An illegally produced distilled beverage.


February 11, 2017

जोगी तुम्हारा घर इतना दूर क्यों है


दिल बीते दिनों के गट्ठर से कोई बात पुरानी खोजता है. एक सिरा सुलगा देता है. बात सुलगती रहती है. जैसे मूमल का इंतज़ार सुलगता था. महबूब ने काश पूछा होता कि "ओ मूमल तुम किसके साथ सो रही हो." एक धुंधली छवि देखकर हार गया. इस तरह गया कि लौटा तक नहीं. आह ! मोहोब्बत, तुम जितनी बड़ी थी. उतनी ही नाज़ुक भी निकली. 

सूमल देखो
हवा उसके बालों से खेल रही है
बिना पासों का खेल.

उसके ऊंट का रंग
घुलता जा रहा है शाम में.

वो अभी पहुंचा नहीं है किले की घाटी के पास
फिर ये कौन चढ़ रहा है
मेरे दिल की सीढियों पर.

ये किसकी आवाज़ है
धक धक धक.

मेरी बहन मूमल
ये ढका हुआ झरोखा काँप रहा है
तुम्हारे इंतज़ार से.

* * *

ओ सूमल
कौन संवारता होगा उसकी जुल्फें
जो मैं बिगाड़ कर भेजती हूँ.

कितने आईने चटक गए होंगे अब तक
उसके चेहरे पर मेरी रातों की सियाही देखकर.

मेरी कितनी करवटें झड़ती होंगी
उसके सालू से.

मेरी बहन मूमल
वो कहाँ जाता है हर सुबह
वो कहाँ आता है हर रात

तुम्हारी कमर में हाथ डालती हैं कच्ची रातें
तुम्हें बोसे देती हैं सुबह की हवा.

पिया जितना पिया
उससे बड़ा उसका स्मरण है.
* * *

सूमल
मेरा जी चाहता है
लिख दूँ उन सब चिड़ियों के बारे में
जो बैठी रहती हैं झरोखे के पास.

लिख दूँ रोज़ शाम जलने वाले
अलाव की आंच को.

लिख दूँ कानों में सरगोशी करती हवा के शब्द
कि तुम भीग गयी हो जान.

आह मूमल
पानी ही बरस रहा है इस रेगिस्तान में
तुम तप रही हो प्रतीक्षा के ज्वर से.
* * *

February 10, 2017

पतनशील पत्नियों के नोट्स

फरवरी का पहला सप्ताह जा चुका है मगर कुछ रोज़ पहले फिर से पहाड़ों पर बर्फ गिरी तो रेगिस्तान में भी ठण्ड बनी हुई है. रातें बेहिसाब ठंडी हैं. दिन बेहद सख्त हैं. कमरों में बैठे रहो रजाई-स्वेटर सब चाहिए. खुली धूप के लिए बाहर आ बैठो तो इस तरह की चुभन कि सबकुछ उतार कर फेंक दो. रेगिस्तान की फितरत ने ऐसा बना दिया है कि ज्यादा कपड़े अच्छे नहीं लगते. इसी के चलते पिछले एक महीने से जुकाम जा नहीं रहा. मैं बाहर वार्मर या स्वेटर के ऊपर कोट पहनता हूँ और घर में आते ही सबको उतार फेंकता हूँ. एक टी और बैगी पतलून में फिरता रहता हूँ. याद रहता है कि ठण्ड है मगर इस याद पर ज़ोर नहीं चलता. नतीजा बदन दर्द और कुत्ता खांसी. 

कल दोपहर छत पर घनी धूप थी. चारपाई को आधी छाया, आधी धूप में डाले हुए किताब पढने लगा. शादियों का एक मुहूर्त जा चुका है. संस्कारी लोगों ने अपनी छतों से डैक उतार लिए हैं. सस्ते फ़िल्मी और मारवाड़ी गीतों की कर्कश आवाज़ हाईबर्नेशन में चली गयी है. मैं इस शांति में पीले रंग के कवर वाली किताब अपने साथ लिए था. नीलिमा चौहान के नोट्स का संग्रह है. पतनशील पत्नियों के नोट्स. 

तेज़ धूप में पैरों पर सुइयां सी चुभती हैं. मैं उनको बारी-बारी से धूप में रखता हूँ और किताब पढता जाता हूँ. संग्रह के पहले अध्याय के नोट्स का शीर्षक है क़ैद में है बुलबुल. मैं बुलबुल के ख़याल से बाहर दूजी जगह पहुँच जाता हूँ. वह जगह है बाबा मोहम्मद याहया खान का एक नावेल. पिया का रंग काला. वहां पर कहानी रहस्यमयी है. बचपन में एक नन्हा सुनहला दिखने वाला प्यारा सा सांप जैसे जैसे बड़ा होता है, उसकी रंगत काले रंग में बदलती जाती है. अंततः वह भयावह काला, विशालकाय और बेहद डरावना हो जाता है. उसके पूरे स्याह बदन में केवल आँखें सफ़ेद होती है. वह सांप जब चाहे आदमी-औरत का रूप धारण कर लेता है. इस रहस्य और जुगुप्सा से भरी कहानी की याद नीलिमा चौहान के नोट्स के साथ आना मुझे हैरत में नहीं डालता. 

हमारे बचपन की नन्हीं जिज्ञासाएं एक रोज़ भयावह कामुक अपराधों भरी सोच में बदल जाती है. औरत और आदमी का जीवन सहगामी है. किसी एक के बिना क्या जीवन. मैं साफ़ आसमान में कुछ सफ़ेद फाहे और क्षितिज पर बादलों की एक लकीर देखता हूँ. सोचता हूँ कि आदमी और औरत ही क्या, हर एक जो हमारे जीवन से गायब हो उसके बिना कितना अधूरा सा होता है. पंछियों, बादलों, तारों के बिना आसमान भी कैसा होता? एक और सवाल आता है कि आदमी और औरत के बीच कुदरती भिन्नता अथवा पूरक होने का ये सुन्दर सहज रूप शोषक और शोषित के दो खेमों में क्यों बंट जाता है. इसका भान बहुत देर से और बहुत कम लोगों को क्यों होता है. कम ओ बेश कुंठाएं पल्लवित होती जाती हैं. समाज का आदमियों के वर्चस्व वाला खेमा उनको अपनाता जाता है. इस पर किसी को कोई अचरज नहीं होता, कोई लज्जा नहीं आती. याहया खाना साहब के नन्हे सुनहले सांप की तरह काम इच्छाओं का नन्हा सुनहला सांप बड़ा होकर क्या कुछ निगल जायेगा, इसकी कल्पना कोई नहीं करता. हम नहीं सोचते कि लस्ट, पोर्न और सेक्स के स्याह अँधेरे से रिस रहा आसव आदमी और औरत के बीच कैसा लिजलिजा सम्बन्ध स्थापित करता है? 

मैं और बेटी दो दिन पुस्तक मेला में घूमें. कुछ मेरे दोस्त हैं, उनसे मिलने और बतियाने का सुख बटोरा. तीसरे रोज़ हमें कुछ किताबें खरीदनी थीं. उनमें से एक किताब ये भी थी. पतनशील पत्नियों के नोट्स. कहीं किसी अख़बार या पत्रिका में छपे नोट्स में से कोई एक दो नज़र से गुज़रे होंगे. तभी सोचा कि ये संग्रह पढना चाहिए. पहली नज़र में किताब को देखते ही आपको राजकमल से आई रविश कुमार की किताब की याद आयेगी. आवरण का रंग, रेखांकन और छोटे-छोटे नोट्स. हालाँकि इश्क़ में शहर होना, उन लम्हों की कल्पना है. जो रविश जी नहीं पाते और दुनिया को अपने पत्रकारिता जैसे काम के बाहर देखते हुए रचते हैं. वे लघु प्रेम कहानियां हैं. ऐसी कहानियां जो आपको शहर के भूगोल की प्रोपर्टी पर बिठा देती है. वहां से आपको जीवन की छूटी हुई अनुभूतियों की छोटी गहरी याद दिलाती है. उस किताब में भी सुन्दर रेखांकन हैं. ऐसा रेखांकन की कई बार आपको लग सकता है किताब के दो बराबर के हिस्से हैं. एक लेखक का दूसरा चित्रकार का. रविश हर दिन हर पल समाज के छिछले ओछे आवरणों से रु ब रु होते हैं और उनको सवाल की शक्ल में हमारे सामने रखते हैं. तो उनकी लघु प्रेम कहानियाँ ये आशा दिखाती है कि इस आदमी को अबतक रुखा और कठोर हो जाना चाहिए था लेकिन बचा हुआ है. पतनशील पत्नियों के नोट्स वाली नीलिमा जी प्रोफ़ेसर हैं और उनका सामना बच्चों से होता है. वे ऐसी चिंताएं करती हैं जो आने वाली पीढ़ी के लिए हैं. वे आज को लिखकर सवाल करना चाहती हैं कि कल को कैसा बनाओगे. इस किताब में सुन्दर रेखांकन हैं. अपराजिता शर्मा ने हमारे दिमाग में बसी फूहड़ छवियों को कोमलता से शालीन और ज़रूरी छवियों में बदल दिया है.  

इस तरह धूप-छाँव में लेटे पढ़ते हुए, मुझे अचानक से याद आता है कि रूमी ने कहा कि जहाँ कहीं खराबा है उम्मीद का खजाना भी वहीँ हैं. पतनशील नोट्स पढ़ते हुए एक संत कवि दार्शनिक की कही बात का याद आना फ़ौरी तौर पर बेवजह लग सकता है. कहाँ ये पतनशील बातें और कहाँ वह आध्यात्म से भरा सूफी जीवन. लेकिन ये इसलिए याद आता है कि हम खराब हो चुके हैं और मैं इस खराबे में उम्मीद तलाशना चाहता हूँ. नोट्स का संग्रह औरत के शरीर, काम और इच्छाओं के विज्ञापनी संसार से खींचकर आपको उस जगह ले जाता है, जहाँ से आपकी चाहनाओं और हरकतों की बद सूरत सामने आती है. इसी दुनिया के दो हिस्सों में आदमियों के फूहड़ लतीफे और औरतों की भद्दी मसखरियां एक परदे के इस और उस तरफ ख़ूब एंजॉय की जाती हैं. नीलिमा के नोट्स इस परदे को हटा देते हैं. पढ़ते हुए जिन छुपी बातों पर मजे लेना चाहते हैं. उन्हीं बातों से आत्मा के पैरहन उतरने लगते हैं. अपनी नंगई किसी और के शब्दों में पढ़ते जाना कुछ ऐसा है कि दिल से आह उठती रहे और मुंह उसे दबाये हुए चुप बैठा रहे. ऐसे चुप कि कुछ हुआ नहीं है

विनोद अथवा प्रहसन और खास तौर से सामाजिक मुद्दों पर लिखे गए ऐसे लेख जो हमारी कुरूपता पर सीधे प्रहार करने की जगह चिकौटी काटते हों. लोकप्रिय होते हैं. उनकी उम्र बड़ी लम्बी होती है. इसलिए कि आदमी का स्वभाव बदलने में कई पीढियां लग जाती हैं. वाणी प्रकाशन से आये इस संग्रह को नॉन फिक्शन के अलावा फेमिनिज्म और ह्यूमर की क्लास में भी रखा गया है. इसमें फेमिनिज्म कितना है ये कहना बड़ा मुश्किल है. लेकिन इसमें मनुष्यता की आशा भरपूर है. ऐसी किताबें हर भाषा में आती रहती हैं. अक्सर व्यंग्य अपने सस्तेपन का शिकार हो जाता है. लतीफों के अनुवाद और विस्तार भर शेष रहते हैं. 

मानु जब पांच साल के आस पास थी तब मैं उसे कहानियां सुनाया करता था. मानु ने जो कहानियां बार-बार सुनी वे इब्न ए इंशा साहब की किताब से ली गयी थी. किताब का शीर्षक है- उर्दू की आखिरी किताब. मैंने व्यंग्य कम पढ़ा है. हालाँकि मैंने सबकुछ बहुत कम पढ़ा है. फिर भी उर्दू की आखिरी किताब मेरी प्रिय किताबों में से एक है. उर्दू किताबों की चर्चा में कुछ बरस पहले हुसैन अहमद शेराज़ी साहब की किताब की काफी चर्चा हुई थी. किताब का शीर्षक है बाबू नगर. ये किताब बाबू साहेब कहे जाने वाले छोटे से बड़े क्लर्क तक के जीवन और उनके आचरण पर कसाव भरी चुटकियाँ लेने वाली कही जाती है. इस किताब का कलेवर भी पतनशील पत्नियों के नोट्स जैसा ही है. यानी रंग तो पीला ही रहेगा, चाहे कोई भी व्यंग्य लिखे. वैसे पीला रंग किताबों के लिए बेहतर भी माना जाता है. इस किताब में भी मशहूर कलाकार जावेद साहब का इलेस्ट्रेशन है. 

नीलिमा चौहान की किताब के शुरूआती नोट्स औरतों के निजी हिस्सों के बाबत आदमी की सोच का खाका है. ये ठीक ऐसा नहीं है मगर आप ऐसे समझिये कि नीलिमा जी ने हमारी ढकी हुई सोच को उल्ट कर सामने रख दिया है. ये प्राइवेट पार्ट्स और लाइफ के बारे में आदमी की सोच को इनसाइड आउट सुखा देने जैसा है. कहीं कोई-कोई बात इतनी सीधी है, जैसे दो धार वाली तलवार होती है. जो जाते हुए भी चीरती है और लौटते हुए भी. आगे के लेख आपको अनुभूतियों की ओर ले जाते हैं. जीवन के छोटे दृश्यों के पीछे की गहरी संवेदना भी छूटती नहीं है. मन के कोनों में दबे-छुपे स्त्री होने के अहसास को नई शक्ल और नया ढब देकर उकेरा है. 

पतनशील पत्नियाँ कहाँ होती हैं. वे पतनशील क्यों हैं. ये सब पढने की बात है. 

मैं धूप के और तल्ख़ होते जाने से बेपरवाह किताब पढता रहता हूँ. सोचता हूँ कि समय हमारे साथ कभी अन्याय नहीं करता. मेरी बेटी जब पांच साल की थी तब मैं उसे इब्ने इंशा साहब द्वारा आगे बढाई गयी कहानियां सुनाता था. जैसे "टोपियाँ बेचने वाला व्यापारी और बंदर" कहानी आप सब ने पढ़ी ही होगी. लेकिन इसे इब्ने इंशा साहब ने इस तरह आगे बढ़ा दिया. “टोपीवाला व्यापारी जंगल से गुज़रते हुए थककर एक पेड़ के नीचे आराम करने लगता है. उसे नींद आ जाती है. कुछ बन्दर आते हैं और उसकी सब टोपियाँ ले जाते हैं. वह जागता है तो टोपियाँ बंदरों के पास देखकर अक्ल से काम लेता है और बंदरों को दिखाकर अपनी टोपी फेंक देता है. बन्दर भी उसकी नक़ल करते हुए टोपियाँ फेंक देते हैं. अगली बार व्यापारी का बेटा वहां से जाता है. यही घटना फिर होती है तो व्यापारी का बेटा अपनी टोपी फेंकता तो एक नन्हा बन्दर जिसे टोपी नहीं मिली होती है, वह उसे लेकर पेड़ पर चढ़ जाता है. नया व्यापारी अचरज से कहता है कि मेरे अब्बू ने कहा था कि उन्होंने जब ऐसे टोपी फेंक दी तो सब बंदरों ने भी फेंक दी थी. इस पर एक बन्दर कहता है- क्या तुम्हारे ही अब्बू थे, हमारे नहीं थे.”

तब मेरी बेटी के पास सुनने को इंशा जी की कहानियां थी. अब जब वह दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ती है तो उसका वास्ता ऐसी किताबों से भी पड़ना चाहिए जो पतनशील पत्नियों के नोट्स जैसी हों. लेखक पीछे छूटते जाते हैं तो इसका अर्थ ये नहीं है कि उन खाली जगहों को भरने कोई आता नहीं है.

December 5, 2016

जाको लागे वो रंग

अचानक माणिक ने किताब उठा ली. “पुखराज की किताब? क्या बात है” नीलम का दिल सदमे में चला ही जाता कि माणिक की मुस्कराहट ने इस सदमे को रोक लिया. वह उनको देख रही थी. जाने क्या सोचें, क्या कह बैठें. कुछ देर तक किताब के पीछे का पन्ना देखने के बाद माणिक ने किताब को अधबीच के किसी पन्ने या शायद आगे पीछे कहीं से पढना शुरू किया. हरा रंग माणिक के हाथों में था लेकिन नीलम के सब रंग ज़र्द हुए जा रहे थे. माणिक ने कहा- “खुली नज़्में”

मई महीने को आधा बीतने में दो दिन बचे थे. रात के आठ बजे थे.

दिल्ली जाने की तैयारी थी. नीलम ने इससे पहले क्या बातें की थी ये पुखराज को याद नहीं था लेकिन पौन घंटे बाद एयरपोर्ट निकलने से पहले नीलम कहा- “कल जो हुआ वह मुझे अभी तक सता रहा है. क्या आपको कुछ कहा है उन्होंने?” नीलम असल में पन्ना के बारे में सवाल कर रही थी. लेकिन इस बात से ज़रूरी बात उनके बीच थी कि अब जाने क्या होगा.

नीलम ने कहा- वे टेक्सी करवा रहे हैं

पुखराज चुप रहना चाहता था मगर उसने जवाब दिया- मेरा हाल अजूबा है. मगर मेरे हाव भाव सामान्य है.

वह पूछती है- अरे क्यों? क्या मैंने कुछ किया?

पुखराज ने सोचा कि कल के वक़्त का वो सफहा, जब बहुत देर तक उसकी कोई ख़बर न थी तब जाने क्या बात गुज़री होगी. असल में कहीं जाने से पहले किताबें लेने जाने जैसे किसी बहाने का कोई अर्थ नहीं होता. इसी सोच में पुखराज ने कहा- “नहीं नहीं. तुमने कुछ न किया. तुम्हारा नाम आते ही मैं जाने क्यों ऐसा बिहेव कर रहा हूँ. मुझे क्यों लग रहा है कि मैं कहीं पकड़ा जा रहा हूँ. तुम जाने कैसे ये सब छिपा लेती हो?”

नीलम ने कहा- “और मुझे हर कदम बढाते हुए लग रहा ही कि मैं आपसे दूर जा रही हूँ.”

“पगली. दूर कभी नहीं. मन के गहरे में हो हमेशा.”

“पता नहीं मैं ये सब छिपा पा रही हूँ कि नहीं. आई एम फीलिंग टू लो. एक ही बात लगती है कि पता नहीं कब देखूंगी आपको.”

“सुनो. अभी जब तुम्हारा फोन आया तब मैं उनके आस पास था, उनको ऐसा न लगे कि दूर भाग रहा हूँ. तुम जल्दी ही मुझे देखोगी.”

“शायद.”  

नीलम टेक्सी में थी. माणिक आगे बैठे थे. टेक्सी को अपने गंतव्य तक जाने में बीस मिनट लगने थे.

नीलम- “जान. आपको जानने के बाद जब पहली बार दिल्ली आई थी तब कितनी खुश थी मैं. फिर आपसे लम्बी लम्बी बातें शुरू हुई. मैं वक़्त चुरा कर आपसे बातें किया करती थी. अब लगता है जैसे ज़िन्दगी एक चक्कर पूरा कर चुकी है. अब हम करीब हैं मगर दूर होंगे.”

“नहीं दूर न होंगे. ये दूरी बस भूगोल की होगी. एक अस्थायी दूरी. जिसे एक दिन मिट जाना होगा.”

“मुझे नहीं रहना आपके बिना. मेरा सब्र ख़त्म हुआ.”

“कभी न रहना मेरे बिना. मगर सब्र ख़त्म होते ही मुश्किलें बेहिसाब हो जाएगी.” ऐसा कहते हुए पुखराज सोच रहा था कि उस देश जाते ही जाने क्या-क्या बदल जायेगा. ये महीनों बाद मिलना भी क्या मिलना था लेकिन अब उसकी भी आस जाती रहेगी. लेकिन जाने क्यों पुखराज को एक यकीन आता था कि नीलम वहां न रह सकेगी. उसको कोई वजह यहाँ खींच लाएगी. वह वजह केवल पुखराज न होगा.

रात के नौ बज चुके थे. नीलम ने कहा- “ये केवल आप समझ सकते हैं कि मैं इसी देश में रहना चाहती हूँ. ये दोनों बातें एक साथ होना बहुत मुश्किल है. मगर फिर भी मैं यहाँ रहने के ख्वाब देखती हूँ. उन लोगों का मेरे साथ रहना मुझे गहरे डिप्रेशन में डालता है मगर फिर भी मैं आप तक लौट आना चाहती हूँ.”

पुखराज ने कहा- “हम इस बारे में बात करेंगे. अभी तुम अपनी यात्रा को कष्टप्रद न बनाओ. समझो अभी वेकेशन पर जा रही हो. जब मुश्किल आएगी तब देखंगे.

“यू आर एन अवसम पार्टनर. मैरी मी.”

पुखराज ने सोचा कि डिप्रेशन में जाने की वजह क्या-क्या हो सकती है? उसने अचानक ऐसा क्यों कहा कि मैं घरवालों की वजह् से डिप्रेशन में चली जाती हूँ. क्या पहले जब डॉक्टर के चक्कर लगाए थे तब उसे भी कारण यही बताया होगा? जबकि उसने मुझसे अक्सर कहा कि मैंने डिप्रेशन की वजह बता दी है कि मैं पुखराज से प्रेम करती हूँ. वह मुझसे प्रेम नहीं करता. वह इग्नोर करता है. जवाब नहीं देता. मैं क्या उससे बाहर आ सकती हूँ. असल में मैं बाहर आना ही नहीं चाहती. मुझे उसी की ज़रूरत है.

रात के साढ़े दस बज गए थे. एक बेचैनी थी. एक शंका थी. कितना कुछ गुज़रा था उन दोनों के बीच पिछली पहाड़ की यात्रा ने बहुत कुछ स्पोइल किया था. उसी की स्मृति एक दूरी बुनती है. इस दूरी में एक दोराहा आता है. क्या वह सचमुच उसके जाने को याद करके उदास हो जाये या फिर समझे कि पुखराज की प्रेमिका के भीतर के खानों में जो कुछ रचा हुआ है, उसका भागी न बने और उसे उसके हाल पर छोड़ दे.

मई महीने के आधे दिन बीतने में कुछ ही घंटे शेष थे. ये रात खत्म होने से पहले बहुत लम्बी हो गयी थी. जाने कौनसा साल था. पुखराज की ऑंखें बेहद भीगी हुई थीं. वह एक ठहरी हुई रात की तरह था. उसके पास कोई रौशनी न थी.

अँधेरा बढ़ता जा रहा था. नब्ज़ डूब रही थी. उससे प्यार कितना करता था ये नहीं मालूम मगर पुखराज को साफ़ लगता था कि वह कभी उससे अलग नहीं हो पायेगा.

[नील-स्वप्न - एक ]


Painting : Hidden lake of memories by John L Mendoza

November 27, 2016

तब तक के लिए

पत्ता टूटा डाल से ले गयी पवन उड़ाय
अबके बिछड़े नाहीं मिलें दूर पड़ेंगे जाय.
~ कबीर
मन शिथिल, उदासीन, बदहवास, गुंजलक. महीनों उलझनों से घिरा. नासमझी से भरा. बीतते दिनों से बेपरवाह. ठहरी चीज़ों से अनजान. दीवार हुआ मन. आंधी का भंवर. सूखी नदी से उड़ती धूल सा मन.
कितनी ही जड़ें उग आई होगी. कितनी ही शाखाएं उलझ पड़ीं थीं.
क्या मन के भीतर आने के चोर रास्ते होते हैं? क्या कोई बेशक्ल चीज़ मन पर एक उदास छाया रच देती है. अक्सर समझ नहीं आता. क्या हम कभी इस सब को समझ सकते हैं? मगर समझें क्या? वो कहीं चुभता दिखे. वह गिरह कसती हुई सामने आये. वो साँस तड़प कर किसी का नाम ले. मगर कुछ नहीं मालूम होता.
आज सुबह अचानक सबकुछ हल्का हो गया. सोचा कल की रात क्या गुज़रा था? क्या सुना-कहा था? क्या जीया था? इस खोज में कुछ भी बरामद नहीं होता. कोई शक्ल, कोई आवाज़, कोई छुअन याद नहीं आती. फिर ये क्या है कि बोझा गायब जान पड़ता है. मन खुली हवा में ठहरा हुआ. मन बेड़ियों से आज़ाद. मन अपने प्रवाह की लय में लौटता हुआ.
बोगनवेलिया से अनगिनत पत्ते रोज़ झड़ते हैं. रोज़ कोई बुहार देता है. लेकिन किसी रोज़ मन उनको खोज लेता है. उस अंतिम बिछोह को पढने के लिए ज़मीन की ओर झुक जाता है. बिना छुए बात करता है. इसी तरह एक रोज़ हम अपने रास्ते चले जायेंगे.
तब तक के लिए प्रसन्न रहो केसी. अपनों से प्रेम करो, परायों के प्रति दया रखो.

November 25, 2016

इस आग ही आग में

तिवारी जी ने कार रोक दी है। 
हापुड़ से मयूर विहार तक शैलेश भारतवासी एक कहानी सुना रहे थे। मानव कौल की लिखी कहानी। मैंने ऐसे अनेक सफर किये हैं। मगर उन सब में कहानी मैं ही सुना रहा होता था। मैंने आज तक जितनी कहानियां सुनाई हैं , वे सब झूठ हैं। कहानी को सच क्यों होना चाहिए जबकि हम झूठ भर से ही किसी का जी दुखा सकते हैं। झूठ भर से काटा जा सकता है एक लंबा सफर। 
आज जो मैंने कहानी सुनी वह तीन लड़कों की प्रेम कहानी है. प्रेम एक युद्ध है. इस कहानी में शांति के मोर्चे पर बैठे एक दूजे को अपने भीतर सहेजे दोस्त अचानक युद्ध के आरम्भ हो जाने के हाल में घिर जाते हैं. इसके बाद मोर्चे पर हो रही हलचल कथानक में बढती जाती है. घटनाएं तेज़ गति से घटती है और योजनाएं नाकाम होती जाती है। प्रेम वस्तुतः नाकामी को अपने पहलू में रखता है और बार-बार इस बात का परिक्षण करता है कि क्या सबकुछ ऐसे ही होना था? वह सोचने लगता है कि गुणी और योग्य व्यक्ति की जगह प्रेम को अक्सर चापलूस और मौकापरस्त चुरा लेते हैं. प्रेम हवा का तेज़ झोंका है जो जीवन को आलोड़ित करके कहीं छुप जाता है. 
शुक्रिया मानव इतनी सुंदर कहानी कहने के लिए। 


मैंने इस कहानी के कोई पंद्रह सत्रह पन्ने सुने. इसी कथावाचन और श्रवण में हम हापुड़ से दिल्ली के मयूर विहार तक आ गए. 

जब हम हापुड़ जा रहे थे तो कथित राष्ट्रीय राजमार्ग पर सैंकड़ों बाइकर्स कलाबाजियां दिखाते हुए सड़क पर आड़े तिरछे भागे चले जा रहे थे. मुझे उनको देखकर कोई प्रसन्नता न हुई. मेरे जैसा व्यक्ति जिसके मन और अनुभवों में बहुत सारा रेगिस्तान बसा हुआ है, वह कभी भी महानगरों को नहीं समझ पायेगा. मेरे लिए राष्ट्रीय राजमार्ग का अर्थ है अस्सी फीट चौड़ी सड़क और सौ किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक की गति. मेरे लिए दूर तक पसरा हुआ सूनापन ज़िन्दगी है. 

शैलेश भारतवासी कहते हैं सब लोग नौकरी करके गाज़ियाबाद को लौट रहे हैं. मैं उनको देख रहा था. वे अपनी बाइक से कारों और बड़े ट्रकों के बीच फिसल रहे थे. असल में उनका भागना ऐसा था जैसे किसी नरक की दीवार में सुराख करके आये हैं. नरक के पहरेदार उनके पीछे लगे हैं. वे हर सूरत में हाथ नहीं आना चाहते हों. लेकिन वे कल सुबह फिर से लौटेंगे. दिल्ली शहर. 

एक रोज़ 
आदमी की पीठ 
लोहे की पटरी में ढल जाएगी. 

धूप की तपिश में   
चमकती 
कोहरे के दिनों में 
खोई-खोई . 
बारिशों में फिसलन भरी.
  
मन मगर मर चुका होगा. 
 
एक रोज़ 
लोहे के फूल चूमेंगे 
धूप में भीगे होठ. 
और इस आग ही आग में 
दुनिया लौट जाएगी वहीँ  
जहाँ से शुरू हुई थी. 

मैंने कितने लोगों से मोहोब्बत की है ये हिसाब बेमानी है. जैसे हर किसी के पास है कहानियां. जैसे हर कोई कविता की तरह चलता है. ज़िन्दगी मगर ज़िन्दगी है, जिस ढब देखिये. 

September 29, 2016

फ़ैसले के बाद का इक सवाल

मुमकिना फ़ैसलों में इक हिज्र का फ़ैसला भी था
हमने तो एक बात की उसने कमाल कर दिया। ~परवीन शाकिर

घर की मरम्मत के काम से उड़ती हुई गर्द ने सब धुले कपड़ों को ढक लिया। कई रोज़ से एक ही जीन्स और दो टी में फिरता रहा। कल रात ये सोचा था कि कपड़े पानी से निकाल कर सुखा दूंगा कि बाद दिनों के बदल कर कुछ पहनूँ। दिनों से कड़ी धूप थी मगर आज कहीं से बादलों का टोला चला आया है। आठ बजे हैं और धूप गुम है।

अचानक कोई मिले और आप पीछे झांकने लगें। आपको वे लोग याद आये जो पास बैठे होने को नज़दीकी समझने लगे थे। अचानक वे भी याद आएं जिनसे नज़दीकी थी मगर कभी पास न बैठे थे। हवा में गिरहें पड़ने लगें, जब कोई अपने हादसे सुनाये और कहता जाये कि इन बातों का आपसे कोई वास्ता नहीं है। और सुनते हुए दिल सोचता जाये कि जब वास्ता नहीं है तो इस मुलाक़ात में उन्हीं की याद क्यों हैं?

कई बार एक ही रास्ते तनहा चलते हुए कोई अजनबी भला सा लगने लगता है। सफ़र के रास्ते के सूनेपन पर कोई साया। जहाँ से गुम हो सब छाँव, सब धूप ला पता हो। जहाँ सांस किसी याद की तरह आये। जहाँ एक सिरा दिख रहा हो। ठीक वहीँ जवाब से सवाल, चुप्पी से सवाल और सवाल से सवाल उगते जाएँ।

ख़यालों के इस वृन्द से ठिठक कर मन देखता है पुल की ढलान से उतरते हुए नौजवान। पीठ पर अपना थैला बांधे। ऊँची आवाज़ में बतियाते। उनपर एक धूप की लकीर आई और फिर से खो गयी। जैसे हम कहीं बहुत पीछे छूट गए थे और इस छूट जाने की याद एक लकीर की तरह बनी और मिट गयी।

सुबह छः बजे परवीन शाकिर साहबा की आवाज़ यूट्यूब पर थी। उनके शेर छूकर गुज़रते रहे मगर ज़िन्दगी की याद में ये शेर मन में अटक गया। कई बार फ़ैसला किया था कि ऐ ज़िन्दगी हम बिछड़ जाएं तो अच्छा मगर वो हर बार कोई न कोई सवाल करके चुप हो जाती रही।

September 27, 2016

उन दिनों के बुलावे

परिवार का संकुचित जीवन, घर की चारदीवारी में बंद स्त्रियां और धन संग्रह की भावना राज्य की एकता और उसके समस्त घटकों के स्वतंत्र विकास की क्षत्रु है ~ अफलातून।

कुछ दोस्त मेरी डायरी के सबसे पुराने पन्ने ही पढ़ना चाहते हैं। वे असल में बार-बार उन्हीं पन्नों को पढ़ते हैं जिनमें जीवन के दुख और चाहनाएँ अनावृत हैं। जहाँ एक व्यक्ति सरलता से अपनी खामियों का चित्रण करते हुए, समाज के मानदंडों को अस्वीकार करता।

मैंने सचमुच वैसे डायरी लिखना छोड़ दिया है। ये भयग्रस्त होने का प्रमाण है। मैं वर्जनाओं के शंकु से घबरा कर दैहिक और मानसिक अपेक्षाओं को छिपाने लग गया हूँ। मैं अब नहीं लिखता कि किस आदर्श जीवन की अवधारणा गिरहें बनकर मेरी साँस को रोक लेती है। मैं ये भी नहीं लिखता कि हताशा, उदासी और अवसाद की पीड़ा से भरा जीवन कैसा दिखता है। एक दोस्त ने कहा कि जब तक आपको कोई जानता नहीं है तब तक आप लिखते है। जब आपको जानने का दायरा बढ़ता जाता है तब वह आपको अधिग्रहित कर लेता है। उसके बाद लिखना होने की जगह लिखवाना होने लगता है।

मैं कहता हूँ- हाँ, ये सत्य है। इसी सत्य की घबराहट में मैं अपनी कहानियों को स्थगित करता हूँ। मैं ऐसी कोई किताब नहीं चाहता जिस में बाहरी दबावों की लिखाई दिखे। वस्तुतः प्रेम करना, चाहना से भरा होना, दैहिक लालसा में बहना, कथित व्यभिचार में लिप्त होना और अनैतिक सम्बन्धों को जीना लिखना कठिन है। इसलिए कि कुछ एक रचनाएं और पुस्तकें आने के बाद आपके जीवन को सार्वजनिक मान लिया जाता है। तब आप लेखक हो चुके होते हैं और समाज के प्रति आपके दायित्व याद दिलाये जाने का अधिकार हर पाठक और परिचित को स्वतः मिल जाता है।

हम सब भीतर से कोमल होते हैं। कोमलता जब तक गहरी न हो उसे कमजोरी कहा जाना ठीक है। कि बेहद कोमल को तो तोड़ पाना असम्भव होता है। लेकिन हमारी भीतरी कोमलता वस्तुतः सख्त होने से पहले की स्थिति भर होती है, जो छोटी बातों से आहत होकर टूटती रहती है। हम जल्दी जजमेंटल होते हैं और फतवे सुनाने लगते हैं। ये ऐसा है तो इसका आशय ये है और इस स्थिति में केसी आपका प्यार, एक दिखावा है।

मैं कई बार तय करता हूँ कि ब्लॉग करने लगूँ। और हर बार ये पाता हूँ कि मेरे जीवन आरोहण में अब तक बहुत सफर हो चुका है और लोग इस बात से अनजान हैं। वे किसी पुरानी या बेहद पुरानी अपनी ओछी जानकारी से अर्थ ग्रहण करने लगेंगे। वे इस बात को कभी नहीं समझ पाएंगे कि मैंने जहाँ लकीर खींची थी, उसके आगे किसी सम्बन्ध के निकल जाने के बाद मेरे वृत्त में खालीपन के सिवा कुछ नहीं मिलेगा।

मैं किसी के प्रेम में नहीं हूँ। मैं किसी के प्रेम में था। इन दो स्थितियों के अतिरिक्त नवीन घटना ये है कि मैं अक्सर अपने बीते दिनों में लौटने का सोचता रहता हूँ। वे दिन जहाँ एक कच्चा और रूमान से भरा गैरज़िम्मेदार जीवन मुझे आमंत्रित करता है।

एक खोखला जीवन, दूसरे खोखले जीवन से मिलकर दुगना शोर करता है। तुम अपनी आवाज़ से पता करो कि भीतर का दृश्य क्या है? कहीं तुम आदर्श, व्यवहार, प्रतिष्ठा, सम्मान, प्रतिबद्धता जैसी बातें करते हुए भीतर से खोखले तो नहीं हो गए। क्या अब भी तुम किसी निषेध को आगे बढ़कर चूम सकते हो?

जाने क्यों, इन दिनों लगता है कि मैं कुशलता से उन्हीं दिनों में लौट जाऊँगा। जहाँ मैं केवल मैं था।

August 23, 2016

तुम्हारे उसका क्या हाल है?

उसके हाथ साफ़ थे. अंगुलियाँ सब गिरहों को करीने से रखती जाती थीं. दिल और दिमाग भले कितनी ही जगह उलझे हों, फंदे के कसाव न कम होते थे न फैलते थे. जब तक थका हारा हुआ बदन ठंडा था. वो आराम गरमाहट भली सी लगती थी. लोग कहते थे कि ये बुनावट असल में उसकी अँगुलियों की ज़रूरत थी. वे अंगुलियाँ जो बचपन से अब तक नयी छुअन की तलबगार रही मगर अपने ही किसी डर के कारण चुप लगाकर बैठी रहती थी.
जिस तरह बेशर्मी आती है. जिस तरह असर खत्म होता है. जिस तरह परवाह जाती रहती है. उसी तरह ये हुनर भी आया था. अलग-अलग सिरे बांधना और फंदे बुनते जाना.
एक दोपहर उसने सिरा बाँधा. शाम को बात करते हैं. शाम को फंदा डाला.
"वो बहुत दूर है. हालाँकि लौटने में कोई तीन दिन का फासला भर है. मगर तुम समझते हो न कि किसी का यूं लौट आना लौटना नहीं होता. बस आधी रात को फ्लाइट लेंड करेगी. दो एक घंटे में घर की डोरबेल बजेगी. उसके इंतज़ार में कदम वहीँ दरवाज़े के पास खड़े होंगे. वह अपने ट्रोली बैग को किनारे कर देगा. उसी तरफ जहाँ पिछली बार लाया हुआ एक पौधा रखा होगा. वाशरूम उधर ही है. रास्ता बेडरूम के अन्दर है. अगर उसी की आदत न हुई होती तो वो वो वहीँ सामने रखे सोफे पर आराम करने लगे."
इस फंदे के बाद उसने सांस ली. एक छोटी चुप्पी भरी सांस. ये सांस भी एक फंदा ही था. जो आगे इस तरह बढ़ा- "खिड़की के पास रखे हुए गद्दे, खिड़की के बाहर टंगा हुआ गन्दला आसमान. दोनों किसी काम के नहीं हैं. एक तरफ इंतज़ार किया जा सकता है, दूजी तरफ दूर तक फैले सूनेपन में बे रोक देखा जा सकता है. मैं बस ऐसे ही कोई कागज़ उठाऊं और उस पर लकीरें खींचने लगूं. मालूम है तुमको बेल, बूटे, कसीदे जैसे आकार मुझे भाते हैं. कागज़, कलम, रंग एक इंतज़ार लिखते हैं. रिश्तों से दूर और धन की घनी छाया में मेरा मन चाहता है कि आते ही वो मुझे बाहों में भर ले. पूछे कि कब से नींद नहीं आई?"
इस फंदे की मुकम्मल बुनावट के बाद एक फीकी सी हंसी हवा में घुल जाती है. "अरे कुछ नहीं होता. सब मुझे ही करना पड़ता है"
छोटी चुप्पी, छोटी साँस के बाद - "जाने दे."
फंदे ख़त्म नहीं होते- "हम सबके साथ ऐसा ही है. ठीक ऐसा न हो तो भी लगभग यही है. तुम्हारे उसका क्या हाल है? पता है, तुम मूर्ख हो. तुम चाहो तो... "
* * *

मैं अपनी अंगुलियाँ झटक लेता हूँ. फंदे लिखने से भी अक्सर अँगुलियों का दम घुटने लगता है. 

फंदे - 1

डरते हैं बंदूकों वाले