May 29, 2010

खूबसूरत लड़की, तीस डिग्री पर खिला चाँद और कुछ यादें

सुबह आठ बजे उठा था. उसके बाद दिन जाने किन ख़यालों में बीता, याद नहीं. आँधियाँ मेरे यहाँ मुहब्बत की राहत की तरह बरसती है. विरह का तापमान कुछ एक डिग्री गिर जाया करता है फिर मैं मुहब्बत की सौगात फाइन डस्ट को पौंछता फिरता हूँ. फाइन डस्ट से कुछ भी अछूता नहीं छूटता जैसे प्रेम अपने लिए जगह बनाता हुआ हर कहीं छा जाता है .

घर में अकेला हूँ इसलिए कल दिन भर डस्टिंग और झाडू पौचा करता रहा तो आज थका हुआ था. दिन के अकेलेपन में किसी और राहत के बरसने की उम्मीद कम ही थी मगर मिरेकल्स होते हैं, आज मैंने अपने घर के दरवाजे पर एक बेहद खूबसूरत लड़की को देखा, उसने क्या कहा अब याद नहीं मगर उसका चेहरा... इस समय पूरब में तीस डिग्री ऊंचाई पर खिले हुए चाँद से अधिक सुन्दर था.

आज मौसम भी कमबख्त पुरानी दुआओं सा था. तन्हाई और यादें... एक इन्सान हुआ करते थे, जो दिल से कहते थे, अब कोई अवतार नहीं होने वाला कोई मसीहा नहीं आने वाला यानि जागो और अपनी तकदीर खुद लिखो. आज के दिन की पूर्व संध्या पर सितारों में खो गए थे. आह मिर्ज़ा साहब, क्या विकास हुआ है हमारा कि लाइन तोड़ कर जाने वालों को रोक भी नहीं पाते ?


रात नौ बजे से पी रहा हूँ और आबिदा को सुन रहा हूँ.
चाँद अभी स्मृतियों की धूल में बेनूर सा है. हवा में जरूर एक ख़ामोशी है. दूर दिखते हुए टाउन हाल की छत, हाई मास्ट लाईट की रौशनी से चमकती है मगर जाने कितने किरदार बुझ चुके हैं. भीतर एक गहरा सन्नाटा अपना पार्ट करता होगा.

May 25, 2010

आओ पी के सो जाएं, महंगाई गयी तेल लेने

कहिये ! प्रधानमंत्री जी आपको एक सवाल पूछने की अनुमति दें तो आप क्या पूछेंगे ? सवाल सुन कर कभी कोई खुश नहीं होता क्योंकि सवाल हमेशा असहज हुआ करते हैं। वे कहीं से बराबरी का अहसास कराते हैं और सवाल पूछने वाले को कभी - कभी लगता है कि उसका होना जायज है. २४ मई को ऐसा मौका था कि अमेरिका के राष्ट्रपति जिस देश को गुरु कह कर संबोधित करते हैं, उसके प्रधानमंत्री चुनिन्दा कलम और विवेक के धनी राष्ट्र के सिरमौर पत्रकारों के समक्ष उपस्थित थे.

प्रेस कांफ्रेंस में तिरेपन पत्रकारों ने सवाल पूछे, आठ महिला पत्रकार बाकी सब पुरुष. एक सवाल सुमित अवस्थी ने पूछा जिसका आशय था कि "आप गुरशरण कौर की मानते हैं या सोनिया गाँधी की ?" इस बेहूदा सवाल पर हाल में हंसी गूंजी, मगर सुमित के सवाल पर मुझे शर्म आई, इसलिए नहीं कि वह निजी और राजनीति से जुड़ा, एक मशहूर मसखरा विषय है. इसलिए कि जिस देश पर आबादी का बोझ इस कदर बढ़ा हुआ कि देश के घुटनों का प्रत्यारोपण ना हुआ तो वह कभी भी ज़मीन पकड़ सकता है. जिस देश के समक्ष मंहगाई ने असुरी शक्ति पा ली है और उसका कद बढ़ता ही जा रहा है. जिस देश में वैश्विक दबाव के कारण मुद्रा स्फीति पर कोई नियंत्रण नहीं हो पा रहा है. उस देश के प्रधानमंत्री जब राष्ट्र के समक्ष अपनी जवाबदेही के लिए उपस्थित हों तब इस तरह के मजाहिया सवाल हमारी पत्रकारिता के गिरे हुए स्तर की ओर इशारा करते हैं.

मैं सिर्फ एक पत्रकार का आभार व्यक्त करना चाहता हूँ जिसने पहला सवाल पूछा था. उसकी आंचलिक प्रभाव वाली हिंदी भाषा मुझे स्तरीय लगी क्योंकि उसने जानना चाहा कि प्रधानमंत्री महोदय ऐसा कब तक चलेगा कि मंहगाई बढती रहेगी और आम आदमी रोता रहेगा. मैं प्रधानमंत्री जी से कुछ पूछने का अधिकारी नहीं हूँ अगर होता तो एक नहीं तीन सवाल पूछता.

इस बार मानसून सामान्य से बेहतर रहने की उम्मीद है तो क्या सरकार इस विषय पर सोच रही है कि किसानों को लगभग मुफ्त में बीज और खाद दिये जाये ताकि भूखे - नंगे आदमी को नक्सली खरीद ना पाएं ? मैं जानना चाहूँगा कि आधार पहचान पत्र (यू आई डी) बनाने की प्रक्रिया से जुड़े कार्मिकों द्वारा गलत व्यक्ति की पहचान सत्यापित करने पर कितनी सख्त सजा दी जाएगी ? ताकि ये तय हो कि इस देश में स्वछंद कौन घूम रहा है और आखिरी सवाल कि सरकारें इतनी दोगली क्यों है कि शराब को राष्ट्र के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक बताती है फिर भी प्रतिबन्ध नहीं लगाती ?

तीसरे सवाल का उत्तर मुझे पता है कि इससे सरकार और उत्पादक को असीमित मुनाफा होता है. सात रुपये की लागत वाली बीयर की बोतल अस्सी रुपये में बेची जाती है. सरकार और कंपनी का फिफ्टी - फिफ्टी. इसका एक उत्तर ये भी हो सकता है कि आओ पी के सो जाएँ महंगाई गयी तेल लेने. सोने से पहले क़मर जलालाबादी का एक शेर सुनिए.

सुना था कि वो आयेंगे अंजुमन में, सुना था कि उनसे मुलाक़ात होगी
हमें क्या पता था, हमें क्या ख़बर थी, न ये बात होगी न वो बात होगी।

May 20, 2010

दोस्त ज़ोर्ज, एक मास्टर कवि ने तुम्हारी याद दिला दी

अमेरिकी प्रशासन ने पिछले साल सब नियोक्ताओं से आग्रह किया था कि वे अपने अधिकारियों को निर्देश दें कि फेसबुक पर कम से कम जानकारी सार्वजनिक करें, मुझे लगा कि अमेरिकी प्रशासन की फट रही थी लेकिन दो दिन पहले एक मास्टर कवि मेरे फेसबुक एकाउंट पर आकर 'टाबर समझे खुद ने बाप बराबर' बता गए तो अब मेरी भी फट रही है. मेरे लिए राहत की बात ये है कि वे मेरे से उम्र में दस साल बड़े है. इस बहाने से मैंने बर्दाश्त करने का हौसला फिर से पा लिया. फेसबुक पर एक ऑप्शन है कि वह अपने सदस्यों को मित्र सुझाने की सुविधा देता है तो मेरे पिताजी के एक मित्र जो वरिष्ठ साहित्यकार हैं और दूरदर्शन के बड़े पद से सेवा निवृत हुए हैं, उन्होंने मुझे सुझाया कि इन्हें आप अपना मित्र बना सकते हैं. उनके सुझाव को मानने के बाद अब सोचता हूँ कि यार इससे तो अच्छा था कि इथोपिया में पैदा होते और लोगों की सहानुभूति के साथ मर जाते.

रात नौ तीस पर छत पर आया था, चाँद ठीक ज्योमेट्री बक्से के चंदा जैसा था अनुमान हुआ कि आज सप्तमी के आस पास का कोई दिन होगा. कल मेरा एक मेहरबान ग्रीन लेबल की दो बोतल पहुंचा गया था. वैसे आप ठेके से लेकर पिए तो जो चाहे ब्रांड ले सकते हैं मगर दो नंबर की दारू के लिए आपको समझौते करने पड़ते हैं. केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ के लिए बिकने वाली शराब हमारे यहाँ अवैध रूप से बिकती है, जिसके दाम बाज़ार कीमत से ठीक आधे होते हैं यानि आप को सौभाग्य से एंटीक्यूटी की खेप में हिस्सेदारी मिल जाये तो उसके दाम होंगे मात्र तीन सौ रुपये प्रति बोतल. मैंने सलाद के लिए आज खीरे को छोड़ दिया और उसकी जगह बेरे की देसी ककड़ी को लिया, कभी पीते हुए आपने भी खायी होगी तो उसका स्वाद अभी तक नहीं भूले होंगे ऐसा मेरा विश्वास है. दक्षिण एशिया का ये सबसे गरीब व्यक्ति बस ऐसे ही काम चलाता है कि अवैध बिकने वाली दारू और देसी ककड़ी खाकर सो जाया करता है तो फिर कैसे किसी बुद्धिजीवी की पंक्ति का उत्तर दे.

अफ्रीका के नक़्शे में एक गेंडे के सींग जैसा क्षेत्र बनता है उसका केंद्र है ईथोपिया. आप जोर्ज रुदबर्क को नहीं जानते होंगे वैसे मैं भी अपने मोहल्ले के बहुत से लोगों के नाम नहीं जानता. ज़ोर्ज एक शाम दिल्ली के संसद मार्ग के किनारे लगी लोहे की रेलिंग से सहारा ले कर खड़ा था मजे की बात है कि मैं भी इसी मुद्रा में था. मुझे वह पहली नज़र में स्मेक के सौदागर जैसा दिखा किन्तु थोड़ी सी जान पहचान के आध घंटे बाद हम दोनों एक सामान्य स्तर के बार में शराब पी रहे थे.

उसने मुझे पूछा कि तुम कहाँ रहते हो मैंने कहा बहुत गर्म प्रदेश में वह जरा चौंका मगर उसने कहा कि कभी दल्लोल आना फिर पता चलेगा कि गर्मी क्या है ? मेरे पचास रुपये बर्बाद हो गए, दो पिए हुए पैग उतर गए क्योंकि मैं थार के मरुस्थल की गरमी को दुनिया का आखिरी सच मान रहा था. मैं समझता था कि काफी बीन्स के लिए अमेरिका उपयुक्त जगह है मगर उसने बताया कि इथोपिया एक नंबर है, सोचा था कि हमारा लोकतंत्र प्राचीन है मगर उसका देश तो दुनिया के प्राचीनतम स्वतंत्र देशों में से एक है. मैंने अपनी सभ्यता के बारे में उसे बताया, उसने बड़े ध्यान से सुना मगर फिर बोला कि हमारे देश की सभ्यता की गणना ईसा से दस शतक पूर्व से की जाती है.

मैंने बताया कि हिमालय और नीचे कन्या कुमारी जैसी विविधता हमें ख़ास बनाती है, उसने नम्रता से कहा कि अफ्रीका की सबसे ऊँची चोटियाँ उसके देश में हैं, हरियाली है, सबसे सुन्दर प्रपात है, गर्म पानी के अद्भुत चश्मे हैं और इस सुन्दरता को गाने के लिए हेमेमल अबेत से लेकर महमूद अहमद जैसे लोग ईश्वर ने उस धरती को दिए हैं. उसने एक ब्राजीलियन शराब की मांग की मगर वह उस बार में नहीं थी तो उसने हल्की और सस्ती शराब पर हामी भरी थी. मैंने उस दिन विस्की ही ली थी मगर वह भी नाकामयाब रही क्योंकि जब मैंने उसे बताया कि तुम और तुम्हारा देश अद्भुत हो तो वह अपना ग्लास खाली करते हुए बोला मैं भूखे और बेबस लोगों के देश से आया हूँ. मैं फिर हार गया था, वह हर मामले में अद्भुत था गरीबी के मामले में भी. उसने कहा मेरे देश में कुछ भी प्रगतिशील नहीं है इस्लामिक, जेविश और क्रिस्तान सब घोर रुढ़िवादी है फिर भी इथोपिया है. वह भूखे नंगे लोगों का देश पूँजीवाद की जूती नहीं है.

मेरे पिता कि तरह ज़ोर्ज कवि नहीं था मगर मास्टर था, वह शराब से प्यार नहीं करता था , वह समाज को खूबसूरत देखना चाहता था ठीक मेरे पिता की तरह, सबसे बड़ी बात कि उसने मेरा पिता बनने की कोशिश करने की जगह दोस्त बन कर बताया कि अभी तुम्हारी उम्र कच्ची है और दुनियावी तालीम अभी बाकी है. ज़ोर्ज आज बीस साल बाद भी मुझे तुम्हारी याद है. ये भी नहीं भूला हूँ कि तुम अपने देश की सोमालिया को छूती सीमा रेखा के पास किसी गाँव में रहते हो जैसे मैं भी. आज तुम यहाँ होते तो हम ग्रीन लेबल विस्की पी रहे होते.

इन दिनों रोज़ ही पीता हूँ मगर अपने दोस्त को फोन नहीं करता ताकि उसे मालूम हो कि शराब पी कर ही तुम्हारी याद नहीं आती है. नज़ीर बनारसी की एक ग़ज़ल मुझे बहुत पसंद है ये करें या वो करें, ऐसा करें, वैसा करें... आज उन्हीं का एक शेर


जहाँ ठहरे क़ल्ब-ए-मुज़्तर वो नज़ीर मेरी मंजिल
जहाँ रुक के सांस ले लूं वही मेरा ठिकाना

May 15, 2010

टिटहरी इस बार ऊंची जगह पर देना अंडे

गाँव बहुत दूर नहीं है बस हाथ और दिल जितनी ही दूरी है. पापा होते तो वे कल गाँव जाने के लिए अभी से ही तैयार हो चुके होते क्योंकि कल आखा तीज है. दुनिया भर में किसानों के त्यौहार फसल की बुवाई से ठीक पहले और कटाई के बाद आते हैं. हमारे यहाँ भी आखातीज बहुत बड़ा त्यौहार है, इसे दीपावली के समकक्ष रखा जाता है. हरसाल इस दिन के लिए प्रशासनिक लवाजमा बाल विवाह रोकने के लिए कंट्रोल रूम बनता है, क्षेत्रवार विशेष दंडाधिकारियों की नियुक्ति करता है और पुलिस थानों के पास हर दम मुस्तेद रहने के आदेश होते हैं मगर फिर भी शादियों की धूम रहती है, कल भी बहुत से नन्हे - नन्हे बच्चे विवाह के बंधनों में बंध जायेगे.

मेरी रूचि रेवाणों में यानि गाँव के लोगों की हर्षोल्लास से भरी बैठकों में सदा से ही बनी रही है. इस ख़ास दिन की शुरुआत हाली अमावस्या से होती है और हर घर में खीच पकना शुरू हो जाया करता है. घर के आँगन के बीच एक पत्थर की ओखली फर्श में जड़ी हुआ करती है उसमे पड़ते हुए मूसल की धमक सूरज के निकलने से पहले सुनाई देने लगती है. आँगन में धान के रूप में बाजरा, मूंग और तिल के साथ गुड़ और कपास रखा होता है. सब घरों के लोग एक दूसरे के यहाँ जाते और खीच खाते हैं किन्तु घर में घुसते ही वे सबसे पहले बाजरा और कपास को सर पर लगाते हैं कि देव कृपा से वर्ष भर के लिए भरपूर धान और पहनने के लिए अच्छे वस्त्र इस बार की फसल से मिलें.

जाने क्यूं मगर हर बीती हुई चीज बहुत अच्छी लगती है जैसे मेरे बुजुर्ग जो अब इस दुनिया में नहीं रहे वे मुझे सबसे अच्छे और परिपक्व काश्तकार लगते थे. उनके हाथ से गिरते बीजों के साथ मेरा विश्वास भी उस नम धरती में गिरता था कि इस बार की फसल व्यर्थ नहीं जाएगी. अब अपने हाथों पर यकीन ही नहीं होता. पहले ऊंट के पीछे बांधे हुए दो हल के निशान में भी लहलहाती फसल दिखाई देती थी मगर अब जब ट्रेक्टर के पीछे बैठ कर बीजोली में से अपना हाथ बाहर निकालता हूँ तो पाता हूँ कि मेरे हाथों में वो जादू नहीं है जो उन सफ़ेद चिट्टी दाढी वाले तेवटा पहने हुए मेरे पितामह और उनके जैसों में था. जिन्होंने सोने के दानों जैसी जौ से कोठरियां भरी और इस रेत को मानव पदचिन्हों से आबाद कर के रखा.

कल आनेवाले मानसून के लिए शगुन विचार होगा. हर रेवाण में भांत भांत के तरीकों से पता लगाया जायेगा कि बरसात कब होगी और कैसा रहेगा इस बार किसान का भाग्य. जो प्रचलित तरीके हैं उनमे सबसे प्रसिद्द है कच्ची माटी के चार सकोरे जैसे प्याले बनाये जाते हैं और उनका नामकरण आने वाले महीनों के हिसाब से कर दिया जाता है. उनमे पानी भरने के बाद उनके फूटने का इंतजार किया जाता है. जो सबसे पहले फूटता है, उसी महीने में बारिश की आस बंधती है. रुई के दो फाहे बनाये जाते हैं एक काला और एक सफ़ेद फिर दोनों को एक साथ पानी में रखा जाता है अगर काला फाहा पहले डूब जाता है तो मान लिया जाता है कि इस बार जबरदस्त जमाना आयेगा क्योंकि काळ डूब गया है.

जोहड़ के आस पास टिटहरी की तलाश की जाती है फिर देखते हैं कि उसने कितने ऊँचे अंडे दिए हैं अगर वह पाळ से भी ऊपर अंडे देती है तो समझो कि इस बार पानी की कोई कमी नहीं. चींटियों की बाम्बी तलाशी जाती है और उसके पास धान रखा जाता है अगर सवेरे धान बिखरा हुआ मिले तो समझो कि इस बार बहुत मुश्किल होनेवाली है. तीतर के बोलने के बाद जितने कदम दूर चलने के बाद वह फिर बोलता है बस उतने ही दिन दूर है बरसात.

मानव इन सब बातों पर भरोसा करता है क्योंकि ये सच्ची बातें हैं. हमने घर बनाना भी इन्हीं पंछियों से सीखा है. हम नहीं जानते कि बरसात कितनी होगी मगर ज़मीन पर अंडे देने वाला पक्षी जिसे स्थानीय भाषा में टींटोली कहते हैं उसे पता है कि उसके अंडे किस स्तर पर सुरक्षित रहेंगे. चींटियाँ जानती है कि अब कितनी ऊँचाई पर शिफ्ट हो जाना चाहिए. हम तो खुद शराब बनाना भी नहीं सीख पाए किण्वन अपने आप हुआ था, बस हिम्मत कर के जौ का बासी पानी पी लिया. जो हमने बनाया है वह हमें प्रकृति से दूर ले जाता है पता नहीं हम कब कुछ ऐसा सीखेंगे जो हमें और प्रकृति को एकमेव कर देगा.

May 8, 2010

भाजपा का हमला नहीं, ज्यादा खा चुकी बकरी के आफरे के बाद की मिंगणियां है

मध्यप्रदेश सरकार के मंत्री कैलाश विजयवर्गीय और उनके सिपहसालार विधायक रमेश मेन्दौला के कथित घोटालों के बारे में प्रकाशित खबरों के बाद राजस्थान पत्रिका समूह के अखबार 'पत्रिका' पर हमले किये जा रहे हैं. संसद में जयपुर के सांसद महेश जोशी ने इसे भाजपाई गुंडागर्दी कहते हुए इन हमलों के खिलाफ पुरजोर आवाज़ उठाई. पत्रिका के गुलाब कोठारी ने इसे भाजपा के भय से कांपती मथुरा का नाम दिया है.

समाचार पत्रों पर फासीवादी हमले कोई नयी बात नहीं है. हमारे देश में इस तरह के हमले स्वतः स्फूर्त हो कर सदा ही प्रायोजित होते हैं. दक्षिण के क्षेत्रीय दल हों या शिव सेना की परंपरा में उपजे महानगरीय उदंड समूह, सबने अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए इस तरह की ओछी हरकतें नियमित रूप से की है. मुझे याद नहीं आता कि इस तरह के हमलों के बाद पुलिस ने कोई उचित कदम उठाये होंगे. सर फूटे हुए पत्रकार फिर से अपने काम में जुट गए क्योंकि उनका प्रबंधन समाचार पत्र चलाने के धंधे को अपने पत्रकारों की तुलना में सदा वरीयता पर रखता आया है.

राजस्थान पत्रिका का भाजपा पर लगाया आरोप उतना सीधा नहीं है जितना दिख रहा है कि करोड़ों के घोटाले की खबरें छापने के कारण ये सब हो रहा है. इसके मूल में कुछ और बातें है जिन्हें समझने के लिए कैलाश विजयवर्गीय को भूल कर इसे एक समाचार कार्पोरेट समूह और सरकार के व्यवसायिक रिश्तों के तौर पर देखना होगा. मंत्री और विधायक की तानाशाही लोकतंत्र पर कलंक है मगर इस खबर को पत्रिका ने व्यवस्था पर केन्द्रित करके व्यक्ति विशेष पर किया है और भाजपा पर गुंडा गर्दी का आरोप मुझे सरासर वाहियात इसलिए भी लगता है कि पत्रिका समूह स्वयं भाजपा के मुखपत्र का दायित्व निभाता रहा है.

भास्कर समूह के राजस्थान में आने के किस्से से सब भली भांति परिचित है. एक तरफा और प्रायोजित खबरों के अभियान से उपजे द्वेष के चलते हुए राजस्थान भाजपा के एक वरिष्ठतम नेता अपने सम्बन्धों के चलते पत्रिका के तोड़ के लिए भास्कर समूह को राजस्थान में लाये थे. उस समय दैनिक नवज्योति कांग्रेस का पक्षधर माना जाता था मगर वह समूह अजमेर अंचल के बाहर अपना अपेक्षित प्रसार कभी नहीं कर पाया था. नवभारत टाईम्स भी अपने व्यवसायिक हितों की पूर्ति होने के कारण जयपुर से खुद को हटा चुका था और राज्य में पत्रिका अकेला समूह था जिसकी तूती बोलती थी.

आज जनपक्षधरता की बात करने वाले इस अखबार में जनता से जुड़ी खबरों में कोई दिलचस्पी नहीं थी. मैं इसे समाचार पत्र की मनमानी और जनता की लाचारी कहता हूँ. पत्रकारों के नाम पर जिला मुख्यालयों पर आकाशवाणी के लिए जिले की चिट्ठी लिखने जैसा औपचारिक काम करने वाले लोग थे. खबरों का आलम ये था कि भाजपा से अलग किसी विचार और आन्दोलन की सिंगल कालम न्यूज तक नहीं लगाई जाती थी. सीकर में इसी अखबार के जनविरोधी रवैये से खफा होकर वामपंथी छात्र, युवा और किसानों ने होली जलाई थी और अख़बार को जिले में घुसने ही नहीं दिया था. तब यह समूह कांग्रेस को लाचार सरकार बता रहा था. व्यापक विरोध के बाद शर्मसार पत्रिका ने किसी जन आन्दोलन को पहले पन्ने पर स्थान दिया था.

भास्कर समूह के आगमन के बाद राज्य के पत्रकारों को उचित सम्मान और अवसर मिलने लगे. गली मौहल्लों में हज़ार पांच सौ की प्रसार संख्या वाले लघु समाचार पत्रों में काम करने वाले असंख्य योग्य युवाओं को इस क्षेत्र में कुछ कर पाने का अवसर मिला, वेतन के नाम पर हो रहे शोषण में कुछ राहत मिली और व्यवसायिक स्पर्धा के चलते छोटे - छोटे शहरों और कस्बों में अखबारों के ब्यूरो खुलने लगे तब कहीं जाकर आम आदमी को उससे जुड़ी खबरें पढ़ने को मिली. पत्रिका के एक सत्तात्मक रवैये से ऊबे हुए आम आदमी ने भास्कर को आते ही सर पर बिठाया जयपुर में इसने पहली तिमाही में ही पत्रिका को बीस हज़ार पाठक पीछे छोड़ दिया था. आज पत्रिका उसी कहानी को मध्यप्रदेश में सफलता पूर्वक दोहरा रहा है.

कल जब संसद में माननीय हरीश चौधरी, बद्री जाखड़, गोपाल सिंह शेखावत सहित कई सांसद पत्रिका के पक्ष में आवाज़ उठा रहे थे तब मुझे अब तक के सभी छात्र संघ, नगर निगम और आम चुनाव याद गए. इन सब में पत्रिका कभी निष्पक्ष नहीं रहा है उसने सदा ही दक्षिणपंथी विचारधारा के लिए प्रायोजक का काम किया है. आपको यकीन हों तो एक सीधा सा काम कीजिये, इस समाचार पत्र की फाईल कॉपी लीजिये और अपने बच्चे के बस्ते से पैमाना निकाल कर नाप लीजिये कि दक्षिणपंथी फासीवादी दल के प्रत्याशियों के लिए इस समाचार समूह का रवैया क्या रहा है ? और इन्हीं हरीश चौधरी जैसे प्रत्याशियों को कितना स्पेस मिला है ?

राजस्थान में भास्कर के आगमन के बाद पत्रिका ने मध्यप्रदेश में कदम रखा है. पत्रिका वहां जन जागरण के लिए नहीं गया बल्कि मुझ सा मूर्ख भी जान सकता है कि ये शुद्ध व्यवसाय है. जो समाचार पत्र करोड़ों के घोटाले उजागर करने की बात करता है, उसी समूह के एक पत्रकार ने प्रशासनिक सेवा अधिकारी के घोटालों की खबरें लिखी तो तीसरे दिन पत्रिका प्रबंधन ने उसे इतना धमकाया कि वह पत्रकार मानसिक अवसाद की स्थिति में गया. उसकी खबरें ड्रॉप कर दी गई, उसे कहा गया कि इन सब में तुम्हारी रूचि क्यों है ? खैर ऐसे बहुत से किस्से हैं. ऐषु सुप्तेषु जागर्ति का दावा वास्तव में स्वयं के व्यवसाय को जगाने का दावा मात्र है.

मैं पत्रिका पर हो रहे हमलों का विरोध करते हुए तीव्र शब्दों में भर्त्सना करता हूँ मगर ये मसला इससे बढ़ कर कुछ नहीं है कि ज्यादा खा लेने से अघाई हुई बकरी को आफरा चढ़ आया है और सूखी हुई मिंगणियों का दोष जो पहले कांग्रेस की लाचारी और वामपंथियों की गुंडा गर्दी को जाता था आज वह भाजपा को जा रहा है. एक राजस्थानी कविता की दो पंक्तियाँ याद रही है.

कोई किंयाँ , अर कोई किंयाँ
पण है सगला का सगला ईंयाँ

May 6, 2010

स्त्री विमर्श की किंवदंती पाकिस्तान चली गयी, तनहा कवि अब दीवारों से सर फोड़ता होगा

कवि के लिए दो ख़िलाफ़त भरे शब्द कोई कह दे तो उसके चमचे कांव - कांव करते हुए सर पर मंडराने लगते हैं, यही एक कवि के सफल और महान होने की पुष्टि का एक मात्र तरीका भी है. मेरी एक परिचित ने जब दूज वर चुना तो मुझे पहले हेमा मालिनी से लेकर करिश्मा और फिर सानिया मिर्ज़ा के बहाने अनिल गंगल की एक कविता की याद गयी. वे कितने बड़े या छोटे कवि हैं ये बहस का विषय नहीं है, मुझे जो बात गुदगुदा रही है. वह है कि उन्होंने भारत की इस टेनिस खिलाड़ी के लिए कविता लिखी. इस कविता को हंस ने प्रकाशित किया. इस कविता के प्रथम पाठ पर मुझे याद आया कि हंस ने कई प्रतिभावान कवियों को रुलाया है. वह सिर्फ उन्हें छापने से गुरेज करता रहा है बल्कि उनकी कविताओं को पाठकों के पत्रों के बीच प्रकाशित ( कर शर्मसार ) करता रहा है. इस पर हंस दावा ये भी करता है कि आप खुशियाँ मनाइये कि कहीं हंस ने आपको जगह तो दी. तौबा ये कवि और ये हंस का अभिमान.

अनिल गंगल, हंस जनवरी 2009 में छपी अपनी कविता 'सानिया मिर्ज़ा के लिए' में लिखते हैं, हाथों में भारी रैकेट लिए तुम्हें टेनिस खेलते देख मैं विस्मित और रोमांचित होता हूँ... जैसे शेष सभी महिला खिलाड़ी फूल छाप झाड़ू से खेलती हैं. वे लिखते हैं कि स्त्री विमर्श की नवीनतम किंवदंती हो तुम... अब ये स्त्री विमर्श, कुछ दिनों तक राष्ट्रवाद का विमर्श बना रहा कर सुप्तावस्था में चला गया है. आगे उन्होंने कविता में खेल और स्त्री देह पर खड़े बाजारवाद पर बने बनाये फोर्मुले में प्रहार किये हैं.

आपने कविता में सानिया के निजी जीवन को, उसके इश्क़ को और मुश्किलों को रेखांकित करते हुए अंत में बड़ी बेतुकी बात कही है कि कहीं तुम कोक, पेप्सी, क्रीम और पाउडर में दिखो ...? अगर सानिया मिर्ज़ा इन विज्ञापनों में दिखती तो क्या अनिल गंगल या उनके पाठक उन्हें जानते होते ? कोई पूछे कि पिछले सैफ खेलों में पदक लाने वाली उत्तर पूर्व की खिलाड़ी का नाम बताओ, जिसके घर से सड़क तक आने के लिए तीन किलोमीटर तक कोई साधन नहीं है ? जिसको जूते भी स्थानीय स्पोंसर ने दिए हैं और बरसात के दिनों में उसकी छत न टपके ये अभी भी पक्का नहीं है ? इस सवाल का उत्तर देने में, मेरे विचार से कई कवियों की फूंक निकल जाएगी .

मैं भी जाने कैसी बक बक में लग जाया करता हूँ शाम सात बजे छत पर आया था और सोचा था कि टहलती हुई नयी शाम को देखूंगा, नए बन रहे मकानों की खुली पड़ी खिड़कियों से कूदते फांदते हुए बच्चों को अपनी आँख में भर लूँगा और फिर रात ढलने लगेगी तब हाथ में चिल्ड वोदका होगी मगर शाम इसी लेपटोप के काले सफ़ेद पैड पर बीत गयी है. मैं नयी नयी मुहब्बतों के लिए बदनाम हूँ इसलिए अब अपने वजूद को समेटता फिरता हूँ. सानिया, कविता और स्त्री विमर्श को गोली मारो और सुनों कि आज की शाम मेरे साथ तुम्हारी याद है और अमज़द इस्लाम का एक शेर.

जो उतर के ज़ीना-ए-शब से तेरी चश्म-ए-खुशबू में समां गए
वही जलते बुझते से महर-ओ-माह मेरे बाम-ओ-दर को सजा गए.

May 1, 2010

जियें तो जहाँ में दिमित्रोफ़ होकर

कल का दिन बहुत उमस भरा था. मौसम में आर्द्रता बढ़ रही होगी वरना नम भीगी आँखों की नमी महसूस करने के दिन अब कहाँ है. ऐसे दिनों में ये बहुत पहले की बात नहीं है जब किसी राह से गुजरते हुए इंसान को उदास देख कर ही लोग उदास हो जाया करते थे. मन उन दिनों गीले थे. सूत के रंगीन धागों से बनी खूबसूरत बावड़ियों वाली चारपाइयों के पाए भी कद में कुछ ऊँचे हुआ करते थे. वे जाने किसके इंतजार में घर के बाहर बनी गुडाल ( मेहमानों का कमरा/विजिटर्स रूम) में आम चारपाइयों से अलग खड़ी ही रहा करती थी. मैं जब भी गाँव जाता, यही सोचता कि आखिर कब बिछेगी ये चारपाई ? मेरे कौतुहल का सबसे बड़ा प्रश्न रहता कि जिस चारपाई पर घर के सबसे बड़े इंसान को सोते हुए नहीं देखा उस पर जरूर कोई फ़रिश्ता कभी सोने के लिए आएगा.

मेरे ताऊ जी जब मौज में होते तो अपनी सफ़ेद दाढ़ी बढ़ा लिया करते थे. उस फरहर सफ़ेद दाढी के बीच मूंछें इतनी पतली करवा लेते कि मुझे पांचवी की किताब में देखी गयी चीनी यात्री की तस्वीर याद आ जाती. खेती बाड़ी के बाद के दिनों में, उनके ढेरिये घूमते रहते और रंगीन सूत के सुंदर गोले बन जाते. उन गोलों को वे इतने प्यार से खूँटी पर टांगा करते थे जैसे कि मुझे गोदी में उठा रहें हों. हिरण का एक सींग सूत की चारपाई बुनने में काम आता था. वह काले रंग का आधे बूमरेंग सा हथियार अधबुने सूत के धागों के बीच अपने काम की प्रतीक्षा में लटका ही रहता था. लेकिन कभी वह चारपाई बिछी नहीं. मैं सच में देख लेना चाहता था कि उस पर सोने से क्या ख़ास बात होगी ?

मैं कुछ बड़ा हुआ तो समझ पाया कि वे सुंदर चारपाइयां मनुष्य के श्रमजीवी होने की निशानियाँ हैं. आगंतुक उनको देख कर व्यक्ति के श्रमशील होने का आभास पाता है. कोई पच्चीस साल पहले जिस घर में सुंदर चारपाइयाँ न दिखाई दे वहां के रिश्ते भी ठुकुरा दिये जाते थे. आलसियों के घर में बेटी को ब्याहना भला कौन चाहेगा. साधू - सन्यासी या फिर महंत या समधी के घर से बहुत ही बुजुर्ग पधारते तब वे चारपाइयाँ उनके आदर में बिछाई जाती रही हैं मगर मैं कभी देख नहीं पाया. हम मौसम आधारित खेती करते आयें हैं इसलिए साल में तीन महीने से अधिक काम नहीं होता. शेष समय में औरतें घर में गोबर का आँगन बिछाने, गाय बकरी और भेड़ को पालने और उसी आँगन में बच्चों को खेलने पर डांटने का काम किया करती हैं. वे चारपाइयाँ और रंगीन ओढ़णियों के घूंघट में छिपी हुई मेरी माँ, ताई और चाचियाँ, मनुष्य के लगनशील - श्रमजीवी होने के प्रतीक के रूप में मेरे मन में अभी भी बसी हुई है.

कभी चूरू जिले में जाना हों तो गुरुद्वारा कबूतरसर के बारे में पूछियेगा. ये स्थान साहवा साहब के रास्ते में आएगा. ऐसे भयानक रेतीले बीहड़ में कबूतर पालने के बारे में जान कर मुझे आश्चर्य हुआ था. कोसों दूर पानी का ठिकाना नहीं था मगर आदमी के जीवट से बड़ा कुछ नहीं होता. जो आदमी कबूतर पालता था, उसी का एक कबूतर गुरु गोविन्द सिंह जी के घोड़े के पांव के नीचे आ गया था. वहीं पर गुरु साहिब ने उस बन्दे को ज़िन्दगी और मौत के बारे में बताया था शायद इसीलिए गुरुद्वारा कबूतरसर के नाम से जाना जाता है. ये एक श्रुत कथा है किन्तु वहीं पास में एक जाट के घर पर चारपाई है. जिसे चार लोग मिल कर नहीं उठा सकते. उसने इस चारपाई को अपने कठोर परिश्रम से बनाया था. गुरु गोविन्द सिंह जी का काफिला जब वहां से निकाला तब उन्होंने उस चारपाई पर विश्राम किया था. वह चारपाई अब भी है और शायद तब तक रहे जब तक कि इंसान के भीतर संवेदनशील श्रम साधक बचा रहे.

मनुष्य की स्वाधीनता और रचनात्मक स्वाभिमान के प्रबल पक्षधर शाईर शेर मोहम्मद खां जिनको हम इब्ने इंशा के नाम से जानते हैं उन्होंने नाजियों के हाथों मारे गए फ़्रांस के क्रांतिकारी गिब्रेलपेरी और बुल्गारियन कम्युनिस्ट दिमित्रोफ़ को अपना गर्व माना है. मेहनतकश अवाम के लिए कही गयी ये खूबसूरत पंक्तियाँ देखिये.

जो मजदूर है उनको मेहनत का हासिल, जो दहकान है उनको खेती दिलाएं,
मरें तो मरें मिस्ले गिब्रेलपेरी, जियें तो जहाँ में दिमित्रोफ़ होकर.

के सी

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Kishore Choudhary is a poet and fiction writer from Barmer (Rajasthan). His writing career took a formal leap from his personal journals to make him a hugely popular blogger on two of his blogs- Kahaniyan and Hathkadh.

Having spent most of his formative years in the desert, the life there is his favourite canvas to contextualise his poetry and stories. His followers from across the world vouch for his realistic and authentic portrayal of the desert life and its typical dilemmas, fused beautifully and almost effortlessly with some stunning images of the desert and its folklore.

Kishore in a way pioneered the incorporation of pre-publishing interactions and feedback with his readers on his blogs and across social media platforms in his final works. His style is known for its lucid and unexampled metaphors that he exquisitely uses to express universal feelings like love, loneliness, hope, pain, longing and fantasy. 

His first collection of stories Chaurahe Par Seedhiyan (2012)was such a thumping bestseller that the first issue was sold out within 50 days of its launch.All the stories skilfully bring the rich and exotic background of the desert come alive and make the reader delve deeper into the layers of human emotions.This much sought after collection raised the bar for all contemporary Hindi works of short fiction and brought in a fresh change in the existing status quo for Hindi short stories. 

The second collection titled Dhoop Ke Aaiyne Mein(2013)had an array of short stories that looked at life through a multi-dimensional prism, lending each one of them a distinctive charm. Kishore being a poet first, his stories are more like poetic fiction. Having a great affinity to the stream of consciousness novels by English literary greats like James Joyce and Virginia Woolf his stories defy the conventional rules of a definitive beginning, middle and end. 

Kishore’s first publication was a collection of poetry Baatein Bewajah, an alluring and bewitching series of short poems which capture the vast expanse of human emotions and have images that have a rare haunting quality.

Kishore is a Radio Broadcaster by profession and has a special fondness for classical & folk music. Articles about him and his interviews are available across many major newspapers and websites. Kishore certainly is the Avant-garde flavour in contemporary Hindi writing and his ever expanding avid readership eagerly waits for his next chartbuster.

Kishore's latest is another collection called "Jaadu Bhari Ladki". This collection has his same imitable style of stories but the contexts and places are beyond the desert as well. 
His deep understanding of the complexity of modern relationships and how they play out in our minds, homes and workplaces makes it a very unique almost post-modern work in Hindi Fiction.

http://www.goodreads.com/author/show/7361739.Kishore_Chaudhary

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हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने या खूबसूरत स्त्री को इरादतन चूमने जितना ही अवैध है.

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