June 25, 2021

सब कुछ किसी स्याही में

चाहनाएं तुम्हारा पीछा करती है दिल दीवार की तरह चुप खड़ा रहता है।

रेगिस्तान में दिन की तपिश भरी आंधियां रात को मदहोश करने वाली हवा में ढल जाती हैं। एक नशा तारी होने लगता है। बीत चुकी बातों और मुख़्तसर मुलाक़ात की याद किसी भीगी छांव की तरह छा जाती है।
कभी किसी शाम धूल उतरती नहीं। आकाश के तारे दिखाई नहीं देते। सब कुछ किसी स्याही में छुप जाता है। उस वक़्त बन्द आंखों में कोई बेहद पुराना स्वप्न टिमटिमाने लगता है।
जाने कब नींद आ जाती है कि स्ट्राबेरी जैसा चाँद देखना रह जाता है। जबकि वह ठीक बाईं और चमक रहा होता है।
इस चाँद को देखने वाली चाहनाएँ उस जगह जा चुकी है। जहां तुम हो।
मगर फिर भी...

June 13, 2021

तीज का चांद

शाम ढल रही थी। डूबते सूरज के ऊपर चाँद खिला था। रेगिस्तान के घर की छत पर आहिस्ता रोशनी का पर्दा गिर रहा था।

दफ़अतन अंगुलियां स्क्रीन को छूती और फिर मन उन तस्वीरों को देखने से मुकर जाता कि उसने कहा था "ये मैं नहीं हूँ।"
एक बार नज़र आसमान की ओर गई तो दिल धक से रह गया। ये चाँद कौनसा है। बचपन में किसी ने कहा था चौथ का चांद मत देखना। अपने ही भीतर गुम रहना।
अकसर तारीखें भी याद नहीं रहती तो तिथियों का हिसाब नामुमकिन था। कोई चाहना रहे तो मन हर कुछ खोज आता है। वह भी जो वह नहीं है।
ये चौथ का चांद न था। आसमान में तीज का चांद चमक रहा था। क्या ये अच्छा है?
पता नहीं। एक सिगरेट टिमटिमाती रही जिस में उसकी सांसें नहीं घुली थी।

June 6, 2021

और बालकनी धुएं से भर गई होती

वही इक रात का सौदा वही बरसों का वीराना। * * *

अंगुलियां एक अक्षर लिखती है
और दिल दो-दो बार धड़कता है।
यही इक बात है जिस पर, अभी तक प्यार आता है।
* * *
सोचता था कि
बड़ी कीमती शै है ज़िन्दगी।
मगर क्या मालूम था
कि कुछ पी लेंगे, उसको चूम लेंगे
बस यही सोचते हुए मर जाएंगे।
* * *
अब तक बना लिया होता दूसरा पेग
और बालकनी धुएं से भर गई होती।
अब तक
इनबॉक्स में ये लिखकर मिटा भी दिया होता
कि तुम्हारी याद आती है।
* * *

June 4, 2021

इस तिलिस्म में

शैतान की प्रेमिका पूछ रही थी तुम मुझको कितना याद करते हो। ठीक उस वक़्त रेगिस्तान की सोनल घास के कान में हवा फूंक रही थी सरगोशी सुनो जानाँ, सुनो जानाँ, सुनो जानाँ। * * *

शैतान की प्रेमिका ने कहा
तुमको बहुत दूर चलकर आना होगा
मुझे छूने के लिए।
शैतान, स्वर्ग से धकेले जाने के बाद
धरती की ओर गिरते हुए
बस यही तो सोच रहा था कि कहाँ जाऊंगा?
* * *
शैतान की प्रेमिका ने कहा
ये तूफ़ान मेरे भीतर से उठता है
तुम्हारे भीतर थमता है
और इसके इतर कुछ नहीं है।
शैतान ने हवस को एक ओर रखा
हवादिस से कहा चुप बैठो
ऐसी बात मैं फिर कब सुनूंगा।
* * *
उसे किसी बात को ढकना न आया
कि शैतान बहुत नंगा था।
रेगिस्तान की रात में चमकते पूरे चाँद की तरह।
* * *
उस वक़्त रात के ढाई बजे थे।
शैतान ने सोचा कि
वह कब इतनी देर तक जगा था
वह भी तो अब से पहले किसलिए जगी होगी।
* * *
तुम मारे जाओगे इस तिलिस्म में
मैं बहुत अधिक हूँ
शैतान की प्रेमिका ने कहा।
शैतान ने महसूस किया
दिल पर बर्फ गिर रही है, उसके बोसे गर्म हैं।
* * *
शैतान अजीर्ण हवस था
शैतान की प्रेमिका मुक्ति।
शुक्रिया।
* * *

June 3, 2021

जो होना है

सौ दर्द उठाए, तड़पे रोए, बेचैन फिरे कि जी न सकें। सुबह खिले और पल में कुम्हलाए। बाल बनाए चेहरा धोया। बाइक उठाई दफ्तर को गए। शाम ढले उल्फ़त की दुकान पर खड़े-खड़े जब थक से गए। तब घर लौटे। कभी पीने बैठे तो पीते ही रहे। कभी देखा ही नहीं सूंघा ही नहीं। कभी मिले तो कसकर यू गले लगे जैसे ये आख़िरी लम्हा हो। कभी याद किया तो मुस्काए। कभी सोच लिया तो उठ बैठे कि क्या सबकुछ ऐसे ही चलना है। कभी किसी नई सूरत पे आंखें कुछ देर रही। फिर हंसते हुए सोचा जाने दो।

कैसे भी रहो और कुछ भी करो
वो जो होना है सो होता है।

June 1, 2021

कितना।

मैं एक उड़ती निगाह से उसके चेहरे को कितना पढ़ सकता था?
चेहरे को देखा तो लगा कि शांति पसरी हुई है। उसके होंठ अधखिले बन्द हैं। आंखें मौन से आच्छादित। कुछ लटें जो बढ़कर गालों को चूम लेना चाहती थी, सिखलाए बच्चे की तरह बैठी थी।
पानी मोड़ पर जिस तरह हल्का बल खाते हुए उचकता है मैंने उसी तरह मुड़कर देखा था। सोचा कुछ कह दूं। फिर मैंने मौन की गहराई में तलछट तक झांकना चाहा मगर देख न पाया। स्वयं से कहा- "चुप रहो।"
शायद झिझक थी। पहचान में बची हुई अजनबियत की झिझक। बहुत बरसों से थोड़ा सा जानने की और उस क्षण तक कुछ न कहे जाने की झिझक।
सोच की वनलता पर झूलते हुए मैं बालकनी से बाहर झांकने लगा।
पत्तों के बीच अकेली चिड़िया ने जाने किसके लिए गाया। आस-पास कोई न था। मुझे लगा कि गाना सुख को सींचना होता होगा। या किसी ने कहा होगा कि हम मिलेंगे तुम गाते रहना।
दाएं बाएं दो तीन बार पल भर की निगाह डालकर चिड़िया उड़ गई। क्या सब ऐसे ही बिना किसी इच्छा से बंधे उड़ सकते हैं। कि अभी यहीं थे और अब नहीं हैं।
दोपहर उतर आई है। दूर तक धूप है। आकाश में रेत है। हवा में सरगोशी है। छतें सूनी है। सड़कें खाली हैं। बस एक मेरा मन है, जो भरा-भरा सा है। मैं अतीत की अनगिनत चीज़ों को टटोल रहा हूँ। ऐसा नहीं है कि ये बेसबब है।
सबको कुछ चाहिए होता है। ये नहीं मालूम कि कितना।

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.