September 28, 2019

अवसाद एक अजगर है

मैं एक बार गिर गया था। ऐसे गिरा होता कि लोग देख पाते तो शायद वे मुझे उठाने दौड़ पड़ते। मैं सीधा खड़ा हुआ था। मेरी चोट नुमाया न थी। ये गिर पड़ना कुछ ऐसा था कि रेत की मूरत झरकर ज़मीन पर पसर गयी है। एक अक्स लोगों की निगाह में बचा रह गया था। जिसे वे देख रहे थे लेकिन वे जान नहीं रहे थे कि अक्स मिट चुका है।

मैंने हेमन्त से कहा- "क्या करूँ?" बाड़मेर के ताज़ा उजड़े बस स्टैंड की खाली पड़ी शेड के नीचे बनी बैठक पर हम दोनों बैठे हुए थे। वो उम्र में मुझसे काफी छोटा है, अनुभवों और दुनियादारी की समझ में बहुत बड़ा है।


उसने कहा- "आपको लगता है कि ख़त्म हो गया है।" मैंने कहा- "हाँ" उसने अगला सवाल पूछा- "ज़िन्दगी में कितने दुःख उठाना चाहते हैं?" मैंने कहा- "कितने भी मगर ये नहीं"

"अब मुड़कर न देखना। इस ख़त्म को आख़िरी खत्म रखना। एक बार के गिरने का बार-बार गिरना हताश करता है। इसे छोड़ दीजिए"

मैं रेत की तरह ख़ुद के पैरों में पड़ा था। मैं अपना नाम, काम, पहचान और जीवन एक किनारे करके खड़ा हुआ था। जहां मैंने चाहा था कि इसके बाद कुछ नहीं चाहिए। वहीं पर धूल उड़ रही थी।

बरसों बाद आज फिर मैं वहीं बैठा था। हेमन्त से मैंने कहा- "मैं सोशल साइट्स के लिए ठीक आदमी नहीं हूँ। मैं लोगों को उकसाता हूँ। मैं उनकी ठहरी हुई कामनाओं में पलीता लगाता हूँ। ये सब करते हुए मैं स्पोइल हो जाऊंगा"

हेमन्त उस शेड की ओर देख रहा था। जहां कुछ बरस पहले हम दोनों एक तपती दोपहर में बैठे थे। मुझे नहीं पता कि उस तरफ देखना हेमन्त का उसी दिन को याद करना था या बेवजह एक ठहरी हुई निगाह थी।

हेमन्त ने कहा- "छोड़ दीजिए। वे जिनको आप दुःख महसूस करते हैं, उनसे क्यों जुड़े रहते हैं? आपको कितने सारे काम हैं। सुबह से रात हम एक साथ होते हैं तब ये समझ आता कि सब कुछ ओवर बर्डन सा है। आप अपने बोझ उतारिये।"

"क्या ये सब डीएक्टिवेट कर दूं। क्या लॉगआउट करके छोड़ दूं।"

हेमन्त जानता है कि दुनिया वह नहीं रही। अब हम उतने ही बचे हैं जितने सोशल साइट्स पर दिखते हैं। "आपकी किताबें और पाठक? ये भी तो एक काम है। जो काम की तरह नहीं दिखता"

मैंने कहा- "लॉगआउट करके छोड़ देते हैं। अवसाद एक अजगर है। वह आपको तब तक नहीं छोड़ता जब तक कि आपका दम घुट न जाए। इसके बाद वह आपको पूरी तरह निगलता है।"

मेरे चेहरे पर वही धूल उड़ उड़कर गिर रही थी। वह धूल जो कुछ बरस पहले मेरे बिखरने से बनी थी।

September 16, 2019

बातों के ठिकाने



जो साथ नहीं हो पाए, उनके पास बचाकर रखी चिट्ठियां थी, रिकॉर्डेड कॉल्स थे। जो साथ हुए उनके पास अधनंगी तस्वीरें थी, चूमने के स्मृति थी, बदन पर उतरे निशानों के पते थे, आधी नींद में सटे पड़े रहने की याद थी।

जो कुछ भी जिस किसी ने बचा रखा था, वह केवल सुख या दुख न था। वह लालच और प्रतिशोध भी था।

इस दौर के आदमी के पास बस यही बचा है। इसे वह मिटाना नहीं चाहता। इसे वह बार-बार टटोलता है। जिस तरह बिल्ली अपने बच्चों की जगह बदलती है वैसे ही ऐसी यादों और बातों के ठिकाने बदलता रहा है।
* * *


मैं चलता था। चलते हुए एक इच्छा करता था। मैं जिधर से गुज़र रहा होऊँ, उधर से मेरा गुज़रना मिटता जाए। मैं लिखूं और मेरा लिखा मेरी याद से मिटता जाए। मैं चूम रहा होऊं और चूमने के निशान किसी आत्मा पर न पड़ें।

खिड़की से पर्दे हटाये। रजाई से बाहर निकला उसका आधा मुंह देखा। उसकी बन्द आंखें देखी। खिड़की के पास खड़े हुए सोचा कि रात और दिन हम क्या चाहते हैं? क्यों हम चाहना की राख से भरे हुए मंद दहकते रहते हैं। क्या दिमाग में हवस ही भरी है। क्या हम कभी इससे बाहर आ सकते हैं। क्या हम बाहर आना चाहते हैं?

अंगुलियां तपिश महसूस करती है। सिगरेट राख हो चुकी होती है। शायद ज़िन्दगी भी इसी तरह लगभग खत्म है जबकि वह ख़त्म होती दिख नहीं रही।
* * *

तुम्हारे पास क्या है? चिट्ठियां, बातें, तस्वीरें, पते या मेरी तरह केवल चाहना और हवस। हालांकि मेरे पास ये है, इसका भी मुझे सन्देह है।
* * *

September 14, 2019

किसी लालच में

इस तरह ठहर कर किसी तस्वीर को न देखा था। अचानक वही तस्वीर फिर सामने थी। उसे फिर देखा। इस तरह दोबारा देखते हुए चौंक आई कि इसे क्यों देखा जा रहा है।

यूँ उस तस्वीर को देखने की हज़ार वजहें हो सकती हैं। उन हज़ारों वजहों से आप बच निकल सकते हैं। अपने आप से कैसे बचें, ये जुगत कठिन हो जाती है।

उस में क्या है। तुम क्या देखना चाहते हो। देखकर क्या पाओगे। बेहद होने के मुकाम तक पहुंच कर किस ओर मुड़ोगे। ऐसे सवाल बुलबुलों की तरह उठते हैं मगर वेगवती लहरें उनको बुझाती जाती हैं।

तस्वीर वहीं है। आंखों के सामने।

उसके चेहरे पर एक शांति है मगर लगता है कि अफ़सोस है। इस बात का अफ़सोस कि उसने किसी लालच में कोई बात कही थी। उसके मुड़े हुए घुटने पर एक विनम्र स्वीकारोक्ति रखी है कि तुम्हारा होना एक चाहना था। उसके कंधों पर उकेरे फूलों में शालीनता है कि वे एक दूजे पर गिर नहीं रहे। उसकी आंखें, इस बारे में कुछ नहीं कहना कि उन आंखों के बारे में कभी कुछ मत सोचो, जिनमें झूठ बोलते वक़्त भी कनमुनि तरलता थी। हालांकि तब उन आंखों में एक स्याह उदासी थी, जब उसके होठ मुस्कुरा रहे थे।

असल में ये सब एकतरफा सोचना है तस्वीर देखते हुए। उसके ज़ेहन में ये सब नहीं है। ये शायद किसी लम्बी उकताहट के बाद की तस्वीर है। इसमें उसे अपने उन दिनों की तलब है, जो किसी उम्मीद में गवां दिए थे। या शायद ये भी नहीं है। एक सुंदर तस्वीर समझ कर रख दी गयी तस्वीर भर है।
* * *

प्रेम के बारे में कहा गया एक झूठ अक्सर बहुत सी उम्मीदों का बीज होता है। ऐसा बीज जो बार-बार अंकुरित होता है।
* * *

September 10, 2019

हमें बिछड़ना चाहिए

जब उदास बात आई। उस क्षण अचानक बेचैनी न आई थी। केवल इतना महसूस हुआ कि समय की चाल थोड़ी धीमे हो गयी है। जीवन के प्रवाह में बहे जा रहे थे मगर नदी के रास्ते की किसी किनार पर पत्ते की तरह अटक गए।

जब कभी इस तरह अचानक ठहर आती है। हम अपने क़रीब आ जाते हैं। हम उस चेहरे को पढ़ने लगते हैं। बरसों साथ रहने के बाद भी ठीक से पहली बार देखते हैं।

इस देखने में याद आता है कि जब उसे पहली बार देखा और चाहना जगी थी, तब भी उसे इतना गौर से न देखा था। उसके साथ रहे। चेहरे से चेहरा सटा रहा। घंटों बतियाते रहे। बाहों में खोये रहे तब भी इस तरह उसे न देख पाए थे।

एक उदास बात हमें ख़ुद के कितना क़रीब कर देती है।

जब हम साथ होने जैसे न बचे तब मिले। वह मुलाक़ात आख़िरी मुलाक़ात होगी ये दोनों को मालूम न था। केवल मैं जानता था। इसलिए कि प्रेम में असीम हो जाने के साथ-साथ अक्सर बेहद लघु हो जाना पड़ता है। असीमता के भावावेश में अक्सर नाव उलट जाती है।

हम उससे प्रेम करते हैं मगर जीना चाहते हैं। उस समय हम उसके बारे में बेहद बुरा सोच रहे होते हैं। उन कारणों को कभी भुलाना और मिटाना नहीं चाहते, जिनके कारण हमारे पास दुःख आया।

लेकिन टूटन के बीच जब आप जीना चुनते है। किसी के बेहद पास रहने की चाहना वाला मन, एकान्त चुनता है। उस पल ये भी चुनाव हो जाता है कि हम एक रोज़ सब माफ़ कर देंगे। या अपने आप माफ हो जाएगा।

उदासी के लम्हों में मैंने अकसर किताबों से धूल झाड़ी। अपनी अलमारी को देखा। उसमें बहुत सी ऐसी चीजें पाई जिनको इन दिनों भूल गया था। मुझे याद आया कि मैं कुछ और भी था। मैं केवल उतना भर न था। फिर भी हर वो बात जो कभी हमारे साथ थी और बिछड़ गयी चुभती तो है ही।

एक रोज़ कहीं किसी जगह किसी पल अचानक वही चेहरा याद आता है। मैं पाता हूँ कि सबसे अधिक गहराई से मैंने उसे उसी पल देखा था, जिस पल हम बिछड़ रहे थे। वह उदासी मेरे मन में उसका सबसे अधिक ठहरा हुआ चित्र छोड़ गयी है।

कभी न कभी, किसी न किसी से हमें बिछड़ना चाहिए कि फिर कभी हम जिसके साथ हों उसे खुशी में उतनी ही गहराई से देख सकें।

September 4, 2019

नुई बात नव दिन

ऊंट बस का नाम सुना है। कभी देखा है। कभी व्हाट्स एप फॉरवर्ड, जाति के प्रदर्शन, धर्म की अंधभक्ति से बाहर झांका है?

भारत में नया मोटर व्हीकल एक्ट लागू हो गया है। जिस चालान की ख़बर ने इंटरनेट को हथिया लिया है, वह कोई मसखरी सी लगती है।

हम इस एक्ट को कोस रहे हैं। हमको यही आता है, कोसो और भूल जाओ। हम कुछ दिन बाद इसके अभ्यस्त हो जाएंगे। जिसके पास कार है। जो अस्सी रुपये के आस पास कीमत वाला पेट्रोल भरवाता है। वह दो चार हज़ार में जुर्माने का सौदा पटा भी सकता है। कोई बहुत महंगी बात नहीं है।

कुछ बरस पहले ट्रैफिक में कोड चला करते थे। अपनों के लिये और अघोषित जुर्माना भर चुके लोगों के लिए। जैसे आपके पास हैलमेट नहीं था। आपको ट्रैफिक अनुशासन की पालना करवाने वालों ने रोक लिया। आपने अपने भारतीय कॉपीराइट वाले हुनर से जुर्माना भर दिया। अब आपकी यात्रा तो समाप्त न हुई। अगले चौराहे पर रोके जाओगे। तब दोबारा जुर्माना न भरना पड़ेगा। आप पहले जुर्माने के साथ एक कोड पाएंगे। कोकाकोला, फेंटा, पारले जी, ओके, टाटा या बाय बाय। ये कोड अगले सर्कल पर बताते ही आप के जुर्माना भरे जाने की पुष्टि हो जाएगी। आप द्रुत गति से गंतव्य को बढ़ जाएंगे।

कालांतर में ये व्यवस्था किन्ही कारणों से चरमरा गई।

अब क्या व्यवस्था है ये मुझे मालूम नहीं। हज़ारों रुपयों के चालान की ख़बर सुनकर आपके होश फाख्ता हो जाएं तो क्या अचरज की बात है। मेरे भी होश फाख्ता हैं।

भारत में मोटर व्हीकल एक्ट की आड़ में अनगिनत हत्याएं हुई। उनकी सज़ा केवल लापरवाही से वाहन चलाने तक की रही। सड़क दुर्घटना के नाम पर हत्या एक ऐसा विषय रहा जिसपर सरकारें, न्यायालय और समाज बेहद चिंतित रहे हैं। क्या इसके लिए कठोर कानून की आवश्यकता नहीं है? है।

लेकिन कोई भी बात इकहरी नहीं हो सकती। अगर आप आँख फूटने के डर से बच्चे को गिल्ली डंडा नहीं खेलने देना चाहते हैं तो आपकी ज़िम्मेदारी है कि उसे खेल की दूजी सामग्री उपलब्ध कराएं। उसके लिए फुटबॉल लाकर रखें और गिल्ली डंडा खेलते पाए जाने पर कठोर कार्रवाही करें।

कुछ गोबर के पिण्डारे आज इस कानून की खिल्ली उड़ा रहे लोगों को विदेशों के सख्त कानून की दुहाई दे रहे थे। मैंने ऐसे लोगों को ये भाषण करते हुए भी देखा है कि अमेरिका में बकरियां एक साथ झुंड में चिपक कर बैठती है। अमेरिका और यूरोप में लोग सवेरे जाग कर जॉगिंग को जाते हैं। हमारे यहां के लोग आलसी और देशद्रोही हैं। वे ख़ुद को फिट नहीं रखते।

जहां अधिक ठंड है, वहीं चिपक कर बैठा जा सकता है। जहां गर्मी है, वहां सबको दूर दूर बैठना पड़ता है। जहां ठंड आपके बदन को जकड़ लेती है, वहां आपको अपने बदन में हरकत करनी होती है।

भारत में गर्मी ही होती है। इसलिए आदमी के पास काम करने को केवल दो तीन घण्टे सुबह और एक दो घण्टा शाम का समय होता है। मौसम आपको काम करने की अनुमति नहीं देता। आप हैं कि ठंडे प्रदेशों के लोगों की नक़ल करना चाहते हैं।

भाई भारत में हो तो सुबह उठकर ज़रूरी काम करो। दोपहर आराम करो। शाम को बचे काम पूरे करो। यही सम्भव है।

जब बेहद नुकसान होता है तब नए एक्ट लाये जाते हैं। अमरीका में भी छियासठ में नया मोटर कानून लाया गया था। वजह थी कि गाड़ियां बेलगाम बढ़ी और दुर्घटनाओं से मृत्यु आसमान को छूने लगी।

इस पर लाये गए एक्ट में सड़कों के अंधे मोड़, सड़कों का घर्षण, गाड़ियों की स्थिति और सुचारू परिवहन के लिए अलग लेन पर कड़ा काम किया गया। जितनी ज़िम्मेदारी ड्राइवर की रखी उससे अधिक सड़क निर्माण और यातायात सुरक्षा पर रखी गयी।

चालीस साल पुराने एक्ट में संशोधन करने से चार साल में ही उत्साही परिणाम मिल गए थे। मृत्युदर अविश्वसनीय रूप से कम हुई। सड़क हादसे घट गए। मोटर व्हीकल एक्ट ने सफ़र सुरक्षित बना दिया।

ये कैसे सम्भव हुआ? सड़क रखरखाव और भ्रष्टाचार रहित यातायात प्रबंधन से, केवल इससे नहीं कि कानून बन गया है।

कल एक कलाकार सड़क पर बने गड्ढों पर मूनवॉक कर रहा था। आप जानते हैं न कि चाँद पर जाए बिना मूनवॉक का हुनर हर हिंदुस्तानी के पास है। फिर क्यों अचानक आपको हंसी आए। हम सब जन्मजात मूनवॉकर हैं। हमारी ये योग्यता देश की सत्ता की अविराम नाकामी के कारण है।

देश तीन तरह के होते हैं। एक पूंजीवादी, दूजे साम्यवादी तीजे धार्मिक। सबके अपने अपने दुख हैं। पूंजीवादी देश के मोटर व्हीकल कानून के बारे में दो बातें आपको बताई है। एक बात साम्यवादी देश की बता देता हूँ।

क्यूबा में निजी कारें अमेरिका की उतरी हुई कारें हैं। जो कार अमेरिका में कबाड़ हुई वही क्यूबा के धनी के गले का हार हुई। इसलिए कि क्यूबा की सरकार ने निजी ऐश्वर्य के लिए कुछ न किया। उसने जो बनाया वह सार्वजनिक बनाया। क्यूबा में ही कैमल बसें चलती रही हैं। ये गांव और शहरों में समान रूप से चलती हैं।

क्यूबा में दुर्घटनाओं की रोक के लिए सरकारी यातायात संसाधन बढ़ाये गए। भारत में ऊंट द्वारा खींचे जाने वाली बसों की तरह पिचके कूबड़ वाली बसें क्यूबा में हर जगह चलती हैं। हालांकि उनमें ऊंट की जगह डीजल इंजन का उपयोग है।

धार्मिक देशों में मोटर व्हीकल एक्ट का लगभग ये हाल है कि अल्लाह मेहरबान तो गधा पहलवान। जो निकल गया सो निकल गया। जो बख़्शा गया सो माफ़।

हम चौथे क़िस्म के देश हैं। नुई बात नव दिन खोंची तोणी तेरह दिन।

सख़्त कानून और अलभ्य सुविधाएं एक त्रासद मसखरी है। इस पर कोई सवाल करना अपराध है। सरकार से पहले गोबर के पिण्डारे कार्रवाही के लिए तैयार हैं।

आपको पता है? कोई साधारण व्यक्ति पार्किंग के लिए जगह खोजता परेशान नहीं होना चाहता है। कोई गरीब आदमी किसी ऋण से वाहन नहीं उठाना चाहता। कोई भी व्यक्ति ऐसा नही चाहता कि आने जाने की सुविधा होने बाद भी निजी ऐश्वर्य के प्रदर्शन में लाखों खर्च करे।

असल बीमारी कुछ और है, दवा कोई और की जा रही है।

कैमल बस को इंटरनेट पर सर्च करेंगे तो आपको लिखा मिलेगा। भारत अद्भुत आविष्कारकों का देश है। सच क्या है ये आप ख़ुद सोचना।

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.