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Showing posts from June, 2015

कि कुछ नहीं था, न कुछ रहेगा.

उस वक़्त परछाइयाँ ज्यादा लम्बी न थी. शाम मगर एक बेहद खूबसूरत रंग में सड़कों, दरख्तों, मकानों की छतों पर उतर आई थी. इस्कॉन मंदिर से हरे रामा हरे कृष्णा के स्वर बिखरते हुए दूर दूर तक फ़ैल रहे थे. धनाढ्य भक्तों की महंगी कारों का आना अभी शुरू न हुआ था. घर की बालकनी तक आते कृष्णा-कृष्णा, रामा-रामा के सुरीले लयबद्ध पाठ को सुनते हुए मुझे लगा कि वे अभी आ जायेंगे. नयेपन की आभा से भरे हुए. सुगन्धित वस्त्र पहने हुए उन देसी गोरे लोगों की आँखों में चमक भर आएगी. वे कार के डैशबोर्ड पर रखे पीले और गुलाबी फूलों की मादक गंध के ऊपर से शीशे के पार खड़े देव को हाथ जोड़कर ध्यानमग्न हो जायेंगे. छठे छठे माले के घर की बालकनी को लोहे के जाल से ढका हुआ है. उसी जाली को थामे हुए अंगुलियाँ चुप उलझी रहती हैं. हरे रामा हरे कृष्णा हवा के झोंकों के साथ कहीं उड़ जाते हैं. स्मृति में कुमार गंधर्व की आवाज़ में नियत अंतराल पर प्रवाहपूर्ण किन्तु साधना की उच्चतम स्थिरता से भरे सुर छूकर गुज़रते हैं. उड़ जायेगा हंस अकेला, जगदर्शन का मेला... 
देखो केसी! 
वह क्या रंग है? ये इतना सुन्दर कोलाज किसने रचा है? ख़यालों के बेतरतीब सिलसिले में …

कमानीदार रास्ते पर तहखाने में आबाद सस्ता शराबघर

एम आई रोड से सिन्धी केम्प की ओर जानेवाले कमानीदार रास्ते पर तहखाने में आबाद सस्ते शराबघर की डिस्प्ले केबिन पर अँधेरा पसरा था. सब शराबें एक ही पारदर्शी स्याह आवरण में ढकी थी. जादू तमाम एक रंग. खाली पड़े सोफों पर किसी बीते दिन के धुंए की तलछट पर नई परत रोपते हुए मेरे हमपेशा आदमी ने कहा- सब चालू है. अपने निजी स्वार्थों पर कायदे और काम का मुलम्मा चढ़ाए हुए ज़माना. 
आरडी मेरे पास के सोफे पर बैठे थे. नब्बे के दशक की शुरुआत में रेगिस्तान में सरकारी दफ्तर की कॉलोनी में शाम होने से पहले रियाया ताजपोशी के इंतज़ार में बेसब्र हो उठती थी. पानी की कमी से जूझ रहे कस्बे पर रहम खाकर आरडी कहते नहालिया जाता तो सुकून आता मगर हमें क्या है. जैसे औरों का जीना वैसे अपने भी कोई कमी नहीं. शाम अचानक टूट पड़ती. व्हिस्की की बू पसीने की बू को रिप्लेस कर देती. सिगरेट के धुंए से माहौल के नमकीन स्वाद में थोडा कैसलापन भी घुल जाता. ठहाके, लतीफे, बेपरवाही और बेख़याली जिंदगी के सभी दुखों को बुझा देती. आरडी जो कुछ कहते वह अक्सर किसी वेद वाक्य की तरह फूटता. पहली बार सुना गया. अंतिम बार तक याद रखने लायक. 
आज दोपहर फिर उसी सस्ते …

जून के सात दिन-रात

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कई बार हमें लगता है कि किसी एक चीज़ के कारण हमारे सब काम रुके पड़े हैं. कई बार उस चीज़ के न होने से मालूम होता है कि ऐसा नहीं था. क्या इसी तरह हमें ये समझना सोचना नहीं चाहिए कि जो कारण हमें सामने दिख रहे हैं वे इकलौते कारण नहीं है. 
इसलिए सोचिये, योजना बनाइये और धैर्य पूर्वक काम करते जाइए. 
ये कुछ रोज़ की डायरी है. तारीख़ें मुझे याद दिलाएगी कि ये दिन कैसे बीते थे. 
June 8 at 11:41pm ·

आवाज़ का दरिया सूख जाता है
उड़ जाती है छुअन की ज़मीन।

मगर शैतान नहीं मरता,
और न बुझती है शैतान की प्रेमिका की शक्ल।

June 9 at 12:09am ·

शैतान के घर में होता है 
शैतान की प्रेमिका का कमरा। 
जहाँ कहीं ऐसा नहीं होता वहां असल में प्रेम ही नहीं होता।
* * * 
सुबह से आसमान में बादल हैं। 
बिना बरसे ही बादलों की छाँव भर से लगता है कि ज़मीं भीगी-भीगी है।

किसी का होना भर कितना अच्छा होता है। * * *
June 10 at 1:03pm ·

अतीत एक साया 
इसलिए भी नहीं होना चाहिए 
कि जितना आपने खुद को खर्च किया है, 
वह कभी साये की तरह अचानक गुम हो जाये।
* * *

ओ प्रिये
एक दिन सब ठिकाने लग जाते हैं, 
हमारे दिन भी लगेंगे. 
तब तक तुम जब भी ज़िन्दगी पियो 
ज़रा सा इशारा मुझ…