March 14, 2020

छत पर बैठी उदास शाम

छत के पास बची होंगी
कितने गीतों की कतरनें
कितनी ही रूमान भरी करवटें।

दुछत्ती पर पड़ी रेत सोचती रहती है।
* * *

बाहों में पड़ी बाँहों को
उखड़ी हुई साँसों को
तारों को देखती आँखों को।

कितना भूल पाती होंगी छतें?

छत के कोने में पड़ी रेत ने बहुत बार सोचा।
* * *

क्या कभी गुमसुम हो जाती है
या फिर कभी मुसकुराती है, छत?

रेत का बहुत मन था कि पूछे
मगर वह ठिठक गयी।

जाने छत की खुशी कैसी निकले
जाने उसकी उदासी कैसी हो?
* * *

सर्द मौसम की आती हुई रातों में
गरम दिनों की ढलती हुई सुबहों में
लिहाफ़ों से आती सरगोशी पर
क्या छत ने कभी कान दिये थे?

ये सोचकर सहसा
रेत के कान लाल हो जाते हैं।
* * *

बहुत उदास शाम थी
बहुत देर छत पर बैठी रही।

बहुत उदास छत है, यही सोच कर।

रेत ने सोचा
पक्का यही बात है।
* * *

तन्हा और लंबे सन्नाटे से भरी छतें
आपस में क्या बातें करती होंगी?

यही जानने
रेत कभी इस छत जाती, कभी उस छत।
* * *

कभी किसी शाम
छत पर अनार झड़ने लगते

रेत सोचती रहती
कि आज छत ने क्या सुन लिया है?
* * *

मन छत की तरह चुप, तन्हा और ठहरा रहता है। रेत की तरह बिखरता और सिमटता जाता है। आवाज़ के भंवर पड़ते हैं तो कितनी तस्वीरें बनने लगती हैं। ठंडी हवा से सिहरन होने लगती है, बेचैनी में लरज़िश घुल जाती है और कुछ नहीं।

एक तवील शाम, रुकी हुई रात, न ख़त्म होने वाली दोपहर के सिरों पर रखी, साँसों का इंतज़ार ज़रूर एक खुशी है।

तुम ही छत हो, तुम ही रेत हो। मैं भी।

* * * 

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.