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Showing posts from July, 2012

कि कुछ नहीं हो सकता

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रात के कई पहर बीत जाने के बाद भी अजनबी आवाज़ें, सन्नाटे को तोड़ती रहती है. उदास थकी हुई करवट, पसीने से भीगी हुयी पीठ, तसल्ली की थपकियाँ देती रेगिस्तान की सूखी हवा. सो जाओ, रात जा रही है...

तुम्हें कुछ नहीं सोचना चाहिए
खिड़की के पेलमेट पर रखे हुए तनहा गुलदस्ते के बारे में
उसे आदत है एकाकीपन में जीने की.

कि उन फूलों ने बहुत कोशिशें की थी
लोगों से घुल मिल जाने की
मगर निराशा में चुन ली है यही जगह, ज़रा अँधेरी, ज़रा उदास
जैसे कोई हताश आदमी बैठा होता है, एक अधबुझे लेम्पोस्ट के नीचे.

मैं ऐसी ही चीज़ों के बीच
इसी घर में हूँ, तुम्हें प्रेम करने के लिए
ये मर्ज़ी है तुम्हारी कि रात भर जागते रह सकते हो कहीं भी.

सुनो मेरी बात कि अगर तुम आओगे यहाँ
तो अपनी आदत के हिसाब से मेरे कमरे में रो सकते हो रात भर
कि मुझे भी आदत है पतझड़ के पेड़ों को देखने की
और मालूम है कि सूखी पत्तियों को किस तरह उठाना चाहिए सावधानी से.

ज्यादा सोचा मत करो कि तुम्हारे बिना भी मैं कभी तनहा नहीं होता हूँ
कि मुझे अक्सर चुभते रहते हैं किसी याद के कांटे
जैसे आप बैठे हुए हों किसी नौसिखिये कारीगर की बनायी हुई दरी पर.

तु…

रह गई हो कोई बात

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दो बेवजह की बातें जो पड़ी रह गई ड्राफ्ट में जैसे किसी को कहते कहते रह गई हो कोई बात

दूसरे पैग के बाद खरगोश ने कहा
मुझे नहीं मालूम कि तनहा क्यों हूँ.

ये भी नहीं पता कि किसी को चाहने से
कोई किस तरह हो जाता है तनहा
जबकि वह रहा ना हो कभी भी उसके साथ.
* * *

खरगोश ने एक तरफ रख दिया,
आधी पढ़ी,
रिलेशनशिप की किताब को
कि हर कोई दूसरे को ठहरा रहा था दोषी.

जिन्होंने नहीं लगाये थे दोष
वे अभी थे प्रेम में
और उनके पहलू में रखा था, इंतजार.
* * *

देखा तो पाया कि शाम है

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रिस रहा हो खून दिल से, लब मगर हँसते रहें, कर गया बरबाद मुझको ये हुनर कहना उसे... सुबह से फ़रहत शहज़ाद साहब की ग़ज़ल सुन रहा हूँ. आवाज़ उस्ताद मेहदी हसन की है. वे मेहदी साहब जिनको सुनते हुए एफ एम 100.7 पर संजीदा ग़ज़लें प्ले करते हुए बाईस से पच्चीस साल की उम्र के दिन काटे थे.
तुम हो क्या कहीं ?

फूलदान में खिल रहा है
किसलिए, नूर तेरी बात का.
* * *

सोचो, ये कैसी है, चुप्पी
अजगर के आलिंगन सी.
* * *

तोड़ दो, अब कसम कि
बारिशें बहुत दूर हैं, अभी.
* * *

कभी रहो साये की तरह
दरख़्त कम है, धूप ज्यादा.
* * *

देखो बाहर, रात है सुहानी
और जाने बचे हैं, कितने दिन.
* * *

और कभी जो रो पड़ो तो याद करना कुछ भी दूर नहीं है कहीं भी, वह या तो है या है ही नहीं. 

मिटा तो न दोगे ?

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वो लड़का किराये पर जीप चलाता था. टेक्सी स्टेंड के आगे से गुज़रती हुई स्कूल की लड़कियों को देखा करता. उस लड़के को गाँव से पांच किलोमीटर दूर ढाणी में रहने वाली एक लड़की देखा करती थी. एक दिन स्कूल ख़त्म हो गयी, इंतज़ार बढ़ गया.

ज़िन्दगी है तो साबुन तेल भी चाहिए. लड़की बस में बैठ कर बायतु गाँव आया करती. उस दिन जीप किराये पर नहीं जाती थी. बबूल के पेड़ों की कच्ची पक्की छाँव में स्टेंड पर ही खड़ी रहती. खरीदारी का वक़्त हाथ की कुल्फी की तरह होता था, लड़की उसे बचाए रखना चाहती थी मगर वह पिघलता जाता. लड़की की ढाणी के पास रेल रूकती नहीं थी वरना लड़की रेलगाड़ी की खिड़की में बैठी रहती और लड़का जीप चलाता हुआ साथ साथ पांच किलोमीटर तक जा सकता था.

लेकिन बकरियां थी न, बकरियां रेत के धोरों पर खड़े दरख्तों की पत्तियां चरती. लड़की हर शाम उनको घर लाती. लड़का वहीं मिलता. धोरे की घाटी में हरी भरी नदी जैसी सूखी रेत पर रात तनहा उतरती. लड़का बायतु चला जाता, लड़की अपनी ढाणी.

बायतु गाँव के बाहरी छोर पर बना हुआ एक कमरे का घर. दरवाज़े पर थपकियों की आवाज़. ऐसा लगता था कि बाहर दो तीन लोग हैं. बिना जाली वाली खिड़की से कूद कर लड़क…

जबकि न था, कभी कोई वादा

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संकरी गलियों और खुले खुले खलिहानों, नीम अँधेरा बुने चुप बैठे खंडहरों, पुराने मंदिर को जाती निर्जन सीढियों के किनारे या ऐसे ही किसी अपरिचित वन के मुहाने के थोड़ा सा भीतर, वक़्त का एक तनहा टुकड़ा चाहिए. मैं लिखना चाहता हूँ कि मेरे भीतर एक 'वाइल्ड विश' मचलती रहती है. उतनी ही वाइल्ड, जितना कि नेचुरल होना. जैसे पेड़ के तने को चूम लेना. उसकी किसी मजबूत शाख पर लेटे हुए ये फील करना कि सबसे हसीन जगह की खोज मुकम्मल हुई.

मैं कई बार इन अहसासों के जंजाल से बाहर निकल जाने का भी सोचता हूँ. फिर कभी कभी ये कल्पना करता हूँ कि काश अतीत में लौट सकूँ. हो सकूँ वो आदमी, जो मिलता है ज़िन्दगी में पहली बार...

ऐसा भी नहीं है
कि न समझा जा सके, मुहब्बत को.

वह भर देता है, मुझे हैरत से
यह कह कर
कि तुम बता कर जाते तो अच्छा था.

जबकि न था, कभी कोई वादा इंतज़ार का.
* * *

कोई कैसे जाने, रास्ता तुम तक आने का

वक़्त के घोंसले में खो गयी
उम्मीदों भरी, वन चिरैया की अलभ्य आँख.
* * *

रीत रहा है, फूटा प्याला

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आँख मूंदे हुए बुद्ध की मूरतों की तस्वीरें, किसी यात्री की भुजाओं पर गुदे हुए नीले टेटू, बालकनी में पड़े हुए खाली केन्स, सड़क पर उड़ता हुआ कागज से बना चाय का कप, आंधी के साथ बह कर आई रेत पर बनी हुई लहरें... जाने कितनी चीज़ें, कितने दृश्य पल भर देखने के बाद दिल और दिमाग में ठहरे हुए. 
मुकम्मल होने के इंतज़ार में पड़े हुए कहानियों के ड्राफ्ट्स. बेपरवाह ढलता हुआ दिन, शाम और विस्की, रात और सुबह के सिरहाने रखे हुए कुछ सपने... * * *
एक चार गुणा चार आकार के सेल में नन्हा सा खरगोश. उसे पकड़ लेने के लिए मैं दरवाज़ा रोके हुए. वह बाहर की ओर आया तो किसी डरे हुए आदमी की तरह उसे पांव से अन्दर धकेल दिया. खरगोश से भी किसी कटखने ज़हरीले जंगली जानवर जैसा डर. वह पैर के धक्के से कोने में चला गया. फिर से आया तो उसे दोनों हाथों में उठा लिया. उसने दोनों दांत मेरी तर्जनी अंगुली पर लगा दिए. दर्द होना चाहिए था मगर था नहीं. 
खरगोश ने मेरे नीले रंग के शर्ट से ख़ुद को पौंछा और ख़ुद पूरा नीला हो गया. इलेक्ट्रिक ब्लू.  एक गुलाबी रंग से घिरी हुई नन्ही लड़की ने मेरे हाथ से खरगोश ले लिया. थोड़ी देर बाद उसने मुझे खरगोश लौटाय…

फूल पर घिरती शाम

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कल जून महीने का आखिरी दिन था. रेगिस्तान, आँधियों की ज़द में है इसलिए तापमान कम था. दोपहर के वक़्त, नेशनल हाई वे पर पसरा हुआ सन्नाटा तोडती कुछ गाड़ियाँ. अचानक तेज़ रफ़्तार बाइक पर गुज़रा, एक नौजवान. इस गरमी में भी बाइक के रियर व्यू मिरर में टंगा हुआ, हेलमेट. उसे भूल कर, रास्ते भर सोचता रहा जाने क्या कुछ.... बहुत सारी बेवजह की बातें, मगर तीन पढ़िए... कि किसी दिन आ जाओ  रेगिस्तान की शाम की तरह

गलियों में उतरती
तन्हा शाम के कदमों की आहट
उचटती हुई नींद, तेरे ख़याल की.
* * *

सबसे ऊँची शाख़ पर खिले
इकलौते फूल पर घिरती शाम
जैसे सुरमई होता, इंतज़ार.
* * *

अतीत के धूसर अरण्य के किनारे

खिड़की, जिसे साँस कहते हैं
रोज़नामचा, ज़िन्दगी के नाम का
और हर शाम उसकी याद लिए हुए.
* * *