February 26, 2021

किस के होने की याद आई

हवा का झौंका अपने साथ पत्ते उड़ाते गुज़रा। खिड़की बन्द थी बाहर कुछ देखा नहीं जा सकता था किन्तु सूखे पत्तों की खड़बड़ भीतर तक चली आई।

मन औचक एक सूनेपन से भर गया।
मन के भीतर कुछ सूख चुकी अनुभूतियाँ ठहरी थी। वे किसी उदास कर देने वाले झौंके की प्रतीक्षा में थी। जैसे कोई चटक जाने के लिए किसी बहाने के इंतज़ार में हो, ऐसे ही मन था।
बाहर गली से गुजरे सूखे पत्ते मन में भर गए। पहले मन खाली कासे में हवा के आने से बजने वाले एक राग से भरा था। अब मन में खड़बड़ाहट भर गई थी।
गर्मी केवल बाहर गली में नहीं पसरती। वह बंद कमरे के भीतर तक गूंजती है। ठंडी हवा के यंत्र चल रहे हो मगर महसूस होता है कि गर्मी पसर गई है। गलियां सुनसान हो चुकी है। सब कहीं चले गए हैं।
अकेलापन मारक हो गया है।
मैं एक लंबी सांस लेना चाहता हूँ। मैं सोचना चाहता हूँ कि किस चीज़ की कमी है। किस के होने की याद आई।
कुछ नहीं जान पाता। मेरे कान बाहर गली में लगे रहते हैं कि फिर से कोई हवा का झौंका आएगा और उड़ते, ज़मीन से टकराते सूखे पत्तों की आवाज़ आएगी।
आवाज़ आती है। सांस अटक जाती है।
जैसे मैं किसी भय की प्रतीक्षा में था। भय आया और मैं सहम गया। थोड़ी देर बाद ये सब अजीब लगने लगता है। मैं क्यों बाहर की आवाजों से बंध गया हूँ। फिर और अजीब लगता है कि वे जो बाहर की आवाज़ें हैं असल में कहीं मेरे भीतर से तो नहीं उठ रही।
मैं बहुत पीछे उन दिनों को सोचने लगता हूँ। गर्मी में सूनी सड़क पर दूर तक पैदल चलने के दिन। मुझे अफसोस होता है कि मैं मदभरी शामें, बीयर केन्स, धुंए और लंबे आलस्य को नहीं सोच पाता।
तुमको शायद पता है कि ये कैसा हाल है। शुक्रिया।

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.