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और मुमकिन है तेरा ज़िक्र कर दे ख़ुदा भी

चार पांच दिन बड़े बेकार गुज़रे हैं. मुंह छालों से भर गया. मैं अपने चारागर अमर लाल जी को याद करता रहा. अमर जी बाड़मेर के पहले प्रेस फ़ोटोग्राफ़र हैं. आजकल कहाँ है पता नहीं. उनको लम्बे समय से देखा नहीं. ईश्वर करे जहाँ कहीं हों आराम से देसी सूंत रहे हो.
रात के नौ बज गए थे महफ़िल जमी हुई थी. दो तीन लोग सीधे बैठे थे, इतने ही लोग कुर्सी पर लटके हुए सांप की तरह थे. उनकी मुंडी टेबल के नीचे से ऊपर की और आती और ग्लास को मुंह लगाकर वापस नीचे चली जाती. सूचना और जनसम्पर्क विभाग में सहायक निदेशक प्रदीप चौधरी कॉलेज दिनों की अनाम प्रेमिका की याद में गीत गा रहे थे. अनाम प्रेमिका इसलिए कहना पड़ता है कि हमारी भाभी न हो सकी लड़की का नाम प्रदीप जी कोई चार पांच पेग के बाद लेते थे. उस वक़्त तक हम भी रसायन के प्रभाव में सूफी हो चुके होते. इसलिए अल्लाह मिया के सिवा कुछ याद न रहता.
चाँद आहें भरेगा फूल दिल थाम लेंगे. हुस्न की बात चली तो...
इतने में अमर लाल जी आ गए. कोई फोटो देने आये थे. प्रदीप जी का गीत रुक गया. "आओ अमर जी." प्रदीप जी ने अभिवादन किया. अभिवादन के जवाब में अमर जी ने कहा- "ये लिफाफा रख रहा …
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शब्द और रेखाओं से जनवाणी रचने वाला आदमी - रविकुमार स्वर्णकार

इससे पहले कि हमारे मुख़ालिफ़ीन सफ़्फ़ाकी से मुक़र्रर करें हमारे लिए सज़ा-ए-मौत
हम रूहों में तब्दील हो जाएंगे
००००० रवि कुमार
वह एक सच्चा आदमी था. मैंने कल शाम उसके न रहने की ख़बर पढ़ी. मैंने अपने दायें बाएं देखा कि क्या वह चला गया है? पाया कि वह मेरे आस पास है. लेकिन जो प्रियजन उसे देख पाते थे वे उसकी छुअन से वंचित हो गए हैं. अब उसकी बाँहों के घेरे बेटे और बेटी को केवल स्मृतियों में ही मिल पाएंगे. उसके भीगे होंठ एक याद बनकर रह गए हैं. साथियों के कन्धों पर रखा रहने वाला हाथ एक भरोसा भर रह गया है.
मन तो कहीं न जा सकेगा लेकिन छुअन चली गयी है.  * * *
अड़-अड़ के वाणी हुई, अडियल, चपल, कठोर। सपने सब बिखरन लगे, घात करी चितचोर॥ चित्त की बात निराली तुरुप बिन पत्ते खाली चेला चाल चल रहा गुरू अब हाथ मल रहा सुनो भाई गप्प-सुनो भाई सप्प।
नाटककार कवि और संस्कृतिकर्मी शिवराम का निधन दो हज़ार दस में हुआ. उनके निधन के कुछ एक साल बाद अड़ अड़ कर आती वाणी कोमा में चली गयी, चेला ने गुरु को गुड़ कर दिया और ख़ुद शक्कर हो गया. एक दूरदर्शी ने इतनी सच्ची गप कही कि ज़माने ने दांतों तले अंगुली दबा ली.
शिवराम अक्टूबर दो हज़ार दस…

कालू जी खत्री साकीन नेहरू नगर बाड़मेर

"बीपी रो की है? बे-तीन दिन सुई रह्यो. आराम करो. गरम होयोड़ी मशीन ठंडी होव्ते ही तेल फेंकणों अपने आप बंद करे. ऐ ईज है बीजो डॉक्टर होस्पिटल जाए खोटी होव्णों" - कालू जी खत्री, साकीन नेहरू नगर बाड़मेर.
पिताजी की पोस्टिंग जब रेलवे स्कूल में थी तब अमरी बाई जी भी वहीं पोस्टेड थी. कभी किसी स्कूल के काम से वे घर आई. उन्होंने मुझे देखकर पूछा- "माड़सा है? जा के अमरी बुआ आई" पिताजी आये और उन्होंने कहा- "आओ अमरी बाईजी" मैं अमरी बाई जी को स्कूल में देखता था लेकिन घर पर पहली बार देखा था. इसके बाद से हमारे पास उनके लिए उम्र भर का एक सम्बोधन आ गया, अमरी बुआ.
नेहरू नगर में स्टेडियम के पास नीलकंठ फैक्ट्री के नाम से एक कारखाना बना हुआ था. सालेचा परिवार के इस विशालकाय उपक्रम में बेंटोनाईट यानी मेट माने पीली चिकनी मिट्टी के ढेलों को पीसा जाता था. मोहल्ले की औरतें अपने बालों को चिकनी मिट्टी से धोने के लिए इसी कारखाने से मेट लाया करती थी. मेरी माँ ने भी कई बार मेरे बाल मेट से धोये थे. गर्मी के दिनों में चेहरे पर फुंसियाँ होते ही या सर में दाने पड़ने पर बच्चों को मेट के लेप से पोत क…

आदमी से बेहतर

के सीमेरी फेसबुक प्रोफ़ाइल है। ये बस इस काम आती है कि वहां से सुंदर चेहरे देख पाता हूँ। वहीं से मन के अपशिष्टों की कथाएँ सुनाई देती हैं। वहीं से देख पाता हूँ कि राष्ट्रवाद की जय करने वाले असल में राष्ट्रवादी होने से पहले जातिवादी हैं।
मैं अपने फेसबुक पेज पर मैं अपना मन लिखता हूँ मगर कभी-कभी दूसरों का मन देखने को चाहूँ तो अपनी प्रोफाइल पर चला जाता हूँ। आज श्री कृष्ण जन्माष्टमी है, ऐसा मुझे व्हाट्स एप पर मिले सन्देशों से पता चला। मुझे कृष्ण भक्त कवियों की याद आई। मैंने कुम्भनदास जी को याद करते हए एकपोस्ट लिख दी। ये मन की बात थी।
इस पोस्ट के साथ लगी तस्वीर में नन्हा बिलौटा मेरी ओर देख रहा है। हमारा रिश्ता ये है कि उसे समझ आया है कि वह मेरे पास रहेगा तो उसे खाना मिलेगा। वह हर शाम आता है। मैं अपना प्याला भरे बैठा होता हूँ तो वह प्याले को सूंघता है। उसे सूंघकर बुरा मुंह नहीं बनाता। मुझे उसकी इस सहृदयता पर प्रेम आता है। मैं उसे दूध का कटोरा भर देता हूँ।
लालची और स्वार्थी मनुष्यों से हटकर वह दूध स्वीकार लेने के बाद भी मेरे पास बैठा रहता है। वह हरदम चौकन्ना होने के हाव भाव लिए होता है। मैं उसे …

बहुत दूर चले जाना।

विरह के प्रेम में जो सुख है वह बाहों में बसे रहने से अधिक मीठा है। ये मीठी टीस दूर होने पर खिलती है। दूर होने पर बदन में शिथिलता आ जाती है। हृदय एक भरे हुए चड़स की तरह आहिस्ता हिलता है। हाथों की अंगुलियां प्रेम नाम लिखने में स्वयं को असमर्थ पाती है। आंखें सूने आकाश और धूसर धरती की रेख को देखती हुई सो जाती हैं।
इसी तरह आधी नींद और जाग में उसके बदन से उठते मादक वर्तुल अचानक हम पर गिर पड़ते हैं तो अधीर और व्याकुल होकर खालीपन के प्रेम तरल में डूब जाते हैं। मन उसके पास जाना चाहता है कि याद आता है असल चाहना तो दूर रहने से ही है। ये गहराई विरह की कुदाल से बनी है। ये धूल का ऊंचा वर्तुल बिछोह से बना है।
इसलिए दूर रहना ठीक है।
कृष्ण भक्त कवियों में कुम्भनदास कृष्ण प्रेम में विरह के कवि थे। एक बार बादशाह अकबर के बुलावे पर चले गए तो उम्र भर पछताते रहे। अकबर से उन्होंने कहा "संतन को कहाँ सीकरी सों काम, आवत जावत पहनिया टूटी बिसरी गयो हरिनाम" वे कुम्भनदास गोकुल के आस पास ही रहते थे लेकिन कृष्ण प्रेम में वहां कम ही जाते थे। उनको कृष्ण के यहां लिए चलने को आतुर लोग अक्सर निराश हो जाते कि कृष्ण…

कुछ बनाने का वहम

अब थकान ने हमारे भीतर स्थायी घर कर लिया है. हम इतना थक जाते हैं कि बैठकर आराम करने की बात से हमारा विश्वास उठ जाता है। हम खड़े हुए, चलते हुए, काम करते सोचते हैं कि ये सब क्या है? हम लम्बी सांस लेना भूल जाते हैं। हम अपने लिए चाय-कहवा बनाना याद नहीं रख पाते। हम मान लेते हैं कि अब कुछ ठीक न होगा। रात भर सोकर सुबह जागते हैं तो बदन में अधिक दर्द पाते हैं। आंखें बुझी-बुझी सी लगती हैं। बहुत देर बाद शरीर साथ देने लगता है। इसका एक कारण हो सकता है मस्तिष्क में भरा हुआ अटाला।
बिछड़े साथी, टूटे सम्बन्ध, कटु अनुभव, असहज स्थितियां, उपेक्षा के क्षण, अपमान के कारक और भी ऐसी सब स्मृतियां हम अपने मस्तिष्क में भरे रखते हैं। मस्तिष्क एक कूड़ेदान बना रहता है। उसमें से एक भी बात मिटाने के लिए अगर कोई हमसे कहे तो हम तुरंत प्रतिक्रिया करते हैं। "अरे उसे कैसे भुला दूँ। तुम्हारे साथ बीता होता तो तुमको समझ आता। भाई किसी का विश्वास टूटना कैसा होता है. खरी कमाई का लुट जाना क्या होता है, अपना सौंपा हुआ जीवन व्यर्थ जाने की कीमत क्या होती है. काश तुम समझ सकते" इस तरह हम अपने जीवन की सबसे बुरी, अनुपयोगी और मन…

मेटाथिसियो फोबिया - जड़प्रिय मन

गाड़ी के चलते ही आपका जी ख़राब होने लगता है उल्टियाँ आने लगती हैं? तो कोई खास बात नहीं है. आप हठी व्यक्ति हैं. नई चीज़ों, लोगों, सम्बन्धों, जगहों से डरते हैं. आपको लगता है कि जो जमा जमाया है उसमें कोई बदलाव नहीं आना चाहिए. मोशन सिकनेस केवल चलते वाहन से होने समस्या नहीं है. ये जड़ चीज़ों के प्रति भी होती है.
मेरी माँ ने जो चीज़ जहाँ रख दी है वहां से कोई हिला दे तो वे महाविस्फोट के नज़दीक पहुँच जाती हैं. घर में कभी भी धमाका हो सकता है. अधिकतर धमाका पेड़ बचाओ बाबा वाले मौन व्रत की तरह अनवरत चलता है, कभी गाँधी जी के नमक कानून तोड़ो की पदयात्रा की तरह घर से बाहर गली में बैठ जाने जैसा होता है. हालाँकि वे चीज़ों की बदली गयी जगह को कम ही बर्दाश्त करती हैं और उनको वापस उसी जगह ले आती हैं. इस क्रिया में एक चकाचौंध करने देने वाले प्रकाश का डरावना प्रस्फुटन होता है जो पूरे घर को अपने प्रभाव में ले लेता है.
इसलिए मैं या आभा या हम दोनों जब भी घर में किसी वस्तु, सुविधा अथवा चर्या में बदलाव चाहते हैं तो गम्भीर विमर्श होता है. अधिकतर विमर्श का परिणाम होता है "जाने दो, कौन टेंशन ले." कभी दीर्घकालीन आव…