June 30, 2011

दोपहर के वक़्त का टुकड़ा...

उमस भरे मौसम में बायाँ हाथ ट्राउज़र के पाकेट पर रखे हुए और दूसरे हाथ की अंगुलियाँ उसके बालों में फिराते हुए जाने क्यों लगता है कि वक्त खोता नहीं, हमारे भीतर बचा रहता है.

जो चीज़ें घेरे हुए थी, उन्हें बिना किसी खास शिकायत के ख़ुद ही चुना था. सलेटी रंग की जींस, पूरी आस्तीन के शर्ट, सफ़ेद जोगर्स, बच्चों के रंगीन कपड़े, चैक प्रिंट वाले बैड कवर, कफ़ और कॉलर से आती खुशबू, दीवारों के रंग, तकियों से भरा डबल बैड और शराब पीने का बेढब अंदाज़. लेकिन इन सालों में जो छूट गया था, उस पर पसंद काम नहीं करती थी. अक्सर वही याद आता. एक खाली दोपहर के वक़्त का टुकड़ा, छिटका हुआ उत्तेजना का पल, हवा में बची रह गयी गरम साँस, छूटता हुआ हाथ, दूर जाती हुई आँखें और देह से अलग हुआ जाता आधी रात के राग का आलाप...

साल गिरते रहे. नए मौसमों का शोर झाड़ू-बुहारी, रसोई-दफ़्तर, बच्चों-बूढों और शादियों-शोक के साथ बीतता गया. ज़िन्दगी के पेड़ की कोमल हरियल छाल, कठोर और कत्थई होती गयी मगर याद कभी अचानक आती थी. ऐसा न था कि वह गली से गुज़रे मुसाफ़िर की किसी दोशीजा पर अटकी निगाह वाली मुहब्बत थी. उसे छू कर देखा था. उसकी आवाज़ को अपने बालों में उलझते हुए पाया था. दीवारों का सहारा लेकर खड़े थे मगर थामा हुआ एक दूसरे को ही था. यानि याद के पेड़ पर हर साल नयी कोंपलें फूटते जाने का सब सामान था.

जाने कैसे कभी साँस मद्धम हो जाती. कुछ सूझता नहीं. कोई याद नहीं आती. कुछ चाहिए भी नहीं होता. ज़िन्दगी के अंधे मोड़ एकाएक सामने से गुजरने लगते. जिनके उस पार कुछ न दीखता था. कुछ भारी भारी से वक़्त के साये डोलते रहते. अक्ल फ़रोशों की नसीहतें फ़ैल हो जाती. मन, दुःख के गाँव से विदा हुए बुद्ध को भूल जाता और दौड़ दौड़ कर दुखों को सकेरने लगता. उनको सीने लगाता. बस उसी एक पल सांसे मद्धम, डूबी हुई और निराकार होती जान पड़ती, उस पल मुहब्बत मुस्कुरा रही होती. इस हाल पर नहीं वरन इसके हासिल पर.

जब तुम्हारी सीली आँखें दीवार पर अपनी रूह के महसूस किये को उकेर रही होती है तब गुमशुदा हवा के झोंके की तरह तुम्हारे पहलू में बैठा हुआ, मैं पढ़ रहा होता हूँ.


तुम्हारे जाने के बाद
एक दिन सब रास्ते भूल चुके होंगे मुझे.

मैं उम्रदराज़ तन्हाई से घबरा कर, रोने लगूंगी
चीज़ों को उठा कर रखूंगी, उसी जगह
फ़िर कभी आह और हिचकी के बीच अटक जायेगा कुछ.

जब अपने ही हाथ न उठ सकेंगे पोंछने आंसू
तब ख़ुदा से मांग लूंगी सारी शिकायतें वापस
कि उसने कभी, तुम्हें मेरी बाँहों में लिखा था...

June 25, 2011

ख़ूबसूरती का ख़याल और बेसलीका बातें

ऐसा नहीं है कि सब अपने होने के बारे में जानते हैं. परिचित शब्द सुनाई देते तो हैं तो उनको दो के पहाड़े की तरह अपनी वह पहचान याद आ जाती है. यह सीखने की प्रक्रिया में शेष बचा रह गया हिस्सा है. जबकि अधिकतर यह भी भूल चुके हैं कि बर्फ के रेगिस्तान वाले देशों के नाम क्या है और अमेरिका में सिर्फ़ हथियारों के कारख़ाने ही नहीं वहां कुछ बहुत लम्बी नदियाँ भी हैं. जिनके किनारे रहने वाले लोग ओबामा को नहीं जानते जैसे बाबा रामदेव अब भी इस रेगिस्तान के एक लोक देवता ही हैं.

यह पीढी जाने किस सम्मोहन में जी रही है कि उनके युवा दिनों के सपनों की निशानियाँ भी शेष नहीं बची. एक अस्पष्ट और लयहीन शोर से घिरे हुए निरर्थक सवाल जवाब में अपना वक़्त बिता रही है. इस टैक दुनिया में इलोक्ट्रोंस के हाहाकार के बीच कुछ पुराने ख़याल के सवालों की गंध जब मुझ तक आती है तो सुख से भर जाता हूँ कि वे दिन कहां गए जब ख्वाबों की लड़कियाँ स्थायी रूप से काई की तरह चिपकी नहीं रहती या फ़िर लडके एक बासी ब्रेड पेकेट के सबसे मोटे वाले टुकड़े की तरह फ्रीज़ में सबसे आगे अटके नहीं रहते थे.

ये शायद फास्ट ट्रेक एवोल्यूशन है कि जिस हुनर से मोहित होकर हमराह हुए, उसे औरतों ने दुनिया का सबसे नाकारा और वाहियात काम घोषित कर दिया और वे भौतिक संसार के असीम ख़यालों में खो गयी हैं. आदमी एक अक्षुण सौन्दर्य वाली ऐसी देह के ख़याल में जीता जा रहा है, जो किसी कार्बन प्रतिमा में ही संभव है. मन को पढना, समझना और साझा करना भूल गया है ये वक़्त... और इस दौर के हम लोग कैसे हैं कि सालिम अली के पंछियों की तरह पतली टांगों में इच्छाओं के टैग लगा कर उड़ते जा रहे है.

जाने दो, मेरी इन बिना सलीके वाली बातों को भूल जाओ. सुनों, मैंने एक और बात बेवजह लिखी है.

उसके शयनकक्ष में किस तरफ खुलती है खिड़की
और दरवाज़ा कहां है, नहीं मालूम
मगर सोने से पहले
उसने फेरा है बेटे के सर पर हाथ
कुछ अधिक गरम स्नेहिल स्पर्श से छुआ है पति को
और फ़िर उदासी के नीले अँधेरे में
दो आंसू खो गए हैं तकिये की कोर पर...

स्कॉच के नए स्वाद को गले लगाता हुआ ऐसा सोचता हूँ.

तुम न सोचना
कि प्रेम मनुष्य को और अधिक तनहा क्यों कर जाता है ?
मैं भी न सोचूंगा कि बातें बेवजह हैं और बहुत सी हैं...


June 22, 2011

सलेटी रंग पर कढ़ाई

उसके हाथ को थामे हुए पाया कि हम उन युद्धबंदियों की तरह थे, जिनके शहरों को अनिवार्य विवशता में ध्वस्त किया जा चुका था. शीशे के पार जो घर दिखाई देते थे, उनकी खिड़कियों में बचपन के बाद के कमसिन दिनों में देखी हुई सूरतें नहीं थी. जून के लगभग बीतते हुए दिनों में गुलाबी दीवारों पर टिकी हुई छतों के ऊपर बादलों के टुकड़े थे. ऐसी उमस भरी दुपहरी की कई कार्बन कॉपी ज़ेहन में पहले से ही मौजूद थी. वे कितने बरस पीछे का खाका खींचती थी ये कोई भूलने जैसी बात नहीं थी. सड़क किनारे का गुलमोहर अभी कच्चा पेड़ था फिर भी उसकी छाँव में एक मुकम्मल इंतज़ार किया जा सकता था.

घर से उस तक पहुँचने वाले रास्ते के बाई तरफ
जलकुम्भी की बढती हुई बेल में खो गया था धूसर तलछट
ठीक मेरे अतीत की तरह, वहां चीज़ें कायम थी
मगर उनको ढक लिया था किसी जिद्दी रंग ने.

वह एक साफ़ खिला हुआ दिन था
गहरी धूप में कुछ बादलों के फाहे,
कुछ कबूतरों का अजाना नाच,
कुछ सूनापन, कुछ कारें और सड़क के मौन किनारे
हमने अपने आंसुओं को पोंछते हुए कहा
"अच्छा हुआ..."

फ़िर उसने कहा, तुम रोओ मत और ख़ुद रोने लगी...

जब तीसरे माले के कबूतर उड़ गए
तब खुद के दिलासे के लिए मैंने उससे एक बात कही
कि ये ज़िन्दगी
हमारी तरकश में सबसे अच्छे अवसर उस वक़्त रखती है,
जब हम निपट अनाड़ी होते हैं.

* * *

बारिशें दूर तक दिखाई न देती थी फ़िर भी उसकी गोल, कत्थई और रोई हुई आँखें एक सीले एकांत से भरी थी. कुछ बिछड़े हुए धागों में अंगुलियाँ घुमाते हुए उसके सूट के किनारों की कढ़ाई के रंग देखता था. वह कुछ इस तरह देखती थी जैसे कभी देखा ही न हो.

बालकनी से रात को देखते हुए कई बार ख़याल आया. वह भी मेरी तरह झूठ बोल रही थी कि अच्छा हुआ...

June 13, 2011

क्या बुझेगा राह से या सफ़र बुझ जायेगा

इस महीने की छः तारीख़ की रात मैंने एक बड़ा उदास और अंधकार भरे भविष्य को सम्बोधित ख्वाब देखा. ख्वाब रात से पहले दिन का तापमान अड़तालीस डिग्री से ऊपर था. लोग इसके बावजूद अपने जरुरी काम करने के लिए बाज़ार में मसरूफ़ थे. जिस चीज़ को छू लो, वह अंगारा जान पड़ती थी. रेगिस्तान के बीच में बसा हुआ क़स्बा है. सदियों पहले अच्छी ज़मीनों से खदेड़ दिए गए लोग इस मरुस्थल में आ कर बस गए थे. संभव है कि वे भ्रमणशील जिज्ञासु थे अथवा भगोड़े या फ़िर विद्रोही. हम अपनी प्रतिष्ठा के लिए खुद के पुरखों को विद्रोही मानते हैं.

दो हज़ार सालों में उन्होंने सीख लिया था कि गरमी की शिकायत करना बेमानी है. मैं भी उनका ही अंश हूँ. मैंने भी गहरे खारे पानी को पीते हुए चालीस साल का सफ़र तय किया है. धूप सर पे न हो तो चौंक जाते हैं. उसका साथ इतना गहरा है कि सौ मील तक एक भी सूर्यदेव का मंदिर खोजना मुश्किल काम हैं. यूं देवता इतने हो गए हैं कि हर मोड़ पर सुस्ताते हुए मिल जाते हैं. सूर्य सहज उपलब्ध है इसलिए दुनिया के उसूलों के अनुसार उसका उतना ही कम महत्त्व भी है.

ख़्वाब किसी अँधेरी दुनिया की बासी जगह पर आरम्भ होता है. वहां कोई तीन चार लोग हैं जो किसी विशालकाय पानी के जहाज कि डेक जैसी जगह पर खड़े हैं. मैं उनको देखता हूँ लेकिन उनका हिस्सा नहीं हूँ. एक संभाव्य दुर्घटना से पूर्व के संकेत मौसम में फैले हैं. डेक के किनारों पर लगी रेलिंग से मैं देखता हूँ कि उत्तर पश्चिम दिशा में लटका हुआ सूर्य किसी हेलोजन बल्ब की तरह गर्म होकर ऊपर नीचे हिला और फूट गया. यह सूर्य का दैनिक अवसान नहीं था वरन उसके नष्ट होने का दृश्य था. अँधेरा, भयानक अँधेरा.... आशंकाएं, सिहरन, उदासी, और एक लम्बे तिमिर में खो जाने का विचार...

मनुष्य उत्पादित विद्युत अभी है. कुछ कम रौशनी के बल्ब जल रहे हैं. लोग जा चुके हैं. तनहा खड़े हुए एक अन्तराल के बाद मैं आवाज़ सुनता हूँ. कोई कहता है सूरज लौट आया है. कुछ अँधेरे कमरों को पार करके दूसरी तरफ खुली जगह पहुँचता हूँ. खुद से पुष्टि करता हूँ कि ये कौनसी दिशा है ? दक्षिण. हाँ... रौशनी लौट कर नहीं आई मगर उस तरफ एक सूरज था. दूर बहुत दूर. कहीं कोई कह रहा था कि ये पृथ्वी का आत्मक्षय था. पृथ्वी, हम जिसे गोल पढ़ते आये हैं, वह वास्तव में एक कूबड़ वाले गोल आलू जैसी है.

मैंने अपनी स्मृति का बेहतरीन उपयोग करते हुए ख़्वाब के सारे सिरे जोड़े. बिस्तर पर चुप बैठा हुआ उस गाढे अँधेरे की गहराई को महसूस करता रहा. एकाएक ख़याल आया कि मेरे हिस्से का कौनसा सूर्य बुझ गया है. क्या ये कोई आगत का संकेत है. क्या दक्षिण दिशा की ओर नई संभावनाएं तलाशनी चाहिए ? क्या किसी अनिष्ट ने रास्ता बदल लिया है ? ऐसे बहुत से सवालों के घेरे में गुंजलक देखता रहा. बच्चे सो रहे थे. बाहर पानी भरने की आवाज़ें आ रही थी, सोचा ये मेरी माँ होगी. रसोई से कॉफ़ी की खुशबू थी. खिड़की से आती गरम हवा से आभास हुआ कि आज फ़िर तपेगा रेगिस्तान का एक और दिन. सूरज सलामत था... वो क्या था ?

June 10, 2011

प्रेम का कोई तुक नहीं होता

उसे तो बात कहने का भी सलीका न था. साँझ ढले रात की चादर पर खुद को बिखेर देता. सूखे पत्तों के टूटने जैसी उसकी आवाज़ थी. कहता था कि मुझे रात के माथे की सलवटें गिनना आता है. इसी कारण देर तक जागने की आदत हो गयी है. सुबह अनार के फूलों पर आने वाली पतली लम्बी चोंच वाली नीले रंग की चिड़िया उसे कहती सुबह हो गयी है. वह कहता इतने सवेरे कैसे उठ जाती हो, तुम किसी से प्रेम नहीं करती क्या ? चिड़िया कहती हाँ करती हूँ. चिड़िया ने उसे एक अतुकांत गीत सिखाया. क्योंकि प्रेम का कोई तुक नहीं होता.

हर शाम संवरती थी, तेरे साथ से महकती थी
जिसमें कांटे चुने, जिसने सपने बुने
ये बीते दिनों की एक बात है
वो लड़की भी नहीं रही, वो दिन भी तो बदल चुके
और मैं भी कोई और हूँ....

बारहा न पूछो हवाओं से, अनमनी सी घटाओं से
इस किस्से में आएगा उसका नाम भी
जिसके हाथों उसका खून हुआ, ज्यों मरते हैं ख्वाब हज़ार बार
वो ख्वाब भी नहीं रहे, वो रुत भी तो बदल चुकी
और मैं भी कोई और हूँ...

ये सवाल ही गलत है कि ना सूद ना उधार थे
क्या देखना, क्या पूछना, उसके ज़ख्म बेहिसाब थे
गणित भी क्या कीजिये, झड़ चुके सब पात का, बीते हुए हालात का
वो सूखे पात भी नहीं रहे, वो हालात भी तो बदल चुकी
और मैं भी कोई और हूँ...

मोती तो सारे बह चुके, ना बाकी कोई आस है
मुझे शाम से अब इश्क़ है, तुझे सुबह की तलाश है
सुबह की तलाश, सुबह की तलाश है....

और वह किसी खोयी हुई उम्मीद की तरह लौट आई. घन गर्जन के बाद का सन्नाटा घनीभूत हो गया. सजल आँखों की कोरों पर उपत्यकाओं की ख़ामोशी ठहर गयी. खुशबुएँ तितलियाँ बन कर उड़ गयी. हसीन हैरानी की तरह दूर किसी देश के गुप्त खजाने के बीजक की कुंजी सामने खड़ी थी. वह अभागा गाने की जगह चिल्लाने लगा...

तुम जाओ कि रंग दू उदास शाम को
तुम जाओ कि भर दूं यादों के जाम को
तुम जाओ कि आवाज़ दूं तेरे नाम को
तेरे नाम को, तेरे नाम को, तेरे नाम को....

June 7, 2011

वह कुछ इस तरह बसा है स्मृतियों में

जहां पर वह रहता था, उस भूगोल में कुछ भी स्थायी नहीं था. बबूल की छोटी झाड़ियाँ एक चौड़ी सड़क के किनारे किसी झालर की तरह उगी हुई रहती थी. कुछ दूर देखो तो उनमें कुछ चिड़ियाएँ या फिर जीभ लटकाए हुए कुत्ते हांफते रहा करते थे. सामने एक बड़े परिसर में सन्नाटा पसरा रहता. उसने कई बार सोचा कि घरों के दरवाजे सड़कों पर न खुल कर सामने किसी घर में खुलने चाहिए. धूप इस तरह बराबर पसरने की जगह बादलों की शक्ल में हो. दूर दूर तक बस धूप के टप्पे दिखाई दें. घर से बाहर निकलें तो भाग कर किसी छाँव वाले टप्पे तक पहुँच जाएँ.

उसके घर के बाहर एक रेत की नदी बहती थी. दरवाज़े की चौखट के पास भी माँ अक्सर बारदाना डाल कर भीतर आने के महीन रास्ते बंद कर दिया करती किन्तु एक शक्ल दीवारों से छन कर नीम अँधेरे में भी उस तक पहुँच जाती. वह उसे अपने सामने की दीवार पर टांग देता किन्तु वह ख़यालों की तस्वीर उछल कर किसी और कोने में जा बैठती. वह कहता खेलो नहीं, यहाँ आओ मुझे प्यार करो. मगर रवायत ऐसी थी कि कमसिन उम्र की तस्वीरें खेलने में ही यकीन रखती थी.

वे छेड़ के छुप जाने की हुनरमंद थी. वह सोचता था कि जब वे छुप जाती है तब क्या मैं भी उसके कमरे में किसी तस्वीर की तरह मंडराता हूँ ? क्या मैं भी देखता हूँ कि वह मुझे अपने पास बुला रही है, रूठ गई है और बेसब्र होकर मुंह फेर कर सो गई है या कुछ देर बाद फिर से देखने लगी है और कहती है. आओ ना मुझे प्यार करो.... सदियों बाद भी ये नामालूम रहा कि वह ऐसा सोचती थी या नहीं लेकिन उसने उसके ऐसा सोचने के बारे में लिखा...


गरम दिनों में
दीवार से उखड़े हुए पोस्टर की याद
रह रह कर मेरे बिस्तर पर उतरती है
मैं सो जाती हूँ तकिये को सर पे रख कर.

जाड़े की स्याह रातों में
लज्जा में डूबा कोई चाँद दिखाई नहीं देता
बस क्षितिज के पार का आलोक
रेशमी चादर ओढ़े हुए आता है छत पर
मैं उसे सजा लेती हूँ माथे की बिंदी की तरह.

जिस दिन बरसात भिगो जाती है
घर के आगे बना सीमेंट का आँगन
दीवारें खिल जाती है कोंपलों की तरह
कोठर से उठती है सीले हुए गेहूं की ताजा गंध...
मैं दरवाज़े पर बैठी सोचती हूँ
कि तुम्हारे आने के लिए ये सबसे अच्छा दिन है.

बातें बेवजह हैं और बहुत सी हैं.... [24 मई 1994]

June 4, 2011

हर किसी का खेल नहीं है...

शाम अभी आई नहीं थी. दूर पेड़ों की टहनियों पर पंछी चौंक जाने की तरह चहकते और चुप हो जाते थे. ये एक लम्बी बेंच थी जिस पर कोई भी बैठ सकता था. वह भी बैठी थी. सामने रखे पानी के आईने में डोलती हुई परछाइयों को देखती हुई. कभी हवा का झोंका आता तो सीढ़ियों की धूल गोल गोल नाचती और फिर ठहर जाती. ऐसी ही एक शाम उसने ख़त में लिखा था कि तुम मेरा साथ कभी मत छोड़ना...

उसे लगा कि वह फिर से सुन पा रही है. मैं चिड़ियों के लिए रखे चुग्गे की तरह बिछ जाऊं तुम्हारी राह में, झील के किनारे की सख्त और गीली सीढ़ियों में ढल जाऊं, हो जाऊं उड़ता हुआ पंख, तुम्हारी बेटी के हाथ जितना कोमल... आवाज़ किसी अनजान दिशा में खो गई. जैसे मुहब्बत खो जाया करती है, रेगिस्तानी पगडंडियों की तरह. फिर कहीं से बादल घिर आये और उसके चेहरे को ढांप दिया.


अगर मैं बना सकता शब्दों को चाकू
और खरज की आवाज़ से गढ़ सकता मजबूत मूंठ
तो पीछे से बाँहों में भरता हुआ
तुम्हारे कान में टूटे पत्तों के हल्के शोर सा बजने लगता
आई लव यू... आई लव यू... आई लव यू...
और फिर गाल और कान के बीच चूमता हुआ
रेत देता तुम्हारा गला.

और इस तरह मैं दुनिया का पहला आदमी हो जाता
जिसने पहली ही बार में कर ली थी सफल आत्महत्या.

तुम इसकी तफ़सील में न जाना
कि मैं कभी कभी ऐसा सोचता हूँ, कि बातें बेवजह हैं और बहुत सी हैं

* * *
फ़रीद अयाज़ साहब को सुनोगी ?

आवाज़ के कुछ टुकड़े

के सी

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Kishore Choudhary is a poet and fiction writer from Barmer (Rajasthan). His writing career took a formal leap from his personal journals to make him a hugely popular blogger on two of his blogs- Kahaniyan and Hathkadh.

Having spent most of his formative years in the desert, the life there is his favourite canvas to contextualise his poetry and stories. His followers from across the world vouch for his realistic and authentic portrayal of the desert life and its typical dilemmas, fused beautifully and almost effortlessly with some stunning images of the desert and its folklore.

Kishore in a way pioneered the incorporation of pre-publishing interactions and feedback with his readers on his blogs and across social media platforms in his final works. His style is known for its lucid and unexampled metaphors that he exquisitely uses to express universal feelings like love, loneliness, hope, pain, longing and fantasy. 

His first collection of stories Chaurahe Par Seedhiyan (2012)was such a thumping bestseller that the first issue was sold out within 50 days of its launch.All the stories skilfully bring the rich and exotic background of the desert come alive and make the reader delve deeper into the layers of human emotions.This much sought after collection raised the bar for all contemporary Hindi works of short fiction and brought in a fresh change in the existing status quo for Hindi short stories. 

The second collection titled Dhoop Ke Aaiyne Mein(2013)had an array of short stories that looked at life through a multi-dimensional prism, lending each one of them a distinctive charm. Kishore being a poet first, his stories are more like poetic fiction. Having a great affinity to the stream of consciousness novels by English literary greats like James Joyce and Virginia Woolf his stories defy the conventional rules of a definitive beginning, middle and end. 

Kishore’s first publication was a collection of poetry Baatein Bewajah, an alluring and bewitching series of short poems which capture the vast expanse of human emotions and have images that have a rare haunting quality.

Kishore is a Radio Broadcaster by profession and has a special fondness for classical & folk music. Articles about him and his interviews are available across many major newspapers and websites. Kishore certainly is the Avant-garde flavour in contemporary Hindi writing and his ever expanding avid readership eagerly waits for his next chartbuster.

Kishore's latest is another collection called "Jaadu Bhari Ladki". This collection has his same imitable style of stories but the contexts and places are beyond the desert as well. 
His deep understanding of the complexity of modern relationships and how they play out in our minds, homes and workplaces makes it a very unique almost post-modern work in Hindi Fiction.

http://www.goodreads.com/author/show/7361739.Kishore_Chaudhary

हेंगओवर सिलसिला

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Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने या खूबसूरत स्त्री को इरादतन चूमने जितना ही अवैध है.

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