An illegally produced distilled beverage.


September 27, 2016

उन दिनों के बुलावे

परिवार का संकुचित जीवन, घर की चारदीवारी में बंद स्त्रियां और धन संग्रह की भावना राज्य की एकता और उसके समस्त घटकों के स्वतंत्र विकास की क्षत्रु है ~ अफलातून।

कुछ दोस्त मेरी डायरी के सबसे पुराने पन्ने ही पढ़ना चाहते हैं। वे असल में बार-बार उन्हीं पन्नों को पढ़ते हैं जिनमें जीवन के दुख और चाहनाएँ अनावृत हैं। जहाँ एक व्यक्ति सरलता से अपनी खामियों का चित्रण करते हुए, समाज के मानदंडों को अस्वीकार करता।

मैंने सचमुच वैसे डायरी लिखना छोड़ दिया है। ये भयग्रस्त होने का प्रमाण है। मैं वर्जनाओं के शंकु से घबरा कर दैहिक और मानसिक अपेक्षाओं को छिपाने लग गया हूँ। मैं अब नहीं लिखता कि किस आदर्श जीवन की अवधारणा गिरहें बनकर मेरी साँस को रोक लेती है। मैं ये भी नहीं लिखता कि हताशा, उदासी और अवसाद की पीड़ा से भरा जीवन कैसा दिखता है। एक दोस्त ने कहा कि जब तक आपको कोई जानता नहीं है तब तक आप लिखते है। जब आपको जानने का दायरा बढ़ता जाता है तब वह आपको अधिग्रहित कर लेता है। उसके बाद लिखना होने की जगह लिखवाना होने लगता है।

मैं कहता हूँ- हाँ, ये सत्य है। इसी सत्य की घबराहट में मैं अपनी कहानियों को स्थगित करता हूँ। मैं ऐसी कोई किताब नहीं चाहता जिस में बाहरी दबावों की लिखाई दिखे। वस्तुतः प्रेम करना, चाहना से भरा होना, दैहिक लालसा में बहना, कथित व्यभिचार में लिप्त होना और अनैतिक सम्बन्धों को जीना लिखना कठिन है। इसलिए कि कुछ एक रचनाएं और पुस्तकें आने के बाद आपके जीवन को सार्वजनिक मान लिया जाता है। तब आप लेखक हो चुके होते हैं और समाज के प्रति आपके दायित्व याद दिलाये जाने का अधिकार हर पाठक और परिचित को स्वतः मिल जाता है।

हम सब भीतर से कोमल होते हैं। कोमलता जब तक गहरी न हो उसे कमजोरी कहा जाना ठीक है। कि बेहद कोमल को तो तोड़ पाना असम्भव होता है। लेकिन हमारी भीतरी कोमलता वस्तुतः सख्त होने से पहले की स्थिति भर होती है, जो छोटी बातों से आहत होकर टूटती रहती है। हम जल्दी जजमेंटल होते हैं और फतवे सुनाने लगते हैं। ये ऐसा है तो इसका आशय ये है और इस स्थिति में केसी आपका प्यार, एक दिखावा है।

मैं कई बार तय करता हूँ कि ब्लॉग करने लगूँ। और हर बार ये पाता हूँ कि मेरे जीवन आरोहण में अब तक बहुत सफर हो चुका है और लोग इस बात से अनजान हैं। वे किसी पुरानी या बेहद पुरानी अपनी ओछी जानकारी से अर्थ ग्रहण करने लगेंगे। वे इस बात को कभी नहीं समझ पाएंगे कि मैंने जहाँ लकीर खींची थी, उसके आगे किसी सम्बन्ध के निकल जाने के बाद मेरे वृत्त में खालीपन के सिवा कुछ नहीं मिलेगा।

मैं किसी के प्रेम में नहीं हूँ। मैं किसी के प्रेम में था। इन दो स्थितियों के अतिरिक्त नवीन घटना ये है कि मैं अक्सर अपने बीते दिनों में लौटने का सोचता रहता हूँ। वे दिन जहाँ एक कच्चा और रूमान से भरा गैरज़िम्मेदार जीवन मुझे आमंत्रित करता है।

एक खोखला जीवन, दूसरे खोखले जीवन से मिलकर दुगना शोर करता है। तुम अपनी आवाज़ से पता करो कि भीतर का दृश्य क्या है? कहीं तुम आदर्श, व्यवहार, प्रतिष्ठा, सम्मान, प्रतिबद्धता जैसी बातें करते हुए भीतर से खोखले तो नहीं हो गए। क्या अब भी तुम किसी निषेध को आगे बढ़कर चूम सकते हो?

जाने क्यों, इन दिनों लगता है कि मैं कुशलता से उन्हीं दिनों में लौट जाऊँगा। जहाँ मैं केवल मैं था।

August 23, 2016

तुम्हारे उसका क्या हाल है?

उसके हाथ साफ़ थे. अंगुलियाँ सब गिरहों को करीने से रखती जाती थीं. दिल और दिमाग भले कितनी ही जगह उलझे हों, फंदे के कसाव न कम होते थे न फैलते थे. जब तक थका हारा हुआ बदन ठंडा था. वो आराम गरमाहट भली सी लगती थी. लोग कहते थे कि ये बुनावट असल में उसकी अँगुलियों की ज़रूरत थी. वे अंगुलियाँ जो बचपन से अब तक नयी छुअन की तलबगार रही मगर अपने ही किसी डर के कारण चुप लगाकर बैठी रहती थी.
जिस तरह बेशर्मी आती है. जिस तरह असर खत्म होता है. जिस तरह परवाह जाती रहती है. उसी तरह ये हुनर भी आया था. अलग-अलग सिरे बांधना और फंदे बुनते जाना.
एक दोपहर उसने सिरा बाँधा. शाम को बात करते हैं. शाम को फंदा डाला.
"वो बहुत दूर है. हालाँकि लौटने में कोई तीन दिन का फासला भर है. मगर तुम समझते हो न कि किसी का यूं लौट आना लौटना नहीं होता. बस आधी रात को फ्लाइट लेंड करेगी. दो एक घंटे में घर की डोरबेल बजेगी. उसके इंतज़ार में कदम वहीँ दरवाज़े के पास खड़े होंगे. वह अपने ट्रोली बैग को किनारे कर देगा. उसी तरफ जहाँ पिछली बार लाया हुआ एक पौधा रखा होगा. वाशरूम उधर ही है. रास्ता बेडरूम के अन्दर है. अगर उसी की आदत न हुई होती तो वो वो वहीँ सामने रखे सोफे पर आराम करने लगे."
इस फंदे के बाद उसने सांस ली. एक छोटी चुप्पी भरी सांस. ये सांस भी एक फंदा ही था. जो आगे इस तरह बढ़ा- "खिड़की के पास रखे हुए गद्दे, खिड़की के बाहर टंगा हुआ गन्दला आसमान. दोनों किसी काम के नहीं हैं. एक तरफ इंतज़ार किया जा सकता है, दूजी तरफ दूर तक फैले सूनेपन में बे रोक देखा जा सकता है. मैं बस ऐसे ही कोई कागज़ उठाऊं और उस पर लकीरें खींचने लगूं. मालूम है तुमको बेल, बूटे, कसीदे जैसे आकार मुझे भाते हैं. कागज़, कलम, रंग एक इंतज़ार लिखते हैं. रिश्तों से दूर और धन की घनी छाया में मेरा मन चाहता है कि आते ही वो मुझे बाहों में भर ले. पूछे कि कब से नींद नहीं आई?"
इस फंदे की मुकम्मल बुनावट के बाद एक फीकी सी हंसी हवा में घुल जाती है. "अरे कुछ नहीं होता. सब मुझे ही करना पड़ता है"
छोटी चुप्पी, छोटी साँस के बाद - "जाने दे."
फंदे ख़त्म नहीं होते- "हम सबके साथ ऐसा ही है. ठीक ऐसा न हो तो भी लगभग यही है. तुम्हारे उसका क्या हाल है? पता है, तुम मूर्ख हो. तुम चाहो तो... "
* * *

मैं अपनी अंगुलियाँ झटक लेता हूँ. फंदे लिखने से भी अक्सर अँगुलियों का दम घुटने लगता है. 

फंदे - 1

August 12, 2016

उससे पहले

स्मृतियां गहरे से हल्के रंग की ओर बढ़ती हैं। फिर पीली पड़ जाती हैं। जैसे किसी तस्वीर का कागज़ उम्रदराज़ दिखने लगता है। उसके पीलेपन को देखते हुए लगता है कि एक हलके से मोड़ से टूट जाएगा। उस कागज़ को छूने से अंगुलियां डरती हैं। जाने किस छुअन से एक दरार आ जाये। आँखे चुप बैठी सोचती हैं। वो कितना ताज़ा लम्हा था। वक़्त की धूप छाया तक कैसे चली आती है। बंद कमरे की दीवार को भी धूप किस तरह छूती है। कि कागज़ अपना हरापन खो देता है।

तस्वीर के कागजों की कुछ जड़ें हुई होती तो शायद कुछ और वक़्त तक अपना हरापन सींचती रहती। ऐसे ही स्मृतियां जिन कारणों से बची रहती हैं, वे सब कारण असल में बीत चुके कारण होते हैं। स्मृतियों के अक्स में एक पीलापन अपनी जगह बनाता रहता है। हम एक रोज़ स्मृति को छूने से डरते लगते हैं।

सब स्मृतियां उन कारणों पर खिलती हैं जिनके पाए सम्मोहन होते हैं। ये सम्मोहनों की ही दुनिया है। सम्मोहन अपने भीतर ईर्ष्या और युद्ध के नक्शे लिए होते हैं। ये ऐसे संघर्ष है जिन्हें आप टाल नहीं सकते। इनसे लड़कर ही मुक्त हुआ जा सकता है।

अकेलेपन का अभ्यस्त नित नए सम्बन्ध तलाशने में सुख पाता है। वह व्यक्ति आस पास की जड़ों में अपने पैर फंसाता है। बेल की घुमावदार कोमल जकड़न बनाता है। उसी से उसी को छीनता है, जिसके सहारे उगा हुआ है। इस जीवन जुगत में किसी एक हरेपन को हारना होता है। जीत अक्सर परजीवी की होती है। वह सम्बन्धों का पानी चुरा कर आगे बढ़ जाता है।

कभी ऊँची शाखों पर ज़िद करके घोंसला बनाने वाली चिड़िया अपने साथ कुछ बीज लेकर आती है। पेड़ जानता है कि इन बीजों में से कोई एक कोटर में जा गिरेगा। वह बीज उगकर एक दिन उसे लील लेगा। लेकिन जीवन में समझदारी सिर्फ कहने को ज्यादा होती है। जीवन अक्सर लाचार बंधुआ होता।

हम सब हारने को अभिशप्त होने की जगह अपने से लगने वाले रिश्तों से ही छले जाने की नियति से बंधे होते हैं। सच कहूं तो पेड़ का खिले रहने की कामना में रहना ही कष्ट का सबसे बड़ा कारण है। जिन्हें बार-बार नष्ट होकर उगने का हुनर होता है, केवल वे ही इस प्रक्रिया में शांत और गतिमान रहते हैं।

एक रोज़ कोई गहरा सन्नाटा उस चिड़िया के अंतस को भी भेद देता है। ख़ामोशी में याद किरचों की तरह बिखर जाती है। वो दौड़ता भागता मन चोटिल होकर लम्बी सांसे लेने लगता है। तब कोई हल नहीं होता। अपने किये और जीये हुए के नतीजे उसकी साँस घोट देते हैं। सूखे हुए दरख़्त चिड़िया की बुझी हुई आँखे देखने को नहीं होते। वे उसके मरने से पहले मर चुके होते हैं।

जीन्स पुरानी हो चुकी है कि सिर्फ ज़िंदा चीज़ें ही नहीं मरती।

August 11, 2016

असंयत उद्विग्न

आप कभी नहीं समझ पाएंगे कि आसान क्या है और मुश्किल क्या? इस दुनिया में सबकुछ अपनी न्यूनता और आधिक्य के साथ गुण-दोष में परिवर्तित होता रहता है। इधर कई रोज़ से आसमान में बादल हैं। सूरज दिखा नहीं। पूरे राजस्थान में बरसात किसी नवेले प्रिय की तरह बरस रही है। कुछ एक टुकड़े जो सूखे हैं, बादलों की छतरी उन पर भी बनी हुई है। रेगिस्तान तपता हुआ कितना कड़ा लगता है। पानी ही जीवन की इकलौती ज़रूरत जान पड़ती है। जहाँ तक आप देख पाते हैं, केवल सूखा और तपिश दिखाई देती है। इधर जब बादल आसाम पर डेरा डालते हैं और बिखरने का नाम नहीं लेते तब स्थिति प्रकृति के विपरीत हो जाती है। कैसी आदतें होती है न। सूखे, बियाबान और उजाड़ में जीने की आदत। प्यास, पसीना और तन्हाई की आदत। प्रेम की कामना, प्रतीक्षा और उसके अंत होने की चाहना। लेकिन कभी सब बदल जाता है। सडकों के किनारे काई जमी दिखने लगती है। हरियाली का बारीक अक्स हर तरफ उभर आता है। सीले कमरे, सीले पैराहन, सीले बिस्तर और भीगी भारी स्मृतियां।

सफ़र के टुकड़े पांवों में चुभे रहते हैं। लंबे समय तक कहीं जाने की आदत नहीं होती। कभी यात्रा पर यात्रा आमंत्रित करती रहती है। नए पुराने शहरों में, बीते हुए रिश्तों और नए चेहरों की आमद में हम कहीं पीछे छूट गए होते हैं मगर खुद को वर्तमान तक खींचने की जुगत लगाते रहते हैं। कॉफी हाउस, मॉल्स, बड़े शोरूम्स के आगे के अविराम चलते बरामदे। देखे भाले रेलवे स्टेशन, मेट्रो, बसें, कैब्स। सब कुछ मिलकर किसी नयी सर्जना की भूमि तो बनाते हैं लेकिन सर्जक जीवन के इस कारवां में कहीं थककर बैठ चुका होता है। बारिश किस तरह गिरती है, ये लिखने वाला मन गायब रहता है।

बस इसी तरह शायद सबका जीवन चलता होगा।

कुछ एक किताबें पास में हैं। मैं रोज़ दो सौ पन्ने की औसत गति से उनका पठन करता हूँ। किसी एक सिटिंग में साठ-सत्तर पन्ने पढ़ते हुए अकसर कुछ एक पैरा, कुछ एक पंक्तियां लौटकर पुनः पढ़नी पड़ती है। मुझे याद है कि मेरा पढ़ना कभी तेज़ कदम रहा ही नहीं। मैं तीन सौ पन्ने पढ़कर थक जाता था। कुछ रोज़ पहले रेल यात्रा में एक उपन्यास को बाड़मेर से रेक के छूटते ही निकाला था। वे डेढ़ सौ पन्ने पढ़ने में मुझे ढाई- तीन घंटे लगे। उपन्यास का प्रवाह तो अद्भुत था ही शब्दों का आकार भी बड़ा था। कितना के पूरा होते ही ख़याल आया कि ये शायद बीस एक हज़ार शब्द रहे होंगे। मेरे एक सहयात्री ने दूजे से कहा- इनकी किताब पूरी होने वाली है। इसके बाद शायिका को खोलते हैं। मुझे ख़ुशी हुई कि पढ़ते हुए व्यक्ति को लोग परेशान नहीं करने का मन रखते हैं।

कल एक छूटी हुई किताब हाथ लगी। दो एक महीने पहले उसके आठ नौ पन्ने पढ़े थे। वो किताब इस तरह छूट गयी जैसे अजाने जीवन का कोई काम छूट जाता है। एक लघु उपन्यास है। सादा लिफ़ाफ़ा। इसके लेखक हैं, मोती नन्दी। मोती बाँग्ला का उच्चारण है। हिंदी में उनको मति नंदी लिखा गया है।

प्रियव्रत का जीवन एक छद्म आवरण में गुज़र रहा है। वह असल पहचान को छुपाये हुए जीता है। जीवन के छब्बीस बरस। प्रियव्रत ने मज़बूरी में एक छद्म नाम से नौकरी हासिल की थी। नौकरी दिलाने वाला छब्बीस सालों तक भयादोहन करता है। एक रोज़ प्रियव्रत का बचपन के दोस्त की बेटी निरुपमा से मिलना होता है। नीरू छद्म आवरण पर तेजाब की तरह गिरती है। कहानी पढ़ते हुए, कोलकाता का शहरी ढब, ट्रामें, सस्ते जीवन, गिरते मूल्य और परपीड़ा से बेखबर उदास जीवन सामने से गुज़रता रहता है। मैं इस उपन्यास को सुबह और शाम दो बैठक में पूरा करता हूँ। मैं कुछ एक कहानियां और उपन्यास पहले पन्ने से आगे नहीं पढ़ पाता हूं। लेकिन सादा लिफ़ाफ़ा की अद्भुत शैली और कथानक का प्रवाह मुझे परमानन्द तो नहीं मगर आनंद की ओर ले जाता है।

तुम्हें मालूम है एक रोज़ छद्म आवरण में ढका हुआ सब कुछ बाहर की दुनिया के सामने आ जाता है।

अभी मैंने अपनी किताबों के बीच से लेव टॉलस्टॉय की लंबी कहानी खोज निकली है। सुखी दम्पत्ति। मुझे इस कहानी की याद कुछ रोज़ से थी। सर्गेई, मरिया और कात्या याद थे। मालूम है इस कहानी में पात्रों के आचरण और कथन के बीच के बारीक परदे, हलकी स्याही और नमक सी गलन रुक रुक कर पढ़ने पर मजबूर करती है। हम बार-बार किन्ही कहानियों को क्यों पढ़ते हैं? मुझे नहीं मालूम मगर मैं नयी कहानियां भी खूब पढता हूँ। पिछले दिनों नरेश सक्सेना और उपासना झा की कुछ कहानियां पढ़ीं। कुछ एक कहानियां सुखी करती हैं। उनके भीतर रचे बिछोह में गहरा जीवन होता है।

"तुम खेलना चाहते हो, बेशक खेलो। लेकिन मेरे साथ मत खेलो। मैं यहाँ किसी और वजह से हूँ।" सुखी दाम्पत्य। टॉलस्टॉय।

June 28, 2016

एक रोज़ तुम्हें मालूम हो


उस सूनी पड़ी सड़क पर कोलतार की स्याह चमक के सिवा कुछ था तो एक फासला था. उमस भरे मौसम में हरारत भरा मन दूर तक देखता था. देखना जैसे किसी अनमने मन का शिथिल पड़े होना.

दफअतन एक संदेसा गिरा.

जैसे कोई सूखी पत्ती हवा के साथ उडती सड़क के वीराने पर आ गिरी हों. सहसा कोई हल्की चाप हुई हो आँखों में. मन को छूकर कोई नज़र खो गयी हो. हवा फिर से दुलारती है सूखी पत्ती को. एक करवट और दो चार छोटे कदम भरती हुई पत्ती सड़क की किनार पर ठहर जाती है. ऐसे ही किसी रोज़ ठहर जाना.

शाम गए छत पर बैठे हुए क़स्बे की डूबी-डूबी चौंध में उजाले में दिखने वाले पहाड़ उकेरता हूँ. चुप पड़ा प्याला. बारीक धूल से अटा लाइटर. और बदहवास बीती गर्मियों की छुट्टियों की याद. फोन के स्क्रीन पर अंगुलियाँ घुमाते हुए अचानक दायें हाथ की तर्जनी उस बटन को छूने से रुक जाती है. जिससे फोन का स्क्रीन चमक उठे. क्या होगा वहां? आखिर सब चीज़ें, रिश्ते, उम्मीदें एक दिन बेअसर हो जाती हैं. उनके छूने से कोई मचल नहीं होती. कब तक उन्हीं चंद लफ़्ज़ों में बनी नयी बातें. कब कोई ऐसी बात कि लरज़िश हो.

मगर उसके लफ्ज़ पढता हूँ. 

सोचता हूँ कि क्या बात उसे बांधती होगी. इस दुनिया में वजहों के बिना चीज़ें नहीं होती. बेसबब कुछ नहीं होता. किसी शाम ढले. कहीं कुछ पढ़-सोचकर. किसी याद, किसी ऐसे अहसास से गुजरते हुए कि अभी कुछ बाकी है. कि दिल उस मकाम पर आया ही नहीं. जिसे सोचा था, वह एक सुविधा है. वह सबसे आसान हासिल है.

मगर कुछ एक हसरतें कहीं टूटना चाहती है. वे इस तरह बिखर जाना चाहती हैं कि आंधियां उनको उड़ा ले जाये.

ये एक रोज़ तुम्हें मालूम हो. 
दुआ.

[Watercolor Y. Warren]

May 29, 2016

लगा लो होठों से

इतनी कसमें न खाओ घबराकर 
जाओ हम एतबार करते हैं.

उस आखिरी कश में क्या होता है? अक्सर मैं मांग लेता हूँ. उसने शेयर करना जाने कब का छोड़ दिया होगा कि देने से पहले एक सवालिया निगाह उठती है. उसने ज़रा सा जाने क्या सोचकर अपनी अंगुलियाँ आगे कर दी.
यही कोना है, मेरा. ऐसा सुनते हुए मैं उसकी अँगुलियों से आखिरी कश चुन लेता हूँ. क्या उसके लबों को छूकर ठहरी चीज़ें बेशकीमती हो जाती हैं. हो ही जाती होंगी कि मैं अपनी नादानी पर चुप रखे हुए धुएं को रोशनदान से बाहर जाते हुए देखता हूँ.
आह ! किस चीज़ को किस चीज़ से मिला रहा हूँ मैं. 

कभी किसी परिंदे का मन भी उस बाग़ से भी उठ जाता होगा. जिस बाग़ से सुकून और अपनेपन की आस रहती थी. कई बार वे रास्ते भी फीके लगते हैं, जिनपर चलते हुए वक़्त जाने कहाँ चला जाता था. कई बार खिड़कियाँ वहीँ रहती हैं मगर बाहर के सब दृश्य गुम हो जाते हैं. कई बार हम वो नहीं होते जो कभी थे. 
इसी होने और बदल जाने के बीच, अतीत को धन्यवाद. 
अगर वह सबकुछ न जीया होता. तकलीफें हिस्से न आई होती. वो बना ही रहता अपने आवरणों के भीतर और सजा आगे खींचती ही जाती. तो क्या कर सकते थे. उस रोज़ धूप ज्यादा थी मगर लगी नहीं. इसलिए कि कड़ी तपिश से बाहर आ जाने पर कुछ चीज़ें आसान लगने लगती हैं. असल में खुले पाँव और खुली आत्मा हज़ार अनचाहे हाल बरदाश्त कर सकते हैं.  और आप एक सूने अनजाने रास्ते पर आगे बढ़ सकते हैं. कहीं जाने का तय न हो. कहीं कोई न हो, तब भी. 
फिर मैं उसी तलब से घिरता हूँ इसे लिखते हुए. हाँ वही धुंआ.रुखसारों को चूमता. आँखों में चुभता. खिड़की के रास्ते बाहर जाता हुआ धुंआ. एक शाम के अहसास का धुंआ. कि इस वक़्त यहाँ की सीली ठंडक में ज़रा सी तपिश घुली है. ये तरतीब से रखी चीज़ें और इनके सामने खड़ी हुई बेतरतीब ज़िन्दगी. 

लगा लो होठों से, ये एक हसरत है. शुक्रिया. 

May 25, 2016

पार्टनर तुम आबाद रहो.

मिर्ज़ा ग़ालिब की वो बात याद है न? कहते थे नौकर नहीं हूँ मैं. 

मैं सोचता हूँ कोई तो कुछ वजीफे छोड़ जाता हिस्से में कि कहानियां कहते, तनहा रहते, फाकों की चिंता न होती. हर महीने रूपया घर आ जाता. मन मुस्कराता है. ऐसा कहाँ होता है. मैं तो जहाँ से याद कर पाता हूँ वहां से जीवन जीने को नौकरी करने की ही चिंता दिखाई देती है. बड़े नौकर, छोटे नौकर और मंझले नौकर मगर पक्के सरकारी नौकर. यही नौकरी सुख की नांव है. 

सुख ने सही वक़्त से पहले ही गलबहिंयाँ डाल दी थी. उसे पता था नाज़ुक दिल आदमी है ख़ुद को सता लेगा मगर कोई छल-प्रपंच न कर सकेगा. जियेगा, चाहे निचले दोयम हाल में ही जीना पड़े. कहीं किसी अख़बार में कुछ एक लेख लिखता. पुराने दुष्टों की झिडकियां सुनता रह न सकेगा इसलिए बार-बार नयी नौकरियों की ओर भागेगा. इस तरह का भागना इसे हताश करेगा. तो कुदरत और हालत ने बाईस साल की उम्र में रेडियो में बोलने की नौकरी पर लगा दिया. 

नौकरी का ख़याल कल दिन भर पार्टनर के कारण रहा. छोड़ दो नौकरी या रिटायर हो जाओ का हिसाब इसलिए नहीं जमता कि ये पार्टनर कि अपनी चीज़ है. उसपर कोई हुक्म चलाना या दखल देना बेजा है. इसलिए कड़ी धूप में नीम की छाँव तले एक दिन बिताना कोई बड़ी बात न थी. इस पर भी अगर आप उस कमरे के आगे खड़े हों जहाँ कभी दसवीं की कक्षा हुआ करती थी. बहार खड़े हुए भी अन्दर का सब हाल मालूम हो कि किस तरह ब्लैक बोर्ड है, किस दीवार पर क्या लिखा होगा अगर चूने की पुताई न हुई हो तो. 

सब कुछ बहुत पीछे छूट गया है. मालूम नहीं पीछे छूटा कहना ठीक है या खत्म होना. मगर अब नहीं है. शायद कहीं नहीं एक याद के सिवा. 

शाम छत पर खड़े हुए तेज़ हवा के झोंके भी पसीने को नहीं सुखा पा रहे थे. गली के छोर देखे, पास के घरों कि छतों पर बिखरे सामान और धूप को देखा. अचानक देखा कि एक चिड़िया किसी मुंडेर पर बैठी थी. रेगिस्तान की तेज़ आंधी में थोड़ी सी दूर जाने को चिड़िया दूर तक उड़ी। उसने हवा के साथ कई कलाबाजियां खाईं, कई गिरहें बुनी और आखिर पहुँच गयी पास की जगह पर।

उसे देख ख़याल आया कि प्रेम का भी यही हाल है।

[Image courtesy : ronbigelow.com]

May 24, 2016

एक जुगलबंदी को

कितनी ही दफा कितने ही मौसमों से गुज़र कर दिल भूल जाता है. कभी-कभी हवा, पानी, ज़मीं और आसमान के बीच किसी एक ख़याल की छुअन होती है. ये छुअन मौसम की तासीर को अपने रंग में ढाल लेती है. तल्ख़ हवा, तपिश भरी ज़मीं, उड़ चुका पानी और साफ़ या भरा आसमान सब बदल जाते हैं. 
कोई शहर किसलिए बुलाता है किसी को?

क्या कुछ कहीं छूट गया था? क्या कोई हिसाब बाकी था. क्या कोई नयी बात रखनी थी ज़िन्दगी की जेब में. फिर अचानक ख़याल आता है फटी जेबों और उद्दी सिलाई वाली जिंदगी के पास यादों के सिवा क्या बचेगा? अब तक यही हासिल है तो आगे भी...

पिछले सप्ताह के पहले दिन को मुकम्मल जी लेने के बाद एक लम्बी सांस आती है. याद से भरी सांस कि हाव यही वे लम्हे थे. दिल फिर उसी मौसम से गुजरता है. 

जबकि कुछ ही देर पहले गुज़रा हो कोई अंधड़ सूखी पत्तियों की बारिश लिए। बूंदें गिरती हो कम-कम। इतनी कि भीग जाएँ और भीगा भी न लगे। दुकानें पूरे शबाब पर हों मगर गिरे हुए हों शटर आधे-आधे। जब दो अलग तरह के प्याले रखे हों एक साथ जैसे कोई दो अलग वाद्य आ जुटे हों एक जुगलबंदी को। जब सर रखा हो उसकी गोद में और आवाज़ बरसती हो आहिस्ता मीठे सलीके से और बत्तियां बुझती जाए बार-बार मगर ज़िन्दगी फिर से।

उस सबके लिए शुक्रिया कहना मना हो मगर बार बार कहा जाये कि...

तुम न समझोगे। छोड़ो।

[Abstract photograph courtesy etsy.com]

डरते हैं बंदूकों वाले