June 29, 2020

बहुत पुरानी तस्वीर

फिर मचलने लग गई दिल में हज़ारों ख़्वाहिशें आप की तस्वीर एक बरसों पुरानी देख ली।

परवेज़ मेहदी साहब गा रहे हैं। आधा चाँद है। हवा बन्द है। किसकी तस्वीर याद आई? मैं सोचता हूँ तो कोई तस्वीर याद नहीं आती। किसी की भी नहीं। हम जिनसे खफ़ा होकर बिछड़ जाते हैं। स्मृति से उनकी तस्वीरें भी मिट जाती हैं क्या?
एक लड़का, कभी एक आदमी और कभी एक अधेड़ खड़ा याद आता है। वह जिस से मिलेगा या जिस से मिल चुका है, वो दिखाई नहीं देता। केवल चौराहे के लैम्पपोस्ट, दुकानों की निऑन लाइट्स, ऑटो वाले और कैब वाले दिखाई देते हैं।
वे सब जिनसे कोई शिकवा न था, सब स्मृति में बचे हुए हैं। जैसे रास्ते, मॉल्स, कहवाघर और अजनबी बिस्तरों वाली होटेल्स। लेकिन वे जो मिले, जिनको गले लगाया, चूमा, जिनके साथ रहे। उनकी सूरतें तस्वीरों से क्यों गायब है।
मैं अक्सर मुड़कर नहीं देखता। किसी के पीछे भी नहीं झांकता। इसलिए कि हर पल एक नया आदमी हमारे साथ होता है। वह कहां क्या जी चुका है, उससे मुझे कोई लगावट नहीं होती लेकिन वह जो अभी मेरे साथ है, कल कहाँ होगा? ये सोचकर अक्सर घबरा जाता हूँ। हालांकि पुरानी तस्वीरों की स्मृति से सब ज़िंदा चेहरे गायब हैं और मुझे इसका अफ़सोस भी नहीं।
हम तस्वीरों में किसी का होना नहीं चुन सकते। ये अपने आप होता है। ऐसा कहकर खुद को समझाता हूँ। लेकिन अचानक किसी फ़िल्मी दृश्य की तरह नायक को चूमती हुई नायिका याद आने लगती है। कभी एक अधिकार से हम हाथ थामे साथ चलते हैं, उसी तरह अधिकार से कहकर चूमना तस्वीरों से नहीं मिट पाता। ऐसे ही अनेक बार का साथ अक्सर तस्वीरों में लगभग खोजा नहीं जा सकता।
कभी-कभी मैं वो तस्वीरें भी देखता हूँ जो अभी तक खींची न जा सकी। इसलिए कि वह लम्हा अभी आया नहीं है। अगर वह तस्वीर खींची जाएगी तो मैं कहूंगा कि चले जाने के बाद भी हालांकि ज़िन्दगी चलती रहेगी मगर तुम ईमान से साथ रहे तो ये तस्वीर कभी बरसों पुरानी न होगी।
मेरे पास सोचते रहने के सिवा कोई काम नहीं है। कभी कोई दिन होता है, जो सुबह से देर रात तक ख़यालों में बीतता रहता है। चाँद है कि धीरे दिल मे उतर रहा है। मेरी आँखें जितनी बन्द होती जाती है। चाँद उतना ही अधिक दिल के क़रीब महसूस होता है।
बहुत पुरानी तस्वीर अक्सर बहुत पुरानी नहीं होती है।

June 27, 2020

तुम मेरे इंतज़ार में

मादक वनैली गन्ध और तुम्हारे नाम के बीच कितना कम फासला है।

तीन दोपहरों से पसीना चू रहा था। मैं अपने अंगोछे से माथे का पसीना पौंछता था। उस अंगोछे से एक परिचित गन्ध आती थी। रंगों की गंध। मैं समझने लगता कि तुम भी कोई रंग ही हो।
इस समय खुले आंगन में कुर्सी पर अधलेटा हूँ। सामने छपरे पर पसरी अमृता के दिल जैसे पत्ते अंधेरे में कहीं-कहीं चमक रहे हैं। पत्तों के ऊपर बादलों के असंख्य फाहे हैं। आकाश से हल्की बूंदें गिर रही है।
कौन कह सकता था कि उमस की घुटन से भरा क़स्बा अचानक किसी ऊंचे पहाड़ी गांव सा हो जाएगा। बादलों के फाहों के बीच लोग चल रहे होंगे। लिबास नमी से भर जाएंगे।
ठीक इसी तरह हम चुप रहते हैं। उसे कुछ कहते नहीं। उसका इंतजार करते हैं। बेख़याली में समझते हैं कि कुछ है नहीं। जाने दो। कहाँ रेगिस्तान और कहां वे पानी भरे बादल। एक रोज़ अचानक हम उनकी बाहों में पड़े होते हैं। न पड़े हों तो भी सोच सकते हैं कि ऐसा भी हो सकता है।
कभी-कभी दूर बिजली चमकती है जैसे कंगन पर कोई रोशनी गिरी हो। कभी-कभी हल्की डूबी आवाज़ आती है जैसे कुछ गिर गया है। क्या? शायद, हमारे बेतरतीब पांवों से टकरा कर बिस्तर के किनारे रखी सुरमेदानी या लाइटर। कभी तेज़ लेकिन डूबी हुई आवाज़ आती है जैसे कहीं दूर कोई बहुत भारी चीज़ गिरी, जो गिरकर दोबारा न उछली।
मुझे फूलों की ख़ुशबू आ रही है। बादलों से बूंदें बरस रही है। बियर केन बर्फ के बक्से में पीसा की मीनार की तरह झुका पड़ा है। सोच रहा हूँ कि तुम मेरे इंतज़ार में आकाश में उड़ते बादल देख रहे हो।
ऐसी रातें उतनी ही मोहक होती है, जितना तुम्हारा नाम या मादक वनैली गंध। सचमुच।
* * * *

June 26, 2020

सिगार बनाते आदमी की तरह

मैं तम्बाकू के गीले पत्तों के बीच सूखी हुई पत्तियां रखता हूँ। उनको गोल करके बांधता जाता हूँ। मेरी अंगुलियों में एक चरक सी बहती है लेकिन अंगुलियां इस तीखेपन की इतनी अभ्यस्त हो चुकी होती हैं कि वे तल्लीनता से लगी रहती हैं। एक तीखापन अंगुलियों की त्वचा को छूकर रक्त में घुल जाता है। मैं बहुत अधिक सोचता हूँ तब पाता हूँ कि सिगार बनाना भी एक नशा है।

सुबह की ठंडी हवा बह रही होती है। कभी दोपहर की उमस में अंगुलियां भीग चुकी होती हैं। और अक्सर तो शाम ढल चुकी होती है। तम्बाकू के साथ अकेलेपन की गंध मिलकर एक नई ख़ुशबू बन जाती है। लकड़ी की कुर्सी पर अधलेटा होने से पहले सिगार एक ओर रख देता हूँ। बड़े कासे में रखे पानी में हाथ धोने लगता हूँ। सूती गमछे में हाथ पौंछते हुए पाता हूँ कि गमछा रंगों की उस ख़ुशबू से भरा है जिसे सिंध के लोग बनाते रहे हैं।
ये क्या कर रहा हूँ।
कुर्सी की पुश्त से पीठ टिकाये हुए आकाश की ओर देखता हूँ। बेरी के पत्तों के बीच से चिड़ियाँ जा चुकी होती हैं। शाखाएँ नीरवता से लदी होती हैं। आकाश में धुँआ नहीं दिखाई देता। तब लगता है कि दुनिया कोई जादुई मिट्टी का ढेला है। इस पर मैंने इतने सिगार बनाये और फूँक डाले फिर भी धुएं का निशान बाकी न रहा। मैं जो रोज़ करता हूँ वह कहां चला जाता है?
मैं एक बार किसी राह बढ़ जाता हूँ तो फिर बहुत दूर तक चलता रहता हूँ। अपने आपको रोक लेना या मोड़ लाना असम्भव हो जाता है। मैं दुनिया में सिगार बनाते आदमी को इस तरह अधिक नहीं सोचना चाहता कि हमारे उगते हुए दिन सिगार हैं और उनको फूंक देना, एक दिवस का ख़त्म हो जाना है। दर्शन की पहली कक्षा के बच्चे की तरह उलझना मुझे उदास करता है। मैं सोचता हूँ कि अगर सिगार बनाने और फूंकने को ही ज़िन्दगी कहते हैं तो इस के साथ इतना सारा बोझ क्यों है? क्यों हम कल के लिये बेचैन और चिंतित रहते हैं। किसी रोज़ सिगार बनाने वाला आदमी भी नहीं होगा। उसके कुछ देर बाद आदमी की उपस्थिति अल्पावधि के लिए एक स्मृति में ढल जाएगी। अंततः आकाश में जिस तरह सिगार का धुँआ नहीं खोजा जा सकता, उसी तरह सिगार बनाने वाला भी नहीं खोजा जा सकेगा।
मैं कुछ रोज़ पुराना सूख चुका सिगार उठा लेता हूँ। उसे जलाने के लिए दियासलाई खोजने लगता हूँ। तभी अचानक मुस्कुराने लगता हूँ।
ज़िन्दगी चाहे कुछ भी होगी। तुम्हारा प्यार दियासलाई है, जिसकी तपिश में मेरा एक दिन ख़ुशी से सिगार की तरह पूरा हो जाता है।

June 21, 2020

आम की ओर से चिड़िया को चिट्ठी

 उसका नाम होने को तो कुछ भी हो सकता था। न होता तो भी उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। उसका काम था शाखों पर झूलना। पत्तों से शरारतें करना। पेड़ को गाने सुनाना।

उसका कुछ पक्का न था कि वह कब आएगी। वह अक्सर हवा के झौंके की तरह आती थी। आई और गायब। गायब और फिर से हाज़िर। कभी-कभी तो वह बार-बार आती। पलक झपकने भर के समय में वह कई बार आ जाती।
खरगोश के लंबे कान जैसे पत्तों वाले चम्पा तक वह नहीं जाती थी। वह अक्सर अमृता की लता के सघन कोने में कुछ देर उल्टी लटकी हुई खोजबीन भरी निगाह दौड़ाती। फिर फुर्र से उड़ती हुई आक के फूलों में आ बैठती। वह गाना पहले सुनाती और अपनी चोंच से फूलों को बाद में छेड़ती थी।
एक सुबह मुझे लगा कि आम का नन्हा पेड़ उसके आने का इंतज़ार करता है। वह आती तो आम के पेड़ को अपने पंखों की हवा तक न लगने देती। ये ख़याल आने के बाद मैं बार-बार आम और उसको एक साथ देखता। वे दोनों दूर-दूर होते मगर मैंने एक रिश्ता सोच लिया था।
ऐसे रिश्ते को क्या कहूंगा? इसी उधेड़बुन में मैंने बहुत सारी बातें सोची। मुझे कोई ठीक बात हाथ न लगी। कोई पूछेगा तो कह दूंगा कि पेड़ उस चिड़िया के साथ इकतरफ़ा प्रेम में पड़ गया है। वह आकाश की ओर उठना भूलकर दाएँ-बाएँ ताकाझांकी करने और अक्सर चुप होकर सो जाने में लगा रहता है।
मैं सुबह जब सूरज नहीं निकला होता है तब इस जगह आकर बैठ जाता हूँ। कभी-कभी तो पेड़ और चिड़िया को सोचकर सुबह ही मुस्कुराने लगता हूँ। मुझे कोई मुस्कुराता देख ले तो पक्का वह भी यही समझेगा कि मैं प्रेम पड़ गया हूँ। ये कितनी अच्छी बात है न कि प्रेम में केवल उदासी और इंतज़ार ही नहीं होता। उसमें मुस्कान भी होती है।
ऐसे ही एक सुबह मैंने सोचा कि पेड़ ने चिड़िया को चिट्ठी लिखी है। उसने प्रिय लिखकर नीचे की पंक्ति में लिखा है। मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ। कहना ये है कि मुझे तुम्हारी आंखें पसन्द है। मैं चाहता हूँ तुम कभी मेरे कंधे पर अपने नाज़ुक पंजों वाले छोटे तीखे नख चुभा दो। इसके आगे चिट्ठी खाली पड़ी थी।
उस पन्ने में बहुत कुछ लिखा जा सकता था।
आज सुबह मैं आंगन में आराम कुर्सी पर सीधा बैठा था कि मुझे लगा कोई चिट्ठी गिरी पड़ी है। मैं मुस्कुराया। प्रेम में बेनामी चिट्ठियां लिखना भी कितना मज़ेदार काम होता है। वह जो पढ़ रहा होता है, उसे विश्वास नहीं होता कि ये उसके लिए लिखा गया है। वह जो लिखता है समझता है कि उसे तो सब पता है ही कि ये किसके लिए है।
"देखो! चिड़ियों, तोतों और बाकी सब सुंदर परिंदों को जागते ख़्वाबों में देखना अच्छा है। मुझे मत सोचा करो।" ये चिट्ठी शायद आम के लिए थी। मैंने उदासी से आम के नन्हे पेड़ को देखा। मुझे आम पर दया जैसा प्रेम आया। चिड़िया को ऐसा जवाब नहीं देना चाहिए था।
आम की टहनियों पर गौरैया का एक झुंड पंचायती कर रहा था। आम हवा के साथ लहरा रहा था। मालती से अधिक फूल मोगरा पर खिले थे।
मैंने आम की ओर से चिड़िया को चिट्ठी लिखी। "प्रेम में चुप रहना ही अच्छा होता है। मैं भी चुप हो जाता हूँ।"
जीवन कितना अजीब है न। कभी चाय के बिना आँख नहीं खुलती। चाय के इंतज़ार में झेर ले रहा होता हूँ। कभी सुबह की पहली चाय को भूल जाता हूँ। आज अभी जब आभा ने चाय का प्याला रखा तो याद आई कि चाय अभी बाकी है।
चाय का घूंट लेते ही मैंने महसूस किया कि मोगरा की एक शाख लचक से भर उठी है। अचानक चिड़िया मोगरा के बीच से उड़ कर आम के कान में पास से बलखाती हुई गुज़री। आम के खरगोश कान जैसे लम्बे पत्ते खुशी लहक उठे। चुहिया के कान जैसे पत्तों वाली अपराजिता के नीले फूलों से स्याही बिखर रही थी।
पता नहीं उस चिड़िया को क्या कहते हैं? मगर आम उसको बहुत प्रेम करता है। या हो सकता है मैं उससे प्रेम करता हूँ और आम का बहाना बना रहा हूँ।
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June 20, 2020

तुम्हारी आवाज़ में अपना नाम

नीले रंग के मकाऊ तोते उड़ते हुए आते हैं। मैं उनकी आंखों के पास बने पीले गोल घेरे देखने लगता हूँ। कभी अचानक बोहेमियन वेक्सविंग चिड़ियों का झुंड आ जाता जाता है। उनकी आँखों के ऊपर बनी स्याह बूमरेंग के नीचे सफेद लकीर में खो जाता हूँ। कितने ही सुंदर पंछी और उनकी बेहिसाब सुंदर आंखें मेरा मन बांध लेती है।

एक रोज़ कभी तुम्हारी चमकती आंखों से उड़ते जादू के बादल मुझे घेर लेते हैं। मैं उस जादुई धुंध में सब पंछियों की आंखें भूल जाता हूँ।
मैं इंतज़ार करने लगता हूँ कि तुम्हारी आँखें बोल पड़ेंगी।
मैं कितनी ही बार तुम्हारी आवाज़ में अपना नाम सुनना चाहता हूँ। लेकिन अब मेरी चाहना कितनी अजीब हो गई है कि मैं चाहता हूँ तुम्हारी आँखें मुझे पुकार ले।
शायद इसलिए कि तुम्हारी आवाज़ का बरसों इंतज़ार करने के बाद अब प्रेम और गहरा हो गया है। वह शब्दों से परे देखने में सुनना चाहता है।
मेरा नाम कितना मामूली है और तुम्हारा पुकारना उसे कितना ख़ास बना सकता है। ये लिखना बहुत कठिन है।उतना ही कठिन जितना कि तुमको प्रेम करने से ख़ुद को रोक पाना।
तुम्हारा साथ मुझे कितना नया कर देता है। मैं उस आदमी को भूल जाता हूँ जो कहना चाहता है कि मुझे तुमसे प्रेम है।
ये नया आदमी तुमको चुपचाप देखता रहता है।
तुमको।

June 10, 2020

सूखे पत्ते की तरह

 हमारे बीच सीढ़ियां थी फिर भी हम ठहरे रहे।

आकाश में सफ़ेदी में घुली नील जैसा छोटा सा बादल देखता हूँ। ऐसा लगता है कि आकाश इंतज़ार है। बादल एक उम्मीद है।
सूने आकाश में बादल देखकर जून की उमस में तन्हा चुप खड़ा हुआ कोई पेड़ याद आता है। दूर तक पसरी धूप में छांव की एक गोल बिंदी याद आती है।
रात होते ही आकाश वैसे दिखना बन्द हो जाएगा, जैसे अब दिख रहा है। अंधेरे में अनगिनत तारे चमकते होंगे। इंतज़ार का रंग स्याह हो जाएगा। याद की सिल्वर लाइनिंग फिर भी बादल को बचाये रखेगी। जैसे उम्मीद बची रहती है।
अपनी नंगी बांहों पर हवा के भारहीन स्पर्श से ख़याल टूट जाते हैं।
एक ठहरा हुआ बादल मन के विस्तार में किसी याद की तरह आहिस्ता सरकता जाता है। कुर्सी तक धूप आने वाली है। मैं कुर्सी पर इस तरह बैठा हुआ हूँ जैसे स्थिर पानी पर सूखा पत्ता पड़ा रहता है। कभी दाएं बाएं झांकता है और फिर अपने आप में खो जाता है।
मन के तालाब में सूखे पत्ते की तरह कोई याद अकारण एक से दूजे कोने तक तैरती रहती है।

June 9, 2020

छितर जाना

 

पानी पौधों के आस पास छितर गया है। आंगन की मिट्टी में पड़े पानी के पेच भले लग रहे। जलपात्र से बाहर बिखर गया पानी भी अच्छा लगता है।
छितरा हुआ पानी देखकर लगता है कि पानी बोल रहा है।
बीयर से भरा ग्लास और ग्लास से छलकती बीयर, चाय से भरा प्याला और चाय की तसली में छलक आई चाय के बीच भी बहुत अंतर होता है।
वे जो भरे हुए हैं मगर छलके नहीं हैं, वे भरे-भरे नहीं लगते। छलक जाना ही भरा हुआ होना है, बाकी सब ने तो अधिक से अधिक बचाया हुआ भर है।
मैं न छलकना चाहता हूँ न भरा-भरा रहना। मैं खाली रहना चाहता हूँ। लेकिन खाली रहना असंभव है कि खालीपन में मौन भरा होगा।
मौन सरल होता या जटिल? मैं सोचने लगता हूँ कि मिट्टी की घण्टी से एक हल्की आवाज़ आती है। मिट्टी तांबे और कांसे की तरह नहीं बोल सकती लेकिन बोलती है।
एक टूटे हुए बाजे के निचले सुर की तरह।

June 8, 2020

उदासी के फूल

वे किन बातों से खिलते हैं, ये नहीं मालूम।

लिखता हूँ। लिखे हुए को पढ़ता हूँ तो लगता है कि ये ठीक है। कुछ देर आसमान को ताकता हूँ। कुछ हवा महसूस करना चाहता हूँ। उमस न होती तो क्या करता? ये सवाल आते ही ठहर जाता हूँ। कि सचमुच ऐसा क्या करना था कि मौसम सुहाना होता तो अच्छा लगता। कुछ भी तो नहीं।
कभी कोई किताब साथ होती है। एक लैपटॉप के किनारे लगाने वाली एलईडी स्टिक है। उसे ऑन कर देता हूँ। कुर्सी की पुश्त से उसका क्लिप अटका देता हूँ। रोशनी किताब पर गिरती है। मैं अक्षरों को देखता हूँ। आस पास अंधेरा पसरा रहता है। कि अचानक किसी आवाज़ सरसराहट से अपने पांवों का सोचता हूँ कि क्या वे धरती से ऊपर हैं?
पांव टेबल पर या पास रखी चारपाई पर रखे होते हैं। एक बार नीचे झांकता हूँ। छछूंदर घूम रहा है। वह अपनी नाक से कुछ टटोल रहा है। मैं क्यों अचानक चौंका? क्या हम कभी ख़ुद को बचा सकते हैं? शायद नहीं फिर भी हम चाहते हैं कि बचे रहें।
खुद से कहता हूँ सब ठीक है। लिखे हुए को पढ़ता हूँ। सोचता हूँ कि ये किसके लिए लिखा है। इसे कहीं क्यों शेयर करना है। इसे पढ़वाने से क्या होगा। कोई ठीक जवाब नहीं मिलता। लिखावट में सब वे ही बातें हैं। रोज़मर्रा की बातें। अनमना कौन नहीं होता। उदासीन कौन नहीं हो जाता।
अचानक हर बात से उदासीन हो जाना कैसा है। किस बात से मन इस तरह उचाट होता है कि हर वो काम जो किया, वह फालतू लगने लगता है। कुछ नया नहीं करना है। हवा के साथ उड़कर आती सूखी पत्ती की खरखराहट सुनकर फिर ठहर जाता हूँ।
ठीक ही तो है। लम्हे झड़ रहे हैं।
उदासी की एक बड़ी बात जो रोज़ होती है। वह सबसे अधिक उदासीन करती है कि लिखकर बाँट देने के बाद ये मुझे अच्छा न लगेगा। मैं इसे मिटा दूंगा। मैं इसे छुपा लूंगा। लेकिन।
पुरानी लिखावट बरबाद लिखावट है। जैसे हर काम को व्यर्थ जानना। इसलिए पुराने से बाहर आना सोचता हूँ। ड्राफ्ट्स देखता हूँ। कहानियां ठीक की थी, मिटा दी। नया लिखा है, पर उसके लिए प्रेम नहीं है। जैसे चुपचाप चले मगर कहीं जाना न था।
बेरी को देखता हूँ। देखना चाहता हूँ कि क्या वहां चिड़ियां बैठी हैं? कुछ नहीं दिखता। केवल अंधेरे में अंधेरे से बनाया हुआ एक चित्र दिखाई देता है।
मैं मुस्कुराता हूँ। सो जाएंगे। सुबह की नींद में बेढब सपने आएंगे। जागूँगा तो लगेगा कि सोना हुआ ही नहीं। बदन अकड़ा है। पीठ जकड़ी है। गर्दन में ऐंठन है।
लेकिन सुबह कुछ देर बिना सोचे बैठा रह सकूँगा। यही सबसे अच्छा होता है।

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सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.