December 27, 2010

वे फेदर टच अंगुलियाँ कैसी थी ?


मेरे एक मित्र हैं अर्जुन मूंढ़. वे अपनी टवेरा कार लेकर घर आये और मैं उनके साथ गाँव की ओर चल पड़ा. बड़े यारबाज आदमी है. पिछले साल एक दोपहर मुझे फोन करके कह रहे थे कि डिप्टी साहब के नंबर दो, फोन करना है. ये वाइन शॉप का सेल्समेन विस्की के सात रुपये अधिक ले रहा है और बिल नहीं देता. मैंने कहा भाई चिंतित न होओ, उपभोक्ता अदालत में बिल न हो तो भी सुनवाई होती है. वह सात रूपये अधिक लेता है तो कोई बात नहीं कल.  हम उस पर दावा कर देंगे. कार में बैठे हुए मैं उस घटना को याद करते हुए मुस्कुराता रहा.

शहर के बाहर निकलते ही उन्होंने कार को नेशनल हाइवे के साइड में लगाया और प्रतीक्षा करने लगे. थोड़ी ही देर में एक बाइक सवार आया और पांच बोतल विस्की दे गया. मेरी ओर देखते हुए कहने लगे बेगार है यानि किसी और का काम है. मेरी मंजिल कुछ और थी इसलिए वे बोतलें मेरी धड़कनों को बढ़ा न सकी. हम सफ़र के दौरान अपनी ज़मीन की बात करते रहे. वे मुझे समझाते रहे कि एक किसान को अपनी ज़मीन की क़द्र करनी चाहिए. मैंने क्षमा मांग ली कि मुझे अपनी नहरी ज़मीन पर जाने का समय नहीं मिल पाता है. इस रास्ते में बीस किलोमीटर पर हम दोनों के एक बेहद करीबी दोस्त का घर आ गया. वहां वे उतरे, कार की चाबी दोस्त को दी और पाँचों बोतल लेकर चले गए.

मेरे साथ अक्सर ऐसा होता है कि कुछ फोन शोरगुल से भरी जगहों पर आया करते हैं. वहीं भरी गुडाळ में सेल बजने लगा. आवाज़ आई और खो गई जैसे कमसिन मुहब्बतें पलक झपकते टूट कर सीने में उम्र भर के लिए चुभ जाया करती है. मैं इस भरी भीड़ में आवाज़ के सम्मोहन में खो गया तो बाहर धूप में निकल आया. मैंने सोचा कि कोई अचानक बाद बरसों के क्यों याद करता होगा. आस-पास के गांवों की औरतें अपने बच्चों के साथ जमा थी. पुरुष गोल घेरों में बैठे हुए पोस्त के चूरे को भिगो कर छान रहे थे. मेरे पास भी परिचित लोगों का घेरा बन गया. उनमे बहुत से बच्चे थे. वे जानना चाहते थे कि गाँव तक एफ एम कब तक सुनाई देगा.

मेरे अपने गाँव से दस किलोमीटर आगे के गाँव में दोस्त का ये घर शोक से भरा था. उसके पिता के निधन के बाद कल का दिन शोक के समापन और अटूट स्मृतियों के आरम्भ होने का दिन था. वैसे एक दिन सब खो जाएंगे. उनके पांवों के निशानों को जेठ की आंधियां उड़ा ले जाएगी. हमारे अपने प्रिय जिनकी छाँव में हम बड़े हुए, कंधों पर खेले हैं, एक दिन उनकी पार्थिव देह को अग्नि को समर्पित कर आना है. मैं ऐसे अनुभवों से गुजरते हुए ही प्रेम को सबसे करीब पाता हूँ. अपने दोस्तों से कहता हूँ तुम खुल कर ढेर सारा प्रेम करो. अपने बच्चों को सीने से लगाओ, माँ के पास चिपक कर बैठो, पिता से कहो कि आप बहुत अच्छे हो और मैं दुनिया में सबसे अधिक आपसे प्रेम करता हूँ. ढलती उम्र में सुन्दरतम होते जाते जीवन साथी को हमराह होने के लिए शुक्रिया कहो.

मुझे यकीन है हम खोयी हुई आवाजें बार बार सुन सकेंगे. सिर्फ आवाज़ ही क्यों कभी न कभी हम देख सकें बिछड़ी हुई आँखों को. मैंने पहले जो बेवजह और बहुत सी बातें लिखी थी, उसमें कमसिन उम्र की मुहब्बत की एक बात ये भी थी.

सूखी निब को कांपते होठों से गीली करके
जो नाम कापियों पर लिखा था, वो नाम किसका था. ...

झमक सी ठंडी रातों और चूर्ण से खट्टे दिनों में
ज्योमेट्री में बिछे कागज के नीचे क्या धड़कता था ?
जिस नर्म दोशीज़ा छुअन के अहसास से जागा करते थे,
वे फेदर टच अंगुलियाँ कैसी थी ?

ज़िन्दगी गुल्लक सी होती तो कितना अच्छा होता
सिक्के डालने की जगह पर आँख रखते
और स्मृतियों के उलझे धागों से बीते दिनों को रफू कर लेते.

December 25, 2010

घर से भागी हुई दुनिया

ये दुनिया ऊबे हुए, निराश और भावनात्मक रूप से नितांत अकेले लोगों की सदी में प्रवेश कर चुकी है. इक्कीसवीं सदी के पहले दशक के कुछ ही दिन शेष हैं. ख़ुशी और सुकून की तलाश में घर से भागी हुई दुनिया फिलहाल हांफने लगी है आगे की मंजिलें क्रमशः हताशा, अवसाद, पागलपन और विध्वंस है. ऐसा होना भी बेहद जरुरी है ताकि फिर से ताजा कोंपलें फूटें और कार्बन क्रेडिट का हिसाब बंद हो सके.

आज क्रिसमस मनाया जा रहा है. दुनिया के सभी पर्वों और त्योहारों की तरह इस पावन अवसर को भी अवास्तविक बाज़ारवाद ने अपने शिकंजे में ले रखा है. रिश्तों की दरारें सामाजिक स्तर पर स्वीकृतियां पा चुकी है. इनकी मरम्मत करने के स्थान पर तन्हा होता जा रहा आज का समाज बेहतर दिखने की कोशिशों में लगा रहता है. अकेले हो चुके परिवार हर साल खरीददारी करने निकल जाते है और अपने आस पास उपभोग और मनोरंजन की सामग्री को जमा करके टूटते रिश्तों को भुलाने के नाकाम प्रयास करते हैं.

इस बार मौसम की मार है. हालाँकि बर्फ़बारी के आंकड़े अस्सी के दशक को अभी मात नहीं कर पाए हैं लेकिन इन बीते हुए चालीस सालों के दौरान तकनीक के हवाले हो चुके मानवीय अहसासों के शोक में बहुत बुरा लग रहा है कि क्रिसमस फीका है. अपने आनंद के रिफिल के अवसरों को जाया होते देख कर चिंतित होना लाजमी है. परिवार नया सामान लाता, नए दोस्त घर पर आते, केरोल्स गाते और फिर कुछ सुकून क्रिसमस ट्री से टपकने लगता. ऐसा न हो पाना आदमी को उसकी तन्हाई का सच्चा आईना दिखाता है. इसमें जो अक्स उभरता है वह बड़ा भयावह है.

इस दशक में दुनिया भर में सर्वाधिक बिकने वाली पुस्तकें नोस्टेल्जिया की थी. ये विपरीत संकेत है कि यानि वो दुनिया बेहतर थी. हम अक्सर अपने बचपन के फोटो को पसंद नहीं करते. हमें लगता है कि वह बड़े बुद्धू की तस्वीर है, उसमे आधुनिकता नहीं है और उसकी सुन्दरता आज के मापदंडों पर ठीक नहीं बैठती है. मैंने अपने बहुत से फोटोग्राफ्स को इधर उधर कर दिया है. एंड्रोयड ऑपरेटिंग सिस्टम वाले सेल फोन को उपयोग में लेते समय मुझे अपनी भोंदू सी पिचके गालों वाली तस्वीरों से ख़ुशी नहीं मिलती लेकिन इस साल के दौरान मैंने नोस्टेल्जिया को ब्लॉग करके जो सुख पाया है वह अविस्मरणीय है.

मेरी स्मृतियों में प्रेम की गाढ़ी दास्तान है और कुछ एक बेहद हसीन दोस्त हैं. मेरे पास कभी रिजोल्यूशन नहीं थे, जो जैसा मिला उससे मैंने प्रेम किया है. प्रेम कोई मील का पत्थर नहीं था. मैं उसके जितना पास गया वह उतना ही दूर होता गया. प्रेम मरुथल की मरीचिका भी नहीं था. उसमें छुअन का अहसास था. कुछ ख़त थे और ढेरों निवेदन... वह बरसों बरस चलता ही रहा. उसकी यादें उसका पोषण करती रही. नास्टेल्जिया को जीना भविष्य की दुरुहताओं को भले ही आसान ना करता हो लेकिन एक आस तो बांधता ही है कि कभी कहीं हम एक मुकम्मल अहसास जी पाएंगे तो मेरी निराशा और ऊब साथ रहते हुए भी मुझे जीने का सामान देती रही.

इस दशक के आखिर में दोस्त तुमको एक फिल्म और एक किताब सजेस्ट करना चाहता हूँ. दोनों मेरे ख़याल से अधूरी है और जरुरी भी. सोफिया कपोला की फिल्म "समवेयर". अफ़सोस कि यह भी फार्मूला है. महानायक के व्यक्तिगत जीवन की हताशा और अकेलेपन को केनवास पर उतारती है. सोफिया ने इसमें सदी के दुष्प्रभावों को नायक केन्द्रित कर दिया है. कमोबेश आर्थिक स्तर की प्रत्येक लेयर में जी रहे लोग इसी मुसीबत के मारे हुए हैं. ऐसे ही यियुन ली का फिक्शन "गोल्ड बॉय ईमर्ल्ड गर्ल" एक साथ कई कहानियों की याद दिलाता है. इस बेस्ट सेलर को देख कर ये भी याद आता है कि दुनिया जिस आदर्श समाज के ख्वाब देखती है वह हद दर्जे का असहिष्णु और अमानवीय हो गया है.


December 22, 2010

फिर शाम आएगी, वो फिर याद आएगा

हमें अपने पास बहुत सा स्पेस रखना चाहिए. ज़िन्दगी में, दिमाग में और दिल में भी क्योंकि भरी हुई जगहें अक्सर बोझ बन जाया करती है. मैंने जब काज़िमीर मलेविच का नाम सुना तो खास अचरज नहीं हुआ था. रूसी लोगों के नाम ऐसे ही होते हैं. मुझे ये जान कर बेहद आश्चर्य हुआ था कि वे एक काले रंग की स्क्वायर और सफ़ेद पर सफ़ेद रंग की पेंटिंग बनाने के लिए जाने जाते हैं. इसी तरह डेविड स्मिथ की अमूर्त शिल्प कला और हैरत में डाल देती है. काले रंग का स्क्वायर बनाना भला कोई अविस्मरणीय काम हो सकता है ? या फिर एक ऐसा शिल्प जिसमें डेविड एक स्क्वायर पर एक क्रोस खड़ा करते हैं फिर उस पर एक स्क्वायर रखते हैं फिर उससे एक आयत चिपक जाता है... मेरे लिए ये सब अबूझ है, अविवेचनीय हैं.

ऐसी ही अमूर्त और अनगढ़ ज़िन्दगी हम सब जीते हैं. मैं पिछले कई सप्ताह से कुछ कहानियों के ड्राफ्ट लिख लेना चाहता हूँ लेकिन दिन बहुत छोटे हो गए हैं और नयी खुशबुओं ने अपनी पांखें फैला रखी है. सांझ के धूसर नग्में, रात के तन्हा बिछोडे़ मुझे अपने पहलू में छिपा लेते हैं. इन दिनों शराब की उम्दा क्वालिटी है, मौसम में ठण्ड भी है और दिन में चमकती हुई धूप भी है. सोचता हूँ कि बीज (स्त्री-पुरुष) ने ज़मीन (कोख) से बाहर सबसे पहले अपना सर उठाया होगा फिर उसने साँस ली होगी और अपने पांवों में हौसला भर कर पानी की खोज में निकल गया होगा. इसी तरह निश्चिन्तता से जीवन को पूर्णता की ओर ले जाते देख कर बीज के रचयिता की ऊब बढ़ गयी होगी. फिर उसने प्रेम जैसी शय का आविष्कार करके बीज को उपहार में दिया होगा ताकि वह सिर्फ पानी (शराब) जैसी मामूली चीजों को आसानी से पा लेने की जगह प्रेम जैसी कठिन चीज के पीछे भागता फिरे.


दरख्तों के पार ज़मी को चूमता
आंख से छिटकता है शाम का आखिरी लम्हा
स्याह दर्द का रंग घुल जाता है क्षितिज के पार.

सोचता हूं उन गुलाबी हथेलियों पर भी
रेशमी अवसाद की सुनहरी तितलियां
दम तोड़ती होंगी.

इतना तय पाता हूँ कि
सफ़र की झोली कुछ और हल्की हो जाती है,
गहरी सांस लेता हुआ, कोई दुआ देता हुआ
एक और दिन चौखट से उठ ही जाता है.

रात की चुप्पी में अंगुलियां
स्मृति की सलवटों को करीने से रखने लगती है
तो रूह यकायक चौंक उठती है, जैसे तूने छू लिया है
और इस तरह कुछ भी जाया नहीं होता.

बातें बेवजह हैं और बहुत सी हैं

* * *

दोस्त तुम जब आओ तो सात समंदर पार से अपने हिस्से की रातों के कुछ लम्हे चुरा लाना. हम उन्हें पनियल ख़ुशी से भिगो कर गर्म सांसों से सुखायेंगे फिर उन पर अभ्रक का नूर उभर आएगा. वे तुम्हारे लौट जाने के बाद भी मेरी याद में चमका करेंगे. मैंने तुम्हारे लिए भी एक तोहफा सोच रखा है कि तुम्हारी पलकों पर अज़रक प्रिंट बहुत फबेगी.

December 15, 2010

धुंध में खोया हुआ ख्वाहिशों का घर

मेरे दोस्त, बातें बेवजह हैं और बहुत सी हैं....के जरिये जो बातें करता था वे बहुत दिनों से याद नहीं आई. ज़िन्दगी के आधे रास्ते के बाद हौसला रहता नहीं इसलिए इस बार बिछड़ने की बात चले तो याद दिलाना कि उस घड़ी कुछ भी साथ नहीं देता. उस घड़ी कोई रंग कोई रौशनी नहीं होती. उस घड़ी कोई आसरा कोई सहारा नहीं होता कि मुहब्बत के चले जाने के साथ सब चला जाया करता है. मैंने जाने कितनी बार खोये हुए रास्तों को देखा है जाने कितनी बार टूटा हूँ. इन दिनों फिर से मौसम के खिलने की आस है किसी के आने का वादा है...


धुंध में खोया हुआ ख्वाहिशों का घर

उन दिनों हरे दरख़्त थे
दोपहर की धूप थी, पेड़ों की गहरी छाँव थी
डूबती शामों के लम्बे साये थे
रास्ते थे, भीड़ थी, दफ्तर भी थे, केफे भी थे.

पलकों की कोर से इक रास्ता
जाता था ख्वाहिशों के घर
आँखों में रखे हुए तारे रात के, होठों पे लाली सुबह की.

मगर एक दिन अचानक
कुछ बुझी हुई हसरतों की आह से, कुछ नाकाम उम्मीदों के बोझ से
उसने हेंडिल ब्रेक लगाया, विंडो के शीशे को नीचे किया,
एक गहरी साँस ली, मगर जाने क्यों... वह उतर ना सकी कार से.

हालाँकि इसी रास्ते पर
उन दिनों भी सूनी बैंचें थी, पीले पत्तों का बिछावन था
और टूटे हुए कुछ पंख थे.

बातें बेवजह हैं और बहुत सी हैं...

* * *
मैंने पहले भी बेवजह और बहुत सी बातें लिखी थी. तुम उनको फिर से सुनना चाहो तो मुझे मेल करना. मेरा पता साइडबार में लाल अक्षरों में दर्ज है. एक पंडित कहता था तुम्हारी कुंडली में राहू ऐसे घर में बैठा है कि तुम झूठ बहुत बोलोगे. मैंने भी उसे बताया कि मेरी झूठी कहानियां लोगों को बहुत सच्ची लगती है. तुम्हें झूठ के इस कारोबार के बीच एक सच्ची बात कहता हूँ कि तुम्हें सीने से लगाने को जी चाहता है, ये अगर झूठ भी हो तो क्या बुरा है ?

December 13, 2010

गलियों की लड़की मैगी और रेत में मशालें

दुनिया बर्फ में दबी जा रही है. मैं सुबह उठ कर देखता हूँ कि व्हाईट स्पाईडर लिली पर अभी फूल आने बाकी है. एलोवेरा के धूसर लाल रंग के फूलों की बहार है. दूब ने अब नई जड़ें निकालनी शुरू की है और इन सर्दियों में वह यथासम्भव भूमि पर बिछ जाने की तैयारी मैं है. पिछले पंद्रह दिनों से चुटकी भर धूप के निकलते ही छोटे भाई की बीस साल पहले खरीदी गई बाइक पर सवार हो कर गाँव चला जाता हूँ. गाँव की ओर जाने वाले रास्ते पर चलते हुए ऐसा लगता है कि कोई अपनी माँ के पास लौट रहा हो. पेड़, पत्थर, कटाव, मोड़, जिप्सम और जो भी रास्ते में आता है सब जाना पहचाना लगता है. इस सफ़र में कम होती हुई दूरी भावनाओं को गाढ़ा करती रहती है. फ्लेशबैक में आहिस्ता घुसने की तरह कैर के पेड़ों में बैठे हुए मोर पर क्षणिक नज़र डाल कर नई चीजों की ओर देखता हूँ. घरों के आगे बन आई नई चारदीवारी और काँटों की बाड़ें मेरी ध्यान मुद्रा को तोड़ती है.

सब रिश्तेदार गाँव में हैं. गाँव का एक ही फलसफा है लड़के लड़कियों के हाथ पीले कर दो कि बड़े होने पर रिश्ते नहीं मिलते. घर का कोई बूढा चला जाये, अब गाँव को जीमाणा तो है ही फिर क्यों ना बच्चों को निपटा दिया जाये. शादियाँ अभी कर देते हैं और बाकी बाद में बड़े होने पर होता रहेगा. ऐसे में एकाएक ख़बर आती है. भाई एक उठाऊ नारेळ आ गया है. कल सुबह आ जाओ. उठाऊ नारेळ यानि अचानक आया हुआ लग्न जो पहले से निर्धारित नहीं था. गाँव जाओ तो शहर की फर्जी व्यस्तता से मुक्ति मिलती है. देखता हूँ कि क्या बदल रहा है. कभी रास्ते में अकेला रुक जाया करता हूँ. बड़ा पेड़, अँधा मोड़ या फिर कुआ और तालाब जैसी जगहों के आस पास घंटा भर बिता लेता हूँ. सोचता हूँ कि सिगरेट और चाय पीने की आदतें होती या फिर हथेली में खैनी मसलने का चाव होता तो और भी मजा आता. तम्बाकू को रगड़ता और फिर हल्की थपकियाँ देकर चूना उड़ाता रहता.

परसों शहर की ओर लौट रहा था तब शाम होने को थी. चाचा के घर के बाहर बैठे हुए देखा सड़क के पार दो चिमनियों के ऊपर आग जल रही थी. ये आयल पोर्सेसिंग टर्मिनल की चिमनियाँ है. दिन में किसी विशालकाय मशाल जैसी दिखती है और रात को किसी ड्रेगन की मुखज्वाला सी. सामने एक बड़ा कारखाना बना हुआ है. रेत के धोरों के बीच ये एक जगमगाता हुआ टापू है. मेरे देश का बाईस फीसद कच्चा तेल यही से निकाला जायेगा. इन रेत के धोरों में उन्नीसवीं सदी के आरम्भ में कल-कारखानों की क्रांति के समय से भी अधिक भयावह संक्रमण जारी है. इस विकास को देखता हूँ तो एक कथा की पात्र स्मृत होती है. उसका नाम मैगी था. मैगी की कथा रचते समय युवा पत्रकार स्टीफन क्रेन ने ऐसे ही संक्रमण को चिन्हित कर शब्दों में ढाला था. उन्होंने अपने स्वप्रकाशित प्रथम उपन्यास "मैगी : अ गर्ल ऑफ़ स्ट्रीट" के जरिये निम्न वर्ग के जीवन की दुरुहताओं को उकेरते हुए एक खूबसूरत लड़की की कहानी रची.

उस उपन्यास को पढ़ते हुए आपको कई बार बांग्ला साहित्य के पात्र याद आयेंगे. ऐसे पात्र जिनको मजबूरी में देह व्यापार को एक पेशे के रूप में चुनना पड़ा था. स्टीफन की नायिका अपने सारे फैसले जल्दी करती है. वह खूबसूरत है. उसके समक्ष चुनौतियाँ है. उसके माँ और पिता अव्वल दर्जे के शराबी हैं. समाज तेजी से अमीर होने की ओर भाग जा रहा है. एक दिन भाई के दोस्त से प्रेम हो जाता है और वह उसके साथ भाग जाती है. प्रेमी उसका अधिकतम उपयोग कर उसे ठुकरा देता है. घर लौटती है तो माँ और भाई स्वीकार नहीं करते... आखिरी रास्ता उसे बदनाम पेशे में ले जाता है और वह जल्द ही मर जाती है.

इस कहानी में सिक्स्थ सेन्स के बीज हैं. कुछ घटनाएँ स्टीफन के जीवन से मिलती जुलती है. पेशे से पत्रकार ये साहित्य सृजक इस उपन्यास के बाद एक वेश्या के बचाव के लिए व्यवस्था से लड़ता है फिर मात्र उन्नतीस वर्ष की आयु में दुनिया को छोड़ जाता है. पैसे के पंख पर सवार और मनुष्यों के ढूंगों पर कीमतों के गोदने का ब्लू प्रिंट लिए फिरते सौदागरों के समाज की इस कथा में जो दारुण दृश्य खुल कर सामने आता है. वह मुझे इस थार की ज़मीन पर भी दीखता है.

स्टीफन ने बहुत सारी कविताएं लिखी, निरंतर छोटी कहानियां लिखी और अख़बार के लिए लगातार काम किया था. क्या उसे कुछ अहसास था कि उसके पास बहुत सीमित दिन है. क्या मनुष्य के साथ भाग्य जैसा कोई टैग लगा होता है जिसमें उसकी एक्सपायरी डेट लिखी होती है ? कितने लोग ये अहसास कर पाते हैं कि उम्र प्रतिपल छीजती जा रही है और हमें दुनिया की इस यात्रा को व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए. हमें निरंतर सामाजिक बदलाव को चिन्हित करते हुए अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए कुछ छोड़ कर जाना चाहिए. परसों में रेत के धोरे पर बैठा हुआ यही सोचता रहा कि इन बदलावों की कहानी कौन लिखेगा ? मैं कुछ और भी सोचता लेकिन रात होने के साथ रेत का तापमान तेजी से गिरता है और एक हल्का सा जेकेट मेरे लिए पर्याप्त गर्मी नहीं सहेज सकेगा.

इसलिए वहां से उठते हुए मैंने थोमस बीर को स्टीफन क्रेन की जीवनी लिखने के लिए धन्यवाद दिया कि इससे बहुत लोगों को दो खूबसूरत उपन्यासों और एक नौजवान की सोच से रूबरू होने का अवसर दिया. मैंने अपनी जींस पर चिपकी धूल को हटाते हुए दूर खड़े चाचा को देखा. वे अनार के झाड़ को इग्नोर करते हुए अपने काश्तकार से बात कर रहे थे. मुझे चाचा ने बहुत बार कहा है मेरे इस घर में रहो... मैंने कभी सोचा ही नहीं कि यहाँ रुक कर भले ही कोई महान रचना ना लिख सको फिर भी ब्योरे तो दर्ज कर ही दो. ये जगह भी इतनी सुंदर और शांत है कि यहाँ बैठ कर खूब शराब पी जा सकती है और सुंदर स्त्रियों के बारे में सोचा जा सकता है.

December 6, 2010

पेंसिलें

आज के बाद स्कूल ले जाने के लिए तुम्हें आधी पेन्सिल मिला करेगी. पापा ने ऐसा कहा तब मैं बहुत डर गया था. मैं इंतज़ार करने लगा कि अब वे कहें स्कूल जाओ. उस सुबह मैंने बताया था कि मेरी पेन्सिल खो गई है. ऐसा एक ही सप्ताह में दूसरी बार हुआ था. मुझे याद नहीं कि उन दिनों पेन्सिल की कीमत अधिक हुआ करती थी या मेरे पिता को तनख्वाह कम मिलती थी या फिर वे मुझे अपनी चीजों को संभाल कर रखने का हुनर सिखाने के लिए प्रयत्न किया करते थे.

पेन्सिल से कोई प्रेम नहीं था. मुझे पढना अच्छा नहीं लगता था. क्लासवर्क और होमवर्क की औपचारिकता को पूर्णाहुति देने के सिवा पेन्सिल किसी काम नहीं आया करती थी. उसकी लकड़ी का बुरादा बेहद फीका और ग्रेफाईट स्वादहीन हुआ करता. उनको छीलने से फूलों के आकार का जो कचरा बनता था अक्सर किसी उकताए हुए मास्टर की खीज निकालने के सामान में ढल जाता. मैं पेंसिलों को संभालने से ज्यादा प्यार खुली आँखों से सपने देखने को करता था. उन सपनों में बेहद सुंदर लड़कियाँ हुआ करती और किसी ताज़ातरीन अपराध की खुशबू फैली रहती. मेरे इन दोशीज़ा सपनों को स्कूल का कोलाहल या रेल की पटरी के टुकड़े से बनी हुई घंटी क्षत-विक्षत कर देती थी. मुझे वही सिक्वेंस फिर दोबारा कभी नहीं मिलती.

मेरी खोयी हुई पेंसिलें कभी वापस नहीं मिलती थी. अपनी चीजों को संभालने का सबक नहीं सीख पाया और ज़िन्दगी भर पेंसिलें खोता ही रहा. उनके खो जाने का दुःख होता था. मैं बहुत उदास हो जाया करता था कि इस बेकार बात के लिए कभी भी डांट पड़ सकती है. सब खोयी हुई पेंसिलें मेरी स्मृतियों में हमेशा दस्तक देती रहती थी. वे काले और लाल रंग की धारियों वाली पंचकोण पकड़वाली हुआ करती थी. उन पेंसिलों से कान खुजाना मना था. पेंसिलों से दीवारों पर लिखना भी मना था. उनसे कुछ खूबसूरत नाम लिखे जा सकते थे मगर डरता था.

सात आठ साल तक इन लगातार खोती जा रही पेंसिलों से मुक्त हो जाने के बाद एक दिन पापा के एक दोस्त ने मुझे शाम को अपने घर बुला लिया. "बेटा अब तुमको स्केच करना सीखना है" ऐसा सुनते हुए, मैंने देखा कि वे एक नाटे कद के आदमी है. उन्होंने तहमद पहनी हुई है. उनके सिर के कुछ बाल गायब हैं और बाकी किसी राजघराने के गवैये की तरह पीछे से वन लताओं से आपस में उलझे हुए हैं. आज मैं कहूँ तो वे बाल किसी कविता जैसे थे. उनके चेहरे पर तेज था. वे पहले ही लुक में एक डीप आदमी लगते थे.

दो महीने तक मैं रोज शाम को उनके पास जाता था. वे मुझसे पंजा, पांव, आँख, भोहें, कोहनी जैसे शरीर के अंग बनवाते रहे. उन्होंने अगले पायदान पर मुझे एक किताब दी जिसमें सब नंगे स्केच थे. उनको देखना और फिर उन पर काम करना बेहद मुश्किल था. मैं तब तक नौवीं कक्षा में आ चुका था और मेरी जिज्ञासाएं चरम पर थी. मैंने कुछ और महीने फिगर पर काम किया. वे मुझसे खुश तो होते लेकिन मुझमे ऐसी प्रतिभा नहीं देख पाए थे कि मेरे जैसा शिष्य पाकर खुद को भाग्यशाली समझ सकें. एक दिन मैंने कहा "मुझसे पेंसिलें खो जाती है शायद मुझे इनसे प्यार नहीं है." उन्होंने पीक से मुंह हल्का करके कहा "बेटा ये राज बब्बर फाइन आर्ट में मेरा क्लासफेलो था, इसने लिखित पर्चे नक़ल करके पास किये है मगर देखना एक दिन फिर से ये पेन्सिल जरुर पकड़ेगा."

मैं पेन्सिल से कोई चमत्कार नहीं कर पाता था. उनकी नोक की साइज़ बढती गई मगर मेरा हाथ तंग बना रहा. हम शहर से बाहर गए ताकि कुछ स्टिल स्केच कर सकें. वहां वे अपना काम करते और मैं सोचता था कि अपनी पसंद की लड़की का पोर्ट्रेट बना कर उसे अचंभित कर दूंगा. सीले सीले से रहने वाले उस फर्स्ट फ्लोर पर मेरे गुरूजी ने मुझे एक ऑयल पेंटिंग दिखाई थी. उनके हिसाब से वह एक अधूरी पेंटिंग थी और वे लगातार उस पर काम करते जा रहे थे. मेरी समझ कहती थी कि वह उनकी महबूबा है. इसके अलावा उनके पास बहुत सी सुंदर पेंटिग्स थी. वे हमेशा मुझे लुभाती रही. उनके नीचे नाम लिखा होता 'राकेश भटनागर'. मैं अक्सर काम कम करता और ऐसी सुंदर पेंटिंग्स के नीचे अपना नाम लिखे होने के सपने ज्यादा देखता था.

मैं कभी अच्छी तसवीर नहीं बना पाया. नंगे स्केच का पुलिंदा, जो मेरे अभ्यास से जन्मा था. उसे मैंने दो चार साल संभालने के बाद जला दिया. पेंसिलों की मैंने जितनी उपेक्षा की उतने ही चित्र दूर होते गए. खुद को राकेश लिखने वाले बृज बिहारी लाल भटनागर सम्भव है कि अभी भी आगरा के आस पास किसी केन्द्रीय विद्यालय में मुझसे अच्छा शिष्य खोजते होंगे या फिर रिटायर होकर उस पेंटिंग को पूरा करने में लगे होंगे. मैं चित्रकार नहीं हो पाया लेकिन उनसे बहुत प्यार करता हूँ.

मेरे दो बच्चे हैं. उनको कुछ हो जाता है तो मुझे पेंसिलें याद आने लगती है. सोचता हूँ कि मेरे पिता अफ़सोस करते होंगे कि जो नालायक कभी अपनी पेन्सिल नहीं संभाल पाया वह बच्चों को क्या संभालेगा. मुझे आज कल कुछ सूझता ही नहीं. मैं कभी सीढ़ियों को याद करने लगता हूँ कि मैंने लोगों की सबसे सुंदर तस्वीरें सीढ़ियों के साथ देखी है. कभी मुझे यकीन होने लगता है कि मुहब्बत की एक्सपायरी डेट नहीं होती. कभी सोचता हूँ कि हमें पेंसिलों को भी संभाल के रखना चाहिए ताकि एक दिन जिंदगी में सबसे प्रिय व्यक्ति की तस्वीर को पूरा कर सकें. वसीम बरेलवी साहब का ये शेर मेरी यादों के लिए बड़ा माकूल है.

किताब-ए-माज़ी के औराक उलट के देख ज़रा
ना जाने कौनसा सफ़हा मुड़ा हुआ निकले !

November 26, 2010

खेत में धूप चुनती हुई लड़कियां

वो जो रास्ता था, कतई रास्ता नहीं जान पड़ता था यानि जिधर भी मुंह करो उधर की ओर जाता था. रेत के धोरों में कुछ काश्तकारों ने पानी खोज निकाला था. वे किसान मोटे मोटे कम्बल लिए आती हुई सरदी से पहले चने की जड़ों में नमी बनाये रखने की जुगत लगा चुके थे. मैं ट्रेक्टर पर बैठा हुआ ऊँची जगह पर पंहुचा तब नीचे हरे रंग के छोटे-छोटे कालीन से दिखाई पड़ने लगे. मुझे इसमें कोई खास दिलचस्पी नहीं थी कि ट्रेक्टर किस तरह से सीधे धोरे पर चढ़ जाता है. मैं सिर्फ अपने देस की सूखी ज़मीन को याद कर रहा था जो बारह सालों में दो एक बार हरी दिखती थी.

मैं इन खेतों को देखने नहीं निकला था. ये खेत एक बोनस की तरह रास्ते में आ गए थे. हमें मेहनसर की शराब पीने जाना था. ये रजवाड़ों का एक पसंदीदा ब्रांड था. हेरिटेज लिकर के कई सारे ख्यात नामों में शेखावटी की इस शराब का अपना स्थान था. मैं जिसके ट्रेक्टर पर बैठा था, वह बड़ा ही दुनियावी आदमी था. खेतों में फव्वारों के लिए दिये जाने वाले सरकारी अनुदान के लिए दलाली किया करता था. अफसरों से सांठ-गाँठ थी. कार्यालयों के बाबुओं को उनका कमीशन खिलाता और शौकिया तौर पर लोगों को अपनी सफलता के प्रदर्शन के लिए शराब की पार्टियाँ दिया करता था.

वह जब मेरे घर पहली बार आया उस समय म्यूजिक प्लेयर पर कोई सूफी संगीत बज रहा था. वह चाहे किसी भी समय आता उसे ऐसा ही कुछ सुनने को जरुर मिलता. "मुझे आपकी पसंद से रश्क होने लगा है" ऐसा उसने कहा और फिर हम मित्र हो गए. खैर उसी के साथ हम एक हवेलीनुमा घर वाले एक धनी किसान के यहाँ पहुंचे. उनकी आवभगत ने मुझे भिगो दिया. मैं मानता था कि मारवाड़ के लोग ही अच्छे मेजबान है लेकिन फिर इसमें थोड़ा संशोधन भी कर लिया कि कुछ अच्छे मेजबान शेखावटी में भी हैं.

उन्हीं दिनों जगजीत सिंह के नए एल्बम में एक खूबसूरत ग़ज़ल थी. "अपनी आग को ज़िन्दा रखना कितना मुश्किल है.." किसी शाम ज्यादा प्यार आता तो एल्बम उठाया और शाईर का नाम पढ़ा... इशरत आफ़रीन. नाम भी बड़ा ही खूब था. इशरत का अर्थ था ख़ुशी और उनके नाम के सन्दर्भ में आफ़रीन का अर्थ हुआ, जो किसी से मेल नहीं खाता यानि सबसे जुदा. मैंने इससे पहले कभी उनका नाम नहीं सुना था. उनकी ग़ज़ल "होठों को सी ले लड़की..." ने खूब दिलों में जगह बनायीं और इसके बाद मैंने उनकी कुछ नज़्में पढ़ी. उनकी नज़्मों में महिलाओं की गज़ब की तरफदारी मिलती है. यही अंदाज़ हकों और सामाजिक बराबरी के मुद्दों पर भी मिलता है. इशरत की नज़्में अंतर्राष्ट्रीय सद्भाव का भी प्रतिनिधित्व करती है.

मेहनसर की शराब की लाजवाबी पर अभी नहीं लिखना चाहता. मैं उस कोकटेल के बारे में याद करना चाहता हूँ जो चने के खेत, ट्रेक्टर की सवारी, जगजीत सिंह की गहरी आवाज़ और इशरत आफ़रीन के बारे में सोचने से बना था. फिर कई साल बाद मैंने कपास के खेत देखे. चीन के बाद हम दूसरे नंबर के कपास उत्पादक हैं मगर मैंने पच्चीस साल की उम्र के बाद ही देखा कि कपास के दूधिया फूलों वाला खेत कैसा दीखता है ? उन्हीं दिनों मैंने जाना कि खेतिहर मजदूर कैसा जीवन जीते हैं और एक खेतिहर लड़की को उसके खेत मालिक के लड़कों द्वारा उठा लिया जाना कितना आसान है. उनका जीवन सच में बहुत कष्टप्रद है.

इशरत आफ़रीन का जन्म पाकिस्तान में हुआ था. वे भारत की बहू हैं और फ़िलहाल अमेरिका में रहती हैं. उनकी हाल की ख्यात नज़्म है "समाया के सीने में दिल धड़कता है..." मैं लाख कोशिशें करता मगर मुझे उनकी नज़्में कहीं मिलती ही नहीं. उनकी ये नज़्म मेरे देखे सुने अनुभवों का सतरंगी कोलाज बुनती है.

खेतों में काम करती हुई लड़कियां
जेठ की चम्पई धूप ने
जिन का सोना बदन
सुरमई कर दिया
जिन को रातों में ओस और पाले का बिस्तर मिले
दिन को सूरज सरों पर जले.

ये हरे लॉन में
संग-ए-मरमर के बेंचों पे बैठी हुई
उन हसीन मूरतों से कहीं खूबसूरत
कहीं मुख्तलिफ
जिन के जूड़े में जूही की कलियाँ सजी
जो गुलाब और बेले की ख़ुशबू लिए
और रंगों की हिद्दत से पागल फिरें.

खेत में धूप चुनती हुई लड़कियां भी
नई उम्र की सब्ज़ दहलीज़ पर हैं मगर
आईना तक नहीं देखतीं
ये गुलाब और डेज़ी की हिद्दत से नाआशना
खुशबुओं के जान लम्स से बेखबर
फूल चुनती हैं लेकिन पहनती नहीं,
इन के मलबूस में
तेज़ सरसों के फूलों की बास
उन की आँखों में रोशन कपास.

November 22, 2010

और अब क्या ज़माना खराब आयेगा

पंडित शहर का है और घर के बड़े बूढ़े सब गाँव से आये हैं. गणपति की स्तुति के श्लोकों के अतिरिक्त पीली धोती धारण किये हुए पंडित जी क्या उच्चारण करते हैं ये मेरी समझ से परे है किन्तु विधि विधान से आयोजन चलता रहता है. जटाधारी नारियल के साथ एक मौली भेजी जानी है जिस पर गांठें लगनी है. ये गांठे इस परिवार की ओर से तय विवाह दिवस को निर्धारित करती हैं. इन गांठों को दुल्हे के घर में हर दिन एक एक कर के खोला जाता रहेगा और आखिरी गाँठ वाले दिन शादी होगी तो उन्हें हिसाब से दुल्हन के यहाँ बारात लेकर पहुच जाना है.

कभी हमारे यहाँ तिथि-दिवसों का और कागज-पत्रियों का उपलब्ध होना असंभव बात थी. फेरी पर निकलने वाले गाँव के महाराज से हर कोई तिथि और दिवस पूछा करता था. खेतों में काम करने के सिवा कोई काम नहीं था. ये तो बहुत बाद की बात है, जब स्कूलों का अवतरण हुआ. मेरे पिता और ताऊ जी घर से पच्चीस किलोमीटर दूर पढने जाया करते थे. उन दिनों अनपढ़ लोगों से याददाश्त में भूल हो जाना बड़ी बात नहीं थी इसलिए नारियल के साथ मौली में बंधी गांठे ही विश्वसनीय सहारा होती थी. कई बार भूल से अधिक गांठें खोली जाने से बारातें एक दो दिन पहले पहुँच जाया करती थी. इस मूर्खता के उदाहरण हर बार लग्न लिखे जाते समय दोहराए जाते रहते. दुल्हे के घर में गांठ खोलने का काम अक्सर उसकी माँ के ही पास होता है. इन दिनों लगभग हर दुल्हे की माँ के पास मोबाईल फोन है. विवाह के निमंत्रण पत्र में छपी तिथि को पढने जितना ज्ञान है. घर की दीवारों पर, टेबल पर और हाथ घड़ियों में कलेंडर है फिर भी अगर गांठे नहीं दी जाएगी तो लग्न कैसे भेजा जा सकता है ?

मैंने और जया ने कल दिन का भोजन भी इसी ख़ुशी भरे घर में किया. सच में जिस घर में विवाह होता है, उसके खाने का स्वाद बदल जाता है. उसमे विवाह की खुशबू घुल जाती है. बीस साल पहले मैं एक ऐसे नेक आदमी की संगत में था जो रिजर्व बैंक के गवर्नर के घर और केन्द्रीय मंत्रियों के महाभोजों में मुझे अपने साथ ले जाता था. वे बीसियों पकवानों वाले खाने व्यापार और सियासत की खुशबू से भरे होते थे लेकिन उसी उच्च कुलीन वर्ग के विवाहों के खाने में यही खुशबू जाने कहां से आ ही जाया करती थी. विवाह भोज की खुशबू हमारे मस्तिष्क में बसी है और ये इसलिए भी अलग है कि इसमें कोई सियासत नहीं है.

हमारे यहाँ मुख्यतः बाजरा उत्पादन करने वाले किसानों की आय बहुत सीमित है तो परंपरागत रूप से हलुआ और तेज लाल मिर्च में पके हुए काले चने वैवाहिक अवसरों पर भोज की एक मात्र डिश हुआ करते हैं. यह बनाना आसान है. इससे भी बड़ी बात है कि ये सामाजिक बराबरी की बात है. आप सिर्फ लाल मिर्च के कम ज्यादा होने पर ही चर्चा कर सकते हैं. सरपंच हो या किसान सबका भोज एक सा होता था. समय के साथ बहुत बदलाव आया है. आज कल गावों में बड़े शामियाने लगाये जाने लगे हैं. शहर से आये कंदोई तीन चार तरह की सब्जी और इतनी ही प्रकार की मिठाइयां बनाते हैं. दिखावा और फिजूल खर्ची बढ़ते जा रहे हैं. जो अच्छी परम्पराएँ थी वे हमने छोड़ दी लेकिन मौली में गाँठ लगाना नहीं छोड़ा.

दोस्त कभी सावों के समय इधर आओ... हम किसी सुदूर रेतीले गाँव के विवाह भोज में घुस जाएंगे और खूब सारा हलुआ और काले चने का सूप पियेंगे. तब तक के लिए सबा के दो शेर सुनो. पहला वाला तुम्हारे लिए और दूसरा वाला मेरी बार के मालिक के लिए.

आज कल मुझसे वो बात करता नहीं, और अब क्या ज़माना खराब आयेगा.
मालिक-ए-मयकदा रिंद हो जायेंगे, मयकदे में नया इंक़लाब आयेगा !!


November 19, 2010

रास्ते सलामत रहें

उन्होंने सबसे पहले पत्थर की नक्काशीदार रेलिंग को तोड़ा फिर गोल घेरे में बनी दीवार को उखाड़ फैंका. इस तरह चौराहे का घूम चक्कर नंगा दिखाई देने लगा. अगली सुबह उन्होंने बाहर के बड़े घेरे को इस तरह साफ़ कर दिया जैसे यहाँ इतना बड़ा सर्कल कभी था ही नहीं. मैंने अपने जीवन के बेशकीमती सालों में उदासी और ख़ुशी के अहसासों को साथ लिए हुए इस चौराहे को देखा है. अब स्वामी विवेकानंद की आदमकद मूर्ति और एक हाई मास्ट लाईट का पोल रह गया है. इन्हें भी अगले कुछ दिनों में हटा लिया जायेगा.

मेरे स्कूल के दिनों से ही ये चौराहा साल दर साल संवारा जाता रहा है. युवा दिवस और चिकित्सा महकमे की योजनाओं के बारे में जागरूकता रैली निकालने के लिए बच्चों को स्कूल से उठा कर यहाँ लाया जाता रहा है. वे बच्चे स्कूल के जेल जैसे माहौल से बाहर आकर भी यहाँ यकीनन स्वामी विवेकानंद के बारे में नहीं सोचते होंगे. उन्हें कतार न टूटने, माड़साब या बहिन जी के आदेशों की चिंता रहती होगी या फिर वे मूंगफली ठेलों और चाट पकौड़ी वालों तक भाग जाने की फिराक में रहते होंगे. अब बच्चों को थोड़ा और दूर तक जाना होगा कि ये जगह बचेगी नहीं.

दोस्त के ख़त के इंतजार में शाम काटने या फिर पावती लिखने के लिए छत से उपयुक्त कोई जगह नहीं होती. मैं घर की छत से इस चौराहे को बरसों तक देखता रहा हूँ. अब भी सामने दिख रहा है. पहाड़ी की तलहटी में बसावट से आगे बढ़ता हुआ, ये रेगिस्तानी क़स्बा अब कई किलोमीटर तक फ़ैल गया है. कई हज़ार करोड़ के निवेश से यहाँ के आदमी से सुकून और रेत से तेल निकाला जा रहा है. ये कस्बा शहर होने की प्रसव पीड़ा से गुजर रहा है. वाहनों की तादाद अविश्वसनीय रूप से बढ़ गई हैं. ट्रेफिक को दुरस्त करने के लिए कोई पच्चीस करोड़ की लागत से एक ओवर ब्रिज का काम शुरू हो गया है.

इस चौराहे के बीच में एक पीपल का पेड़ भी है हालाँकि रात में पीपल के पत्तों की आवाज़ें भूतहा ध्वनियाँ बिखेरती होंगी लेकिन दिन भर यहाँ लोक गायक मांगणियार बैठे रहा करते हैं. ये उनके मिलने का स्थान है. यहीं पर भारू की चाय पीने के लिए शहर जुटा करता है. लकड़ी की बेंचों पर बैठे हुए मात्र बीस रुपये में बाजरा के दो सोगरे, खट्टा रायता और कोई एक सब्जी यहीं मिला करती है. दो चार साल पहले लगे पानी के फव्वारे के पास शाम बिताते हुए कई नए नवेले परिवार दिखते रहा करते हैं.

कल शाम हम वोलीबाल खेलने जा रहे थे कि मोहवश मैंने बाईक को रोक दिया और नौ साल के बेटे से कहा "छोटे सरकार, अब कैसा दिख रहा है चौराहा ?" उसने पूछा कि "ऐसा हो क्यों रहा है ?" मैंने उसके प्रश्न को नज़र अंदाज करते हुए फिर पूछा "क्या ये चौराहा आपको याद रहेगा ?" वह बची हुई लोहे की रेलिंग पर हाथ रखे हुए कहता है "शायद रहेगा..." उसने फिर आस पास देखा और पूछा "पापा, यहाँ से और क्या-क्या चीजें हटा दी जाएगी ?" मैंने कहा "बेटा दिल्ली में बैठे हुए लोग जंगलों से आदिवासियों को, समन्दरों से मछुआरों को और रेगिस्तानों में रहने वाले ऊंट जितने लम्बे लोगों को हटा देंगे. सदियों से यहाँ रहने वाले ये लोग जाहिल और गंवार हैं. ये विकास की राह के रोड़े हैं. " मुझे ऐसा नहीं लगा कि उसे कुछ समझ आया है लेकिन मैं चाहता हूँ कि इस चौराहे की याद उसके मन में बनी रहे.

इस चौराहे से कितनी बार मैं अपने पिता के साथ उनकी सायकिल पर, फिर स्कूटर और फिर कार में पीछे बैठे हुए निकला हूँ. उनकी यादें मेरे साथ आजीवन रहेगी, उनमे कहीं ये चौराहा भी होगा. सोचूं तो लगता है कि कोई बड़ी बात नहीं, इसे थोड़ी ही दूर फिर से बना दिया जायेगा. इससे आगे की सोच मुझे परेशान करती है कि क्या उस नई जगह से मेरा कोई जुड़ाव होगा या यही घूम चक्कर सपनों में आता रहेगा. मैंने पाठ्यक्रम से बाहर की पहली पुस्तक स्वामी विवेकानंद की ही पढ़ी थी. मेरे पिता के संग्रह में इतिहास की पुस्तकों के अलावा दयानंद सरस्वती और स्वामी विवेकानंद की पुस्तकें थी. उन्होंने बड़े सलीके से मुझे पहले इन्हें ही पढने को प्रेरित किया था. स्कूल के आखिरी दिनों में उन्होंने मेरा मार्क्स से परिचय करवाया था. चौराहे पर खड़ी गेरुए वस्त्र वाली प्रतिमा, मेरे जीवन का हिस्सा है. ये एक जिद भी है कि मैंने इसे जहाँ देखा है, इसे वहीं होना चाहिए.

दोस्त तुम कुछ समय पहले आये होते तो मैं तुम्हें दिखाता कि ये विवेकानंद सर्कल है. इससे पूर्व की ओर सौ मीटर के फासले पर बैठे गाडोलिया लुहारों के बीच मेरे पिता का बनाया हुआ घर है. इस बदलते हुए पते के बीच मुझे नासिर काज़मी साहब की कही और गुलाम अली साहब की गाई ग़ज़ल याद आने लगती है. ग़ज़ल से पहले के शेर को सुनते हुए मैं अक्सर सोचता हूँ कि मेरे पिता इस रास्ते से ही चले आ रहे हैं. ओह पापा, मुझे आपकी याद बहुत रुलाती है. मैं उन रास्तों को सलामत देखना चाहता हूँ, जो आपके पांवों के निशानों से सजे हुए थे.

November 16, 2010

भूख आदमी को छत तक चढ़ा देती है

नाईजीरिया को लोग भुखमरी के सिवा और किसी कारण से जानते हैं या नहीं लेकिन मैं जानता हूँ कि वहां एक अद्भुत संस्कृति है योरुबा.. योरुबा लोगों का एक लोकगीत बरसों पहले पढ़ा था. उसे एक किताब के पीछे लिख लिया. मेरी किताबें अक्सर खो जाया करती है. खोने का एक मात्र कारण उसे मांग कर ले जाने वालों का लौट कर न आना है.

भाषाएँ दुनिया के किसी कोने में बोली जाती हों या उनका विकास हुआ हो मगर उनकी समझ हतप्रभ कर दिया करती है. मनुष्य के दैनंदिन जीवन के प्रसंग देवों को दी जाने वाली बलि से अधिक महत्वपूर्ण हुआ करते हैं. सामाजिक विकास की कामना और मुश्किलों के गीत कालजयी हो जाया करते हैं. मैं सोचता हूँ कि विद्वानों को और बहुत से अनुवाद करने चाहिए ताकि हम समझ सकें कि मनुष्य मात्र एक है. उसकी खुशियाँ और भय सर्वव्यापी है.

मनुष्य द्वारा किये गए प्रेम का अनगढ़ रूप जितना खूबसूरत लोकगीतों में दिखता और चीरता हुआ हमारे भीतर प्रवेश करता है ऐसा और कोई माध्यम नहीं है. लोकगीतों में हर स्त्री-पुरुष को अपना अक्स दिखाई दे सकता है. मनुष्य का प्रेम रसायन भाषाओं के विकास से पहले का है. इस तथ्य को लोकगीत चिन्हित करते हैं. मेरा रसायन शास्त्र उसी दिन फ़ैल हो गया था जब मैं चुप देखता रहा. जब मैं उसे लिखता रहा था कि तुम बहुत ख़ास हो मगर अफ़सोस कि तब किसी केटेलिस्ट ने काम नहीं किया .

बहुत साल बीत गए हैं और फासला बढ़ता जा रहा है. हम एसएमएस करते हैं. उतनी कीमत में बात हो सकती है लेकिन नहीं होती. समय की पगडण्डी हमें अलग रास्तों पर ले गयी है. इस सफ़र में तुमने बहुत से लोकगीत पढ़े सुने होंगे. आज इसको पढो हालाँकि यह भूख का गीत है. भूख, जिसने हर बार याद दिलाया कि दुनिया में बराबरी होनी चाहिए. यह प्रेम का गीत होता तो भी कुछ ऐसा ही बनता कि प्रेम के लिए आदमी शहतीरों पर उल्टा लटका रह सकता है ...

भूख
भूख आदमी को छत तक चढ़ा देती है
और वह शहतीर से लटका रहता है

जब भूखा नहीं होता मुसलमान, वह कहता है
हमें मना है वानर खाना
पर जब भूखा होता है इब्राहिम
तब खा लेता है बन्दर.

भूख जब सताती है स्त्री को हरम में
वह दिन में ही सडकों पर निकल आती है
भूख पुजारी को उकसाएगी
वह अपने ही देवस्थान में करेगा चोरी.

जब मृत्यु बंद करती है द्वार
भूख खोल देती है उन्हें....
भूख के लिए बेमतलब है ये
कि "मैंने कल ही तो पेट भरा था. "

मेरा डिनर अभी शेष है. मुझे खाने में काफी पोष्टिक चीजें मिलेगी. मेरी भार्या अपने परिवार की बेल के पोषण को प्रतिबद्ध है. वह सुबह पांच बजे जागती है और रात ग्यारह बजे तक सोती है मगर आज उसको मैंने निवेदन किया है कि वह मेरे बगैर खाना खा ले. मैं इस समय एक सस्ते दर्जे कि ज़िन पी रहा हूँ और सोचता हूँ कि अभी शुभरात्रि कह दूं तो कोई हर्जा नहीं होगा शायद...

November 8, 2010

यही मौसम क्यूँ दरपेश है ?

मौसमों की कुंडली में सेंधमारी करके उन्हें तोड़ देने का हुनर अभी आया नहीं है. कुछ दिन बिना पिए रहे, कुछ सुबहों का मुंह देखा, कुछ शामें घर में बितायी, कुछ रातों को देर तक दीये जलाये और आखिर में रविवार को फिल्म देखने के लिए गए. इससे पहले मैंने साल दो हज़ार दो में गुजराती नाटक 'आंधलो पाटो' जैसी फिल्म आँखें देखी थी. वह फिल्म बैंक के एक मैनिक अधिकारी पर केन्द्रित थी. जो तीन अंधे लोगों को बैंक लूटने के लिए मजबूर करता है. इसे अंजाम तक पहुँचाने के लिए नायिका उन्हें दक्ष करती है. उसमे कई सारे शेड्स थे. उस फिल्म को देखे हुए आठ साल हो गए हैं.

आँखें फिल्म से पहले जनवरी सत्तानवे में जयपुर के एक सिनेमा हाल में 'सपने' फिल्म देखी थी. उस फिल्म में गायक एस. पी. बाला सुब्रह्मण्यम ने अभिनय किया था. काजोल पर फिल्माए गए गीत आवारा भंवरे के अलावा मुझे फिल्म से अधिक उस दिन की याद है कि वह बीता किस तरह था. जाने क्यों अँधेरे कमरों में बैठ कर गल्प और अनुभूतियों के तिलिस्मों को देखना कभी रास आया ही नहीं. कितनी ही खूबसूरत फ़िल्में आई. उनको क्रिटिक से लेकर आम दर्शक ने सराहा. मैं फिर भी जाने किस दुनिया में रहता हूँ. घर पर कभी हल्ला होने लगता है और कोई मुझे पूछता भी नहीं कि फिल्म देखने चलोगे ?

कल फिल्म देखने क्यों गया था ? कह नहीं सकता. पत्नी ने कहा आखिर आप हमारे करीब तो आये. ये उसकी शरारत थी क्योंकि मैं घर में सारे दिन उसी से चिपके रहने को बहाने ढूंढता रहता हूँ. सिनेमा हाल में दर्शकों का अजब शोर था. वे समवेत स्वर में चिल्ला रहे थे. फिल्म में एक ही जगह मुझे ऐश्वर्या में अपील लगी मगर उस समय दर्शकों की सीटियाँ बुझी रही तो मुझे लगा कि मेरे सेन्स बराबर नहीं है. फिल्म हमारी उसी पुरातन ख्वाहिश पर आधारित थी कि अगर चांस मिले तो हम जिंदगी को फिर से जीते हुए गलतियों को दुरस्त कर सकें. बकवास फिल्म थी. कितना अच्छा होता कि फिल्म के नायक - नायिका अपने बच्चों के जीवन में कुछ इस तरह अप्रत्यक्ष हस्तक्षेप करते कि वे उन गलतियों को दोहराने से बच जाएँ.

फ़िल्में नहीं देखना एक फोबिया है और निरंतर फ़िल्में देखना किसी डिस-ऑर्डर का संकेत है. मैं अभी इस ओर हूँ. यानि इससे बच कर खुश रह सकता हूँ. उस ओर होना अधिक घातक होता क्योंकि ये शराब पीने जैसा काम है. आप निरंतर बढ़ता हुआ नशा खोजते हैं लेकिन फिल्म हो या कोई और माध्यम सबकी अपनी सीमायें हैं. हर काम एक दिन आपको सन्यास जैसी किसी अवधारणा की ओर प्रेरित करता है. काम का बोझ और विफलताएं अवसाद से भर देती है फिर हमें एकाएक किसी नए धर्म में आशा की किरणे दिखाई देने लगती है. कोई बनारस के घाटों पर मालाएं धारण कर रहा होता है, कोई मस्जिदों के आहातों में चुप बैठना पसंद करने लगता है तो कोई मोमबत्तियां जला कर प्रार्थनाएं करने में ख़ुशी खोजने लगता है. मुझे ऐसा करने में रूचि नहीं है क्योंकि ये भी एक क्रिया है और एक दिन इससे भी विरक्ति होना स्वभाविक है.

मैं जिस मौसम को बिखेर देना चाहता हूँ. वह अभी ठहरा हुआ ही है.

November 4, 2010

ओ वादा शिकन...

आजकल, जाने क्यों आवाज़ें बड़ी साफ़ सुनाई देने लगी है.
बाहर गली में किसी के पाजेब की रुणझुण कदम दर कदम करीब आती हुई सुनाई पड़ती है फिर किसी के चलने की कुछ आहटें है और कभी दिन भर, सांझ की राग सा बच्चों का शोर खिड़की तक आकर लौट जाता है. कितने सफ़र, कितने रास्ते उलझ गए हैं. बेचैन रहा करने के दिन याद आने लगे हैं. सलेटी जींस और ऑफ़ वाईट शर्ट पहने घूमने के दिन. ऑफिस, घर या बाज़ार सारा दिन होठों को जलाते हुए सिगरेट के कई पैकेट्स पीना ज़िन्दगी के कसैलेपन को ढक नहीं पाता था लेकिन खुद को राख सा बिखरते हुए देखना सुख देता था.

अकेलापन यानि पत्तों के टूटने की आवाज़, टूटन को सुनना माने एक लाचारी. वे उसकी आवारगी के दिन नहीं थे. कुलवंत की दुकान से सुबह शुरू होती और दिन सिगरेट की तरह जलता ही रहता. रात होते ही शराब फिर सवेरे उठ कर बालकनी में आता और देखता कि गाड़ी कैसे खड़ी है. अगर वह सही पार्क की हुई मिलती तो शक होता कि रात को खाना खाने गया ही नहीं. अपने हाथों को सूंघता. अँगुलियों के बीच खाने की खुशबू होती तो लगता कि कल सब ठीक था. सरकारी फ्लेट पर वह इतनी पी चुका होता कि दुनिया के सारे खौफ गायब हो जाते. उसे अपनी पहचान भूलने लगती और अक्सर रोने लगता. बी एल पीठ थपथपाता हुआ, एक गाली देता. 'साली...' फिर एक छोटे से पॉज के बाद कहता "किसी के साथ गुजर कर लो पर एक वही ..." पलकों पर ठहरे हुए आंसू ज्यादा देर ठहर नहीं पाते. बी एल फिर ऐलान करता कि चलो अरोड़ा के...वहीं चिकन खायेंगे और पियेंगे.

वह कुछ भी पी लेता. देसी - विलायती, कच्ची या पक्की. अरोड़ा के ढाबे पर नियमित जाना था तो दो स्टील के ग्लास आ जाते. कांच के ग्लास में पीनी होती तो होटल के ऊपर नौकरों के लिए बने कमरे में जाना होता. ज़िन्दगी भी दो हिस्सों में बंट गई थी जिसके एक तरफ कांच और दूसरी तरफ स्टील के ग्लास थे. जितना पीते जाते उतने ही शालीन होते जाते. दुःख दर्द डूबने लगते. पीते हुए हमेशा होटल के सामने का एस टी डी बूथ ही दीखता रहता. " मैं कल जा रहा हूँ." ऐसा कहते हुए उठने को होता तभी बी एल हाथ पकड़ लेता "रात के बारह बज चुके है अब उसको फोन मत करो..." रात डूब जाये, इससे पहले कुछ और पी ली जाये.

सुबह पांच बजे बस स्टेंड पर टहल रहा होता. जो भी बस मिलती उसमे बैठ जाता. मीलों पसरी हुई रेत, धूप में चमकती. कई सौ किलोमीटर का सफ़र. पानी की तलब साथ चलती रहती. तीन बार बस बदलता और हर बस के आखिरी स्टॉप तक का यात्री हुआ करता. सवारियां उतरती और चढ़ती जाती. सर्दियों में ठण्ड से अकड़े हुए तलवों को अपने जूतों में हिला कर गरम करने की कोशिश करता. कभी बस का ड्राइवर किसी स्टेंड पर जलते हुए अलाव के पास रोकता तब अपने पांव सेकना नहीं भूलता. गरमियां होती तो लू बदन को चीरती रहती. एक गरमी की दोपहर में स्टेंड पर पानी पीने के लिए उतरा तो ड्राईवर ने कहा "भाई ये पानी तुमसे पिया नहीं जायेगा." वह बहुत खारा पानी था जैसे नमक के दो चमच एक ग्लास पानी में घोल दिये गए हों. वह आधा जग पानी पी गया. ड्राईवर ने पूछा "कहां के रहने वाले हो." कहा "इस रेगिस्तान के आखिरी छोर का..."

रंगीन हवेलियों वाले देस में शाम उतरती जाती. बिस्तर पर लेटा हुआ उसे देखता. खिडकियों पर कबूतर बैठे रहते और वह आलू छीलती हुई दो एक बार उजड़ी निगाह डालती हुई अपने काम में लगी रहती. रात बरसती रहती और वह उसकी छातियों में सर रखे हुए रोता ही जाता. ओ वादा शिकन... इन दिनों फिर वही आवाजें है और वह फिर से टूट रहा है.


October 24, 2010

इन आवाज़ों को शक्ल मिलने की दुआ करता हूँ

विकीलीक्स द्वारा सार्वजनिक की गई रपट के प्रति विश्व समुदाय को लम्बे समय से जिज्ञासा थी. पेंटागन और विकी के बीच पिछले कई सालों से इन तथ्यों को उद्घाटित किये जाने को लेकर कशमकश जारी थी. चार महीने पहले कुछ तस्वीरों के सार्वजनिक किये जाने के बाद अमेरिकी प्रशासन ने 'राष्ट्र हित' को ध्यान में रखने का बड़ा ही मार्मिक और देशभक्ति पूर्ण इमोशनल अनुरोध भी किया था कि विकी को अमेरिकी करतूतों को सार्वजनिक नहीं करना चाहिए. वे तस्वीरें ईराक में मानवीयता का गला रेत रहे गोरे, दम्भी और अमानुषिक अत्याचारों की थी.

युद्ध अपराध से सम्बंधित जो दस्तावेज़ विकीलिंक्स पर सार्वजनिक किये गए हैं, उनका सत्य अमेरिका के इतिहास जितना ही पुराना है. ये साम्राज्यवादी चरित्र के असली चेहरे की घूंघट से दिख रही एक धुंधली सी छवि है. दुनिया पर काबिज हो जाने के लिए जंगल के कानून से भी बदतर तरीकों वाला ये साम्राज्यवादी अभियान समाज में नस्लभेद, जाति और चमड़ी के रंग के भेद को खुले आम बढ़ावा देता हुआ नस्लीय घृणा का सबसे बड़ा पोषक है. ज़मीन और समुद्र के बीच अपने अड्डे बनाते हुए दुनिया को अपने रहम और करम से पालने के इरादे से भी आगे उसे अपना गुलाम बनाने की ओर अग्रसर है. शोषण और खून खराबे वाली इस संस्कृति के बारे में जानने के लिए विकी की रिपोर्ट रौशनी की एक किरण मात्र है. वास्तविकता को हम कभी नहीं जान पाएंगे क्योंकि राजनीति विज्ञान और समाज शास्त्र का पाठ्यक्रम निर्धारित करने वाले लोग आज भी वही गेंहू खा रहे हैं जो मछलियों को डाल दिये जाने बाद बचा रह गया है और उसके निस्तारण के लिए तीसरी दुनिया के सिवा कोई ठिकाना बचा नहीं है.

विकी के दस्तावेज़ कोई नई कहानी नहीं कह रहे हैं. उनके अध्ययन से सिर्फ एक पंक्ति का नतीजा निकाला जा सकता है कि इस बर्बर व्यवस्था का अंत होना मानव समाज का पहला लक्ष्य होना चाहिए. मैं उन देशों के नाम नहीं लेना चाहूँगा जिन्होंने पिछले पचास बरसों से अमेरिका के पड़ौस में रहते हुए उसके पिछवाड़े पर लात लगा रखी है. वे देश सम्मान का जीवन जीने का प्रयास कर रहे हैं. उनके कोई मुआमले संयुक्त राष्ट्र में लंबित नहीं है. उन्होंने अपने अपने कश्मीरों को ताल ठोक कर खुद का बता रखा है और दुनिया को खुली चुनौती है कि वे हस्तक्षेप करने का साहस ना करें. उन देशों के बारे में हमारे मन में पूर्वाग्रहों के बीज रोपे जा चुके हैं और उनके राज्य के विचार को इन्हीं साम्राज्यवादी शक्तियों द्वारा 'असफल विचार' करार दिया जा चुका है.

दुनिया में हुई क्रांतियों के उत्सव उन्हीं देशों ने मनाये हैं जिन्होंने राजशाही को उखाड़ फैंका था. औपनिवेशिक देशों के पास उत्सव मनाने के जो ख्वाब हैं, वे उधार के हैं और उनमें ब्रिटेन और अमेरिका के सितारे जड़े हुए हैं. इन दिनों मेरे ख्वाब भी बहुत उलझते जा रहे हैं. मैं अपनी धुन का पक्का नहीं हूँ. मनमौजी हूँ इसलिए मेरे पास एक ही समय में कई सारे काम होते हैं और मैं लगभग सब कामों को अधूरा छोड़ दिया करता हूँ. यहाँ तक कि अपनी तमाम मुहब्बतों को अंजाम तक नहीं ले जा सका.

एक मुहब्बत, दुनिया में सब को बराबरी का हक़ मिले की लडाई से भी थी. ये मुहब्बत भी अभी अधूरी है. बाईस साल की उम्र में मेरे लिखे लेखों का अंग्रेजी में अनुवाद मुझे पढने को मिलता था. आज उन पन्नों को देखता हूँ तो रोना आता है कि मैंने कैसे खुद को बरबाद किया है. मुझे मयकशी से कुछ दिनों के लिए मुक्त होने की जरुरत है. मैं कई बार सोचता हूँ कि मुझे प्रोफेशनल राईटिंग पर ध्यान देना चाहिए लेकिन फिर डर जाया करता हूँ कि ये काम मुझसे मेरी सहूलियतें छीन लेगा. कभी लगता है कि बीस साल पुराने धंधे में लग जाऊं, अख़बारों के लिए राजनैतिक विश्लेष्णात्मक लेखन आरम्भ करूं ताकि मेरी रूह को चैन मिले किन्तु मैं कुछ नहीं कर सकता जब तक अपनी बुरी आदतों से छुटकारा न पा लूं.

दुनिया में कोई काम आसान नहीं होता. किसी के तलवे चाटना भी आसान कहां होता है ? इसलिए मैं उन सब को बधाई देना चाहता हूँ जो अंकल सैम के गुलाबी कदमों को सदियों से चूम रहे हैं.

October 22, 2010

सोये हुए दिनों के कुछ पल

ऐसा नहीं है कि मैं आत्मरति के तिमिर में खो जाने के लिए एकाएक गायब हो जाया करता हूँ. मैं उन्हीं जगहों पर होता हूँ मगर खुद को उस लय में पा नहीं सकता. दिन के किसी वक्त या अक्सर सुबह कई परछाइयाँ मेरे सिरहाने उतर आती हैं. उनकी शक्लें बन नहीं पाती. वे या तो बहुत भारी या फिर उदास हुआ करती हैं कि मैं ऑफिस जाने के लिए जरूरी सामर्थ्य को खो बैठता हूँ. रिवाल्विंग चेयर या फिर सात फीट लम्बे चौड़े बिस्तर पर अधलेटा अलसाया हुआ तीन पंक्तियाँ लिखता और चार मिटाता रहता हूँ. एक भोगे हुए किन्तु बेचैन मन की तरह विलंबित लय में अपनी जगह बदलता रहता हूँ. दोपहर बाद पत्नी ऑफिस से लौट आती "मुझे नहीं लगता कि आज ऑफिस जा पाओगे"

बस ऐसे ही कई दिन बीत गए हैं. ऑफिस गया भी और लौट भी आया. दर्ज करने लायक कुछ नहीं था. इन पंद्रह दिनों में रेल, शोर, शहर, माल, केफे, बर्गर, चायनीज़, स्पेनिश, सरकारी गाड़ियाँ और चौराहों पर खिले हुए फूलों की लघुतम स्मृतियां ही बची. याद रखने के तरीके सिखाने वाले कहते हैं कि आपको सिर्फ वही याद रहता है जिसे आप सख्त पसंद या सख्त नापसंद करते हैं.

मेरी यादों में लगभग यही है. बीच की सारी चीजें धुंधली हो गई हैं. सप्ताह भर पहले वापस अपने घर लौटने के लिए प्लेटफार्म नंबर तीन पर उतरने वाली सीढियों के आगे बेतरतीब रखे सामान को पार करते हुए परिवार के साथ खड़ा था. शाम बहुत सामान्य थी. नज़र दूसरी तरफ जाकर अचानक रुक गई जैसे किसी देखते हुए को देख लिया हो. कमसिन लड़की थी.

आज एक फोन करता हूँ फिर बीस मिनट के वार्तालाप में भीगी नम आवाज़ को सुनते हुए पाता हूँ कि कुछ मौसम बड़े जिद्दी होते हैं. वे लौट - लौट आया करते हैं. इस पीड़ादायक युग से होड़ करता हुआ आदमी जाने कैसे प्रेम के लिए समय निकाल लेता है. गहन अनुभूतियों और सन्निहित संवेदनाओं के बाजारू हो जाने के अंदेशे के बीच जीने के लिए एक मुकम्मल दर्द को खोज ही लाता है. धूप और ओस को एक ही माला में पिरोने वाले मेरे ये दोस्त सच में कितने अच्छे हैं. मैं इनके लिए दुआएं करता रहना चाहता हूँ.

चलो उठो... आज फिर दिन के तीन बजने को.

October 7, 2010

दिल तो रोता रहे और आँख से आंसू ना बहें

कहां कर रहे हो, कहां जा रहा है
किये जाओ राजा मजा आ रहा है

हम अपनी तमीज भूल चुके थे. ये जाने किसने कहा था, किसकी महफ़िल थी और जाने किसने सुना था. शराब का नशा और खिलने लगा. सोने जैसी रेत पर काली कलूटी सड़क, महान व्यक्ति के चरित्र पर काले कारनामों की रेख. इसी सड़क के किनारे रोटी के ढाबों का सिलसिला. बिछी हुई चारपाइयों पर चड्ढा ग़ज़ल गुनगुनाते हैं. दाल में बघार की खुशबू और मिट्टी पर गिरे हुए डीज़ल की मिली जुली गंध में रम के ग्लास की पहचान नहीं हो पाती. करमजीत पी नहीं रहा, चिंतित हो रहा है. कुछ लोग शराब के इस तरफ होते हैं कुछ उस तरफ.
वो सूरतगढ़ अब दस साल पीछे छूट गया है.

* * *

बेतरतीब कटे हुए प्याज, दो सिकी हुई हरी मिर्च, टमाटर सॉस और ग्रीन लेबल विस्की. एक आँगन, एक कमरा, एक फोटो फ्रेम में मुस्काती हुई लड़की. इसने शायद देखा होगा कि आज रेणु इस कमरे में आई थी लेकिन शुक्र है कि तस्वीरें चुप रहना पसंद करती है. ठंडी रात, ठंडी रजाई और चित्रा के पहलू से आती हुई जगजीत सिंह की आवाज़. कभी सप्ताह भर शकील साहब के बोल बजते बेगम साहिबा की आवाज़ में, मेरे हमनफस मेरे हमनवा... महीने की तनख्वाह ढाई हज़ार और खर्च... खर्च तो उम्र हुई जा रही थी मगर उसकी स्मृतियाँ कभी खर्च नहीं हो पाई. वे दिनों दिन संवरती गयी. अब कई बार लगता है वो एक ख़्वाब था, जिसे भूल न सका.

पास में एक घर था. बहुत अपना और बहुत पराया. वो घर जिस शहर में था, उसे चूरू कहते हैं. सत्रह साल पीछे छूट गया है.

* * *

बाहर का रास्ता दीवार के ऊपर से विश्वविध्यालय के आगे से गुजरते हुए नॅशनल हाई वे के पार चाय की थड़ी तक जाता है. एक बारहठ जी, भगत की कोठी रेलवे स्टेशन के बाहर चाय बनाते हैं. रात के दो बजे शराब बची नहीं, चलो चाय पीते हैं.बारहठ जी कहते "चारणों क्यों रो रो नैण गंवाओ, राठोड़ी म्हारी गयी अब खेती खड़ ने खाओ..."
जोधपुर विश्व विद्यालय के न्यू केम्पस के पी जी हास्टल का कमरा संख्या तीन सौ सात, बीस साल पीछे छूट गया है.

* * *

कल दूसरे गेम में स्मेश करते समय लगा कि बाल को स्पोट नहीं कर पाया कि शामें जल्दी घिरने लगी है. रेगिस्तान में शाम रात आठ बजे से सरक कर अब छः बजे तक आने वाली हैं. अब फ्लड लाईट की रौशनी में खेलना होगा. साल भर पहले इसी जगह ऐसे ही स्मेश करते हुए बाएं घुटने के लिगामेंट्स को बरबाद कर लिया था. अब फिर से वालीबाल ... अगले सप्ताह माथुर हाई पावर ट्रांस मीटर चले जाएंगे. गेम सुस्त हो जायेगा. उन्होंने कहा 'आज आपके साथ पीनी है'. मैंने कहा कल ठीक रहेगा. कल क्यों ?

बेग़म अख्तर साहिबा का हेप्पी बर्थडे है दोस्त... हेप्पी बर्थडे !

दोस्त, प्रेमिकाएं और शराबी... सब पीछे छूटते जाएंगे.
मल्लिका-ए-ग़ज़ल अख्तरी बाई फैज़ाबादी, आप हमेशा साथ रहेंगी.

कुछ तो ... शाईर - सुदर्शन फ़ाकिर, आवाज़ - बेगम अख्तर

October 4, 2010

मीनारों से उतरती ऊब का मौसम

वाईट मिस्चीफ़ की बोतल में एक पैग बचा रह गया है. वह एक पैग किसी शाम के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता. बस उसे रोज़ देखता हूँ और आर सी पीने बैठ जाता हूँ. विस्की के साथ ज़िन को पीने का कोई मतलब नहीं है इसलिए हर रात वह बचा रह जाता है. एक सफ़ेद पोलीथिन का लिफाफा रखा है. इसमें कॉलेज और नौकरी के शुरूआती दिनों की स्मृतियां है. ख़तों में शुभकामनाएं, ग्रीटिंग कार्ड्स में सुनहरी स्याही से लिखी दुआएं और कुछ पासपोर्ट साइज़ के फोटोग्राफ्स है. इन ख़तों और तस्वीरों का कोई मतलब नहीं है फिर भी वे कई सालों से बचे हुए हैं. कुछ कार्ड्स मुझे अपील करते हैं. ये अपील उस उपेक्षित किले जैसी है जिसमें बरसों से कोई पदचाप नहीं सुनाई देती, जिसकी घुड़साल से घोड़े समय के पंख लगा कर उड़ गए हैं. तीमारदारी में लगे रहने वाले सेवक काली बिल्लियों में बदल गए हैं और मेहराबों के पास के झरोखों में बैठे एक आँख से टोह ले रहे हैं.

ऐसे में एक ऊब चुप से पसरती हुई घेरने लगती है. मुझे इसकी आदत है. बरसों से ऐसा होता आया है कि ऊब के आते ही मैं समर्पण करने लगता हूँ. यह अनचाहा न होकर स्वेच्छिक होता है. जैसे पहले प्रेम में कोई षोडशी समस्त भयों से सहमी हुई होने के बावजूद अपने प्रियतम को इंकार नहीं कर पाती. उसके इंकार सम्मोहन में खो जाते हैं फिर वह खुद को कोसती रह जाती है कि मैंने ऐसा क्यों होने दिया. इस ऊब के आने के बाद मैं उनींदा होने लगता हूँ. मुझे लगने लगता है कि अब मैं जाग नहीं पाऊंगा. मेरे मन में सो जाने के प्रति बहुत से भय हैं. उनमे सबसे अधिक कष्टदायी है, न जाग पाने का भय... यह एक अतिसामान्य मनोरोग है लेकिन अफ़सोस इस बात का है कि इसके उपचार के लिए सोना जरुरी है.

मैं अपनी नींद के छोटे छोटे हिस्से चुराता रहता हूँ. इस प्रक्रिया से छः सात महीने में एक बार मुझे नींद घेरने लगती है. मेरे इंकार खो जाते हैं. मैं समर्पण नहीं करना चाहता किन्तु वह मुझे कीट भक्षी पौधों के फूल की तरह अपने में समेट लेती है. एफ एम 100 .7 पर काम करने के दिनों में दो दिन ऑफिस नहीं पहुंचा तो मेरे साथी प्रेजेंटर खोजने आये, मैं उन्हें सोता हुआ मिला. जब अकेला नहीं रहा तब पत्नी की गैर मौजूदगी में यह आयोजन संपन्न हो जाता किन्तु एक बार वह और बेटी पड़ौस में गए. वे कोई घंटे भर में लौट आये लेकिन मैं अपने सरकारी फ्लेट का दरवाजा बंद करके सो चुका था. दो साल की बच्ची को गोद में लिए हुए वह डोरबेल बजाती रही. पड़ौसियों ने आदिवासी शोरगुल से मुझे जगाया और मैं दरवाजा खोल कर फिर सो गया. रात दस बजे आँख खुली, वह घुटनों को मोड़े हुए मेरे पास बैठी थी. उदास और भयभीत.

मैंने बहुत साल अकेले रहते हुए बिताये हैं. एक कमरा, किताबें, म्यूजिक प्लेयर, ग़ज़लें, सिगरेट, शराब, तन्हाई और खालीपन... कुल मिला कर इस काकटेल से मैंने खुद को ख़राब किया. पिछले सात आठ दिन से वही खराबी फिर से घेर रही है. दो दिन और एक रात सोने के बाद आज शाम को जागा हूँ और नई दुनिया को समझने की कोशिश करता हूँ. अपने होने के अहसास को आश्वासन देता हुआ. इन कोशिशों में याद आता है कि दो लोग मिल कर मुहब्बत नहीं कर सकते, कि दुनिया में बहुतायत के बावजूद ये शय बहुत तनहा है, कि इसकी खोज में निकले हुए लोग अक्सर मुड़ मुड़ कर पीछे देखते हैं.

* * *
शाम हुई है और विस्की पीते पीते उकता कर मैंने, ज़िन का पैग भी पी डाला है.
कोई कविता कोई कहानी नहीं सूझती, बस तेरी आहट की लरज़िश, मेरी छत पर उतर रही है, एक सिनेमा चल निकला है, ईंटों के घर की कच्ची छत पर, बिछे हुए सन्नाटे में, यादों का चूरा उड़ता दीखता है, उस चूरे में एक उजला दिन निकला है, दिन की तपती पीठ पे इक सायकिल फिसली जाती है, सायकिल पर रखे बस्ते में इक गीला दरिया बैठा है, यादों की रंगीन मछलियाँ गोते दर गोता खाती सी कोई लाकेट ढूंढ रही है जो तूने आँखों से चूमा था...

* * *
ऊब इस कदर तारी है कि लिखी हुई पोस्ट को ड्राफ्ट में छोड़ दिया था.
फरियादी शाम है और रातों का पारा गिरने को है. सात आसमानों के पार से कोई ख़त नहीं आएगा फिर भी मैंने दो कुंवारे दीये अलग से रखे हैं कि उन ख़तों को पढने के लिए तेरी पेशानी का नूर कहां से लाऊंगा.

September 25, 2010

शोक का पुल और तालाब की पाल पर बैठे, विसर्जित गणेश

[4] ये हमारी यात्रा की समापन कड़ी है.

सड़क एक पुल में बदल गई है. यह पुल चार साल पहले आई एक नदी की स्मृति है और सैंकड़ों परिवारों का शोकगीत है. इसे आश्चर्य कहते हैं कि रेगिस्तान में सौ साल में एक बार नदी बहती है. यह आश्चर्य शीघ्र ही दुःख में तब्दील हो जाता है. जब भी यहाँ से गुजरता हूँ तो वही दिन याद आते हैं, रेगिस्तान में बाढ़ के दिन... हम एक हेल्प लाइन प्रोग्रेम कर रहे थे. जिले के आला अधिकारियों और बाढ़ में फंसे हुए लोगों को मोबाइल और रेडियो के जरिये जोड़े हुए थे. लगान फिल्म का भजन बज रहा था कि मेरा फोन चमकने लगा. ये मेरा निजी नंबर था मगर बेसिक फोन्स के ठप हो जाने के कारण इसे ऑन एयर कर दिया गया था. एक श्रोता का फोन था. उसने कहा "मेरे सामने सौ फीट दूर हमारे पड़ोसी का पक्का घर है, उस पर पांच लोग बैठे हैं और वे डूबने वाले हैं... वे नहीं बचेंगे और हम भी कुछ नहीं कर सकते." मैं उनके फोन को कंट्रोल रूम में ट्रांसफर करता हुआ रेडियो पर सहायता दल को लोकेशन के बारे में बताता हूँ. तभी उधर से आवाज़ आती है "वे डूब गए... " मैं ऑन एयर चल रहे फोन का फेडर डाउन कर देता हूँ.

असहाय, हताश और चिंतित उस श्रोता को फोन लगाता हूँ और खैरियत पूछता हूँ. वह कहता है, हम अभी बचे हुए हैं. रेत का पचास फीट ऊँचा धोरा बह गया है और पानी आया तो शायद हम भी मुश्किल में हों. कंट्रोल रूम से फोन आता है कि आपने लोकेशन सही बताई है ? मैं कहता हूँ कि हाँ... उधर से दबी हुई आवाज़ आती है हमारे ऐ डी एम साहब ठीक इसी लोकेशन पर हैं और उनसे संपर्क टूट गया है. वे भी बह गए थे. एक बड़े पेड़ के सहारे से बचे. उन फोन काल्स को सुनना और प्रकृति के सामने बौना हो जाना घोर विवशता थी.

सड़कें टूट गई, बिजली गुल हो गई फोन सेवाएं ठप हो गई थी. एक मात्र नेटवर्क काम कर रहा था लेकिन मोबाइल की बेट्रियाँ जवाब देने लगी. रेगिस्तान की बाढ़ में दो सौ पच्चीस लोग लापता हो गए. वे शव यात्राओं के दिन थे, हर दिन... टेलीफोन के पुराने पोल्स पर जानवरों के शव तैरते हुए अटके थे. बचाव कर्मी डूब गए तो वायुसेना में मातम पसर गया. चार दिन बाद एक दुर्गंध फैलने लगी. महामारी की आशंका के बीच देश भर के बचाव और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के दल पहुँच गए थे. यूपीए की चेयरपर्सन ने देखा और अफ़सोस जताया. सच में ये पुल उन्हीं शोक के दिनों की स्मृति से बढ़ कर कुछ नहीं है.

पुल और मेरा पैतृक घर तीन किलोमीटर के फासले पर हैं. घर को याद करते ही दुखों के आवेग कम होने लगते हैं. हरे खेतों में तना हुआ लाल पीले रंग वाला शामियाना कितना सुंदर दिखता है. यहाँ एक विवाह का भोज है. मेरे बेटे को जीमण का बहुत कोड (चाव) है. वह इस तरह के समारोहों में डट कर खाता है और भोजन के स्वाद की कड़ी समीक्षा करता है. यहाँ आकर हम सुख से भर जाते हैं जैसे शहर की भीड़ में खो गए थे और फिर से ठिकाने लग गए हैं. ग्रामीण आत्मीयता को बहुराष्ट्रीय तेल कंपनी निगल चुकी है फिर भी अपनों के चेहरे देखना सुकून देता है. जाने क्यों मुझे यकीन है कि मैं यहीं पर अपना घर बनाऊंगा. इसी सोच में अपनी पत्नी को देखता हूँ. मारवाड़ी पहनावे में वह कितनी सुंदर दिखती है. पलक झपकते ही, वह घर के आँगन में पचरंगी ओढ़णों से बने रंगों के कोलाज में खो जाती है.

हम लौटते समय उतरलाई नाडी पर रुके. मैं चाहता था कि बेटा इसे करीब से देखे, इसके पानी को छुए. वह तालाब के पानी पर पत्थरों को तैराने की कोशिश करने लगा और मैं चबूतरे पर बैठा रहा कि हवा अच्छी लग रही थी. किनारे पर बहुत सी गणेश भगवान की मूर्तियाँ रखी थी. यहाँ पानी की कीमत है इसलिए गणेश पूजन के बाद विसर्जित की जाने वाली गणेश प्रतिमाओं को स्थानीय ग्रामीण तालाब में डालने के स्थान पर पाल पर रखवा लेते हैं. एयरफोर्स में नौकरी करने वाले मराठी परिवार इस रेगिस्तान में गणेश विसर्जन के लिए समंदर का किनारा नहीं पा सकते लेकिन फिर भी विसर्जन तो होना ही है ताकि भगवान अगले साल फिर से आये. भगवान हमेशा साथ रहें तो उनके आने का रोमांच नहीं रहता.

एक मूषक पर सवार गणेश प्रतिमा को देख कर बेटा पूछता है कि पापा ये चूहा इतना बड़ा क्यों है और भगवान इतने छोटे क्यों हैं ? मैं उसकी गहरी भूरी निश्छल आँखों में झांकते हुए कहता हूँ. बेटा, चूहे को भगवान ने बनाया है और भगवान को इंसान ने...

September 22, 2010

आओ शिनचैन लड़कियों के शिकार पर चलें

[3]
मैंने दादा के घर के बाहर फैली खुली साफ़ सुथरी रेत पर पहली बार एक गुबरैले को देखा था. तब मेरी उम्र पांच सात साल रही होगी. वह मेरे लिए विस्मय का कारक था. खुद उल्टा चलता हुआ गोबर की एक गेंद को लुढ़काता हुआ चला जा रहा था. विस्मय व्यक्ति के सुख और दुखों की तात्कालिक अनुभूति होती है. इसी से सारे रसों का बेहतर स्वाद मिलता है. किसी की सुन्दरता को देख कर जब मैं विस्मित होता हूँ तो मुझे श्रृंगार रस के तत्व याद आते हैं. इक्यानवे-बानवे के दिनों में एक सुंदर सी दिखने वाली लड़की से मिलने की तमन्ना मचलती रहती थी. आख़िरकार हम मिले और मैं विस्मित था. इस पहली मुलाकात का हासिल सिर्फ उदासी थी. इससे उबरने के लिए कई और मुलाकातें जरुरी थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ. मेरा विस्मय निर्जीव होकर ठहर गया. बरसों सोचे गए दृश्यों के उलट तस्वीर देखना भी विस्मित करता है.

बेटे से अविश्वसनीय घटनाक्रम वाली कहानी सुन कर मैं खो गया था. मुझे एकाएक गंभीर अफ़सोस हुआ कि इसके विस्मय को छल लिया गया है. अमेरिकी कार्टून करेक्टरों में नए विस्मयबोध की लालसा में निरंतर रचे गए अतिरंजित हादसों और उनसे उबरने के तरीकों को देख कर मेरे बेटे में स्वभाविक आनंददायी घटनाओं के प्रति रूचि नहीं बची है. आशा के लिए निराशा को रचना एक बाध्यता है. इसी बाध्यता ने कई काल्पनिक शैतानी दुनिया रची और एलियंस को चित्रित किया और उन पर जीत के लिए सुपरमैन को रचा. हम सुपरमैन से ऊब गए तो बैटमैन, शेडोमैन, हीमैन, होलोमैन, स्पाइडरमैन जैसे असंख्य चरित्रों के निर्माण को बाध्य हुए. व्यक्ति एक रहस्यमयी शक्ति चाहता है ताकि वह रोजमर्रा के जीवन में एक अद्भुत रोमांच को तलाश सके. इन्हीं काल्पनिक विराट व्यक्तित्वों की छाया में हमारे आधारभूत सुख और दुःख अनचीन्हे रह जाते हैं और उनेक आगमन के समय हमें विस्मय नहीं होता. तब कोई काल्पनिक चरित्र काम नहीं करता.

दूरदर्शन पर नब्बे के दशक में ऐसा ही एक भारतीय पात्र भी बच्चों के मुख्य आकर्षण का केंद्र था. देश भर में उसे देख कर बच्चों ने अपने घरों की छतों से छलांगे लगा दी थी. मैं जिस स्कूल में पढ़ा करता था, उसके सामने तापड़िया सर का घर था. उनका बेटा भी कथित रूप से इसी धारावाहिक को देखने के बाद अपने पांवों पर बारदाना बाँध कर दो मंजिल से कूद गया था. यह एक सम्मोहन है. अद्वितीय और अलौकिक शक्तियों को प्राप्त करने की आदिम चाह का आधुनिक रूप है. गंभीर किस्म का अफ़सोस ये है कि इसका लक्षित वर्ग बेहद कोमल और कच्चा है.

एक दिन मैंने बेटे से कहा. चलो, अपन दोनों शिनचैन और उसके पापा की तरह लड़कियों के शिकार पर चलते हैं. वह मुस्कुराया नहीं उसकी मुद्रा बेहद गंभीर हो गयी कि मैंने गलत प्रस्ताव दिया है. इस उम्र में उसने इस तरह के कार्यक्रमों के प्रयोजन जान लिए हैं. उसने मेरी इस हरकत पर मुझे एक वरिष्ठ नागरिक की तरह समझाया. सच में आठ दस साल के बच्चों के लिए रचे गए ये जापानी चरित्र उनका सहज बचपन छीनते जा रहे हैं. शिनचैन अपने पापा से कहता है "ओ हो मैंने सोचा आप मेरे साथ कबड्डी खेलोगे मगर आप तो सिर्फ मम्मा के साथ खेलते हो..." इतना कहते ही उसके गालों पर खिलते सूरज जितनी लाली का स्केच बन जाता है.

मुझे आज के दिनों की तुलना अपने बचपन से नहीं करनी चाहिए. समय के आरोहण ने हमें अलग मक़ाम पर लाकर खड़ा कर दिया है लेकिन जो नुकसान हो रहा है वह द्रुतगामी है और संवेदनशील है. मैं बाइक पर पीछे बैठे बेटे से पूछता हूँ, छोटे सरकार कभी खेत में हरे सिट्टों को छू कर देखा है ? वह प्रतिप्रश्न करता है, कैसा लगेगा ? मैं चुप कि एक अपराधबोध भीतर कुनमुनाता है. बच्चों को दिये गए लम्बे भाषण याद आते हैं. ये नहीं करना, वो नहीं करना मगर करना क्या ? इसका हमको भी नहीं पता... ऐसे ही सोच भागी चली जा रही थी और दूर तक काले - पीले सिट्टों से झूमते हुए खेत हमारे साथ भाग रहे थे.

September 20, 2010

हरे रंग के आईस क्यूब्स

[2]
दक्षिण अफ्रीकी देश से आया कोयले का चूरा उड़ रहा है. हर सप्ताह कत्थई लाल रंग के बीस डिब्बों वाली एक रेल गाड़ी आकर उतरलाई स्टेशन पर रुकती है. दूर देश की खदानों का कोयला ट्रकों में लादा जाता है. काले रंग की गर्द रेलवे ट्रेक से होती हुई चारों और बरसने लगती है. ये कोयला हाल ही में रेगिस्तान में उग आये थर्मल बिजली कारखानों तक जाता है. दिन के दो बजने को है, जोधपुर जाने वाली पेसेंजर के निकलने का समय है. उन्नतीस रुपये में दो सौ दस किलोमीटर का सफ़र, डिब्बे भरे हुए और सफ़र से बंधी आशाएं सरपट भागती हुई.

उत्तरलाई स्टेशन से तीन सौ मीटर दूर एक नाडी है. रेल छूटती है और हम एक दिशा में चल रहे हैं. सोचता हूँ कि घर से बाहर आते ही मैं रूपांतरित होने लगता हूँ. पुराने सुख दुखों के बीच नए रंग की कोंपलें मन की धरती को फोड़ते हुए खिलने लगती है. अभी थोड़ी देर पहले पत्नी का इंतजार कर रहा था और सोच रहा था कि क्या वाकई हर व्यक्ति के लिए घर बनाना अनिवार्य है ? मेरे पास बहुत पैसे नहीं है कि घर बना सकूँ. हम दोनों ने सत्रह अट्ठारह साल उस घर के लिए दिये हैं जिसने हमें जीवन दिया है. इन सालों की कमाई से जो बचा वह बस थोड़ा सा प्यार है. मैं अभी तक उसके लिए घर नहीं बना सका, घर तो क्या ज़मीन का एक टुकड़ा भी नहीं खरीद सका जबकि ये उसकी बहुत बड़ी ख्वाहिश है. क्या वो इसके बावजूद भी उतना ही प्यार करती है ?

बेटा कहता है, पापा रेल से आगे निकलें. मैं पूछता हूँ कि क्यों ? वह कहता है मजा आएगा. इसका अभिप्राय हुआ कि किसी को पछाड़ कर आगे निकलने में मजा है. मेरे हाथों में बहुत से हाथ थे वे बारी बारी से मुझे पीछे छोड़ते हुए आगे निकल गए थे, उनको भी बहुत मजा आया होगा ? फिर मैं मन में सोचता हूँ कि सामने की नाडी तक अगर हम पहले पहुंचे तो जो सोचा है, वह हो जायेगा. रेल के पास सैंकड़ों पहिये हैं. इन पर सवार होकर कितने ही सुख सात समंदर पर चले गए हैं और मैं उससे होड़ करने चला हूँ. सड़क के किनारे जिप्सम खोद लिए जाने के कारण चौकड़ियाँ बनी हुई है. उनमे बरसात का पानी भरा है दूर से देखो तो लगता है कि फ्रीज़र में बर्फ जमाने के लिए हरे रंग के पानी की विशाल आईस ट्रे रखी है. सर्दियों तक ये पानी बचा रहा तो हरे रंग के आईस क्यूब्स कितने सुन्दर दिखेंगे.

रेल पास ही है. मैं नॅशनल हाईवे पर रफ़तार नहीं बढ़ाता हूँ कि मैं जबरन नहीं जीतना चाहता. रेल, परी लोक को जाती हुई सी है रंग बिरंगे ओढने खिड़कियों से बाहर थोड़ा सा उड़ते हुए. डिब्बों के दरवाजों पर बैठे हुए लड़के, हत्थियाँ पकड़े हुए नौजवान रेल के साथ उड़े जाते हैं. चौमासा है इसलिए हल्की उमस में बाहर से आती हवा उनके मन को ठंडा करती होगी. मुझे भी गर्मी नहीं लग रही. एक हाथ से बेटे को अपने पास सरकता हुआ कहता हूँ, ध्यान से बैठो. मेरे पापा भी सायकिल चलाते हुए रास्ते भर मुझे हाथ से छू कर टटोलते रहते थे. उनकी नज़र जरूर सामने होती थी लेकिन मन शायद सायकिल के करियर पर ही अटका रहता था. हर आदमी के पास एक सुखों की पोटली होती है. जिसे वह उम्र भर ढ़ोने का साहस रखता है.

अब तक उसे जिप्सम हाल्ट तक पहुँच जाना चाहिए था लेकिन नहीं, रेल पीछे छूट गई थी. नाडी के बाहर बबूल के नीचे बैठे देवताओं के पास से एक जीप होर्न बजाते हुए निकली. छोटू उस रेल को ही देख रहा था लेकिन आश्चर्य कि उसे रेल को हरा देने में मजा नहीं आया. ये कुछ ऐसा ही था जैसे आसमां से बड़े, समन्दरों से अधिक गीले, व्योम से अधिक मटमैले रंग के प्रेम का कोमा में चले जाना. आप जानते हैं मटमैला प्रेम कैसा होता है ? मुझे भी नहीं पता.

हम चौदह किलोमीटर आ चुके थे. जिस घर में मेरे पिता जन्मे, जहाँ मुझे दादी ने गले लगाया, उस तक पहुँचने के लिए अभी भी और पंद्रह माइल स्टोंस पर बैठी चिड़ियाओं को उड़ाना शेष था.

September 19, 2010

मुंह के बल औंधे गिरे हों और लौटरी लग जाये


हम जीवन का आरोहण करते हुये हर दिन बड़े होते जाते हैं। साल दर साल हमारे अनुभव में इजाफा और उम्र की तस्वीर में रेखाओं की बढ़ोतरी होती जाती है। मनुष्य एक आखेटक है। वह अपने रोमांच और जीवन यापन के लिए निरंतर यात्रा में बना रहता है। अगर सलीके से दर्ज़ की जाए तो कुछ बेहद छोटी यात्राएं भी हमें अनूठे आनंद से भर देती हैं। मेरा बेटा ऐसी ही एक छोटी सी यात्रा पर मेरे साथ था। आज के दौर के बच्चे सबसे अधिक सितम बरदाश्त कर रहे हैं। उनको जल्दबाज़ी की दौड़ में माता पिता की लालसा और भय की मरीचिका में दौड़ते जाना होता है। दस साल का बच्चा है और चौथी कक्षा में पढ़ता है। समझदार लोगों से प्रभावित उसकी मम्मा कहती है कि ये एक साल पीछे चल रहा है. मैं कहता हूँ कोई बात नहीं एक साल कम नौकरी करनी पड़ेगी. हम सब अपने बच्चों को अच्छा नौकर ही तो बनाना चाहते हैं. दरिया को पूरी रवानी से बहता हुआ देखने की जगह पर बांधों की नीव बनाने में अधिक दिलचस्पी रखते हैं. फ़िलहाल हम दोनों में ये तय है कि वह जैसे पढ़ और बढ़ रहा है, उसकी मदद की जाये. उसकी तमाम असफलताओं के दोष मेरे हिस्से में डाल दिये जाये बाकी बची हुई सफलताएँ दोनों मिल कर बाँट लेंगे.

मैं जहां रहता हूँ वहाँ से गाँव जाकर लौट आ आने का कुल तीन घंटे का सफ़र था. हम दो बजे निकले और पांच बजे घर में लौट आये.मैं अपनी बाइक पर यह यात्रा करना पसंद करता हूँ। ऐसा हर बार इसलिए करता हूँ कि मैं बहुत सुविधाभोगी हूँ. अपनी इच्छा से जाना और लौट आना चाहता हूँ. आज कल बेटा मेरे साथ रहना पसंद करता है, ऐसा क्यों है ? इसका कारण मुझे पता नहीं है. पहले बेटी ऐसा करती थी अब वह शायद बड़ी हो रही है इसलिए अपनी मम्मा और चाचियों से चिपकी हुई ऐसी यात्राओं में निंदा रस का बड़ा सुख उठाना पसंद करती है। मैंने सोचा कि इस प्रक्रिया से भी स्त्रियाँ थोड़ा चतुर बनती है. वे दूसरों के मंसूबों का आंकलन करने का हुनर सीखती हैं. इस प्रकार के बेहूदा कहे जाने वाले काम से भी संभव है कि लड़कियाँ दूसरे के उपयोग की वस्तु बनने से कई बार बच सकें.

शहर से बाहर निकलते ही एक भोमिया जी विराजते हैं. ये कल्लजी का स्थान है. हमारे गाँव के माली परिवार के एक ट्रांसपोर्टर के बेटे थे और एक शाम शहर से गाँव की ओर लौटते हुए, उनकी आर्मी से डिस्पोजल हुई जोंगा गाड़ी पलट गई थी और उनकी आत्मा ने सामान्य मनुष्य की तरह इस दुनिया को छोड़ने से मना कर दिया था. इस हठ के कारण उन्हें छोटे रूठे देव यानि भोमिया जी का दर्जा देकर शांत किया गया है.

कल्लजी से सम्बंधित जानकारी सतोलिया खेलने के दिनों की है. कवास स्कूल के मैदान में मेरे हमउम्र भाईयों ने बताया कि जिस रात कल्लजी का निधन हुआ, उसके एक महीने बाद से उनके परिवार में अजब अजब वाकये होने लगे. उनमे से एक प्रसिद्द था कि उनकी जोंगा गाड़ी अक्सर गेरेज में अपने आप स्टार्ट हो जाती थी. कुछ का कहना था कि गेरेज का फाटक भी खुलता था और वह बाहर आ जाया करती. इसी तरह की और घटनाओं के बाद कष्टों की मुक्ति के लिए उनसे आशीर्वाद माँगा जाने लगा कि परिवार की रक्षा अब आप ही करो फिर उनके दिवंगत होने के स्थान को, उनके रहने के लिए एक पवित्र स्थल की तरह थापा गया.

कल्लजी को पूजने के लिए बने चबूतरे के पास से गुजरने वाले पत्थरों से भरे ट्रक एक - दो खंडे श्रृद्धा पूर्वक डाल कर आगे जाया करते थे. इस कारसेवा से उस चबूतरे के आस पास कुछ ही सालों में पत्थरों बहुत बड़ा जमावड़ा हो गया. यह स्थान उत्तरलाई एयर फ़ोर्स स्टेशन के ठीक पास है तो वहां कार्यरत वायुसैनिक इस स्थान को पत्थर बाबा कहने लगे. पत्थर बाबा को शराब और सिगरेट से बहुत प्यार था तो प्रसाद के रूप में यहाँ पर यही मिलता भी है. आप चाहें तो नारियल या मखाणे भी चढ़ा सकते हैं. इस जगह पर शाम होते ही भोमिया जी की प्रसन्नता के लिए शराब चढ़ाई जाती है. श्रद्धालुओं के बैठने लिए और प्रसाद ग्रहण करने के लिए उत्तम सुविधाएँ बन गई है. नियमित और शौकिया शराब पीने वालों के लिए यह थान एक ईश्वरीय उपहार की तरह है.

कल जैसे ही मैं कल्लजी के थान के पास पहुंचा, बाइक पर पीछे बैठे हुए बेटे ने कहा "पापा, सोचो कि आप अभी बाइक चलाते हुए मुंह के बल गिर जाओ और आपको ज्यादा चोट नहीं आये फिर आँख खुलते ही आप देखो कि आपके चेहरे पर एक लौटरी का टिकट चिपका हुआ है. उसका नंबर है नौ आठ आठ नौ सात नौ आठ... फिर आप उस टिकट को चेहरे से हटा कर फैंक देते हो और चल देते हो. इतने में आपको मालूम होता है कि उस टिकट पर तो बहुत बड़ा ईनाम खुला है. अब आप क्या करोगे ? क्या लौट कर वापस जाकर उस टिकट को खोजोगे या फिर अपने काम से काम रखते हुए आगे चले जाओगे." ये बहुत कोम्प्लीकेटेड कहानी थी और मैं कल्लजी के ख़यालों में गुम था. बचने के लिए मैंने पूछ लिया कि छोटे सरकार आप क्या करते ?

उसका जवाब था "मैं खोजता फिर भी नहीं मिलती तो मुझे अफ़सोस होता कि एक अच्छा खासा मौका हाथ से निकल गया." ये कहानी या दृश्य एक रूमानी गल्प है. इसमें औंधे मुंह गिरने की वास्तविक सच्चाई है और लौटरी का टिकट मुंह पर चिपक जाना सबसे बुरी स्थिति में भी असामान्य आशा है लेकिन फिर हालात वही है कि टिकिट खो गया है.

इस प्रश्न की ही तरह हम सब हर रोज़ खोयी हुई अतिकाल्पनिक चीजों का अफसोस करते रहते हैं। हमारे सहज मन को जब भी दुनियावी दौड़ से फुरसत मिलती है। हम शेख़ चिल्ली हो जाते हैं। एक खयाली यात्रा से सचमुच की यात्रा सदा बेहतर होती है। जो हमारा इस खूबसूरत और अविश्वसनीय दुनिया से परिचय करवाती है। 

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September 16, 2010

मैं तुम्हारी आँखों को नए चिड़ियाघर जैसा रंग देना चाहती हूँ

डिक नोर्टन को कम ही लोग जानते हैं. मैं भी नहीं जानता. उसके बारे में सिर्फ इतना पता है कि वह एक विलक्षण लड़की का दोस्त था. उससे दो साल आगे पढ़ता था. उस लड़की ने उसे टूट कर चाहा था. वह कहती थी, तुम्हारी साफ़ आँखें सबसे अच्छी है मैं इनमे बतखें और रंग भर देना चाहती हूँ एक नए चिड़ियाघर जैसा... उस लड़की का नाम सिल्विया प्लेथ था. हां ये वही अद्भुत कवयित्री है जिसने लघु गल्पनुमा आत्मकथा लिखी और उसका शीर्षक रखा 'द बेल जार' यानि एक ऐसा कांच का मर्तबान जो चीजों की हिफाज़त के लिए ढ़क्कन की तरह बना है.

प्लेथ ने आठ साल की उम्र में पहली कविता लिखी थी. इसके बाद उसने निरंतर विद्यालयी और कॉलेज स्तर की साहित्यिक प्रतियोगिताएं जीती. उसके पास एक मुक्कमल परिवार नहीं था. वह अकेले ही नई मंजिलें गढ़ती और फिर उन पर विजय पाने को चल देती थी. उसके भीतर एक प्यास थी कि वह दुनिया को खूबसूरत कविताओं से भर देना चाहती थी. वह पेंटिग करती थी. उसे गाने का भी शौक था. उसने कुछ एक छोटी कहानियां भी लिखी. जो उसने हासिल किया वह सब दुनिया की नज़र में ख़ास था किन्तु स्वयं उससे प्रभावित नहीं थी. उसकी कविताओं को अमेरिका की महान कविताओं में रखे जाने की बातें की जाने लगी थी फिर भी डिक नोर्टन के आस पास बीते दिनों के सिवा उसे कोई चीज अपनी नहीं लगी.

वह विद्वता और पागलपन के सी - सा झूले पर सवार थी. कभी उसे पागलखाने में बिजली के झटके लग रहे होते फिर वह दो साल में अपना शोध कार्य पूरा कर के जमा करवाती फिर किसी मनो चिकित्सक से उसका उपचार हो रहा होता और वह सबसे खूबसूरत कविता लिखती.

'द बेल जार' में वह अवसाद के दिनों में भी खूबसूरती से आशाओं को लिखती है. वह जीवन के उच्चतम शिखर पर बैठ कर घाटी में टहलती हुई मृत्यु को देखती है. तीस साल की होते होते एक दिन विदुषी अथवा पागल होने के बीच का बारीक फासला मिट गया. उसने अपने दो बच्चो को गीले टावेल से दूसरे कमरे में ढका, कमरे के दरवाजों के आगे फर्श पर पानी डाला ताकि वे हर संभावित खतरे से सुरक्षित रहें, फिर खुद को रसोई में बंद कर के कार्बन मोनों ऑक्साइड के लिए ओवन को ऑन कर लिया. सुबह साढ़े चार बजे के करीब उसने अपना सर ओवन में रखा और सो गई.

यह भयानक था. ओवन में सर रख कर मर जाने के ख्याल से ही लोगों के रोंगटे खड़े हो गए. डिक के बाद उसके जीवन में आये पूर्व पति द्वारा उसे मारे जाने के कयास लगाये गए. उस कवि पति को आशंका से देखा गया. एक अद्वितीय कवयित्री के प्रशंसकों ने गहन जांच का दवाब बनाया था लेकिन चिकित्सकों ने कहा कि यह एक आत्महत्या का मामला है, क्या मैं इसे एक विलक्षण आत्महत्या कह दूं ?

मेरा नाम डिक नोर्टन नहीं है. मैं प्लेथ की तरह विलक्षण नहीं हूँ इसलिए मेरे खो जाने की चिंता गैर वाजिब है. इन दिनों किसी को याद नहीं कर रहा हूँ मगर डर सिर्फ यही है कि जब से मैंने याद के गमलों को तोड़ना शुरू किया है, मेरी पसंद के फूल फिर से खिलने लगे हैं.

September 10, 2010

दिनेश जोशी, आपकी याद आ रही है.

अब उस बात को बीस साल हो गए हैं. वे फाके के दिन थे. शाही समौसे और नसरानी सिनेमा की दायीं और मिलने वाली चाय के सहारे निकल जाया करते थे. उन्हीं दिनों के प्रिय व्यक्ति दिनेश जोशी कल याद आये तो वे दिन भी बेशुमार याद आये. मैं डेस्क पर बैठ कर कई महीनों से प्रेस विज्ञप्तियां ठीक करते हुए इस इंतजार में था कि कभी डेट लाइन में उन सबको भी क्रेडिट मिला करेगी, जो अख़बार के लिए खबरें इस हद तक ठीक करते हैं कि याद नहीं रहता असल ख़बर क्या थी.

हमारे अख़बार के दफ्तर में ग्राउंड फ्लोर पर प्रिंटिंग प्रेस और ऊपर के माले में एक हाल के तीन पार्टीशन करके अलग चेंबर बनाये हुए थे. एक में खबरों के बटर पेपर निकलते थे दूसरी तरफ पेस्टिंग, ले आउट और पेज मेकिंग का काम होता था. बाहर की तरफ हाल में रखी एक बड़ी टेबल पर तीन चार लोग, जो खुद को पत्रकार समझते थे, बैठा करते थे. मैं भी उनके साथ बैठ जाया करता था.

एक सांध्य दैनिक में काम करते हुए कभी ऐसे अवसर नहीं मिलते कि आप कुछ सीख पाएं, सिवा इसके कि हर बात में कहना "उसको कुछ नहीं आता". इसी तरह के संवादों से दिन बीतते जाते हैं. ऐसे अखबारों के हीरो क्राइम रिपोर्टर हुआ करते हैं. वे बलात्कार, छेड़-छाड़, अपहरण का प्रयास, या जानवरों के साथ इंसान का दुष्कर्म से जुड़ी खबरें खोजते हुए, पुलिस थानों में घूमते रहते हैं बाकी लोग जिन दुकानों के उदघाटन के विज्ञापन आये होते हैं. उनकी खबरें बनाने में दिन काट देते हैं. टेबलायड फार्म में छपने वाले अख़बार हमेशा लोकरंजन की सस्ती खबरों पर ही चला करते हैं, ये सच्ची बात नहीं है मगर वहां ऐसा ही था.

मुझे एक काम मिला कि सोनू खदान से निकलने वाले लाइम स्टोन पर जैसलमेर के संवाददाता बद्री भाटिया एक सीरीज लिखेंगे और मुझे उसको सही करना है. सत्रह कड़ियाँ लिखने के बाद एक सप्ताह बड़ी आपत्तिजनक ख़बर मिली. कुल मिला कर उसमे लिखा था कि न्यायालय का स्थगन आदेश तो कोई भी ला सकता है. दिनेश जोशी मुखिया थे तो उनको मैंने बताया कि ये कुछ ठीक नहीं लग रहा. खैर साहब, प्रबंधन ने वह ख़बर लिखवाई. जोशी जी की समझाईश फ़ैल हो गयी. ख़बर का शीर्षक था "स्टे तो गरीब की जोरू है जो चाहे सो ले आये" मेरे सीनियर जानते थे कि इसका अंजाम क्या है ?

मूल ख़बर पर प्रबंधन ने छापने का आदेश लिखा और अपने हस्ताक्षर किये. मेरे हाथ से लिखे आलेख को तुरंत कम्प्युटर कक्ष से मंगवा कर दिनेश जोशी ने मेरे ही सामने जला डाला. मूल आलेख वे अपने बैग में रख कर घर ले गए. मैं उस अख़बार को छोड़ कर चला गया फिर कुछ दिनों बाद सूचना और प्रसारण मंत्रालय की एक मिडिया यूनिट में भारत सरकार का नौकर हो गया.

उस ख़बर पर राजस्थान उच्च न्यायालय ने कड़ा फैसला सुनाया. पत्रकारों को कारावास की सजा दे दी गई. मेरे लिए ये अप्रत्याशित तो नहीं मगर कोई अच्छी खबर नहीं थी. खबरों के प्रकाशन के लिए उत्तरदायी दिनेश जोशी ने न्यायालय के समक्ष वास्तविक ख़बर का परचा रखा, जिसमे प्रबंधन के निर्देश थे. मैंने सुना कि बद्री भाटिया ने कहा, भाई मेरी कोई नौकरी तो है नहीं मैं तो छः महीने सेन्ट्रल जेल में काटना बेहतर समझूंगा... प्रबंधक शायद अपील लेकर आगे गए थे.

आखिरी बार की मुलाकात के समय जोशी जी भास्कर में कॉपी एडिटर थे... मगर आज बीस साल बाद भी उनकी याद आती है और याद आता है कि सीखने को हर जगह मिलता है.

September 5, 2010

हम तुम... नहीं सिर्फ तुम

अभी बहुत आनंद आ रहा है. रात के ठीक नौ बज कर बीस मिनट हुए हैं और मेरा दिल कहता है कुछ लिखा जाये. खुश इसलिए हूँ कि चार दिन के बुखार के बाद आज सुबह बीवी की डांट से बच गया कि मैंने दिन में अपने ब्लॉग का टेम्पलेट लगभग अपनी पसंद से बदल लिया कि एक दोस्त ने पूछा तबियत कैसी है कि अभी आर सी की नई बोतल निकाल ली है... हाय पांच सात दिन बाद दो पैग मिले तो कितना अच्छा लगता है.

सुबह ख़राब हो गई थी. मेरे समाचार पत्र ने अपने परिशिष्ट का रंग रूप तो बदला मगर आदतें नहीं बदली. यानि वही सांप वाली फितरत कि मध्य प्रदेश में व्यापार करने और अख़बार के पांव जमाने को भारतीय जनता पार्टी को गाली दो लेकिन हिंदुस्तान की खुशनुमा फेमिली के तौर पर भाजपा नेता शाहनवाज हुसैन और उसकी पत्नी का इंटरव्यू छापो. चाचा, कृष्ण के वैज्ञानिक तत्व पर शोध की पोल यहीं खुल जाती है. तुमसे तो कुलिश साहब अच्छे थे कि जो करते थे, वही कहते भी थे. तुम मीर तकी मीर से शाहिद मीर तक को भुला देना चाहते हो और संगीत में अन्नू मलिक को हिंदुस्तान का सिरमौर मनवाना चाहते हो, कि तुम्हें सब भूल जाता है और एक आमिर खान का लास्ट पेज पर पांच सेंटी मीटर का स्टीमर लगाना याद रहता है... और तो कुछ बचा नहीं है उस कौम में जो हिंदुस्तान की होकर भी हिंदुस्तान की नहीं कहलाती.

आज दिन भर मेरे ज़ेहन में बहुत से नाम आते रहे और मैं सोचता रहा कि क्या वाकई उनको प्रकाशन उद्योग मिटा पायेगा, क्या व्यापार इंसान से बड़ा हो जायेगा और क्या महमूद दरवेश का नाम भी फिलिस्तीन के मिट जाने पर मिट जायेगा. उधर चार दिन पहले फ़िडेल कास्त्रो फिर दिखाई दिये थे उन्होंने बोला भी कि दुनिया में जब कुछ न बचेगा तब मज़लूम बचेंगे. मुझे उनको देख कर ख़ुशी होती है कि उनका देश रहमो करम पर नहीं चलता. हम दिल से भूल जाते हैं भोपाल गैस काण्ड के सबक को और नए परमाणु समझौते को सदन में पारित करवा लेते हैं. हम भूल जाते हैं उन लोगों को जो तीन सौ इकहत्तर को समाप्त करने का एजेंडा लेकर आते हैं और राज कर के चलते बनते हैं.

'हम तुम' नहीं सिर्फ तुम...

September 1, 2010

अफीम सिर्फ एक पौधे के रस को नहीं कहते हैं


उसे मरने से बीस दिन पहले अस्पताल में लाया गया था. उसने ज़िन्दगी के आखिरी दिन एक पुलिसकर्मी की परछाई देखते हुए बिताये थे. वह लीवर और ह्रदय के निराशाजनक प्रदर्शन से पीड़ित थी. उसका नाम एलोनोरा फेगन था और बेल्ली होलीडे के नाम से पहचानी जाती थी. वह अमेरिका की मशहूर जोज़ गायिका थी. पैंतालीस साल की होने से पहले ही मर गई. उसे अफीम से बेहद लगाव था. इसके लिए वह कुछ भी कर सकती थी. कुछ भी यानि कुछ भी...इंसान की अपनी कमजोरियां होती है. उसकी भी थी.

मुझे लगता है कि उसकी ज़िन्दगी के आखिरी दिन उस भारतीय आम एकल परिवार जैसे थे. जिसमे पत्नी या पति को विवाहपूर्व या विवाहेत्तर सम्बंधों का पता चल जाये फिर तुरंत रोने -धोने, लड़ने - झगड़ने और आरोप - प्रत्यारोप के बाद अपराधी को अन्य परिवारजनों द्वारा नज़रबंद कर दिया जाये. ऐसे ही लेडी डे के नाम से मशहूर उस स्त्री के हालात रहे होंगे कि वह अपनी कमजोरियों पर बैठे एक पहरेदार को देखते हुए मर गई और ठीक इसी तरह कई परिवार भी तबाह हो गए. नशाखोरी और देहिक सम्बन्धों की चाह सभ्य समाज में अनुचित है, अपराधिक है... मगर है.

हमारा समाज कथित रूप से बहुत ही सभ्य है. सभ्य होने की आकांक्षा में समाज कई बार अमानवीय भी हो जाया करता है. हम प्रेम और उसकी अनुभूतियों को गहराई से जीये जाने से अधिक इसकी चिंता में डूबे रहते हैं कि समाज हमें कितना शिष्ट और शालीन मानता है. हम जरूरी बातें भूल जाते हैं और स्वयं को प्रताड़ित करते हुए एक अच्छे आदमी का चेहरा ओढना अधिक पसंद करते हैं. मैं ऐसा नहीं कर पाता फिर भी मुझे अपराधबोध नहीं होता तो क्या मैं एक दम गया गुजरा आदमी हूँ ? दुनिया के महान लोगों को भी इसलिए मुआफ नहीं किया गया कि उन्होंने अपनी कमजोरियों को स्वीकार कर लिया था. मैं तो महान क्या ख़ास भी नहीं हूँ फिर भला रहम की उम्मीद भी क्यों कर हो. इसलिए जैसा पहले था वैसा अब भी हूँ सिर्फ इस विरोधाभासी बयान के साथ कि किसी को दुःख नहीं देना चाहता हूँ.

मेरी प्रिय पत्नी, मैं नामी आदमी न बन सका लेकिन फिर भी मेरी कमजोरियों पर तुमने अमेरिकी प्रशासन जैसा निर्णय लेकर कोई कोप पहरे पर नहीं बिठाया इसीलिए ज़िन्दा हूँ. हालाँकि मैं अपने आचरण में घुली अफीम से मुक्त नहीं हो पाऊंगा लेकिन आज तुम्हारे जन्मदिन पर फिर से कहता हूँ "तुमसे जब पहली बार मैंने कहा था कि तुम्हारे साथ ज़िन्दगी बिताने को जी चाहता है तो उसका अर्थ भी यही था. मुझे तुम बेहद हसीन लगती थी. अब और ज्यादा हसीन लगती हो. इससे भी बड़ी एक बात थी. मेरे मन में एक विश्वास था कि मेरी गुज़र तुम्हारे सिवा कहीं न हो पायेगी. मैं सही निकला. इस एक सही निर्णय ने मेरे बाकी के गलत निर्णयों को ढक लिया."

वह अगले जनम में मेरे साथ नहीं रहना चाहती... कल रात ऐसा कहते हुए मुस्कुरा रही थी. कभी कभी मुस्काने का अर्थ ये नहीं होता कि वह सीरियस नहीं है, लेकिन जाने दो... हसीन लोगों के बहुत नखरे होते हैं.

August 16, 2010

ब्रिटनी मर्फी और ये याद का टीला

पानी के बह जाने के बाद रेत पर जानवरों के खुरों के निशान बन आये हैं. उन्हीं के साथ चलता हुआ एक छोर पर पहुँच कर बैठ जाता हूँ. सामने एक मैदान है. थोड़ा भूरा थोड़ा हरा. शाम ढलने में वक़्त है. ये विक्रमादित्य का टीला नहीं है, ये किसी प्रेयसी की याद का टीला है. यहाँ से एक काफिला किसी सुंदरी को जबरन लेकर गुजरा होगा. वह कितनी उदास रही होगी कि पूरे रस्ते में वही अहसास पीछे छोड़ गई है. मैं भी अक्सर चला आया करता हूँ. मैं अपने साथ कुछ नहीं लाता. पानी, किताब, सेल फोन जैसी चीजें घर पे छोड़ कर आता हूँ. मेरे साथ कई दिनों के उलझे हुए विचार होते हैं. मैं उनको रेत की सलवटों पर करीने से रखता हूँ.

रेत की एक लहर से आकर कई सारी लहरें मिल रही हैं. इन्हीं में एक ख्याल है साईमन मार्क मोंजेक का, वह उसी साल दुनिया में आया था जिस साल मैंने अपनी आँखें खोली थी. मैं इस समय रेत के आग़ोश में किसी को सोच रहा हूँ और वह होलीवुड की फोरेस्ट लान में बनी अपनी कब्र में दफ़्न है. वह बहुत ख्यात आदमी नहीं था. उसने दो तीन प्रेम और इतनी ही शादियाँ की थी. इसमें भी कुछ ख़ास नहीं था कि उसने कुछ फिल्मे बनाई, निर्देशन किया और स्क्रिप्ट्स लिखी. वह लन्दन में पैदा हुआ बन्किंघम्शायर के लम्बे चौड़े खेतों के बीच में स्कूल के रस्ते को याद रखते हुए पंद्रह साल की उम्र में अपने पिता को खो बैठा. उसे टेलीविजन से प्रेम हो गया था. वह अपने ख़यालों में इसे एक अद्भुत दुनिया मानता था. उसी में जाकर बस गया. वहां से उजड़ा तो अमेरिका चला गया.

मैं ऐसे पात्रों को बहुत पढ़ता और जीता आया हूँ जिन्होंने प्रेम किया, देह का उत्सव मनाया, तूफ़ान में पतंग की तरह आसमां की ऊँचाई को छुआ और सात आठ साल काम करके पैंतीस साल की उम्र से पहले मर गए. कैसी उदासी है मेरे भीतर कि जापान के टोक्यो शहर की एक गली में बाईस साल के नौजवान चार्ट बस्टर सिंगर की मृत्यु को नहीं भूल पाता. जाने क्यों ऐसे ही आम और खास लोगों की जीवनियाँ और आत्मकथाएं ढूढता फिरता हूँ. उन्हें सहेज कर रखता हूँ. रात को जब पीता हूँ तो उन्हें वाइन भी ऑफ़र करता हूँ.

साईमन की मृत्यु अभी दो महीने पहले ही हुई है. उस दिन मुझे ख़बर नहीं हुई. अगले दिन प्रधानमंत्री जी की प्रेस कांफ्रेंस थी तो उस पर लिखने लग गया था फिर कई दिनों तक मुझे ब्रिटनी मर्फी जैसी खूबसूरत महिला की याद नहीं आई. मैंने शराब को भी नहीं चखा. मैं एक कहानी लिखने लगा. कहानी को इम्प्रेशन से बचाने के लिए कहीं घूमने भी नहीं गया. यानि मैंने ब्रिटनी और साईमन से खुद को बचा कर रखा. कल जाने क्यों उन्हें भुला नहीं पाया. सोचता रहा कि जिस लड़की को उसका पिता दो साल की उम्र में छोड़ जाए और उसकी माँ उसके एक इशारे पर जान देने जितना प्यार करते हुए पाले. वह एक दिन फिल्मों की चका चौंध में चहेता नाम बन जाये और दूसरी शादी के बाद अवसाद में चली जाये. कितना तेज कदम सफ़र है ज़िन्दगी का...

पिछले साल दिसंबर में ब्रिटनी मात्र बत्तीस साल की उम्र में मर गई. उसकी मृत्यु के कारण बताये गए थे कि वह बहुत अधिक एनीमिक हो गई थी और हृदयाघात को सहन नहीं कर पाई. मुझे बहुत अफ़सोस होता है कि इस दो साल के विवाहित जीवन में अपनी माँ और पति के साथ रहते हुए भी ब्रिटनी को किस चीज की कमी थी कि उसने कोकीन जैसे पदार्थ का सहारा लिया. हालाँकि अमेरिकी चिकित्सा विभाग इस बात की पुष्टि नहीं करता मगर ये सच है कि उसने अत्यधिक मात्र में नशीले पदार्थों का सेवन किया और दो महीने में ही चालीस पौंड से अधिक वजन खो दिया था.

मुझे पश्चिम की जीवन शैली और उसके जीवन पर प्रभावों का लेश मात्र भी ज्ञान नहीं है. उनकी क्या खूबियाँ और क्या खामियां है नहीं जानता मगर इतना समझ आता है कि भारतीय जीवन शैली मेरे जैसे अवसाद प्रेमी को बचा कर रखने में कामयाब है. अपने रचे गढ़े गए अफसोसों के साथ रहते हुए मुझे कभी इस तरह से जीवन को समाप्त करने का विचार नहीं आया. मैं हर बार ऐसे दौर को जी भर के जीते हुए आगे बढ़ा हूँ. कल भी सोच रहा था कि जिस दुनियां में शादियाँ और प्रेम क्षण भंगुर हैं वहां आखिर ऐसा क्या था कि मर्फी के जाने के बाद साईमन पांच महीने से अधिक जीवित न रह सका. उसने भी ब्रिटनी की तरह अपने जीवन का अंत क्यों कर लिया ? और वह ब्रिटनी की माँ जिसने दूसरी शादी ही नहीं की... अभी भी उस घर में कैसे रहती होगी ? किस ह्रदय से उसने पांच महीने के अंतराल में दो बार इमरजेंसी को फोन कर के बताया कि कोई मरने वाला है और वे सच में चले गए.

तुम भी बिना मिले मत जाना किसी से... मेरे जैसे लोग उनके लिए भी दुआ करते हैं जिनको कभी देखा ही नहीं...

August 9, 2010

क्रश... क्रश... क्रश.. काश, लोबान की गंध से बचा रहूँ.

आसमां में बादलों के फाहे देखता हूँ और कमरे में अपने वजूद की तरह बिखरी बिखरी चीजें. म्यूजिक सिस्टम के स्क्रीन पर वेव्ज उठ कर गिर रही है. लोक संगीत के सुर बज रहे हैं. रात में रीपीट मोड में प्ले किया था. तीन बजे के बाद शायद दीवारों ने सुना होगा, मुझे नींद आ गई थी. इन दिनों में व्यस्त भी बहुत हूँ और खुश भी तो याद आता है कि ऐसा ही दस साल पहले भी था. उन सालों में ज़िन्दगी ने मुझे एक साथ कई वजीफे दे रखे थे. मैं जिधर देखता था मुहब्बत थी. एक सुबह राजेश चड्ढा ने कहा 'चलो, आपको लैला - मजनूं की मज़ार दिखाते हैं.' वो रेत का दरिया ही था, जिसमें से हम गुजर रहे थे. कोई एक सौ किलोमीटर से भी ज्यादा पाकिस्तान की तरफ चलते रहने के बाद हम गाड़ी से उतर गए. मेरे कदम जिस तरफ बढ़ रहे थे, उसी तरफ से लोबान की गंध तेज होती जा रही थी.

मैंने लैला मजनूं का किस्सा बचपन में सुना था. मेरी स्मृतियों में मजनूं अरब देशों के रेगिस्तान में भटकते हुए मुहब्बत की फ़रियाद करता था. उस दिन अचानक मैं उसकी मज़ार के सामने खड़ा था. मुझे नहीं मालूम कि उन दो मज़ारों का सच क्या है किन्तु वहां से लौटते ही मैं अगली रात की गाड़ी से चार सौ किलोमीटर दूर जयपुर चला गया. लोबान की गंध अब भी मेरे साथ थी. वहां मैंने उसको खोया जिससे में डूब कर मुहब्बत करता था. उसे खो देना जरूरी था फिर चार छः महीने तक शराब पीता रहा. एक दिन सरकार ने मेरा स्थानांतरण रेत के ही किनारे मेरे अपने घर में कर दिया. यहाँ आते ही सब ठीक लगने लगा लेकिन कुछ ही दिनों में वही हाल हो गया. याद के तपते मौसम में मुझे लोकगीतों से राहत हुई. सुना और सुना... बस सुनता गया.

पिछले कुछ सालों से 'जिप्सी म्यूजिक' में सबसे मीठी आवाज़ मुझे गफूर खां मांगणियार की लगती है. वह साल दो हज़ार की एक खिली हुई दोपहर थी. गफूर ने मेरी ओर देखा और हाथ से इशारा किया. जिसका अर्थ था कि वो मुझे कुछ सुनाना चाहता है. मैंने उसे रोक कर कहा गफूर आज साज़ रहने दो और मूमल सुना दो. उसने कहा बिना साज़ के ? हाँ, मैं जानता था कि वह खालिस गायक है इसलिए दिल से गा ही लेगा. उसने गाया...

उसी का एक टुकड़ा आपको भी सुनाता हूँ.
ढोला तुम्हारे देस में मैंने तीन रतन देखे हैं, एक प्रियतम दूसरी उसकी प्रिया तीसरा कुमकुम के रंग का नौजवान ऊंट. ओ प्रियतम सावन के महीने की पहली तीज से भी जल्दी घर आना, तुम्हारी ये प्रिया डरती हुए कहती है जल्दी से घर की ओर मुडो. मूमल, रंग महल में खड़ी अपने केश सुखा रही है और बियाबान में एक तनहा खड़ा पेड़ दिन दिन सूखता ही जा रहा है. सांवले रंग की काजल की रेखा की तरह भूरे क्षितिज पर महल की बुर्जों के पार बिजली चमक रही है.. ओ ढोले की मूमल आओ, चलो तो तुम्हें मरुधर देस ले चलूँ. मूमल का सिर अखंड नारियल सा गोल है और उसके बाल विषधर नाग से हैं. ओ ढोले की मूमल आओ, चलो तो तुम्हें मरुधर देस ले चलूँ...



August 3, 2010

धोधे खां की बकरियां और विभूति नारायण राय

इस रेगिस्तान में जन्मे धोधे खां की अंतर्राष्ट्रीय पहचान है. वे एक बहुत दुबले पतले और पांच वक़्त के नमाजी इंसान है. उनके पास जो संपत्ति है. वह एक झोले में समा जाती है. जो नहीं समा पाता वह है बकरियों का रेवड़ और कुछ किले ज़मीन. उन्होंने राजीव गाँधी की शादी में अलगोजा के स्वर बिखेरे थे. उनका मानना है कि इस संगीत को सुन कर इंदिरा गाँधी प्रसन्न हो गई थी. उन्होंने अपने हाथ से कुछ सौगात भी दी थी. भले ही अलगोजा जैसा वाद्य हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में शहनाई जितना उचित सम्मान न पा सका हो लेकिन उन्हें फ़ख्र है कि दिल्ली एशियाड का आगाज़ अलगोजा के स्वर से ही हुआ था.

मैंने जाने कितने ही घंटे उनके अलगोजा को सुनते हुए बियाते हैं. वे मेरी ज़िन्दगी के सबसे सुकून भरे पल थे. वह ख़ास कलाकार इतना सहज है कि रिकार्डिंग स्टूडियो और बबूल के पेड़ की छाँव में फर्क नहीं करता. इसीलिए मैं उसका मुरीद भी हूँ. मैंने बहुत नहीं तो कुछ नामी कलाकारों के पास बैठने का अवसर पाया है लेकिन इस सादगी को वहां नहीं पा सका. धोधे खां ने दुनिया के पचास से अधिक देश देखे होंगे और वहां के लोगों का प्यार पाया होगा. उनकी गहरी आँखें हमेशा उस अदृश्य सर्व शक्तिमान के रोमांच से भरी रहती है.

धोधे खां बातूनी है या नहीं कह नहीं सकता मगर मैंने उनके साथ लगातार तीन - तीन घंटे तक कई बार परिवार, कला और कला से जुड़े अनुभवों और समाज के बारे में बातें की है. दुनिया के सबसे बड़े रेडियो नेटवर्क आकाशवाणी के राष्ट्रीय कार्यक्रम संस्कृति भारती के लिए उन पर आधारित एक लघु रूपक भी बनाया था. इस कार्यक्रम के निर्माण से पहले भी कई बार मैं उनके गाँव में बकरियों के रेवड़ के बीच बैठ कर अलगोजा सुनता रहा और वे हर बार आल्हादित होकर, हर एक रचना के बाद अपने रचयिता ईश्वर का आभार व्यक्त करना नहीं भूलते.

धोधे खां से अलग होकर मैं शाम होते ही कुछ और कलाकारों के साथ बैठ जाता तो अगले दिन वे मुझे अपने बच्चे की तरह समझाते "अल्लाह ताला ने हमें ये शरीर दुनिया की बेहतरी के लिए दिया है, और आप साहब इसको शराब से ख़राब कर रहे हैं, क्या जवाब दोगे...?" मेरा ये बेटा... ऐसा कहते हुए वे अपने मंझले बेटे की और देखेते हुए कहते हैं "इसने बीड़ी पीनी शुरू की है, मुझ से छुप कर पीता है ... अभी से सांस फूलती है... मूजिक की बजाई एक दिन ख़त्म हो जाएगी. इसकी सांस फूल जाती है और मेरे को देखो पैंसठ साल की उम्र में राग प्रभाती को तीन बार बजा लेता हूँ..."

खैर धोधे खां साहब को याद करने का कोई इरादा नहीं था. वह तो कल रात को बरसात की हल्की फुहारें लगातार पड़ रही थी.बच्चे खाना खा के सो चुके थे और वायदे के हिसाब से पत्नी को भी मेरा इंतजार नहीं था तो मैं छत पर बैठ कर कोई सात आठ दिन बाद शराब पी रहा था. दिन को दो तीन मित्रों के फोन आये वे सब बड़े ही व्यथित थे कि विभूति नारायण राय जैसे आदमी ने कैसा स्टेटमेंट दिया है. उन्होंने स्त्री लेखिकाओं को छिनाल कहा है. उन्होंने एक समूह के लिए आपत्तिजनक शब्द का प्रयोग किया है. ऐसे ही या इसी अर्थ के उनके सवाल थे तो मुझे धोधे खां की याद आ गई.

धोधे खां की याद इसलिए कि वे हर बात में अपने कान पकड़ते हुए अल्लाह तौबा का उच्चारण करने की आदत रखते हैं दूसरा ये कि उनकी बकरियां अभी तक मौका मिलते ही अलगोजा को चबाने को आतुर रहती है. इसलिए भी कि वे सब एक सुर में मिमियाती हैं और इसलिए भी कि उन्होंने बिना साक्षात्कार पढ़े, मैं - मैं की जुगलबंदी की है. बकरियों, विभूति जी ने भले ही इशारे में कहा किन्तु उनका इशारा साफ़ है. वे किसी एक महिला लेखिका की बात कर रहे है. जिनकी आत्म कथा को पढ़ने से लगता है कि शीर्षक 'कितने बिस्तरों पर कितनी बार' होना चाहिए था ? मैं नाम लिखूंगा तो गुड़िया रूठ जाएगी. वे एक ख़ास रस्ते पर चलने वाली होड़ को बेहतर नहीं मानते, बस इतनी सी बात है. आपको लगता है कि वे पूरी बिरादरी की बात कर रहे हैं तो खुद को टटोल कर देखिये कहीं आप भी उसी पंक्ति में नहीं हैं. असल हल्ला तो कान में बिना बाली डाले हुए अमर - बकरे कर रहे हैं.

मैं जिन लेखिकाओं को जानता हूँ. वे भद्र और सुसंस्कृत महिलाएं हैं. भले ही उनके नाम बड़े नहीं है मगर मेरी नज़र में उनकी लेखनी बहुत बड़ी है और उनके लिए मेरा सम्मान भी इसलिए है कि वे धोधे खां की अलगोजा चबाने को आतुर बकरियां नहीं हैं. मेरी दुआ है कि वे साहित्यिक आकाश की सब ऊंचाइयां पार कर लें.

July 28, 2010

मैं कब ज़िन्दगी को तरतीब में रखना सीखूंगा, एंथनी !


एंथनी हट्टन होता तो इस समय कोई स्पेशल डिश बना रहा होता. उस डिश को खा चुकने से पहले ही उससे एक साल बड़ी कैली शेपर्ड उसे अपनी बाँहों में कस कर मार डालती या फिर शायद वे देर तक आईस हाकी खेलने जैसा नृत्य करते हुए थक कर चूर हो रहे होते. हो सकता है कि कैली कहती "एंथनी तुम फायर मेन क्यों बन गए हो, तुम उस लाल रंग की कठोर टोपी के नीचे से हरदम जागती आँखों से मेरे सिवा सब के बारे में सोचते ही रहते हो." एंथनी के पास सब बातों के जवाब रहे होंगे, पता नहीं उसने कैली को दिये या नहीं.

एक लाल रिनोल्ट ने उस बीस साल के नौजवान सायकलिस्ट एंथनी हट्टन को कुचल कर मार दिया था. दुनिया में सड़क हादसों में बहुत लोग मरते हैं किन्तु एंथनी अनमोल था.

दो महीने पहले तेरह एप्रिल के दिन सैंतालीस साल के रसेल हट्टन अस्पताल के बाहर खड़े हुए एक टीवी चेनल से बात कर रहे थे. मैं उस हतभागे को सुनता हुआ रोने लगा. एक पिता अपने बेटे की आखिरी इच्छा पूरी करने के लिए खड़ा था. वह अपने बेटे के अंगों का दान किये जाने की कार्रवाही में सहयोग कर रहा था. "वह चाहता था कि अगर मुझे कुछ हो जाये तो मेरे शरीर के सभी उपयोगी अंगों को जरुरत मंद लोगों को दान कर दिया जाये." एक हिचकी के बाद और रुलाई फूटने से पहले उसकी माँ कहती "वह सिर्फ ग्रेज्यूएट ही नहीं वरन अच्छा शेफ था लेकिन उसने इस पढाई के पूरा होते ही फायर सर्विसेज को सेवा देने की ठानी. वह हमारे घर का सबसे योग्य और सुंदर बच्चा था." फिर वह कहती "मैं उससे बहुत प्रेम करती हूँ..." इसके आगे उसके पास शब्द नहीं थे.

वह इस जुलाई के महीने में अपना इक्कीसवां जन्मदिन मना रहा होता और अपनी इस बात पर अडिग रहता " 'I would rather live the life I do for two days than live a long life and be bored." एंथनी ने ज़िन्दगी के लिए सारी तैयारी कर के रखी थी और मरने के बाद की भी... मैंने अभी तक कुछ नहीं किया है.

सोचता हूँ कि बीस साल की उम्र में वह कितना सुलझा हुआ था और मैं ? कल रात से बहुत उदास हूँ. एक पुरानी दोस्त जो किसी सूरत में पिछले दस सालों से दोस्त नहीं है. उसे भूल जाना चाहता हूँ. मेरी चाहतें नास्तिकता की हद से भी आगे की और बहुत असामाजिक है. मैं कुछ ऐसे जीता आया हूँ जिसे ईमान वाले धोखा कहते है, मैं कहता हूँ कि राहत है ... आज एक मित्र ने कहा है, खाली एक दम खाली हो जाना कभी कभी बेहद ज़रूरी... काश ये मेरे पास बैठ कर कहा होता ?

July 20, 2010

शामें सुस्त है मगर बोझिल नहीं

छः दिन हो गए हैं. शाम सात पचास पर सीढियां चढ़ता हूँ, घूम कर मुड़ता हुआ फिर से चढ़ता हूँ और ऐसे मैं अपनी छत पर पहुंचता हूँ. मेरे हाथ में लेपटोप, एक चिल्ड पानी की बोतल, बच्चों टिफिन जैसे प्लास्टिक के पात्र में स्नेक्स और बीवी के गोल लंच बोक्स जैसी बंद होने वाली कटोरी में सलाद होता है. छत पर एक झोंपड़ी की शेप का कमरा है. जिसमे तीन तरफ से हवा आती है. उसके आगे बरामदा और लेट-बाथ है. इस झोंपड़ी में तीन चारपाइयां और छत पर बिछाने लायक बिस्तर रखे हैं. एक सोफा है और तीस - पैंतीस आंग्ल भाषा में छपी हुई प्राणी शास्त्र की पुस्तकें हैं. एक आले में हंस, पाखी, लहमी, वागर्थ, नया ज्ञानोदय जैसी मासिक त्रेमासिक पत्रिकाएं रखी हैं.

जलसा का पहला अंक भी है जिसके कवर पर चिर विवादित, धर्म नाशक, कुंठित और घोर साम्प्रदायिक कहे जाने वाले मेरे प्रिय बूढ़े बाबा का बनाया हुआ चित्र छपा हुआ है. मैं उस पर अधिक ध्यान नहीं देता क्योंकि मेरे यहाँ बरसात सात साल में एक बार होती है और धूप में छाता तानते ही हर कोई व्यंग करता है कि देखो लाट साहब या मेम साहब जा रही हैं इसलिए मेरे दिल में छातों की ख़ास क़द्र नहीं है
लेकिन तस्वीर से याद आता है कोई देश से निकल जाये तो भी वह दिल से कब निकलता है ?

एक निवार से बुनी हुई चारपाई बाहर निकालता हूँ, उसके पास टी टेबल पर लेपटोप रखता हूँ फिर ऊपर के आले में रखी शराब की तीन चार बोतलों में से रेंडमली कोई एक को बिना देखे नीचे खींच लेता हूँ. पहला पेग लेते ही जी मेल का कम्पोज ऑप्शन चुनता हूँ और कहानी लिखने लगता हूँ. तकरीबन बीस लाइन लिखने के बाद उसे ओटो सेव होने के लिए छोड़ देता हूँ... और किस काम की होती है शामें ? शराब पीने की या कहानियां लिखने की.

देर रात पत्नी कहती है तुम क्या हो... फिर पास आती और पूछती है, आज भी ? मैं कहता हूँ तुम मेरी कहानी पढो. मैं अभी नहा कर आता हूँ.

आवाज़ के कुछ टुकड़े

के सी

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Kishore Choudhary is a poet and fiction writer from Barmer (Rajasthan). His writing career took a formal leap from his personal journals to make him a hugely popular blogger on two of his blogs- Kahaniyan and Hathkadh.

Having spent most of his formative years in the desert, the life there is his favourite canvas to contextualise his poetry and stories. His followers from across the world vouch for his realistic and authentic portrayal of the desert life and its typical dilemmas, fused beautifully and almost effortlessly with some stunning images of the desert and its folklore.

Kishore in a way pioneered the incorporation of pre-publishing interactions and feedback with his readers on his blogs and across social media platforms in his final works. His style is known for its lucid and unexampled metaphors that he exquisitely uses to express universal feelings like love, loneliness, hope, pain, longing and fantasy. 

His first collection of stories Chaurahe Par Seedhiyan (2012)was such a thumping bestseller that the first issue was sold out within 50 days of its launch.All the stories skilfully bring the rich and exotic background of the desert come alive and make the reader delve deeper into the layers of human emotions.This much sought after collection raised the bar for all contemporary Hindi works of short fiction and brought in a fresh change in the existing status quo for Hindi short stories. 

The second collection titled Dhoop Ke Aaiyne Mein(2013)had an array of short stories that looked at life through a multi-dimensional prism, lending each one of them a distinctive charm. Kishore being a poet first, his stories are more like poetic fiction. Having a great affinity to the stream of consciousness novels by English literary greats like James Joyce and Virginia Woolf his stories defy the conventional rules of a definitive beginning, middle and end. 

Kishore’s first publication was a collection of poetry Baatein Bewajah, an alluring and bewitching series of short poems which capture the vast expanse of human emotions and have images that have a rare haunting quality.

Kishore is a Radio Broadcaster by profession and has a special fondness for classical & folk music. Articles about him and his interviews are available across many major newspapers and websites. Kishore certainly is the Avant-garde flavour in contemporary Hindi writing and his ever expanding avid readership eagerly waits for his next chartbuster.

Kishore's latest is another collection called "Jaadu Bhari Ladki". This collection has his same imitable style of stories but the contexts and places are beyond the desert as well. 
His deep understanding of the complexity of modern relationships and how they play out in our minds, homes and workplaces makes it a very unique almost post-modern work in Hindi Fiction.

http://www.goodreads.com/author/show/7361739.Kishore_Chaudhary

हेंगओवर सिलसिला

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Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने या खूबसूरत स्त्री को इरादतन चूमने जितना ही अवैध है.

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