February 29, 2020

न कहने सी बात

विदा होते समय
काश थोड़ी देर और
थाम कर रखा होता हाथ।

भारी क़दमों से लौटते हुए शैतान ने सोचा।

विदा होने के बाद
भीड़ में दिग्भ्रमित मन लिए ठहर गयी
शैतान की प्रेमिका।

प्रेम जैसी सरल बात
दुनिया में सबसे कठिन बात थी।
* * *

शैतान डरता रहा कि
उससे दिल की बात कही तो
दिल टूट जाएगा।

दिल तोड़ देने के सिवा कोई रास्ता न था।
* * *

कितनी ही
आंधियां आई
बारिशें गुज़रीं
कितने ही सर्द मौसम
दिल के रास्ते निकले
मगर प्रेम के पदचिन्ह मिटते ही नहीं थे।

हैरान शैतान
दिल को उलट पुलट देखता
और थककर एक ओर रख देता था।

पदचिन्ह फिर टिमटिमाने लगते।
* * *

शैतान डरता था
कि कहीं प्रेम न हो जाये
आख़िर शैतान बने रहना ही सुखकर था।

डर एक दिन हर किसी को दबोच लेता है।
* * *

शैतान को छत पर सोना प्रिय था।

वह एक चादर बिछा कर सोया हुआ
आकाश के असंख्य तारों में खोजता था
एक सितारा।

जो शैतान की प्रेमिका के होठों के पास बैठा रहता था।
* * *

जब काली, लाल, पीली आंधियां गुज़रती थी
शैतान सोचता था कि सांस लेना ज़रूरी बात है।

शैतान क्या जानता था
कि एक दिन शैतान की प्रेमिका
कानों में फुसफुसा रही होगी मैं केवल तुम्हारी हूँ।

सांस आना न आना, एक मामूली बात हो जाएगी।
* * *

एक और बात है
मगर वह बताने लायक नहीं।

शैतान ने पहली बार सोचा
कि कुछ निषेध भी होता है।
* * *

मेरा व्यवहार इन दिनों असामान्य है। मैं दिन को उनींदा और रातों को जागता रहता हूँ। कल्पना के घोड़ों को उपेक्षा से देखता हूँ। सूने रास्ते देख उदास नहीं होता। किसी के बतलाने पर झल्ला जाता हूँ। मैं चलता हूँ मगर कहीं नहीं जाता। मैं ठहरा रहता हूँ मगर वहां होता नहीं हूँ।

इस सब का कोई हल नहीं है। कुछ अजेय दूरियां होती हैं। ख़ुद से ख़ुद की दूरी।

हालांकि इस बात से डर जाता हूँ कि प्रेम में दिल टूट जाता है लेकिन इसी बात पर मुस्कुराता हूँ कि प्रेम में टूटा हुआ आदमी अक्सर विनम्र हो जाता है। अगर वह सचमुच प्रेम करता था तो...

February 24, 2020

मैं क्यों कांटे बो रहा हूँ

सोई तो क्या ही होगी
शैतान की प्रेमिका।

उनींदा शैतान सोचता है।
* * *

यूँ तो कितनी ही बार
कुछ याद नहीं आता
मगर कभी कभी एक नाम, कर जाता है कितना तन्हा।

ऐसा शैतान ने सोने से पहले सोचा।
* * *

शैतान ने उससे कभी नहीं कहा
कि हम न मिले तो मर जायेंगे।

वह कहता रहा
मेरी जाँ जल्दी मिलो कि मर जाएं।
* * *

शैतान की प्रेमिका
आंखों से हंसती थी।

शैतान भी अजूबा था कि
वह चूमकर प्रेम करता था।
* * *

एक बार शैतान ने सोचा
मैं क्यों कांटे बो रहा हूँ।

लेकिन प्रेम न करने की कोई वजह न थी।
* * *

February 23, 2020

शैतान की प्रेमिका के अधखुले होंठ

क्या कुछ नहीं कर सकता
स्वर्ग से निष्कासित शैतान।

मगर पैदल गुज़रता है याद से भरा हुआ
देखता है अधखुली खिड़कियां
और सोचता है प्रेमिका के उड़-उड़ आते बालों के बारे में।

राह को देखते
प्रेमी की तरह ठहर जाता है
बिंधा हुआ
कातर, असहाय और अनमना।

भूल जाता है सबकुछ
प्रेम में शैतान।

कभी कभी फैलाता है अपने पंख
और आहिस्ता से समेट लेता है
ऐसा नहीं है कि भूल गया है उड़ना।

किसी मीनार पर
किसी दरख़्त की छांव में
कहीं शोर की लहरों के पास
कभी भरी-भरी तन्हाई में फुसफुसाता है।

बस एक उसकी याद इतनी भारी है
कि सीने पर रखी नाज़ुक कलाई
कि भीगे फाहे को छूती कोई नर्म सांस
कि आंख की कोर पर ठहरी ख़ुशी भरी बून्द।

मुस्कुराता है, उदास होता है
चलता है, लड़खड़ाता है
और कभी उड़ जाता है बहुत दूर शैतान।

प्रेम में शैतान, कितना शैतान बचा रहता है
ये केवल
शैतान की प्रेमिका के अधखुले होंठ जानते हैं।
* * *

February 19, 2020

मैं उनींदा मुस्कुराता हूँ

कितनी सादगी थी
तुम्हारे चेहरे में।

जैसे वीराने में बजती हवा के बीच
सांस भूल गयी हो अगली सांस लेना।

जैसे मैंने कहा ज़रा और ठहर जाओ
और तुम ठहर गए हो।
* * *

शोर की लहरों की तरह
लोग आते और चले जाते थे।

तुम ठहरे रहे
मेरी पीठ के पीछे
जैसे वीराने का शैदाई दिल भर जाता हो वीराने से।
* * *

चमकीली रोशनियों
स्याही से भरे पन्नों की ख़ुशबू और
एक अनवरत हड़बड़ी के बीच।

तुम्हारे गले से लिपटा मफ़लर
चुपचाप जाने क्या देख रहा था।
* * *

एक बार मैंने चाहा
कि कोई तूफ़ान उड़ा दे वो छत
जिस छत के नीचे हम खड़े थे
और
लोग फूलों की तरह आसमान में बिखर जाएं।

मगर मुझे उड़ने का हुनर न था
इससे भी बड़ा डर
ये था कि कहीं छूट न जाये तुम्हारा हाथ
जो मेरे हाथ में न था।
* * *

कितनी अजीब होती है
प्यार भरी मुलाक़ातें।

बिछड़ने के बरसों बाद हमें मालूम होता है
कि वह प्यार था।
* * *

तुम्हारे कांधे को छू रही थी
रोशनदान से आती रोशनी।

मैंने पहली बार चाहा
कि मुझे रोशनी होना चाहिये।
* * *

मैं देर रात तक जागता रहा
होटल के सीले कमरे में।

हालांकि ठंड ज़्यादा थी
मगर जागने की वजह ठंड न थी।
* * *

कभी-कभी मेरा मन हुआ कि कहूँ
और क़रीब आ जाओ।

मगर मैं देखता रहा तुमको
जैसे पेड़ की शाख से कोई फूल छाया देखता है।
* * *

कितनी भरी भरी थी
तुम्हारी उपस्थिति।

वीराने में भरी याद जैसी।
* * *

मैं मुल्तवी कर देता हूँ
कुछ भी तुमको कहना।

मुल्तवी करने से बचा रहता है भ्रम
कि एक दिन तुम ही कह दोगी।
* * *

मैं गुज़रती हुई रेल देखता हूँ।

कि हर डिब्बे के बीच की झांक में
शायद कभी तुम दिख जाओ।
* * *

उनींदी आंखों देखती हैं
तुम चले जा रहे हो बहुत दूर।

मैं उनींदा मुस्कुराता हूँ
कि तुम दूर जा रहे
तो इसका अर्थ है कि मेरे पास भी थे।
* * *

February 14, 2020

झरबेरी सा प्रेम

वेलेंटाइन डे कल आ जायेगा
तुम मुझ तक जाने कब आओगे।
* * *

झरबेरी के बेर था, प्रेम।

दिल इंतज़ार में बना रहता था
जब आ जाते तो इस तरह चुनने लगता
जैसे होठों से तुम्हारे बदन के सितारे चुनता हो।
* * *

कभी कभी बेर चमकते थे
तुम्हारे लज्जा भरे गालों की तरह।

और दिल उन्हें देखता रह जाता था।
* * *

तुम्हें बाहों में भर कर खड़े रहना और
बेरी को झकझोर देना एक सा काम रहा।

टप टप बरसता था प्रेम।
* * *

तुम्हारे होंठ चूम लूँ
ऐसा कहते ही स्याह ज़ुल्फ़ों में
छुप जाती थी तुम्हारी आंखें।

कभी कभी मीठे बेर खोजने को
झांकना पड़ता था झरबेरी के भीतर।
* * *

दुनिया में बहुत मिठास थी
लेकिन मेरी जेबें भरी रहती बेरों से।

होने को तुमसे अधिक
मोहक, सुंदर, कमनीय, मीठा
कोई भी हो सकता था
लेकिन दिल को कोई भाया ही नहीं।
* * *

एक रोज़ हम बाहों में भरे खड़े होंगे
जैसे बेरी के कांटों में फंसी हो अंगुलियां।
* * *

एक तरफ बेर रखे होंगे
एक ओर तुम बैठे होवोगे।

तब लालची दिल क्या करे? ये तुम्ही बताना।
* * *

शाम ढल रही होगी
बेर की मादक गंध हो जाएगी व्हिस्की सी
दिल डूब जाएगा, तुम्हारे बदन की खुशबू में।

जागती आंखों का
इससे सुंदर सपना मैंने अब तक नहीं देखा।
* * *

तस्वीर में कुछ बेर उतने ही लाल हैं, जितनी मेरी हथेलियां थीं, तुम्हें छूने के बाद।

तुम फिर मिलना, बार बार मिलना। तुम्हारा शुक्रिया।

February 13, 2020

कालो थियु सै - इंदु सिंह




नई पुस्तक कालो थियु सै पर कथाकार कवयित्री इंदु सिंह जी की टिप्पणी


“ कालो थियुसै ” नाम का आकषर्ण जितना अधिक है उससे कहीं अधिक आकर्षित करती है इसकी भाषा और बिम्ब।किशोर चौधरी जिस तरह से अपनी ठेठ भाषा के साथ हर कथ्य में खड़े हैं वो नायाब है.छोट-छोटे सटीक वाक्य गहरी लम्बी बातों को समेटे हुए हैं।

“ज़िंदगी एक भ्रम है और इसके टूटे जाने तक इसे धोखा मत देना” अमित का जीवन,उसके सरोकार,उसकी लिखावट,उसकी ख्वाहिशें और उन सबसे जूझता अमित। लेखक ने अमित को पुनः जीवित कर दिया है सभी पाठकों के बीच। अंत में आँखों से आँसू ठीक वहीं टपकता है जहाँ लेखक ने इसे महसूस किया । अमित को पढ़कर बस अमित को जाना भर जा सकता है लेकिन वो महसूसना किसी को इतनी बारीकी से,ये लेखक की खूबी है । जिस दिन अमित को पढ़ा उस दिन कुछ भी और आगे पढ़ने कि इच्छा न हुई । वो दिन सिर्फ़ अमित का था ।

किशोर सही ही तो कहते हैं कि हम सब एक लट्टू की ही तरह तो हैं । कोई फ़र्क नहीं । एक दिन सबको लुढ़कना है । दुशु के साथ यात्रा में लेखक न सिर्फ़ पिता है बल्कि एक मित्र भी है और साथ ही स्वयं एक बच्चा भी जो अपने पिता के साथ किये गए साइकिल के सफ़र की मीठी व सहज स्मृतियों को भी साथ ही लेकर सफ़र पर निकला है । किशोर एक अच्छे यात्री हैं और यह पूरे तथ्यों एवं प्रमाणों के साथ कहा जा सकता है ।

“इसी साहस को महाभारत में धृतराष्ट्र कहा गया है” इस एक वाक्य में लेखक ने कितना कुछ कह दिया है।

किशोर चौधरी यदि सबसे अधिक कहीं दिखते हैं तो ‘शायद’ रेत में ही दिखते हैं । “रेत कहीं जाती नहीं,बस आती रहती है” ये आना ही ज़िंदगी है ।रेगिस्तान की माटी में रेत ही रेत है और वहाँ का जनजीवन किस तरह इससे प्रभावित है इस पर लेखक की पैनी नज़र चली है शब्दों के माध्यम से क्योंकि यहाँ लेखक रेत में ही जीता है और रेत में ही उसकी साँसे खुल कर साँस लेती है ।

हाँ सच है अभी बहुत कुछ कहना है आपको । बहुत  जीना भी है ताकि साहित्य को और मिल सके इसलिए स्थगित करने होंगे सारे बेकार के काम ।

“बेलगाम बढ़ती हुई आबादी के बोझ तले दबे हुए हिंदुस्तान” ऐसे छोटे-छोटे सूक्ति परक वाक्यों ने अपनी गहरी चिंता दर्ज की है । पर्यावरण,बाजारीकरण की तरफ लेखक ने ध्यान खींचा है । इतिहास के माध्यम से उदहारण प्रस्तुत करना भी दुरूह कार्य है क्योंकि लेखक को सही जानकारी देने हेतु अच्छी मेहनत करनी पड़ती है । साँझ और रात के मिलन की घड़ी की तरह ही लेखक ने शब्दों और भावों को पिरोया है ।

“मुक्ति बहुत कठिन चीज़ है लेकिन मिल आसानी से जाती है । जैसे किसी पुरखे की राख को लाओ और उसे गंदले पानी में फेंक दो” पढ़कर गहरी वेदना महसूस की जा सकती है । हाँ यही तो है, होता है बस इतना भर ! किशोर एक भावुक ह्रदय लेखक हैं जिन्हें संबंधों के टूटने में मृत्यु सी महसूस होती है । ये दर्द बहुत गहरा है। किशोर स्वयं एक ज़हीन पाठक हैं और यही वजह है कि वो इतिहास,विज्ञान या कि मनो विज्ञान को बड़ी ही सावधानी एवं सतर्कता के साथ अध्ययन करते हैं ताकि पाठकों तक कोई भी तथ्य गलत न पँहुचे ।

किशोर कहीं भी स्त्री विमर्श का ज़िक्र नहीं करते बल्कि सीधे “ वह एक ऐसे परिवार के सुखों का कन्धा बनती है जिनमे उसका योगदान शून्य गिना जाता है ” कहकर अपनी बात रख देते हैं । चौबीस घंटे की नौकरी का भार भला कौन स्त्री नहीं समझती है।

“जब तक बंधन है,घुटन है तब तक चुड़ैल भी है” सामाजिक परिवेश पर इससे मुखर चोट क्या होगी ।

अपनी जन्म भूमि से प्रेम सदैव इंसान को इंसान बनाये रखता है । कितने ही रहस्य होते हैं जो कि सिर्फ़ वहाँ के स्थानीय ही जान पाते हैं । लोक कथाएँ इसीलिए सर्वथा सबसे अलग होती हैं । मन तो मन है क्या कीजे ! चाहना किसी के बस में नहीं ठीक वैसे ही जैसे न चाहना।

निश्चित ही किशोर ने अपने मन की बात ही कही है “एक ही जीवन में हम कई बार कितने ही लोगों के साथ जीते हैं और मर जाते हैं” । मन को पढ़ते वेदना का अहसास होता है । मन बेचैन है । क्या यही सच है । हाँ ! यही !

बचे रहने से जीवन फिर जिया जाता है इसलिए सबको बचा रहना चाहिए । बचा रहना उम्मीद है । विश्वास है । हौसला है । अंत में पुनः लेखक अपने गाँव लौट जाना चाहता है जहाँ उसे आने वाली पीढ़ी के लिए भी सामाजिक बदलाव चिन्हित करने होंगे । रिश्तों को बचाना होगा ताकि गाँव बचे रहें । भारतीयों के जींस में ही गाँव है इसलिए गाँवों के जीवन से ही संस्कृति भी सुरक्षित है ।

किशोर चौधरी को इससे पूर्व भी पढ़ा है । आपका गद्य जन-जन का गद्य है । नपे तुले सार्थक शब्दों के संयोजन के साथ कालो थियुसै निश्चित ही बेहतरीन कथेतर गद्य है. लेखक एवं प्रकाशक को इस पुस्तक के लिए खूब बधाई । आपका रचना संसार खूब रचे और सार्थक रचे यही शुभकामना है।

February 9, 2020

ये ही वो समय है

सारे आदेश मसखरी थे
सब हत्याएं हादसा थी।

सड़क पर कुचले गए कुत्ते के पास एक शोकमग्न कुत्ता अंतिम बार उसे सूंघ रहा था। एक आदमी के क्षत विक्षत शव पर दूजे ने कहा हरामी की अंतड़ियां बिखर गई।

यह एक स्थानीय किन्तु वैश्विक बात थी।
* * *

बच्चे क़ैदी थे। नौजवान सिपाही तमाशबीन थे। अधेड़ अधिकारी थे। न्याय के विलम्ब में मौन कोलाहल पसरा रहता। सुख भरी शांति केवल तब प्रस्फुटित होती, जब बच्चों के बयान से साफ़ हो जाता कि उनको जन्म देने वाली माएँ अपराधी थी।

पंच तत्वों से बनी दुनिया में हवा में उड़ाया जाता, पानी की कैनल दागी जाती, नफ़रत की आग भड़काई जाती, भूमि से भार हटाया जाता और आकाश को झूठ के बांस से अधिक ऊंचा उठाया जाता।

स्त्रियां यौनि थी, पुरुष लिंग थे, बच्चे अंगदानकर्ता थे। कवि मसखरे थे। मसखरे विद्वान थे। विद्वान अपराधी थे। न्याय अंधा था।

राजा कौन थे? ये सब जानते थे। मगर चुप थे। कि सब घरों में बच्चे थे।

सीरिया के बच्चे युद्ध लड़ रहे थे। अफ्रीका के बच्चे भूख से लड़ रहे थे। अफगानिस्तान के बच्चे रॉकेट लांचर का भार उठाये थे। बाकी बच्चे नफ़रत के अलाव से अपना दिमाग़ सेक रहे थे।

पिछली सदी के नौवें दशक में कार्ला हिल्स ने कहा था कि हम नस्लों की पहचान कर रहे हैं। बीस बरस बाद पूरी दुनिया इसी काम में खो गयी थी।

आदम की नस्ल की खोज जारी थी। अधिक उदास होने की ज़रूरत नहीं थी कि हर धर्म कहता था अन्याय और आतंक अपने कर्मों से मारे जाएंगे। इसलिए लोग प्रार्थनाओं में लगे थे।

बच्चे फ़ौज़ी टैंकों के सामने खड़े थे।
* * *

February 7, 2020

और कितना पड़ा जा सकता है प्रेम में

इससे अधिक
और कितना
पड़ा जा सकता है प्रेम में।

आक के डोडे से उड़े
फूल के पीछे भागते हुए
तुम्हारे ख़याल से टकरा जाऊं।

बाजरे की भूसी में
उछल कर गिर जाऊं बेवजह
और हंसता रहूँ देर तक।

बैठे हुए सूने कुएं की मुंडेर पर
कबूतरों की आवाज़ में
खोजने लगूँ कि तुम कुछ कह रहे हो।

दूर तक
कोई राह नहीं होती जो तुम तक आती हो
मगर बेतरतीब बिखरे
अनार के फूलों में भी दिखाई देता है तुम्हारा चेहरा।

जबकि कुछ नहीं होता
छू नहीं सकते, चूम नहीं सकते
रूह के प्यार की बातें करते,
खुद को बहलाते हुए हर रात खत्म हो जाता हूँ
अपने बिस्तर में तन्हा।

दफ़अतन
तुम्हारे प्रेम में होने के ख़याल से
कभी लगे कि प्रसन्न हूँ, कभी लगे कि उदास हूँ।

इससे अधिक
और कितना
पड़ा जा सकता है प्रेम में।
* * *

तस्वीर आकाशवाणी बाड़मेर के परिसर में उगे जंगली फूल की है। जैसे मैं तुम्हारे जीवन में उग आया।

February 5, 2020

हालांकि हम क्या बात करते

संदेशे छूटते जाते हैं। बात करना कल तक के लिए टल जाता है। जाने कौनसा कल। बस एक ख़याल दस्तक देता रहता है कि आवाज़ अभी तक न सुनी जा सकी।

हालांकि हम क्या बात करते?

इस तस्वीर को अगर तुम पढ़ सको तो यही लिखा है कि कलाकार स्टूडियो से बाहर हैं। साज़ बेतरतीब रखे हैं। साज़ के कवर घिस चुके हैं। स्टूडियो की दीवारों पर अनगिनत स्याह तारे टिमटिमाते हैं। और मैं सोच रहा हूँ कि तुमको पहली बार देखा था तो मैंने क्या किया।

पखावज से निकले दीर्घ स्वर की लोप होती हुई स्मृति की तरह मैं ओझल हो रहा था। धीरे धीरे डूब रहा था।

इसके बाद मुझे लगा कि तुम तक जाना चाहिए लेकिन ये न लगा कि तुमको बताना चाहिए कि मैं यहां क्यों आया हूँ। इसलिए केवल कहानियों की बातें ही ठीक थी। लेकिन क्या मैं तुम तक आया था?

एक उजली लौ असंगत नाचती है। मैं चुपचाप देखता हूँ। जैसे तुमको देखा था।

दो सूखे पत्ते नम मिट्टी में

एक रोज़ कोई कोंपल खिली जैसे नज़र फेरते ही किसी ने बटुआ पार कर लिया हो। एक रोज़ उससे मिला। फिर उससे ऐसे बिछड़ा जैसे खाली बटुए को किसी ने उदासी ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने या खूबसूरत स्त्री को इरादतन चूमने जितना ही अवैध है.