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Showing posts from March, 2019

हर चीज़ बदलती है - ब्रेख़्त

हर चीज़ बदलती है।
अपनी आख़िरी सांस के साथ
तुम एक ताज़ा शुरुआत कर सकते हो।
लेकिन जो हो चुका, सो हो चुका। जो पानी एक बार तुम शराब में
उड़ेल चुके हो, उसे विलग नहीं कर सकते।
जो हो चुका, सो हो चुका। वह पानी जो एक बार
तुम शराब में उड़ेल चुके हो
उसे उलीच कर बाहर नहीं कर सकते। लेकिन हर चीज़ बदलती है
अपनी हर अंतिम सांस के साथ
तुम एक ताज़ा शुरुआत कर सकते हो। ~ बर्तोल्त ब्रेख़्त EVERYTHING CHANGES Everything changes. You can make
A fresh start with your final breath.
But what has happened has happened. And the water
You once poured into the wine cannot be
Drained off again.
What has happened has happened. The water
You once poured into the wine cannot be
Drained off again, but
Everything changes. You can make
A fresh start with your final breath. ~Eugen Berthold Friedrich Brecht

बताशे जितनी पूरी

"आभा दी फुचका" मेरे ऐसा कहते ही आभा मुस्कुराने लगी।
मैंने पूछा- "कुछ याद आई?" आभा ने कहा "हाँ आपकी दोस्त। उनकी क्या ख़बर है?"
मैंने कहा- "पता नहीं। कहीं रंग भरी अंगुलियाँ लिए ड्राइंग बोर्ड के सामने खड़ी होगी या किसी आर्ट गेलेरी में अपनी पेंटिंग्स बेच रही होगी।"
आभा ने कहा- "आपको उनके बारे में पता करना चाहिए।"
कैसे कोई एक बात किसी की हमेशा के लिए याद रह जाती है। उस बात के बहाने उसे हर बार याद किया जाता है। फुचका हमारे लिए नया शब्द था। बांग्ला लोग पानी पूरी को फुचका कहते हैं। हमारे लिए तो पानी पूरी भी एक नया शब्द था। पहले पहल जब भी इसके बारे में सुना तब ये पानी पताशा था।
रेगिस्तान के लोगों के पास मखाणे और बताशे ही केंडी के रूप में हुआ करते थे। इन्हें बरसों बिना किसी विशेष रखरखाव के संभाला जा सकता था। दादी की पेटी में, नाना के कुर्ते के खूंजे में, मेहमानों की थेलियों में, विवाह समारोहों के अवसर पर कट्टों में भरे हुये मखाणे और बताशे मिला करते थे।
ये बताशे ही थे जिनको स्थानीय बोली ने पताशे कर दिया था। पानी पूरी वाली, पूरी भी लगभग बताशे जितनी…

एक पिता होना

एक पिता के लिए सबसे महत्वपूर्ण काम ये है कि वह अपने बच्चों की माँ से प्रेम करे। ~ थियोडोर हेज़बर्ग
ड्राइंग रूम की सेंटर टेबल पर अकसर कैरम जमा रहता। माँ, पापा और भाई माने सब लोग खेलते थे। बोरिक ऐसिड की सफेदी यहाँ वहाँ बिखरी रहती। शाम को ये कैरम बाहर खुले में आ जाता। इस खेल का आनंद बहुत देर तक चलता। कभी मानु आकर कैरम के बीच में बैठ जाती। इसे खेल के बीच का टी ब्रेक मान लिया जाता। खेल फिर से चल पड़ता। इस खेल के समापन का एक रिवाज सा बन गया था कि माँ की टीम हारने लगती तब माँ कैरम को एक तरफ उठाकर सारी गोटियाँ बिखेर देती।
एक ठसक और झूठे रूसने के साथ माँ रसोई की ओर चल पड़ती। पिताजी उनको मनाने के लिए राजसी सम्बोधन लिए पीछे चल पड़ते।
घर के भीतर के इन दृश्यों से इतर बाहर के संसार में पिता एक शिक्षक, सामाजिक कार्यकर्ता और बेहद गंभीर व्यक्ति थे। उन्हें किसी प्रहसन, हंसी-ठिठोली और निंदा में सम्मिलित किसी ने नहीं पाया। वे इस तरह के स्वभाव के व्यक्तियों से यथोचित दूरी बनाए रखते थे।
जब तीनों बच्चों की नौकरी लग गयी। घर में बहुएँ आ गईं तब उन्होने अपनी इच्छा से नौकरी से सेवानिवृति ले ली। अपने प्रिय लोगों के …

बाड़मेर में पकवान दीवाने

सर दो पेग ले लेते हैं।  भाई सुबह से कुछ खाया ही नहीं है।  सर ये गेट के सामने पकवान वाला है, बहुत अच्छे पकवान देता है।  ले आइये।  सर मिर्ची कम या ज़्यादा? मिर्ची अच्छी।  सर मीडियम ठीक रहेगी।  भाई एक पतला सा पापड़। थोड़ी सी दाल और प्याज के चार बारीक टुकड़े। इतना मत सोचो। जैसा अच्छा लगे ले आओ।
बाड़मेर में पकवान दीवाने रहते हैं। लोग सुबह सवेरे पकवान खाने निकल पड़ते हैं। हर पकवान वाले ठेले के पास खड़े होकर आपको इंतज़ार करना पड़ता है। पकवान खाने के दीवाने अधिकतर विस्थापित होकर आए लोग थे। वे ही अपने साथ पकवान लेकर आए। लेकिन जल्द ही ये हर एक का प्रिय होने लगा।
मैंने किसी जाट को पहली बार पकवान खाते हुये देखा, वो हमारा कॉमरेड दोस्त खेताराम था। मैं तब भी पकवान नहीं खाता था। पिताजी को गलियों में चटोरों की तरह खाने की आदतें अच्छी नहीं लगती थी। ये भी एक वजह रही होगी मैं बहुत बार ललचाने के बाद भी आलू-टिक्की, छोले और पकवान जैसे ठेलों के पास भी नहीं गया।
इधर आकाशवाणी के गेट के सामने बिजली विभाग की दीवार के पास एक व्यक्ति ने साल डेढ़ साल पहले पकवान का ठेला लगाया। बिक्री इतनी तेज़ी से बढ़ी कि हाथगाड़े की जगह कबट लगा…