January 30, 2020

ये कोई नई बात नहीं है

बेरियां समय पर खिलना भूल गई हैं। दिल मगर इंतज़ार करता है कि बेर आएंगे। साल भर बाद डालियों पर लकदक बहार आ जाती है। मैं झुक-झुक चुन रहा होता हूँ बेर।

अचानक आवाज़ आती है तुम अब तक यहीं खड़े हो? मैं चौंक जाता हूँ।

कुछ बेवजह की बातें आवाज़ के बारे में
* * *

कितनी सुंदर होती है आवाज़
सुनहरी रेत पर गिरती गुलाबी पंखुड़ियों सी
कितना डरावना होता है आंधी को सोचना।

हालांकि उसे मोहब्बत नहीं, यही एक सुकून की बात है।
* * *

आवाज़ का साज़ जब दिल होता है
वह अटक जाता है एक ही सुर पर।

कुछ तो - कुछ तो।
* * *

शुद्ध और कोमल के बीच का
कोई नया सुर
खोज लेती है आवाज़।

अगर आवाज़ को मोहब्बत हो तो।
* * *

हम नहीं समझते चिड़िया का गाना
अगर हम समझ भी सकते तो क्या होता।

वो जो गीत मोहब्बत के लिए हैं
बताने में अक्सर संकोच होता है।
* * *

हर किसी को मिल जाती है
वह आवाज़,
जिसकी तलब होती है।

लेकिन कई बार उदास लम्बी ज़िन्दगी
इंतज़ार में ही चलती रहती है।

ये उसे मैंने कभी कहा नहीं।
* * *

उसकी आवाज़
रेत के धोरों की उपत्यका में बैठे
ख़ानाबदोशों के जैसी थी।

मेरे दिल में एक अलाव जल रहा था
उसकी आवाज़ की धुन पर।
* * *

दिल जानता था कि उसे मोहब्बत नहीं है
दिल जानता है कि उसे मोहब्बत न होगी।

दिल से उठती ऐसी आवाज़ का कोई क्या करे।
* * *

और अंत में
उसकी आवाज़ के लिए
यही लिखना काफी है
कि ये उसकी आवाज़ है।

वह कैसी आवाज़ है
ये एक इंतज़ार से भरा हुआ दिल ही जानता है।
* * *

मुझे पता है
इतना लिखने के बाद भी नहीं आएगी उसकी आवाज़।

ये कोई नई बात नहीं है।
* * *

तस्वीर घर की है। बेर दफ़्तर से किसी गुमख़याली में साथ चले आये हैं, जैसे उसकी आवाज़ साथ आ जाती है। हर जगह।

January 27, 2020

चुप्पी भली बात है।

कितना सारा बोलती हूँ
और तुम कुछ नहीं कहते।

मेरे पास तुम्हारी
एक बरस लम्बी चुप्पी बोलती रहती है।
* * *

शाम ढले दो मिनट के लिए उसकी आवाज़ न सुनी जा सके। उसे कहा न जा सके कि तुमको सुन लिया है, अब सुकून है। तुम्हारी आवाज़ न होती तो स्याही में कोई टिमटिमाता रहता। तुम्हारे ख़याल में डूबा हुआ मैं।

तुम नहीं हो। तुम्हारी आवाज़ आज के रोज़नामचे से गायब है। इसलिए तुम्हारी चुप्पी की कविताएं पढ़ रहा हूँ। हालांकि तुम कभी न पढोगे, पढ़ सके तो भी चुप ही रहोगे। ये मैं जानता हूँ।
* * *

अंत में हम याद नहीं कर सकते
कि मिलने के समय मौसम कैसा था।

हम उलझे होते हैं
कि बिछड़ने का मौसम कैसा होगा
क्या हम कुछ कह सकेंगे
या चुप्पी हमको बाहों में भर लेगी।
* * *

हमने जितनी भी बातें की थीं
उनको भूल गए या उनके अर्थ खोजे।

चुप्पी सच्ची दोस्त निकली
उसी में याद रहा चूमने का ख़याल और एक दूजे को देखना।
* * *

ईश्वर चुप्पी का मित्र था
उसे खोजा नहीं जा सकता था
किसी हुड़दंग में।

इसलिए प्रेम में चुप्पी ही ईश्वर थी।
* * *

जो चुप्पी नहीं समझता
वह शब्द भी नहीं समझेगा
ये कहकर फ़कीर चुप हो गया।

मगर प्रेम को फकीर की तरह
एक भी शब्द की कभी ज़रूरत ही न थी।
* * *

चुप्पी मृत्यु की प्रतिकृति थी।

प्रेम भी अनंत के लिए ठहरा हुआ
बहुत अच्छा दिखता था।
* * *

बातें उलझ उलझ जाती थीं।

मगर
चुप्पी से बनते जाते थे प्रेम के पिरामिड
बस इसलिए कि
तुमको देखते जाना सबसे अच्छा था।
* * *

हर बात उलट ही सीखी दिल ने।

प्रेम किया तो सोचने लगा कि टूट न जाये
साथ हुआ तो बिछड़ने के डर से भर गया।

एक चुप्पी ही थी, जिसने हौसला दिया।
• * *

मुझे चूमने दो तुम्हारे होंठ
कुछ न कहो।

कुछ भी कहना अर्थहीन है
कि शब्दों की मृत्यु हो जाने पर
उनको चुप्पी की कब्र में ही दफनाया जा सकेगा।
* * *

चुप्पी एक धुनका थी
एक सूप थी।

काश वो तुम्हारी बाहें भी होती।
* * *

मैं हर बार चुन लेता हूँ तुम्हारी तस्वीर। हर बार तुम कहते हो कि मैं अपनी ही तस्वीर देखकर चौंक गया। कभी कभी ये बात सुनकर मुझे खुशी होती है। मैं समझता हूँ कि तुम इसलिए चौंके कि मैंने तुम्हारी तस्वीर चुनी मगर असल बात होती है कि तुम डर जाते हो। लोग क्या सोचेंगे।

कोई बात नहीं। चुप्पी भली बात है।
* * *

मेरा शुक्रिया।
* * *

January 22, 2020

क्योंकि ऐसा ही है

ऐसा ही होता है।

सोचना है तो अभी की नवीन बात से मत सोचो। पीछे वहां तक झांको, जहां तक स्मृति साथ देती है। वहीं से आरम्भ करो। धीमे मद्धम अनगिनत चेहरे याद आएंगे। स्पष्ट होने लगेगा कि वे चेहरे न थे, मुखौटे थे।

उन मुखौटों के स्थिर मुंह से निकली बातें याद आते ही परिणाम भी याद आएंगे। उन बातों के भूत और भविष्य का सत्य सम्मुख आ खड़ा होगा। पुनः समझोगे कि वे बातें नहीं थी। वे प्रयोजन थे। तुम्हारे भीतर झांकने के और तुम्हारे भीतर कुछ बो सकने के प्रयोजन।

जब भी दृश्य धुंधला जाए। मन दिग्भ्रमित हो उठे। विचार उथल पुथल से भर जाएं तब दो क़दम पीछे हटकर देखना। सम्भव है, उतनी उलझन न रहे जितनी अब है।

अभी तुम जिस बात से आहत हो वह मामूली है। अभी तुमने देखा ही क्या है?
* * *

तस्वीर में नन्हे दोस्त पाठक साब कागज़ की थैली में अमरूद लिए हैं। एक अमरूद थैली से बाहर गिर जाता है। मैं अपने कोट के अगले बटन खोलकर नीचे बैठकर अमरूद उठा लेता हूँ।

"हम इसे वापस थैली में डाल देते हैं।"

पाठक जी हतप्रभ हैं। कि थैली का मुंह उन्होंने पकड़ा हुआ है, अब अमरूद वापस कैसे डाला जाए। मैं कहता हूँ- "ये अमरूद साहब जहां से बाहर को कूदे हैं, वहीं से इनको वापसी का रास्ता दिखाया जाए।"

इसके बाद हमने थैली को दोनों हाथों से थाम लिया ताकि किधर से भी अमरूद न गिरे।
* * *

पाठक जी से मिलकर मैंने सीखा। केवल अमरूद ही वापस लेना। भूल से जो धतूरे थैली में आ जाएं तो तुरंत पहचान कर बाहर कर देना।

ऐसा ही हो क्योंकि ऐसा ही है।

January 8, 2020

अख़बार का मुखपृष्ठ

निर्भया केस में अपराधियों को मृत्युदंड का वारंट जारी। दिल्ली के मुख्यमंत्री ने कहा है कि इसमें सात साल लग गए। ये तंत्र बदलना चाहिए।

अभिनेत्री दीपिका पादुकोण की तस्वीर लगी है। वे जेएनयू में आंदोलनरत छात्रों का समर्थन करने आई हैं।

जेएनयू में हुई हिंसा के मामले में छात्र नेताओं के विरुद्ध वाद दायर किये गए हैं जबकि हमलावरों में से कोई भी नहीं पकड़ा गया है। प्राध्यापक सुचरिता सेन ने हत्या के प्रयास की धारा में एफआईआर लिखने की मांग की है।

पुलिस ने घायल आइशी घोष, साकेत मून सहित अट्ठारह छात्रों के विरुद्ध तोड़फोड़ और राजकार्य में बाधा पहुंचाने जैसी धाराओं में मुकदमा कर लिया है।

पिंकी चौधरी ने जेएनयू हमले की ज़िम्मेदारी उठाई है और कहा है कि इसी तरह सबके साथ किया जाएगा।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को निर्देश दिया है कि वे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में पुलिस द्वारा मानवाधिकारों के हनन की जांच कर रिपोर्ट पेश करे।

भारत सरकार को आशंका है कि वर्ष 2019-20 की भारत की जीडीपी माने सकल घरेलू उत्पाद का आंकड़ा पिछले बरस के 6.8 की जगह गिरकर अगली तिमाही तक 5 प्रतिशत के नीचे जा सकता है।

एक अंतरराष्ट्रीय समाचार है कि ईरानी जनरल सुलेमानी के अंतिम संस्कार में उमड़ी भीड़ में पददलित होकर पचास लोगों की जान चली गयी है। इसके साथ लगी तस्वीर में एक बिलखती व्याकुल महिला दिख रही है। नीचे लिखा है। सूचना केंद्र के बाहर एक औरत अपने भाई के बारे में पता करते हुए।

मुखपृष्ठ के स्टीमर में अभिनेत्री सदफ ज़फर का उल्लेख करता हुआ समाचार है। सदफ को बूटों से पीटा गया। उनको अपमानित करने के लिए भद्दे वाक्य कहे गए। सत्तर वर्षीय पूर्व आईपीएस दारापुरी ने कहा है कि पुलिस ने उनको ओढ़ने के लिए कम्बल तक नहीं दिया। चौबीस घंटे भूखा रखा गया।

इसके आगे भीतर के समाचार मैंने पढ़े नहीं है। पारदर्शी शीशों के बाहर सर्द मौसम में घने बादल छाए हुए हैं। समाचार पढ़ लेने के अपराध के बाद सोच रहा हूँ। क्या सोच रहा हूँ? जाने क्या।

January 2, 2020

बेंत मेरी नौकरी बेच खाई बंदूक


  • बेंत मारी नौकरी
  • बेच खाई बंदूक।

  • इत्ती गरज कभी न रखी कि किसी व्यक्ति या वस्तु के बिना जीवन न चले। काम अटक जाए, ये अलग बात है। काम अटकेगा तो उदास बंदर की तरह किसी मुंडेर पर बैठ जाएंगे। उलटे लटके रहेंगे दुछत्ती के मकड़े की तरह। घोंघे की तरह याद के सफ़र पर निकल जाएंगे। तकलीफ़ पर अजगर की तरह कुंडली मार कर पड़े रहेंगे। इस सबसे भी आराम न आया तो भालू की तरह शीतनिंद्रा में चले जायेंगे। महीनों बाद जाग कर देखेंगे कि दुनिया का क्या बना।

  • मेरा साहित्य संसार इतना ही है कि दोस्तो से मिलो। गप करो। हुक्का खींचो। प्याले भरो। कभी मन हो तो जैसी दुनिया दिख रही, समझ आ रही। वैसी ही कविता, कहानी, यात्रा के ढब में लिख दो। दोस्तो के पास किताब पड़ी होगी तो दिल खुश हो जाएगा कि थोड़ा सा मैं भी उनके पास पन्नों और शब्दों के सूरत में बचा हुआ हूँ।

  • हेमंत मित्र हैं। प्यार से उल्फ़त नाम दिल में सेव हो रखा है। उन्हीं के साथ बीती शामों में जब अश्विनी शामिल हो गए तो दुनियादारी को क़हक़हों का धुआँ करके उड़ा दिया। कोई बात समझ न आई, कोई काम न सधा, कोई कठिनाई पास आ बैठी तो कहा, छोड़ देंगे नौकरी और बेच देंगे बंदूक। 

  • इस किताब में तकलीफ़ों को धूप में सुखाकर उड़ा देने, ग़मों को कसी हथेलियों में मसल देने और जिजीविषा के घोड़े पर जीन कसते जाने वाले रेगिस्तान से पहाड़ तक के लोगों के कच्चे खाके हैं।

  • जीवन के बिम्बों से भरी संजीदा कहानियों और चुटकी भर शब्दों की तड़प भरी बेवजह की बातों से इतर यात्रा, संस्मरण और गप से बने लोकजीवन के रेखाचित्र।

  • मौखी नंबर आठ, नरगासर, मुड़दा कोटड़ी, रेलवे मैदान, पनघट रोड, भड़भूँजे की भाड़, मोहन जी का सिनेमा, चाय की थड़ी, दल्लुजी कचौरी वालों की दुकान, फ़कीरों का कुआं, स्टेडियम, लुहारों का वास जैसे बेहिसाब ठिकाने, जिनसे मिलकर अलसाए, ऊँघे बाड़मेर की जो सूरत बनती है, वही सब ये किताब है।

  • कहानी नहीं है किन्तु कहानी ही है। कि इस किताब में रेगिस्तान के छोटे से क़स्बे बाड़मेर से की गई दूर-नज़दीक की यात्राएं, बिछड़े दोस्त की याद, बड़ी हस्तियों से की गई बेआवाज़ बातचीत, भांग और विज्ञान के अद्भुत मेल से बनी गप और वह सब, जो आधे जगे, आधे खोये रचा गया। 

  • जीवन का कुछ पक्का नहीं है। जो कर रहे, वह छोड़ दें। जो छोड़ दिया उसे फिर से पकड़ लें। बरसों कुछ न लिखा आगे जाने क्या हो। मगर जब बेचैन, हताश होने लगूँगा तो उसका भी हल है।

  • और करेंगे नौकरी
  • नई लाएँगे बंदूक। 
  • * * * 

  • ये किताब के भीतर किताब के बारे में लिखा है। शीर्षक का मन्तव्य है कि जीवन के बारे में हम कभी न कभी सोचते हैं। इतना सोचने पर अक्सर कहा जाता है कि पागल हुए हो? ये एक वैश्विक प्रश्न है। ये हर उस व्यक्ति के लिए है, जो जीवन को सोचता है। 

  • आप पुस्तक मेला जाएं तो हिन्दयुग्म के स्टाल पर किताब का ज़रूर पूछें कि आ गयी क्या? मैं आऊंगा तब तक आ ही जाएगी। 10 और 11 जनवरी को मिलते हैं। 



छीजने की आहट

मन एक तमाशा है  जो अपने प्रिय जादूगर का इंतज़ार करता है। शाम से बालकनी में बैठे हुए सुनाई पड़ता है। तुम कितने कोमल हो सकते हो? खुद से पूछने पर...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.