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Showing posts from August, 2017

प्रेम का जाने क्या होता है

सायकिल के कॅरियर पर बैठे
उनींदे बच्चे के पांव से गिरे
कच्चे हरे नीले रंग के जूते की तरह।

अक्सर कहीं पीछे छूट जाता है, प्रेम।
* * *

मैं चलते हुए अचानक रुक गया. जैसे कोई चिट्ठी जेब से गिर गयी. मुझे बहुत सालों से किसी ने चिट्ठी लिखी न थी. मैंने रेत में चारों तरफ देखा. वहां कोई चिट्ठी न थी. कोई कागज़ का टुकड़ा भी न था. एक काला मोती, सोने जैसी रेत में पड़ा था. अचानक मुझे याद आया कि उसके नाक पर बेढब तरीके से बैठा काला तिल सुन्दर दिखता है. उसके बच्चे बड़े हो गए हैं. मगर वह तिल उतना ही वहीँ ठहरा हुआ है.

मैंने कभी उससे नहीं कहा कि तुम्हारे नाक पर ये तिल कैसा लगता है. उसका वहां होना ही ठीक था. जैसे हम दोनों का एक साथ होते हुए भी एक साथ न होना ठीक था. ऐसे ही रेत में पड़ा काला मनका रेत के साथ होने पर ही सुन्दर था.

जाने क्यों प्रेम भी काले मोती की तरह रेत में सुन्दर दीखता तो है मगर बहुत जल्द खो जाता है.
* * *


छोटी नीली चिड़िया को
चाहिए होती है जितनी जगह
एक पतली सी टहनी पर।

सबको
बस उतना सा प्यार चाहिए होता है।
* * *

मेरी ज़रूरतें बहुत कम है
और तुम बहुत से अधिक हो।

मेरे लिए
तुम्हारा थोड़ा सा सा…

सराह एप - ओट से चलते बाण

असल में ऐप के पीछे छुपा हुआ शुभचिंतक आपकी हर तरह से हत्या का इरादा रखता है। आप समझ नहीं रहे।
मेरे पिता के ज़माने के लोग कहा करते थे कि अपनों को मुंह पर डांटते रहिये, पीठ के पीछे उनकी प्रसंशा कीजिये। एक ऐंटी सोशल एप ने बुजुर्गों की ये बात याद दिला दी है। अब चुपके से बिना नाम बताए ढेर तारीफें फेंकी जा रही हैं।
लेकिन मेरा एक डर अभी बाकी है। ये अदृश्य लोग कितने ख़तरनाक हैं। ये आपकी अच्छाइयों को आपके सामने स्वीकारते नहीं हैं। ये लोग आपके सामने प्यार और इज्ज़त से देखते नहीं लेकिन पसमंज़र में आपके लिए दिल उछाले जा रहे हैं। आपको अपना क्रश बता रहे हैं। आपको डेट पर चलने के न्योते दे रहे हैं।
किसी भी व्यक्तित्व को सम्मान और प्रेम चाहिए होता है। वह आपके मुख से अपने बारे में दो मीठी बातें सुनकर ख़ुश भी रहना चाहता है। हम ऐसा नहीं करते हैं।
एप पर आये संदेशे अगर आपने ख़ुद ख़ुदको नहीं भेजे हैं तो सावधान रहिये।
मैंने एप का उपयोग नहीं किया। अगर किया होता और कोई मुझे गुप्त तरीके से कहता कि आप अच्छी कहानियां लिखते हैं। तो ये हौसला अफ़ज़ाई क्या सचमुच होती? ऐसा क्यों है कि आप किसी को अच्छा कहने के लिए मुंह छुपाये र…

जेएनयू परिसर की एक दोपहर

उदासी का कोई कवर नहीं होता। मगर वह धुंधली होकर मिट जाती है।

मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
मेरे हो…

इस रुत

तुरई के पीले फूलों पर
भँवरे मंडराते रहे
बेरी में घोंसला बनाती रही नन्ही काली चिड़िया
बेशरम की बेल चढ़ गई नीम की चोटी तक
मन, ख़रगोश घर के बैकयार्ड में खोया रहा।

इस रुत कहीं जाने का मन न हुआ।


और कोई प्रेम नहीं तुमको

सघन दुःख की भाषा में ठीक से केवल हिचकियाँ लगीं होती हैं.
दुःख जब घना होता है तब हम जिस भाषा में प्रखर होते हैं, उसी भाषा में अल्प विराम ( , ) अर्द्ध विराम ( ; ) पूर्ण विराम ( । ) विस्मयादिबोधक चिह्न ( ! ) प्रश्नवाचक चिह्न ( ? ) योजक चिह्न ( - ) अवतरण चिह्न या उद्धरणचिह्न ( '' '' ) लोप चिह्न (...) लगाना भूल जाते हैं.

ठीक वाक्य विन्यास और बात सरलता से समझ आये, ये तो कठिन ही होता है. 
* * *
दुःख के सामने घुटने मत टेको. दुःख को उबालो और खा-पी जाओ. 
आलू, अंडे और कॉफ़ी की एक पौराणिक कथा है. एक बेटी ने पिता से कहा- "पापा मेरे सामने असंख्य समस्याएं हैं. मैं दुखी हो गयी हूँ." पिता उसे रसोई में ले गए. तीन मर्तबानों में पानी डाला और उनको आंच पर रख दिया. एक मर्तबान में आलू डाला, दूजे में अंडा और तीसरे में कॉफ़ी. कुछ देर आंच पर रखने के बाद पिता ने कहा- "देखो, इन तीन चीज़ों के सामने एक सी विषम परिस्थिति थी. इस आंच को सहने के बाद, आलू जो कि सख्त था. वह नरम हो गया है. अंडा जो कि एक कच्चे खोल में तरल था, वह सख्त हो गया है. और कॉफ़ी ने तो पूरे पानी को ही, अपने जैसा कर लिया ह…