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Showing posts from September, 2018

नई दिल्ली एक दीवार पर ऊंट

रेगिस्तान में ऊंट भिक्षु नहीं एक साधु था। उसने हमारे दुःख ढोये। उसने रास्ता दिखाया। रेगिस्तान वालों ने अपने लोकगीतों में ऊंट को जी भर गाया। गहरे मन से नवाजा। "घोड़लो बँधावां गढ़ री भींत, करियो बँधावां हाँ जी कोटड़ी।" अश्व तो गढ़ की दीवार के पास बंधे रहें लेकिन हमारा नौजवान ऊंट कोटड़ी यानी मेहमानख़ाने के पास ही बंधेगा।
जिस तरह प्रेम एक स्मृति और प्रतीक्षा है, उसी तरह रेगिस्तान के दिल में ऊंट है।

जहां से आगे पटरी कहीं नहीं जाती

अक्सर ज़्यादा लेना चाहा  और तुम्हारे दिल को कम-कम तोला।
मेरा मन एक बे ईमान का तराजू था।  * * *

अब लैपटाप के किनारों पर पड़ी बारीक गर्द को देखते हुये सोचता हूँ कि कब से इसे पोंछा नहीं है। ठीक ऐसे ही कभी-कभी सोचता हूँ कि हम आख़िरी बार कब मिले थे।
नींद से जागता हूँ तो याद आता है कि एक संदशे में लिखा था। "आप अच्छे आदमी हैं।" अगली नींद से जागते ही याद आता है कि कोई मेल था। "एक आदमी को स्टेज पर गाते हुये देखा तो अचानक आपकी याद आई। उसकी तस्वीर भेज रही हूँ। देखना" उसकी अगली नींद से जागते ही याद आता है कि कौन था जिससे कुछ बात हुई। जवाब न देने के बारे बात।
स्कूल के रास्ते में एक रेलवे ठोकर थी। माने जहां से आगे पटरी कहीं नहीं जाती। वहाँ तक रेल का इंजन आया करता था। उसे वापसी की दिशा में मुड़ना होता था। उस ठोकर पर बैठने से रेलवे फाटक की ढलान और बहुत सारे कच्चे घर दिखते थे। वो बहुत अजीब जगह थी कि जहां से बहुत कुछ देखा जा सकता था मगर आगे जाने का रास्ता बंद था।
जैसे ये उम्र है। यहाँ से कुछ अधिक दिखाई देता है लेकिन कहीं जाया नहीं जाता।  * * * बाद के दिनों में वो ठोकर नहीं रही। रेल इंज…

अकेलेपन की बारूदी सुरंगें

किसी के एकांत में अपनी इच्छाओं के बीज मत फेंकना.
एक लड़का तीन बार फ़ोन कर चुका था. उसे मुझसे अपने उपन्यास के बारे में बात करनी थी. एक बार मेरे पास समय न था बाकी दोनों बार मेरा मन न था. मैं छोटी-छोटी बातों से रेस्टलेस होने लगता हूँ. इसके बाद सामान्य होने में बहुत समय लगता है. कई बार तो वह बात मेरे मन से जाती ही नहीं कि ऐसा क्यों हुआ. अपने आप को समझा लो, डांट लो, कोस लो लेकिन छीजने की अपनी प्रक्रिया है और वह उसी तरह से होता है. मैं उसे समय न दे पाया. दो तीन दिन बाद माँ ने आवाज़ दी कि कोई मिलने आया है. दोपहर के दो बजे थे. मैं दरवाज़े तक गया तो पाया कि एक लड़का खड़ा है. उसने अभिवादन किया. "सर मेरे को आज वापस अहमदाबाद जाना है. आपसे मिले बिना जाने का मन न था इसलिए चला आया."
हम अपने लिविंग रूम में बैठ गये. उस कमरे में माँ का छोटा पलंग है. रजाई और गरम कपड़े रखने का बड़ा संदूक है. एक सोफ़ा से बिछड़े हुए दो कुर्सी जैसे सोफे हैं. एक तरफ दीवार में बनी अलमारियों में कुछ एक किताबें रखीं हैं. उन दो अलमारियों के बीच पिताजी की तस्वीर टंगी है. पिताजी की मोनालिसा मुस्कान को घेरे हुए प्लास्टिक के फूलों …

और मुमकिन है तेरा ज़िक्र कर दे ख़ुदा भी

चार पांच दिन बड़े बेकार गुज़रे हैं. मुंह छालों से भर गया. मैं अपने चारागर अमर लाल जी को याद करता रहा. अमर जी बाड़मेर के पहले प्रेस फ़ोटोग्राफ़र हैं. आजकल कहाँ है पता नहीं. उनको लम्बे समय से देखा नहीं. ईश्वर करे जहाँ कहीं हों आराम से देसी सूंत रहे हो.
रात के नौ बज गए थे महफ़िल जमी हुई थी. दो तीन लोग सीधे बैठे थे, इतने ही लोग कुर्सी पर लटके हुए सांप की तरह थे. उनकी मुंडी टेबल के नीचे से ऊपर की और आती और ग्लास को मुंह लगाकर वापस नीचे चली जाती. सूचना और जनसम्पर्क विभाग में सहायक निदेशक प्रदीप चौधरी कॉलेज दिनों की अनाम प्रेमिका की याद में गीत गा रहे थे. अनाम प्रेमिका इसलिए कहना पड़ता है कि हमारी भाभी न हो सकी लड़की का नाम प्रदीप जी कोई चार पांच पेग के बाद लेते थे. उस वक़्त तक हम भी रसायन के प्रभाव में सूफी हो चुके होते. इसलिए अल्लाह मिया के सिवा कुछ याद न रहता.
चाँद आहें भरेगा फूल दिल थाम लेंगे. हुस्न की बात चली तो...
इतने में अमर लाल जी आ गए. कोई फोटो देने आये थे. प्रदीप जी का गीत रुक गया. "आओ अमर जी." प्रदीप जी ने अभिवादन किया. अभिवादन के जवाब में अमर जी ने कहा- "ये लिफाफा रख रहा …

शब्द और रेखाओं से जनवाणी रचने वाला आदमी - रविकुमार स्वर्णकार

इससे पहले कि हमारे मुख़ालिफ़ीन सफ़्फ़ाकी से मुक़र्रर करें हमारे लिए सज़ा-ए-मौत
हम रूहों में तब्दील हो जाएंगे
००००० रवि कुमार
वह एक सच्चा आदमी था. मैंने कल शाम उसके न रहने की ख़बर पढ़ी. मैंने अपने दायें बाएं देखा कि क्या वह चला गया है? पाया कि वह मेरे आस पास है. लेकिन जो प्रियजन उसे देख पाते थे वे उसकी छुअन से वंचित हो गए हैं. अब उसकी बाँहों के घेरे बेटे और बेटी को केवल स्मृतियों में ही मिल पाएंगे. उसके भीगे होंठ एक याद बनकर रह गए हैं. साथियों के कन्धों पर रखा रहने वाला हाथ एक भरोसा भर रह गया है.
मन तो कहीं न जा सकेगा लेकिन छुअन चली गयी है.  * * *
अड़-अड़ के वाणी हुई, अडियल, चपल, कठोर। सपने सब बिखरन लगे, घात करी चितचोर॥ चित्त की बात निराली तुरुप बिन पत्ते खाली चेला चाल चल रहा गुरू अब हाथ मल रहा सुनो भाई गप्प-सुनो भाई सप्प।
नाटककार कवि और संस्कृतिकर्मी शिवराम का निधन दो हज़ार दस में हुआ. उनके निधन के कुछ एक साल बाद अड़ अड़ कर आती वाणी कोमा में चली गयी, चेला ने गुरु को गुड़ कर दिया और ख़ुद शक्कर हो गया. एक दूरदर्शी ने इतनी सच्ची गप कही कि ज़माने ने दांतों तले अंगुली दबा ली.
शिवराम अक्टूबर दो हज़ार दस…

कालू जी खत्री साकीन नेहरू नगर बाड़मेर

"बीपी रो की है? बे-तीन दिन सुई रह्यो. आराम करो. गरम होयोड़ी मशीन ठंडी होव्ते ही तेल फेंकणों अपने आप बंद करे. ऐ ईज है बीजो डॉक्टर होस्पिटल जाए खोटी होव्णों" - कालू जी खत्री, साकीन नेहरू नगर बाड़मेर.
पिताजी की पोस्टिंग जब रेलवे स्कूल में थी तब अमरी बाई जी भी वहीं पोस्टेड थी. कभी किसी स्कूल के काम से वे घर आई. उन्होंने मुझे देखकर पूछा- "माड़सा है? जा के अमरी बुआ आई" पिताजी आये और उन्होंने कहा- "आओ अमरी बाईजी" मैं अमरी बाई जी को स्कूल में देखता था लेकिन घर पर पहली बार देखा था. इसके बाद से हमारे पास उनके लिए उम्र भर का एक सम्बोधन आ गया, अमरी बुआ.
नेहरू नगर में स्टेडियम के पास नीलकंठ फैक्ट्री के नाम से एक कारखाना बना हुआ था. सालेचा परिवार के इस विशालकाय उपक्रम में बेंटोनाईट यानी मेट माने पीली चिकनी मिट्टी के ढेलों को पीसा जाता था. मोहल्ले की औरतें अपने बालों को चिकनी मिट्टी से धोने के लिए इसी कारखाने से मेट लाया करती थी. मेरी माँ ने भी कई बार मेरे बाल मेट से धोये थे. गर्मी के दिनों में चेहरे पर फुंसियाँ होते ही या सर में दाने पड़ने पर बच्चों को मेट के लेप से पोत क…

आदमी से बेहतर

के सीमेरी फेसबुक प्रोफ़ाइल है। ये बस इस काम आती है कि वहां से सुंदर चेहरे देख पाता हूँ। वहीं से मन के अपशिष्टों की कथाएँ सुनाई देती हैं। वहीं से देख पाता हूँ कि राष्ट्रवाद की जय करने वाले असल में राष्ट्रवादी होने से पहले जातिवादी हैं।
मैं अपने फेसबुक पेज पर मैं अपना मन लिखता हूँ मगर कभी-कभी दूसरों का मन देखने को चाहूँ तो अपनी प्रोफाइल पर चला जाता हूँ। आज श्री कृष्ण जन्माष्टमी है, ऐसा मुझे व्हाट्स एप पर मिले सन्देशों से पता चला। मुझे कृष्ण भक्त कवियों की याद आई। मैंने कुम्भनदास जी को याद करते हए एकपोस्ट लिख दी। ये मन की बात थी।
इस पोस्ट के साथ लगी तस्वीर में नन्हा बिलौटा मेरी ओर देख रहा है। हमारा रिश्ता ये है कि उसे समझ आया है कि वह मेरे पास रहेगा तो उसे खाना मिलेगा। वह हर शाम आता है। मैं अपना प्याला भरे बैठा होता हूँ तो वह प्याले को सूंघता है। उसे सूंघकर बुरा मुंह नहीं बनाता। मुझे उसकी इस सहृदयता पर प्रेम आता है। मैं उसे दूध का कटोरा भर देता हूँ।
लालची और स्वार्थी मनुष्यों से हटकर वह दूध स्वीकार लेने के बाद भी मेरे पास बैठा रहता है। वह हरदम चौकन्ना होने के हाव भाव लिए होता है। मैं उसे …

बहुत दूर चले जाना।

विरह के प्रेम में जो सुख है वह बाहों में बसे रहने से अधिक मीठा है। ये मीठी टीस दूर होने पर खिलती है। दूर होने पर बदन में शिथिलता आ जाती है। हृदय एक भरे हुए चड़स की तरह आहिस्ता हिलता है। हाथों की अंगुलियां प्रेम नाम लिखने में स्वयं को असमर्थ पाती है। आंखें सूने आकाश और धूसर धरती की रेख को देखती हुई सो जाती हैं।
इसी तरह आधी नींद और जाग में उसके बदन से उठते मादक वर्तुल अचानक हम पर गिर पड़ते हैं तो अधीर और व्याकुल होकर खालीपन के प्रेम तरल में डूब जाते हैं। मन उसके पास जाना चाहता है कि याद आता है असल चाहना तो दूर रहने से ही है। ये गहराई विरह की कुदाल से बनी है। ये धूल का ऊंचा वर्तुल बिछोह से बना है।
इसलिए दूर रहना ठीक है।
कृष्ण भक्त कवियों में कुम्भनदास कृष्ण प्रेम में विरह के कवि थे। एक बार बादशाह अकबर के बुलावे पर चले गए तो उम्र भर पछताते रहे। अकबर से उन्होंने कहा "संतन को कहाँ सीकरी सों काम, आवत जावत पहनिया टूटी बिसरी गयो हरिनाम" वे कुम्भनदास गोकुल के आस पास ही रहते थे लेकिन कृष्ण प्रेम में वहां कम ही जाते थे। उनको कृष्ण के यहां लिए चलने को आतुर लोग अक्सर निराश हो जाते कि कृष्ण…