December 30, 2011

नी मुईये, मैला मन मेरा...

इस साल की सुराही में एक बूँद बची है. जो पी लिया वह ये था कि प्रायोजित गांधीवाद के एक तालिबानी नेता ने साल भर लड़ाई लड़ी. उसके सामने नूरा कुश्ती के पहलवान भारतीय राजनेता थे. परिणाम ये रहा कि देश की जनता फिर हार गयी. मैं नहीं जानता कि नूरा कुश्ती के जनक कौन है मगर पाकिस्तान में यह बहुत फेमस है. इसमें कुश्ती लड़ने वाले दोनों पहलवान पहले से तय कर लेते हैं कि कोई किसी को हराएगा नहीं. दांव पर दांव चलते रहते हैं. दर्शक परिणाम की उम्मीद में हूट करते रहते हैं. आख़िरकार नाउम्मीद जनता अपने ढूंगों से धूल झाड़ती हुई घर को लौट जाती है. पहलवानों के समर्थक विपक्षी की नीयत में खोट बताते हुए अगली बार की नयी लडाई के वक़्त देख लेने की हुंकार भरते रहते हैं.

हमारी निष्ठाएं यथावत रही. भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ कोलाहल रचते रहे, कामचोर बने रहे, सरकारी फाइलें अटकी रही. देश फिर भी आगे बढ़ता रहा. टाइम मैगजीन के लोग रालेगण सिद्धि में इंटरव्यू करने को आये. देश का बड़ा तबका धन्य हो गया. हमारे आदर्श बड़े भ्रामक हैं. टाइम मैगजीन के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ कि मनुष्य का भला करने वाली किसी घटना या व्यक्ति को सालाना कवर के लिए चुना गया हो. उन्नीस सौ सत्ताईस से लेकर दो हज़ार ग्यारह तक मात्र एक बार महाविनाशक रोग एड्स पर शोध के लिए ताईवानी वैज्ञानिक डेविड हो को पर्सन ऑफ़ द ईयर चुना गया है. शेष सभी अमेरिकी और रूसी राष्ट्राध्यक्ष, लड़ाईखोर, धार्मिक उन्माद फ़ैलाने वाले अयातुल्लाह खुमैनी जैसी लोग रहे हैं. टाइम मैगजीन मनुष्यता की नहीं वरन उथल पुथल की दीवानी है. ऐसे ही एक खुशफहमी ये भी रही कि भारतीय मिडिया को अन्ना प्रिय हैं और यूपीऐ का चेहरा काला दिखाना, जनता की पक्षधरता का प्रमाण है. वास्तविकता ये है कि मिडिया को किसी से प्रेम नहीं है. उन मनुष्यों से भी नहीं जिन्होंने बारह घंटे की शिफ्ट में अमानवीय कार्य करके गला काट प्रतिस्पर्धा में अपने समूह को नयी पहचान दी है. मिडिया के मालिक सिर्फ़ पैसा और सत्ता में अघोषित हिस्सेदारी के एजेंडा पर ही कार्य करते हैं.

हमारा देश सभी संस्कृतियों और विचारों का दिल खोल कर स्वागत करता है. जिनको कहीं पनाह नहीं मिलती वे हमारे यहाँ राज करते रहे हैं. पिछले कुछ एक सालों में आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक के सौजन्य से सप्रयास दुनिया भर के विकासशील देशों में सिविल सोसायटी की अवधारणा को अमली जामा पहनाया जा रहा है. इसका पहला उद्देश्य है कि वहाँ के संविधान के समानांतर एक समूह तैयार किया जाये. जो उसे निरंतर चुनौती देता रहे. इस कार्य को ऐसे समझा जा सकता है कि पिता के विरुद्ध परिवार के एक सदस्य को खड़ा किया जाये. इससे निरंकुश पिता परिवार को गर्त में न धकेल सके. इसके परिणाम क्या होंगे यह तो हम रेगिस्तान में भेड़ें चराने वाले लोग भी जानते हैं. देश में जंतर मंतर करने वाले इसे और बेहतर जानते ही होंगे. फिर भी शराबियों को खम्भे से बांध कर पीटने वाले इस तालिबानी गाँधीवादी से देश को बहुत उम्मीदें हैं. हम भ्रष्टाचार से मुक्त होना चाहते हैं, हम लूट के राज से बाहर आना चाहते हैं. हम सुकून और इज्जत से जीना चाहते हैं.

हमारा संविधान कहता है कि चुनी हुई सरकार जनता के लिए है. सरकार ने पाया कि चुन कर जनता के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, भोजन, जनसंचार और आवागमन की सुविधाएँ जुटाने में लगे रहना कोई राज करना थोड़े ही होता है. असली राज है कि आदेश हमारा चले, काम कोई और करे. इसलिए जनता की सभी जरूरतों का निजीकरण कर दिया गया है. पानी चाहिए पैसे दो, बीमार हो तो पैसा दो, आने जाने को साधन चाहिए तो पैसे दो, बच्चों को पढ़ाना है तो पैसे दो... अनवरत, सब जरूरतों का हल है पैसा. जेब में नहीं है तो कमा के लाओ. रोज़गार नहीं है अब क्या करें? सरकारों के पास इसका भी जवाब है कि पूरी दुनिया में नहीं है क्या करें? इन सवालों और जवाबों के कुचक्र में इतना तो तय है कि इस भ्रष्टाचार का आका निजीकरण है. मेरे प्यारे तालिबानी गाँधीवादी उसके ख़िलाफ़ नहीं लड़ेंगे कि ऍनजीओ के लिए पैसा बड़े मुनाफाखोरों की तिजोरियों से आता है.

इस साल के लिए एक दुआ थी कि थोड़ी सी शराब बरसे. दुआ कुबूल हो गई. साल भर लाजवाब स्वाद का सिलसिला चलता रहा. शराब बहुत काम आई कि स्मृतियों के उत्सव मनाने में आसानी रही. देश की आत्मा कही जाने वाली संस्कृति के अनमोल तत्व सिलसिले से बिछड़ते गए. मक़बूल चित्रकार, रुपहले परदे के नायाब सितारे, आवाज़ों से अमृत बरसाने वाले फ़नकार, किताबों के रचयिता इस लोक को अलविदा कह गए. उनके अमूल्य योगदान पर बरबस आँखें भीगती रही मगर देश, दिल्ली और दिल्ली की गलियों में स्वांग रच रहे लोगों के समूहों को देखता रहा. एक यकीन फिर भी बना रहा कि लोकपाल के लिए पैंतरे चला रहे लोग किसी के दिल में नहीं धड़क सकेंगे. वहाँ सिर्फ़ जगजीत जैसी मखमली आवाज़ें होंगी. कोई साज़ याद दिला रहा होगा कि बहुत पहले से उन कदमों की आहट जान लेते हैं, तुझे ऐ ज़िन्दगी हम दूर से पहचान लेते हैं...

इस साल मंदिरों के तहखानों में दबी अविश्वसनीय अकूत धन सम्पदा देखी, पहली बार टीवी पर करोड़ों का ईनाम जीतता आम आदमी देखा, नक्सलियों की पैरोकार को कुर्सी पर बैठते देखा, अट्ठाईस साल बाद क्रिकेट के नए अवतार देखे. ऑटो रिक्शा में लाया जा रहा कबड्डी का विश्व कप देखा, तैतीस साल बाद झुका हुआ लाल झंडा देखा और सदी का सबसे बड़ा पूर्ण सूर्य ग्रहण देखा. सच, इस साल की सुराही में भरा पेय अद्भुत था कि बगलें झांकता विपक्ष देखा, मात दर मात खाता पक्ष देखा. दो चार के सिवा नेताओं का कुछ नहीं बिगड़ा बस आम आदमी को पस्त देखा. दिन भर कैमरे घूमते रहे तिहाड़ के आस पास और उनको रात में किसी बार में मस्त देखा. हाँ, शायद इसीलिए इक़बाल साहब ने कहा था, कुछ और बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी...

एक दुआ थी कि बहुत सारा सुकून बरसे, कुबूल नहीं हुई. जिनको अपना कहते हैं, उन मेहरबानों की मेहरबानियाँ बरसती रही. उन्होंने ज़ुबान पर लगे चाँदी के वर्क को उतार दिया और अपने नाखूनों को धार देते रहे. सब दुआएं कहां कामयाब होती है? मंदिरों में खड़े पुराने वृक्षों की डाली डाली पर और मस्जिदों की जालियों के हर कोने में बंधे हुए मन्नतों के धागे कब खुलते हैं. ऐसे ही सब रंग बिरंगी दुआएं समय की धूप में बेनूर हो जाया करती है. कमबख्त दुनिया का कारोबार चलता रहता है. इस सुराही से खट्टा मीठा जो भी बरसता है, वही ज़िन्दगी की नियाज़ है. किसी दिन ज़िन्दगी की सुराही रीत जाएगी. उस दिन हम भी बेनियाज़ हो जायेंगे.

* * *

नए साल में भले ही शराब न बरसे मगर एक लम्बी कहानी लिखनी है, उसे लिख सकूँ. कुछ किताबें, कुछ आवाज़ों का जादू बना रहे. जिन पर क्रश है, वे पहलू में हों. हिंदुस्तान जैसे विरले देश की हर गली में असंख्य किस्सागो, संगीतकार, चितेरे और अनूठी कलाओं के धनी रहते हैं. उन सब का हुनर सितारों में चाँद सा रोशन हो. जिन मित्रों ने साल भर मेरी इन कच्ची बातों को पढ़ा है, अलभ्य खुशियां उनका पता पूछती फिरे. वे अपनी चौखट पर महबूब को बोसे देता हुआ देखें... इसके बाद होने वाली तकलीफों को आंसू भरी आँखों और मुस्कुराते हुए होठों से बरदाश्त भी कर सकें. वैसे अभी इस साल की सुराही में एक बूँद बाकी है. उस्ताद सुल्तान खां साहब को याद करते हुए, श्रेया की दिल चुराने वाली आवाज़...

December 27, 2011

पीले रंग का बैगी कमीज़ : पेट्रिसिया लोरेन्ज

यह पीले रंग का बैगी शर्ट मुझे उन्नीस सौ चौसठ में मिला था. पूरी आस्तीन वाले इस कमीज़ के चार जेबें थी. कई सालों तक पहने जाने के कारण इसका रंग बहुत कुछ उड़ चुका था किन्तु अब भी ये बहुत अच्छी हालात में था. यह उन दिनों कि बात है जब मैं क्रिसमस अवकाश के दिनों घर पर आई थी. माँ ने कुछ पुराने कपड़ों के ढेर के बारे में बात करते हुए कहा था कि तुम इनको नहीं पहनने वाली हो ना? तब उनके हाथ में एक पीले रंग वाली कमीज़ थी. उन्होंने कहा कि "इसे मैंने उन दिनों पहना था जब तुम और तुम्हारा भाई इस दुनिया में आने वाले थे. यह साल उन्नीस सौ चौवन की बात है.

"शुक्रिया माँ मैं इसे अपनी आर्ट क्लास में पहनूगी" कहते हुए, मैंने उस पीले रंग के कमीज़ को अपनी सूटकेस में रख लिया. इसके बाद से यह कमीज़ मेरे वार्डरोब का हिस्सा हो गया. स्नातक उत्तीर्ण करने के बाद जब मैं अपने नए अपार्टमेंट में आई तब मैंने इसे पहना. इसके अगले साल मेरी शादी हो गयी. मैंने इस कमीज़ को बिग बैली दिनों में पहना यानि उन दिनों जब हमारे घर में नया बच्चा आनेवाला था. इस कमीज़ को पहनते हुए मैंने अपनी माँ और परिवार के लोगों को बहुत याद किया. मैं कई बार इसलिए बरबस मुस्कुरा उठती थी कि इसी कमीज़ को एक माँ ने कई साल पहले ऐसे ही दिनों में पहना था.

क्रिसमस के अवसर पर मैंने भावनाओं से भर कर उस पीले रंग के बैगी शर्ट को एक सुन्दर लिफाफे में बंद करके के माँ को भेज दिया. इसके जवाब में माँ ने पत्र लिख कर बताया कि ये एक रीयल गिफ्ट है. मुझे इससे बहुत प्यार है. इसके बाद उन्होंने कभी इसका ज़िक्र नहीं किया. हम अपनी बेटी के साथ अगले साल फर्नीचर की खरीदारी के सिलसिले में लिए माँ और पापा के यहाँ गए थे. लौट कर आने के कुछ दिनों बाद जब हमने खाने की मेज पर की हुई पेकिंग को खोला तो वहाँ लिफाफे में बंद कुछ पीले रंग का चमक रहा था. यह वही कमीज़ था

इसके बाद एक सिलसिला चल पड़ा.

अगली बार जब हम माँ और पापा के यहाँ गए मैंने चुपके से उसी शर्ट को माँ के बिस्तर के गद्दे के नीचे छुपा दिया. मुझे नहीं मालूम कि वह कितने दिन तक वहाँ छुपा रह पाया होगा. लेकिन कोई दो साल बाद इसे मैंने हमारे लिविंग रूम के लेम्प के नीचे पाया. फिर उन्नीस सौ पचहत्तर में मेरा तलाक हो गया. मैं जब अपना सामान बाँध रही थी, अवसाद ने मुझे बुरी तरह घेर लिया. मैं दुआ कर रही थी कि इस सब से उबर सकूँ. मुझे लगा कि वह पीला कमीज़ जो मेरी माँ का प्यार है वास्तव में वही ईश्वर का दिया हुआ उपहार है.

बाद में मुझे रेडियो में एक अच्छी नौकरी मिल गई. एक साल बाद एक थैले में मुझे वह पीला कमीज़ मिल गया. उस पर कुछ नया लिखा था. यह उसके सीने वाली जेब पर था. “आई बिलोंग टू पेट.” इस बार माँ ने उस पर मेरा नाम लिख दिया था. मैंने अपना कशीदे का सामान लिया और उसके आगे कुछ और अक्षर लिख दिए. अब यह हो गया था. “आई बिलोंग टू पैट्स मदर” मैंने इसे दूर रह रही अपनी माँ को भेज दिया. मेरे पास कोई तरीका नहीं था कि ये जान सकूँ कि उस पार्सल को खोलने के बाद माँ के चेहरे पर क्या भाव थे.

मैंने साल सत्तासी में फिर विवाह कर लिया. हमारी शादी के दिन मैं अपने पति की कार में बैठी थी. मैं आराम के लिए तकिया खोजने लगी तभी मुझे विवाह के अवसरों पर उपहार में दिए जाने जैसी पैकिंग में एक लिफाफा मिला. उसे खोलते ही पाया कि वह वही पीले रंग का बैगी कमीज था. ये पीला बैगी शर्ट, मेरी माँ के द्वारा दिया गया आखिरी उपहार था. इसके तीन महीने बाद सत्तावन साल की उम्र में वे चल बसी.

सोलह साल तक चला प्यार का खेल जो मैंने और माँ ने खेला, अब खत्म हो गया था. मैंने तय किया कि मैं इस पीले बैगी शर्ट को अपनी माँ की कब्र पर भेज दूं. लेकिन मुझे खुशी है कि मैंने ऐसा नहीं किया. एक और भी बात है कि मेरी बेटी इन दिनों कॉलेज में है और वह कला पढ़ रही है. कला के सब विद्यार्थियों को एक पीले रंग का बैगी कमीज चाहिए होता है जिसमें चार बड़ी जेबें हो...

* * *

इस कहानी के आखिर में एक पंक्ति लिखी है. "सच्चा दोस्त वह है. जो आपके हाथों को छुए तो लगे कि दिल को छू लिया है"

* * *

पेट्रिसिया लोरेन्ज की लिखी ये कहानी साल दो हज़ार पांच के क्रिसमस से पहले अट्ठारह तारीख़ को 'डॉन काजर' ने मुझे भेजी थी. मेरे मेल बॉक्स मैं रखी हुई बहुत सी यादगार चीज़ों में से एक है. मैंने अपनी उस दोस्त को कभी कुछ कहा नहीं. मैं आज छः साल बाद इस कहानी को लौटा रहा हूँ. इस तरह कहानी को एक दूसरे तक पहुंचाने का खेल एक रोज़ ख़त्म हो जायेगा. मेरी मृत्यु के पश्चात् पीले बैगी कमीज़ को याद करते हुए, वह इस कहानी को गंगा में बहाने की जगह अपने किसी और प्रिय दोस्त को दे देगी. विलासिता के तमाम उपहार होठों पर रखे उस चुम्बन की तरह है जो दिल तक पहुंचे बिना अगले पल दम तोड़ देते है. जबकि हमारे आत्मीय प्रेम भरे संबंधों को एक पीले रंग का बहुत पुराना बैगी कमीज़ अपनी चार बड़ी जेबों में भर कर रख सकता है.

[Fairy mom and daughter painting : courtesy artist Nichole Wong]

December 23, 2011

मेहरबानों के घर के बाहर


उस रात अमावस्या को गुज़रे हुए कोई दो तीन दिन ही हुए होंगे. सब तरफ अँधेरा ही अँधेरा था. आकाश तारों से भरा था. धरती के ज़रा दायीं तरफ दक्खिन की ओर जाती हुई दिप-दिपाते हुए तारों की एक लम्बी श्रृंखला आसमान के ठीक बीच नज़र आ रही थी. वह पांडवों का रास्ता है. हाँ, वही होगा जिसे वड्सवर्थ ने मिल्की वे कहा है. उसने इस सब को इतने गौर से कभी नहीं देखा था. वह सिर्फ़ सोचता था कि तारे कहां से निकलते हैं और किधर ड़ूब जाते हैं. उसने ये कभी नहीं सोचा कि अँधेरा भी ख़ुद को इतनी सुन्दरता से सजा लेता है. उसने अपना हाथ किरण के कंधे पर रखे हुए कहा. "तारों को देखो किरण.."

मुझे जाने क्यों सहसा सुख हुआ कि भले ही सुबह ओपरेशन के बाद वह बचे या नहीं मगर यह उसके जीवन के अनन्यतम श्रेष्ठ क्षणों में से एक क्षण है. मैं राजशेखर नीरमान्वी की कहानी पढ़ रहा था. कई दिनों से मैं रास्ता भटक गया था. मेरे जीवन जीने के औजार खो गए थे. इस जीवन में जिधर भी देखो आस पास कई सारी शक्लें जन्म से लेकर मृत्यु तक मंडराती रहती है. उनमे से कई हमारे जन्म से पूर्व प्रतीक्षा में होते हैं और कई हमारी मृत्यु के पश्चात् भी हमारी स्मृतियों में डूबे रहते हैं. इन चेहरों को समाज अपना कहता है. मैं सोचने लगता हूँ कि ये अपने किसलिए होते हैं? ये किस तरह की खुशियां लेकर आते हैं अथवा हमारे जीवन पथ के शूल कब कब बुहारते हैं. क्या ऐसा होता भी है कि ये हमारे उघड़े हुए दुखों पर अपनी आत्मीयता का पैबंद भी रखते हैं. अचानक मेरे भीतर से कोई नकार जागता है. अनुभव कहते हैं कि अपना तो कोई कोई ही होता है बाकी सब समाज के छद्म जाल हैं.

मैं जो कहानी पढ़ रहा था उसका नायक अपने पिता को कोसता है कि उन्होंने अपने स्वार्थ अथवा दुनिया की लकीर को बचाए रखने के लिए शादी करने को बाध्य किया. उसे अनेक अवसरों पर बाल्टी भर कर आंसू बहाने वाली अपनी माता भी याद आई. एक ऐसी माता जो जन्म देने का प्रतिफल चाहती थी. उसे वे सब दयनीय चेहरे याद आये जो समाज की रीति की वेदी पर सिक रहे थे. उसे याद आता है कि वह स्वयं कितना कमजोर था कि जिस समय रूढी की दीवार को ठोकर मारनी चाहिए थी, उसने आत्मसमर्पण कर दिया था. इस समय वह कृशकाय हो चुका था और चिकित्सकों का कहना था कि आंतें सूख चुकी है जीवन का कोई भरोसा नहीं है. ऐसे में लिपे पुते हुए चेहरे वाली उसकी धर्मपत्नी अपनी सहेलियों के साथ उसे देखने आई है.

नायक का मन इस कदर घृणा से भरा होता है कि वह पत्नी के द्वारा किये गए स्पर्श के लिए कोई प्रतिक्रिया करने के स्थान पर सोचता है कि इसके आंसुओं को रुक जाना चाहिए ताकि क्रीम पाउडर उतर न जाये. इस नकली चेहरे को सजाने में ख़राब हुआ समय और धन बेकार न चला जाये. नायक की इस मनोदशा के बारे में पढ़ते हुए मैं सोचता हूँ कि शादी का अर्थ होता है ख़ुशी. यह किस तरह की ख़ुशी है जिसमें एक तरफ घोर उपेक्षा और दूजी तरफ एक घृणा का बसेरा है. मुझे इससे भी अधिक अफ़सोस इस बात का होने लगता है कि समाज या जो अपने कहलाते हैं वे सब इन्हीं स्थितियों को बनाये रखने के लिए मरने को तैयार हैं. उनकी आँखें आंसुओं से भरी है. उन्होंने मुंह फेर लिए हैं कि उनका अपना इस बंधन से मुक्त क्यों होना चाहता है. ये अपने हैं क्या ?

कहानी इस समाज की विवाह व्यवस्था के आस पास की है. लकीर को पीट रहे समाज की क्षणिक तस्वीर दिखाती है. एक ऐसा समाज जिसमें माँ, पिता और तमाम सगे सम्बन्धी विवाह की रट लगाये रहते हैं. उस वक़्त से ही जब बच्चा बोलना सीखता है. गोया कि बच्चे पैदा करना और उनका विवाह कर के मर जाना ही एक मात्र शास्त्रीय कार्य है और स्वर्ग का आरोहण कर रही गाय की पूंछ है. वे ऐसा किसलिए कर रहे हैं? उनके पुरखों ने भी ऐसा ही किया था. उनके पिता भी माता को पीटते हुए और माताएं पिता को उपहास के झूले में झुलाते हुए जीती रही हैं. जब उनके साथ ऐसा ही हुआ तो फिर उनकी संतान क्योंकर खुश होकर अपनी पसंद के बंधन चुन और त्याग सकें.

यह ढपोर शंखों की दुनिया है. इसकी सब आवाजें खो गयी है. बचा हुआ सुर है वह एक सरीखी रेंक है. चौतरफ बंधन हैं, ख़ुद के भ्रम से रचे गए बंधन. जन्म पर उल्लास की नदियाँ बहा देने वाले और मृत्यु पर शोक के विशाल पर्वतों की श्रृंखला रच देने वाले नासमझ इंसानों के समूह का आचरण, जिसे हम सामाजिकता कहते है, बड़ा खोखला, कुंठित और निर्दयी है. समाज की इस अवस्था के बारे में सोचता हुआ मैं फिर से कहानी में लौट आता हूँ. राजशेखर की यह कथा छठे दशक के हिंदुस्तान की कहानी है. सोचता हूँ पढ़ लिख कर बेहतरी की ओर बढ़ रहे समाज की हालात में अभी तक कोई परिवर्तन आया है. कहानी लिखने के बाद के इन पचास सालों में हमारी रूढ़ियाँ और समझ उसी खूंटे के चक्कर काट रही है जिस से हमारे पुरखे बंधे हुए थे.

उस दौर की माँ केपिटलिस्ट थी. जिसने सब अधिकार अपने कब्ज़े में कर लिए थे और पिता इसके विरोध में कम्युनिस्ट हो कर लड़ते रहे. पत्नियाँ आंसुओं की दुकानें थी और राशन कार्ड के हिसाब से उचित अवसरों पर यथायोग्य स्टाक कंज्यूम किया करती थी. पति भावनाओं से भरे वे श्रमजीवी थे जो कभी अपने अधिकारों के लिए लड़े नहीं और इसका दोष अपनी भार्याओं पर मढ़ते रहे. उन्होंने जिससे प्रेम किया वे उनकी पत्नियाँ नहीं थी और जो पत्नियाँ थी, उन पर प्रेम आता नहीं था. क्योंकि प्रेम एक रूमानी चीज़ है और रुमान क्षणभंगुर होता है. वह अल्टरनेट करंट की तरह आता है. जबकि पत्नी हमेशा साथ रहने के कारण डायरेक्ट करंट का ग्रिड बनी रहती है. आज भी सब कुछ वैसा ही है. आदम ने जो सहजीवन का झूला दिया था वह विवाह की आकाशीय पींगों में तब्दील हो गया है. हम चिल्लाने वाले को कौतुहल से देखते हैं और उसे कुटिल दिलासा देते हैं कि झूला नीचे आते ही सब सामान्य हो जायेगा. लेकिन सदियों से समाज इसका प्रतिकार करता है कि झूला रुक जाये.

खैर, वो जो किरण है. जिससे नायक कहता है. इस चांदनी को देखो... वह एक अभागी स्त्री है. जिससे नायक को इसलिए विवाह नहीं करने दिया गया था कि वह सोशल लेयर में नीचे थी. वह इस आखिरी घड़ी में तमाम बाधाएं पार कर किसी की परवाह किये बिना अस्पताल चली आई है. नायक को सहारा देकर खड़ा करती है. वह बाहर खुली हवा में घूम लेने के बाद अपने बिस्तर पर लौट आता है. नायक अमावस्या के बाद की अँधेरी रात में देखता है कि शुक्र तारा ऊपर जा रहा है. वह अपने रिश्तेदारों के बारे में सोचता है कि इन मेहरबानों से मुक्ति नहीं है. इन मेहरबानों के घर के बाहर क्षितिज से परे क्या है, यह देखने की इच्छा है. कभी कभी इस कब्र सी भूमि पर पड़े हुए आकाश की चादर को फाड़ कर भूमि और आकाश को एक कर देने की इच्छा होती है. अगले ही क्षण मेरा अस्तित्व धूल हो जाता है.

क्या सबके जीवन में कम से कम एक ऐसा क्षण आएगा कि घनघोर अँधेरे दिनों में कोई एक चांदनी की किरण होगी. सुबह जब नायक को स्ट्रेचर पर लिटा दिया गया तब उसने पाया कि माँ की आँखों में आंसू थे, पिता सांत्वना दे रहे थे और पत्नी किसी भाव को मुख पर लाने का प्रयास कर रही थी. लेकिन उसने इन मेहरबानों के बीच तय किया कि मर गया तो मेरी इच्छा पूर्ण होगी और बच गया तो... बस... जीवन अर्थपूर्ण ही बीतेगा. मुझे लगा उसने तय कर लिया है कि वह अपने इस जीवन को खोखले चेहरों और सड़ी-गली रवायतों के लिए बरबाद नहीं करेगा.

* * *

इस कथा के नायक सदृश्य असंख्य नायिकाएं भी इसी धुंए में घुट रही है. समय का सूचक हमारा घड़ियाल कहीं ठहर तो नहीं गया है या फिर हमने अपनी अक्ल पर नासमझी को पहरेदार बना लिया है. "मेहरबानों के घर के बाहर" राजशेखर नीरमान्वी की इस कन्नड़ कथा के जरिये मैं इस नए दौर के कथित सभ्य समाज को लानतें भेजता हूँ. हम अभी भी घूरे के ढेर पर बैठे हैं, जाने हमारे दिन कब फिरेंगे?

December 18, 2011

सोच के उनको याद आता है...


अक्सर एक निर्वात में खो जाता हूँ. वहाँ असंख्य कथाओं का निरपेक्ष संचरण होता है. उसमें से एक सर्वव्याप्त कथा है कि जिनका मुश्किल दिनों में साथ दिया हों वे अक्सर ज़िन्दगी आसान होने पर एक काली सरल रेखा खींच, मुंह मोड़ कर चल देते हैं. इस सरल रेखा के बाद, उससे जुड़ी जीवन की जटिलतायें समाप्त हो जानी चाहिए किन्तु मनुष्य अजब प्राणी है कि दुर्भिक्ष में पेड़ से चिपके हुए कंकाल की तरह स्मृतियों को सीने से लगाये रखता हैं.

जोर्ज़ बालिन्त की एक खूबसूरत रूपक कथा है. 'वह आदमी रो क्यों रहा था." रंगमंच या किसी उपन्यास में रुलाई उबाऊ और भावुकता भरा प्रदर्शन लगती है परन्तु सचमुच की ज़िन्दगी में रोना एक अलग ही चीज़ है. क्योंकि ज़िन्दगी में रोना वातावरण पैदा करने वाला भौंडा प्रदर्शन नहीं होता. जैसे सचमुच के जीवन में डूबते हुए सूरज की ललाई किसी पोस्टकार्ड की याद नहीं दिलाती बल्कि बेहद आकर्षक और रहस्यमयी लगती है. ठीक इसी तरह सचमुच के जीवन में शिशु का रिरियाना मोहक नहीं लगता बल्कि ऐसा लगता है मानो वह बहुत पुरातन कोई अदम्य आदिम व्याकुलता व्यक्त कर रहा हो.

इस कथा के नायक का नाम लीफे था. वह राजमार्ग पर बैठा, अपने घुटनों में सर डाले हुए रो रहा था. किन्तु वहाँ से गुज़रते हुए किसी व्यक्ति ने उस पर ध्यान नहीं दिया. कथाकार उसके रोने के कारणों के बारे में कई कयास लगाता हुआ हमारे सुखों को छल लिए जाने को अनावृत करता है. मनुष्य ने अपने जीवन पर छलावों के झूठ का सुनहला का पानी क्यों चढ़ाया है. क्या हमारे दुःख आदिम है? और क्यों हम मनुष्य के रोने से परे हुए जा रहे हैं? एक जगह मन को छू जाने वाला कयास है कि शायद किसी ने लीफे को पूछा हो कि "आप कैसे हैं?" और वह रो पड़ा हो. हम अक्सर जिनसे अपना हाल दिल से पूछे जाने की अपेक्षा करते हैं, वे हमारे पास नहीं होते.

जीवन की अटूट विश्रृंखलता का अपना विधि विधान है. जीवन के कारोबार में रोने का मोल समसामयिक नहीं होता है. दुःख का कारवां, हमारे जीवन को उथले पानी में फंसी मछली जैसा कर देता है. रोने के भंवर से बाहर आने के लिए जिस स्पर्श की जरुरत होती है. वह समय की धूप में सख्त हो चुका होता है. वस्तुतः रोते समय हम अपनी शक्ल खो देते हैं इसलिए जोर्ज़ की कथा के नायक का चेहरा नहीं दिखाई देता. उसके वस्त्रों से वह साधारण जान पड़ता है. साधारण मनुष्यों के रोने के लिए खास जगहें नहीं होती. वे सड़कों के किनारे ऐसी जगहों पर बैठे होते हैं जहाँ ऊपर की ओर हाईमास्ट कलर्ड लाइट्स लगी रहती हैं.

ये रौशनी का समाज अँधा है. इसकी दीवारें बहरी है. यह अपने मृत दिवसों की खाल को ओढ़े हुए उत्सवों में मग्न रहना चाहता है. इसलिए भी इस कथा में अगर लीफे शाम होने तक उसी जगह बैठा रोता रहा तो वह किसी को दिखाई भी नहीं देगा. उसके सर के बीसियों फीट ऊपर रंगीन रौशनी की जगमगाहट होगी. वह रंगीनी के तले अंधेर में खो जायेगा... घिर घिर कर प्रश्न सताएगा कि फिर वह आदमी रो क्यों रहा था? ऐसे ही मैंने भी कई बार पाया कि लीफे की तरह बेशक्ल, घुटनों में सर डाले हुए हम सब कितनी ही बार उनके लिए रोते रहे हैं, जिनको हमारी परवाह नहीं थी. आज सोचता हूँ कि उस रोने का मोल क्या था? और क्या सचमुच ऐसे कारण थे कि रोना आ जाये...

* * *

जोर्ज़ बालिन्त की मात्र सैंतीस साल की उम्र में नाज़ी श्रम शिविर में मृत्यु हो गयी थी. हम भी भौतिकता के नाज़ीवाद में घिरे हैं. इस दौर में हम दबाव वाली जीवन शैली के नाज़ी शिविर में कैद हैं फिर भी मैं एक दुआ करता हूँ कि हम सीख सकें प्रेम से बाहर आना ताकि प्रेम हमारे भीतर आ सके.

December 11, 2011

कुछ ये याद किया...


एक बड़ा दरवाज़ा है. मजबूत सलाखों के पार दुनिया की रफ़्तार है. सांझ घिर आई तो बाहर सड़क पर चलती फिरती शक्लें लेम्पोस्ट से गिरती रौशनी में कुछ देर दिखती और फिर बुझ जाती. दफ्तर के अंदर गरमी है, बासी लम्हों के शोक से भरी गरमी. खुले में हवा की ठंडी झुरझुरी याद का तिलिस्म खोलती है. गुड़हल के पास हेजिंग के लिए मेहँदी और रेलिया की लम्बी कतार और कैन से बुनी कुर्सी पर स्मृतियों का कारोबार. बचपन के दिनों की अकूत खुशबू और रात के अद्भुत सिनेमा के रिपीट होने का ख़्वाब. वह सिनेमा कुछ ऐसा था कि उन दिनों माँ अक्सर आँगन के बीच दो चारपाई डाल कर हम तीनों भाइयों को सुला देती थी. उस अँधेरे में चारपाई पर लेटे हुए ऐसा लगता था कि काँटों की बाड़ के पार कुछ आवाज़ें हैं. दिन के समय उस तरफ वाले लम्बे खाली मैदान में बेतरतीब उगी हुई कंटीली झाड़ियाँ फैली दिखती थी. उन झाड़ियों के बीच पैदल चलने से बने हुए रास्ते थे, जिनकी दिशाएं खो चुकी थी.

रात के समय दिन भर का निरा शोर एक विचित्र काले सन्नाटे में समा जाता. किसी मायावी घटना के होने की बेशक्ल उम्मीद मुझे छू कर अँधेरे में गुम जाती. मैं हर रात तय करता कि सुबह होते ही बाड़ के आगे के पूरे इलाके की छानबीन करूँगा, मगर हर सुबह भूल जाता. रात के इकहरे रंग वाले इफेक्ट अद्भुत तरह का सम्मोहन रचते थे. मैं एक असम्भव दुनिया को अपने आस पास महसूस करने लगता. दिन भर कूड़े के ढेर पर माचिस की खाली डिबियों को चुनते फिरते लड़के कहते थे कि प्यासी जनाना रूहें गलियों के मोड़ों पर भटकती रहती हैं. वे खास तौर से पानी के हौद, बिजली के खम्भे और स्टेडियम वाले मोड़ के आस पास हुआ करती थी. मुझे कभी नहीं लगता था कि रात एक ज़ोरदार कहकहा लगा पायेगी. वह सिर्फ़ अजगर की तरह कुंडली कसती रहेगी. ऐसा ख़याल आते ही कभी हाथ के रोयें खड़े हो जाते. मैं अपनी हथेली से उन रोयों को छूकर देखता. वे ओस भीगे बाजरा के सिट्टों को छूने जैसा अहसास देते थे. उस अँधेरे से मेरे बहुत से आग्रह थे. उनमें सबसे गोपनीय था, एक कमसिन गंध... मेरे मस्तिष्क में वह कमसिन गंध उसी तरह आई होगी जैसे मिट्टी से बने घोंसले में बैठे हुए ततैये के बच्चे उड़ने का हुनर साथ लेकर आते हैं.

रात बदस्तूर हर शाम के बाद आती और माँ उसी तरीके से चारपाइयाँ बिछा देती. मैं अपने उसी सम्मोहन में खो जाता. गरमी के पूरे मौसम में अनजान अदृश्य दुनिया नींद आने से पहले आबाद रहती. वन बिलाव पेड़ की शाख़ पर दो तरफ टाँगे लटकाए हुए सोया रहता हो, उसी तरह मैं भी चारपाई की ईस पर सोता था. उस मोटी लम्बी ईस पर लेटे हुए सामने बाड़ और नीचे गोबर से लिपा हुआ आँगन दिखता था. रात गहराती रहती थी. आवाज़ों पर सन्नाटे का पहरा बैठ जाता. दबे पांव नींद फिर घेर लेती. सुबह आँख खुलती तो देखता कि झाऊ चूहे कि तरह गोल होकर चारपाई के बीच में सिमटा हुआ हूँ. रात के काले से सम्मोहन भरे कांटे गायब हो चुके होते. स्नानघर के ठन्डे फर्श पर पगथलियों में गुदगुदी हो रही होती फिर इसके बाद दिन खाली गलियों में दौड़ते भागते हुए बीत जाया करता था. कभी दोपहर को खुली खिड़कियों से कमसिन गंध की टोह लेता रहता था.

रात से मुहब्बत के सफ़र में अल्पविराम की तरह कुछ रातें आती रही. तब खुले आँगन में सोने नहीं दिया गया. ये प्यासी रूहों की गिरफ्त में आने से भी बड़ा खतरा था. उस रात दम भर के लिए चाँद को अँधेरा डस लेता. माँ तीलियों से बने एक सूप में गेंहूं भर कर छत पर रख आती. रात के भोजन को साँझ होते ही करना पड़ता. सवेरे झाड़ू लगाने वाली एक बूढी औरत घर के सामने आती और जोर से आवाज़ लगती "बाई जी, गरण दिराईजो..." माँ वे गेहूं उसकी झोली में डाल देती. मुझे वह रात कभी अच्छी नहीं लगती थी. उस रात अँधेरे की आवाज़ों का वाध्यवृन्द बंद हो जाया करता था. मुझे थपकियाँ देने वाली रूहें बंद कमरे में नहीं आ पाती थी. भटकने की आदत पर दीवारों की लगाम कस जाती. उनके पार सोचने को कुछ नहीं बचता था.

एक अरसे तक रात का अपना ओपरा कंसर्ट चलता रहा. अद्वितीय आवाज़ें जादू की दुनिया रचती रही. शहतीर के नीचे लटके हुए झीने परदे के पार से प्रीमा डोना यानि ओपरा कंसर्ट में गाने वाली मुख्य गायिका मेरी ओर बढ़ी आती. वाह वाही की प्रतीक्षा करते हुए निरंतर अपने सुर को बचाती हुई मुझसे अँधेरे कोने तक आने का मादक संकेत करती थी. उस वक़्त मैं नीम नींद से भरा रात की लहर पर सवार होता था जबकि ज़िन्दगी से जिरह कर के हार चुकी दुनिया के लोग अपने बिस्तरों में मरे पड़े रहते. मैं नींद में जाने से पहले इसी अद्भुत दुनिया में खोया रहता. मुझे अपनी पलकें आहिस्ता से झुकाते हुए एक साथ बंद करने का काम बहुत पसंद था. ऐसे नींद आया करती थी और ऐसे ही उतर आता था जादू रात की आँख से...

याद के आने के वक़्त का ये किस्सा कल शाम का है. जब हवा कुछ ठंडी थी और हरे रंग के बिना बाजू वाले स्वेटर के अंदर धड़क रहे दिल को कुछ खास काम नहीं था. चाँद को ग्रहण था तो सूरज के ढलते ही वोदका की गंध देसी बबूल की खुशबू से मिल कर अधिक नशीली हो गई. आवाज़ों का भूला बिसरा रोमांस दफ्तर के गलियारों में टहलता रहा. मैं सीढ़ियों के पास बनी पटरी पर दीवार का सहारा लिए बैठा रहा. यादों के साये, बचपन के भूले बिसरे आँगन से उड़ कर इस देह पर बिखरते रहे. रात कुछ बेवजह की बातें की और कुछ ये याद किया कि रात ने वो कमसिन गंध किस जगह छुपा रखी है? 

* * * 

[Painting : Counterweight; Image courtesy : Andrea Beech]

December 3, 2011

किस्से ज़ेहन में


इस स्कोटिश कहावत को भले ही गंभीरता से न लिया जाये मगर बात पते की है कि "हम जब तक ज़िन्दा हैं हमें खुश रहना चाहिए क्योंकि बाद में हम लम्बे समय के लिए मरने वाले हैं." ये मेरे अनुवाद का दोष हो सकता है या फिर स्कोट्लैंड के लोग भी मानते होंगे कि जीने का चांस फिर मिलेगा. यह भी एक तरह से ख़ुशी भरी बात है. इस तरह जीवन को बार बार पाने की चाह तो हम सब में है किन्तु इसी एक जीवन को प्रसन्नता से बिताने की कोई इच्छा नहीं है.

प्रसन्नता के बारे में अपनी इस बात को आगे बढ़ाने के लिए मैं रुढ़िवादी, अज्ञानी और आदिम दम्भी लोगों के समूह के लिए उचित 'एक शब्द' लिखना चाह रहा था और मेरे दिमाग में आया, तालिबानी. इसके बाद मुझे गहरा अफ़सोस हुआ कि मैंने अपने भाषाई ज्ञान पर वातावरण में उड़ रही गर्द को जम जाने दिया है. तालिबान होने का अर्थ है विद्यार्थी होना. इस शब्द का उपयोग निरंतर अमेरिका के पाले हुए उस समूह के लिए हो रहा है, जिसे सोवियत रूस के विरुद्ध खड़ा किया गया था. अब इस शब्द का सहज लिया जाने वाला आशय कठमुल्लों का वह समूह है, जो कबीलाई दुनिया के ख़्वाब देखता है और कोड़े और बंदूक का राज कायम करना चाहता है. खैर मैं ऐसा ही एक शब्द सोच रहा था जिससे यह कहा जा सके कि हम अपनी प्रसन्नता को निरंकुश हुक्मरान होने जैसी अवस्था में ही साबुत पाते हैं. किसी की असहमति या कोई एक मतभेद हमें असहज और प्रतिगामी बना देता है.

हम अधिकारों का कूड़ेदान हो गये हैं. हम अड़ियल टट्टू हो गये है. इसी में हमें प्रसन्नता है. ऐसे होने का आशय हुआ कि वास्तव में जो कुछ सामान्य रूप से हमें घेरे हुए है, वही हमारा प्रतिबिम्ब निश्चित करता है. यह इन्टेलेक्च्युलिज़्म की अवधारणा है. यह उस मूल विचार के आस पास केंद्रित है, जो कहता है कि हमें अननोटिस्ड चीज़ें रूल करती हैं. जबकि ख़ुशी एक प्रत्याशित चीज़ है इसलिए हाथ नहीं आती. बौद्धिकतावाद के प्रमुख नाम हेनरी डेविड थ्रौउ, नेचुरल हिस्ट्री के भी जरुरी नाम है. उनकी आत्मकथा वाल्डेन या जंगल में जीवन, छिछले समझ कर त्याग दिए गये अनुभवों की खासियतों का महीन रेशम बुनती है. उन्होंने प्रसन्नता के बारे में कहा कि "ख़ुशी एक तितली की तरह है. आप जितना इसका पीछा करते हैं वह उतना ही आपको छलती जाती है. जब आप दूसरे कामों में ध्यान लगाते हैं तो वह कोमलता से आपके कंधे पर आकर बैठ जाती है."

मैं इस बात के किसी भी सिरे को पकडूँ, पहुंचना वहीं है कि जब हम खुश रहना ही नहीं चाहते हैं तो एकाधिक बार के मनुष्य जीवन के प्रति आकर्षित क्यों होते हैं. मृत्यु जैसा शब्द सुनते ही क्यों हम जीवन के पाले में खड़े हो जाते हैं. हमारी आस्थाएं इतनी संवेदी है तो ये किन तंतुओं के जाल में उलझ कर निष्क्रिय हो गई है. हम अपने इस लम्हे को चीयर्स क्यों नहीं कह पाते हैं. यही बात कहने के लिए उसका इंतजार है, जिसका आना अनिश्चित है. शायद हम एक भव्य लम्हे की प्रतीक्षा में हैं ताकि हमें ख़ुशी भरा देख कर कोई इसके मामूली होने का भ्रम न पाल ले. अर्थात हम खुश भी उनके लिए होना चाहते हैं जिनको हमसे कोई गरज नहीं है. हम अपनी हेठी होते न देखें, इस आशा में खुश होना त्याग देते हैं.


"खुश रहा करो" यह हर बात में कहना अच्छा लगता है मगर दिक्कत ये है कि ख़ुशी अन्दर से और अवसाद या दुःख बाहर से आना चाहिए. किन्तु हमने इसे लगभग उलट दिया है. ख़ुशी को हम बाहर खोजते हैं और अवसाद को भीतर सहेजते हैं. मेरा बेटा अंकगणित में पांच और नौ उल्टा लिखता था. हम उसे सही करवाते मगर फिर एकांत में वह उसे अपने ही तरीके से लिखता. उसे कहते कि आपने क्या गलत लिखा है पता लगाओ. तो वह उलटे लिखे हुए पांच और नौ को कभी पहचान नहीं पाता था. जब हम उन अंकों पर अपनी अंगुली रखते तब उसे वे दिखाई देते थे. उसने धीरे धीरे उन गलतियों को दुरुस्त कर लिया मगर मैं वहीं अटका रह गया कि ख़ुशी बाहर और दुःख भीतर... हमारी ये उलटी गणित भी ठीक होनी चाहिए.

* * *

मेरे सेलफोन में एक मेसेज रखा है. ख़ुशी, एक जादू का तमाशा है. यह सत्य है या भ्रम, हम कभी नहीं जान पाते हैं.

* * *


जोर्ज़ बालिन्त की जो कहानी मैं सुनाने वाला था. वह ख़ुशी के बारे में नहीं है. वह मनुष्य के अकेलेपन और उजाड़ मन पर आई खरोंचों के प्रतीक, रोने के बारे में है. मेरी आत्मा इन आंसुओं में बसती है. खैर ! मैंने अब तक वह कहानी लिखनी शुरू नहीं की है. उस कथा के पात्रों की पदचाप सुनाई देने लगी है. वे जब बातें शुरू करेंगे तो मैं लम्बे वक़्त के लिए गायब हो जाऊँगा. उनकी दुनिया के तिलिस्म में अकूत बेचैनी और अकुलाहट होगी. दो दिन से बुखार है. बदन दर्द और हरारत से भरा है... फिर भी याद की लालटेन में जलता - बुझता हुआ एक चेहरा काफी बड़ी ख़ुशी है. इस पोस्ट के आखिर में तुम्हारे लिए प्यारे शाईर गौतम राजरिशी का शेर.


किताबें बंद हैं यादों की जब सारी मेरे मन में,
ये किस्से ज़ेहन में माज़ी के रह-रह कौन पढ़ता है.

आवाज़ के कुछ टुकड़े

के सी

My photo

Kishore Choudhary is a poet and fiction writer from Barmer (Rajasthan). His writing career took a formal leap from his personal journals to make him a hugely popular blogger on two of his blogs- Kahaniyan and Hathkadh.

Having spent most of his formative years in the desert, the life there is his favourite canvas to contextualise his poetry and stories. His followers from across the world vouch for his realistic and authentic portrayal of the desert life and its typical dilemmas, fused beautifully and almost effortlessly with some stunning images of the desert and its folklore.

Kishore in a way pioneered the incorporation of pre-publishing interactions and feedback with his readers on his blogs and across social media platforms in his final works. His style is known for its lucid and unexampled metaphors that he exquisitely uses to express universal feelings like love, loneliness, hope, pain, longing and fantasy. 

His first collection of stories Chaurahe Par Seedhiyan (2012)was such a thumping bestseller that the first issue was sold out within 50 days of its launch.All the stories skilfully bring the rich and exotic background of the desert come alive and make the reader delve deeper into the layers of human emotions.This much sought after collection raised the bar for all contemporary Hindi works of short fiction and brought in a fresh change in the existing status quo for Hindi short stories. 

The second collection titled Dhoop Ke Aaiyne Mein(2013)had an array of short stories that looked at life through a multi-dimensional prism, lending each one of them a distinctive charm. Kishore being a poet first, his stories are more like poetic fiction. Having a great affinity to the stream of consciousness novels by English literary greats like James Joyce and Virginia Woolf his stories defy the conventional rules of a definitive beginning, middle and end. 

Kishore’s first publication was a collection of poetry Baatein Bewajah, an alluring and bewitching series of short poems which capture the vast expanse of human emotions and have images that have a rare haunting quality.

Kishore is a Radio Broadcaster by profession and has a special fondness for classical & folk music. Articles about him and his interviews are available across many major newspapers and websites. Kishore certainly is the Avant-garde flavour in contemporary Hindi writing and his ever expanding avid readership eagerly waits for his next chartbuster.

Kishore's latest is another collection called "Jaadu Bhari Ladki". This collection has his same imitable style of stories but the contexts and places are beyond the desert as well. 
His deep understanding of the complexity of modern relationships and how they play out in our minds, homes and workplaces makes it a very unique almost post-modern work in Hindi Fiction.

http://www.goodreads.com/author/show/7361739.Kishore_Chaudhary

हेंगओवर सिलसिला

Labels

अफीम अमज़द इस्लाम अमर अमीर कज़ालबाश अम्बानी अरुंधती अर्नका बोहम असकर खाँ आखा तीज आत्मकथा आबिदा परवीन आर एस हरियाणवी 'रतन' इक़बाल अज़ीम इब्ने इंशा इशरत आफ़रीन ईथोपिया उत्तरलाई एटेल जुडिक एमी वाइनहॉउस एलोनोरा फेगन क़मर जलालाबादी कल्लजी कवास कवि कविता कहानी कार्टून कासानोवा केन्द्रीय विद्यालय ख़त ख़्वाब गणेश गफूर खां मांगणियार गाय ग़ालिब गालियां गिब्रेलपेरी गुडाळ गुरुद्वारा कबूतरसर गुलाम अली ग्रामीण भोज ग्रीन लेबल चाईल्ड मोलेस्टेशन छोटे सरकार जगजीत सिंह ज़फर हुसैन खां जया ज़िन्दगी जिप्सम हाल्ट जेम्स डगलस मोरिसन जोधपुर टाल्सटॉय ठुमरी डिक नोर्टन तीसरा प्रहर त्यौहार थारपारकर द बेल जार दिनेश जोशी दिमित्रोफ़ दूरदर्शन देजो कोस्तोलान्यी देसो सोमोरी देहरादून धोखा धोधे खां नज़ीर बनारसी नया साल नरसिंह बाकोलिया नष्टोमोह नसरुद्दीन नसीम देहलवी नागौर नाटक नानी नासिर काज़मी नुसरत नोस्टेल्जिया पतनशील पत्रकारिता पर्व पापा पेन्सिल प्रेम प्रेस कांफ्रेंस प्लेटफार्म नंबर तीन फ़रहत शहज़ाद फ़रीद अयाज़ फिर से फ़िराक फ़ीचर फैज़ फैंव्किस बर्नियर फ्रिजेश कारिंथी बाघ बाढ़ बातें बेवजह बी बी एल भटनागर बीकानेर बेख़याल बेगम अख्तर बेल्ली होलीडे बेस्ट स्कालर ब्रिटनी मर्फी भाई भुट्टा खाँ भूख मकबूल फ़िदा हुसैन मतीरा मंहगाई महमूद दरवेश महाजन माओवादी मास्टर मिर्ज़ा साहब मूमल मेकडोवेल्स मेथी मेहदी हसन मेहनसर मेहरुन्निसा परवेज़ मैगी मौसम यात्रा वृतांत याद यानोश कांदोलान्यी यू आई डी रांगेय राघव राहत रुकमा रेडियो रेवाण रेशमा लंगा लायोश ज़िलाही लायोश बीरो लेखन लोकगीत वसीम बरेलवी वाईट मिस्चीफ़ विकास विकीलीक्स विजय माल्या विभूति नारायण राय विवेकानंद विस्की व्यर्थ अभिमाना शराब शादी शाम शाहनवाज़ हुसैन शिनचैन शुजात हुसैन शेखावटी श्रेया घोषाल सपना सबा समंदर खान सलेटी जींस सहवाग साईमन मार्क मोंजेक सिल्विया प्लेथ सुदर्शन फ़ाकिर सुनो [जा]ना सुल्तान खां सूरतगढ़ स्कायलार्क स्टीफन क्रेन स्त्री विमर्श स्फिंक्स हंगरी हबीब वली मोहम्मद हम तुम हवेलियाँ होली ह्यूम

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने या खूबसूरत स्त्री को इरादतन चूमने जितना ही अवैध है.

Popular Post's

Google+ Followers

पलटे गए पन्ने