March 30, 2020

रेत को देशनिकाला



कंगूरे पूछते हैं
यहां तक कहाँ से आ जाती है, रेत।

मेहराबें कहती हैं
नीच चीज़ें ही होती हैं सर पर सवार।

खिड़कियां उदास हैं
इस रेत के कारण बन्द रहना पड़ता है।

बग़ीचे नहाते हैं दो वक्त
रेत की छूत से घबराए हुए।

बहुत तकलीफ़ होती है नौकरों को भी
जब मालिक की आंख में चुभ जाती रेत।

लेकिन
रेत को देशनिकाला नहीं दिया जा सकता।

कि रेत पर ही खड़े हैं महल माळीये
कि रेत से मिलकर ही बनी मेहराबें
कि रेत में ही सांस ले रही है बग़ीचों की जड़ें
कि मालिक ख़ुद खड़ा हुआ है रेत पर।

हठी, निर्लज्ज, अजर, अमर
रेत ने ही बचाकर रखा हुआ है सबकुछ
सब कुछ बना हुआ भी उसी से है।
* * *

सूने राजमार्गों पर रेत पसर रही है। रेत के पांवों में छाले हैं। रेत घबराई हुई कम है। रेत, महलों और दरबारों से हताश अधिक है।
* * *

रेत ने ईश्वर को पाजेब की तरह पहना हुआ है। रेत ने ईश्वर को कांख में दबा रखा है। रेत ने ईश्वर को सर पर उठा रखा है।
रेत के पास ईश्वर कम से कम होता जा रहा है।
ईश्वर के न रहने पर तुम्हारी इस दुनिया को मिटा कर रेत को नई दुनिया बनानी पड़ सकती है।
* * *


Picture courtesy - scroll.in

March 27, 2020

इन दिनों की याद


बिल्ली हेजिंग के पास पीठ के बल लेटी है। मैं मुख्य द्वार के पास लोहे की लंबी बैंच पर बैठा हूँ। हम दो ही हैं। बाकी दफ़्तर में सन्नाटा पसरा है। मैं बिल्ली को देखता हूँ और वह मुझे देखती है।

विंक पर बहादुर शाह ज़फ़र की ग़ज़ल प्ले कर ली है। मेहदी हसन गा रहे हैं। बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी।

तस्वीर थोड़ी देर पहले स्टूडियो में ली थी। इन दिनों की याद की तरह बची रहेगी।

March 25, 2020

छायाकार की तस्वीर में रखी बेचैनी

मैं कुछ भी हो सकता था
मगर उसके बिना क्या ही था?

अचानक एक बीता लम्हा याद आता है। बेचैनी, उद्विग्नता और डर से भरा हुआ। कि अब वो जाने कहाँ होगा। इसके बाद तेज़ क़दम मैं भागने लगता।

मैं चल रहा होता मगर लगता कि भाग रहा हूँ।

एक दस्तक होती। वह जाने कहाँ है। मैं जाने क्या चाहता हूँ। हम क्या करेंगे। दुनिया के किस सांचे में ये फिट होगा। क्या इससे कुछ बनेगा। क्या इससे कुछ बिगड़ जाएगा?

जो हो सो हो।

हर कदम और हर सांस पर एक लंबी और न खत्म होने वाली प्रतीक्षा बनी रही। कुछ ऐसा न था कि मैं मुस्कुरा सकूँ। मैं आवाज़ दे सकूँ। मैं कह सकूँ कि तुम्हारा होना कितना और क्या है।

वह जो भी है। वह तस्वीर ले रहा है या तस्वीर में बेचैनी पढ़ रहा है। वह वही है। लेकिन ये तस्वीर वही लम्हा है। जहां मैं गुंजलक खड़ा हूँ। कब कौन कुछ सब कह सकता है।

मैं कितनी अजीब तरह से देख रहा हूँ। इसलिए कि मैं ऐसा ही हूँ। कि मेरे साथ सुबह के रूमानी ख़्वाब देखता। चौंक कर जागता हुआ, वही है।

ये दुनिया वैसी नहीं है। जैसी हमको सिखाई गयी है। ये उतनी साफ, सरल और सीधी नहीं है। इस दुनिया का ऐसा होना केवल कल्पना है। असल में दुनिया एक जादू का भयभीत करने वाला पिटारा है।

चाहनाएँ चुप और संजीदगी मुखर रहती।

केसी।

तुम बुला लेना। इसी बात पर उम्र भर पश्चाताप न रहेगा कि बुलाया न था।

March 24, 2020

बियाबान में भागती रेल




कलाई पर कान रखे लेटा हुआ था। धक-धक की आवाज़ सुनाई देने लगती है। मैं उसे थोड़ा अधिक ध्यान से सुनता हूँ। ये केवल रेल की आवाज़ भर नहीं है। ये आधी रात को बियाबाँ में भागती हुई रेल की आवाज़ है।

मैं इस रेल में सवार कहीं जा रहा हूँ।

रेल एक झटका खाकर रुकती है। जैसे कोई आपात स्थिति थी। मेरा बदन सीढ़ी से पैर चूकने के डर से सम्भलता हुआ ठहर जाता है।

भाप जैसे धुएं के बीच से आता हुआ मैं सफेद दिखाई देता हूँ। प्रतीक्षालय के अंधेरे की ओर बढ़ते हुए मेरा रंग श्याम होने लगता है। प्रतीक्षालय के चिकडोर के अन्दर सीलापन है। चुप्पी का जाल है।

मैं रेलवे स्टेशन से बहुत दूर निकल आया हूँ। सीधे सूने मार्ग पर तन्हाई पसरी है। अब मुझे पदचाप सुनाई पड़ती है। क्या ये मेरी पदचाप है या तुम मेरे पीछे चले आ रहे हो। मैं मुड़कर नहीं देखता।

सोचता हूँ इतनी दीवारें किसने बनाई है। ये रास्ते किनके गुज़रने से बने हैं। ये शाम का धुंधलका है या आधी रात की जादुई चमकीली स्याही।

धक-धक, धक। रेल फिर से चलने लगी है।

मैं उतर चुका हूँ। इसलिए ये वो रेल है जिसमें तुम हो। रेल धक-धक का मद्धम लय में गाना गाने लगती है। मैं चाहता हूँ कि दौड़ता हुआ इसमें चढ़ जाऊं। गलियारे में चलता हुआ तुमको खोज लूँ।

फिर हम दोनों रेल से उतरकर एक बैंच पर बैठे जाएंगे। दूर तक कोई न होगा। इस दुनिया की भीड़ का स्वप्न बहुत दूर छूट चुका होगा। रेल आवाज़ किए बिना चुपचाप चली जायेगी।

March 21, 2020

जनता कर्फ्यू।

जनता कर्फ़्यू।

टीवी वाले कह रहे हैं कि हम आपको विश्व क्लासिक दिखाएंगे। रेडियो वाले कह रहे हैं कि आपका ज्ञान के साथ मनोरंजन करेंगे। किताबों वाले कह रहे हैं कि अच्छा अवसर है, किताबें पढ़िये। तो जिसके पास जो है वह उसने प्रस्तुत कर दिया है। आपकी सेवा में उपस्थित है।

आप क्या करेंगे। आपने सोचा है?

मैंने सोचा कि अगर मैं घर पर होता या एक दिन नितांत अकेले जीने का अवसर पाता तो क्या करता?

इसी सोच में कोरोना की गम्भीरता के बारे में सोचने लगा। सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक व्यवस्था और स्थिति के आस पास मनुष्य समाज चल रहा है। राजनैतिक और आर्थिक स्थितियाँ एक दूजे की पूरक है। एक के चरमराते ही दूजी अपने आप ध्वस्त हो जाती है।

दुनिया की आर्थिक स्थिति को शेयर बाज़ारों के हाल से समझा जाता है। शेयर बाज़ार तीस प्रतिशत लुढ़क चुके है। ऐसा नहीं है कि ये कोरोना ने ही किया है। ये कोरोना नहीं तो किसी और कारण से भी करेक्ट होता। करेक्ट होना सही होता है। आप अपने आप को ठोक बजा कर सॉलिड कर लें तो ज़्यादा लंबे समय तक चल सकते हैं।

शेयर बाज़ारों के गिरने का सिलसिला अगर यहीं रुक जाता है तो समझिए कि ये उनका अपना करेक्ट होना था। इससे नीचे का रुख होते ही समझना कि आप वो देखने जा रहे हैं, जो पिछले दो सौ साल में किसी ने नहीं देखा होगा।

शेयर बाज़ार में होने वाले नुकसान के सबक बहुत लोगों के पास हैं। वे अरबपति लोग हैं। उन्होने खोया और पाया। पाया और खोया लेकिन मुझे इन सब लोगों से अलग एक वह ट्रेडर अक्सर याद आता है जिसने बाज़ार खुलने के एक घंटे में लाखों डॉलर खो दिये। अपना कमाया हुआ लगभग सारा का सारा।

ऐसे हादसे अनेक ट्रेडरों के साथ पेश आते हैं। लेकिन मुझे वही क्यों याद आता है? इसलिए कि उसने कहा मैं चितबगना हुआ खड़ा था। मेरा दिमाग काम नहीं कर रहा था। ये क्या हुआ। फिर अचानक मैंने वाक्य को बदला। "ये क्या हुआ" को "ये क्या है" कर लिया।

इसके बाद वह व्यक्ति महानगरीय जीवन को छोड़कर जंगल में चला गया। उसने खुद से कहा कि मैं किस मानसिक दबाव में जी रहा हूँ। क्या मेरा जीवन इन्हीं अरबों डॉलर के पीछे भागने के लिए बना है।

नहीं!

मैं कुदरत के साथ रहूँगा। मैं अपने होने को महसूस करूंगा। मेरे पास हरियाली। समंदर। जीव जंतुओं की आवाज़ें और पंछियों का कलरव होगा। वह व्यक्ति अब भी है। बरसों बाद भी जंगल में प्रकृति के साथ खुश है। मुझे लगता है शेयर बाज़ार से सबसे अच्छा सबक उसी ने सीखा है। पैसा बनाने वालों ने अभी कुछ नहीं सीखा।

अब आप सुन देख रहे होंगे कि दुनियाभर में बाज़ार बंद हो रहे हैं। ये आर्थिक आपातकाल है। इसकी गम्भीरता को समझना मेरे बस की बात नहीं है। लेकिन मैं इतना समझता हूँ कि हठधर्मी मनुष्य अपने इसी जीवन में लौटना चाहेगा जबकि ये एक अवसर है। नए सिरे से पुराने बाज़ार बनाने का। ये अवसर है कि कुदरत का शोषण करना छोड़ कर उसके साथ जीने का। ये अवसर है युद्ध और शोषण की दुनिया को बदलने का।

पता नहीं क्या होगा लेकिन खतरे का सायरन बज चुका है। इस बार नहीं तो अगली बार प्रकृति का स्वच्छता अभियान चलेगा।

किसी की बहादुरी को बताने के लिए कहते हैं फलां आदमी शेर है। किसी से नहीं डरता। तो आदमी की क्यों शेर की ही याद कर ली जाए। अफ्रीका वाले शेर तो और भी बब्बर थे। एक नन्हा सा विषाणु आया ऐन्थ्रेक्स। उसने केवल शेरों का कुनबा साफ किया। कहते हैं पाँच प्रतिशत शेर बचे रहे। ये आंकड़े कितने ठीक है मैं स्थापित नहीं कर सकता मगर ये कह सकता हूँ कि कुबुद्धि आदमी ने उसी ऐन्थ्रेक्स के जैविक हमलों की अफवाहें बनाई। दुनिया भर को डर में धकेल दिया।

पिछले बरस एक खबर पढ़ी थी। वह सच कितनी थी कहना कठिन है लेकिन वह किसी नामी पत्रिका पत्र में थी। अमेरिकी एजेंसी के किसी व्यक्ति ने स्वीकारा कि हमने एड्स को फैलाने के लिए मासूमों का उपयोग किया। ऐसे साधारण मरीज जिनको कुछ न हुआ था उनमें इंजेक्ट किया। वे अफ्रीकी लोग जो शिकार हुये, आगे चलकर दुनिया भर में बदनाम हुये। इस बीमारी ने कितना कहर ढाया आप बेहतर जाने हैं।

अगर ये ख़बर किसी बुनियाद पर सच ठहरती है तो कोरना के बारे में भी कभी ऐसी बात बरसों बाद सुनी जाए तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

इससे मैं क्या समझा? कि ये केवल एक बीमारी नहीं है। सम्भव है कि आपदा की जगह ये एक युद्ध है।

जनता कर्फ़्यू केवल युद्ध का जवाब भर नहीं है वरन उससे बढ़कर एक अवसर है। ऐसा अवसर कि हम प्रकृति के बारे में सोचें और समझें। हम इस अंधी भौतिक दौड़ में कितनी भयावह दुनिया बना चुके हैं, इसका अनुमान लगाएं।

हम जानें कि हमारी आवश्यकताएं कितनी हैं। मानसिक दबाव और भविष्य के भय से भरी जीवन शैली को अलविदा कहने का साहस जुटाएं।

कल अच्छा होना चाहिए इसके लिए श्रम करें। कल क्या होगा की चिंता व्यर्थ है।

March 19, 2020

बारूद से बिछड़े पलीते

उसकी बातों का किसी भाषा में
अनुवाद नहीं किया जा सकता था।
इसलिए कि वे बातें किसी भाषा में लिखी नहीं जा सकती थी।

प्रेम को कैसे कोई लिख सकता है कि वह कैसा है। इसी तरह दुख को भी कैसे लिखा जा सकता है। उपस्थिति या अनुपस्थिति को कैसे लिखा जा सकता। कुछ भी नहीं लिखा जा सकता।

केवल एक ब्योरा दिया जा सकता है कि उसकी प्रेमिल आँखें चेहरे पर किस तरह टिकी थी। उन आँखों को इस तरह देखते हुये देखना कैसा था। उनको देखकर किस तरह मन भीग गया था। लेकिन शब्द और वाक्य अधूरे रह जाते हैं।

वे ठीक-ठीक नहीं लिख पाते कि किस तरह सीले बरस उन आँखों के देखने भर से गायब हो जाते हैं। किस तरह उन आँखों की झांक पूरे बदन में लहू भर जाती है। अतीत की खरोंचों के निशान झड़ने लगते हैं। जैसे कोई पेड़ नया हो रहा हो।

कोई कैसे किसी को कुछ कह सकता है कि तुमने कितना दुख दिया या कितना प्रेम किया। भाषा के पास अभी इतना नहीं है। अभिनय के पास भी नहीं। केवल बीते हुये कल के सामने आज रखकर कहा जा सकता है कि देखो तुम्हारे होने न होने से कितना कुछ बदल जाता है। लेकिन ठीक-ठीक ये नहीं कहा जा सकता कि तुम्हारा होना कितना है।

एक तुम ही नाउम्मीदवार थे। जिसके पास कोई ऐसी कोई उम्मीद न थी कि कुछ पा लेना है। जिसके पास केवल मन था, साथ होने का मन। उसी मन की बुनियाद पर तुम्हारी आँखें झांक पाती इतना प्रेमिल। यही कहा जा सकता है मगर शायद ये उतना ठीक नहीं है कि तुम्हारा देखना बस इतना भर नहीं है। ये इससे कहीं अधिक है। 

कभी-कभी बारूद से पलीते बिछड़ जाते हैं। पलीता समझते हो न? वह जो आग को वहाँ तक पहुंचाए जहां पहुंचानी है। वह पलीता है। जैसे पटाखों में लगे होते हैं। पलीता न हो तो जीवन उदास बेढब पड़ा हुआ सड़ता रहता है। तो किसी का होना एक पलीता हो जाता है। वह जो हमें किसी शोरगर के बनाए अनार की तरह रंगीन रोशनी से भरकर बिखेर दे। वह जो हमारे दुखों में एक महाविस्फोट कर दे। ये सब लिखकर भी नहीं लिखा जा सकता कि किसी को महसूस करना कैसा होता है।

सुबह छः बजे से छत पर बैठा हूँ। हवा के झकोरे बार-बार मुझे छू रहे हैं। कभी कभी ये इतनी तेज़ है कि किसी प्रेमिका ने अपने प्रेमी को शरारत में हल्का धक्का दिया हो। और उसे मजबूती से थाम लिया हो। इसी तरह मैं भी सिहर कर वापस अपने पास लौट आता हूँ। देखता हूँ कि क्या लिख रहा हूँ। समझ रहा हूँ कि वह नहीं लिख पा रहा हूँ जो लिखना चाहता हूँ।

ये मेरा दोष नहीं है। ये भाषा की कमतरी भी नहीं है। लेकिन क्या किया जा सकता है कि कुछ भी ठीक वैसा नहीं लिखा जा सकता जैसा साथ होने पर महसूस होता है। जैसा हम अपने आगे पीछे झाँककर याद कर पाते हैं। 

मैं अगर कहूँ कि तुमको बाहों में भर लिया है। मेरी नाक तुम्हारे गालों को छू रही है। तो इसे सुन-कह कर जो होता है, वह कैसे भी नहीं लिखा जा सकता।

लिखने की कोशिश करना बेकार का काम है। मगर मेरी फितरत ऐसी है कि लिखकर थोड़ा सा आसान हो जाता हूँ तो लिखता रहता हूँ। इस लिखने को दरकिनार ही रखना।

शुक्रिया। 
* * * 

March 18, 2020

धुंध का कालीन

मेरे सामने पुराने काग़ज़ों की सतरें थीं। जैसे मेरे बीते बरस किसी पुलिंदे से गिर कर बिखर गए हों। मैंने एक नज़र उन सतरों को देखा। मेरा देखना ऐसा था कि ये हैं तो है, इनका क्या किया जा सकता है। बीते हुए काग़ज़। मैं उनके प्रति उदासीन बना रहा।

उन काग़ज़ों में जो लिखा था, उसे कोई नाउम्मीदवार ही पढ़ सकता था। उन काग़ज़ों को एक हसरत से देखना केवल उसके लिए सम्भव रहा होगा जिसने कभी जाना हो कि ठहर कर देखना ही जीवन है। केवल दौड़ते भागते हुए लोगों, सभ्यता और समय का पीछा करना एक बेकार काम है।

क्या उन काग़ज़ों में कोई कागज़ किसी बुरादे में बचे हुए बारूद सा हो सकता था या वे सिर्फ सीलन का घर थे? मुझे नहीं पता लेकिन मैंने बार-बार उनको मुड़कर देखा।

क्या मैं बिस्तर की उन सलवटों को याद करना चाहता था जो अकेले रह जाने के बाद बची थी। या फिर शायद मैं उन जगहों पर जाकर बैठ जाना चाहता था, जहाँ मुझे केवल अकेले ही होना था। हो सकता है उन काग़ज़ों को देखते हुए मैंने सोचा हो कि मेरे चेहरे पर छूटे नाज़ुक निशान उन काग़ज़ों में बिखरे-टूटे मिल सकते थे।

हवा तेज़ चलने लगी। पीपल से गहरी और बेचैन करने वाली आवाज़ें आने लगीं।

मैंने मुड़कर नहीं देखा। क्या ये आवाज़ें उन्हीं काग़ज़ों की सतरों से आ रही थी या मेरे दिल के भीतर से उठ रही थी। मैं अचानक भरभरा कर ढह जाने का सोच कर डर गया।

वो जो साथ नहीं है, उसे खो देने का डर।

अचानक बारिश होने लगी। बारिश चौबीस घण्टे बरसती रही। एक धुंध का कालीन बिछा रहा। उस कालीन पर धुंध के फाहे उड़ते रहे।

दिमाग एक शैतान का घरोंदा है। प्रेम में डूबे डरे हुए शैतान का।

March 17, 2020

मैं चलकर मुझतक जाना चाहता था

मैं कब का लौट चुका था मगर अचानक वहीं पहुंच जाता था। हवा सूखे फूलों को बुहारती किनारे कर गयी थी। रास्ता दूर तक सूना हो गया। छीजती रोशनी फर्श पर गिर रही होती मगर लाल झाईं नहीं उग पाती। सलेटी रंग दूर जाकर स्याह हो रहा होता।

हुजूम छंट चुका होता। लोग जा चुके होते। सूनी सड़क से उठते सन्नाटे के बगुलों की तरह आस-पास के कोनों में कोई धुन बजती रहती। वहां खड़े हुए मैं ख़ुद को देखने लगता कि क्या वो मैं उसी चेहरे को तलाश रहा है? लेकिन मुझे मैं कभी इस तरह खोजता हुआ न मिला। बल्कि हर बार झुके कंधे और थोड़ा सा सिर झुकाए हुए चुप खड़ा देख पाता।

मैं चलकर मुझ तक जाना चाहता था। कि पूछ सकूँ तुम बार-बार यहां क्यों चले आते हो। ये किसी का घर नहीं है। यहां से कोई बस किसी जगह नहीं जाती। यहां से कोई रेल भी नहीं गुजरती। ये एक ऐसी जगह है जहाँ खुद चलकर आना पड़ता है, खुद ही जाना। मैं ये पूछने को बढ़ना चाहता तो पाता कि रोशनियों की लकीरें धुंध में बदल रही है। मैं जो वहां खड़ा था कहीं गुम हो गया हूँ।

मैंने बहुत बार सोचा कि वहां ऐसा क्या हो सकता है जो मुझे खींच लेता है। विरल ही लेकिन ऐसा भी होता है कि हम साए से कहते हैं, तुम साथ रहना और वह चला आता है। ऐसे ही एक साया, एक स्मृति, एक अनदेखी अनुभूति वहीं रही होगी कि मैं अक्सर बन्द कमरे में रोशनदानों से आती रोशनियों के बीच खड़ा होता। अपनी खोज में निकलता तो ख़ुद को वहीं खड़ा मिलता।

बरसों मैं उसी जगह भटकता रहा। जब तक कि मैंने ये न सुना था कि पहले माले पर रेलिंग के सहारे एक साया या किसी का वो खुद वहां खड़ा रहता है।

ऐसा सुनते ही उन धुंधली रोशनियों के बीच से मैं गायब हो गया। जैसे मेरा वहां होना, अतीत में बहुत दूर भूली-बिसरी न पहचाने जाने वाली उपस्थिति भर हो।

तो मेरा क्या हुआ। क्या मुक्ति हो गयी। उदास सीली रोशनियों ने मुझे छोड़ दिया या मैं कहीं और चला गया था।

एक शाम मैंने वैसी ही आवाज़ सुनी जो उस जगह पर सुनी थी। मैंने सोचा कि अब रेगिस्तान का बुझता ठंडा दिन वैसी ही रोशनियों से भर जाएगा। लेकिन ऐसा कुछ न हुआ। मैं दूर तक टहलता रहा।

मैं जाने कहाँ कहाँ खुद को खोजने जाता रहा हूँ। वह मैं अकेला नहीं होता हूँ। हमारा जीवन जितना बाहर से इकहरा दिखता है, असल में उतना होता नहीं। हम जाने कहाँ भटकते रहते हैं। अजीर्ण प्यास से भरे हुए। अजाने संसार के अनदेखे रास्तों पर चलते रहते हैं।

कोई नहीं जान सकता कि इस समय हम कहाँ हैं।

मुझे परालौकिक शक्तियों पर विश्वास और अविश्वास जैसा कुछ नहीं है। मैं जानता हूँ कि अभी यहाँ बैठा हूँ मगर यहां हूँ नहीं। मैं गुज़रे मौसमों की आहटें अपने पास सुनता हूँ जबकि वे बहुत पीछे छूट चुके होते हैं ना दोहराये जाने के लिए।

क्या सचमुच कुछ ख़त्म होता है? नहीं। वे मौसम जो मेरी नज़रों से खो गए। मैं जब खुद से खो गया तो हम फिर टकरा गए।

एक गहरी सांस आने तक हम कुछ सांसें स्किप कर चुके होते हैं। मैं दिखते जीवन को स्किप करता जाता हूँ। मैं कब तक इसी तरह चलता फिरता खुद को देख सकता हूँ। इसलिए मैं धुंध में ढलती रोशनियों, उजाड़ रास्तों के मादक बुलावों और न बुझने वाली कसक के भीतर खो जाता हूँ।

तुम इसे नहीं समझोगे जब तक तुम खुद को खोजने का सिलसिला न बुनोगे। ये भी तब तक आरम्भ न होगा जब तक तुमको ये मालूम न होगा कि तुम यहाँ हो पर यहां नहीं हो।

एक मैं जो यहां बैठा लिख रहा है, दूजा मैं बहुत दूर अलसाया अधलेटा है।

March 14, 2020

छत पर बैठी उदास शाम

छत के पास बची होंगी
कितने गीतों की कतरनें
कितनी ही रूमान भरी करवटें।

दुछत्ती पर पड़ी रेत सोचती रहती है।
* * *

बाहों में पड़ी बाँहों को
उखड़ी हुई साँसों को
तारों को देखती आँखों को।

कितना भूल पाती होंगी छतें?

छत के कोने में पड़ी रेत ने बहुत बार सोचा।
* * *

क्या कभी गुमसुम हो जाती है
या फिर कभी मुसकुराती है, छत?

रेत का बहुत मन था कि पूछे
मगर वह ठिठक गयी।

जाने छत की खुशी कैसी निकले
जाने उसकी उदासी कैसी हो?
* * *

सर्द मौसम की आती हुई रातों में
गरम दिनों की ढलती हुई सुबहों में
लिहाफ़ों से आती सरगोशी पर
क्या छत ने कभी कान दिये थे?

ये सोचकर सहसा
रेत के कान लाल हो जाते हैं।
* * *

बहुत उदास शाम थी
बहुत देर छत पर बैठी रही।

बहुत उदास छत है, यही सोच कर।

रेत ने सोचा
पक्का यही बात है।
* * *

तन्हा और लंबे सन्नाटे से भरी छतें
आपस में क्या बातें करती होंगी?

यही जानने
रेत कभी इस छत जाती, कभी उस छत।
* * *

कभी किसी शाम
छत पर अनार झड़ने लगते

रेत सोचती रहती
कि आज छत ने क्या सुन लिया है?
* * *

मन छत की तरह चुप, तन्हा और ठहरा रहता है। रेत की तरह बिखरता और सिमटता जाता है। आवाज़ के भंवर पड़ते हैं तो कितनी तस्वीरें बनने लगती हैं। ठंडी हवा से सिहरन होने लगती है, बेचैनी में लरज़िश घुल जाती है और कुछ नहीं।

एक तवील शाम, रुकी हुई रात, न ख़त्म होने वाली दोपहर के सिरों पर रखी, साँसों का इंतज़ार ज़रूर एक खुशी है।

तुम ही छत हो, तुम ही रेत हो। मैं भी।

* * * 

March 12, 2020

बारिश की सीलन

तट तट तट

बारिश की बूंदें दिखी नहीं मगर एक ख़ुशबू आई। बारिश के आने से पहले उसकी ख़ुशबू। फिर देर तक बिजलियाँ कड़कीं और पानी बरसता रहा। बेमौसम। अगले रोज़ कान बजने लगे। एक दीर्घ शोक में डूबी हुई बहुत दूर से आती आवाज़ जैसी हवा। खिड़की खोली। दरवाज़ा खोला। बाहर आया मगर चैत्र की शुरुआती आंधियों के निशान गायब थे। दोपहर होते हवा तेज़ बहने लगी। हर दीवार, हर मोड़ और हर दरख़्त से कट कर आती हवा में वही गीत था। तनहाई का गीत।

कभी जब बेमन बारिश में भीग जाते हैं तब कैसा लगता है। कपड़े की छुअन भर से अजीब सा हाल होने लगता है। बदन से अपने टी को दूर रखे रहने की नाकाम कोशिश। जींस के भीगेपन से बचने की कोशिश। लेकिन सब नाकाम। ऐसा ही हाल था। चमकीली पन्नियों से नीली-पीली बेढब कंचों सी छोटी गोलियां निकालता और उदास आँखों से देखता हुआ निगल लेता। वे उदास आँखें घड़ी भर बाद सूनी आँखों में बदल जाती। सिर वैसा ही हो जाता जैसा बेमन भीगे कपड़ों से असहज बदन होता है।

माइक्रोफोन का फेडर खोला और सोचने लगा कि मुझे क्या बोलना है। बरसों से उच्चरित शब्द भूल के खाने में चले गए। वाक्य अधूरे और गुंजलक हो गए। जैसे कि उनका कोई अर्थ ही न हो। जैसे कोई बच्चा कुछ कहते हुये अचानक रुक कर सोचने लगा। जैसे औचक एक ख़याल पानी के भंवर की तरह आया और मैं उसके साथ घूमने लगा।

मैं स्टुडियो से कब बाहर आया याद न था। ये याद आया कि मुंह अधखुला है और मैं कबूतरों को देख रहा हूँ। फिर याद आया कि कहाँ बैठा हूँ। फिर खुद को याद दिलाया कि ये वही चमकीली पन्नियों में भरा रसायन है। आह! ये सुख भी तो है।

तो जब बारिश न आई थी तब कैसे लगा कि बारिश की ख़ुशबू है। जब साँय- साँय बजती हवा न थी तब कैसे सुनी उसकी आवाज़। जब उदासी न थी तो कैसे नीम की सूखी पत्तियों की तरह शब्द कागज़ पर गिरने लगे।

नींद उचट जाती थी। नीम नींद में समय का अनुमान लगाता। इसलिए नहीं कि जागकर कुछ काम करना होता था। इसलिए कि दिल धडक जाता था कि अभी तक अगर सुबह नहीं हुई है तो तो कैसे होगा। इस वक़्त मैं कहाँ जा सकूँगा।

एक बार साढ़े तीन बजे थे। बेहद घबराहट हुई। अब क्या करूँ? दो करवट बदलते ही नींद आ गयी। फिर आँख खुली तो डरते हुये दीवार घड़ी को देखा। छः बज रहे थे। कितने अजीब डर हैं। जाग जाने के डर। फिर ये हुआ कि बहुत महीनों बाद देर से जागा। सुबह के पौने सात बजे थे। देर तक मुस्कुराया।

मैं कभी नहीं समझ पाया कि मैं हूँ क्या? किस चीज़ से बना हूँ। क्या मुझे इस तरह निरर्थक भय से भर देता है। वे कैसी बातें हैं, जो मुझे सुनाई नहीं देती लेकिन मैं उनके कारण बिखरने लगता हूँ।

रात को सोने के समय सामने की दीवार देखता हूँ। लकड़ी की लम्बी अलमिरा के ऊपर एक छोटा हवाई जहाज रखा है। वैसा जैसा पाठ्य पुस्तकों में पहले-पहल वाले हवाई जहाज को देखा था। वह धीरे-धीरे दिखना बंद होने लगता है। सिर पर कोई ठंडी हवा का पंखा झलता है। आँखें मुँदने लगी हैं। मैं सोचता हूँ कि सुबह की ओर जा रहा हूँ। हाँ सुबह की ओर।

चश्मे की कमानी अंगुलियों में फंसी रहती है। एक झपकी के साथ डर जाता हूँ कि चश्मा गिर गया है। लेकिन वह वहीं होता है अंगुलियों में फंसा हुआ।
लरज़िश भरे हाथ से चश्मा पलंग के नीचे रख देता। उतना भीतर कि भूल से भी कोई उसे छू न पाये।

मैं चश्मे की तरह ही ख़ुद को भी रख देना चाहता हूँ।

वहीं।
* * *

March 8, 2020

और कुछ नहीं

कभी-कभी

पीड़ा को, हताशा को,
दुख भरे आंसुओं को
बरबाद मोहब्बत को
नष्ट हो चुके सम्बंध को 
न भरे जा सकने वाले नुकसान को
माफ करने का मन हो जाता है।

कि शैतान नहीं झाँकता पीछे
वह फिसलता रहता है वक़्त के रेले में
शैतान की प्रेमिका की आँखें खोजता हुआ।
* * *

और कुछ नहीं।

March 3, 2020

जादूगर का दुःख

जब जादूगर मंच से चला जायेगा
तब दर्शक अपने असली दुखों से घिर जाएंगे।

एक जादूगर ही होता है जो सियार को भेड़िया, कुत्ते को बिल्ली, कबूतर को खरगोश बना सकता है। वह सबको एक रंग में रँगे जाने का स्वप्न दिखाता हुआ आता है।

उसका वादा होता है कि अफ्रीकी कालों, बर्फीले देशों के गोरों, मध्य के गेहुंआ लोगों को अपनी टोपी से निकालता हुआ एक जैसा कर सकता है। सब भेद मिटा सकता है।

वह सारी प्रार्थनाओं को एक प्रार्थना में बदल सकता है। वह सब प्रार्थनाघरों के दरवाज़े एक दिशा में ला सकता है। वह इतिहास के तमाम अत्याचारों का बदला वर्तमान से ले सकता है। वह वीभत्स की स्मृति को सजीव कर सकता है।

जादूगर के पास इतनी खूबियां होने के बाद भी उसके अपने निजी दुख होते हैं। सबसे बड़ा दुख होता है कि वह जानता है, जादू आंखों में धूल झोंकने का काम है।

मैं आप की आँखों में धूल झोंकते हुए थकने लगता हूँ। कभी-कभी मेरा मन होता है कि सोशल मीडिया छोड़ दूं।

लेकिन मैं आपके हक़ में सोचता हूँ कि शैतान की प्रेमिका की कविताएं कहता रहूँ ताकि आप सब व्यवस्था की बढ़ती नाकामी, भ्रष्टाचार, आर्थिक मंदी, लुटते बैंक, बेमौत मरते श्रमिक, आत्महत्या करते कृषक, नौकरियां खोजते नौजवान, न्याय को तरसती आंखें आदि अनादि बेकार की बातों को भूले रहें।

भुलावा ही सबसे बड़ा जादू है। भूलना ही सबसे बड़ा सुख।
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सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.