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तुम्हारी नियति

ये ज़रूरी नहीं है कि
काग़ज़ के फूल काग़ज़ से ही बने हों।

ताज़ा फूल थे। महकते, लुभाते फूल। गमले में रख दिए।
हवा ने या वक़्त ने उनकी नमी सोख ली। उन सूखे फूलों को देखकर लगता था कि वे काग़ज़ के फूल हैं।

अचानक हाथ सूखे फूलों के गुच्छे पर गया तो काग़ज़ की छुअन महसूस हुई। काग़ज़ सी आवाज़ आई। वे फूल अगर छांव में न रखे होते तो धूप में काग़ज़ की तरह जल सकते थे।

प्रेम भी एक दिन सूखा हुआ काग़ज़ फूल हो जाता है?

नहीं। तुमने कभी देखा है कि तितली, भँवरे, चिड़ियाँ किसी मुरझाए फूल के पास उदास बैठी है? नहीं न। तितलियां और पंछी जानते हैं कि फूलों का काग़ज़ हो जाना, प्रेम का स्मृति में ढल जाना नियति है। इसलिए नए फूल तक उड़ो।

तुम्हारी नियति एक नये क्षण की ओर चलते जाना।
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फूलों का मौसम न था

फासलों की वजह काश उम्र ही हो. गहरे रंग वाले फूल ने धूप ज़्यादा सही। बारिशों का लम्बा इंतज़ार किया। उसने जाना कि इस पल जो पास खिला है, उसे नाज़ुकी से छू लो। ये पल किसी प्रतीक्षा के लिए नहीं है। एक हल्के रंग के फूल ने चटकते ही मादक गन्ध महसूस की। उस ख़ुशबू का ख़यालों में पीछा किया। सपनों की दुनिया गढ़ी। ऐसा होगा, वैसा होगा मगर दुनिया का हिसाब सही न था। फूल के पास आशाओं की गीली कूचियां थी जबकि समय के पास ऊब की उदास धूप थी। उम्र के फासले को कुतर कर एक दिन छोटा फूल बड़े फूल से सटकर बैठ गया। छोटे ने पूछा- “हमारा क्या होगा?” बड़े ने कहा- “तुमको दुख हो सकता है और मुझे शायद न हो” छोटे ने विस्मय किया- “ऐसा क्यों?” बड़े ने कहा- “उम्र की एक लकीर के उस पार पहुंच जाने पर तुमको ये समझ आएगा कि जीवन को न जियोगे तो भी बीत जाएगा।” छोटे फूल ने पूछा- “क्या तुमको कभी दुःख न हुआ?” बड़े ने कहा- “एक दिन सब छोटे ही होते हैं” छोटे ने खुले मुंह उसे देखा- “दुःख न होने का कोई रास्ता है?” बड़े फूल ने कहा- “नहीं। मगर किसी का होने की हिम्मत करना। होकर पछताना नहीं। ऊब जब उदास करने लगे वहाँ से कहीं और चले जाना” छोटे फूल ने शब्दो…

मन में छुपे बुलावे

टूटे पंख की तरह  कभी दाएं, कभी बाएं  कि कभी हवा में तैरता मन। 
आँखें पास की दीवार, छत, पेचदार सड़क या खुले आसमान की ओर रह जाती है जबकि मन चुपके से कहीं दूर निकल जाता है। मैं उसी जगह बैठा हुआ पाता हूँ कि खोया हुआ मन जहां गया है, वह कोई चाहना नहीं है। मन का जाना ऐसा है जैसे वह निरुद्देश्य भटक रहा है। 
मैं उसे पकड़कर अपने पास लाता हूँ। उसी जगह जहां मैं बैठा हूँ। वह लौटते ही मुझे उकसाता है। अब क्या करें? मैं भी सोचता हूँ कि क्या करें? कुछ ऐसा कि नींद आ जाए। थकान आँखें बुझा दे। कोई मादक छुअन ढक ले। कोई नशा बिछ जाए। ये सब हो तो कुछ ऐसा हो कि जागने पर नींद से पहले का जीवन भूल सकें। 
यही सोचते, मन फिर बहुत दूर निकल जाता है। * * *
पर्दा हल्के से उड़ता है  जैसे कोई याद आई और झांककर चली गयी। 
हम किसी को बुलाना चाहते हैं मगर ऐसे नहीं कि उसका नाम पुकारें। हम उसके बारे में सोचते हैं कि वह आ जाए। वह बात करे। किन्तु हम इन बुलावों को मन में ही छुपाए रखना चाहते हैं। 
कभी-कभी हम इस चाहना से शीघ्र मुक्त हो जाते हैं और कभी हम सोचने लगते हैं कि किस तरह उसे बुला लिया जाए और साथ ही ये भी न लगे कि हमने बुलाया ह…

टला हुआ निर्णय.

टाटा स्काई वाले बार-बार फोन कर रहे हैं. नाम पूछते हैं फिर पूछते हैं क्या आपसे बात करने का ये सही समय है? मैं कहता हूँ नाम सही है और बात करने का सही समय रात नौ बजे के आस-पास होता है. इतना सुनते हुए उधर क्षणांश को चुप्पी छा जाती है. मैं बोल पड़ता हूँ- "फिर भी बताएं क्या कहना चाहते हैं?" एग्जीक्यूटिव कहता है- "आपका लॉन्ग ड्यूरेशन पैक ड्यू हो गया है. क्या आप इसे कंटिन्यु करेंगे?" मैं कहता हूँ- "भाई नहीं करना"  "क्यों?"  "महंगा बहुत है."  "सर कोई दूसरा देख लीजिये."  "नहीं भाई बड़े पैक लेकर देखे बारह हज़ार में भी सब चैनल पर रिपीट टेलीकास्ट होता रहता है." "सर आप क्या देखना चाहते हैं"  "बीबीसी अर्थ देख रहा था दो महीने में ही उनके प्रोग्रेम खत्म हो गए. अब वही रिपीट"  "सर कंटिन्यु करेंगे?" "नहीं पैसे ज़्यादा हैं और चैनल बोर हैं" "सर प्लान तो ये ही हैं"  "भाई बहुत सारे चैनल बहुत कम पैसों में दिखाओगे तो बोलो"
मेरे इतना कहते ही दुष्यंत मेरी तरफ देखने लगा. एग्जीक्यूटिव ने फ…

पोटाश बम

उसकी निकर की जेब में कुछ रखा था. "कंचे है?" ऐसा पूछते ही बोला- "नहीं. उधर चलते हैं."
दोनों लुढ़कती सायकिल पर इस तरह सवार हुए जैसे कड़ी में पाँव फंसाकर घोड़े की जीन पर बैठ रहे हो. ढलान में सायकिल घने बबूलों के पार आबादी से दूर तक जाती थी. सीढियों से घिरे मैदान में पसरी हुई धूप में कोई परिंदा भी नहीं दिखता था.
दोनों वहां आकर सीमेंट के चबूतरे जैसे मंच के पास खड़े हो गए. उसने अपनी जेब से दो छोटी गोलियां निकाली. एक को हाथ से थोड़ा सा सहलाया और फिर ज़मीन पर मारा. छोटा धमाका हुआ लेकिन खाली मैदान में उसकी आवाज़ गूंजने लगी. परिंदे जाने कहाँ छिपे बैठे थे कि अचानक रेत के मैदान पर छायाएं तैरने लगीं. आकाश में बहुत सारे परिंदे उड़ रहे थे.
उसने कहा- "तुम फोड़ो"
कपड़े की बेहद छोटी कंचे जितनी गेंद में कुछ बंधा हुआ था. उसे सीमेंट के फर्श पर पटका तो फिर वही धमाका हुआ.
"ये तुमने बनाया है?" "हाँ" "कैसे?" "पोटाश से"  "वो क्या होता है?" "बारूद"  "बारूद तो बहुत बड़ी चीज़ होनी चाहिए जो सब कुछ उड़ा देती है. मैंने पढ़ा है कि उससे …

कांच के टुकड़ों की खेती

एक सहकर्मी थे. उन्होंने रेडियो कॉलोनी में आवंटित मकान के पीछे खाली छूटी हुई ज़मीन पर फल और सब्ज़ी के लिए क्यारियां बना ली थीं. प्रेमपूर्वक देखभाल करते. रेगिस्तान में पानी की कमी के बावजूद अपनी क्यारियों के लिए जितना संभव होता उतना पानी उपयोग में ले लेते.
कभी-कभी कॉलोनी के पड़ोसी कहते कि गर्मी के दिन आ गए हैं अब पानी की सप्लाई कम आती है. आप कम पानी का प्रयोग किया करें. इसके जवाब में वे लड़ने लगते. लोगों ने कहना छोड़ दिया. बाड़ी फलती रही. सात-आठ दिन बाद शहर के साथ आकाशवाणी को पानी की सप्लाई मिलती तो सबसे पहले उनकी बाड़ी का नल खुलता. चिंतित और परेशान कॉलोनी के रहवासी कुढ़ते रहते कि अगली बार जाने कब पानी आये.
एक दिन उनका स्थानांतरण हो गया. वे अपने पैतृक घर के पास जा रहे थे. प्रसन्न थे. उन्होंने ट्यूब लाईट के डंडे और फ्यूज हो चुके बल्ब तोड़े और बारीक टुकड़े किये. खिडकियों के टूटे हुए शीशों को इकठ्ठा किया. उनके छोटे टुकड़े बनाये. अपनी बाड़ी से एक एक पौधा उखाड़ा. मिट्टी खोदी और उसमें कांच के टुकड़े मिला दिया. इसके बाद उनके चेहरे संतोष से भर गए. उन्होंने हल्के मन से विदा ली.
जब हम जा रहे हैं तो ज़रूरी नहीं…

उलझन

"सर आपके हाथ मे शायद पूँछ आई है?" केसी
केएसएम - "लेकिन ये खोखली और बेजान लग रही है।"
"संभव है किसी कलावादी की पूँछ है" केसी
केएसएम - "हो सकता है कला मर्मज्ञ की हो।"
"देखिए इस पूँछ में कुछ कौवों और चिड़ियों के पंख भी हैं" केएसएम
केसी- "ये कोई जड़ों से जुड़ा कलावादी होगा"
केएसएम - "आपको क्यों नहीं लगता कि ये जड़ों से जुड़ा कला मर्मज्ञ है?"
"कलावादी जहाँ भी जाता है वहाँ की कला को छीनकर अपनी पूँछ में लगा लेता है" केसी
"सर ज़्यादा साफ फर्क समझ नहीं आ रहा" केएसएम
केसी- "देखिए कलावादी हर जगह उपस्थित रहता है लेकिन वह कला के किस क्षेत्र का प्रतिनिधि है ये समझा नहीं जा सकता"
केएसीएम- "सम्भव है कि ये मर्मज्ञ है।"
केसी- "देखिए मर्मज्ञ वो है जो अपने क्षेत्र विशेष के कलाकारों का शोषण करे और अन्य मंचों पर उन्ही के कसीदे पढ़े।"
केएसीएम- "जैसे?"
केसी- "जैसे ही परिवार के सम्मान की बात हो स्वयं का सम्मान करवा लें, बड़े शहर में कोठी बनाकर रहे मगर पुश्तैनी ज़मीन से अपने …