Posts

Showing posts from April, 2017

करने से होने वाली चीज़ें

Image
कोई पल जो बेहद भारी लगता है, वह कुछ समय के बाद एक गुज़री हुई बात भर रह जाता है. 
रात की हवा में शीतलता थी. दिन गरम था. साँझ के झुटपुटे में मौसम जाने किससे गले मिला कि सब तपिश जाती रही. हवा झूलने की तरह झूल रही थी. रह-रहकर एक झोंका लगता. आसमान साफ़. तारे मद्धम. कोलाहल गुम. रात का परिंदा आसमान की नदी में बहता जाता है. इसी सब के बीच आँखें अबोध सी शांत ठिठकी हुई. 
बदन के रोयों पर शीतल हवा की छुअन से लगता कि हरारत भर नहीं तपिश भी है. जिसे बहुत सारी शीतलता चाहिए. नींद की लहरें आँखों को छूने लगतीं. धीमे से सब बुझ जाता. 
एक बेकरारी की मरोड़ जागती है. करवट दर करवट. रात की घड़ी से एक हिस्सा गिरा. दूसरी करवट के बाद दूसरा. तीसरी करवट के समय अचानक उठ बैठना. सोचना कि हुआ क्या है? क्यों नींद ठिठकी खड़ी है. किसलिए बदन करवटें लेता जा रहा है. समय का पहिया आगे नहीं बढ़ता. 
बिस्तर ठंडा जान पड़ता है. हाथ सूती कपडे से छूते हैं तो सुहाना लगता है. बुखार अपने चरम पर आता. जहाँ सबकुछ एक सामान तपिश से भर जाता है. दवा लेकर आँख बंद किये सोचता हूँ. होठ गुलाबी हो गए हैं. कच्चे, एकदम कच्चे. वे जगह जगह से फट गए हैं. जैसे कि…

वो जाने क्या शै थी?

Image
छतरी के जैसे खिले हुए दो फूल याद आते रहे.
रात चाँद था. खुली छत पर गरम मौसम की सर्द हवा थी. बदन की हरारत पत्थरों की तरह टूटती रही. भारीपन और बेअसर करवटें. दवा नाकाम. जाग में नींद का इंतज़ार. इंतज़ार में कुछ करने की चाह. इस चाह में कुछ न कर पाने की बेबसी. जैसे किसी योद्धा का का गर्व चूर होता है. सब कुछ ठोकरों पर रखे हुए. जीवन के उड़नखटोले पर बेखयाली में गुजरते दिनों पर कोई प्रेत का साया गिरा. मन एक भीगा हुआ फाहा होकर सब उड़ना भूल गया.
क्यों और अच्छा लगता जाता है आपको?
फिर इसी सवाल पर बहाने बनाते हुए. झूठी दलीलें देते हुए. सोचना- "तुम कह क्यों नहीं देते कि कई बार वहीँ होने का मन होता है. जहाँ छुअन एक सम्मोहन से परे बड़ी ज़रूरत हो." इधर आ जाओ. ये सुनकर मैं कहता हूँ- "आज मैं खुद मुझे अच्छा नहीं लग रहा" सुबह से बिस्तर पर पड़े हुए कभी सीधे कभी औंधे लेटे हुए. ये देखते हुए कि क्या बजा है. ये सोचकर हताश होते हए कि समय रुक गया है.
बहुत दूर कहीं. किसी जगह जहाँ गायों के गले में बंधी घंटियों का हल्का स्वर सुनाई देता है. जहाँ शाम ढले एक अलाव हर मौसम में जलाता है. जैसे असमाप्य बिछोह की …

इतने सारे दुःख उगाने के लिए

Image
ईर्ष्या मत कीजिये  इतने सारे दुःख उगाने के लिए  मैंने बहुत सारी चाहनाएँ बोईं थीं.
धूल भरी आंधियां चलने लगीं. रेलवे स्टेशन पर किसी नये ब्रांड का लेबल था. पानी की ख़ुशबू बोतलों में बंद थी. अचानक मन ने कहा- “अच्छा हुआ.” धूल भरी आंधी. गरमी को पौंछने लगीं थी. एक तकलीफ गयी तो दूसरी आ गयी. पहले बदन पसीने से तर था. अब बदन को धूल ने संवारना शुरू कर दिया. बिखरे बालों के बीच बची हुई जगह पर बारीक धूल भरने लगीं. रुमाल उदासा जेब में पड़ा रहा. कई बार हाथ जेब तक गया मगर खाली लौट आया. क्या होगा इतना सा पौंछ देने से?
जब बहुत सा कुछ आता हो तो उसे रोकने के लिए बहुत थोड़ा काम में नहीं लेना चाहिए.
कभी-कभी बहुत सी खुशियाँ आती हैं. अचानक. लहराती. हरहराती. अचम्भित करती हुई. उस वक़्त पीछे छूट गए छोटे-बड़े दुखों का बांध बनाना बेकार है. दो रोज़ पहले कुछ एक घंटे की यात्रा बाकी थी तब कोच सहायक चादरें समेटने लगा था. उसने हमारे कूपे के परदे में जरा सा झाँका. उसकी शर्मीली झाँक में ख़याल रहा होगा कि काश ये चादरें भी समेट ली जाएँ. वह नहीं रुका. जो चीज़ें जहाँ जाकर खत्म होती हैं. उन्हें वहां तक जाने देना चाहिए. मैंने सोचा कि इस स…