August 29, 2020

असल में तुमसे मैं मिला नहीं हूँ

कितनी सी जगह चाहिए थी तुम्हारे पास

कितना सा प्रेम अपेक्षित था। इतनी बड़ी दुनिया में।
* * *
तुम
कपास के भीगे फाहे से होते
अनार की छिछली छांव से होते।
दिल नमी की तरह रहता
ठंड की तरह रहता।
बस तुम होते ज़रा-ज़रा।
* * *
कभी बेढ़ब नींद आ जाती
कभी बेवक़्त जागती आंखें।
कभी तुम मुस्कुराते
कभी मैं मुस्कुराता।
और ख़ुशी, और ज़िन्दगी किसे कहते हैं।
* * *
कभी दफ़्तर में उनींदे बैठे हुए
कभी बेसबब पैदल चलते हुए
मैंने तुमको सोचा है।
मगर सबको लगा
कि मैं उनींदा हूँ, मैं कहीं जा रहा हूँ।
* * *
कभी कभी मन पड़ा रहा
तुम्हारे बाजुओं के घेरे में।
कभी ये दूर से देखता रहा तुमको।
तुम मिलोगे तो ये बात
बताऊंगा तुमको।
* * *
तुम मुझे नहीं जानते
मैं तुम्हें नहीं जानता।
मन पगला ये कब जानता है?
* * *
असल में तुमसे मैं मिला नहीं हूँ। तुम भी मुझे नहीं जानते हो। ये कोई दो और लोग हैं। वे समझते हैं कि बीज का काम पेड़ होना है, उसी तरह हमारा एक दूजे को चूमना और बाहों में भरे खड़े रहना।
बाकी सब फज़ूल है।
* * *
ओह प्यारे केसी तुम दिन को सोया न करो। शाम बेढ़ब बातों से भर जाती है। बातें बेवजह।

August 14, 2020

कोई बात है मगर क्या?

मैं नहीं समझ पाता कि बात क्या है। उसी क्षण उलझन में गिर जाता हूँ कि अगर बात है तो मालूम होनी चाहिए मगर बहुत सोचने के बाद भी कोई बात समझ नहीं आती।
दफ़्तर के खाली कमरे में एसी चल रहा होता है मगर बेचैनी होने लगती है। मैं दाएं-बाएं झांकता हूँ। सोचता हूँ क्या करूँ। बस इतना भर समझ आता है कि अब यहां दो क्षण भी बैठा नहीं जा सकता। मोबाइल का चार्जर और हैंड्सफ्री समेटता हुआ बाहर निकल आता हूँ।
खुले आकाश तले सीढ़ियों पर खड़ा हुआ चौतरफ़ देखता हूँ। सब ठहरा हुआ है। पेड़ की छांव में खड़े स्कूटर के पास रुकता हूँ। मैं चिड़ियों की आवाज़ें सुनना चाहता हूँ। चिड़ियों की आवाज़ के लिए इंतज़ार नहीं कर पाता।
रोज़ कोई सपना, इच्छा, चाहना या आशा कहीं खो जाती है। मैं जानता हूँ कि जीवन अत्यंत साधारण घटनाओं से बना होता है। इसमें अद्भुत और आश्चर्यचकित करने वाली ख़ुशी नहीं होती। इसमें ही रोज़ खप जाना होता है। लेकिन इस खपने को सोचने से हर बार बचा नहीं जा सकता।
कभी-कभी कितने ही बीते हुए दिन एक अफ़सोस की तरह सामने आ खड़े होते हैं। जैसे एक-एक कर पत्ते झड़ रहे हैं। सब कुछ बीत रहा है।
चाहना और प्रत्याशा से भरे जीवन का कॉकटेल बहुत भारी होता है। इस जीवन को सोचना ही उदासीन भारीपन लेकर आता है। शायद।
अकसर कोई बड़ी बात नहीं होती। सब कुछ यथावत चलता रहता है। अकसर कोई नाकामी, कोई ग़लती या कोई दुःख नहीं होता। लेकिन कुछ नहीं होने की छीजत के बाद जो बचा रह जाता है, शायद वही एक क्षण अचानक बेचैनी की शक्ल में हमें दबोच लेता है।
हम अपने हाल से कब मुंह फेर सकते हैं? लेकिन इससे भी बड़ी बात है कि उस बात कैसे लिखा जा सकता है जो समझ ही नहीं आ रही।
वह बात जो है तो सही मगर है जाने क्या?

August 10, 2020

ठहरी हुई सतर

जीवन भीतर से तरंगित होता है। कभी-कभी उसकी आवृति इतनी क्षीण होती है कि सुनने के लिए ध्यान लगाना पड़ता है। सुस्त बाज़ार में खाली पड़ी नाई की दुकान, किराणे की पेढ़ी के आगे सूनापन और चाय की थड़ी की बैंचों पर पसरी चुप्पी दिखाई देती है।

असल में जीवन का बाजा तब भी बज रहा होता है। सूनी बैंचों पर बैठे हुए, दुकानों के आगे बने ओटों पर ज़र्दे को थपकी देते और बीड़ी सुलगाते लोगों की स्मृति ठीक से बुझ नहीं पाती उससे पहले दृश्य में नए चेहरे समा जाते हैं।
एक ठहरी हुई सतर पर कुछ नए लफ्ज़ गिरते हैं और वह आगे बढ़ जाती है।
मैं ऐसे दृश्यों को शब्दों में बांध लेना चाहता हूँ। दीवार पर अशुद्ध वर्तनी में लिखे अनुरोध पढ़ते हुए देखना चाहता हूँ कि पिछली बरसात से अब तक दीवार पर स्याह रंग कितना बढ़ गया है।
सड़क पर उड़ते कागज़ के कप, बुझी हुई बीड़ियाँ, सिगरेट के टोटे और पान मसालों की पन्नियां समय के निशान हैं। संझा होते ही इनको बुहार दिया जाता है तब लगता है जैसे किसी गहरी झपकी से जाग गया हूँ। खुद को देखता हूँ कि मैं बिल्कुल नया हूँ।
मैं जो वहीं बैठा था। समय जो निरन्तर बीत रहा था। जीवन जो अपनी उम्र में एक टिक आगे बढ़ गया था।
कुछ भी ठहरा हुआ नहीं होता। न सुख न दुख।
* * *

August 8, 2020

लेकिन नियति।

सब ख़राब और अच्छे काम नियति के खानों में रखे जा सकते थे। सब योजनाओं को नियति के हवाले किया जा सकता था। इससे भी कड़ी बात थी कि हर सम्पन्न कार्य पर नियति की मोहर लग जाना। इससे इनकार न कर पाने की बेबसी और अधिक बुरी थी।

कहीं कोई उदास ख़्वाब लिए चुप बैठे होते। प्यार से ऊबकर प्यार तलाशते जैसे तम्बाकू से ऊबकर फिर से तम्बाकू सुलगाते। कहीं कोई आहट होती दिल पहले ही मान लेता कि ये वो नहीं है।
समय का कारवां गुज़रता रहता। बस।

August 4, 2020

ये मैं ख़ुद नहीं जानता

कभी-कभी स्वप्न में जेबें छुहारों से भरी होती हैं

जैसे कभी-कभी दिल उसकी चाहना से भर जाता है।
तन्हाई में कच्ची दीवार पर बैठा रहता। दोपहर में लम्बी धूपिया धुन बजती रहती। किसी शाम मुंडेर से नीचे पांव लटकाये हुए आंखें गली को देखती थी। सूनेपन में जब कोई दिख जाता तो आंखें कहीं और देखने लगती। तपती खाली दोपहर, सूनी सांझ और तारों भरी नीरव रात किसी की मोहब्बत कैसे हो सकती है? मगर थी।
एक बार दिल किसी काम में लग गया। खेल, जुआ या मोहब्बत, तो फिर वह अपना कुछ नहीं सोचता था। दिल शुरुआत करना तो जानता था मगर सलीके से कुछ भी सम्पन्न करना सीख नहीं पाया। यही खामी अकसर एक ख़ूबी बन जाती थी कि जिंदगी को गुज़रना होता है वह गुज़रती रहती थी।
आज दिल भर आया। चाहने वालों से और जिनको चाहा। फिर उसी कच्ची दीवार, उसी मुंडेर, उसी नीरव रात के पास लौट जाने का मन हुआ। मगर वह किशोर बहुत पीछे छूट गया है, जिसके पास ये सब था।
अब एक बेहद मीठी शराब है। सुरूर तो होता है मगर कोई बात गुम है। जैसे जेबों से सब छुहारे गिर गए हों। मैं बेहद पुरानी व्हिस्की या छुहारों से कितना प्रेम करता हूँ, ये मैं ख़ुद नहीं जानता।
जैसे होना। तुम रहना।
* * *

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.