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Showing posts from October, 2015

तुम ये क्या बना रहे हो चित्रकार?

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चित्रकार ने तस्वीर में थोड़ी सी ठंडी हवा बनाई. 
बहुत सी खाली कुर्सियां, कुछ एक लोग, हल्की रौशनी, और हल्का इंतज़ार बनाया. गलबहियां डाले हुए एक टीन-एज जोड़ा बनाया. उस जोड़े के झरता बहुत सारा प्रेम उससे अधिक उत्तेजना और उससे अधिक अबखाई बनाई. 
कि दुनिया में बहुत कम जगहें बची थी निजता भरा प्रेम जीने की. 
चित्रकार ने और जो कुछ बनाया वह किसी सड़क किनारे रेस्तराओं का सिलसिला था. वहां लेम्प पोस्ट थे. उनपर धर्मेद्र और हेमा के जमाने की फिल्मों के पोस्टर लगे थे. चित्रकार ने अमिताभ का कोई पोस्टर न बनाया. इसलिए कि अपनी 'डैन' में आराम करते हुए राजेश खन्ना के चेहरे पर एक अफ़सोस रखा था कभी-कभी हम ऐसे लोगों का साथ दे देते हैं, जिनमें सिर्फ दूसरों के पाँव काटकर खुद के लिए सीढियाँ बनाने का हुनर होता है. 
चित्रकार ने एक इंतज़ार बनाया. जैसे रंग बनाने वाले बोर्ड पर नीले रंग की ओर बहता हुआ कोई और रंग. उसने टेबल के नीचे पैरों में हरकत बनायीं. उन हरकतों में छुअन भरी. छुअन में अपनापा बनाया. और जिस आदमी पर छुअन के छींटे बनाये उसी आदमी के चेहरे पर एक सवाल बनाया. कि काश तुम एक पारदर्शी रंग होते. 
चित्रकार थक गया…

एक तेरे आने की, याद के सिवा

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तल्ख़ दिन  अचानक बरसों पीछे छूट गए. 
खिड़की और दरवाज़ों के पल्ले वेगवती हवाओं से अपने आप उढक गए. एक बार सब कुछ कांपा और फिर शांत हो गया. बरसों से कोई अँधेरा गर्द की चादर के नीचे पड़ा हुआ था. कसक से भरे विकल मन की कोई ठांव न थी. अव्वल तो ज़िन्दगी कहने लायक तकलीफें देती ही नहीं है. फिर भी कोई ऐसी तकलीफ़ जिसे मनमीत से बाँट सकें तो भी उम्र की छीजत इस सुख को भी छीन लेती है. 
अब कहाँ बचा है कोई मीत.
दूरतक एक उजाड़ उदासी है. आबाद चीज़ें बेपर्दा हो गईं है. कोई सुख एक स्मृति है और अधिकतर स्मृतियाँ सुख नहीं हैं. अधिकतर माने जिस तरफ टटोलिये उखड़े हुए पैबंद हैं. ज़िन्दगी जो हादसों की शक्ल में सीख देती है वे सीखें बहुत कुछ छीन लेती है. यकीन, आसरा, उम्मीद, दिलचस्पियाँ... सब पर धब्बे पड़ जाते हैं. ऐसे तेजाबी धब्बे जिनसे सिर्फ दाग नहीं छेद बनते हैं. 
एक कंधे पर लटकने वाला थैला तब तक साथ रखने का मन है जब तक दुनियादार हूँ. इस पर लिखा है आखिरी उम्मीद. जैसे कि आखिरी में आप फिर से एक जुआरी की तरह हारते जाएँ. इससे ज़िन्दगी ज़रा आसान लगती है. आसान कुछ नहीं होता बस भुलावा है और भुलावा बड़ी चीज़ है.


सब्र के प्याले को खाली न …

तुम जो मिलोगे इस बार तो

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उदासी के झोंके ने  गिरा दिया शाख से पत्ता 
ज़िंदगी को इतना भी यूनिक क्यों होना चाहिए कि जीया हुआ लम्हा बस एक ही बार के लिए हो. कुछ क्लोन होने चाहिए कि हम उसी लम्हे को फिर से जी सकें. एक याद का मौसम जब भी छू ले, उसी पल कोई दरवाज़ा बना लें. दरवाज़े के पीछे एक छुअन हो. एक लरज़िश हो. एक धड़क हो. इस तरह याद जब उदासी और नया इंतज़ार घोले, उससे पहले हम उसी लम्हे को फिर से बुला लें. 
जिस तरह गिरते हुए पत्ते ख़ुद को धरती को सौंप देते हैं, उसी तरह कभी हम ख़ुद को प्रेम को सौंप दें. प्रेम लुहार की तरह हमें लाल आंच में तपाकर बना देगा कोमल. किसी बुनकर की तरह बुन देगा एकसार. किसी राजमिस्त्री की तरह चुन देगा भव्य. 
वह जो दरवाज़े के पीछे अँगुलियों के रास्ते बदन में उतर आई लरज़िश थी. वह उसी एक पल के लिए न थी. उसका काम बस उतना सा ही न था. 
तुम जो मिलोगे इस बार तो पूछेंगे ये हवा क्या है, उदासी कैसी है और तन्हाई कब तक है? 

ये भी तो किसने सोचा था कि

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एक ठहरी हुई सांस 
बेचैन निग़ाह में उदासी घोलती है.
बारिश नहीं थी मगर थी. एक आवाज़ ने बुनी बारिश. एक सूखी रात का ये पहला पहर था. बंद आँखों में कहीं दूर हिलते हुए होठ खिले थे कि कोई संगीतकार, साजिंदों को अपनी छड़ी से प्रवाहित कर रहा था. मुझे उसे कहना था कि सांस लेने में कठिनाई है. मगर उसकी आवाज़ दवा थी. एक ठहर के बाद प्रतिध्वनी गूंजती. क्या बारिश रुक गयी है? कोई जवाब आता. तीन बार. वह जवाब मुझे बाहर बारिश की ओर खींच ले जाता. उसकी आवाज़ में बारिशें बुनने का हुनर था. 
क्या हम पहले कहीं मिले थे? अगर नहीं तो फिर ऐसा क्यों लगता है कि तुम बिन कुछ नहीं. बचपन में पढ़ी प्रेम कहानियों से ऊब होती थी. ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई दो, एक होकर अंतिम विदा का गीत गाकर चुप हो जाते हैं. बचपन में रूह का नाम न सुना था. तब सिर्फ प्रेतों के किस्से थे. शाम के धुंधलके में बाहर जाना निषेध था. ये प्रेतों का समय था. ये भय और जिज्ञासा के मारक मिलन का समय था. 
काश, बचपन में रूह का कोई किस्सा सुना होता. रूह के मिलने का समय मालूम होता. यकीनन मैं उस समय को अपने भटकने के हिस्से में जमा रखता. 
कि कहीं रूह मिले. 
तो क्या तुम रूह हो…

उदासी नींद, बावरा स्वप्न

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सिसकियाँ ख़ामोशी हिचकी और ज़रा ठंडी हवा

रात जिस ढलान पर चली थी, सरकती गयी. हलकी स्याही में एक वही पुराना स्वप्न. जो पहले भी कई बार देखी हुई जगहों से होकर गुज़रता है.

घर के आँगन के बीच दक्खिन में एक पानी जमा करने का भूमिगत हौद बना हुआ है. इसकी जगत ज़मीन से तीन एक फीट ऊँची है. इस हौद की छत एकदम पारदर्शी. पानी भी इसमें ऐसा कि दस फीट नीचे तल में पड़ी हुई सुई को देखा जा सके.

प्यास लग आई.

हम दो लोग थे वहां पर. मैंने पानी खींचने के लिए टाँके यानी हौद के अन्दर देखा. वहां एक धारीदार लम्बा घोड़ा पड़ा हुआ था. वह टाँके के तल पर लेटा हुआ सा जान पड़ता था. मगर मैंने समझ लिया कि घोडा पानी के अंदर है तो मर चुका है. मन में एक चिंता आई कि पानी दो दिन बाद सड़ जाएगा. अब उस घोड़े को बाहर निकालने के लिए एक लम्बे बांस के सहारे रस्सी का फंदा बनना था. उस फंदे को घोड़े की किसी टांग में डालकर बांस निकालकर फिर रस्सी के सहारे घोड़े को उपर खींच लेना था.

घोड़े को निकालने के लिए कुछ सामान चाहिए थे.

एक दूकान है. जो कि ज़मीन से चार पांच फीट ऊँची है. उसके आगे सीढियां है और एक तीन फीट का रास्ता है. वहां से फुटबाल की पेलेंटी लेन…

तेरे बाद की रह जाणा

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मौसम ऐसा है कि कमरे अंदर ठंडे और बाहर गरम। प्लास्टिक के सफ़ेद छोटे कप चाय से भरे हुए। नया हारमोनियम।। जमील बाजा के बारे में कुछ और बताते हुए गुनगुनाना शुरू करते हैं। तेरे बाद की रह जाणा... मैं कहता हूँ गाते जाइए। जमील मुस्कुराते हुए स्वरपटल पर अंगुलियां रखे हुए अपनी आँखें मेरी आँखों में उलझा देते हैं। मैं डूबता जाता हूँ। सचमुच तुम्हारे बाद जीवन में क्या बचा रह जायेगा। उदासी, तन्हाई और बेकसी। आकाशवाणी के विजिटर रूम में ढोलक की हलकी थाप से सजी संगत और सिंधी-पंजाबी के मिले जुले मिसरों का मुखड़ा, गहरी टीस से भरता रहता है। 
जमील अपने कुर्ते के कॉलर ठीक कर एक लम्बे सूती अजरक प्रिंट के अंगोछे को गले में डाल कर बिना सहारा लिए आँगन पर बैठे हैं। ग़फ़ूर सोफे पर बैठे हैं। मैं अधलेटा सोफे का सहारा लिए सामने खिड़की की ग्रिल पर पाँव रखे हुए। मैं कहता हूँ ये हारमोनियम कितने का आया? ग़फ़ूर कहते हैं कल ही अट्ठारह हज़ार में लिया। मैंने पूछा कलकत्ता का है? बोले- नहीं! पंजाब की बॉडी है और सुर... मैं कहीं खो गया कि ये न सुन पाया सुर कहाँ के हैं। मेरा मन उकस रहा था कि कहूँ कोई बिछोड़ा सुना दो। ऐसा विरह गीत की आँख भ…

उस रुत झड़ गये थे पत्ते, इस बार?

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अलमारी की ऊपरी दराज़ में यूएसबी केबल्स रखीं हैं। अंगुलियां उनमें उलझकर सब्र भूल जाती हैं। सब्र जो पहले से ही चुकता जा रहा था। एक पतली पन्नी चाहिए। जिसमें कुछ साल्ट रखे हों। किसी कोने में अँधेरे और ठण्डी दीवार के सिवा कुछ हाथ नहीं लगता। 
रात ठहर गयी है। आधे रास्ते में कोई और काली दीवार आ खड़ी हुई। रात को दीवार के पार कोई रास्ता नहीं है। रोशनियाँ नाकाम टूट-टूट कर वहीँ गिर पड़ती हैं जहाँ से उगी थीं। हर रौशनी रेंगने से लाचार तलछट को पीलेपन से रंगकर खो जाती है। 
अचानक साँस की लड़ी टूटती है। एक अल्पविराम। अगली साँस के लिए कुएं से रहट खींचते हुए निर्जन उजाड़ चुप टोह लेता है। एक लहर सी पंजों से सर तक दौड़ती है। ज़हर की तड़प से भरी आंत के मरोड़ जैसी। 
धप धप धप... सीढ़ियों पर थके अबकाये कदम कभी तेज़ कभी दीवानावार पहले तल से दूसरे तल और कभी छत पर। अलमारियों, दराजों और किताबों के आलों में पीछे छूटी जगहों पर हाथ घूमकर टटोलते हुए पन्नियों की तलाश खत्म नहीं होती। एक ऐसी गोली, ऐसा रसायन, ऐसा जैसे जान बख़्श दिए जाने की आस जगे। मगर नहीं मिलता।
मौसमों की बड़ी बातें लिखीं। उनकी बेवफ़ाई और मेहरों पर तकरीरें की मगर भूल…