July 29, 2011

इन आँखों में भरी है सावन की बदरी

मुझे कुछ पुस्तकें प्रियजनों से उपहार में मिलती रहती है. अनियमित जीवनचर्या में वे महीनों तक किताबों की अलमारी में एक तरफ रखी रहती हैं. उस कोने को मैं न्यू एराइवल सेक्शन समझता हूँ. अभी मेरे पास तेरह नई किताबें हैं. इनके कुछ हिस्से पढ़ कर वैसे ही रख छोड़ा है. जाने ये कैसी आदत होती है कि एक ही वक़्त में एक काम नहीं कर पाता हूँ. जिस तरह कलगी वाले रंगीन पंछी अपनी पांखें साफ़ करने में दिन बिताते हैं. ज़िन्दगी की डाल बैठे हुए बारी बारी से कई सारी पांखों को अपनी चोंच से सही बनाते हुए दुनिया के हाल पर एक उचाट नज़र डाल कर, उसी काम में लग जाते हैं. मैं भी उनकी तरह बहुत सी पुस्तकों के अंश पढता हूँ और उन्हें वापस अनपढ़ी किताबों के बीच रख देता हूँ.

पिछले साल मैंने नास्टेल्जिया का बहुत आनंद लिया. इसमें प्रफुल्लचन्द्र ओझा 'मुक्त' के संस्मरणों का खासा बड़ा योगदान रहा. उनके संस्मरणों के संग्रह "अतीतजीवी" में एक सदी के जीते जागते, नामी किरदार चहलकदमी करते हैं. उस किताब के बारे में अगर कुछ लिख पाया तो इतिहास, दर्शन, मानवीय मूल्य, आत्मसम्मान, जिजीविषा जैसे अनेक टैग लगाने होंगे. गध्य मुझे सहज रखता है लेकिन अगर कोई मुझसे ये पूछे कि आधुनिक कविता की किताबें कैसी होती है ? तो मेरा पहला शांत और संकुचित उत्तर होगा कि वे बोर होती हैं. उनको पढ़ते हुए कई बार मैं सोचने लगता हूँ कि अब चारपाई से नीचे गिर जाऊं, या इस कुर्सी का पाया टूट जाये या फ़िर छत से कूद जाऊं या गली से गुजर रही मोटर सायकिल के पहिये में अपनी टांग अड़ा दूँ.. फ़िर ख़याल आता है कि इस कविता की किताब को फैंक दूँ और इसके बाद आराम आ जाता है. ये समय, इस दर्ज़े की बोर कविताओं का है.

अपने अस्तित्व और निजता से बेख़बर सामाजिक उथली पीडाओं के नारे लगाती, आत्मभर्त्सना या आत्मसंताप के महिमामंडन में जुटी हुई कविताएं ही मेरे पढने के हिस्से आ रही हैं. वे समकालीन जीवन यथार्थ की विसंगतियों को भूल कर राज्य के विनाशी तत्वों को कोसती है. वे लगावट नहीं अलगाव बुनती हुई है. बेसुरी कविताओं के इस समय में आत्ममुग्ध कवियों के ये उदघोष पढ़ते हुए कि सबसे बुरे समय में सबसे अच्छी कविता हो रही है. मेरा मुंह कसैला हो जाता है. इस बिगड़े हुए स्वाद का पहला कारण है कि मुझे कविता की समझ नहीं है. मैं पहले पठन में ये भी तय नहीं कर पाता हूँ कि इस कविता का प्रयोजन क्या है ? ये यश, अर्थ, ज्ञान, शिक्षा, अथवा सम्मान आदि में से किस हेतु लिखी गयी है. कवि अपनी दृष्टि से हमारे आवरण की जिस विद्रूपता अथवा ख़ूबसूरती को चिन्हित कर रहा है, वह मेरे लिए काला अक्षर भैंस बराबर है. इसलिए इन कविताओं के सपाट रास्ते से मन हट जाता है और तुरंत बाहर लुहारों की गली में ऊंघते हुए कुत्तों, पसरी हुई गायों, कंचे या गुल्ली डंडा खेलते हुए बच्चों, ताश के पत्तों में उलझे हुए अर्थशास्त्रियों और पानी के घड़े लिए औरतों को देखने लगता हूँ.

इन सालों में जिन कविताओं को सम्मानित किया जा रहा है एवं उनको सम्मानित करने वालों के नाम देख कर, मुझे अपने इस विचार पर बारम्बार विश्वास हुआ जाता है कि मैं कविता को पकड़ नहीं पा रहा हूँ. उसके तत्व, शिल्प और कथ्य, मेरी भोथरी और संकरी समझ में नहीं समा सकते. मैं कविताओं की पुस्तकों को नमन करता हुआ एक तरफ रख देता हूँ. ख़ुद के दिल पर हाथ रख कर इस विश्वास के साथ अलमारी से दूर हो जाता हूँ कि एक दिन मैं कविता को जरुर समझूंगा. फ़िलहाल कविता की शास्त्रीय आलोचना से अधिक एक रस भरी कविता का होना मुझे अधिक आनंददायी लगता है. मैं दायरों में कैद, सोचते विचारते हुए जी रहा हूँ. यह एक कबूतर की गुटर-गूं है और लौट कर उसी पाइप पर आकर बैठ जाना है, जिस पर से वह अभी थोड़ी देर पहले उड़ा था.

खैर पिछले साल रंजना भाटिया जी ने भी अपना कविता संग्रह उपहार में दिया. उसे टुकड़ों टुकड़ों में पढ़ा. साया शीर्षक वाले इस संग्रह को पढ़ चुकने के बाद इसके बारे में एक पंक्ति में कहा जा सकता है कि "बंद कमरे की खिड़की से आता एक चिड़िया का बेरहमी से स्वसंपादित गीत है, साया."
इस संग्रह को पढ़ते हुए मैंने पाया कि कविता व्यक्ति की सबसे अच्छी मित्र है. एकांत में उसके सबसे करीब होती है. खीज और अफ़सोस को बुहारने में मदद करती है. कई बार वह उस अच्छे दोस्त की भूमिका में भी आ जाती है जो आपको झूठा यकीन दिलाता है कि सब ठीक हो जायेगा. ये कविताएं मूलतः एक खूबसूरत डायरी है. इस संग्रह के आईने में साफ़ दीखता है कि रंजना भाटिया नितांत अकेली खड़ी हैं. उनका कोई साथी नहीं है. उनकी मित्र और पहली श्रोता उनकी नन्ही परियां है. जिनके लिए माँ यूं भी इस दुनिया का आखिरी सच हैं.

मित्र, कविताएं जीवन में उर्वरा का काम भी करती है इसलिए इनका दामन थाम कर रखना. अगली बार बात कुछ ऐसे कहना कि सुनने वाले का कलेजा फट पड़े.
इधर बरसात हो नहीं रही. उदासियों का 'बार' बंद है. दोस्त उलझनों में हैं. गीत की सावंत आंटी की लड़कियाँ आसेबज़दा होकर सत्रह साल की उम्र में भूतनी सी दिखाई दे रही हैं. ऐसे मौसम में, साया से कुछ कविताएं बिना अनुमति के यहाँ टांग रहा हूँ. आशा है कि जिसने किताब दी है, वह तीन छोटी कविताओं के लिए कोई तकाज़ा न करेगा.

१. अस्तित्व
रिश्तों से बंधी
कई खण्डों में खंडित
हाय ओ रब्बा !

२. नदी का पानी
एक बहता हुआ सन्नाटा
धीरे - धीरे तेरी यादों का...

३. सावन
चल ! प्यार का सपना
फ़िर से बुनें
इन आँखों में भरी है सावन की बदरी.

July 24, 2011

वी ओनली सैड गुडबाय विद वर्ड्स...

मृत्यु अप्रतिम है. शोहरत की बुलंदी से एक कदम आगे वाली घाटी के निर्वात में प्रतीक्षारत रहती है. उसका सौन्दर्य मायावी है. पहली नज़र का प्यार है. वह जब अपने गुलाबी हाथों से हमें समेट रही होती है, दर्द बड़ी तेजी से छूटता है. आखिरी साँस के बाद दर्द यहीं रह जाता है प्रियजनों की आँखों में और हम तकलीफों के आवरण से आज़ाद हो जाते हैं. ख़यालों के इसी पैरहन को समेटते सहेजते हुए कल की रात बीती. ये बरसात के इंतजार के दिन है मगर कुछ नहीं बरसता...

रात, एमी वाइनहॉउस की तस्वीरों को देर तक देखा. उसके गोदने देखे. वीडियो देखे. उसकी खबरें देखी. देखा कि उसका स्थान खाली हो चुका है. किसी भी खालीपन को भरा नहीं जा सकता क्योंकि कुदरत के मेनिफेस्टो में लिखा है कि एक जैसे लोग नहीं बनाये जायेंगे. ऐसे में मुझे बेल्ली होली डे और जिम मोरिसन की याद आई. अपनी वो बात भी याद आई कि आदमी के काम करने के दिन सात आठ साल ही होने चाहिए और उसके बाद अपने चाहने वालों से विदा लिए बिना असीम शांति में खो जाना चाहिए. मेरे मन में ऐसा विचार पिछले साल के बेहद उलझे हुए दिनों में आया था. एमी ने इसे फ़िर से कर दिखाया.

उसने ऐसा क्यों किया ? बुलंदियों के शिखर से शराब के प्याले के पैंदे में पड़े ड्रग्स के दलदल में छलांग क्यों लगा दी ? शोहरत की शाख इतनी कच्ची थी या फ़िर अन्तरिक्ष की भारहीनता में दिशा खो गयी थी. स्वर्ण तमगों के ढेर पर बैठे हुए. गीत और संगीत रचते हुए. लाखों दिलों की धड़कनों में गुनगुनाते हुए. दुनिया के लाल कारपेट पर नाजुक बदन के ख़म बिखेरते हुए. आवाज़ के जादू से वशीकरण की सात तहों को बुनते हुए किस वक़्त ये सिरफिरा ख़याल आया होगा कि दुनिया फ़ानी है. ज़िन्दगी पानी में कैद बुलबुला है और तेजी से ऊपर की ओर जा रहा है.

हमारे बेइंतहा अकेलेपन, टूटन और दिमागी उलझनों में बीतते हुए गुंजलक दिनों को गिनने का कोई पैमाना अभी बना नहीं है. ये एक नामालूम सी बात है कि कब और किस तरह से कोई तनहा हो जाता है. प्रेम जैसे असरदार सिडेक्टिव का कोई अल्टरनेट हम क्यों नहीं बना सके हैं. बंदरों के द्वीप बनाने में क्या मजा है. मनुष्य के एकाकीपन को बढ़ाती जा रही भौतिकता की मार्फीन पर प्रतिबन्ध क्यों नहीं है ? ऐसे सवालों के सिरों को थामे हुए मैं एमी से रश्क करता रहा कि जाने मेरे अब और कितने गाम बाकी है ?

फ्रांक सिनेट्रा जब आई फील अ ग्लो जस्ट थिंकिंग ऑफ़ यू ऐंड द वे यू लुक टुनाईट... गा रहे होते. उनको सुनते हुए एमी तुम्हें कैसा लगता होगा. क्या कभी सोचा था कि ऐसे ही किसी दिन इतना गहरा और उदात्त गीत तुम ख़ुद गाओगी. सुनने वाले पागल हुए जाते होंगे, ग्रेमी एवार्ड्स की एक कतार तुम्हारी तरफ फिसलती हुई कदम चूमने को आती होंगी ? तुम्हें मालूम होगा एमी कि हमारे कदमों को अक्सर आगे बढ़ने की लत लग जाती है. वे रुक कर दम नहीं भरना चाहते कि रुकने पर उदासी घेर लेती है. इसी उहापोह में सफलताओं के शोर का हथोड़ा खोपड़ी के नीचे के तरल द्रव्य पर अकस्मात प्रहार करता है.

हमारे बचपन के दोस्त, टीन ऐज़ के क्रश, जवानी के महबूब उम्र की हर साँस पर हौंट करते रहते हैं मगर ज़िन्दगी का तम्बोला खेलते हुए सबकी पर्चियां आगे पीछे कटती है. कुछ लोग अब भी कुर्सियों पर बैठे होते हैं कुछ अपना ईनाम लेकर जा चुके होते हैं मगर तुमने अपनी पर्ची को फाड़ दिया. जिम मोरिसन, बेल्ली होलीडे, ब्रिटनी मर्फी, सिल्विया प्लेथ ने भी ऐसा ही किया. ऐसा दुनिया के बहुत से लोग करते हैं. वे आत्महंता हो जाते हैं. उनको बार बार आत्महत्या करने के प्रयासों से बचाए जाने की कोशिशें नाकाम हो जाती है. वे दुनिया से प्रेम और नफ़रत एक साथ करते हैं. शायद कभी कभी दिमाग हमारे चारों तरफ एक ऐसा आवरण रच देता है, जिसमें अहसासों का संचरण नहीं होता.

कोई बात नहीं एमी... शराब पीकर मारपीट करते हुए, अपने लहुलुहान नाक और बदन को पौंछे बिना लन्दन की सड़कों पर रात को आवारा फिरते, नशे के अवसाद की चादर को चूमते हुए, सलाखों के पीछे रात बिताते हुए, पुलिस कोप से ये कहते कि औरतें आपस में आदमियों जैसी ही बातें करती है लेकिन वे थोड़ा ज्यादा जिज्ञासु और गहरी होती हैं. तुमने जो जीया अच्छा जीया, कुछ बेहद अच्छे गीत रचे हैं. तुम्हारी आवाज़ का स्पंदन काल के क्षय से लड़ता रहेगा लेकिन इन दिनों मैं अपनी उदासियों की 'बार' को कुछ समय के लिए बंद कर चुका हूँ. एमी, तुमने गलत समय पर दस्तक दी.

* * *

इस आलेख का शीर्षक, एमी वाइनहॉउस के गीत बैक टू ब्लेक से लिया गया है.
एमपी थ्री सौजन्य : आइसलेंड रिकार्ड्स


July 23, 2011

म्यूजिक स्टूडियो में फ़िर आना, रुकमा

वे इस रेगिस्तान की मांड गायकी का आखिरी फूल थी. गुरुवार की सुबह एक अफ़साना बन कर शेष रह गयी है लेकिन उनकी खुशबू हमेशा दिलों में बसी रहेगी. मैं अब उनके बारे में सोचूंगा तो वे मुझे एक बड़े ढोल को थाप देती हुई दिखाई देगी. उनके भरे हुए लम्बोतर चेहरे पर सजी वक़्त की लम्बी लकीरें और काला-ताम्बई रंग याद आएगा. अल्लाह जिलाई बाई, रेशमा, मांगी देवी की परम्परा की इस गायिका का नाम रुकमा है. पोलियो ने दोनों पैर छीन लिए लेकिन वे गायिकी के हौसले से ज़िन्दगी के सफ़र को तय करती रही.

हर पर्व पर गफूर घर के आगे ढोल पर थाप देता हुआ ऊँचे स्वर में कुछ देर गाता और फ़िर कहता. खम्मा घणी हुकम किशोर जी साब रे बारणे बरकत है. ओ रुकमों रो डीकरो कदी खाली हाथ नी जावे... हुकम पचा रूपया में हाथ नी घातु एक सौ इक्यावन... और फ़िर कुछ गाने लगता. उसके कहे का अर्थ होता कि इस घर से बरकत है. रुकमा का ये लड़का कभी खाली हाथ नहीं जाता. मैं पचास रुपये नहीं लूँगा पूरे एक सौ इक्यावन... सब मांगणियार इतने ही मीठे और आदर सूचक संबोधन से सबको बुलाते हैं.

पिछली बार विवेकानंद सर्कल पर मिल गया. कहने लगा की माँ की तबियत ख़राब है. कल जोधपुर से वापस लेकर आये हैं. मैंने उससे वादा लिया कि वह कल आकाशवाणी आएगा. सोचा कि कार्यक्रम अधिकारियों को कहूँगा कृपया इसे रिकार्ड कर लें, कुछ मदद हो जाएगी. तबला का हाई ग्रेड में अप्रूव्ड आर्टिस्ट है. वो हर बार हाँ भरता लेकिन नहीं आता. मुझे वह हमेशा सुबह पुरखे भील के घर से निकलता हुआ दिखाई देता. अक्सर उसके सुर हमारे घर की दीवारों से छन कर आ जाते. बालकनी या छत से देखो तो कच्ची शराब के लिए मोहल्ले में लोगों के यहाँ कुछ गाता बजाता दिख जाता.

मुझे गफूर को देख कर अफ़सोस होता. कमाल का गायक और साजिंदा, अपने लहू में दौड़ती मुफलिसी की आग को शराब के हवाले करता है. ज़िन्दगी को बुझाने के इस तरीके पर असंख्य उपदेश दिए जा सकते हैं लेकिन यही ज़िन्दगी इतनी सितम ज़रीफ़ है कि दो वक़्त की रोटी के लिए आदमी को आदमी नहीं रहने देती. भूखे नंगे के गले में बसी हुई सरस्वती देर तक अपना आशीर्वाद नहीं बनाये रख सकती. उसके पास जीने का कोई साधन नहीं है. राजे महाराजे रहे नहीं, सरकार कोई इमदाद देती नहीं.

जिप्सी परिवारों के गायन से आमदनी के जो सुनहरे साल थे. 2008 की मंदी में डूब गए. यूरो और डॉलर की आमदनी का बड़ा हिस्सा कला के पारखी कहे जाने वाले बिचोलिये खा जाते मगर फ़िर भी जो बचता वह इनके लिए साल भर बिताने को काफी होता था. इधर कुछ बढती हुई आबादी ने भी अवसरों को कम कर दिया. इन सालों में रुकमा के दिन भी फाके करते हुए बीत रहे थे. पति उम्र के पहले पड़ाव पर छोड़ गए. पाँव में लकवा. खेती को उपजाऊ ज़मीन नहीं. विदेशों से डाक्यूमेंट्री बनाने वाले आते, महीना भर साथ रहते और मुफलिसी के गीत को फिल्मा कर लाखों में बेचते. रुकमा को मिलते कुछ हज़ार रुपये.

आस्ट्रेलिया से आई एडना बहुत समय से जिप्सी संगीत सीख रही थी. मुझसे कहती है. मैं गुरु जी के पैरों की धूल, आपको कुछ सुनाती हूँ. गाने लगती है. केसरिया बालम आओ नी पधारो म्हारे देस... मैं मुग्ध होकर उस विदेशी लहजे में मेरी अपनी धरती का गीत सुनता. मैं कहता हूँ. आपने बहुत अच्छा सीखा. वे रेत को छूती हुई कहती हैं. अच्छा ! बहुत धन्यवाद. उनकी छोटी आँखें शरमाते हुए मुस्कुराती हैं. मुझे ख़याल आता कि जब रुकमों विदेशों में गाकर कुछ देर रूकती होंगी तो जाने कितनी आँखें उनको अपने दिल में छिपा लेती होंगी.

कल उनके जाने की खबर के बाद टेप्स को खोजा. जो मिला उसे देख कर मैं भीगी आँखों से मुस्कुराया. 24 फरवरी 1998 की रिकार्डिंग थी. टेप क्यूशीट में मेरे हाथ से लिखी गीतों की डिटेल्स. अपनी इतने साल पुरानी लिखावट याद आई. रुकमा अपने साजिंदों के साथ पालथी मार कर म्यूजिक स्टूडियो में बैठी हुई दिखाई दी. उनके चेहरे पर वही सूफियाना नूर दमक रहा था. वह सुरीली आवाज़... जैसे मैं पूछता हूँ कि आप क्या गायेंगी ? और वे कहती हैं. किशोर साब कहें, क्या सुनेगे. मैं मुस्कुराता हुआ अतीत से लौट आता हूँ.

उसी रिकार्डिंग से एक गीत है. अरणी. इस गीत में अपने पीहर को याद करती हुई नायिका कह रही है. ओ माँ देखो अरणी पर कितने सुन्दर फूल खिल आये हैं. हरियाली चारों तरफ फूटने को है. ओ मेरे भाई, इस बार सावन की तीज पर ऊंट लेकर मुझे लेने आना भूल न जाना. ओ नौजवान ऊंट तुझे बिठाऊं झोक में. पीने को दूँ बाढ़ाणे की बरसात का मीठा पानी. तेरी मोरी में मोती जड़वा दूँ और करूँ पीतल का पिलाण. कसूम्बल रंग के धागों से तुझे सजा दूँ. बस इस सावन की तीज पर मुझे लेने आना भूल न जाना. अरणी पर खिल आये हैं सुन्दर फूल...

सावन की तीज आने में दस दिन बचे हैं और रुकमा सावन के लगते ही अपने पीहर के लिए इस ससुराल से सदा के लिए विदा हो गयी हैं.

* * *

इस गीत की wma फ़ाइल को mp3 में कन्वर्ट कर के एक दोस्त ने भेज दिया है. शुक्रिया ! अब आप इसे यहाँ सुन सकते हैं. इस लोक गीत को डाउनलोड करने के लिए नीले रंग के लिंक पर क्लिक करें. अरणी : रुकमा देहड़


July 20, 2011

अपूर्व, कोई दिन तो सुकूँ आएगा...

मेरे प्यारे अपूर्व,
दीवार की खूंटी पर टंगी फ़कीर की झोली से पुराने सत्तू की तरह मौसम उसी शक्ल और स्वाद में टपकता रहता है. सुबह-ओ-शाम के मातम को ज़िन्दा रखने के सामान की तलाश में अतीत के समंदर में गोते दर गोते लगाता हुआ किसी याद का टुकड़ा बीन लाता हूँ. अभी आखिरी सफ़ा दिखाई नहीं देता. वह सिर्फ़ ख़याल में धुंधला सा उभरता है लेकिन ज़िन्दगी के खर्च के हिसाब का पन्ना काफी लम्बा हो चुका है. ऐसा नहीं सोचता हूँ कि अगले अंधे मोड के बाद 'दी एंड' का बोर्ड दिखाई देगा मगर कुछ है जो मुझे हैरान और परेशान करता है.

अक्ल के जोर से ज़िन्दगी के साज़ को कसना मुझे ज़रा सा गैर जरुरी काम लगता है. सुर कहां बिगड़ जाते हैं ? इस सवाल को पैताने रखता हूँ. सिरहाने के पास बीते हुए हसीन लम्हे हैं. भले ही इनका नासेह की नज़र में कोई मोल नहीं है. बस ऐसे ही वक़्त के छोटे छोटे हिस्से गिरते जाते हैं. मैं इस गिरने की आवाज़ से डर कर फिर से अपने अतीत में भाग जाता हूँ. मेरी ख्वाहिशों की कंदील पर जो चमकता हुआ नूर रक्स करता है. वह भी अतीत के रोशनदानों से उड़ कर आता है. मैंने अपने किस्सागोई के हुनर से अतीत को एक ऐसे कारखाने में तब्दील करने की कोशिशें की हैं कि वहां रखे हुए अफ़सोस अमीबा की तरह अपने आप एक से दो हिस्सों में बंटते जाएँ. मुसलसल यादों की पैदावार में बरकत बनी रहे.

आरज़ुओं की सिलाईयों में समय को बुनते हुए, जैसी भी बन पड़ी है. यह ज़िन्दगी मुझे बहुत पसंद है. इस ज़िन्दगी में उसकी सुंदर आँखें चमकती है. वे आँखें जो दुनिया को ठोकर पर रखने का हौसला लेकर ही पैदा हुई थी और अपने ज़ख़्मी पैर मुझे कभी न दिखाती थी. बस ज़रा सवाल के अंदाज़ में पूछती थी कि तुम मेरे पास हो सकते हो या नहीं... मेरे अपने अंदरखाने की अँधेरी गलियों में भटकने के इतने रास्ते थे कि सही जवाब उन पेचदार परीशां रास्तों में खो जाते. वह फिर से रुक कर आवाज़ लगाती थी. उसकी आवाज़ मैं अब भी सुनता हूँ. डूबी हुई, लोचदार और जरुरत से भरी आवाज़.

उस आवाज़ को सुनते हुए अक्सर चौंक कर उठ बैठता हूँ. दफ्तर छोड़ देता हूँ, घर से भाग कर शहर की दुकानों के साइन बोर्ड पढता हुआ टहलता हूँ, छत पे होता हूँ तो बंद कमरे में लौट आता हूँ, कमरे से बालकनी में और इसी तरह हर जगह से घबरा कर एक अंतहीन सफ़र में चलता हुआ जब थक कर बैठ जाता हूँ तो ख़याल आता है कि मैं किसी गोल चक्कर में फंस गया हूँ. अब ये मालूम करना कठिन है कि वह आवाज़ मेरे आगे है या पीछे ? मैं याद के टुकड़ों के पीछे भाग रहा हूँ या फिर वे नश्तर जैसे टुकड़े किसी गाईडेड मिसाइल की तरह मुझ तक आ रहे हैं.

ज़िन्दगी के इस छोटे से मंज़र को कई तरीकों से लिखते हुए पाता हूँ कि मेरी तकलीफें गैरवाजिब नहीं है कि दुनिया में कुछ और भी लोग ऐसे ही मसहलों में गिरफ्त है. उनको भी इस नासमझी ने घेर रखा है कि वो शय क्या थी, जो एक बार आँखों में कौंध कर उम्र भर के लिए तनहा कर गई ? मेरी अक्ल किस पेड़ के नीचे और किस दिन आँख खोलेगी समझ नहीं आता. बस ऐसे ही गुंजलक ख़यालों की चादर में बेकस, बेबस और उदास बैठा रहता हूँ. अचानक कोई रौशनी की शहतीर मेरे सर से टकराई और मैंने ये फैसला किया कि उससे मुलाकात के आख़िरी लम्हे को लिख कर दोस्तों से बांट लूं. मेरे दोस्तों के घरों की दीवारों पर यह अफ़साना चमकता होगा और मैं इसी ख़ुशी में आगे से उसे याद न करने का हौसला पाकर, याद की लेनटर्न को बुझा दूंगा.

तुम्हें पता है अफ़सोस कभी पीछा नहीं छोड़ते. वे दो से चार होते हुए बददुआ की तरह असर दिखाते हुए हमें घेर लेते हैं. पिछले सालों से मैं जिन दोस्तों से किस्से कहानियां शेयर कर रहा था. उनमें से कुछ सोये हुए, कुछ अपने शहरों से दूर ज़िदगी को आसान बनाने की मशक्कत में मसरूफ, कुछ गाफ़िल और कुछ अपने नोलिज के बोझ तले दबे हुए मिले. उन्होंने मेरी दरख्वास्त को अनसुना कर दिया. मैंने दूसरी रात जब तीसरा जाम हाथ में लिया तो मुझे पहले हैरत और उसके बाद नफ़रत हुई कि इसी शय को दोस्ती, मित्रता या ऐसा ही कुछ कहते हैं तो मैं इसे ज़िन्दगी में सबसे दोयम दर्ज़े की चीज़ घोषित करता हूँ.

मेरे पास कोई बीस पच्चीस मेल पते हैं. जिन्होंने बड़े दिल से गुज़ारिशें की थी कि हथकढ़ पर कमेन्ट का ऑप्शन खोलिए. हम आपके अहसासों की क़द्र करते हैं और ज़िन्दगी के खट्टे मीठे स्वाद को बांटना चाहते हैं. तीसरे जाम के वक़्त उन ख़त नवीसों का ख़याल भी आया. इसके ठीक बाद मैंने हसरत भरी निगाह से खुद से दूर बैठ कर खुद को देखा. लौट कर खुद तक आया और अपने ही माथे पर हाथ फेरते हुए कहा. बस वही एक साथ है. वही हर जगह है. इसके बाद मैंने अपना स्टेट्स लिखा और इन फ़रेबआलूदा ज़हीन लोगों से विदा लेकर सो गया.

मगर मुश्किलें फिर भी साथ नहीं छोडती. सुबह जब पहली दफ़ा देखा तो पाया कि मेरे कद्रदान नसीहतों के बजूके हो गए हैं. मुझे हर उम्मीद, हर तवक्को और हर हसरत को बुझा देने को कह रहे हैं. इनमे से अधिकतर वे दोस्त हैं जिन्होंने मेरी अर्जी को ख़ारिज किया हुआ है. उनके सवालात भी बेहतर थे कि हालाँकि मैंने इसे शेयर नहीं किया है फिर भी आप बताएं कि कोई इसे क्यों शेयर करे ? अपूर्व जानते हो दुनिया के हुनरमंद लोगों के पास अपने तजुर्बे से जुटाए हुए वे सवाल होते हैं कि अगले को शिकस्त देकर ही दम लेते हैं. मेरे पास इसका एक ही जवाब था कि मैं आपको अपना दोस्त समझ बैठा था.

मेरे स्टेट्स पर तुम्हारा लिखा फैज़ साहब का शेर पढ़ा तो मुझे उस दिन की याद आई. जब तुम लोग ब्लॉग छोड़ कर जा रहे थे और मैंने अपने आंसुओं को पौंछ कर इल्तज़ा की थी. जैसे मेरा साया ही रूठ कर जा रहा हो. दिसम्बर के उन दिनों में ये अहसास मुझे कई दिनों तक सताता रहा कि लोग जिन्हें वर्च्युअल समझते हैं. मैं उनके लिए क्यों रो रहा हूँ. ज़हन में उठते सवालों को बांध कर मैं लिख पाया था कि दोस्तों ब्लॉग छोड़ कर न जाओ, कल कौन लिखेगा कि ये दुनिया ऐसी क्यों है ? ये मैंने इस लिए लिखा था कि इस दुनिया की बेरहम रवायतों से नफ़रत मुझे जिलाए रखती है. दोस्त मुझे बचे रहने में मदद करते हैं. हमारे होने से ही आज एक अरसे बाद भी तुम बचे हुए हो किसी मासूम बच्चे की पेशानी के नूर की तरह मेरे सीने में ...

वो किस करवट सो पाती होगी, उसके घर में सूरज किधर उगता होगा, आँखों के भीगे मौसम को किस तरह जीत पाती होगी, उसके साफ़ चमकते दिन पर पैबंद की तरह मेरी बातें कैसी दिखती होगी, कोई दोस्त न होगा तो क्या होगा, हम मिल जाएँ किसी दिन तो क्या कीजियेगा, कभी वो बेचैन होकर कह दे कि मैं भी उदास हूँ तो उसकी आँखें किस टिशु पेपर से पौंछियेगा, कभी वह एक सवाल करने लगे कि तुम मुझसे उम्र में बड़े थे तो नासमझ कैसे हुए, हाथ की जिन रेखाओं से तक़दीर को पढने का ड्रामा करते थे, उस हाथ को छोड़ते हुए तुम्हें अफ़सोस क्यों न हुआ, तुम एक मुकम्मल पता लेकर दुनिया में क्यों न आये कि मैं जब चाहती तुम तक आ सकती.... ऐसे सवालों से घिरा हूँ.

वासी शाह के शेर में वही मुस्कुराती है. फैज़ के इंकलाब में भी उसी को पाता हूँ. लोह-ए-अज़ल यानि धर्म के आखिरी बड़े उपदेश में उसी का ज़िक्र है. कृष्ण, यज्ञाद भवति पुर्जन्यः में कल्याणकारी, निष्काम, निष्पाप और विघ्न हरण करने वाली जिस पवित्र यज्ञ ज्वाला की बात करते हैं वह उसी का अनंत रूप है. वह मेरे भीतर है एक भीगे हुए आंसू की तरह, वह मुझसे जुदा नहीं, मेरे साथ है. उसे मेरी बेवजह की बातें पसंद है. इसीलिए खुद से कहता हूँ. "चल छोड़ ना, जो तेरा था वो मिल गया..." अब किसी से कोई उम्मीद नहीं. शराब के प्याले को औंधा रखा हुआ है. अगले शनिवार की रात तुम आना. मैं तीन शराबों को मिला कर 'अर्थक्वेक' नामक कॉकटेल बनाऊंगा और हम दोनों पीकर चित्त हो जाएंगे फिर कोई सवाल कैसे सताएगा...

आज सुबह सात समंदर पार से आई तुम्हारी भीगी हुई चिट्ठी को कई बार पढ़ते हुए दूर खड़े अरावली से बिछड़े हुए पहाड़ों को देखते हुए सोचता हूँ कि उसकी याद न होती तो ज़िन्दगी क्या होती.

तुम्हारा दोस्त.

July 18, 2011

ये बेदिली कल तक न थी...

ये हर रोज़ का काम होगा और सदा से इसी तरह अजान दी जाती रही होगी. मैंने आज ही सुनी. जबकि मस्जिद, तीसरे चौराहे के ठीक सामने खड़ी है. उन दिनों मेरी उम्र पांच साल रही होंगी. जब इसे पहली बार देखा होगा. मदन लुहार की दुकान से होता, सड़क के किनारे सीमेंट के फुटपाथ पर चलता, अपने पिता को खोजता, उनकी स्कूल तक आ गया था. उस बात को बीते हुए पैंतीस बरस हो गए. चबूतरे वाले नीम के पेड़ के सामने खड़ी स्कूल और पास की मस्जिद एक ही दीवार बांटते हैं. रास्ता दोनों और जाने वालों के कदम चूमता है.

मुझे इस स्कूल के बारे में पुख्ता सिर्फ़ यही पता है कि दूसरी पाली के बच्चे, दोपहर की अज़ान सुन कर गणित का घंटा बजने का हिसाब लगाते हैं. आज मस्जिद से निकलते हुए एक नमाज़ी को देखता हूँ. किसान छात्रावास के पास सायकिलों की दुकान चलता है. ख़ुदा के दरबार में अपनी अर्ज़ी लगा कर फिर से सायकिल के पंक्चर बनाने जाते समय स्कूल की खिड़कियों की तरफ देखता है. उसे याद न आता होगा कि अब तक वह कितनी सायकिलें कस चुका है मगर खिड़कियों से आती आवाज़ों को सुन कर शायद सोचता होगा कि वो माड़साब कितने लम्बे थे.

बच्चों को यकीनन इससे कोई गरज नहीं कि इबादतगाह से उठती पुकारों पर अल्लाह क्या सोचता है. मैं भी उदास मौसम में थके कदमों से चलता रुक जाता हूँ. अपने बेटे का हाथ थामे गन्ने की दुकान के आगे कुछ देर सोच कर लकड़ी की बैंच पर बैठ जाता हूँ. मस्जिद को देख कर उस लड़की की याद आती है. जिसने एक शाम कहा था. "मग़रिब की नमाज़ से उठते ही आपका ख़याल आया..." और फ़िर देर तक चुप रही. बादलों की एक कतार कुछ बूँदें बिखेरते हुए सर से गुजरी तो आसमान की ओर झाँका. उस जानिब, वही न भूला जा सकने वाला सवाल था. पापा, एक दिन सब कहां चले जाते हैं ?

* * *

कल रात 'मिंट थंडर' कॉकटेल बनाया था. स्टील के वाइन ग्लास में पुदीने की हरी पत्तियां, एक मीज़र ड्राई ज़िन, एक मीज़र स्वीट सोफ्ट ड्रिंक और छोटे आईस क्यूब डाल कर लकड़ी के दस्ते से कूट कर बारीक कर लिया. स्टील ग्लास पर ढ़क्कन लगा कर, उस ढ़क्कन के उड़ जाने के अहसास तक शेक किया. प्याले में डाल कर वाईट वाइन के साथ हार्ड सोडा से टॉपिंग कर ली. दिखने में अच्छा हो इसलिए लेमन स्लाइस भी... . तुम पियोगे तो इस लाजवाब स्वाद के मुरीद हो जाओगे मगर मैं दूसरा पैग पूरा न पी सका. कि जब बहुत उदास होता हूँ तो शराब भी दिल से उतर जाती है. सब तरीके बेकार हो जाते हैं. मैं उसे बैकयार्ड में ऐसे ही छोड़ कर डिनर के लिए चला आया था.

* * *

रेशमा को सुनोगी, आयरिश कवि थॉमस मूर की एक खूबसूरत कविता का उर्दू अनुवाद गा रही है.

July 13, 2011

इस शहर का नाम क्या है ?

एक बेकार सी दोपहर के वक़्त पलंग के आखिरी छोर पर बैठे हुए लड़की ने कहा. वह मुझे पसंद है. ही इज़ सो केयरिंग ऐंड वैरी हम्बल. मालूम है, मेरी पहली रिंग पर वह फोन पिक करता है, जब मैं कहती हूँ अभी आओ तो वह उसी समय आता है. मेरे लिए रात भर जाग सकता है. उसने कई दिनों से अपनी जींस नहीं बदली क्योंकि वो मैंने उसे दिलवाई है. अभी वह क्रिकेट खेल रहा है मगर खेलते हुए भी मुझसे बात करता है. वो मेरे साथ रहना चाहता है.

इसके बाद एक लम्बी चुप्पी दोनों के बीच आकर बैठ गयी. उनके बीच कुछ खास बचा नहीं था. जिसे वे प्रेम समझते थे वह वास्तव में एक दूसरे के होने से एकांत को हरा देने का प्रयोजन मात्र था. एक तरल अजनबीपन बढ़ने लगा तो उसके पहलू से उठते हुए लड़की ने आखिरी बात कही. तुम्हारे साथ सिर्फ़ रो सकती हूँ और उसके साथ जी सकती हूँ.

उसके चले जाने के बाद कई सालों तक उस लड़के को कुछ खास इल्म न था कि किधर खड़ा है और किस झोंके के इंतज़ार में है. धुंधली तस्वीरों में उस शहर की सड़कें वीरान हो गई थी. घंटाघर के पास वाली चाय की थड़ी पर वह चुप सोचता रहता था. इस शहर का नाम क्या है ?

नदी के किनारे बैठे हुए
या वादियों को सूंघते, तनहा रास्तों के मोड़ पर
या कभी किसी सूनी सी बेंच पर
या शायद किसी पुराने पेड़ की छाँव में
एक तिकना था उसके हाथ में और अचानक छूट गया.

जैसे किसी ने पढ़ लिया हो स्मृतियों में बचा प्रेम...

ऐसा सोचते हुए मुझे ज़िन्दगी कुछ आसान लगती है
कुछ रूह को दीवानेपन की कैद में सुकून आता है.

जब अचानक बच्चे दौड़ते हुए आते हैं, कमरे में
मेरे हाथ से भी कोई पन्ना अक्सर छूट जाता है
जैसे पकड़ी गयी हो दोशीज़ा, चिट्ठी लिखते हुए महबूब को
कि बातें बेवजह हैं और बहुत सी हैं...

* * *

इधर कई दिनों से बादलों का फेरा है. हवा अचानक रुक जाती है. शहर की सड़कें और घर अजनबी लोगों से भर गए हैं. डॉलर की पदचाप से उडती हुई धूल पेशानी की मुबारक लकीरों को और गहरा कर रही है. अब ये रेगिस्तान मुझे रास नहीं आ रहा. बैडरूम में एक हाथ की दूरी पर प्रीमियम स्कॉच विस्की की तीन बोतलें रखी है मगर रूस की घटिया देसी शराब वोदका पीता हुआ शाम बुझा देता हूँ. तुम होती तो इसे भी डेस्टिनी कहते हुए मुंह फेर कर सो जाती...

July 9, 2011

यूं भी किसी और सिम्त जाना था.

यात्रा वृतांत : अंतिम भाग

सर्पिल रास्तों से गुजरती हुई लो फ्लोर बस की गति ख़ुशी देती थी. बाहर घाटियाँ और उनके भीतर से ऊपर की ओर उठती हरियाली मनभावन थी. सूखे देस की आँखें, इन दृश्यों को भरपूर कैद करती जाती. भूखे पेट बच्चे जी मचलने की शिकायत करते हुए बारिश की फुहारों में फ़िर से अपने कष्ट को भूल जाते. हाल जया का भी कमोबेश ऐसा ही था. उसे यूं भी बस और चार पहिया वाहनों में सफ़र करना कभी रास नहीं आता. उम्र के इस पड़ाव तक आते आते उसने ज़िन्दगी की मुश्किलों से लड़ने और सब्र करने का हुनर सीख लिया था. मैं उसके उतरे हुए चेहरे को देख रहा था. वह सर दर्द और उलटी कर देने के बीच के हालात में ख़ुद को रोके हुए थी. आधे रास्ते में फ़िर एक बार बारिश की फुहारें आई तो मन बदला लेकिन रास्ता कठिन से कठिन होता गया. बस बहुत से मोड़ों पर अचानक से रूकती. पहाड़ी रास्तों पर चलने की अनुभवहीनता के कारण हर बार हम अपनी सीट से लगभग गिर जाते.

मिथकीय, पौराणिक और ऐतिहासिक कथाओं वाले देहरादून का ज़िक्र सबसे पहले बचपन में अपने पिता के मुख से सुना था. वह एक अपूर्ण कामना जैसा कुछ रहा होगा. जिसका आशय था कि बच्चों को सर्वश्रेष्ठ शिक्षा दी जानी चाहिए और इसके लिए सबसे उपयुक्त स्थान दून वैली है. मेरे पिता एक बेहद गरीब परिवार में जन्मे थे. उनके पास कोई उपजाऊ भूमि न थी. सैंकड़ो मील दूर तक मजदूरी के लिए कोई कारख़ाने न थे. उस ग्रामीण जीवन में पढाई और ज्ञान जैसी किसी शय का वास्ता सिर्फ़ उन बच्चों से था, जो कहीं से ये जान गए थे कि उन्नति का रास्ता किताबों में छुपा है. उनके साथ के सब लोग स्व शिक्षित थे. उन्होंने पानी के पींपे ढोए और उससे मिलने वाले चार आने से शहर के कमरों का किराया चुकाया. गाँव तक की पच्चीस किलोमीटर की दूरी पैदल तय की और अपना भाग ख़ुद लिखा.

हमारा एक छोटा सा प्यारा बच्चा है. उसकी नेपीज़ बदलते हुए जया ने बेहद ख़ुशी भरी रातें बितायी है. उस बदमाश ने मुझे कभी टी वी नहीं देखने दिया और मेरा परिचय टी वी में उछलते कूदते कार्टून करेक्टरों से करवाया. स्कूबी का नाम पहली बार उसी के पास बैठे हुए जाना. वह अपने नाना के घर में ही रहा. उसके पिता ज़िन्दगी भर अपनों से फरेब खाते हुए रास्ते तलाशते रहे. उसकी मम्मा ज़िन्दगी की तमाम मुश्किलों से लड़ते हुए अपनी सेहत के अधीन बनी रही. इन हालातों ने उसे शायद अधिक मेच्योर कर दिया था कि एक दिन उसने अपनी इंजीनियरिंग की पढाई छोड़ कर सेना में जाने का फैसला कर लिया. उसके पास बेहतर अवसर थे कि वह एम बी ऐ करता और किसी मल्टी नॅशनल कम्पनी में काम करते हुए जीवन बिता देता. वहां उसके लिए सुख होता लेकिन उसने मुक्ति को चुना. आश्रित होने के भाव से आज़ादी चाही. वह अगर छः महीने अपनी आँखों के लिए अभ्यास करता तो एयर फ़ोर्स के लिए पात्र होता किन्तु उसने प्रतीक्षा नहीं की... उसने सिर्फ़ अपनों के सम्मान के लिए सब कुछ त्याग दिया.

हमारी अपनी प्राथमिकतायें और खुशियों के लिए अलग मापदंड हो सकते हैं लेकिन मेरे और जया के लिए ये ज़िन्दगी का अविस्मर्णीय उपहार था कि 19 पंजाब के लिए कमीशन होने के वक़्त उसके कंधों पर लगे दो सितारों को अनवैल करना. सच है कि एक सौ इक्कीस करोड़ की आबादी में हर साल कुछ एक बच्चे अपने परिवारों को ये अतुलनीय ख़ुशी दे पाते हैं. मैंने देहरादून स्थित किसी अकादमी में पढने के ख़्वाब को पूरा होते हुए पहली बार देखा. सैन्य अधिकारियों और पटियाला कोच में सवार होकर आई महामहिम राष्ट्रपति की उपस्थिति में कदम कदम बढ़ाये जा... को सुनते हुए उस एक अलग दुनिया का ख़याल आता है जो हमारे जीवन में कम ही दस्तक देती है. भ्रष्टाचार और भोगियों ढोंगियों को कोसते हुए बिताये दिन जाया हुए जान पड़ते हैं.

सैन्य अकादमी के बी गेट पर नवीन से विदा लेते हुए सफ़र का रोमांच शिथिल हो गया. बच्चे बेहद उदास हो गए और जया ने नम आँखों से कहा. "होने को तो कुछ भी हो सकता है..." मेरे पास इस बात का कोई जवाब नहीं था. सिवा इसके कि ज़िन्दगी इम्पोसिबल है और ख़ुशी का तरंग देर्ध्य अपने पीछे गहन सन्नाटा छोड़ जाया करता है. रात को पोलो बार में छोटे सरकार के सोफ्ट ड्रिंक से अपना कॉकटेल पैग टकराते, मानू और जया का हाथ थामे हुए हम सब कहते हैं. वी लव यू नवीन. एक दिन तुम 19 पंजाब को कमांड करोगे.

|| यात्रा असीमित है. हमारा होना यात्रा का रूपक, न होना यात्रा की स्मृति ||

July 8, 2011

खुली जो आँख तो...

यात्रा वृतांत : छठा भाग

साँझ और रात के मिलन की घड़ी में श्वेत-श्याम का वशीकरण अपने अधीन कर लेता है. रेल की पटरियों से परावर्तित होती जादुई चमक, सामान ढ़ोने के हाथ ठेले, वेटिंग लाइंस पर खाली खड़े हुए उदासीन डिब्बे, सिगनल पर जलती हरी बत्ती, सौ मीटर दूर लाइन स्विचिंग केबिन का धुंधला सा आकार पानी में लहराती हुई तस्वीर सा झिलमिलाता रहता है. यात्री उतरते हैं और गुमशुदा सायों को रेलवे स्टेशन का हल्का प्रकाश फ़िर से नए रूप में गढ़ने लगता है.

रेल के अब तक के सफ़र में मुसाफ़िरी का तरल सामान ख़त्म. पानी, चाय, कॉफी और एनर्जी ड्रिंक यानि कुछ भी शेष नहीं. सूरतगढ़ स्टेशन आखिरी उम्मीद की तरह है. हमारा कोच ठीक वहीं रुकता है. जहाँ भूपेंद्र खड़े हैं. कभी कभी ज़िन्दगी मुझे ऐसे ही चौंका देती है. ख़यालों में जिन जगहों पर दौड़ता फिरता हूँ, वे अचानक सम्मुख खड़ी होती हैं. भूले बिसरे हुए लोगों के कंधों को मेरी अंगुलियाँ छूने लगती है तो डेस्टिनी जैसी वाहियात बात पर दिल आ जाता है. बरसों बाद मैं उनको नाम लेकर पुकारता हूँ. वे अपने स्टाल से आँखें ऊपर कर के देखते हुए बाहर की दौड़ते हुए से रुक जाते हैं. कहते हैं अन्दर आ जाओ. लेकिन मैं उनसे तीन पानी की बोतल, एक चाय और दो कप गरम दूध मांगता हूँ. तीन बार डिब्बे में चढ़ता उतरता हूँ. ट्रेन के रवाना होने में आखिरी दो मिनट बचे हैं. वे स्टाल से बाहर आ जाते हैं. उस दोस्त के गले लगे हुए मैं अपने वेलेट से एक नोट निकाल कर उनके गल्ले का निशाना साधता हूँ. ट्रेन के चलने की विशल के साथ उनके मुनीम और एक कर्मचारी आवाज़ देते हैं. साहब ने रुपये गल्ले में डाल दिए हैं. भूपेंद्र कहते हैं. किशोर जी ये बहुत गलत बात है.. और इस छोटी सी मुलाकात का आखिरी टाईट हग अपने दिल बसाये हुए, मैं डिब्बे की हत्थी पकड़ लेता हूँ.

डिब्बे में रात की हलचल है. डिनर के समय इस बार दिन के भोज की तरह मनवारें और खुशबू फेरे नहीं लगाती. अलबत्ता हमारे साथ बाड़मेर से ही ट्रेन में सफ़र कर रहे एक क्रिकेट कोच हमारी सीट के पास आकर कहते हैं. मेरी बेटी को इडली बहुत पसंद है, क्या आप थोड़ी सी दे सकेंगे ? मेरी पत्नी आश्चर्य मिश्रित ख़ुशी से एक प्लेट उस बारह तेरह साल की बच्ची के लिए बना देती है. रात का हल्का भोजन करने के बाद जब मैं और बेटी वाश बेसिन पर हाथ धो रहे थे तब वे कोच साहब वहां खड़े हुए सिगरेट पी रहे थे. उस शराबी पिता पर मुझे बेहद अफ़सोस हुआ कि वह अपने परिवार के लिए आने वाले पल के बारे में कम सोचता है. उसे रेल में शराब याद रहती है लेकिन बच्ची के लिए खाना लाना भूल जाता है. मैं अपनी बेटी को कहता हूँ कि वह बच्ची अपने पिता के बारे में क्या सोचती होगी ? वह अपने हाथ को पेपर नेपकिन से पोंछती हुई कहती कि मेरी ही तरह उसे भी अपने पापा सबसे बेस्ट पापा लगते होंगे. ऐ सी एरिया की तरफ बढ़ते हुए सोचता हूँ कि मुझ में कोच साहब की तरह जाने कितनी खामियां हैं जो बेस्ट पापा होने की फीलिंग में मुझसे कही नहीं जाती.

बैड रोल खुल गए. शोरगुल थम सा गया. पहियों का शोर जागने लगा. बातचीत के हलके स्वर डूबते गए. रेल सम्मोहन के दरिया में उतरने लगी. जिसका आलाप, विलंबित और द्रुत अपने आप में अनूठा था. संगरिया स्टेशन डेढ़ घंटे बाद आता है. यह इस रेगिस्तान का आखिरी स्टेशन है. सुबह छः बजे से हम रेगिस्तान में सात सौ पचास किलोमीटर का सफ़र कर चुके थे. मंडी डबवाली के आते ही रेगिस्तान सिर्फ़ एक ताज़ा याद बन कर रह जायेगा. वह रेगिस्तान जिसके नहरी इलाकों में बाहर से आये हुए लोग बसते गए. जहाँ पानी के उचित प्रबंधन और निकासी के अभाव में सैम (पानी के रिसाव से भूमि का दलदल में बदल जाना) ने खेतों को बंजर कर दिया. जिसकी सांस्कृतिक विरासत में सैम की ही तरह आधा पंजाब और देश भर के गरीब खेतिहर मजदूर समा गए. वो रेगिस्तान जो बोलियों का चिड़ियाघर है और राजस्थानी भाषा को एक सुरक्षित राष्ट्रीय अभ्यारण्य घोषित करने की पुकार लगा रहा है.

रात के ख्वाबों में फ़सलों से भरे खेतों वाला हरा पंजाब लहलहाता था. अजाने अँधेरे में सेल फोन की स्क्रीन पर फेसबुक एकाउंट था. उसमें सोलह साल पहले खो गयी एक दोस्त की फ्रेंड रिक्वेस्ट रखी थी. आँखों की कोर पर एक सवाल रखा था कि क्यों हम बिछड़ते और मिलते रहते हैं ? उसने मुझे खोजा होगा तब क्या सोचती होगी. ज़िन्दगी के अनिश्चित संगीत में कैसा आकर्षण है. अनचीन्हे और अनुत्तरित भविष्य के गर्भ से उम्मीदें क्यों बंधी रहती है. सवालों की कागजी नावें तैरती रही.

बंद दरवाजों और कांच वाली खिडकियों को भेदती हुई सुबह डिब्बे में उतर आई. रात भर के आराम के बाद ताज़ा आँखों में हरे खेतों पर बादलों की रिमझिम थी. ओस से भीगे मौसम में घरों की छतों पर लगे हुए वेंटिलेटर सुबह से सवाल करते प्रश्नवाचक चिन्ह से थे. वे पूछते होंगे कि आज क्या तोहफा लाई हो ? मौसम बेहद नम और बहुत सुहावना था. रेत की तपिश से दूर ये एक हरे सपनों की जगह थी. जी करता कांच की इस खिड़की से हाथ बाहर कर सकें और बारिश को छू लें. सामने की सीट पर बैठे हुए डॉक्टर व्यास बेहद दयालु स्वभाव में निष्क्रमण कर चुके थे. उनकी डिब्बे में एंट्री के समय का दर्प रात निगल चुकी थी. जोधपुर से आये यात्रियों को एक कॉफ़ी वाला मिल गया वे उससे चुहल कर रहे थे. मुझे बीस घंटे से कॉफ़ी नहीं मिली तो सर दर्द से फटा जा रहा था लेकिन मन हुआ नहीं कि यहाँ कुछ पिया जाये.

जंग लगी लोहे की जंज़ीर से बंधा स्टील का पुराना डिब्बा औंधा पड़ा था. टॉयलेट के फर्श पर पानी और मिट्टी फैली थी. वेस्टर्न और इन्डियन कमोड्स की सीट्स को हिंदुस्तान के बेशऊर लोग गंदा कर चुके थे. वाश सोप का डिब्बा खाली था और गुलाबी रंग का तरल साबुन हाथ धोने की जगह पर बिखरा पड़ा था. दीवारें अश्लील भित्ति चित्रों और आमंत्रणों से सजी थी. इस अश्लीलता के विरुद्ध धर्म के रखवालों ने कभी त्रिशूल दीक्षा नहीं दी, कोई फ़तवा जारी नहीं किया था. यकीन मानिये मुझे पहले एक मिनट में ही मितली आने लगी. मैं लघुशंका के बिना ही दरवाज़े को बंद कर के बाहर आ गया. आपको कभी इस विराट राष्ट्र में यात्रा करनी हो तो उस यात्रा के इतने टुकड़े करना कि ऐसे बदतमीज़ लोगों की फैलाई हुई गन्दगी से सामना न करना पड़े.

सफ़र के इस पड़ाव पर मैं रेल के इस डिब्बे से मुक्त होना चाहता हूँ. चाहता हूँ कि मेरे बच्चे दो घंटे तक और सोये रहें ताकि किसी अच्छे होटल तक पहुँचने से पहले की उनकी तकलीफें टाली जा सके. यकसां मेरे पुरखों की मुक्ति के स्थल हरिद्वार का कच्चा प्लेटफार्म बारिश से भीगता दिखाई देता है. ट्रोली बैग घसीटो, पांवों को चलने का हुनर याद दिलाओ, बच्चों के हाथ थामे हुए छब्बीस घंटे की रेल यात्रा को अलविदा कहो. भीड़ में खोजो अपनी राह, सुबह की साफ़ हवा को शुक्रिया कहो और चल पड़ो उस शहर की तरफ जिसका नाम देहरादून है.

जारी...

July 6, 2011

आरज़ुएँ हज़ार रखते हैं...

यात्रा वृतांत : पांचवा भाग

निकम्मा माने निः कर्मकः. जिसके पास काम न हो. यहाँ अनंत विश्राम है मगर वह कीमत बहुत मांगता है. विशाल भू भाग पर फैले इस रेगिस्तान का जीवन बहुत दुष्कर है. मनुष्य ने किस तरह से इसे आबाद रखा है, ये सोचना भी कठिन है. मुझे अक्सर दुनिया में दो तरह के लोग ही सूझते हैं. एक वे जो नदियों के किनारे बसे, दूसरे वे जिन्होंने सहरा को आबाद किया. सिन्धु घाटी सभ्यता से लेकर अमेजन के आदिवासियों तक को पढ़ते हुए पाया कि मनुष्य ने सदा बेहतर सुविधा वाली जगहों पर रहना पसंद किया है. जहाँ पानी सहजता से उपलब्ध हो और ज़मीन उपजाऊ हो. व्यापार के मार्ग भी वे ही रहे जहाँ नदियाँ और समंदर थे. तो ये कैसे लोग थे जो इस सूखे मरुस्थल में सदियों तक रहे. तीन सौ हाथ नीचे ज़मीन को खोद कर पीने का पानी निकाला और विषम परिस्थितियों में भी जीवन के सोते को सूखने न दिया.

बीकानेर का रेगिस्तान रेल के साथ चलता है. खिड़की से बाहर छोटे छोटे से गाँव आते हैं. घरों की शक्लें बदल गयी है. झोंपड़ों वाला रेगिस्तान सीमा पर छूट गया. अब कच्चे घरों पर पक्के जैसी कारीगरी दिखती है लेकिन बाड़ वैसी ही, वही बबूल या कीकर घर की बाखळ में खड़े हुए. अब कसी हुई लंगोट वाली धोती नहीं रही. वह खुली हुई पंजाबी तहमद जैसी दिखने लगी. पुरुषों ने सफ़ेद कुरता पजामा और सर को धूप से बचाने के लिए अंगोछा लिया हुआ है. औरतें घाघरा ओढने में ही हैं लेकिन नागौरी महिलाओं की डीप गले वाली कांचली की जगह बंद से गले वाले कुरते आ गए. उनकी बाहें विवियन रिचर्ड को बाल फैंकने जा रहे कपिल देव के टी शर्ट जितनी हो गयी हैं. वे ना पूरी है ना ही आधी.

बच्चों को बाहर से गुज़रते हुए दृश्यों को देखने के लिए कहता हूँ. वे थक चुके हैं किन्तु विवशता में बाहर अधिक आकर्षक दिखाई देता है. डॉक्टर व्यास नया डिजी कैम लेकर आये हैं तो उसके मेन्युअल को बांच रहे हैं. उनको देखते हुए मुझे एक ताऊ की याद आती है. वे इस हद के खाली हुआ करते थे कि अख़बार में छपी निविदाएँ तक पढ़ लिया करते. सहयात्रियों के नन्हे बच्चे थक गए हैं. उन्हें नींद की जरुरत है किन्तु इस अजायबघर जैसे माहौल में उनकी जिज्ञासु आँखें अपनी उत्सुकता को रोक नहीं पाती. आखिर नासमझी से थक कर रोने लगते हैं. पापा के पास जाते हैं तो लगता है मम्मा अच्छी है. मम्मा के पास आते ही पापा की पुकार लगाते हैं. माँ-बाप की हालात उकताए हुए आढ़तियों जैसी हो गयी है. जो सौदा सही न होने पर ग्राहक का तिरस्कार कहते हैं और उसे पेढ़ी से धकेल देते हैं.

इस रास्ते पर मैंने दो साल तक सफ़र किया है. सूरतगढ़ में आकाशवाणी का हाई पावर ट्रांसमिशन है. ये विदेश प्रसारण सेवा के लिए बना बड़ा केंद्र है. मैं दो साल यहाँ पोस्टेड रहा और फ़िर से रेगिस्तान के अपने हिस्से में चला आया था. उन सालों की स्मृतियाँ ताज़ा है. अभी लूणकरणसर स्टेशन निकला है और जानता हूँ शाम साढ़े छ बजे महाजन स्टेशन आएगा. यहाँ आर्मी की फायरिंग रेंज है और इसका सामरिक हिसाब से बड़ा महत्त्व है लेकिन रेल यात्रियों के लिए आकर्षण का केंद्र है एक गैर अधिकृत वेंडर. जिसके ठेले पर पकौड़ियाँ मिलती हैं. सौ सौ ग्राम तोलते हुए भी दो मिनट में वह कई किलो पकौड़ियाँ बेच देगा. इनका स्वाद अलग है. कई सालों बाद उसी ठेले वाले को देखने के लिए मैं गाड़ी से उतर जाता हूँ. शाम के आने की गंध स्टेशन पर फैली है.

मीर तक़ी मीर के शेर "आरज़ुएँ हज़ार रखते हैं, तो भी हम दिल को मार रखते हैं." की तर्ज़ पर मैं कुछ खरीदता नहीं हूँ कि सफ़र लम्बा है और बच्चे नाज़ुक. तिस पर इस तरह का चटोरापन आगे का रास्ता मुहाल कर सकता है. पत्नी के लिए चाय खरीदता हुआ सोचता हूँ कि सूरतगढ़ स्टेशन पर एक लाजवाब आदमी मिलेगा भूपेंदर मौदगिल. रेडियो का शौकिया प्रेजेंटर है मगर अपने पुश्तैनी काम को सम्हालने में परिवार की मदद करता है. हाय मैं किसी रेलवे स्टेशन पर वेंडर हुआ तो लाखों हसीनाओं को पहली नज़र में दिल दे चुका होता. खैर भूपेंदर से मेरा आज के दौर का एसएमएस वाला रिश्ता है और मैंने उनको बताया नहीं कि मैं इस रास्ते से जा रहा हूँ.

इस सफ़र के बारे में महबूब शायर राजेश चड्ढा को भी बताता लेकिन उसका अंज़ाम ये होता कि वे खाने पीने से भरे हुए थेले लिए स्टेशन पर इंतजार कर रहे होते. वे ऐसे ही हैं अनगिनत परिवारों के सुख और दुःख के सहभागी हैं. ट्रेन चल पड़ी थी और अंदरखाने के बोरियत भरे माहौल से परेशान मेरी बेटी दरवाज़े के पास चली आई. मैं उसे थामे हुए था और वह हत्थियाँ पकड़े हुए मद्धम गति से चलती रेल से बाहर के रेत के धोरे देख रही थी. रेलवे ट्रेक के पास राष्ट्रीय राजमार्ग गुजर रहा था. बाद बरसों के लग रहा था कि मुझे सूरतगढ़ पर उतर जाना है और यहाँ से कोई रिक्शे वाला मुझे रेडियो कॉलोनी ले जायेगा. फ़िर मैं कुलवंत कि दुकान से सिगरेट खरीदूंगा. पिपेरन वाले चौराहे से अच्छी विस्की लेता हुआ अपनी सुजुकी बाइक से उतर कर फ्लेट नम्बर सी-13 में दाखिल हो जाऊँगा.

इंसान कहीं नहीं पहुँचता. वह ठहरा रहता है. जैसे मेरी आँखों में इस वक़्त अपनी तीन साल की बेटी ठहर गयी थी. खेजड़ी वाले बालाजी के मंदिर से जया की अंगुली थामें ढलान उतरती हुई या फ़िर मीनाक्षी आंटी के आगे पीछे भागते हुए गौरव गरिमा के साथ मुस्कुराती हुई. मैं फ़िर से इस पांच फीट ऊँची लड़की को देखता हूँ जो मेरे आगे खड़ी है. अचानक वह पीछे की ओर सरकी. पापा देखो यहाँ से गिर जाये तो ? मैं उसका हाथ और मजबूती से पकड़ लेता हूँ. एक शानदार मोड़ पर रेल रुक गयी. उसके दोनों सिरे दिख रहे थे. जैसे चालीस की उम्र में आप बीत चुकी आधे से अधिक ज़िन्दगी को देख सकें और और बचे हुए कुछ सालों की तस्वीर का आभास होने लगे.

रेत के समंदर में सूरज डूबने को था. उसकी बुझती हुई केसरिया चूनर के नीचे सिमट आये सूखे पेड़ किसी वियोग में जलते हुए से दिख रहे थे.

जारी...

July 5, 2011

प्यास भड़की है सरे शाम...

यात्रा वृतांत : चौथा भाग

मनवार शब्द का शाब्दिक अर्थ है आग्रह. अब तक धार्मिक पर्यटन पर निकले परिवारों के पच्चीस से पैंतीस आयु वर्ग के नए गृहस्थों की टोली जो मोबाइल पर ऊँची आवाज़ में बात करने, गाने सुनने और चुहलबाजियों में व्यस्त थी, एकाएक अच्छे मेजबानों में रूपायित हो गयी. हम सब के भोजन के बाद देसी घी से बनी मिठाई के डिब्बे हमारे कूपे में भी दाखिल हुए और बच्चों को पकड़ लिया. खाओ, अरे पापा मना नहीं करते हैं, तो क्या तुम मिठाई खाते ही नहीं, ले लो बेटा. इस तरह की मनवार से कोई कैसे बच सकता है.

वैसे भी राजस्थान के लोग मेजबानी और मनवार में अतुलनीय हुनर के धनी होते हैं. अट्ठारह सौ में बंगाल आर्मी में कमीशन लेकर आया केडेट जेम्स टोड कुछ साल मराठों को संभालने के लिए नियुक्त रहा फ़िर उसे राजपुताना में जासूस और निगोशियेटर बना कर भेज दिया गया. वह यहाँ आते ही मनवारों के सम्मोहन में गिरफ़्तार होकर कम्पनी और महारानी के आदेश को भूल गया. उसने पर्यटन किया. अद्भुत राजस्थान की भौगोलिक और सांस्कृतिक विशेषताओं को दर्ज किया. उस कर्नल जेम्स टोड की लिखी पुस्तक "एन्नल्स ऐंड एंटीक्युटीज़ ऑफ़ राजस्थान" को आज भी राजस्थान का सच्चा और इकलौता इतिहास ग्रंथ माना जाता है.

दोपहर के भोजन के बाद वातानुकूलित डिब्बे में यात्रा करते हुए साँझ होने तक प्रति वयस्क आपको दो लीटर पानी की जरुरत होती है. रेगिस्तान के इस सफ़र की असली मुश्किल नागौर के बाद आपसे हाथ मिलाती है. जून महीने का तापमान चवालीस से उनचास डिग्री के बीच होता है. रेलवे स्टेशन खाली. सड़कें सूनी. मजदूर सुस्ताते हुए. पंछी गायब. दूर तक एक धूप की चमक साथ चलती है. डिब्बे का वातावरण किसी भरे हुए पब की आधी रात जैसा हो जाता है. गरम सांसें, चिपचिपा पसीना और फ्रेश के नाम पर सिर्फ़ झुंझलाहट.

इस गाड़ी में पेंट्री कार नहीं है. मतलब साफ है चाय, कॉफ़ी कुछ नहीं मिलेगा. दो रूपये के पानी की बोतल को पंद्रह रुपये में बेचने वाले इस डिब्बे में नहीं आयेंगे. आपके पास डिब्बे में कोई ज़िन्दा ऊंट भी नहीं होगा जिसे मार कर उसके पेट में रखा पंद्रह बीस लीटर पानी आप पी सकें. इसलिए हमेशा याद रखिये कि रेगिस्तान की प्यास बहुत बड़ी होती है. हमारे पास कोई तीन लीटर पानी था. धान मंडी के लिए प्रसिद्द जगह नोखा, चूहों की देवी करणी माता के मंदिर वाला देशनोक और कई छोटे स्टेशन गुजरते जाते हैं मगर सूने पड़े हुए इन स्टेशनों पर बस एक प्याऊ होती. जिस तक पहुँच कर पानी भर के लौटने के लिए माईकल जोर्डन जितना सामर्थ्य चाहिए. फ़िर उन स्थानों पर पानी हो इसकी संभावना आपके सौभाग्य पर निर्भर करती है.

आखिर बीकानेर आता है. नमकीन भुजिया की वैश्विक राजधानी. उस्ता कला के कारीगरों की नगरी और साल भर इस सूखे मरुथल में बारिश पर जुआ खेलने की अनोखी जगह. शहर के बीच पुरानी और बेहद तंग जगह पर पक्षियों को दाना डालने के लिए बने चबूतरे पर एक आधी मटकी में रेत रखी है. यह बारिश होने या ना होने का पैमाना है. हर दिन यहाँ शौक़ीन लोग सट्टा लगाते हैं कि आज बरसात होगी या नहीं. आप जानते हैं कि इस मरुस्थल में बरसात का हाल क्या रहता है. खैर इस अद्भुत बीकानेर के बारे जानने के लिए आपको कभी सर्द दिनों में सैर करनी चाहिए.

बाहर स्टेशन पर सूरज का कर्फ्यू लगा था. हमारे सह यात्रियों के दस लीटर क्षमता वाले पानी के दो आधुनिक पींपे थे. वे खाली हो गए. हमारे पास सिर्फ़ एक लीटर पानी बचा था. जो सूरतगढ़ तक पहुँचने के लिए काफी था. ट्रेन के रुकते ही लोग पानी लेने के लिए भागे. धूप में खड़ी झुलस रही सवारियां ऐसी कोच की ओर भागी. अन्दर आकर उनके चेहरे खिल गए मगर हम काफी उमस भरा महसूस कर रहे थे. दो मातहतों अथवा चहेतों की अगुवाई में डॉक्टर व्यास हमारी सीट के पास आये. वो ग्यारह नंबर सीट मेरी है. ऐसा कहते हुए उन्होंने देश के गरीब गुरबों पर तिरस्कार भरी नज़र डाली और कांच लगी खिड़की के पास बैठ गए.

डॉक्टर साहब की एंट्री ठेठ भारतीय थी फ़िर भी मुझे थोड़ी नरम इसलिए लगी कि उन्हें डिब्बे में बिठाने के लिए मात्र तीन लोग ही चढ़े थे. इस अद्भुत देश में रेलवे स्टेशनों और हवाई अड्डों पर सत्तर फीसद भीड़ उन शुभचिंतकों की होती है जो अपने प्रियजनों को यात्रा के लिए विदा करने आये हों. गाड़ी के चलने से पहले साठ लोगों के बैठने को बने डिब्बे में सौ लोग भरे होते हैं. वे गलियारे को रोक कर खड़े रहते हैं ताकि यात्रियों को हतोत्साहित किया जा सके और वे अगली यात्रायें टालते जाएं. इससे देश की यातायात सुविधा पर बोझ कम होने का फायदा हो सके.

ट्रेन चल पड़ी. बीकानेर पीछे छूट रहा था. मेरी याद में महेंद्र का सुनाया हुआ एक ऐतिहासिक किस्सा घूमने लगा. बीकानेर और नागौर रियासतों के बीच एक अजब लडाई लड़ी गयी थी. एक मतीरे (वाटर मेलन) की बेल एक रियासत की सीमा में उगी किन्तु सीमा के दूसरी तरफ फ़ैल गयी. उस पर एक मतीरा यानि तरबूज लग गया. एक पक्ष का दावा था कि बेल हमारे इधर लगी है, दूसरे का दावा था कि फ़ल तो हमारी ज़मीन पर पड़ा है. उस मतीरे के हक़ को लेकर युद्ध हुआ. इतिहास में इसे "मतीरे की राड़" (वार फॉर वाटर मेलन) के नाम से जाना जाता है. आप जी खोल कर मुस्कुराइए कि साल भर बरसात के अभाव में निकम्मे बैठे रहने वाले हम रेगिस्तान वासियों के पास कितने अनूठे काम है.

जारी...

July 4, 2011

खुशबू उसका पता है...

यात्रा वृतांत : तीसरा भाग

नागौर मेरे ज़हन फ़िर लौट आया. बैलों वाला नागौर नहीं वरन अकबर के नौ रत्नों में से दो रत्न अबुल फज़ल और फैज़ी का जन्मस्थान नागौर. वह नागौर जिसके निवासी शेख़ मुबारक ने उलेमाओं के बीच गज़ब का कायदा स्थापित करवाने के लिए बादशाह अकबर के लिए अचूक आज्ञापत्र तैयार किया था. वह एक संविधान बनाने जैसा काम था. ये दो रत्न उसी शेख़ मुबारक के ही बेटे थे. मुझे एक और बड़ा नायाब आदमी याद आया. उसका नाम था अब्दुल क़ादिर बदायूँनी. जिसने बादशाह अकबर के यहाँ नौकरी पर रहते हुए भी चोरी छिपे उस वक़्त का सच्चा इतिहास लिखा और उस दौर में दिल्ली में वही सबसे अधिक बिकने वाली किताब थी. मुझे ये मुल्ला बदायूँनी जन्मजात नाख़ुश और नालायक पात्र लगता है. उसकी मृत्यु के बाद में जहाँगीर ने उसके खानदान को यह कहते हुए लूट कर जेल में डाल दिया था कि उस पुस्तक ने अब्बाजान की बेइज्जती की थी.

इन यादों का कारण है कि मेरे पिता इतिहास पढ़ाते थे और छोटा भाई भी इतिहास का एसोसियेट प्रोफ़ेसर है. उनके द्वारा सुनाये गए रोचक किस्से हँसते हँसते मेरे मन पर अपनी छाप छोड़ते गए हैं. लेकिन मैंने कभी इतिहास नहीं पढ़ा. संभव है कि प्रेमचंद की कथा बड़े भाई साहब में दिए गए उद्धरण कि "आठ-आठ हेनरी गुज़रे हैं, कौनसा कांड किस हेनरी के समय में हुआ, क्या यह याद कर लेना आसान समझते हो ?..." यही डर मुझे इतिहास से दूर ले गया होगा. फ़िर थोड़ा बड़ा हुआ तो सोचता रहा कि पदेलों (पाद मारने वाले) और कमसिन लड़कियों को फंसाने के अनुभवों के किस्से लिख कर, लिखा गया ऐतिहासिक उपन्यास 'दिल्ली', लेखक खुशवंत सिंह की नज़र में इतिहासनामा है तो खैर हुई कि इतिहास न पढ़ा.

जून का महीना और बेतरहा गरमी. अनुनय विनय कर डिब्बे में भरे हुए हरिद्वार जाने वाले वेटिंग लिस्ट के तीर्थयात्री. वातानुकूलन यन्त्र से आती हुई नाकाफ़ी हवा के बीच अजनबियों के चेहरे देख कर उकताए हुए बच्चे अपने किसी खेल में रम गए थे. मैंने बहुत से स्टेशन देखे हैं जहाँ चाय, कॉफ़ी, बिस्किट, स्नेक्स, पूरी, सब्जी और पानी के अलावा कोई खास चीज़ भी बिकती हो. जोधपुर के पास लूणी जंक्शन रसगुल्ले के लिए प्रसिद्द रहा है. मैं पर्यटक के तौर पर कभी इस स्टेशन से गुजरा होता तो भी उन रसगुल्लों को कभी नहीं खरीदता. वे देसी डिब्बाबंद तकनीक में या फ़िर हाथ ठेले पर कांच के पीछे रखे होते. कुछ आम किस्म की डिश स्थान विशेष पर ख़ास हो जाया करती है. जैसे बस के सफ़र में बाड़मेर और जोधपुर के बीच धवा गाँव में दाल के पकोड़े खाने के लिए रुकना यात्री बहुत पसंद करते हैं.

ऐसी एक खूबी नागौर पर भी दिखाई दे जाती है कि वहां मेथी (Fenugreek) की सूखी हुई हरी पत्तियां बेची जाती है. यह एक लाजवाब मसाला है. मेथी के स्वाद और खुशबू की दीवानगी सर चढ़ कर बोलती है. अगर आप सामान्य कोच में यात्रा कर रहे हों तो खिड़की के रास्ते मेथी की सुगंध आप तक पहुँच ही जाएगी. पाकिस्तान के सियालकोट में महाशय चुन्नी लाल की मसालों की एक छोटी सी दुकान थी. बंटवारे के बाद उन्होंने दिल्ली के करोल बाग़ इलाके में महाशिया दी हट्टी ऑफ़ सियालकोट के नाम से खोली. वह अब वैश्विक ब्रांड एम डी एच हो गयी है. महाशिया वाले पहले पाकिस्तान के कसूर इलाके की मेथी को बेचा करते थे, भारत आने के बाद इन्होने कसूर इलाके की मेथी से भी बेहतर खुशबू वाली नागौर की मेथी बेचनी शुरू की. एम डी एच ने अपना समूचा कारोबार लाल देगी मिर्च और नागौर की मशहूर मेथी को बेच कर खड़ा किया है.

हम सुबह छः बजे इस रेल में सवार हुए थे और अब तक दिन के डेढ़ बज चुके थे. हमें भी भूख लग आई थी. बच्चों की चाची ने इडली और साम्भर बना कर भेजी थी. नानी के घर से आलू और परांठे बन कर आये थे. जया सांगरी की लीडरशिप में पंचकूटा की सब्जी देसी घी में बना कर साथ लाई थी. जोधपुर से बैठे यात्रियों ने भी अपने स्टील के कटोरदान खोलने शुरू किये. पूरा डिब्बा बीकानेरी भुजिया, जोधपुरी शाही समौसों, लहसुन की चटनी और भांत भांत के पकवानों से आती मसालों की गंध से भर गया। जैसे हमारा डिब्बा पटरी से उतर कर किसी पाकशाला में घुस आया है.

जारी...

July 3, 2011

अमूर्त यादों से खिला रेत का समंदर


यात्रा वृतांत का दूसरा भाग.

बेलगाम
बढती हुई आबादी के बोझ तले दबे हुए चिंचिया रहे हिन्दुस्तान का एक छोटा रूप रेल के डिब्बे में समा आया था. मुद्रास्फीति के समक्ष घुटने टेक चुके भारतीय रुपये की तरह वातानुकूलन यन्त्र ने भी अपना असर खो दिया. मेरे देश के आवागमन की जीवन रेखा भारतीय रेल पर हर सैकेंड इतना ही बोझ लदा रहता है.

हमारे तीसरे दर्ज़े के इस डिब्बे की दो सीटों पर दस जानें फंस चुकी थी. इस गाड़ी में अगर दूसरा या पहला दर्ज़ा होता तो मैं अवश्य उन्ही को चुनता. मेरे बच्चे इन अतिक्रमणियों को देख कर नाखुश थे लेकिन हर गरीब मुल्क में आदम कौम का कायदा यही है कि वे पहले बहस मुबाहिसे में उलझते हैं और बाद में अपने सहयात्रियों को भोजन की मनवार में लग जाते हैं. मैंने अपने इसी एक छोटे से अनुभव से बच्चों को राजी कर लिया कि इनमें से कुछ की सीट्स अगले स्टेशन तक कन्फर्म हो जाएगी.

बाहर की तस्वीर में कोई खास बदलाव नहीं होना था कि कालका एक्सप्रेस के नाम से जानी जाने वाली ये रेल हिंदुस्तान के पूरे रेगिस्तान के बीच छः सौ किलोमीटर गुजरती है. बस एक जैसलमेर अलग छूट जाया करता है. मगर उसकी तस्वीर भी दिल में बसी रहती है. सत्यजीत रे को रेगिस्तान की अनंत मरीचिका में भी सशरीर खड़े जिस सोनार किले से मुहब्बत थी, उसकी छवि को मेहरानगढ़ फोर्ट फ़िर से याद दिला देता है. सफ़र है तो चीज़ें पीछे छूटती ही हैं, कुछ यादें भी कभी कभी छूट जाया करती है. खिड़की के पार छांग दिए गए पेड़ दिखते हैं. उन पर हल्की सी हरीतिमा फूटती हुई जान पड़ती है. मैदानी बालू रेत की जगह कुछ गहरे रंग की मिट्टी के सपाट खेत रेल के साथ होड़ करते रहते हैं.

बंद रेलवे क्रोसिंग के आते ही कारें, ट्रेक्टर और अधिसंख्य लोग दुपहिया वाहनों पर सवार दिखाई देते हैं. इनका पहनावा अलग है. सिंध के आस पास लुंगी और फ़िर इस तरफ बेहद ढीली धोती बांधी जाती है, जिसे हम तेवटा कहते हैं. अब वह लंगोट की तरह कस कर जांघों के बीच चली आई है. ये नागौर के पुरुषों का पहनावा है. नागौर का प्रचार कुछ इस तरह से किया गया जैसे यहाँ बैलों के सिवा कुछ खास कभी हुआ ही नहीं.

नागौरी बैल यकीनन कद-काठी में ऊँची और बेहद शक्तिशाली नस्ल है फ़िर भी मुझे नागौर का ये परिचय खास अच्छा नहीं लगता. हालाँकि दुनिया भर के सब हिस्सों की पहचान में कुछ जानवर जुड़े होते हैं. वैसे हमारी मालाणी की पहचान इससे ठीक लगती है कि मालाणी का परिचय घोड़ों के साथ दिया जाता है. राजस्थान की खारे पानी की सबसे बड़ी बरसाती नदी जो 'कच्छ का रन' में जाकर गिरती है. उस लूणी की नमक भरी रेत पर लोट कर बड़े हुए ये तुरंग, अरबी घोड़ों के बाद घुड़सवारों की पहली पसंद है.

अचानक मेरा ध्यान एक बुजुर्गवार पर गया. आप पतली पतली सी पुस्तिकाएं बाँट रहे थे. मेरा दिल धक कर के रह गया. मुझे लगा कि ये डिब्बा हाईजेक होने को है. अब बेसुरी आवाज़ों के सांप फन फैलाये हुए आयेंगे और हमें ज़िन्दा निगल जायेंगे. मेरे साथ ऐसा कई बार हुआ कि मैं धार्मिक यात्रा पर निकले समूहों के डिब्बों में फंस गया था. वे सस्ते फ़िल्मी गीतों पर इकलौते ईश्वर के भिन्न रूपों की सामूहिक ऐसी तेसी करते. वह बेसुरा क्रन्दन इतना प्रभावी होता कि मेरी सीट पर कीलें उग आती. मैं उठ कर डिब्बे के दरवाज़े पर चला जाता.

इस बार मेरे इस उतरे हुए चेहरे पर अचानक चमक लौट आई कि वे पुस्तिकाएं बच्चों के लिखी गयी नीति कथाएं थी. मैंने ख़ुशी की लम्बी साँस ली और उस ईश्वर के इन भक्तों का धन्यवाद किया कि ये असीम दया दिखाते हुए भजन दुपहरी शुरू नहीं कर रहे.

जारी...

July 2, 2011

आगाज़ हुआ फ़िर किसी फ़साने का...

उदासी को तोड़ने के लिए जून महीने में की गई यात्रा को लिख रहा हूँ. बात लम्बी है तो टुकड़े भी कुछ ज्यादा है. दिल में सुकून हो तो पढ़िए न हो तो जरुर पढ़िए क्योंकि दुनिया सिर्फ़ वैसी ही नहीं है जैसी हमें दिख रही है.



गतिश्च प्रकृति रसभवस्थान देश काल चापेक्ष वक्तव्याः

लय की निश्चित चाल के विभिन्न रूपों से जो विविधता और अनचीन्हा सौन्दर्य उत्पन्न होता है वह आनंददायी है. इस गति को हम जीवन भी कहते हैं और गति से भावव्यंजना होती है. प्राणियों में भिन्न प्रकार के रसों की निष्पत्ति से क्रियाएं शिथिल अथवा द्रुत हो जाया करती है. क्रोध, लोभ, सुख, प्रेम, भय आदि से प्रेरित होकर हमारे भीतर अत्यधिक प्रतिक्रिया होती है. घर में गति न्यूनतम होती है. यह ठहराव का स्थल है. इसलिए घर से बाहर आते ही मन और मस्तिष्क की गति परिवर्तित हो जाती है.

मैं बरसों बाद इस तरह के अनुभव में था. सुबह के वक़्त ठीक से आंख खुली न थी और रेल के पहियों के मद्दम शोर में आस-पास बच्चों की ख़ुशी लहक रही थी. खिड़की से बाहर सोने के रंग की रेत के धोरे पीछे छूटते जा रहे थे. बरसों से मेरे मन में बसा रहा कैर, खेजड़ी, आक और बुवाड़ी के मिश्रित रंग रूप का सौन्दर्य मुझे बांधे हुआ था. सूरज की पहली किरणों के साथ गोरी गायें और चितकबरी बकरियां दिखती और क्षण भर में खो जाती. मुस्कुरा कर बच्चों और पत्नी को देखता और फ़िर से गति से उपजे ख़यालों में उलझ जाता.

रेत जो पीछे की ओर भाग रही थी. उसकी गति में मेरा मन अशांत हुआ जाता. आगत के संभाव्य अंदेशों को बुनते हुए, उनके संभावित हल गढ़ता जाता. एक बड़ी होती बेटी और छोटे बेटे के साथ होने से कई तरह की निर्मूल आशंकाएं भी गति में थी. खिड़की से फ़िर बाहर देखता तो मरुधरा की इस माटी के लिए वंदना जैसे श्लोक मेरे मस्तिष्क में फूटते जाते. मैं उम्र भर इस रेत के गुण गा सकता हूँ कि इस जीवनदायिनी ने अपनी गोद में मेरे सारे सुख-दुःख समेटे फ़िर भी सदियों से इतनी ही निर्मल बनी रही. इस रेगिस्तान से कितने काफ़िले गुज़रे और कितने लुटेरों ने अंधे धोरों की घाटियों में लूट के जश्न मनाये. कितनी ही प्रेम कथाएं रेत से उपजी और उसी में निराकार होकर खो गयी.

तोपचियों और सिपहसालारों को अपनी तोपों और बारूद के असलाह को खींचते समय इस रेत के आगे हार कर थक जाना पड़ा. इस रेत ने मनुष्य को सागर से बूँद कर के सुखा दिया. दुनिया जीतने को निकले गाज़ी पानी के लिए भटकते हुए मारे गए. उनको भी इस रेत ने अपने आँचल में जगह दी. एक औरत ने अपने गर्भ में पल रहे बादशाह अकबर के लिए इसी रेत से हौसला माँगा था कि वह इसके पार जा सके. आँधियों से प्रार्थनाएं की थी वे रुक कर इस अजन्मे का साथ दें. ग़ज़नी ने धर्म के प्रसार और काफ़िरों को नेस्तनाबूद करने के अभियान में अल्लाह कह कर इसी रेत के आगे सर झुका लिया था.

मेरे लिए ये रेत के धोरे दुनिया के स्वर्ग कहे जाने वाले देशों से अधिक सुन्दर हैं. मुझे इनकी बलखाती लहरों से जागता स्वर्णिम जादू बहुत लुभाता है. दूर दूर तक एकांत और असीम शांति. बजती हुई हवा के रहस्यमय संगीत की मदहोशी और तमाम दुखों के बावजूद अनंत सुख भरा जीवन. शोर की दुनिया को नापसंद करने वाले लोगों की इस आरामगाह में लाल मिर्च और बाजरे की रोटी परमानन्द है. जेठ महीने की तपन आदम के हौसले के आगे बहुत छोटी जान पड़ती है. मैं ऐसा ही सोचते हुए जया को देखता और फ़िर से सोचता कि वे मुसाफ़िर किस चीज़ के बने थे जिन्होंने दुनिया छान मारी.

बाड़मेर से कोई दो सौ किलोमीटर के फ़ासले पर बसी मारवाड़ की राजधानी जोधपुर तक आते हुए हर जगह ऐसी जान पड़ती है कि बरसों से इसे देखा है. मेरी तमाम यात्राओं का ये इकलौता मार्ग रहा है अगर इसके सिवा कोई रास्ता है तो वो गुजरात की ओर जाता है. रेगिस्तान के इस भारतीय छोर पर जीवन, कला और धर्म को समझने के लिए एक पूरी उम्र कम है. मेरे दादा को रोज़गार के लिए सिंध मुफ़ीद था. सिंधियों और पंजाबियों को यहाँ का तम्बाकू पसंद था. यहाँ पहनावे और भाषा के छोटे छोटे बहुतेरे रूपों में कोई एक संस्कृति नहीं झलकती. बहुत से हिन्दू रोजे रखते है और मुसलमान मांगणियार गायक देवी माता और कृष्ण भजनों के बिना अपने गायन की शुरुआत नहीं करते. लोकदेवता बाबा रामदेव का आशीर्वाद पाना पड़ौसी मुल्क में आज भी एक बड़ी हसरत है. कुछ धूप जलाते रहे कुछ उनको पीर कह कर लोबान की गंध को दिल में बसाये हुए आते रहे.

मुझे क्या चाहिए सफ़र के लिए ? बस थोड़ा सा हौसला और बहुत सारी कॉफ़ी. जोधपुर में रेल डिब्बे को मुसाफ़िर किसी खैरात की तरह बेरहम होकर लूट लेना चाहते हैं लेकिन मैं अपने छोटे भाई के हाथ से कॉफ़ी का थर्मस ले लेता हूँ. भाई पुलिस महकमे का अफ़सर है मगर ज़माने के रंग को देखते हुए दिल से कई तरह की हिदायतें देता है. मैं चाहता हूँ कि बच्चों के साथ सफ़र करना किसी ईमान वाले मुल्क में चिंता का सबब कभी न होना चाहिए लेकिन लूट और आतंक से मुक्त स्वराज का सपना ज़मीन पर उतरा ही नहीं. अब भी दूसरे के हक़ को मारने में मज़ा कायम रहा.

रेल के डिब्बे में लौटते ही पाया कि हम चार लोगों के बैठने के लिए आरक्षित स्थान पर जोधपुर के भाभाओं की स्त्रियाँ और बच्चे बैठे थे. उन्होंने हमें इस तरह जगह दी जैसे सत्यनारायण की कथा में बैठने का स्थान क्षुद्र और कथा का प्रयोजन विशिष्ट होता है.
जारी...


आवाज़ के कुछ टुकड़े

के सी

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Kishore Choudhary is a poet and fiction writer from Barmer (Rajasthan). His writing career took a formal leap from his personal journals to make him a hugely popular blogger on two of his blogs- Kahaniyan and Hathkadh.

Having spent most of his formative years in the desert, the life there is his favourite canvas to contextualise his poetry and stories. His followers from across the world vouch for his realistic and authentic portrayal of the desert life and its typical dilemmas, fused beautifully and almost effortlessly with some stunning images of the desert and its folklore.

Kishore in a way pioneered the incorporation of pre-publishing interactions and feedback with his readers on his blogs and across social media platforms in his final works. His style is known for its lucid and unexampled metaphors that he exquisitely uses to express universal feelings like love, loneliness, hope, pain, longing and fantasy. 

His first collection of stories Chaurahe Par Seedhiyan (2012)was such a thumping bestseller that the first issue was sold out within 50 days of its launch.All the stories skilfully bring the rich and exotic background of the desert come alive and make the reader delve deeper into the layers of human emotions.This much sought after collection raised the bar for all contemporary Hindi works of short fiction and brought in a fresh change in the existing status quo for Hindi short stories. 

The second collection titled Dhoop Ke Aaiyne Mein(2013)had an array of short stories that looked at life through a multi-dimensional prism, lending each one of them a distinctive charm. Kishore being a poet first, his stories are more like poetic fiction. Having a great affinity to the stream of consciousness novels by English literary greats like James Joyce and Virginia Woolf his stories defy the conventional rules of a definitive beginning, middle and end. 

Kishore’s first publication was a collection of poetry Baatein Bewajah, an alluring and bewitching series of short poems which capture the vast expanse of human emotions and have images that have a rare haunting quality.

Kishore is a Radio Broadcaster by profession and has a special fondness for classical & folk music. Articles about him and his interviews are available across many major newspapers and websites. Kishore certainly is the Avant-garde flavour in contemporary Hindi writing and his ever expanding avid readership eagerly waits for his next chartbuster.

Kishore's latest is another collection called "Jaadu Bhari Ladki". This collection has his same imitable style of stories but the contexts and places are beyond the desert as well. 
His deep understanding of the complexity of modern relationships and how they play out in our minds, homes and workplaces makes it a very unique almost post-modern work in Hindi Fiction.

http://www.goodreads.com/author/show/7361739.Kishore_Chaudhary

हेंगओवर सिलसिला

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Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने या खूबसूरत स्त्री को इरादतन चूमने जितना ही अवैध है.

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