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घसियारा मन

क्या हम गुज़र चुकी बारिश को आवाज़ देते हैं।
या नई बारिशों का इंतज़ार करते हैं, ज़रा कहो?

इस समय अचानक बादल बरसने लगे हैं। बोरोसिल के ग्लास में भरी बकार्डी की रम में बारिश की बूंदें गिर रही है मगर मन जाने कहाँ खोया है? किसे होना था और कौन नहीं है, कुछ समझ नहीं आता।

वैसे नासमझी एक अच्छी शै है।

घास की तरह
उग आते हैं बीते दिन
बैठे-चलते मन
घसियारा हो जाता है।
एक बस छोटी बात
लिखना चाहता है दिल
मगर बात के साथ
गुँथ जाते हैं मौसम।

मैं पहुंच जाता हूँ
कहीं का कहीं
और कहीं छूट जाता हूँ मैं।
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हरे पेचों को छूकर आती हवा

खिड़की के रास्ते गरम चुभन से भरी सीली हवा का झोंका आता है। बरसात कब की जा चुकी मगर यहाँ-वहाँ उग आये हरे पेचों से सीलापन हवा के साथ उड़ता रहता है।

एक बेहद हल्की ख़ुशबू आती है। जैसे कोई मन चटक कर खिल रहा हो।

बिल्ली मुझे देखती है। मैं उसे पूछता हूँ कि जिस तरह स्वप्न चटक कर खिलता है और मौसम में घुलकर अदृश्य हो जाता है, उसी तरह मन भी बह जाता होगा?

लघुत्तम मौन के बाद बिल्ली कूद कर खिड़की में बैठ जाती है। अगली छलांग में वह गायब हो जाती है। जैसे एक स्वप्न।

तेरी ओर तेरी ओर

सुरों की पेटी खोलने वाला क्या सुरों को ठीक रास्ता बता सकता है? क्या कहीं बीच में ही झर जाते हैं सुर जैसे आकाश को ताकती लता के फूल ज़मीन पर गिरते रहते हैं।

हम स्वप्न में किसी फूल को देखते हैं तब क्या फूल को भी ऐसा कोई स्वप्न आता है?

स्वप्न अलोप होता हुआ एक रेखाचित्र है। कभी वह लिखित संदेशे नहीं छोड़ता।

मगर क्यों?

हवा का झोंका फिर आता है।

एक गीत का मिसरा उलझकर सांसों में टँग जाता हैं। पीठ को पीछे की ओर किये खिड़की से बाहर देखते जाना कि एक बार बारिश कितनी हरियाली फैला देती है।

उसने क्या पहना था? एक गहरा रंग। रंग के साथ कोई हल्की किनारी…

बाक़ी कामों से भरी जिंदगी

ज़िन्दगी में काम पेंडिंग पड़े रहें इससे अच्छी बात सिर्फ एक ही होती है कि उन कामों को भुला ही दिया जाए। काम पूरे हो जाएंगे तो क्या करेंगे? लेकिन मन कई बार होता है कि कुछ काम पूरे कर लिए जाएं। उन कामों में लगते ही कुछ रोज़, कुछ घण्टे या कुछ ही देर में मन उचट जाता है।

हर काम के होने का कोई मतलब होता है। जैसे कुछ काम पेंडिंग होने को ही होते हैं। कुछ कभी न होने के लिए होते हैं।

कुछ किया, कुछ न किया। ज़िन्दगी चलती रही। फेसबुक को फोन से नहीं हटाया, मन से हटा दिया। क्या हमारे समय का इतना सा मोल रह गया है कि स्क्रॉल करें, अपडेट करने को सोचें या फिर इनबॉक्स किये जाएं। असल में फेसबुक ज़िन्दगी की एक बहुत मामूली सी बात है। ज़िन्दगी का विस्तार इतना है कि हम अचरज भरे उचक सकते हैं, चौंक कर ठहर सकते हैं या फिर कुछ न करने के परमानंद को पा सकते हैं।

अब बस मेल पर बात कर लेना ठीक लगता है। और कहने सुनने लायक बात हो तो फोन पर कर लेता हूँ। मेल का पता yourkc@yahoo.com हैं। यहीं से सब बातें हो जाती हैं।

आज लोक संगीत रिकॉर्ड कर रहा था। मुल्तान ख़ाँ साहब ने नौजवानी भरा गीत गाया। मैं उनको कहने लगा कि आपको कौन कहेगा कि …

वो जो दिल ने सोचा

घर में एक पेड़ है। हर सुबह एक चिड़िया आती है। वह सबसे ऊंची शाख पर झूलती है। शाख लचकती है। चिड़िया इस लचक के साथ गाना गाती है। मैं दोनों को देखता हूँ। 
अचानक मोगरे का नया फूल मुझसे पूछता है। "तुम क्या देख रहे हो?" मैं अचरज से भरा हुआ मोगरे के फूल से पूछता हूँ- "तुमको कैसे पता कि मैं कुछ देख रहा हूँ?" 
"तो क्या कर रहे हो?" 
"मैं सुन रहा हूँ" 
"क्या चिड़िया का गाना?" 
"नहीं उसकी बातें" 
"अच्छा तुमको कैसे समझ आता है कि वह गा नहीं रही।"
"मुझे नहीं समझ आता मगर मेरे भीतर एक चिड़िया है वह समझती है" 
मोगरे के नए फूल ने अपनी ठोडी पर एक पत्ती रखी और कहा- "तो बताओ चिड़िया ने क्या कहा?"
मैने कहा- "चिड़िया पेड़ से कहती है कि तुम हर सुबह बड़ा होने का स्वप्न लिए जागते हो।" 
मोगरे का फूल कुछ सोचने लगा तभी एक बुलबुल मुझसे बोली- "तुम उसकी बातें नहीं समझते हो" 
मैंने पूछा- "तुमको कैसे पता?" 
"इसलिए कि मैंने सुना था चिड़िया रोज़ उससे कहती है कि तुम पेड़ नहीं हो। तुम एक झूला हो" 
मोगरे का …

सपने में गश्त पर प्रेम

होता तो कितना अच्छा होता कि हम रेगिस्तान को बुगची में भरकर अपने साथ बड़े शहर तक ले जा पाते पर ये भी अच्छा है कि ऐसा नहीं हुआ वरना घर लौटने की चाह खत्म हो जाती. 
अक्सर मैं सोचने लगता हूँ कि
क्या इस बात पर विश्वास कर लूँ?

कि जो बोया था वही काट रहा हूँ.
* * *

मैं बहुत देर तक सोचकर
याद नहीं कर पाता कि मैंने किया क्या था?

कैसे फूटा प्रेम का बीज
कैसे उग आई उस पर शाखाएं
कैसे खिले दो बार फूल
कैसे वह सूख गया अचानक?
* * *

कभी मुझे लगता है
कि मैं एक प्रेम का बिरवा हूँ
जो पेड़ होता जा रहा है.

कभी लगता है
कि मैं लकड़हारा हूँ और पेड़ गिरा रहा हूँ.
मुझे ऐसा क्यों नहीं लगता?

कि मैं एक वनबिलाव हूँ
और पाँव लटकाए, पेड़ की शाख पर सो रहा हूँ.
* * *

प्रेम एक फूल ही क्यों हुआ?
कोमल, हल्का, नम, भीना और मादक.

प्रेम एक छंगा हुआ पेड़ भी तो हो सकता था
तक लेता मौसमों की राह और कर लेता सारे इंतज़ार पूरे.
* * *

जब हम बीज बोते हैं
तब एक बड़े पेड़ की कल्पना करते हैं.

प्रेम के समय हमारी कल्पना को क्या हो जाता है?
* * *

प्रेम
उदास रातों में तनहा भटकता
एक काला बिलौटा है.

उसका स्वप्न एक पेड़ है
घनी पत्तियों से लदा, चुप खड़ा हुआ.

जैसे कोई मह…

तुम्हारी नियति

ये ज़रूरी नहीं है कि
काग़ज़ के फूल काग़ज़ से ही बने हों।

ताज़ा फूल थे। महकते, लुभाते फूल। गमले में रख दिए।
हवा ने या वक़्त ने उनकी नमी सोख ली। उन सूखे फूलों को देखकर लगता था कि वे काग़ज़ के फूल हैं।

अचानक हाथ सूखे फूलों के गुच्छे पर गया तो काग़ज़ की छुअन महसूस हुई। काग़ज़ सी आवाज़ आई। वे फूल अगर छांव में न रखे होते तो धूप में काग़ज़ की तरह जल सकते थे।

प्रेम भी एक दिन सूखा हुआ काग़ज़ फूल हो जाता है?

नहीं। तुमने कभी देखा है कि तितली, भँवरे, चिड़ियाँ किसी मुरझाए फूल के पास उदास बैठी है? नहीं न। तितलियां और पंछी जानते हैं कि फूलों का काग़ज़ हो जाना, प्रेम का स्मृति में ढल जाना नियति है। इसलिए नए फूल तक उड़ो।

तुम्हारी नियति एक नये क्षण की ओर चलते जाना।

फूलों का मौसम न था

फासलों की वजह काश उम्र ही हो. गहरे रंग वाले फूल ने धूप ज़्यादा सही। बारिशों का लम्बा इंतज़ार किया। उसने जाना कि इस पल जो पास खिला है, उसे नाज़ुकी से छू लो। ये पल किसी प्रतीक्षा के लिए नहीं है। एक हल्के रंग के फूल ने चटकते ही मादक गन्ध महसूस की। उस ख़ुशबू का ख़यालों में पीछा किया। सपनों की दुनिया गढ़ी। ऐसा होगा, वैसा होगा मगर दुनिया का हिसाब सही न था। फूल के पास आशाओं की गीली कूचियां थी जबकि समय के पास ऊब की उदास धूप थी। उम्र के फासले को कुतर कर एक दिन छोटा फूल बड़े फूल से सटकर बैठ गया। छोटे ने पूछा- “हमारा क्या होगा?” बड़े ने कहा- “तुमको दुख हो सकता है और मुझे शायद न हो” छोटे ने विस्मय किया- “ऐसा क्यों?” बड़े ने कहा- “उम्र की एक लकीर के उस पार पहुंच जाने पर तुमको ये समझ आएगा कि जीवन को न जियोगे तो भी बीत जाएगा।” छोटे फूल ने पूछा- “क्या तुमको कभी दुःख न हुआ?” बड़े ने कहा- “एक दिन सब छोटे ही होते हैं” छोटे ने खुले मुंह उसे देखा- “दुःख न होने का कोई रास्ता है?” बड़े फूल ने कहा- “नहीं। मगर किसी का होने की हिम्मत करना। होकर पछताना नहीं। ऊब जब उदास करने लगे वहाँ से कहीं और चले जाना” छोटे फूल ने शब्दो…