May 29, 2020

दो सूखे पत्ते नम मिट्टी में

एक रोज़ कोई कोंपल खिली जैसे नज़र फेरते ही किसी ने बटुआ पार कर लिया हो।

एक रोज़ उससे मिला। फिर उससे ऐसे बिछड़ा जैसे खाली बटुए को किसी ने उदासी में छोड़ दिया। एक रोज़ मालूम हुआ कि बटुआ नहीं चाहिए था, उसी को चुराना था, जिसका बटुआ था।
एक रोज़ कोई पत्ता दूजे पत्ते के पास इतनी शांति और चुप्पी के साथ गिरा कि आंखें हैरत से भर गई।
मैं अक्सर सोचता हूँ कि हम दो सूखे पत्ते नम मिट्टी में दबे पड़े हैं। हम कभी-कभी मिट्टी से बाहर झांकते हैं और मौसम देखकर दोबारा एक साथ दुबक जाते हैं।
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May 25, 2020

तुम्हारे इंतज़ार में - 2


कमलदल से भरे
तालाब के किनारे बैठी नायिका
सहसा लजा गई।
कि हवा के चूमने से
फूल लरज़ कर सहम गया।
अभी-अभी देखा एक चुम्बन
जड़ों तक उतर गया
जैसे कभी-कभी न मिल पाने की बेकसी
आत्मा तक उतरती है।
______
कुछ तस्वीरें बेसबब, कुछ ख़त उसके नाम।
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May 17, 2020

उसके बिछड़ने की बात

 उदास सन्नाटे में

अचानक आई याद की तरह
दोपहर पर उतरती
किसी पुरानी सांझ की तरह।
वो जो मिला नहीं, उसके बिछड़ने की बात।
कैसा मौसम था, याद नहीं रहा। ज़रा ठंडी हवा थी। ज़रा से ज़रा सी ज़्यादा एक बात थी। जिस हाथ ने उसके हाथ को छुआ था, उसी हाथ को कुछ देर देखता रहा।
उसके साथ होने से अचानक तन्हा हो जाने पर तलब जागी। एक गहरी हूक सी तलब। गले के सूखेपन से टकराकर उसके नाम का पहला अक्षर गले में ही ठिठक गया।
सड़क पर भीड़ थी लेकिन जाने क्यों लगा कि सबकुछ वही बुहार कर अपने साथ ले गया, एक वह पीछे छूट गया है।
ऑटो वाले कहीं पहुंचा देना चाहते थे लेकिन उसे जहां जाना था, वह रास्ता उसने पूछा न था। इसलिए वह आवाज़ों को अनसुना करते हुए आगे बढ़ गया।
बेरिकेड्स से थोड़ा आगे महानगर की चौड़ी सड़क के किनारे खड़े सब लोग कहीं पहुंच जाना चाहते थे। वह कहां जा सकता था? इसलिए एक खोखे की ओर बढ़ गया।
अल्ट्रा माइल्ड है? खोखे वाला ज़रा सा नीचे झुका। उसने एक सिगरेट आगे बढ़ा दी। एक और कहते हुए तीली सुलगा ली। वह खुद को याद दिलाता रहा कि तीली को फेंक भी देना है। अंदर बाहर हर जगह एक दाह से भर जाना अच्छा नहीं है।
कहीं दूर से आवाज़ें आने लगी। खोखे वाले ने बाहर लटकी तम्बाकू की पन्नियां समेटनी शुरू की। आस पास खड़े लोग सिगरेट्स लेकर बिखर गए।
वह एक पत्थर पर बैठ गया था। सिगरेट की ओर दो एक बार देखा। सोचा कि ये बुझ जाए इससे पहले दूजी जला ले। वह मुस्कुराया कि अभी तो उसने कहा था "ख़ुश होने पर भी सिगरेट की तलब हो सकती है।"
क्या वह फ़ोन करके कह दे कि तुम्हारी याद आ रही है। धुएं को पास से गुज़री एक तेज़ रफ़्तार गाड़ी ने बेतरतीब कर दिया। बेतरतीबी में ये नई बेतरतीबी ऐसी थी कि उसने फ़ोन जेब में रख लिया।
ख़ुशी थी कि उदासी मालूम नहीं।
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May 15, 2020

रोटी एक पहिया हो गयी है


पीछे क्या छूटा
कि जाना कहाँ है।
एक भूला हुआ आदमी
ख़ुद से पूछता है।
* * *
सूखे पत्तों के बीच
सरसराहट की तरह
एक डर दौड़ा आता है
कि रोटी एक पहिया हो गयी है
ढलान में दूर भागी चली जाती है।
* * *
उसकी अंगुलियां रेत पर
गोल-गोल क्या उकेरे जाती थी।
कि आकाश में
एक पूरा चाँद कांपता रहता था।
* * *
दुःख जिन दुःखों को छोड़कर
चले आए थे
आज उन्हीं दुःखों तक लौट रहे हैं।
एक पागल वहीं पड़ा है
बुझी हुई तीलियों को
माचिस की खाली डिबिया में डालता।
* * *
तुमने किसी को देखा है
दुःख उठाकर
अपने पुराने दुःख तक लौटते हुए।
एक आदमी
ये सवाल करता है या उत्तर देता है
नहीं मालूम।
* * *
उसकी उदास आंखों ने कहा
कि लाख करम फूटे मगर।
मगर तुम जिस दुनिया में पैदल चल रहे हो
वह दुनिया तुम्हारे लिए अजनबी न हो जाए।
* * *
मैं चाहता हूँ
कि हमारे प्यार के बारे में
लिखता ही रहूँ।
मगर सड़क पर चलते
ख़ानाबदोश हुए मासूम बच्चों की
याद से सिहर कर चुप हो जाता हूँ।
* * *
इस सबके बीच भी
कभी-कभी मुझे लगता है
कि सब ठीक हो गया है।
मैं तुम्हारे मिलने के वादे के इंतज़ार में खड़ा हूँ
और तुम सचमुच मेरी ओर चले आ रहे हो।
* * *
छायाकार - मानविका।
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May 13, 2020

घर कितने दूर हो गए हैं


मैं अपनी हंसती हुई एक तस्वीर पोस्ट करके ग़मज़दा हो जाता हूँ। चलचित्र की भांति सैंकड़ों तस्वीरें मेरे सामने से गुज़रने लगती हैं। मैं अपनी तस्वीर पर शर्मिंदा होने लगता हूँ।
प्रसव के घण्टे भर बाद मीलों पैदल चलती माँ की तस्वीर। लँगड़ा कर चलते-चलते बैठ गए बच्चे की तस्वीर। उदासी और क्षोभ से भरे युवाओं के गले से रिसती आवाज़ों की तस्वीर। सड़क किनारे मोबाइल पर बात करते रोते हुए अधेड़ की तस्वीर। मुंबई से चलकर अयोध्या जाते तीन दृष्टिहीन वरिष्ठ नागरिकों की तस्वीर। घर लौटते हुए सायकिल सहित सड़क पर कुचल गए आदमी की तस्वीर।
तस्वीरों का चलचित्र भयावह है। मैं बेचैन होकर आंखें बंद कर लेना चाहता हूँ।
ग़रीब ख़ुद को घसीटकर घर ले जा रहा है। एक श्वान दूर देश से हवाई जहाज में आया है। उसका ऑफिशियल स्वागत किया जा रहा है।
जुए के एक तरफ बैल दूजी तरफ एक आदमी है। वे मिलकर एक लंगड़ाती बैल गाड़ी को खींच रहे हैं। ग़रीब परिवार को एक बैल बेचना पड़ गया है। एक किशोरवय लड़का बैल की जगह जुत गया है। इस परिवार को जाने कब बचा हुआ बैल भी बेचना पड़ सकता है।
घर कितने दूर हो गए हैं।
मैं लॉक डाउन में अविराम ड्यूटी कर रहा हूँ। मुझे कोई तकलीफ नहीं है। मुझे स्क्रिप्ट लिखनी है। उसे रेडियो पर बोलना है। कुछ रिकॉर्डिंग्स करनी है। बस। मैं खाना खाकर जाता हूँ और लौटकर खा लेता हूँ।
इसके बाद भी अजीब सा लगता था। पहले पच्चीस दिन घर आने पर पत्नी और बच्चों से अलग रहता था। मुझे लगता था कि लड़ाई ज़ोर से चल रही है। मैं दफ्तर में अक्सर धूप में अकेला खड़ा हुआ सूखे पत्तों को देखता हुआ मुस्कुराता था। कभी कुछ लिख लेता था। अब शिथिल हो गया हूँ। मजदूर चले जा रहे हैं।
औरोन तामाशी की कहानी का पहला ही पैरा दिल पर दस्तक देता रहता है।
"अत्तिल्ला के हूणों का ठेठ वंशधर। इतालवी बंदी शिविरों में तीन साल बिता कर वह वापस घर लौट रहा था। मोड़ पर पहुँचते ही अचानक ठिठक कर खड़ा हो गया। उसके सामने गाँव फैला पड़ा था। आँखों ही आँखों में जैसे समूचा दृश्य लुढ़क कर उसके दिमाग में समा गया, सिर्फ गिरजाघर की मीनार बाहर रह गयी थी। उसकी आँखों के कोनों में आंसू तिर आये। अपनी झोंपड़ी के पिछवाड़े पहुँच कर वह रुका। किसी तरह फेंस पर चढ़ कर आँगन में कूद गया। कूदते ही बोला, मेरी झोंपड़ी।"

May 11, 2020

बरसों से


मालती के फूल झड़ रहे हैं
लू के झकोरे भूल जाते हैं रुकना।
पंछी चहक कर
भूल जाता है
अपनी चोंच बन्द करना।
मैं भूल जाता हूँ
आंखें झपकाना।
कि बरसों से तुम मेरे आस पास हो
बरसों से तुम्हारा इंतज़ार बना हुआ है।


 

May 10, 2020

इंतज़ार से भरी सुबहें


 ||तुम्हारे इंतज़ार से भरी सुबहें||

कुर्सी पर सूखे पत्ते पड़े होते
कोई फूल टूटकर पत्तों के आस पास गिरता।
सुबह की हवा में
नीम नींद से भीगा हुआ मैं अलसाया
एक मोढ़े में दुबका रहता।
कभी-कभी मुझे लगता
कि तुमने मेरे पैरों पर चादर डाल दी है।
मैं हड़बड़ा कर उठता
कि तुम चले तो न जाओगे।
हवा के झौंके के साथ सब पत्ते बिखर जाते।

May 6, 2020

कि माँ कहीं दूर नहीं हो सकती


 रेत में नाव बही जा रही थी। हतप्रभ डॉक्टर देख रहा था। उसने कहा- "मैं विश्वास नहीं कर सकता कि रेत में नाव बह रही है"

मैंने कहा- "सही कह रहे हो"
हवा का बहाव तेज़ होते ही नाव भी तेज़ हो जाती। डॉक्टर ने एक बार मुझे छूकर देखा। शायद वह जानना चाह रहा था कि ये कोई भ्रम तो नहीं है।
"क्या ये नाव वहां तक जा सकती है?" डॉक्टर ने पूछा।
मैंने कहा- "ये नाव तभी कहीं जाती है जब प्रेम हो"
डॉक्टर ने कहा- "हाँ मुझे बहुत प्रेम है।"
इसके बाद डॉक्टर ने अपने प्रेम के बारे में बताया तो मैं सोचने लगा। मुझे सोचते देखकर डॉक्टर चिंतित हुआ। उसने बेसब्र होकर पूछ लिया "क्या ये नाव वहां तक नहीं जा सकती"
मैंने कहा- "जो कोई भी प्रेम करता है, वह इस नाव से अपने प्रेम तक जा सकता है लेकिन..."
"लेकिन क्या..."
"माँ तक नहीं जाया जा सकता। कि माँ कहीं दूर नहीं हो सकती। माँ तक जाने के लिए नाव से उतरना पड़ता है।"
"तुम उतरे हो कभी?" डॉक्टर ने पूछा।
मैंने कहा- "हाँ। मैं अपनी दुनिया से भरी नाव से उतर जाता हूँ तब मुझे माँ सामने खड़ी मिलती है।"
डॉक्टर कुछ सोच रहा था तभी मैंने उससे कहा- "बीमार मैं हूँ, मेरे बारे में सोचो।"
अचानक डॉक्टर ने स्टेथोस्कोप एक तरफ रखा और वह नाव से उतर गया। रेत के झकोरों ने उसे घेर लिया। वह बुदबुदाया। "ये रेत ही उड़ी जा रही है, हम कहीं नहीं जा रहे।"
रेत के झौंके के गुज़रते ही मैंने देखा कि डॉक्टर मुस्कुरा रहा था। मैंने पूछा- "माँ दिखी" डॉक्टर ने कहा- "हाँ"
एक सफेद तितली रेत को चूमती उड़ी जा रही थी।

May 5, 2020

अगर तुम प्रेम करते


 रेत में पड़ी नाव में बैठकर दूर तक की यात्रा की जा सकती है। मैं बेसब्र अक्सर नाव में खड़ा भी हो जाता हूँ कि अब कितना दूर है। अचानक नाव, दीवार से टकरा कर रुक जाती है। वह अधीर दौड़ती हुई अपनी खिड़की के पास आ रही होती है, जहां मेरी नाव रुक गयी है।

डॉक्टर ने पूछा कितनी यात्राएं कर चुके हो।
मैंने इनकार में सर हिलाया। मेरे बालों से झड़ती बालू रेत से डॉक्टर की मेज़ ढक गयी। वह रेत में डूबता जा रहा था कि मैंने उसे अपनी नाव में बिठा लिया।
बदहवास डॉक्टर को होश आया तो उसने पूछा कि ये नाव कहाँ कहाँ जा सकती है।
मैंने कहा- "ये कहीं भी जा सकती है अगर तुम प्रेम करते हो।"

May 3, 2020

तुम्हारी परछाई भर देखने को

तुम्हारे बारे में सोचते हुए

मैं सो गया
और मैंने स्वप्न में तुमको देखा।
अगर मैं जानता
कि ये एक स्वप्न होगा
तो मैं कभी नहीं जागता।
ओनो नो कोमाची [825 - 900]
अगर मैं जानता
कि तुमको आना नहीं है
मैं कब का सो चुका होता
लेकिन अब बहुत रात हो चुकी है।
मैं चाँद को देखता हूँ
ढलते हुए।
एकाजोमे इमोन [956 - 1041]
अकस्मात
तुम्हारी परछाई भर देखने को
मैं कितनी ही बार गुज़रा
तुम्हारे घर के दरवाज़े के आगे से।
हिगुची इचियो [1872 -1896]
कितने हज़ार बरस पीछे तक मैं तुमको ऐसे ही प्यार करता रहा हूँ।
अपने प्रेम के निशान खोजने के लिए मैं बहुत पीछे के सफ़र में निकल जाता हूँ। ईसा के बाद से ईसा के पहले तक के हिसाब में मैंने हर कविता में ख़ुद को तुम्हारे इंतज़ार में बैठा पाया है।
सोचता हूँ कि इस सब से पहले की वे कविताएं जो पाषाणों पर लिखी गई, गुफाओं में उकेरी गई हैं अगर कहीं मिल जाएगी तो वहां भी मैं तुम्हारे प्रेम में खोया मिलूंगा।
मालती के फूलों की तस्वीर लेने में खोया हुआ था कि गुलाब के काँटों ने बाँह पर चूम लिया है। एक गिलहरी तस्वीर लेते देख रही है। जैसे जानना चाहती हो कि मैं इन फूलों को अपने दांतों से कुतरना नहीं चाहूंगा तो क्या करूँगा।
गिलहरी को क्या पता कि तुम्हारे अधपके बालों में ये फूल कितने सुंदर दिखेंगे।

April 17, 2020

खिड़की में बंधी चीज़ें


विंड चाइम, गले की घण्टी, घुँघरू बंधे धागे, रिबन में गुंथी चिड़ियों जैसा जो कुछ घर लाता हूँ, उसे खिड़की पर टांग देता हूँ। बहुत बरसों से ऐसा करते रहने के कारण खिड़की पर इतनी चीजें टँग गयी हैं कि वे रोशनी को ढकने वाला पर्दा बन चुकी हैं।

हवा चलने पर उनकी मिली जुली आवाज़ बहुत अलग होती है। अक्सर विंड चाइम की ट्यूब से घुँघरू टकरा जाते। इसी तरह पीतल की बड़ी घण्टी जो भेड़ों के गले में बांधी जाती है, उससे विंड चाइम की ट्यूब टकरा जाती है।

एक विशेष टंकार कमरे में गूंजती। ऐसे स्वर जिनको मैंने पहले कभी नहीं सुना होता है। इनको सुनते हुए मैं सोचता कि किस से क्या टकराया होगा तब ये आवाज़ आई होगी। ऐसा सोचते हुए मुझे नींद आ जाती है।


नींद में अक्सर एक ही सपना आता है। खिड़की में बंधी रहने वाली सब चीज़ें हवा में तैर रही हैं। मैं उनको पकड़ कर वापस बांध देना चाहता हूँ।

खिड़की के उस ओर कभी-कभी एक चिड़िया आकर बैठ जाती है। वह बहुत देर तक बैठी रहती है। मुझे लगता है वह खिड़की में बंधी चीज़ों का बेढब संगीत सुनने आती है।

इतना सोचते ही मुझे दुःख होता है कि चिड़िया का इतना उदास होना कितनी ख़राब बात है।

April 14, 2020

कोई कठिन काम, जैसे ज़िन्दगी

कोई लड़ाकू विमान चुपचाप मेरे पास से गुज़र जाता है। उसके गुज़र जाने के बाद का सन्नाटा सुनाई देता है। एक गहरी बेचैनी से भरने लगता हूँ।

मैं कुछ नहीं कर रहा हूँ। समय ख़त्म होता जा रहा है।

ये ख़याल आते ही कोई काम करते, कहीं चलते, कहीं बैठे हुए बेचैन हो जाता हूँ। जो काम कर रहा होता हूँ, उसे उसी पल छोड़ देना चाहता हूँ।

उस लम्हे किसी की आवाज़ सुनाई पड़ना, किसी काम में लगे रहने का ख़याल आना परेशान कर देता है। उस लम्हे मैं ब्लैंक हो जाना चाहता हूँ। इतना खाली कि जैसे कहीं कुछ नहीं है। मैं भी नहीं हूँ।

इसी घबराहट में अक्सर बाहर खुले आकाश के नीचे आ जाता हूँ। मैं देखने लगता हूँ कि बोगेनवेलिया पर नीम की छाया गिर रही है। मैं यही देखने के लिए आता हूँ। कुछ देर चुप खड़ा उसे देखता रहता हूँ।

बोगेनवेलिया नीम के लिए क्या करता है? कुछ भी तो नहीं। लेकिन कड़ी धूप की इन दोपहरों में उस पर नीम की छाया गिर रही है।

मैं ये देखकर शायद ख़ुद को सांत्वना दे रहा होता हूँ। तुम जो इतना प्यार करते हो। तुम नीम की छांव हो, मैं बोगेनवेलिया हूँ।

मैं इस देखने में पाता हूँ कि मेरे बदन पर खिले फूल झड़ रहे हैं। वे हवा के साथ तुम तक पहुंच रहे हैं। लेकिन मैं तुमसे इतना दूर हूँ कि अभी तुमको गले नहीं लगा सकता।

धुएँ की तलब मुझपर तारी हो जाती है। हालांकि तुम्हारी बाहों को धएँ के पर्दे के पीछे छिपाया नहीं जा सकता। मैं लम्बी छुट्टी पर मयखानों तक भाग जाना चाहता हूँ। ये जानते हुए भी कि बहकी-बहकी गंध से भरी ठंडी जगहों पर भी तुम्हारी नमी की चाहना दिल से नहीं जा सकेगी।

फिर एक सन्नाटा गूंजने लगता है। पत्ते उड़ने लगते हैं। कड़ी धूप से बचाती छांव में खड़ा हुआ अपने तक लौट आना चाहता हूँ। लेकिन मैं जानता हूँ कि ये कितना कठिन काम है।

जैसे ज़िन्दगी।

April 13, 2020

पता नहीं कैसे।



पेंसिल बेख़याली में एक अक्षर लिखकर रुक गयी। मैं उस अक्षर को देखते हुए सोचने लगा कि ये क्यों लिखा है। इस अक्षर से किसी का नाम बनता है, या फिर कोई काम, कोई चाहना या फिर कोई बेहद पुराना सम्मोहन?

मैं देर तक अपनी ड्राइंग डायरी को देखता रहा। मुझे याद आया कि मैं एक औंधी लेटी हुई किताब पढ़ती लड़की के पैरों का चित्र बनाना चाहता था। लेकिन वह तस्वीर वहां नहीं थी।


जैसे उकताए हुए लोग बार-बार सर या दाढ़ी खुजाते हैं, वैसे मैं लिखने लगता हूँ। कुछ भी लिखना। बस लिखना। अभी देखे परिंदे के बारे में, हवा के साथ झरती सूखी पत्तियों के बारे में, छत्ते के पास रह रहकर उड़ती पहरेदार मधुमक्खियों के बारे में या सड़क पर पसरी धूप के बारे में या कुछ भी।

मुझे हर आधी पौनी भरी डायरी में ऐसी बेतरतीब लिखावट मिलती रहती है। मैंने उनको ऐसे ही लिखा था। जैसे सिस्मोमीटर हर आहट के साथ कुछ लिखता है, वैसे ही मेरी अंगुलियों में फंसी पेंसिल काँपती रहती है।

सूखी पत्तियां, मधुमक्खियां, सूनी सड़कें, परिंदे, कोई ठहरा हुआ दृश्य, कुछ भी देखना प्रिय है। जो ठहरा हुआ है, उसमें देखने को बहुत सा होता है। जो सजीव है वह तो अनगिनत कलाओं से भरा होता है।

मैं अपनी पीठ से कुर्सी की पुश्त को पीछे धकेलता हूँ। देखता हूँ। छत दिन में टिमटिमाती है। आंखें नीम बन्द कर लूं तो अचानक एक फाहे की तरह उड़ते हुए दिखते हो। मेरी नज़र तुम्हारा पीछा करती रहती है।
* * *

दो सूखे पत्ते नम मिट्टी में

एक रोज़ कोई कोंपल खिली जैसे नज़र फेरते ही किसी ने बटुआ पार कर लिया हो। एक रोज़ उससे मिला। फिर उससे ऐसे बिछड़ा जैसे खाली बटुए को किसी ने उदासी ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने या खूबसूरत स्त्री को इरादतन चूमने जितना ही अवैध है.