराबर द्रव अथवा वायु को हटा देती है। इसकी प्रतिक्रिया माने हटाने के विपरीत जो बल लगता है उसे उत्प्लावन बल कहते हैं।"

इतना कहकर हनु भाय्या ने श्याम पट्ट पर लिखा।

"तरल में आंशिक या पूर्ण रूप से डूबी वस्तु के भार में हुई कमी, उस जगह से हट चुके द्रव्य के भार के बराबर होगी।"

हनु भाय्या ने पूछा। "कोई बच्चा कभी पानी में कूदा है"

एक ने कहा- "माड़सा ए डूरे मई कुदयो हतो"

"डूरा, बाजरा निकालने के बाद बची भूसी है। वह मुलायम होती है। इसलिए उसमें कूदने पर डूरा दूर हटा। इस क्रिया और प्रतिक्रिया में इसको चोट नहीं लगी। तो डूरे के उत्प्लावन बल ने इसकी ढूंगी टूटने से बचा ली"

इसी बात को हनु भाय्या ने ज़ोर से पूछा "उत्प्लावन बल ने क्या किया?"

"बचा लिया"

"ये अगर किसी भाटे पर कूदता तो?"

कक्षा के सब बच्चे हंसने लगे।

हनु भाय्या ने बच्चों से कहा- "आर्किमिडीज़ महान ज्ञानी थे। उनके पिता खगोल विज्ञानी थे। उन्होने ही गोल ग्रहों जैसे गुलाब जामुन, रसगुल्ले और लड्डुओं की कल्पना को साकर किया था। एक रोज़ आर्किमिडीज़ की माँ बेसन के गट्टे बना रही थी। उन्होने माँ से पूछा कि ये गट्टे बेलन जैसे क्यों बनाए जाते हैं? जबकि पिताजी तो रसगुल्ले गोल बनाते हैं"

हनु भाय्या ने श्यामपट्ट पर एक गोला और एक बेलन का चित्र बनाया।

"बेलन या घोटे से हम सिल पर रखकर कुछ भी पीस सकते हैं। उसकी गोली भी बना सकते हैं। तो बेलन और गोले का आपसी रिश्ता बहुत गहरा है। एक गोले का आयतन और उसकी सतह का क्षेत्रफल इसको घेरने वाले बेलन का दो तिहाई होता है। इसलिए गट्टे बेलन जैसे बनाए जाते हैं कि वे साग की तरी में ज्यादा जगह घेर सके। इससे बेसन के उबले गट्टों में अधिक स्वाद आ सके।"

थोड़ा रुककर उन्होने पूछा- "क्या आ सके?"

बच्चों ने एक साथ ज़ोर से कहा- "स्वाद"

हनु भाय्या ने श्यामपट्ट पर बनाया गोले और बेलन का रेखाचित्र साफ किया तब तक उनके कालांश के समाप्त होने की घंटी बज गयी। उनको आज आधी छुट्टी में जाना भी था। निम्बड़ी माता के मंदिर के गोठ होनी थी।

हनु भाय्या स्कूल से साइकिल लेकर निकले थे। वे सोचते जा रहे थे कि भांग ऐसा औषध है, जो अपने गुणों के अतिरिक्त बाह्य कारकों से सर्वाधिक प्रभावित होता है। सबसे बड़ा कारक है कि कम्पनी कैसी है। दूजा कारक है कि मौसम कैसा है। तीजा कारक है लेने वाले का मन कैसा है। चौथा कारक अज्ञात है कि सब परिस्थितियां अनुकूल होने पर भी लक्कड़ आ जाता है। नए पुराने भांग प्रेमी चौथे अज्ञातकारण का कभी न कभी शिकार हो चुके थे।

निम्बड़ी माता का मंदिर बाड़मेर क़स्बे से पच्चीस एक किलोमीटर दूर स्थित है। इस निकटस्थ पर्यटन स्थल पर एक तरणताल बना हुआ है, जो हर बरस एक भख लेता है। माने किसी न किसी की इसके पानी में डूबने से मौत हो जाती है। हर बरस कोई मरे न मरे लेकिन चोरी छिपे निम्बड़ी जाने वाले बच्चों को डराने के लिए ये अफ़वाह हर कोई सच ही मानता था।

गोठ में जाने वाले पांच लोग थे। बाड़मेर अस्पताल की फोर्ड एम्बुलेंस चलाने वाले नगजी, एक अंग्रेजी के लेक्चरर खूबजी, एक मलेरिया विभाग में खून के नमूने लेने वाले रामसा, हनु भाय्या और पांचवे बड़े बाबा डमजी।

डमजी अनुशासन के धनी थे। उनको अगर किसी ने सात बजे आने का समय दिया है तो सात बजते ही आना पड़ता था। पहले आना चल सकता था लेकिन पीछे कतई नहीं। डमजी खुद भी इसी कानून की पालना करते थे। वे इसी नियम से उपस्थित होते थे। इसलिए हनु भाय्या ने सायकिल के पैडल पर ज़ोर बनाए रखा।

तीन किलो मिठाई। दो किलो बाटी बनाने को आटा। एक किलो घी। आधा किलो मूंग दाल। एक पाव काजू, एक पाव बादाम, आधा पाव सूखे बड़े अंगूर माने मुनक्का, सौ ग्राम सौंफ, गुलाब की सूखी पत्तियां... नगजी ने लिस्ट पूरी पढ़ी ही नहीं। उन्होंने सामान की लिस्ट देखते हुए रामसा से पूछा- "कोई सगपण है?"

रामसा ने इशारा किया आगे पकड़ा दो। नगजी ने तोतामल खूबचन्द की दुकान के गल्ले पर पकड़ा दी। पकड़ाते हुये कहा- "मिर्चों तो लिखी ही कोनी?"

गोठ का सामान बंध गया। आर्मी रंग की फोर्ड गाड़ी मलेरिया के सेम्पल लेने के लिए निम्बड़ी की ओर चल पड़ी।

निम्बड़ी माता मंदिर प्रांगण में प्रवेश द्वार के दायीं तरफ पाकशाला है। इस पाकशाला के उत्तर में तरणताल। नगजी भोजन पकाने की सामग्री लेकर रसोई चले गए। बाकी चारों लोग तरणताल की ओर बढ़ गए। मौसम अच्छा था। मोर मियों मियों कर रहे थे। ढेलड़ियाँ गायब थीं। जुलाई का महीना था। कुछ एक बादल आ जा रहे थे।

बूटी घोट छनकर तैयार हुई। सबने भोग लगाया। तरणताल के पानी में पांव डालकर बैठ गए। भीगे पाँवों से बॉडी को चार्ज मिल रहा था। जैसे बेट्री का तार प्लग में लगा दिया गया हो। तीनों रसिक आनंद से परमानंद की सीढ़ी चढ़ गए। अब तीनों के देखने की क्षमता दस फ़ीट के दायरे तक सिमट गयी। दस फ़ीट तक पानी दिखता था। इसके आगे अथाह जलराशि की उपस्थिति अनुभूत होने लगी।

खूबजी उनके बीच से उठे और तरणताल के डाइविंग बोर्ड पर चढ़ गए। जलक्रीड़ा प्रिय खूबजी ने डाइव किया। छपाक की आवाज़ आई। डाइव करने के बाद खूबजी पानी के भीतर स्थिर हो गए। अब केवल उनका सर दिख रहा था।

पानी में पांव डाले बैठे रामसा ने खूबजी से पूछा- "पानी में सुनाई देता है?"

खूबजी ने कोई जवाब नहीं दिया। इस पर हनु भाय्या ने कहा- "जवाब नहीं आने का मतलब है कि सुनाई नहीं देता है।"

खूबजी को पानी में कूदे हुए पांच मिनट हुए थे लेकिन भांग प्रेमियों को लगा कि आधा घन्टा हो गया है।

चिंतित स्वर में रामसा ने नया प्रश्न किया। "पानी में ज़्यादा रहने से भांग ज़्यादा तो न चढ़ जाएगी"

खूबजी वहीं स्थिर रहे। उन्होंने कोई जवाब न दिया।

आधे घंटे तक जवाब न आने पर हनु भाय्या ने कहा- "पानी के उत्प्लावन बल और खूब जी में कोई होड़ चल रही है। खूबजी ऊपर आ नहीं रहे और पानी उनको नीचे जाने नहीं दे रहा"

फिर कुछ और समय बीता।

रामसा ने कहा- "एक घण्टे तक जल साधना कठिन कार्य है। स्थिति चिंताजनक है। सेम्पल लेना पड़ सकता है। "

हनु भाय्या ने कहा- "आप इसे कठिन की जगह असम्भव भी कह सकते हैं।"

डमजी ने दोनों को उपेक्षा भरी दृष्टि से देखा- "बावली फोकियां। इस जगत में कुछ भी असम्भव नहीं है"

हनु भाय्या और रामसा ने स्थिर किन्तु फटी आँखों से डमजी का कथन ग्रहण कर लिया। इसके बाद तीनों पानी से ज़रा सा बाहर दिख रहे सर के बालों को देखते रहे। उनमें से किसी के भी हिलने की स्थिति तक न थी। वे केवल देख सकते थे।

हनु भाय्या को लगा तीन कलाक समय बहुत अधिक होता है। उनसे रहा न गया। अचानक हनु भाय्या के मुंह से निकला- "खूबजी सजीव है कि निर्जीव"

डमजी ने बिना हाथ हिलाए आंखों ही आंखों से हनु भाय्या को एक चमाट लगाई। हनु भाय्या ने भी बिना गालों पर हाथ फेरे हाथ फेरकर गाल सहलाया।

इतने में नगजी आये। उन्होंने कहा- "बाटिया तो ठाडा होण आला है। हालो"

इतना कहकर नगजी छपाक से पानी में कूद गए। वहां से उन्होंने बाल पकड़े और खींचकर उनको बाहर लेकर आ गए।

"खूब जी री बालों आळी टोपी पोणी मो ही रेगी। आप उघाड़े माथे ही जीमण ने आया रा" ऐसा कहते हुए नगजी एक हाथ में खूबजी की विग पकड़े हुए थे दूजे हाथ से हनु भाय्या को उठा रहे थे।

हनु भाय्या उठे और कच्छप चाल चलते हुये समझ रहे थे कि वे दौड़ रहे हैं। वे चिल्लाने लगे। "यूरेका, यूरेका, यूरेका..."

नगजी ने पूछा- "काला होग्या के? के हाको करो हो?"

हनु भाय्या ने बताया- "यूरेका का अर्थ है मिल गया"

नगजी ने कहा- "लाध ग्या, लाध ग्या। करो"

खूबजी सजीव थे। तरणताल एक तरफ लुढ़क गया था। उस लुढ़के हुए तरणताल पर टेढ़े-टेढ़े तीन लोग चले जा रहे थे।

गोठ के बाद फोर्ड में बैठते समय हनु भाय्या फाटक पकड़ कर खड़े हो गए।

रामसा ने पूछा- "सूं थियु?"

"गाडी माथे आवे सै" हनु भाय्या ने जवाब दिया।

रामसा ने कहा- "ना आवती, चढ़ो"

हनु भाय्या ज़रा सा पाँव आगे बढ़ाए और फिर उसे पीछे खींच ले। उन्होने दरवाज़े की हत्थी मजबूती से पकड़ रखी थी। नगजी ने एक धक्का दिया। हनु भाई स्ट्रेचर रखने को छोड़ी खाली जगह में फिट हो गए।

सबको घर छोड़कर नगजी गाड़ी अस्पताल खड़ी करने आये। गेट पर भंडारी साब मिल गए। उन्होंने पूछा- "कहाँ गए थे नगजी?' नगजी ने ड्राइवर खिड़की से मुंह बाहर निकाल कर कहा- "साब, नमूना लेण"

भंडारी जी ने बात को टालते हुये कहा- "ले लिए"

"हों लिया रा, ने घिरे पुगाय भी दिया।" ऐसा कहते हुये गाड़ी आगे बढ़ा ली।

सामने से एक नए चिकित्सक आ रहे थे। उनको सलाम बजाते हुये नगजी ने कहा- "जाडी नाह आलो घुटमुटियो" हालांकि नगजी ने ये केवल मन में सोचा ही था लेकिन उनको सुनाई देने लगा कि डॉक्टर साब की आवाज़ आ रही है।

गैरेज में एक ही वाक्य गूंज रहा था। "क्या कहा? क्या कहा? क्या कहा?"

नगजी ने घोषणा की भोंग एक डफोल नशो है। इतना कहकर वे गैरेज का दरवाज़ा खोजने लगे। वे अपनी अक्ल लगाकर रोशनी की तरफ गए शायद उधर ही दरवाज़ा हो मगर वो दीवार पर लगा हुआ बल्ब निकला।

December 20, 2018

काळी भींत गेमरिंग रो तोड़

#भंगभपंग - 4

बाड़मेर स्टेडियम में पाँच छह सौ दर्शकों की हुटिंग चल रही थी। खेल का पहला हाफ पूरा हो गया था। फुटबाल को अपने पाँव के नीचे दबाये हुये नबी ने मांगिलाल से कहा- "ईए गेमरे दुख दीयो है। डीकरो कालो पाडो" इतना सुनते ही गेमर सिंह ने एक बेंत बताई और कहा- "गेमरो काळी भींत है, होएं माथो फोड़ो।" लक्ष्मी नगर में रहने वाले पुलिस कांस्टेबल गेमर सिंह फुल बैक थे और फुल टेंशन भी थे। दुनिया में बाड़मेर ही इकलौता क़स्बा था जहां के फुटबाल प्रेमियों में सेंटर फॉरवर्ड से अधिक लोकप्रिय कोई फुल बैक खिलाड़ी था।

क़स्बे में फुटबाल खेलने वालों की बड़ी पूछ थी। मांगिलाल, कुन्दन, नबी, रवि जैसे साधारण अदने लोग सड़क पर निकल जाते तो युवाओं का एक कारवां उनको घर तक पहुंचा कर आता था।

हर मैदान के खिलाड़ी खेल समाप्ति पर दूध पीने रेलवे स्टेशन के सामने के चाय ढाबों पर आया करते। खेरू की दुकान पर इन खिलाड़ियों के लिए दूध के स्पोंसर तक आते थे। इन काले कलूटे, बिखरे बालों वाले, घिसे स्पाइक्स शू पहनने वालों के लिए प्यार की एक बंदनवार लगी रहती थी। ये खेरू की चाय दुकान और लवली टी स्टाल को जोड़ती थी। इसी बंदनवार के नीचे से सारा शहर गुज़रता था, "इक्कीस ग्लास दूध देना। पैसे मैं दे रहा हूँ" ये सम्मान देने के लिए प्रायोजक होड़ में रहते।

उस दोपहर बाद चार बजे शुरू हुआ फुटबाल का खेल बिना निर्णय के समाप्त हो गया। गेमर सिंह अपनी तोंद पर पुलिस की खाकी स्वेटर डाल कर साइकिल पर चढ़ गए। बाकी खिलाड़ी भीड़ के साथ स्टेडियम से शहर को लौट रहे थे। ये समझना कठिन था कि ये राम को वनवास के लिए पहुंचाने जाती भीड़ थी या उनका स्वागत करके लाती हुई भीड़।

नीलकंठ फेक्ट्री की ढलान चढ़ने के बाद कारवां में शामिल पैदल चल रहे कई लोग अपनी सायकिलों पर सवार हो गए। उन साइकिल सवारों के इंतज़ार में लुहारों के वास के कुत्ते बैठे थे। उन्होने भी सम्मानपूर्वक सायकिलों के साथ दौड़ लगाई।

खेरू टी स्टाल पर निकर पहने बैठे खिलाड़ियों के पास से तीन बुजर्ग गुज़रे। एक ने पूछा- "कुण जीत्यो?" दूजे ने पूछा- "के रिजल्ट रयो?" तीजे मगराज जी थे। उन्होने कहा- "खेल जीवन में अनुशासन लाता है। सम्मान करना करना सिखाता है और आपसी सद्भाव को बढ़ाता है।" आखिरी बात का अर्थ खिलाड़ियों और उनके प्रशंसकों को समझ न आया।

नबी ने कहा- "मोंगा खेल तकनीक रो सुधार करणो पड़ेला"

मांगिलाल कुछ जवाब देते इससे पहले ही एक गोलीदार ने कहा- "डमजी सै ना"

फुटबाल खिलाड़ी इस क़स्बे के चरक और लुक़मान माने जाने वाले डमजी को खोजते हुए सोन तलाई तक गए लेकिन डमजी कहीं न मिले। लौटते हुए सदर बाज़ार में मालूम हुआ कि आज डमजी फकीरों के कुएं के पास वाली गली ऊपर जहां पहाड़ी खत्म होती है, वहीं बने गणेश मंदिर में औषधि का संसाधन करेंगे। ये वही चमत्कारी मंदिर था जहां से राइट बंधुओं ने हवाई जहाज की भव्य कल्पना को साकार अपनी आँखों से देखा था।

डमजी को पाँव धोक देकर पसीने से भरे खिलाड़ी आँगन पर बैठ गए।

उन्होने डमजी को अपनी परेशानी बताई। "कित्ति भी तेज़ किक मारो गेमरो आडो आवे रो। दौड़ भाग रो सत्यानास। ईए रो कोई इलाज बताओ।"

डमजी ने चिलम से एक कंचा निकाला। राख़ को मैदान की घास की तरह आँगन पर फैला दिया। उन्होने पूछा ये क्या है? खिलाड़ियों ने कहा- "कन्टा"

डमजी ने थोड़ा विचार किया। सबके लिए एक-एक कप ठंडाई मँगवाई। खिलाड़ी बंधु जो रोज़ चीनी मिला दूध पीते थे, उनके मुंह में काजू, बादाम, सौंफ, गुलाब का स्वाद आया।

ठंडाई ने अपना असर करना शुरू किया। पसीने से भरे चेहरे शांति और आनंद से भरने लगे। डमजी ने कंचा फिर से आँगन में रखा। पूछा- "ये क्या है?" सब खिलाड़ी एक साथ बोले "फुटबाल।" घनघोर अचरज ये हुआ कि उन्होने जीवन में पहली बार काँच की फुटबाल देखी। वे डमजी के आगे नतमस्तक हो गए।

डमजी ने कहा- "दुनिया उल्टी खोपड़ी की है। इसे जिधर जाने का कहोगे उसकी उल्टी जाएगी। दायें मारो तो बाएँ चल पड़ेगी।"

इतना कहकर डमजी ने तर्जनी को अंगूठे से बांध कर कंचे पर बाईं तरफ प्रहार किया। कंचा अंगुली से चोट खाकर वलय की तरह दायीं और जाने लगा। फुटबाल खिलाड़ी स्थिर आँखों से देख रहे थे कि स्पाइक्स पहनी मज़बूत टांग बाईं तरफ जा रही थी जबकि काँच से बनी विशालकाय फुटबाल दायीं तरफ।"

खिलाड़ी एक साथ बोले- "ये कैसे हुआ?"

डमजी ने कहा- "भविष्य में इसे फुटबाल का कर्ल शॉट कहा जाएगा। जाओ अभ्यास करो"

खिलाड़ियों ने लौटकर इस शॉट का अभ्यास किया। अब वे पेनल्टी लेने के लिए दौड़ते हुए दायीं ओर झुकते हुए फुटबाल को उल्टी दिशा में किक मारते। फुटबाल हवा में वृत्ताकार घूमती हुई गोल के कोने में घुस जाती। इस अभ्यास का परिणाम भी अगले मैच में मिल गया। काळी भींत फुलबैक गेमर सिंह के पीछे से घूमकर गोलकीपर को छकाती हुई फुटबाल गोल पोस्ट में घुस गयी।

खेल समाप्ती पर पर गेमर सिंह ने पूछा- "नबीया ए कोंकर कियो?" नबी मुसकुराता चलता रहा। विजया औषधि की स्मृति से ही शरीर मद से भरने लगा।

इस बात के तीस साल बाद इंग्लैंड से एक गोरा आदमी अपनी बीवी और दो बच्चों को साथ लिए पनघट रोड नामक पतली सी गली में डमजी को खोज रहा था। वह दुनिया भर में फुटबाल का कर्ल शॉट लगाने का उस्ताद माना जाता था। उसने कल्याणजी सोनार से कहा- "आय एम बेकहम। आय एम लुकिंग फॉर डैमजी बावा" कल्याण जी ने गोरे को रास्ता बता दिया- "ओ उआ दैट। गो पाधरा एंड टेक डावा टर्न।"

#येभांगकिसकीहै #सेणोंनसो #भांगभूंगड़ा #डफोलनशो

December 19, 2018

हवाई जहाज के आविष्कार का रहस्य

#भंगभपंग - 3

बाड़मेर क़स्बे में आयुर्वेदिक औषधियाँ वैद्य आदरणीय शास्त्री जी के यहाँ मिलती थी। शास्त्री जी के औषधालय में मिलने वाली औषधियाँ के मुकाबले उपयोग में सर्वाधिक और निर्विरोध विजया औषधि ही आती थी। वैद्य जी किसी भी प्रकार के नशे के विरुद्ध थे। मुख्यतः आयुर्वेदिक औषधि कहकर भांग का सेवन करने वाले लोग उनको असह्य थे।

बाड़मेर में जिस गली ने अच्छा नाम कमाया, वह वैद्य जी की गली है। इस गली को प्रसिद्ध करने में स्त्रियों की बड़ी भूमिका है। इसी गली में गोटे और चूड़ी की दुकाने रही हैं। स्त्रियों के लिए ओढ़ने के गोटे, साड़ी के फाल, पिको और चूड़ियों का क्या महत्व है ये कोई भी व्यक्ति शादी करके जान सकता है।

हालांकि फाल, पिको, गोटे आदि का काम क़स्बे के हर मोहल्ले में होता रहा है लेकिन वैद्य जी सद्गुणों के प्रताप से इसी गली की दुकानें ही स्त्रियों में लोकप्रिय रही हैं। दस फीट की गली में दोनों तरफ दुकानें हैं इसलिए भीड़ ही अधिक रहती है। स्त्रियों के साथ आने वाला प्रत्येक पुरुष इस गली के नाम से परिचित होने लगा और कम समय में ही वैद्य जी की गली बाड़मेर में एक जानी पहचानी गली हो गयी।

वैद्य जी सर पर जोधपुरी चुंदड़ी वाला साफा बांधते थे। साफे पर कलगी और एक लंबी पूंछ होती थी। अपनी प्रसिद्धि और लोकसेवा के चाव से वैद्य जी ने एमएलए का चुनाव लड़ने का मन बनाया। ईश्वर की कृपा से एक आयुर्वेद चिकित्सक को चुनाव चिन्ह भी फूल और पत्ती आवंटित हो गया।

जड़ी-बूटी रसिको ने वैद्य जी के बारे में अफवाह फैलाई की वैद्य जी वोट मांगने गए। उन्होने वैसा ही शाही साफा बांध रखा था। महीन सफेद धोती पहन रखी थी। धोती का अगला पल्ला उन्होने हाथ में उठा रखा था और हाथ जोड़ रखे थे। वे घरों के बाहर देहरी पर बैठी महिलाओं से वोट देने की अपील करते जा रहे थे। "एक फूल ने दो पत्ती याद राखजो सा"

राम द्वारे के पास एक बूटीप्रिय सज्जन परिवार सहित घर के चौखटे पर आसन्न थे। वैद्य जी ने चुनाव प्रचार के उत्साह में महीन कपड़े की सफ़ेद धोती को कुछ अधिक ही ऊपर उठा रखा था और हाथ उनको अभिवादन में जुड़े हुये ही थे। उन्होने पुनः निवेदन किया। "एक फूल ने दो पत्ती याद राखजो सा।" सामने से जवाब आया। "वैद्य जी, एक फूल ने दो पत्ती दीखे है। कदी नी भूल सकां। आगे हालो"

इन्हीं वैद्य जी की गली के पास लक्ष्मी जी का मंदिर है। हनु भाई जोशी कभी धनलोभी नहीं रहे। उनकी ये चाहना कभी नहीं थी कि धन की सदानीरा नदी उनके घर में बहती रहे। लेकिन वे धन की पतली नाली की आशा अवश्य रखते थे। इसलिए हनु भाय्या ने स्कूल जाते हुये लक्ष्मी जी को दंडवत हुए बिना दंडवत प्रणाम किया।

स्कूल में पाठ था हवाई जहाज का आविष्कार।

उन्होने पूछा- "होशियार लड़का कहाँ है?" लड़का कुछ अधिक ही झुका हुआ था। वह अपने से अगली पंक्ति में बैठे छात्र के पीछे छिपा हुआ था। हनु भाय्या ने अपनी निगाह पीछे तक दौड़ाई लेकिन बूटी के प्रभाव में दृष्टि पीछे वाली दो पंक्तियों को देख पाने में असमर्थ थी।

उन्होने पुनः पूछा- "होशयार बच्चा आया नहीं?"

कक्षा में खुसर-पुसर हुई। एक लड़के ने कहा- "माड़ सा ओ लारे लुक्योड़ो है"

हनु भाय्या पीछे की पंक्ति तक गए। सहमा हुआ बच्चा उनको देखने लगा। उसकी कातर दृष्टि से हनु भाई द्रवित हो गए। उन्होने उसके सर पर हाथ फेरा और कक्षा के सामने ले आए। हनु भाई ने पूछा- "बताओ हवाई जहाज सजीव है कि निर्जीव?"

होशियार लड़का सर झुकाये चुप खड़ा रहा।

कक्षा की अगली पंक्ति में बैठा एक लड़का बोला- "माड़सा ईये रे धूजणि होवे"

हनु भाय्या ने पुनः एक कोमल दृष्टि होशियार बच्चे पर डाली और कहा जा अपनी बेंच पर बैठ जा। इसके बाद उन्होने कक्षा को बताया- "उन्नीस सौ तीन में दो भाइयों ने मिलकर एक हवाई जहाज बनाया।"

पाठ समाप्त होने के बाद उन्होने पूछा- "हवाई जहाज एक जगह से दूसरी जगह जा सकता है?"

बच्चे बोले- "हाँ"

"हवाई जहाज उड़ सकता है?"

बच्चे बोले- "हाँ"

"तो जो चीज़ें उड़ती और चलती हों, वे सजीव होती हैं कि निर्जीव?"

होशियार लड़का टेबल के नीचे घुस गया। बाकी बच्चों ने मौन धारण कर लिया। अचानक स्कूल की घंटी बजी। टन टन टन इसके साथ हनु भाय्या हंसने लेगे ही ही ही हिई।

रोज़ बस्ते उठाते भागते जाने वाले बच्चे भागना भूलकर माड़सा के साथ हंसने लगे। ही ही ही ही।

थोड़ी देर में गलियारा सजीव-निर्जीव के स्वर से भर गया। बच्चे धक्के मारते दौड़ते जा रहे थे। सजीव-निर्जीव का स्वर स्कूल के मुख्यद्वार की ओर भाग रहा था।

शाम को हनु भाय्या ने पुनः चिंता प्रकट की। "स्कूल की पढ़ाई सही नहीं है। एक ही बात एक जगह सही होती है दूजी जगह गलत।"

"सूं वात!"

"आज हूँ कक्षा मा पढवातो तो हवाई जहाज रो आविष्कार राइट बंधुओंए कीनो सै..."

हनु भाय्या की बात सुनकर मंडली एक साथ बोली। "सूं ! कालो थियु सै?"

हनु भाय्या अचरज भरी स्थिर दृष्टि से देखने लगे।

हरी गोली की तीसरी चूँटी काटकर डमजी भाय्या ने पनघट रोड के सिरे पर खड़े भड़भूँजे पर निगाह डाली। भाड़ खाली पड़ी थी। पास ही एक कुकरिया शाम ढलने की प्रतीक्षा में बैठा था। डमजी भाय्या ने सही जानकारी पेश की।

बात है अट्ठारह सौ निन्यानवे की। राइट ब्रदर बाड़मेर आए थे। उनको किसी ने बाड़मेर के गणेश मंदिर का पर्चा बताया था। दोनों भाई पन्ड्डिजी के चरणों में बैठ गए। बोले कोई आविष्कार करना है। पन्ड्डिजी जी ने कहा करवा देंगे। दोनों भाइयों को दो दो गिलास ठंडाई दी। ठंडाई देने के बाद लाल गमछा भिगोकर दोनों भाइयों के चेहरे पर हवा डाली। इसके बाद थोड़ी देर शांति से बैठ गए।

एक मक्खी आई बड़े राइट ब्रदर के राइट घुटने पर बैठ गयी। मक्खी ने वहाँ से चेहरे की ओर उड़ान भरी। राइट ब्रदर को दिखने लगा कि कोई विशाल यंत्र धीमी गति से उड़ता हुआ चेहरे की ओर आ रहा है। जिस गति से विशालकाय यान आ रहा था, उसी धीमी गति से बड़ा राइट ब्रदर अपने सर को विशाल यान से बचाने के लिए एक तरफ झुकाता जा रहा था। पांच मिनट की इस क्रिया के बाद उसका सर पीछे लटक चुका था। सर धीरे-धीरे सही पोजीशन में आया।

पन्ड्डिजी ने पूछा चमत्कार दिखा?

राइट ब्रदर ने आश्चर्य से पूछा- "ये क्या था पन्ड्डिजी?"

"तुमने क्या देखा?"

"जैसे कोई बहुत बड़ा यान उड़ता हुआ हमारे चेहरे के सामने आ रहा है। हम कठिनाई से उससे बच पाये है।"

पन्ड्डिजी ने आँखें मूंदकर ये योजना उनको सौंप दी। उन्होने कहा- "इस लघु में जो दिव्य दर्शन हुआ है इसे साकार करना है। यही आगे चलकर हवाई जहाज कहलाएगा। तुम्हारा नाम रोशन होगा। गणेश जी का नाम लेकर किए सब कार्य सिद्ध होते हैं।"

पन्ड्डिजी जी विजया औषधि के ऐसे ज्ञाता थे कि राइट बंधु अमेरिका पहुँच कर भी कई बरस लड़खड़ाते रहे। उनका बनाया यान भी लड़खड़ाया लेकिन चमत्कार खाली नहीं गया।

"असल मा तो हवाई जहाज री सोच गोपीलाल श्रीमाली री सै।"

हनु भाय्या को एक प्रश्न सूझा तभी तेज़ आवाज़ें आने लगीं। पुरानी सब्ज़ी मंडी से दो बैल आपस में उलझे हुये जैन मिष्ठान भंडार से होते हुये रामगोपाल रामविलास दुकान की ओर बढ़ रहे रहे थे। कमजोर कायर लोग चिल्लाते हुये भाग रहे थे। हनुमान जी के मंदिर के आगे बैठे डमजी और अन्य जड़ी बूटी रसिक वीर टस से मस न हुये। अचानक एक सांड ने दूजे को रोक दिया। उसने डमजी को झुककर नमस्ते किया। फिर दोनों वापस सींग भिड़ा कर तेलियों की गली की ओर बढ़ गए।

December 18, 2018

अजवाइन

अजवाइन एक औषधीय पादप वनस्पति है। मेरा बचपन इसकी गंध से भरा रहा है। मैं कई बार इसकी गंध से घबरा जाता था। खासकर स्त्रियों के कपड़ों से इसकी तीखी गन्ध आती थी। एक बार भूल से उनको छू लेने पर मैं बार-बार अपनी अंगुलियां सूंघता था। मुझे कभी उबकाई आने लगती थी। घर में भिन्न अवसरों पर अजवाइन की खोज होती उसे पीसा जाता था। हमारे घर में अब भी पत्थर की चाकी है। इसे घटी कहते हैं। माँ, मौसी या चाची इस पर कुछ न कुछ पीसते रहते हैं। लेकिन जब कभी इस पर ये मसाला पीस लिया जाता उसके बाद मैं उस कमरे में नहीं जाता था जहां घटी रखी रहती थी।

अजवाइन असल में रामबाण औषध कहलाने की योग्यता रखता है। किसी भी प्रकार की बीमारी अथवा स्वस्थ होने पर इसका नियमित सेवन हमारे स्वास्थ्य की बेहतरी में साथ देता है। उदर से संबंधित सभी रोगों का नाश करता है। इसके बीज माने जिसे हम अजवाइन कहते हैं उसके अलावा इसके पुष्प बहुत उपयोगी होते हैं। वे सुंदर नीले-सफ़ेद या हल्के बैंगनी-सफेद दिखते हैं। उन सूखे पुष्पों से भी अनेक औषधियां बनाई जाती हैं। लेकिन रेगिस्तान के लोगों के ग्राम्य जीवन में अजवाइन बिना लाभ हानि सोचे शामिल रहा है।

आजकल घरों में स्वास्थ्य के लिए दवाओं पर निर्भरता बढ़ गयी है लेकिन बुजर्ग औरतें इस मसाले के साथ अब भी बनी हुई हैं। कुछ एक नए ज़माने की नई माएं भी गर्व जताने को कहने लगी हैं "आज तो अजवाइन के परांठे बनाये हैं। सो हेल्दी" मैंने पहली बार हैल्दी परांठा केवल अजवाइन का ही सुना है। अजवाइन के परांठे आम बात होंगे लेकिन रेगिस्तान एक सूखी जगह है इसलिए यहां अब तक अजवाइन की हरी मोटी पत्तियां केवल ख़्वाब भर था।

खैर। मौसी अजवाइन लेकर आई हैं। माँ के साथ मिलकर इसकी धुलाई चल रही है। ख़ुशबू से आंगन महक उठा है। इसे सुखा दिया जाएगा फिर शायद इसके लड्डू बनेंगे। पता नहीं क्या बनेगा?

December 17, 2018

मोनालिसा मुस्कान का रहस्य



जिस बात पर दुनिया अभी तक अंधेरे में है उस रहस्य को केवल बाड़मेर के चुनिन्दा लोग जानते हैं। ।


बाड़मेर के रेलवे स्टेशन से बाहर आते ही आपको गांधी जी मिलेंगे। वे उसी तरफ जा रहे हैं, जिधर बल्लू भाई की भांग की दुकान है। स्टेशन रोड पर सीधे चलते हुए एक टी पॉइंट आ जाता है। गांधी जी केवल टी पॉइंट साथ चलते हैं। इस जगह से वे दायें मुड़कर बापू कॉलोनी की ओर चले जाते हैं।

टी पॉइंट के बाएँ मोड़ से शहर शुरू होता है। मोड़ पर गांधी चौक स्कूल है। उसके सामने दल्लू जी की कचौड़ी वालों की असली दुकान है। इससे आगे एक सरकारी कार्यालय, उसके सामने अंग्रेजों के ज़माने की स्कूल है। स्कूल से थोड़ा आगे गोपाल सेठ चप्पल वालों की दुकान आती है।

गोपाल सेठ ने आसमानी चप्पल बेचकर बहुत सारा सफ़ेद धन बना लिया था। इस धन के बूते सफाई महकमे की आला कमिटी के सदर बनने के चक्कर पड़ कर मेवाराम से उलझ बैठे थे। जड़ी बूटी रसिकों का मानना है कि मेवारामजी ने ही चप्पल सेठ गोपाल की सराय जैसी होटल के आगे रेलवे पुल का लक्कड़ खड़ा करवाया है।

पुल की लम्बाई मंत्री जी के घर तक खत्म हो रही थी लेकिन मेवारामजी रंढू से खींचकर पुल को स्टेडियम के मोड़ तक ले गए और गोपाल होटल को दबा दिया। इसके बाद अजमेरी अंडे वाला और होटल गोपाल की औकात बराबर हो गयी। इस परिणाम से "करोगे सेवा तो मिलेगा मेवा" कहावत निरर्थक हो गयी, चप्पल सेठ को सेवा नहीं करने पर भी मेवा मिल गया।

चप्पल सेठ की दुकान से बीस एक दुकान आगे गांधी चौक से गढ़ को जाती सड़क पर बल्लू भाई की भांग की लाइसेन्सी खानदानी दुकान आ जाती है। इस दुकान में एक बड़ा और कुछ छोटे सिलबट्टे, कुछ एक डिब्बे, स्वच्छ जल के पात्र, लाल गमछा, मीठा और नमकीन सहित ढेर सारी शांति रखी रहती है।

बल्लु की दुकान के आगे रास्ते मुख्य बाज़ार से होते हुए शहर से बाहर निकलकर गांवों की ओर जाते हैं। कुछ एक रास्ते पहाड़ी की खोह में जाकर खत्म हो जाते हैं। जबकि बल्लू भाई की दुकान पर आप प्रसाद ले लें तो रास्ता सीधा आनंदलोक को जाता है।

इसी जगह से प्रसाद लेकर हनु भाई जोशी नई नौकरी पर गए थे। हनु भाय्या कला में बारहवीं पास थे। स्कूल वाले उनके संभाषण से ऐसे प्रभावित हुये कि पहली घोट्म-घोटाई में ही रिश्ता पक्का कर बैठे। उन्होने पूछा- "क्या पढ़ाओगे?" हनु भाय्या ने गोली ले रखी थी। उन्होने कहा- "ज्ञान तो जित्ता घोटा जाये उतना ही कीमती होता है। मैं तो हर विषय का अध्ययन करता रहता हूँ। मुझे तो आप कहो। मैं तो कुछ भी पढ़ा लूँगा"

उनको साइंस की कक्षा दे दी गयी।

कक्षा में जाते ही हनु भाय्या ने जीव विज्ञान की किताब खोली। उन्होने पूछा- "सबसे होशियार बच्चा कौन है?" पूरी कक्षा ने एक लड़के की तरफ देखा। उस लड़के से नए माड़सा ने पूछा- "पौधे सजीव होते हैं कि निर्जीव" लड़के ने कहा- "सजीव" हनु भाय्या ने उसे इशारा किया और कक्षा के सामने बुला लिया।

"क्या पौधे बोल सकते हैं?

"नहीं"

"क्या पौधे चल सकते हैं?"

"नहीं"

एक चमाट लगा कर होशियार को बैठा दिया।

विद्यालय से लौटने के पश्चात शाम की गोली लेते समय हनु भाय्या ने बताया कि सबसे अच्छे प्राइवेट स्कूलों के भी हाल खराब हैं। सब बच्चे डफोल हैं। अर्धचेतन और लुघुचेतन गोलीदारों ने उनको समझाया। पौधे सजीव होते हैं।

अगले दिन हनु भाय्या तैयार होकर फिर विद्यालय। वही पाठ शुरू। उसी होशियार लड़के को खड़ा किया। पूछा "पौधे सजीव होते हैं या निर्जीव?"

लड़के ने कहा- "निर्जीव"

हनु भाय्या ने एक चमाट लगाई और लड़के को बैठा दिया।

उन्होने कक्षा को समझाया। "पौधे सांस लेते हैं। पौधे भोजन जुटाते हैं। पौधे बढ़ते हैं। इसलिए पौधे सजीव होते हैं।" सर झुकाये बैठे होशियार बच्चे पर चाक का टुकड़ा फेंका। उसने ऊपर देखा तो हनु भाय्या ने कहा- "ज़ोर से बोलो, पौधे क्या होते हैं?"

कक्षा में स्वर गूँजा "सजीईईईव"

इस सजीव और निर्जीव के कारण कोई बात हनु भाय्या के मन को कचोटने लगी। वे एक उलझन में घिर गए। स्कूल से आने के बाद उन्होने चिंताजनक चर्चा की "हम ब्राह्मण होकर कहीं ज़िंदा चीज़ों का भोग तो नहीं लगा रहे? भांग एक पौधा है और पौधे सजीव होते हैं"

सबने एक स्वर में कहा- "सूं ! कालो थियु सै?"

इसके बाद एक चुप्पी पसर गयी। इस चुप्पी में सदर बाज़ार के ऊपर खींची बिजली की तारों पर बैठे रहने वाले कबूतरों ने बीट करना स्थगित कर दिया। मंडली की चुप्पी को भंग करने के लिए डमजी भाय्या ने वैदिक-फतवा जारी किया। "भांग शाकाहारी है।"

सबके चेहरे पर आराम उतरने लगा। डमजी इस क़स्बे के आदिनागरिक गिने जाते रहे हैं। उनका प्रादुर्भाव कब हुआ और वे कहाँ मिलेंगे ये कोई नहीं जान सका। डमजी भाय्या ने आगे सौंदर्यशास्त्र सम्मत वाक्य उदबोधित किया। "भांग मनुष्य के चेहरे का आभूषण है।" अब कहीं जाकर बल्लू की दुकान के पतरे वाले छज्जे पर बैठे कबूतरों ने सांस ली।

डमजी भाय्या ने ठंडी हवा के लिए चेहरे को आसमान की ओर उठाया। तेलियों की गली से घूमकर आया गोबर भरी हवा का ताज़ा झौंका उनको भरपूर छूकर गुज़रा। उनको तरंग आई। "मोनालिसा पेंटिंग माय एवी हहातोड़ी स्यान दिखाए सै गमसे की इए रे भोंग लिधोड़ी सै"

मोनालिसा की रहस्यमय मुस्कान का राज़ है कि उसने भांग ली हुई थी। ऐसी मुस्कान और किसी औषध से नहीं आ सकती। 
* * *

#भंगेड़ीमोनालिसा #येभांगकिसकीहै #विजयाऔषधि #भांगभूंगड़ा #डफोलनशो

December 16, 2018

पीवन को भंग नहावन को गंग

बाड़मेर में भांग, बिजली के आने से बहुत पहले आ गयी थी। मान्यता ये है कि बाड़मेर आने वाले पहले आदियात्री की धोती से चिपक कर आई। मंदिरों और चौपालों के पिछवाड़े उग गयी थी।

ढाणी बाज़ार से रिस कर नीचे उतर रही संकरी पेचदार गलियाँ प्रताप जी की प्रोल पहुँचती हैं। वहाँ पहुँचते ही मोखी नंबर आठ के पास वाले और नरगासर के बकरों की गंध पीछे छूट जाती है। गायों का गोबर गली-गली की धूल से अपवित्र हुई चप्पलों और मोजड़ियों को पवित्र करने के इंतज़ार में मिलता है। यहीं जोशी जी की एक पान की दुकान है।

दिन भर से दुकान पर बैठे जोशी जी को आराम देने के लिए छोटे भाई आ गए।


"हमें जावों" इतना कहकर उन्होने दुकान की पेढ़ी की ओर टांग बढ़ाई। गल्ले के पीछे तक पहुँचने में टांग थोड़ी छोटी पड़ गयी। टांग की क्रिया-गति इतनी धीमे थी कि गिरने की जगह टांग हवा में लटकी रह गयी। उन्होने ध्यान से हवा में स्थिर टांग को देखा। टांग को थोड़ा उठाया, थोड़ा आगे बढ़ाया लेकिन अन्तरिक्ष के निर्वात में स्थिर की भारहीन वस्तु की तरह टांग फिर भी लटकी रही। दायें बाएँ देखे बिना नाप को सही किया और वे तीसरे प्रयास में दुकान में पहुँच गए।

गल्ले के पीछे आए ही थे कि ग्राहक ने कहा पान लगा दो। पाँच एक मिनट के बाद ग्राहक ने कहा- "दे दो" जोशी जी ने पूछा "सूं?"

"पान"

"कत्थो लगावो पड़से, चूनों लगावो पड़से, प्छे देऊं"

हथेली में रखा पान कब का फट चुका था। जोशी जी अपनी हथेली पर ही कत्था लगाए डंडी घुमाए जा रहे थे। बड़े भाई साब देख रहे थे। हथेली पर कत्था रगड़ रही डंडी रुक गयी। उन्होने बड़े भाई साब को पूछा "वैगा आया?"

पाँच मिनट से वहीं खड़े हुये भाई साब ने कहा- "बारे आवो"

छोटे जोशी जी ने पान रखी बाल्टी से पानी लेकर अपना कत्थे वाला हाथ धोया और बाहर गए। बाहर आकर कहा- "जाऊ सूं।"

दस कदम दूर चलते ही एक नाली आ गयी। छोटे जोशी जी ने पाँवों के ब्रेक किए। झुककर नाली के आकार का निगाहों से नाप लिया। वे दो कदम पीछे आए और एक लंबी छलांग लगाकर पानी के ऊपर से कूद गए। छह इंच चौड़ाई वाली नाली पीछे छूट गयी और वे जोशियों के ऊपरले वास की ओर बढ़ गए।
* * *

भांग हमारे जीवन को बढ़ा देती है। एक-एक पल एक-एक घंटे जितना लंबा हो जाता है। विजया नामक इस औषधि से दीर्घायु होना केवल कल्पना मात्र नहीं है। ये अनुभूत सत्य है। भांग क्रिया में स्थिरता लाती है।

आज सुबह ही हेमंत के पान के गल्ले पर खड़े पंडित जी ने कहा- "भाई साब भांग का उल्लेख तो शास्त्रों में भी मिलता है। राम और लक्ष्मण ने भी मिलकर घोटी थी। वही बूटी लेकर हनुमान जी समुद्र लांघ गए थे।

इसके बाद उन्होने ये रचना प्रस्तुत की।

पीवन को भंग नहावन को गंग ओढ़न को दुशाला
हे दीनदयाल दे कोई मृगनयनी या देना मृगछाला।

ओ मेरे दीनदयाल इतनी विनती है कि पीने के लिए भांग देना, नहाने को गंगा का पानी, ओढ़ने को दुशाला देना। एक बड़ी सुंदर आँखों वाली भार्या देना और ये न दे सको तो मृग छाल दे देना ताकि साधू बनकर उसे ओढ़ बिछा सकें। 
* * *

इस गूढ ज्ञान को प्राप्त करके मैंने जिज्ञासा से पूछा- "प्रधानमंत्री जन औषधि योजना में इसे शामिल किया गया है या नहीं?" पंडित जी ने ठहरी हुई आँखों से मुझे देखा। वे अनर्थ या अवश्यम्भावी में से एक शब्द का उच्चारण करने को ही थे कि चाय आ गयी। 
* * *

December 15, 2018

रेगिस्तान के विद्यालयों शौचालय

मेरे पास एक माइक्रोफोन और एक छोटा रिकॉर्डर था। विद्यालय में प्रवेश करते ही मेरी नज़र इसी तरफ गयी। मैंने अपने साथ चल रहे गुरुजी से पूछा कि क्या मैं ये टॉयलेट्स देख सकता हूँ। वे बोले "अरे ज़रूर देखिए।" विद्यालय के मुख्य द्वार से हम उसी ओर चल पड़े। रेगिस्तान के बीच किसी विद्यालय में इतने सुंदर दिखने वाले और स्वच्छ शौचालय मेरे लिए आकर्षण का कारण होने से अधिक प्रसन्नता का विषय थे।

ये छह शौचालय हैं। फाइबर से बने हुए हैं इसलिए इनकी उम्र काफी होने की आशा की जा सकती है। इनको इतना ऊंचा इसलिए बनाया गया कि इस ऊंचाई के नीचे पीछे वेस्ट के लिए पिट बने हैं। उनमें एक विशेष प्रकार का सूखा रासायनिक मिश्रण डाला हुआ है जो विष्ठा को गंध रहित खाद में बदल देता है। फाइबर बॉडी के ऊपर जो लाल रंग की पट्टी दिख रही है, वह असल में वाटर टैंक है। शौचालय का उपयोग करने के बाद फ्लश किया जा सकता है। एक फ्लश में इतना कम पानी खर्च होता है कि एक टॉयलेट का वाटर स्टोरेज तीन दिन तक चल जाता है।

मैंने गुरुजी से पूछा कि क्या विद्यालय की लड़कियां इनका उपयोग कर रही हैं। उन्होंने कहा- "लड़कियों के लिए सचमुच ये कष्टप्रद ही था कि वे कच्चे टॉयलेट्स में नहीं जाने के कारण घर लौटकर ही लघुशंका आदि से निवृत होती थी। लेकिन अब स्कूल की सब लड़कियां इनका बिना झिझक के उपयोग करती हैं।"

रेगिस्तान के सब विद्यालयों में अभी तक शौचालय की व्यवस्था नहीं है। शिक्षिकाएं विद्यालय भवन की चारदीवारी के उस कोने तक जाती हैं जहां बबूल आदि झाड़ियां खड़ी हैं। वे दो तीन एक साथ जाती हैं। एक जब लघुशंका के लिए जाए तो दूजी मुंह फेरकर चौकीदारी करती हैं। विद्यालय की बालिकाएं भी कम ओ बेश इसी तरह नैसर्गिक आवश्यकताएँ पूरी करती हैं। ऐसे में इस विद्यालय में बने इन शौचालयों ने मुझे प्रसन्नता से भर दिया। 
* * *

December 13, 2018

हमारा क्या होगा?

पहाड़ की ऊंची चोटी पर एक मंदिर था। वहाँ से नीचे पाँच सौ मीटर का रास्ता तय करना था। जब हम ऊपर गए थे तब उसे जाने क्या हो गया था। वह कुलांचें भरते हुए पत्थरों की ओट में बढ़ती गयी। उसे इस बात की परवाह न थी कि वह अकेली है। मैं पीछे छूट गया हूँ। बाइस की उम्र ऐसी भी नहीं होती कि बचपना जाग उठे।

जब मैं ऊपर पहुंचा तब वह एक अधेड़ पुजारी से बात कर रही थी। मुझे देखकर चहक कर बोली "ये चमत्कारी जगह है, देखो बाबा ने मुझे पहचान लिया" मैं पल दो पल निर्विकार रहा तब तक उसने आगे कहा "सचमुच ये बड़ी बात है। किसी लड़की के चेहरे पर थोड़े ही लिखा होता है कि उसके पिता आर्मी ऑफिसर है" वह मंदिर के चारों ओर पत्थर की दीवार को छूते हुए परिक्रमा करने लगी। जब चक्कर पूरा हुआ तब मैंने कहा- "चलें"

उसने मंदिर के चारों ओर बनी रेलिंग को पकड़कर एक दो बार नीचे ज़मीन की ओर झाँका। हम उतरने लगे। इस बार वह तेज़ नहीं उतर रही थी। बल्कि हाथ थामकर आहिस्ता साथ चल रही थी। "हमारा क्या होगा?" पहाड़ की ढलान उतरते हुए उसने पूछा। मैंने कहा- "हम बहुत जल्द सब भूल जाएंगे" उसने शंकित निगाहें मेरे चेहरे पर जमा दी और ठहर गयी। "इसका क्या मतलब है?" मैंने उसके हाथ को खींचा और हम नीचे की ओर चलने लगे। "ये एक अच्छी न लगने वाली बात है मगर क्या करें?" वह दो कदम चली और रुक गयी। उसने एक बड़े पत्थर से अपना सर टिका लिया। उसने मेरा हाथ खींचा। मैंने कहा- "क्या सर फोड़ना है?" उसने कहा- "नहीं। देखो इतनी धूप में भी ये पत्थर ठंडा है।" वह मुस्कुरा रही थी।
* * *

December 11, 2018

चुनावी टिप्पणी - अशिक्षित असभ्य समाज



देश के कुल बजट में शिक्षा का बजट केवल ढाई प्रतिशत है। वर्ष दो हज़ार अट्ठारह-उन्नीस के लिए शिक्षा को इक्यासी हज़ार करोड़ रुपये मिले हैं। ये ऊंट के मुंह में जीरा भी नहीं है। मैं समझता हूँ कि देश चलाने के लिए भिन्न महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं लेकिन एक सुशिक्षित समाज का निर्माण ही किसी देश का प्राथमिक लक्ष्य होना चाहिए। एक अफसोस ये भी है कि देश की कुल स्कूली शिक्षा में से तीस प्रतिशत निजी शिक्षा ने हथिया लिया है। इनका कुल बजट माने इन निजी शिक्षण संस्थानों द्वारा की जाने वाली लूट भी इतने ही हज़ार करोड़ की हो चुकी है। ये एक विडम्बना है।

शिक्षा को लेकर मेरी चिंता आज अचानक इसलिए फिर से पेशानी पर उभरी है कि आज कुछ राज्यों से चुनाव परिणाम आये हैं। मेरी फेसबुक मित्र सूची के आम और खास लगभग सभी अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं। इनकी प्रतिक्रिया की भाषा अशिक्षित, द्वेषपूर्ण, कुंठित और निम्न स्तरीय व्यक्ति होने का बोध करा रही है। नेताओं से भारतीय समाज कोई अपेक्षा नहीं करता है, ये दुखद है। लेकिन पत्रकार, शिक्षक और विद्यार्थी भी उन्हीं की भाषा के पदचिन्हों पर चल रहे हैं।

अंत में वे जो प्रगतिशील लोग थे वे कब के हार चुके हैं। इसलिए कि उनको सामने वालों ने अपने जैसा बना लिया है। मजाक बनाओ, भद्द पीटो, झूठ की कालिख फैलाओ जैसे कामों में लगा दिया है।

आप अपने घर को बंकर बनाना चाहते हैं या आपकी चाहना है कि आपके बच्चे मजबूत, विद्वान और कर्मयोगी बनें। इसका उत्तर आपको पता है।

मुझे मेरी चाहना पता है इसलिए नई सरकार जो बने उससे मेरी पहली मांग है कि राज्य में शिक्षा का बजट दो गुना करे। और जो नई सरकारें आएं वे इसे चौगुना कर दें। मुझे शालीन, सभ्य, विद्वतापूर्ण एवं मृदुभाषी लोग बहुत पसन्द है।

पसन्द अपनी-अपनी, मांग अपनी-अपनी।
* * *
India’s quality of ECCE lags behind the rest of the world, ranking last among 45 countries in the Economist Intelligence Unit’s 2012 survey of ECCE quality.
Picture of classroom and statement regarding ECCE rank - Courtesy ~ Mint, Nov. 4, 2018


December 9, 2018

हो तो फिर

नदी में ठहरी रहे कोई नाव
पोखर के पानी पर पड़ा हो सूखा पत्ता
रेत के धोरे पर हो सोनल घास का बूंठा
तब ही सुंदर लगता है किसी का इतना बड़ा होना।


दिल पर भी होना चाहिए कोई ज़ख्म।
* * *


December 5, 2018

मैं अपनी एक बेहद झूठी तस्वीर हूँ



लगता है ऐसा कभी कभी
जैसे कि शाम ढल गयी।

हर दिन मैं एक नए मन के साथ जागता हूँ। मैं बहुत कुछ भूल चुका होता हूँ। अपनी ही लिखावट को पढ़कर याद नहीं कर पाता कि ये किसके लिए लिखा था। मेरी लिखावट में किसी का नाम नहीं होता। इससे भी अधिक मुश्किल की बात ये है कि अक्सर लिखावट में किरदार इतने गहरे और सुंदर लिखता हूँ जितना मैंने उनको सुंदर होना चाहा था। ऐसे किरदार दोबारा सच में कभी खोजे नहीं जा सकते।

तस्वीरें इसके उलट एक खाका अपने साथ लिए बैठी रहती हैं। जैसे अभी-अभी ही उस कॉफी टेबल से उठ कर आया हूँ। लेकिन एक दिक्कत है कि तसवीरों में भी किरदार छुपाए जा सकते हैं। हम बाद अरसे के हमारी मुस्कान और दुख को नए अर्थों में पढ़ पाते हैं।

ये सच है कि लिखावट झूठ से भरी होती है। तस्वीरें झूठी नहीं होती ऐसा नहीं है लेकिन वे इसलिए बच निकलती हैं कि वे कभी कुछ कहती नहीं। केवल देखने वाला ही उनको पढ़ता है।

मैं अपनी एक बेहद झूठी तस्वीर हूँ।

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.