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Showing posts from May, 2010

खूबसूरत लड़की, तीस डिग्री पर खिला चाँद और कुछ यादें

सुबहआठबजेउठाथा. उसकेबाददिनजानेकिनख़यालोंमेंबीता, यादनहीं. आँधियाँमेरेयहाँमुहब्बतकीराहतकीतरहबरसतीहै. विरहकातापमानकुछएकडिग्रीगिरजायाकरताहैफिरमैंमुहब्बतकीसौगातफाइनडस्टकोपौंछताफिरताहूँ. फाइन डस्ट से कुछ भी अछूता नहीं छूटता जैसे प्रेम अपने लिए जगह बनाता हुआ हर कहीं छा जाता है .

घरमेंअकेलाहूँइसलिएकलदिनभरडस्टिंगऔरझाडूपौचाकरतारहातोआजथकाहुआथा. दिनकेअकेलेपनमेंकिसीऔरराहतकेबरसनेकीउम्मीदकमहीथीमगरमिरेकल्सहोतेहैं, आजमैंनेअपनेघरकेदरवाजेपरएकबेहदखूबसूरतलड़कीकोदेखा, उसनेक्याकहाअबयादनहींमगरउसकाचेहरा... इससमयपूरबमेंतीसडिग्रीऊंचाईपरखिलेहुएचाँदसेअधिकसुन्दरथा.

आज मौसम भीकमबख्तपुरानीदुआओंसा था. तन्हाई और यादें... एकइन्सानहुआकरतेथे, जोदिलसेकहतेथे, अबकोईअवतारनहींहोनेवालाकोईमसीहानहींआनेवालायानिजागोऔरअपनीतकदीरखुदलिखो. आजकेदिनकीपूर्वसंध्यापरसितारोंमेंखो गए थे. आह मिर्ज़ा साहब, क्याविकासहुआहैहमाराकिलाइनतोड़करजानेवालोंकोरोकभीनहींपाते ?


रातनौबजेसेपीरहाहूँऔरआबिदाकोसुनरहाहूँ.
चाँदअभीस्मृतियोंकीधूलमेंबेनूरसाहै. हवामेंजरूरएकख़ामोशीहै. दूरदिखतेहुएटाउनहालकीछत,हाईमास्टलाईटकीरौशनीसेचमकतीहैमगर जाने कितने किरदारबुझचुकेहैं.भीतरएकगह…

आओ पी के सो जाएं, महंगाई गयी तेल लेने

कहिये ! प्रधानमंत्री जी आपको एक सवाल पूछने की अनुमति दें तो आप क्या पूछेंगे ? सवाल सुन कर कभी कोई खुश नहीं होता क्योंकि सवाल हमेशा असहज हुआ करते हैं। वे कहीं से बराबरी का अहसास कराते हैं और सवाल पूछने वाले को कभी - कभी लगता है कि उसका होना जायज है. २४ मई को ऐसा मौका था कि अमेरिका के राष्ट्रपति जिस देश को गुरु कह कर संबोधित करते हैं, उसके प्रधानमंत्री चुनिन्दा कलम और विवेक के धनी राष्ट्र के सिरमौर पत्रकारों के समक्ष उपस्थित थे.

प्रेस कांफ्रेंस में तिरेपन पत्रकारों ने सवाल पूछे, आठ महिला पत्रकार बाकी सब पुरुष. एक सवाल सुमित अवस्थी ने पूछा जिसका आशय था कि "आप गुरशरण कौर की मानते हैं या सोनिया गाँधी की ?" इस बेहूदा सवाल पर हाल में हंसी गूंजी, मगर सुमित के सवाल पर मुझे शर्म आई, इसलिए नहीं कि वह निजी और राजनीति से जुड़ा, एक मशहूर मसखरा विषय है. इसलिए कि जिस देश पर आबादी का बोझ इस कदर बढ़ा हुआ कि देश के घुटनों का प्रत्यारोपण ना हुआ तो वह कभी भी ज़मीन पकड़ सकता है. जिस देश के समक्ष मंहगाई ने असुरी शक्ति पा ली है और उसका कद बढ़ता ही जा रहा है. जिस देश में वैश्विक दबा…

दोस्त ज़ोर्ज, एक मास्टर कवि ने तुम्हारी याद दिला दी

अमेरिकी प्रशासन ने पिछले साल सब नियोक्ताओं से आग्रह किया था कि वे अपने अधिकारियों को निर्देश दें कि फेसबुक पर कम से कम जानकारी सार्वजनिक करें, मुझे लगा कि अमेरिकी प्रशासन की फट रही थी लेकिन दो दिन पहले एक मास्टर कवि मेरे फेसबुक एकाउंट पर आकर 'टाबर समझे खुद ने बाप बराबर' बता गए तो अब मेरी भी फट रही है. मेरे लिए राहत की बात ये है कि वे मेरे से उम्र में दस साल बड़े है. इस बहाने से मैंने बर्दाश्त करने का हौसला फिर से पा लिया. फेसबुक पर एक ऑप्शन है कि वह अपने सदस्यों को मित्र सुझाने की सुविधा देता है तो मेरे पिताजी के एक मित्र जो वरिष्ठ साहित्यकार हैं और दूरदर्शन के बड़े पद से सेवा निवृत हुए हैं, उन्होंने मुझे सुझाया कि इन्हें आप अपना मित्र बना सकते हैं. उनके सुझाव को मानने के बाद अब सोचता हूँ कि यार इससे तो अच्छा था कि इथोपिया में पैदा होते और लोगों की सहानुभूति के साथ मर जाते.

रात नौ तीस पर छत पर आया था, चाँद ठीक ज्योमेट्री बक्से के चंदा जैसा था अनुमान हुआ कि आज सप्तमी के आस पास का कोई दिन होगा. कल मेरा एक मेहरबान ग्रीन लेबल की दो बोतल पहुंचा गया था. वैसे आप ठेके से …

टिटहरी इस बार ऊंची जगह पर देना अंडे

गाँवबहुतदूरनहींहैबसहाथऔरदिलजितनीहीदूरीहै. पापाहोतेतोवेकलगाँवजानेकेलिएअभीसेहीतैयार होचुकेहोतेक्योंकिकलआखातीजहै. दुनियाभरमेंकिसानोंकेत्यौहारफसलकीबुवाईसेठीकपहलेऔर कटाईकेबादआतेहैं. हमारेयहाँभीआखातीजबहुतबड़ात्यौहारहै, इसेदीपावलीकेसमकक्षरखाजाताहै. हरसालइसदिनकेलिएप्रशासनिकलवाजमाबालविवाहरोकनेकेलिएकंट्रोलरूमबनताहै, क्षेत्रवारविशेष दंडाधिकारियोंकीनियुक्तिकरताहैऔरपुलिसथानोंकेपासहरदममुस्तेदरहनेकेआदेशहोतेहैंमगरफिरभी शादियोंकीधूमरहतीहै, कलभीबहुतसेनन्हे - नन्हेबच्चेविवाहकेबंधनोंमेंबंधजायेगे.

मेरीरूचिरेवाणोंमेंयानिगाँवकेलोगोंकीहर्षोल्लाससेभरीबैठकोंमेंसदासेहीबनीरहीहै. इसख़ासदिनकी शुरुआतहालीअमावस्यासेहोतीहैऔरहरघरमेंखीचपकनाशुरूहोजायाकरताहै. घरके आँगन केबीचएक पत्थरकीओखलीफर्शमेंजड़ीहुआकरतीहैउसमेपड़तेहुएमूसलकीधमकसूरजकेनिकलनेसेपहलेसुनाई देनेलगतीहै. आँगनमेंधानकेरूपमेंबाजरा, मूंगऔरतिलकेसाथगुड़औरकपासरखाहोताहै. सबघरोंके लोगएकदूसरेकेयहाँजातेऔरखीचखातेहैंकिन्तुघरमेंघुसतेहीवेसबसेपहलेबाजराऔरकपासकोसरपर लगातेहैंकिदेवकृपासेवर्षभरकेलिएभरपूरधानऔरपहननेकेलिएअच्छेवस्त्रइसबारकीफसलसेमिलें.

जानेक्यूंमगरहरबीतीहुईचीजबहुतअच्छीलगती…

भाजपा का हमला नहीं, ज्यादा खा चुकी बकरी के आफरे के बाद की मिंगणियां है

मध्यप्रदेशसरकारकेमंत्रीकैलाशविजयवर्गीयऔरउनकेसिपहसालारविधायकरमेशमेन्दौलाकेकथितघोटालोंकेबारेमेंप्रकाशितखबरोंकेबादराजस्थानपत्रिकासमूहकेअखबार'पत्रिका'परहमलेकियेजारहेहैं. संसदमेंजयपुरकेसांसदमहेशजोशीनेइसेभाजपाईगुंडागर्दीकहतेहुएइनहमलोंकेखिलाफपुरजोरआवाज़उठाई. पत्रिकाकेगुलाबकोठारीनेइसेभाजपाकेभयसेकांपतीमथुराकानामदियाहै.

समाचारपत्रोंपरफासीवादीहमलेकोईनयीबातनहींहै. हमारेदेशमेंइसतरहकेहमलेस्वतःस्फूर्तनहोकरसदाहीप्रायोजितहोतेहैं. दक्षिणकेक्षेत्रीयदलहोंयाशिवसेनाकीपरंपरामेंउपजेमहानगरीयउदंडसमूह, सबनेअपनीउपस्थितिदर्जकरानेकेलिएइसतरहकीओछीहरकतेंनियमितरूपसेकीहै. मुझेयादनहींआताकिइसतरहकेहमलोंकेबादपुलिसनेकोईउचितकदमउठायेहोंगे. सरफूटेहुएपत्रकारफिरसेअपनेकाममेंजुटगएक्योंकिउनकाप्रबंधनसमाचारपत्रचलानेकेधंधेकोअपनेपत्रकारोंकीतुलनामेंसदावरीयतापररखताआयाहै.

राजस्थानपत्रिकाकाभाजपापरलगायाआरोपउतनासीधानहींहैजितनादिखरहाहैकिकरोड़ोंकेघोटालेकीखबरेंछापनेकेकारणयेसबहोरहाहै. इसकेमूलमेंकुछऔरबातेंहैजिन्हेंसमझनेकेलिएकैलाशविजयवर्गीयकोभूलकरइसेएकसमाचारकार्पोरेटसमूहऔरसरकारकेव्यवसायिकरिश्तोंकेतौरपरदेखनाहोगा. मंत्रीऔरविधायककीतानाशाहीलोकतं…

स्त्री विमर्श की किंवदंती पाकिस्तान चली गयी, तनहा कवि अब दीवारों से सर फोड़ता होगा

कविकेलिएदोख़िलाफ़तभरेशब्दकोईकहदेतोउसकेचमचेकांव - कांवकरतेहुएसरपरमंडरानेलगतेहैं, यहीएककविकेसफलऔरमहानहोनेकीपुष्टिकाएकमात्रतरीकाभीहै. मेरीएकपरिचितनेजबदूजवरचुनातोमुझेपहले हेमा मालिनी से लेकर करिश्मा और फिर सानिया मिर्ज़ा के बहाने अनिलगंगलकीएक कविता की यादआगयी. वेकितनेबड़ेयाछोटेकविहैंयेबहसकाविषयनहींहै, मुझेजोबातगुदगुदारहीहै. वहहैकिउन्होंनेभारतकीइसटेनिसखिलाड़ीकेलिएकवितालिखी. इसकविताकोहंसनेप्रकाशितकिया. इस कविता के प्रथम पाठ पर मुझे याद आया कि हंसनेकईप्रतिभावानकवियोंकोरुलायाहै. वहनसिर्फउन्हेंछापनेसेगुरेजकरतारहाहैबल्किउनकीकविताओंकोपाठकोंकेपत्रोंकेबीचप्रकाशित( करशर्मसार ) करतारहाहै. इसपरहंसदावायेभीकरताहैकिआपखुशियाँमनाइयेकिकहींहंसनेआपकोजगहतोदी. तौबायेकविऔरयेहंसकाअभिमान.

अनिलगंगल,हंसजनवरी 2009 मेंछपीअपनीकविता 'सानियामिर्ज़ाकेलिए' मेंलिखतेहैं, हाथोंमेंभारीरैकेटलिएतुम्हेंटेनिसखेलतेदेखमैंविस्मितऔररोमांचितहोताहूँ... जैसेशेषसभीमहिलाखिलाड़ीफूलछापझाड़ूसेखेलतीहैं. वेलिखतेहैंकिस्त्रीविमर्शकीनवीनतमकिंवदंतीहोतुम... अब ये स्त्री विमर्श, कुछ दिनों तक राष्ट्रवाद का विमर्श …

जियें तो जहाँ में दिमित्रोफ़ होकर

कल का दिन बहुत उमस भरा था. मौसम में आर्द्रता बढ़ रही होगी वरना नम भीगी आँखों की नमी महसूस करने के दिन अब कहाँ है. ऐसे दिनों में ये बहुत पहले की बात नहीं है जब किसी राह से गुजरते हुए इंसान को उदास देख कर ही लोग उदास हो जाया करते थे. मन उन दिनों गीले थे. सूत के रंगीन धागों से बनी खूबसूरत बावड़ियों वाली चारपाइयों के पाए भी कद में कुछ ऊँचे हुआ करते थे. वे जाने किसके इंतजार में घर के बाहर बनी गुडाल ( मेहमानों का कमरा/विजिटर्स रूम) में आम चारपाइयों से अलग खड़ी ही रहा करती थी. मैं जब भी गाँव जाता, यही सोचता कि आखिर कब बिछेगी ये चारपाई ? मेरे कौतुहल का सबसे बड़ा प्रश्न रहता कि जिस चारपाई पर घर के सबसे बड़े इंसान को सोते हुए नहीं देखा उस पर जरूर कोई फ़रिश्ता कभी सोने के लिए आएगा.

मेरे ताऊ जी जब मौज में होते तो अपनी सफ़ेद दाढ़ी बढ़ा लिया करते थे. उस फरहर सफ़ेद दाढी के बीच मूंछें इतनी पतली करवा लेते कि मुझे पांचवी की किताब में देखी गयी चीनी यात्री की तस्वीर याद आ जाती. खेती बाड़ी के बाद के दिनों में, उनके ढेरिये घूमते रहते और रंगीन सूत के सुंदर गोले बन जाते. उन गोलों को वे इतने प्यार …