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कविता चाहे जैसी करें जगह का ध्यान रखें

मित्रो अभिवादन।  कार्यक्रम के मुख्यअतिथि का काम होता है कि वह अतिथि की तरह आए। मुख्यता से आयोजन में उपस्थित रहे। अंत में चाय भोजन आदि ग्रहण करके चला जाए। लेकिन मुझे कहा गया है कि मैं इस कवि सम्मेलन के अध्यक्ष महोदय के कविता पाठ और उद्बोधन से पूर्व बोलूँ।
डॉ तातेड़ सर ने अभी कहा कि आजकल सब लाइव हो जाता है। मुझे इस बात की गहरी चिंता रहती है। कोई भी व्यक्ति आपके कहे को, बातचीत को और आपकी उपस्थिती को अपने फोन में रेकॉर्ड कर सकता है वह उसे लाइव भी कर सकता है। हम किसी भी कार्यक्रम मे अपनी तैयारी और अध्ययन के बिना जाने के अभ्यस्त हैं। इसका एक कारण है कि अधिसंख्य आयोजन और बुलावे तात्कालिक होते हैं। आमंत्रण निजी सम्बन्धों के आधार पर दिये जाते हैं। ऐसे प्रेम भरे आमंत्रणों और आयोजनों में अक्सर मैं अनियोजित और असंगत बातें बोल जाता हूँ। मुझे अभी तक ये सीखना है कि संतुलित, सारगर्भित और विषय से संबन्धित बात कैसे कही जाये।
आज का विषय कवि सम्मेलन है तो इसके बार में कोई पूर्व तैयारी नहीं की जा सकती थी कि किस तरह कम शब्दों में अच्छी बात कही जा सके। लेकिन मुझे इस महविद्यालय में आना सदैव रोमांचित करता है।…
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हम जाने कहाँ चले गए

संसार है एक नदिया दुःख सुख दो किनारे हैं
स्टूडियो की ख़ुशबू आकाशवाणी के दरवाज़ों तक साथ चली आती है। सर्द सुबहों की हल्की धूप में बुझते अलाव के पास बैठे हुए लगता है कि टर्न टेबल पर ग्रामोफ़ोन रिकॉर्ड अभी घूम रहा है। निडल नोट्स को सस्वर पढ़ रही है। स्पीकर के अलावा रिकॉर्ड के पास से भी एक महीन आवाज़ आ रही है। वायलिन प्लेयर आंखें मूंदे हुए बजाए जा रहा है।
लेकिन ग्रामोफ़ोन रिकार्ड्स अब लाइब्रेरी की सीलन में चुप पड़े हैं। आधी नींद में उद्घोषणाएं करने वाले उदघोषक बूढ़े हो चले हैं। चाय ताज़ा है मगर उसका परमानंद खो चुका है। सुबह-सुबह के लतीफ़े सूखे पत्तों की तरह झड़ चुके हैं। हम बीती रात की कारगुज़ारियों पर न हंसते न उदास होते हैं। कम ओ बेश शक्ल वही है पर हम जाने कहाँ चले गए।

प्ले लिस्ट में बैठे वे ही पुराने गाने अब नए अर्थों में पीछा कर रह रहे हैं।

हिलारिए कुंभटिये अकेसिया सेनेगल

रेगिस्तान में सूखी सब्ज़ियाँ हर घर में मिल जाती है। हालांकि अब यातायात के साधन बढ़ने से हरी सब्ज़ियाँ आसानी से मिलने लगी है। इन हरी सब्ज़ियों के कारण सूखी सब्ज़ियों के प्रति लगाव कम हुआ है। अब भी काफी घरों में सांगरी, केर, कुम्भटिये, काचर आदि को पानी में उबालकर सुखा लिया जाता है। ये सूखी सब्ज़ियाँ साल भर कभी भी काम ली जाती हैं।
ये हिलारे हैं। इनको कुछ लोग कुम्भटिये कहते हैं। रेगिस्तान में पाए जाने वाले पेड़ कुंभट के बीज हैं। कुंभट के फलियां लगती हैं। उनमें से ये बीज निकलते हैं। राजस्थान की प्रसिद्द पंचकूटा की सब्ज़ी में अगर हिलारिये नहीं है तो सब्ज़ी अधूरी है।
कुंभट एक कम पानी की आवश्यकता वाला पेड़ है। इसे अंग्रेजी में अकेसिया सेनेगल कहा जाता है। कुंभट के पेड़ के तने से गोंद निकलता है। इस गोंद का उत्पादन बढ़ाने के लिए जोधपुर स्थित काजरी में एक इंजेक्शन तैयार किया गया है। इस इंजेक्शन से प्राप्त गोंद की गुणवत्ता भी स्तरीय है। इस इंजेक्शन के पेड़ पर साइड इफेक्ट भी होते हैं, ऐसा कृषकों का कहना है।
दो दिन पहले गोंद बेचने के लिए गांव से एक लड़का आया था।
"भाई के जातियो है?"  "सारण"  &…

यूनान का गरीब ब्राह्मण आर्किमिडीज़

#भंगभपंग - 5
हनु भा जोशी ने श्यामपट्ट पर लिखा उत्प्लावन बल।
"किसी भी क्रिया के परिणाम से उत्पन्न प्रतिक्रिया से प्राप्त परिणाम को उत्प्लावन बल कहते हैं।" एक सांस लेकर कहा- "क्रिया और प्रतिक्रिया का अर्थ है कि कुकरिये को भाटा मारना एक क्रिया है और कुकरिए का पूंछ दबा कर भाग जाना प्रतिक्रिया"
हनु भाय्या ने आगे बताया-"क्रिया और प्रतिक्रिया अलग-अलग पदार्थों पर अलग-अलग होती है। कैसे होती है, कोई बता सकता है?"
सबसे पिछली पंक्ति में बैठे लड़के ने ऊंची आवाज़ में कहा- "सर कुकरिया लोंठा हो तो पूंछ दबाने की जगह बाका भी भर सकता है"
"शाबाश। अब आपको समझ आ गया कि क्रिया और प्रतिक्रिया में केवल इतना फर्क है कि पहले भाटा मारा जाना क्रिया है। उसके जवाब में पूँछ दबाना या बाका भर लेना प्रतिक्रिया है।"
हनु भाय्या ने कहा- "उत्प्लावन बल का सिद्धान्त है कि क्रिया के कर्ता का जितना भार होता है, वह उस भार के बराबर अगले को विस्थापित कर देता है।"
"माड़सा जैसे भाटा जित्ते ज़ोर से भाया उतना..."
"ज़्यादा लपर चपर नहीं। जितना बताऊं समझो, जितना पूछू…

काळी भींत गेमरिंग रो तोड़

#भंगभपंग - 4

बाड़मेर स्टेडियम में पाँच छह सौ दर्शकों की हुटिंग चल रही थी। खेल का पहला हाफ पूरा हो गया था। फुटबाल को अपने पाँव के नीचे दबाये हुये नबी ने मांगिलाल से कहा- "ईए गेमरे दुख दीयो है। डीकरो कालो पाडो" इतना सुनते ही गेमर सिंह ने एक बेंत बताई और कहा- "गेमरो काळी भींत है, होएं माथो फोड़ो।" लक्ष्मी नगर में रहने वाले पुलिस कांस्टेबल गेमर सिंह फुल बैक थे और फुल टेंशन भी थे। दुनिया में बाड़मेर ही इकलौता क़स्बा था जहां के फुटबाल प्रेमियों में सेंटर फॉरवर्ड से अधिक लोकप्रिय कोई फुल बैक खिलाड़ी था।
क़स्बे में फुटबाल खेलने वालों की बड़ी पूछ थी। मांगिलाल, कुन्दन, नबी, रवि जैसे साधारण अदने लोग सड़क पर निकल जाते तो युवाओं का एक कारवां उनको घर तक पहुंचा कर आता था।
हर मैदान के खिलाड़ी खेल समाप्ति पर दूध पीने रेलवे स्टेशन के सामने के चाय ढाबों पर आया करते। खेरू की दुकान पर इन खिलाड़ियों के लिए दूध के स्पोंसर तक आते थे। इन काले कलूटे, बिखरे बालों वाले, घिसे स्पाइक्स शू पहनने वालों के लिए प्यार की एक बंदनवार लगी रहती थी। ये खेरू की चाय दुकान और लवली टी स्टाल को जोड़ती थी। इसी बंदनवार क…

हवाई जहाज के आविष्कार का रहस्य

#भंगभपंग - 3
बाड़मेर क़स्बे में आयुर्वेदिक औषधियाँ वैद्य आदरणीय शास्त्री जी के यहाँ मिलती थी। शास्त्री जी के औषधालय में मिलने वाली औषधियाँ के मुकाबले उपयोग में सर्वाधिक और निर्विरोध विजया औषधि ही आती थी। वैद्य जी किसी भी प्रकार के नशे के विरुद्ध थे। मुख्यतः आयुर्वेदिक औषधि कहकर भांग का सेवन करने वाले लोग उनको असह्य थे।
बाड़मेर में जिस गली ने अच्छा नाम कमाया, वह वैद्य जी की गली है। इस गली को प्रसिद्ध करने में स्त्रियों की बड़ी भूमिका है। इसी गली में गोटे और चूड़ी की दुकाने रही हैं। स्त्रियों के लिए ओढ़ने के गोटे, साड़ी के फाल, पिको और चूड़ियों का क्या महत्व है ये कोई भी व्यक्ति शादी करके जान सकता है।
हालांकि फाल, पिको, गोटे आदि का काम क़स्बे के हर मोहल्ले में होता रहा है लेकिन वैद्य जी सद्गुणों के प्रताप से इसी गली की दुकानें ही स्त्रियों में लोकप्रिय रही हैं। दस फीट की गली में दोनों तरफ दुकानें हैं इसलिए भीड़ ही अधिक रहती है। स्त्रियों के साथ आने वाला प्रत्येक पुरुष इस गली के नाम से परिचित होने लगा और कम समय में ही वैद्य जी की गली बाड़मेर में एक जानी पहचानी गली हो गयी।
वैद्य जी सर पर जोधपुरी चु…

अजवाइन

अजवाइन एक औषधीय पादप वनस्पति है। मेरा बचपन इसकी गंध से भरा रहा है। मैं कई बार इसकी गंध से घबरा जाता था। खासकर स्त्रियों के कपड़ों से इसकी तीखी गन्ध आती थी। एक बार भूल से उनको छू लेने पर मैं बार-बार अपनी अंगुलियां सूंघता था। मुझे कभी उबकाई आने लगती थी। घर में भिन्न अवसरों पर अजवाइन की खोज होती उसे पीसा जाता था। हमारे घर में अब भी पत्थर की चाकी है। इसे घटी कहते हैं। माँ, मौसी या चाची इस पर कुछ न कुछ पीसते रहते हैं। लेकिन जब कभी इस पर ये मसाला पीस लिया जाता उसके बाद मैं उस कमरे में नहीं जाता था जहां घटी रखी रहती थी।
अजवाइन असल में रामबाण औषध कहलाने की योग्यता रखता है। किसी भी प्रकार की बीमारी अथवा स्वस्थ होने पर इसका नियमित सेवन हमारे स्वास्थ्य की बेहतरी में साथ देता है। उदर से संबंधित सभी रोगों का नाश करता है। इसके बीज माने जिसे हम अजवाइन कहते हैं उसके अलावा इसके पुष्प बहुत उपयोगी होते हैं। वे सुंदर नीले-सफ़ेद या हल्के बैंगनी-सफेद दिखते हैं। उन सूखे पुष्पों से भी अनेक औषधियां बनाई जाती हैं। लेकिन रेगिस्तान के लोगों के ग्राम्य जीवन में अजवाइन बिना लाभ हानि सोचे शामिल रहा है।
आजकल घरों में…