July 5, 2017

मैं क्या कहता उसको?



तुम ख़ुशी की तलाश में 
एक खंडहर के सामने खड़े हो. 

हालाँकि मुझे तुम्हारे लिए ख़ुशी है. कि एक रोज़ तुम बीती ज़िंदगी को जानोगे. गुज़रे वक़्त के निशान पढना सीखोगे. समझोगे कि परमानन्द किसी साबुत चीज़ में नहीं है.

बीज का परमानन्द मिट्टी, पानी और हवा के साथ मिलकर फूट जाने में हैं. शाखों का परमानन्द हरा रंग छोड़कर भूरे हो जाने में हैं. एक बेहद बूढ़े पेड़ का परमानन्द आँख मूंदकर ठूंठ हो जाने में है. इसी तरह हर एक जो ज़िन्दा है. उसका परमानन्द अपनी गति को पा जाने में है.

प्रेम की भव्यता अधूरे होने में है और परमानंद नष्ट होकर बिखर जाने में. 
* * *

मैंने कहा- "अब जो भी लिखता हूँ बड़ा सतही और ग़ैर ज़रूरी सा लगता है." उस लड़की ने बहुत दिनों से रफ ड्राइव न किया था. सिगरेट बहुत रोज़ पीछे कभी पी थी. व्हिस्की के बारे में उसने कुछ बताया था मगर मुझे याद न रहा. उसने मेरी इस बात पर कहा- "केसी शराब को मेच्योर होने में वक़्त लगता है. आपने जो कुछ सात-आठ साल पहले लिखा है. वह आपको पसंद है. लेकिन यकीन जानो कि आज जो लिख रहे हो. वह सात आठ साल बाद वैसा ही अच्छा लगने लगेगा."

शाम की हवा गुम थी.

शायद बरसातें होने लगें. मैं आसमान में बादलों के फाहों को देखने लगा. उसकी आवाज़ फिर से आई- "मैं शायद उससे बात करना छोड़ दूँ" मैंने पूछा- "क्यों?" उसने कहा- "अब बार-बार प्रेम में पड़ने की हिम्मत नहीं रही. वही करीब होने का सोचना, मेल्स लिखते जाना, घबराये हुए रहना, सब कामों को भूल जाना. ये सब अब न हो पायेगा." मैंने कहा- "तुम भी थक जाओगी तो.." वह बोली- "तो.." जरा सा चुप रहा और फिर धीरे से कहा- "कुछ नहीं. अच्छा सुनो. क्या तुम्हें इस बात का एतबार होगा कि मैंने अपना एक बेकार सा सपना लिखकर एक लड़की को भेज दिया."

छत तक गली में हंस रहे बच्चों की आवाज़ आई.

मैंने नीचे झांककर देखा. वे दोनों बच्चे हंसी के जाल में फंस गए थे. एक दूजे को देखते और हंसने लगते. एक बूढ़ा आदमी इस हंसी से बेख़बर चारपाई पर बैठा था.

उसने पूछा- "फिर क्या जवाब आया?"

मैं क्या कहता उसको? 
* * *

सपनों के बारे में मुझे बस इतना पता है कि वे उसे बाँहों में भर लेने जैसे होते हैं. जिनके बारे में ठीक-ठीक नहीं समझा जा सकता कि ये सब क्या है? ठीक-ठीक किसी को कहा नहीं जा सकता कि क्या होगा. 
* * *

वह जो तुम्हारे पास इक ठहरी हुई निगाह थी न. वह अच्छी थी, केसी. 
* * *

July 4, 2017

धुएं के नीम नशे में स्वप्न


ये एक सामान्य दोपहर थी. उमस कम थी. एक सिगार के पैकेट में पड़े हुए कुछ सिगार बहुत पुराने हो चुके थे. क्या उनका स्वाद अब भी वैसा ही है. जबकि तम्बाकू पर बंधे हुए पत्ते में दरारें आ गयीं थी. बीस एक सिगारों में निचले वाली परत से उल्फत ने एक साबुत दीखता हुआ सिगार निकाला.- "लीजिये इसे ट्राय कीजिये." वह सिगार घुमाकर देखने से साबुत दिख रहा था. उसकी ख़ुशबू अभी तक काफ़ी बाकी थी. 

शहर के स्टेशन रोड पर हलके बादलों की छाँव कभी कभी शामियाना तान रही थी. बाज़ार में लोग कम थे. शादियों का आखिरी सावा निकल चुका था. निम्बू वाले गायब थे. बारिशो में पिलपिले हुए आमों से ठेला भरे हुए खड़ा आदमी ख़ुद बेहद गंदा था. उसे देखते सिगार के धुंएँ को खींचने के यत्न करते हुए पाया कि सिगरेट से इसका स्वाद अलग है. जीभ पर एक नीम कड़वाहट उतर आई है मगर गला अभी धुएं की खरोंच से बचा हुआ है. 

घर आया तो दोपहर अलसाने लगी. आँखों में नींद ने अपने पाँव पसार लिए. 

और स्वप्न की आहट हुई. 

विदेश में कहीं किसी काउंटी का क्लब था. जैसे हमारे बगीचे होते हैं. एक लम्बा रास्ता. उसके पास लोहे की फेंसिंग में हेजिंग के लिए खड़ी हरी झाड़ियों की कतार. आगे जाकर एक चौकोर बड़ा भवन जिसके नादर अलग अलग कमरे होंगे ऐसा आभास था. उसी हाल के बायीं तरफ बास्केटबाल का कोर्ट था. मैंने डॉक् हार सीढियाँ चढ़कर बायीं तरफ मुड़ते समय देखा कि वहां चार पांच लोग हैं. उनमें एक नौजवान था. एक अधेड़ उम्र का कपल था. बाकी दो लड़के थे. उनके बारे में ठीक से नहीं मालूम मगर वे कुल पांच लोग थे. 

औरत धीरे से बास्केटबाल कोर्ट की तरफ बढ़ी. मैंने देखा कि वह हवा में उछली. उसने कलाबाज़ी खाते हुए बास्केट रिंग की तरफ छलांग लगाई थी. ,उझे आश्चर्य हुआ कि वह इतना ऊँचा कैसे कूद सकती है. वह असल में बास्केट करने वाले खिलाडी की तरह कूदी ज़रूर थी लेकिन वह रिंग के ऊपर जाकर बैठ गयी.

एक छोटा सा गेप आया. जैसे अँधेरा फैल गया हो. 

वे चार लोग कहीं जा रहे थे. औरत बास्केट बाल बोर्ड के बराबर ऊँचाई पर लोहे के सपोर्ट पर बैठी थी. मैं उसकी तरफ बढ़ा. उस सपोर्ट तक पहुँचने से पहले मैंने देखा कि औरत में रुमान भर आया है. औरत बैठी थी. उसने पाने पाँव लम्बे किये हुए थे. वह मुझे पास न आने के संकेत की तरह ख़ुद को मुझसे दूर कर रही थी. असल में वह दूसरी तरफ झुक गयी थी. मैंने इसको नज़र अंदाज़ किया. मैं उसके करीब पहुंचा. एक छुअन को दो तीन बार दोहराया.  मैंने अपना सर उसकी दायीं जांघ पर रख दिया. आँखें बंद कर ली. 

अचानक औरत उन चार लोगों के साथ उसी रास्ते वापस जाती हुई दिखी. जिस रास्ते से मैं इस क्लब में आया था. औरत उनसे कह रही थी कि मैं इस बात की शिकायत करुँगी. मुझे लगा कि वह अपने पार्टनर के बारे में कह रही है. औरत और वे लोग बाहर चले गए तब वह नौजवान अचानक मेरे पास से गुज़रा. उसने मुझे कहा- "आपने ये क्या किया?"

नौजवान इतना कहकर खो गया. औरत का पार्टनर उस बड़ी बिल्डिंग के एक रास्ते पश्चिम की और जाता दिखाई दिया. उसकी बायीं जेब से एक लम्बी पिस्तौल झांक रही थी. उसका रंग चमकीला था. जैसे वह चाँदी से बनी है. वह आदमी अचानक पलटा. इसके पलटने के साथ मुझे ये अहसास हुआ कि वह मुझे खोज रहा है. शायद वह गोली चलाएगा. मैं दीवार के एक तरफ छिप गया. 

सहसा लगा कि वह आदमी मुझे खोजते हुए लुका छिपी की तरह दीवार के सहारे चलता हुआ मुझे देख लेना चाहता है. मैं गिव अप के हाल में पहुंच गया था. मैंने सोचा कि इस आदमी के साथ इस खेल में हार जाऊँगा. 

इसी भय में स्वप्न टूट गया.
* * *

दिन इतने तनहा है कि किसी आवाज़ में कोई रुमान नहीं आता. असल में मुझ तक मेरी या किसी की आवाज़ ही नहीं आती. 

June 30, 2017

चुड़ैल तू ही सहारा है

रेगिस्तान में चुड़ैलों के कहर का मौसम है. वे चुपके से आती हैं. औरतों की चोटी काट देती हैं. इसके बाद पेट या हाथ पर त्रिशूल जैसा ज़ख्म बनाती हैं और गायब हो जाती हैं.

सिलसिला कुछ महीने भर पहले आरम्भ हुआ है. बीकानेर के नोखा के पास एक गाँव में चोटी काटने की घटना हुई. राष्ट्रीय स्तर के एक टीवी चैनल ने इस घटना को कवर किया. पीड़ित और परिवार वालों के इंटरव्यू रिकॉर्ड किये. कटी हुई चोटी दिखाई. बदन पर बनाया गया निशान दिखाया. गाँव के बाशिंदों की प्रतिक्रिया दर्ज की. पुलिस वालों के मत लिए. इसके बाद इसे एक कोरा अंध विश्वास कहा. घटना के असत्य होने का लेबल लगाया. टीवी पर आधा घंटे का मनोरंजन करने के बाद इस तरह सोशल मिडिया के जरिये फैल रही अफवाह को ध्वस्त कर दिया.

इसके बाद इस तरह की घटनाओं का सिलसिला चल पड़ा. बीकानेर के बाद जोधपुर जिले की कुछ तहसीलों में घटनाएँ हुईं. जोधपुर से ये सिलसिला बाड़मेर तक आ पहुंचा. सभी जगहों पर एक साथ पांच-सात स्त्रियों के साथ ऐसी घटनाएँ हुईं. उनकी कटी हुई चोटी का साइज़ और काटने का तरीका एक सा सामने आया. शरीर पर बनने वाले निशानों की साइज़ अलग थी मगर पैटर्न एक ही था.

बाड़मेर के महाबार गाँव में तीन औरतों के साथ एक साथ ऐसा हुआ. ये समाचार शहर और जिले भर में तुरंत फैल गया. इसे कुछ समाचार चैनल के संवाददाताओं ने आगे राज्य स्तर और राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया. समाचार ने एक भय मिश्रित कौतुक जगाया लोग अस्पताल की ओर भागे. उपचार के लिए भर्ती की गयी इन पीड़ित महिलाओं को देखने पुलिस-प्रशासन के अधिकारी और जन प्रतिनिधि पहुंचे.

चुड़ैल की शिकार सभी महिलायें गहरे सदमें में थी. सदमें की वजह चोटी काटने के बाद आने वाला संकट था. ज़ुबानी, सोशल और अन्य माध्यमों में ये प्रचारित है कि जिस महिला के साथ इस तरह का हादसा पेश आता है, उसकी तीसरे रोज़ मौत हो जाती है.

परसों रात कोई एक बजा होगा कि लोहे के चद्दर से बने दरवाज़ा पीटने के शोर और लाठियों के ज़मीन पर पटकने के शोरगुल से आँख खुली. मैं किसी बुरे स्वप्न में था. शोर सुनकर मैं तेज़ी से चारपाई से उठा. नींद में ही तेज़ कदम रेलिंग के उस छोर पर पहुँच गया, जिस तरफ से आवाज़ें आ रही थी. मोहल्ले भर के लोग जाग गए थे. ज्यादातर छतों पर ही सो रहे थे बाकी छत पर चले आये. शोरगुल पांच सात मिनट चला और उसके बाद लोगों के ऊँचे स्वर में बतियाने की आवाजें आने लगी. कहीं-कहीं आवाज़ में हलकी हंसी के साथ थोड़ा उपहास भी था.

मैं चौंका की इस तरह नींद में रेलिंग तक चले आना खतरनाक था. मुझे हड़बड़ी में जागते ही ऐसा न करना चाहिए था. तीसरी मंजिल से अगर गिरता तो चुड़ैल मेरी चोटी काटने की जगह हाथ-पाँव तो तोड़ ही देती. या चुड़ैल को कहानियां सुनना प्रिय होता और वह एक लेखक को ख़रगोश या चूहा बनाकर अपने साथ ही ले जाती.

पड़ोस की तीसरी गली में शोरगुल थम गया था. छतों पर खड़े लोग सामान्य हो रहे थे. मैं वापस चारपाई पर लेट गया. चुड़ैल की वापसी हो चुकी थी. मोहल्ले में घंटे भर बाद सन्नाटा छा गया था.

मुझे हलकी नींद आई और मैं भी चौंक पड़ा. अपना सर ऊपर किया और देखने लगा कि छत पर कोई है तो नहीं. सीढियों के पीछे कोई छुपा तो नहीं है. कहीं ऐसा तो नहीं कि चुड़ैल चारपाई के नीचे ही रेंग रही हो. मुझे ख़याल आया कि चुड़ैलों को शराब पीनी चाहिए या सिगरेट. इससे उनकी उपस्थिति का पता चल सकता है. एल्कोहल की महक या जलती हुई चिंगारी देख कर पहचाना जा सकता है. लेकिन जिस तरह मनुष्य समाज भले लोगों से भरा है. जो शराब और सिगरेट से दूर रहते हैं. उसी तरह संभव है कि चुड़ैल समाज भी सभ्य चुड़ैलों से भरा हों. ऐसे ख़यालों के बीच मुझे नींद आ गयी थी.

सुबह मालूम हुआ कि भूराराम के घर पर सो रही उसकी बच्ची चिल्लाते हुए जगी. उसने कहा कि चुड़ैल आ गयी है. वह मेरे बाल काटने ही वाली थी कि मेरी आँख खुल गयी. मेरे जागते ही वह कहीं छुप गयी है. परिजनों ने दरवाज़ा पीटना और शोर मचाना शुरू किया. लड़की की नींद उड़ चुकी थी. कुछ जागरूक नौजवान गली भर में डंडा बजाते हुए घूमे कि देखो चुड़ैल डरकर भाग चुकी है.

जिला अस्पताल में उपचार को आई एक महिला को डॉक्टर ने दो-चार थप्पड़ लगा दिए. डॉ साहेब जाने किस भोपे, तांत्रिक या झाड़ागर से एमबीबीएस करके आये थे. उन्होंने विधिवत अगरबत्ती जलाई और हाथ उठाया. आस पास उपस्थित लोगों ने इसका विडिओ बनाया. आज के अख़बार में ख़बर है कि उन डॉ साहेब को सेवा से निलम्बित कर दिया गया. जयपुर के बड़े भोपों ने उनको हाजरी देने अपने पास बुला लिया है.

महाबार मेरा प्रिय गाँव है. लेकिन बाड़मेर शहर की सीमा से लगा महाबार गाँव महज एक गाँव नहीं है. ये एक अघोषित राष्ट्र है और इसका संविधान अलिखित है. यहाँ की अनूठी और विरल जीवन शैली से रोचक तथ्य सामने आते रहते हैं. कभी महाबार से कच्ची शराब की आपूर्ति हुआ करती थी. कभी चोरी गए माल को महाबार और आगे के गांवों के धोरों से बरामद किया जाता था. कभी सिलसिले से लोग अकाल मृत्यु को प्राप्त होते थे. कभी संस्कृति एवं पर्यटन को बढ़ावा देने को महाबार के धोरों पर जमूरे इक्कठे हुआ करते थे. सरकारी लवाजमा आता. बेरिकेडिंग होती. शहर भर के लोग आते. नाच गाना होता. कभी मुम्बैया सिने संसार के गवैये आते.

मुझे कोई आश्चर्य न हुआ कि बाड़मेर में चुड़ैल का प्रकोप इस गाँव से शुरू हुआ. गाँव में चर्चा थी कि सत्तर-अस्सी साधुओं का एक दल आया हुआ है. वे तीन चार लोगों के समूह में बंटकर घूमते हैं. वे इस तरह की घटनाओं के लिए ज़िम्मेदार है. वे भिक्षा के लिए घर घर जाते हैं. जो कोई अन्न देता है. उसका कुछ नहीं होता. जिस परिवार ने दस बीस रुपये दिए थे. उनके घरों में ही चोटी कटने की घटनाएँ हुई.

मैं जब दस बारह साल का था तब पिताजी ने लुहारों के बास में एक कच्चा घर बनाया था. वह घर लुहारों के घरों से ज्यादा विलासी दीखता था. कि उसकी छत भी थी. लुहारों के पास घास फूस की छत वाले पड़वे थे. उनके पास आग की छोटी भट्टियाँ थीं. वे खेती बाड़ी में काम आने वाले औजार बनाते थे. साथ ही घर के लिए ज़रूरी चीज़ों का निर्माण भी करते थे. ये गाडोलिया लुहार नेहरू जी के आदेश से बसाए गए थे. इसलिए मोहल्ले का नाम नेहरू नगर रखा गया था.

एक दोपहर हल्ला हुआ कि आग लग गयी है. मैं भी भागा. मैंने देखा कि पड़ोस के एक झोंपड़े में आग लगी है. आग घास फूस की छत वाली चोटी में लगी थी. उसे तुरंत बुझा दिया गया. इसके बाद ये सिलसिला चल पड़ा कि हर दिन किसी न किसी झोंपड़े में आग लगती. इस आग से लपटें उठती. इसे तुरंत काबू कर लिया जाता. किसी भी प्रकार की हानि नहीं होती. इस जादुई आग के पीछे कहा जाने लगा कि एक लुहारण किसान बोर्डिंग के आगे सामान बेच रही थी. वहां कोई साधू चिमटा खरीदने आया. ग्राहक और दुकानदार के बीच अप्रिय संवाद हुआ. दुकानदार को साधू ने श्राप दिया कि जिस तरह तुमको तपना पड़ता है उसी तरह अब जलते भी रहना. आखिरकार इस श्राप से बाहर आने को बाबा रामदेव से विनती की गयी. उनकी कृपा से आग लगनी बंद हो गयी. बाबा रामदेव ने साधू के श्राप को डीएक्टिवेट कर दिया. उनके इस उपकार के बदले एक मन्दिर का निर्माण किया गया. बाबा रामदेव के ये मंदिर अब भी मोहल्ले में उपस्थित है लेकिन एक निजी संपत्ति हो गया है.

कुछ साल बाद मैंने सुना कि कोई प्रेतात्मा आ गयी है. वह क़स्बों में लोगों के घरों के बाहर दरवाज़े पर लाल स्याही की चौकड़ी बनाकर चली जाती है. जिस घर के दरवाज़े पर चौकड़ी बनती है. उसके किसी सदस्य की मृत्यु हो जाती है. लोग भय से भर गए थे. वे चौकड़ियाँ किसने बनायीं और बाद में उनका क्या हुआ याद नहीं. मगर अब सोचता हूँ. जिस तरह ये चोटी काटने वाली घटनाएँ याद के किसी कोने में दब जाएँगी वैसा ही कुछ उनके साथ भी हुआ होगा.

आपने मॉस साय्कोजेनिक इलनेस के बारे में सुना है? इसे समाज की सामूहिक बीमारी भी कहा जाता है. ये बहुत जटिल है. इसके अनेक रूप हो सकते हैं. इसके फैलने की गति अविश्वसनीय हो सकती है. किसी समूह या स्थान के लोग एक साथ इस बीमारी की चपेट में आते हैं. हम हर तरह की छानबीन करते हैं. तथ्य जुटाते हैं. जो कुछ भी जाना जा सकता है हम जानते हैं. लेकिन फिर भी हम कोई ठीक-ठीक कारण नहीं जान पाते हैं. हमको पहली नज़र में लगता है कि मरीजों द्वारा की जाने वाली हरकतें लगभग एक सी हैं. उनके ख़ुद के द्वारा किया जाना संभव है. किन्तु तर्क और सबूतों से आगे इन बीमारों की बढती तादाद हमको भ्रमित करने लगती है. हम तुरंत अपने ज्ञान को एक तरफ रखकर अलौकिक शक्तियों के संसार की बातों की तरफ अपना ध्यान लगा देते हैं.

इंग्लेंड के मनोविज्ञानी साइमन वेस्सेली कहते हैं कि सामूहिक उद्विग्नता माने इज़्तराब माने एंजायटी बचपन से ही हमारे भीतर घर कर लेती है. हम अपनी कल्पना शक्ति से भयावह स्थितियों के दृश्य बुनने लगते हैं. ये सामूहिक उद्विग्नता किसी भी क्षेत्र, उम्र के लोगों में आ सकती है. नाचते हुए कपड़े उतार देना. नाचते हुए हंसना. भीड़ में कोई डरावना दृश्य बनाना, करतब करना.

सोलहवीं शताब्दी में यूरोप में नाचना एक मेनिया हो गया था.

युवा से अधेड़ होने की उम्र की ओर बढती औरतें इस सामाजिक हिस्टीरिया का सर्वाधिक शिकार होती हैं. अपने बाल खोल लेना. कपड़े फेंक देना. हुमक हुमक कर बेतहाशा नाचना. लगातार चिल्लाना. राग निकाल कर रुदन करना. लगातार गोल गोल झूमते जाना. ऐसी क्रियाएं अनवरत दुनिया के हर कोने में होती हैं. ज्यादातर ऐसा करने वाली औरतें होती हैं. कहीं कहीं पुरुष भी ऐसा करते हैं. वे गालियाँ देते हैं. अलग मोटी, भारी या बारीक आवाजें निकालते हैं. धमकियाँ देते हैं. हमला करने पर उतारू हो जाते हैं. ये व्यक्तिगत हिस्टीरिया है. यही बातें सिलसिले से अनेक घरों में होने लगे तो इसे मॉस हिस्टीरिया कहा जाता है.

असल में हमारा अकेलापन, असंतोष, बेचैनी और घुटन इन क्रियाओं के मूल में है.

रेगिस्तान में ही नहीं वरन हर जगह औरतों के पास अपना कुछ नहीं है. वे किसी एक पुरुष के अधीन हैं. ऐसा पुरुष जो उसे अपनी प्रोपर्टी के रूप में देखता, समझता और परोटता है. दूसरे पुरुष इसी समझ के पहरेदार बने रहते हैं. अपना घर छोड़कर दूसरे घर में बसने वाली औरत से धीरे से सब सुख छूट जाते हैं. वह एक ऐसे परिवार के सुखों का कन्धा बनती है, जिनमें उसका योगदान शून्य गिना जाता है. घर की चारदीवारी में क़ैद जीवन. चौबीस घंटे की नौकरी. झिड़की, पहरे और उलाहनों से भरे दिन रात. ऐसे में जीवन कितना कठिन हो जाता है ये समझना उस आदमी के बस की बात नहीं है. जो आदमी औरत का मालिक कहा जाता है.

मैं मनोविज्ञान का विद्यार्थी नहीं हूँ. मुझे जादू भी नहीं आता है. लेकिन इतना ज़रूर लगता है कि ऐसे में सोशल हिस्टीरिया ही इकलौता सहारा है. कि हमारी तरफ भी देखो.

ओ वीर बहादुर आदमियों 
औरतों की ये कटी हुई चोटियाँ 
तुम किसी मैडल की तरह 
अपने साफे-टोपी में क्यों नहीं टांग लेते?

के सी

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Kishore Choudhary is a poet and fiction writer from Barmer (Rajasthan). His writing career took a formal leap from his personal journals to make him a hugely popular blogger on two of his blogs- Kahaniyan and Hathkadh.

Having spent most of his formative years in the desert, the life there is his favourite canvas to contextualise his poetry and stories. His followers from across the world vouch for his realistic and authentic portrayal of the desert life and its typical dilemmas, fused beautifully and almost effortlessly with some stunning images of the desert and its folklore.

Kishore in a way pioneered the incorporation of pre-publishing interactions and feedback with his readers on his blogs and across social media platforms in his final works. His style is known for its lucid and unexampled metaphors that he exquisitely uses to express universal feelings like love, loneliness, hope, pain, longing and fantasy. 

His first collection of stories Chaurahe Par Seedhiyan (2012)was such a thumping bestseller that the first issue was sold out within 50 days of its launch.All the stories skilfully bring the rich and exotic background of the desert come alive and make the reader delve deeper into the layers of human emotions.This much sought after collection raised the bar for all contemporary Hindi works of short fiction and brought in a fresh change in the existing status quo for Hindi short stories. 

The second collection titled Dhoop Ke Aaiyne Mein(2013)had an array of short stories that looked at life through a multi-dimensional prism, lending each one of them a distinctive charm. Kishore being a poet first, his stories are more like poetic fiction. Having a great affinity to the stream of consciousness novels by English literary greats like James Joyce and Virginia Woolf his stories defy the conventional rules of a definitive beginning, middle and end. 

Kishore’s first publication was a collection of poetry Baatein Bewajah, an alluring and bewitching series of short poems which capture the vast expanse of human emotions and have images that have a rare haunting quality.

Kishore is a Radio Broadcaster by profession and has a special fondness for classical & folk music. Articles about him and his interviews are available across many major newspapers and websites. Kishore certainly is the Avant-garde flavour in contemporary Hindi writing and his ever expanding avid readership eagerly waits for his next chartbuster.

Kishore's latest is another collection called "Jaadu Bhari Ladki". This collection has his same imitable style of stories but the contexts and places are beyond the desert as well. 
His deep understanding of the complexity of modern relationships and how they play out in our minds, homes and workplaces makes it a very unique almost post-modern work in Hindi Fiction.

http://www.goodreads.com/author/show/7361739.Kishore_Chaudhary

हेंगओवर सिलसिला

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हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने या खूबसूरत स्त्री को इरादतन चूमने जितना ही अवैध है.

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