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Showing posts from October, 2010

इन आवाज़ों को शक्ल मिलने की दुआ करता हूँ

विकीलीक्स द्वारा सार्वजनिक की गई रपट के प्रति विश्व समुदाय को लम्बे समय से जिज्ञासा थी. पेंटागन और विकी के बीच पिछले कई सालों से इन तथ्यों को उद्घाटित किये जाने को लेकर कशमकश जारी थी. चार महीने पहले कुछ तस्वीरों के सार्वजनिक किये जाने के बाद अमेरिकी प्रशासन ने 'राष्ट्र हित' को ध्यान में रखने का बड़ा ही मार्मिक और देशभक्ति पूर्ण इमोशनल अनुरोध भी किया था कि विकी को अमेरिकी करतूतों को सार्वजनिक नहीं करना चाहिए. वे तस्वीरें ईराक में मानवीयता का गला रेत रहे गोरे, दम्भी और अमानुषिक अत्याचारों की थी.
युद्ध अपराध से सम्बंधित जो दस्तावेज़ विकीलिंक्स पर सार्वजनिक किये गए हैं, उनका सत्य अमेरिका के इतिहास जितना ही पुराना है. ये साम्राज्यवादी चरित्र के असली चेहरे की घूंघट से दिख रही एक धुंधली सी छवि है. दुनिया पर काबिज हो जाने के लिए जंगल के कानून से भी बदतर तरीकों वाला ये साम्राज्यवादी अभियान समाज में नस्लभेद, जाति और चमड़ी के रंग के भेद को खुले आम बढ़ावा देता हुआ नस्लीय घृणा का सबसे बड़ा पोषक है. ज़मीन और समुद्र के बीच अपने अड्डे बनाते हुए दुनिया को अपने रहम और करम से पालने के…

सोये हुए दिनों के कुछ पल

ऐसा नहीं है कि मैं आत्मरति के तिमिर में खो जाने के लिए एकाएक गायब हो जाया करता हूँ. मैं उन्हीं जगहों पर होता हूँ मगर खुद को उस लय में पा नहीं सकता. दिन के किसी वक्त या अक्सर सुबह कई परछाइयाँ मेरे सिरहाने उतर आती हैं. उनकी शक्लें बन नहीं पाती. वे या तो बहुत भारी या फिर उदास हुआ करती हैं कि मैं ऑफिस जाने के लिए जरूरी सामर्थ्य को खो बैठता हूँ. रिवाल्विंग चेयर या फिर सात फीट लम्बे चौड़े बिस्तर पर अधलेटा अलसाया हुआ तीन पंक्तियाँ लिखता और चार मिटाता रहता हूँ. एक भोगे हुए किन्तु बेचैन मन की तरह विलंबित लय में अपनी जगह बदलता रहता हूँ. दोपहर बाद पत्नी ऑफिस से लौट आती "मुझे नहीं लगता कि आज ऑफिस जा पाओगे"
बस ऐसे ही कई दिन बीत गए हैं. ऑफिस गया भी और लौट भी आया. दर्ज करने लायक कुछ नहीं था. इन पंद्रह दिनों में रेल, शोर, शहर, माल, केफे, बर्गर, चायनीज़, स्पेनिश, सरकारी गाड़ियाँ और चौराहों पर खिले हुए फूलों की लघुतम स्मृतियां ही बची. याद रखने के तरीके सिखाने वाले कहते हैं कि आपको सिर्फ वही याद रहता है जिसे आप सख्त पसंद या सख्त नापसंद करते हैं.

मेरी यादों में लगभग यही है. बीच की सा…

दिल तो रोता रहे और आँख से आंसू ना बहें

कहां कर रहे हो, कहां जा रहा है किये जाओ राजा मजा आ रहा है
हम अपनी तमीज भूल चुके थे. ये जाने किसने कहा था, किसकी महफ़िल थी और जाने किसने सुना था. शराब का नशा और खिलने लगा. सोने जैसी रेत पर काली कलूटी सड़क, महान व्यक्ति के चरित्र पर काले कारनामों की रेख. इसी सड़क के किनारे रोटी के ढाबों का सिलसिला. बिछी हुई चारपाइयों पर चड्ढा ग़ज़ल गुनगुनाते हैं. दाल में बघार की खुशबू और मिट्टी पर गिरे हुए डीज़ल की मिली जुली गंध में रम के ग्लास की पहचान नहीं हो पाती. करमजीत पी नहीं रहा, चिंतित हो रहा है. कुछ लोग शराब के इस तरफ होते हैं कुछ उस तरफ. वो सूरतगढ़ अब दस साल पीछे छूट गया है.
* * *
बेतरतीब कटे हुए प्याज, दो सिकी हुई हरी मिर्च, टमाटर सॉस और ग्रीन लेबल विस्की. एक आँगन, एक कमरा, एक फोटो फ्रेम में मुस्काती हुई लड़की. इसने शायद देखा होगा कि आज रेणु इस कमरे में आई थी लेकिन शुक्र है कि तस्वीरें चुप रहना पसंद करती है. ठंडी रात, ठंडी रजाई और चित्रा के पहलू से आती हुई जगजीत सिंह की आवाज़. कभी सप्ताह भर शकील साहब के बोल बजते बेगम साहिबा की आवाज़ में, मेरे हमनफस मेरे हमनवा... महीने की तनख्वाह ढा…

मीनारों से उतरती ऊब का मौसम

वाईट मिस्चीफ़ की बोतल में एक पैग बचा रह गया है. वह एक पैग किसी शाम के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता. बस उसे रोज़ देखता हूँ और आर सी पीने बैठ जाता हूँ. विस्की के साथ ज़िन को पीने का कोई मतलब नहीं है इसलिए हर रात वह बचा रह जाता है. एक सफ़ेद पोलीथिन का लिफाफा रखा है. इसमें कॉलेज और नौकरी के शुरूआती दिनों की स्मृतियां है. ख़तों में शुभकामनाएं, ग्रीटिंग कार्ड्स में सुनहरी स्याही से लिखी दुआएं और कुछ पासपोर्ट साइज़ के फोटोग्राफ्स है. इन ख़तों और तस्वीरों का कोई मतलब नहीं है फिर भी वे कई सालों से बचे हुए हैं. कुछ कार्ड्स मुझे अपील करते हैं. ये अपील उस उपेक्षित किले जैसी है जिसमें बरसों से कोई पदचाप नहीं सुनाई देती, जिसकी घुड़साल से घोड़े समय के पंख लगा कर उड़ गए हैं. तीमारदारी में लगे रहने वाले सेवक काली बिल्लियों में बदल गए हैं और मेहराबों के पास के झरोखों में बैठे एक आँख से टोह ले रहे हैं.
ऐसे में एक ऊब चुप से पसरती हुई घेरने लगती है. मुझे इसकी आदत है. बरसों से ऐसा होता आया है कि ऊब के आते ही मैं समर्पण करने लगता हूँ. यह अनचाहा न होकर स्वेच्छिक होता है. जैसे पहले प्रेम में कोई…