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Showing posts from March, 2017

कारवां गुज़र गया

रख दो रात के कंधे पर हाथ
तनहा-तनहा थक गयी होगी।
• * *

किसलिए आते है दिन
रात बनी है किसलिए।

काश
एक तुम न हो तो सवाल भी न रहें।
• * *

तुम जो छू भी लो
किसी को किसी भी तरह।

कंधा जिसे चूमा न था
वही काम बाकी रहेगा।
• * *

कारवां
गुज़र गया है आज का
जाने कब तक के लिए

* * *

और फिर कहीं खो गए.

दीवार का सहारा लिए
उंघती चारपाइयाँ.

आँगन पर बुझी-बुझी
चादर एक छींट की.

जैसे हम तुम मिले थे
और फिर कहीं खो गए.
* * *

वो उसकी भीगी आवाज़ थी
कि पानी की ख़ुशबू थी, रेगिस्तान में.

और ये
ज़िन्दगी है कि कुछ सूखे हुए कतरे हैं, याद के.

* * *

उदासी जाने किस बात पर ज़िन्दा रहती है. जिन बरसों में बहुत प्रेम था. बहुत कल्पनाएँ थीं. उसी में डूबे हुए दिन-रात गुज़र जाते थे. जैसे बचपन में रेल के पहियों के बीच से रौशनी दिखा करती थी. दिप-दिप-दिप. पहिये तेज़ी से घूमते जाते और आँखें रेल के गुजरने तक इसी जादू को देखते जाना चाहती. रेल के पहियों से लेकर मादक बाहों में खोये रहने तक के, प्रेम के दिनों में बेहद उदासी थी. उन बरसों के दिनों को मैंने अपनी डायरी के हर पन्ने पर उदास पाया.

इन दिनों मन हर ऐसी बात से बेपरवाह है. थोड़ा-थोड़ा बच्चों के बारे में सोचता है. थोड़ा ख़ुद से कहता है- "समय के फूल हैं, समय के हवाले रखो" चिंता नहीं करता. मदद करता हूँ, प्यार करता हूँ.

बस एक ही बात है कि उदासी के दिनों में लिखने का खूब मन हुआ करता था. जो इन दिनों नहीं है.

ठीक समय की प्रतीक्षा

मन

इस तरह गया घर में
जैसे सर्द दिनों की
संकुचाती धूप उतरती है।

मगर बदन रात भर
औंधा पड़ा रहा, बेख़याल।

देखो, एक ही ज़िन्दगी की
दो चीज़ें कितनी अलग हैं।
• * *

कई बार हम अपनी ही ज़िन्दगी को संवारने से उदासीन किसी ठीक समय की प्रतीक्षा करते हैं। निरन्तर उकताहट आती है कि ऐसा क्यों है कि ज़िन्दगी में सबकुछ ठीक करने को ही रखा है।

कोई एक बात तो ऐसी होनी चाहिए, जो बिलकुल ठीक हो।

अनुत्तरित प्रश्न

अतीत को सूंघते हाथी
ठहर जाते हैं वर्तमान में.

बुझी-बुझी रेखाओं में
संताप, शोक और शांति.

सूंड उठाकर
बारम्बार
हाथी पूछते हैं
अनुत्तरित प्रश्न.

मैं क्या हूँ ?
क्या मैं हूँ?

चींटियाँ बनाती जाती हैं, नई लकीरें
समय उनको ढकता रहता है धूल से.
* * *

के तब तक हम न मिले तो?

बस एक ही बात थी
वो भी कही नहीं गयी.
* * *

पीली चादर ओढ़े दो भंवरे बड़े दिनों बाद कल दिखे. उनकी उड़ान में लय थी. उनके गान में सुर था. वे हवा में थोड़ा स्थिर होते और फिर हलकी मचल के साथ नृत्य करते. मैं बालकनी में खड़ा हुआ था. उनके साथ जाल के पेड़ टंगे एक पुराने घोंसले को देखने लगता. डेजर्ट डव का घोंसला है. बिखरे-बिखरे तिनके हैं. एक टहनी पर बैठी डव, कभी भंवरों का उल्लास देखती है और कभी मुझे. अचानक एक हवा का वर्तुल आता है. डव अपनी पांखें खोलकर बड़ी हो जाती है. हवा के साथ उड़ने को तैयार. भंवरे जाल के भीतर कहीं गुम हो जाते हैं. हवा अपना फेरा देकर जाती है तो डव अपने पंख समेट लेती है. भंवरे अपनी बांसुरी लेकर लौट आते हैं. जीवन में हवा के झोंके जैसे असहज दिन-रात कई बार आते हैं. हम उनको कोसते हैं. हम उनको भूलते भी नहीं हैं. लेकिन डव और भंवरों का जोड़ा उसे भूल कर फिर से जुट जाता है, अपनी मोहोब्बत को जीने के काम में. 
शुक्रिया.  * * *

बस इतना भर याद है कि
तुम्हें डर है भविष्यवाणियों से.

के तब तक हम न मिले तो?
* * *

हर प्यार की तरह
वह भी आला मूर्ख था.

मर गया प्यार ही में.
* * *

दिल चाहता है कि
एक भवि…