Posts

Showing posts from 2014

इंतज़ार में खड़ा हो कोई कब से ही

Image
टूटे-टूटे गिरते जाते इन लम्हों में, धुंध भरी सुबह की आँखें सोचे, सारे मंज़र खो जाने हैं. दूर किसी धुंधले धब्बे की मानिंद. धुआँ धुआँ सा बेशक्ल तुम्हारा होना दिखता है और मिट जाता है. जैसे कोई पानी की चादर मुड़ी हुई सूखी पत्तियों सी उड़ी जाती है. सूखे सूखे इस रेतीले जीवन में ठंडी नमी भरी हवा का मौसम फुसलाता है. दुःख आने हैं, हाँ दुःख ही आने हैं सच लगता है फिर भी मन मुस्काता है.

उफ़क और मेरी आँखों की बीच तुम्हारी याद किसी व्यू कटर की तरह खड़ी है.
कहीं से भी
अपनी ही आवाज़ की तरह
सुनाई दो।

दिखाई पड़ो अचानक
खाली मैदान के किसी टुकड़े पर
जैसे इंतज़ार में खड़ा हो कोई कब से ही।

जैसे कोई साया छू जाये
ऐसी छुअन की तरह आओ।

मैं कब तक
एक सर का बोझा उठाये रखूं
दर्द भरी गरदन पर
कब तक पीठ पर मुमकिन रहे
इस गरदन के साथ अतीत का बोझ।

तुम आओ कहीं से।

उसके सामने कई बार हम पिघल कर बह जाते हैं कि आखिर कब तक जिरह करते जाएँ। कई बार हम साँस भी नहीं लेते कि उसके सामने मुंह तक न खोलें।

होता मगर कुछ भी नहीं।
वह अपनी फितरत में और हम अपनी बेबसी में जीते जाते हैं।

शब्द रंग रेखाएं
सबकुछ उधार के
सब प्रसंशाओं के भरोसे…

ख़ानाबदोश कारवां में

Image
मेरा जीवन एक आवृति की तरह स्पंदित है. तुम एक अविराम, अन्नत प्रवाह की तरह हो. मेरी नींद और जाग के बीच की घाटी के खालीपन में स्याह आवाजें हैं. उनका ठीक से पढ़ा जाना शेष है. स्मृति की वेगवती धाराएँ स्थिर होने से रोकती हैं. प्रवाह की एक ही दिशा में होते हुए भी तुम्हारे प्रश्न अलग हैं मेरे उत्तर अलग हैं. मैं सुबह को सोया सोया जागता हूँ. रात को जागा जागा सोता हूँ. शामें जैसे मेरी ही टोह में रहती है. जैसे कोई सोलह साला लड़का अपनी प्रेमिका को किसी लम्बे गलियारे में खींच लेता है किसी खम्भे के पीछे.  मैं भी खुद सौंप देता हूँ अपने आपको जैसे रूई का फाहा पानी को छूकर हो जाता है स्थिर, गीला और जयादा नरम. मुझे नहीं मालूम कि इस ज़िन्दगी का क्या होगा. मुझे इससे गरज भी नहीं कि जिनको खूब चिंता थी ज़िन्दगी की वे भी नहीं बचे शेष.
हमारे बीच एक ही अपूर्व सम्बन्ध है
मुझे किसी ने नहीं किया प्यार तुम्हारे सिवा.
मैं इसी बात पर पहली बार समझ सका प्यार.
* * *

प्रेमिका की छेनी की धार उतरती नहीं
शैतान भी विचलित नहीं होता इस टंकार से.

प्रेम जैसा जाने क्या करते हैं ये दो लोग.
* * *

प्रेमिका बाल्टी को पानी पर पटकती जाती है

जीवन वितान के कोने खड़े एक आदमी का एकांत

Image
सुबह का आग़ाज़ रात के हेंगऑवर में होता है. कल मालूम हुआ कि मेरा पहला कहानी संग्रह तीसरी बार मुद्रित होने जा रहा है. इसका आवरण बदला गया है. नए रंग रूप में इस किताब का होना मुझे ख़ुशी से भर रहा है. मैंने कहानियां मन के रंजन और दुखो के निस्तारण के लिए लिखीं थी. हिंदी साहित्य इसलिए पढ़ा था कि कभी लेखक बन सकें. लेकिन औपचारिक पढाई पूरी करते ही मेरा लेखक होने के स्वप्न से मन टूट गया. हालाँकि अनेक लेखक मेरे लिए सम्मोहक थे. उनके शब्दों में एक जादू भरी दुनिया दिखती थी. मैंने किताबों के साथ हालाँकि बहुत कम समय बिताया किन्तु मेरे लिए किताबें और तन्हाई दुनिया के दो बड़े सुख रहे हैं.
कहानी संग्रह चौराहे पर सीढियां का बनना सिर्फ और सिर्फ इंटरनेट, ब्लॉग और दोस्तों के कारण संभव हुआ. साल दो हज़ार आठ में कहानियों के मामूली ड्राफ्ट लिखना शुरू किया. अपने बचपन के मित्र संजय व्यास को वे ड्राफ्ट पढवाए. संजय ने तमाम खामियों के बावजूद मेरा उत्साहवर्धन किया. एक दोस्त के ऐसे शब्दों से मुमकिन था कि मैं लिखता गया. वहां से शुरू हुई ये यात्रा आज कुछ सालों के भीतर ऐसे मुकाम तक आ गयी है जहाँ सब मुझे प्रेम और सम्मान से देख…

शाख के उस सिरे तक

Image
एक काफिला था, ठहरी हुई दस्तकें थीं. बंद दरवाज़े और दीवार से बिना कान लगाये सुनी जा सकती थी. ज़िंदगी मुझे बुला रही थी. मैं अपने सब रिश्ते झाड़ रहा था. चलो अच्छा हुआ जी लिए. जो उनमें था वह गले से उतरा. जिस किसी जानिब कोई टूटी बिखरी आवाज़ के टुकड़े थे सबको बुहारा. अपने आप से कहा चलो उठो. ज़िंदगी जा रही है. रास्तों को छूना है तो चलो उनपर. देखना है बदलते मौसम को तो बाहर आओ. प्रेम करना चाहते हो तो प्रेम करो. न करोगे कुछ तो भी सबकुछ जा ही रहा है. ज़िंदगी एक छलनी लगा प्याला है. कुछ रिस जायेगी कुछ भाप हो जायेगी. 
कुछ बेतरतीब बातें. बीते दिनों से उठाई हुई.  * * *

खुला पैसा अक्सर हम जिसे समझते हैं वह वो चवन्नियां अठन्नियां रुपये सौ रूपये नहीं होते। खुले पैसे वो होते हैं जिन्हें बेहिसाब खर्च किया जा सके। ऐसे ही खुली ज़िन्दगी वो है जो बहुत सारी है। जिसे आप अपने हिसाब से बेहिसाब खर्च कर सकते हैं।
* * *

शाख के उस सिरे तक जाकर बैठेंगे, जहाँ वह हमारी सांस-सांस पर लचकी जाये।
* * *

उस जगह मुद्दतों सूनापन और किसी आमद की हलकी आस रहती थी। अचानक दो जोड़ी गिलहरियाँ फुदकने लगी। वे कच्ची मूंगफली के दूधिया दाने मुंह में …

सुनो [जा]ना, व्यर्थ अभिमाना

Image