March 28, 2016

एक स्थगित क्षण

वो जो अनजाने दफअतन हमारे जीवन में घट जाता है. वह जिसके पहले कुछ सोचा न था. वह जिसके बाद का सोचना अभी बाकी हो.

उसका मन गुंजलक था.

वह दरवाज़ा खोलकर सीढियाँ नहीं उतरी. उसे इस बात का सब्र नहीं था कि मुख्य दरवाज़े के सामने बनी दुछ्ती से बाएं मुड़े और फिर रेलिया कि हेजिंग के पास से होती हुई चले. वह सदाबहार के फूलों के बराबर बने कच्चे रास्ते से जाये. उसे याद था कि रास्ता गीला है. पिछवाड़े में बने छोटे से कृत्रिम तालाब से बहकर पानी, काली मिट्टी के छोटे ढेर तक जा रहा था. वहीँ खरपतवार के बीच कुछ बैंगनी रंग के जंगली फूल उगे हुए थे.

वह खिड़की से कूद गयी.

चार हाथ ऊँची खिड़की में ग्रिल नहीं थी. बस दो पल्ले भर थे. पिछले कुछ दिनों से वह इस खिड़की में घंटो पालथी मार कर बैठी रहा करती थी. वह वहीँ से कूदी. बे आवाज़ चलते हुए छोटे तालाब तक आई और गीली मिट्टी से सने पैरों को पानी में डालकर बैठ गयी. मुड़कर देखे बिना आहटों की टोह लेती रही. क्या कोई इस तरफ आ रहा है. क्या आस-पास कोई आवाज़ है. क्या किसी ने देखा है?

उसने धप से अपनी दोनों आँखें ढक लीं. एक लम्हा सामने खड़ा हुआ था. जैसे कोई मुकदमे का पहला पन्ना. अकेला, कमजोर, हवा के साथ हिलता हुआ मगर खौफ से भरा हुआ. बंद आँखों तक कोई आहट नहीं आई. कोई आवाज़ भी नहीं. उसने आहिस्ता से अपने हाथ हटाये. नन्हे छोटे तालाब में स्थिर पड़े हुए पाँव थोड़े बेढब दिख रह थे. ज़रा सी हलचल से पानी हिलने लगता तो पांवों की शक्ल बदलने लगती. जैसे मोम के बने हुए पाँव हैं. पानी ज्यादा हिलता तो लगता कि पाँव मोम के नहीं कपडे के बने हुए हैं. वे पानी के साथ लहरा रहे हैं.

एक सिहरन हुई. उसे माँ की आवाज़ सुनाई दी- “कलमुही इस तरह खाली बरामदों में बिल्ली की तरह अकेली कहाँ फिर रही है. सत्यानाश होगा.” उसने अपनी पीठ पर झर रही झुरझुरी को महसूस किया. जैसे कई सारे आवाज़ के फाहे पीठ पर आ गिरे थे. वे फाहे बूँदें बनकर पीठ से फिसल रहे थे.

माँ नहीं है यहा पर. वह बहुत बरस दूर छूट गयी. बीस-इक्कीस की उम्र के आस-पास माँ की आँखों से चौकसी जाती रही. तन्हाई में बैठे रहने और अकेले घर के सूने कोनों में घूमने पर उठने वाले तानों-सलाहों-चेतावनियों के चक्रवात थम गए. माँ बराबर बैठ कर ऐसे देखने-सुनने लगी जैसे रिश्ता उलट गया हो. माँ उसकी बेटी हो गयी थी और वह माँ. फिर माँ उसकी तरफ इस उम्मीद से देखती थी जैसे वह सलीके से कोई कायदे की बात कहने वाली है.

आज सुबह, उस वक़्त शायद पौने चार बजे थे. ये सोचकर उसे अच्छा लगा. अगर तीन बजे के आसपास का समय होता तो बुरा लगता. चार बजे किसी का जागना उतना बुरा नहीं है. चार बजे अँधेरा उतना ही था, जितना रात बारह बजे रहा होगा. मगर मन ने भोर की आस बाँध ली थी तो वही स्याही ज़रा कम गहरी लगने लगी थी. इसी सोच में जैसे ही उसे ख़याल आया कि रात ढाई बजे उसने अपने कमरे की कुण्डी खोल दी थी.

भीतर से बंद दरवाज़ा उढ़का हुआ भर था.

हलकी चादर ओढ़े, सीधे लेटे हुए शरीर में एक ही जगह बची थी, जो ज़िन्दा थी. उसका दिल. वह रह-रह कर इस तरह धड़क रहा था कि जैसे अभी सारे संतुलन बिगड़ जायेंगे, एक तूफ़ान सा उठेगा और सबकुछ ढह जायेगा. वह ऐसे बहुत देर तक न सो पाई थी. उसका दिल ही उसको डरा रहा था. बेकाबू धड़कन से अधिक भयभीत करने वाली कोई चीज़ उसे याद नहीं आ रही थी. वह अपने बिस्तर से उठी. उसे लगा कि ऐसे उठना अच्छा नहीं है. उसे बिना कोई हरकत किये चुप लेटे रहना चाहिये. फिर भी वह आहिस्ता से दरवाज़े के पास दीवार का सहारा लेकर खड़ी हो गयी थी. दिल पर हाथ रखने से धड़कन काबू में नहीं आनी थी. उसे इस बात का यकीन था इसलिए उसने अपनी पीठ को पूरी तरह दीवार से सटा लिया. अगर संभव होता तो वह दीवार के भीतर प्रवेश कर जाती.

दरवाज़े के कब्जों से चरमराने की हलकी सी आवाज़ आई. उसकी आँखे अँधेरे में किसी चौंक से भर कर खुली रह गयी.

दरवाज़े से होकर भीतर आती बेहद हलकी सी पांवों को चाप. कालीन के मुलायम रेशों से रगड़ खाते हुए पाँव. एक. दो. तीन. उसी पलंग की ओर मुंह किये खड़ा हुआ एक साया. चुप. जैसे इंतजार में हो कि बिस्तर से कोई आवाज़ आएगी. एक लरज़िश से भरा हाथ चादर से बाहर आएगा. रेगिस्तान के सूने मार्ग पर दूर किसी साए के बुलावे की तरह बुलाएगा. मेरा करीब आओ. इस अँधेरे में ये सब कुछ न दिखेगा मगर दिखेगा. शरीर का हर अंग देखने सुनने लगेगा. बिना किसी छुअन और बिना किसी भाषा के हर तरह के संबोधन, उत्तर और प्रतिउत्तर में बीतता हुआ, सुबह का ठहरा वक़्त.

“रेहा...”

दीवार का सहारा कमजोर हो गया. एक आवाज़ जो सरगोशी थी. एक आवाज़, जो उस खाली पड़े बिस्तर को संबोधित थी. एक आवाज़, जिसने उसके दिल की बेकाबू धड़कनों को रोक दिया. सबकुछ ठहर गया. उत्तेजना, मद, सिहरन, भय, इंतज़ार सबकुछ ठहर गया.

एक स्थगित जीवन का क्षण जहाँ भूत और भविष्य अलोप हो चुके हों.

[दो प्याले स्ट्रोबेरी फ्लेवर वाली आइसक्रीम - एक]

Image courtesy : Rudolf Rinner 

March 27, 2016

उन हथेलियों में कई सारे रास्ते हैं

सुरिन ने जतिन को कहा कि मैं कुछ लेकर आती हूँ. वह तेज़ी से उठी और बिल काउंटर तक चली गयी. बिल काउंटर पर बैठे लड़के से सुरिन ने पूछा- “यहाँ फ्लेट वाइट के अलावा कोई दूसरा फ्लेवर है ?” काउन्टर के अंदर की तरफ खड़े लड़के ने अपनी पीठ की ओर संकेत किया. वहां एक लम्बी सूची थी.

“कैफ़े लात्ते...”
“तुम्हें कैसे मालूम?”
“जाने दो. मैं तुम्हें एक बात याद दिलाता हूँ शायद तुम भूल गयी हो.”

सुरिन अचरज से देखने लगी. उसने अपने होठों पर लम्बी मुस्कान रखी. वे दोनों जीवन की अबूझ बातें करते हुए थक गए थे. उनके पास यही रास्ता था कि वे कोई ख़ुशी की बात करें. अक्सर ख़ुशी को लालच देना होता है. जैसे आप बड़ी मछली को फांसने के लिए छोटी मछली को चारे की तरह कांटे में फंसाते हैं न वैसे ही बड़ी हंसी तक पहुँचने के लिए एक छोटी मुस्कान खुद बनानी पड़ती है. फिर ये छोटी मुस्कान बड़ी मुस्कान को खींच लाती है. इसलिए सुरिन ने अपने चेहरे पर एक लम्बी मुस्कान रखी. “हाँ बताओ वो बात जो शायद मैं भूल गयी हूँ”

“वो बी ब्लॉक वाला शोपिंग काम्प्लेक्स याद है?”
“जहाँ हम पहली बार मिले थे”
“अच्छा तुम्हें तो खूब याद है सब. मैंने समझा तुम भूल गयी हो. तो सुरिन तुम्हें ये भी याद होगा कि वहां एक नन्हा गुलमोहर था.”

सुरिन का फोन बजने लगा. उसने फोन उठाया और स्क्रीन देखने लगी. उसने फोन पर बात नहीं की. फोन को थैले में रखा और जतिन से कहा.- “अब चलना होगा.”

“पांच मिनट और रुको”
“फिर क्या हुआ ये बताती जाओ”
“एक दिन वो चक्कर खाकर गिर पडा. हम उसे अस्पताल लेकर गए. वहां पहुँचते ही वह काफी नार्मल हो गया. लेकिन ये सिलसिला बढ़ता ही गया. वह लगातार कमजोर होता गया. आखिरकार बोन मेरो ट्रांसप्लांट हुआ. और एक रोज़ डॉक्टर्स ने कहा कि आप इनको घर ले जाइए. अब हम एक बंद कमरे में रहते हैं. वह काफी अच्छा है. अपना काम खुद कर लेता है.”

ये सुनकर जतिन बहुत उदास हो गया.

सुरिन ने कहा- “मालूम है वह पिछले एक साल से मुझे कह रहा था कि तुम बाहर जाया करो. हमेशा मेरे पास बैठी हुई बोर नहीं हो जाती हो. मैं उसे कहती- तुम पागल हो क्या. मुझे यहीं अच्छा लगता है. फिर कुछ रोज़ पहले उसने कहा कि मुझे गिल्ट होने लगा है. तुम बाहर नहीं जाती हो तो मुझे लगता है कि मैंने तुम्हें क़ैद कर लिया है. मुझे सचमुच अच्छा नहीं लगता. मैंने कहा जाती तो हूँ. इतना सारा सामन ले आती हूँ. वह बोला कि ऐसे नहीं तुम सिर्फ अपने खुद के लिए बाहर जाओ. तुमको लगे कि तुम्ह सिर्फ इस घर में क़ैद रहने के लिए नहीं हो.”

एक और मुस्कान होठों पर रखकर सुरिन ने कहा- “मुझे कभी समझ नहीं आता कि क्या करूँ. मुझे उदासी नहीं है. मेरे पास तन्हाई नहीं है. मेरे पास एक दुबले से आदमी के दो हाथ हैं जिनको मैं अक्सर चूमती रहती हूँ. उन हथेलियों में कई सारे रास्ते बन गए हैं. मैं उन रास्तों पर चलती हूँ. कुछ छोटे पहाड़ हैं. कुछ कम गहरी खाइयाँ हैं. दो एक सरल रास्ते हैं...” अचानक सुरिन की ऑंखें चमकी और उसने कहा- “तुम्हें मालूम है अगर ये सब न होता तो मैं उसकी हथेलियों को कभी इस तरह न देख पाती”

कांच के पार धूप कम हो गयी थी. लम्बी छायाओं ने सड़क को ढक लिया था. तीन चार बच्चे गेंद और बल्ला लिए आ गए थे. वे पक्का कुछ और दोस्तों का इंतज़ार कर रहे थे. सुरिन ने अपना थैला उठाया. जतिन ने अपना चश्मा लिया. दोनों बाहर निकल पड़े. रेस्तरां से बाहर आते ही जतिन ने कहा- “बी ब्लाक की तरफ से होते हुए चलें.?”

वे चलते हुए काफी दूर आ गए थे. सड़क खाली थी. शोपिंग कोम्प्लेक्स के आगे मोड़ था मगर गुलमोहर नहीं था. जतिन रुक कर उस जगह को देखने लगा जहाँ वे पहली बार मिले थे. कुछ एक पल वहीँ खड़े रहने के बाद उसे सुरिन का खयाल आया. जतिन ने देखा कि सुरिन बिना रुके बहुत दूर जा चुकी थी. बहुत दूर सड़क पर एक सुर्ख रंग का छोटा स्कार्फ था. जो कभी जतिन को दिखता और कभी उसकी निगाह से खो जाता.

[याद, एक अमरबेल है. ]

कहानी खत्म नहीं होती. उसमें कुछ अल्पविराम होते हैं. मैं इस अल्पविराम से आगे किसी और को सोच रहा हूँ.

Picture courtesy : Jyoti Singh 

March 25, 2016

जैसे नंगी पीठ पर फिसलता हो पंख

उस खाली-खाली से पड़े रेस्तरां में क्रिकेट मैच देख रहे लड़के की अलग दुनिया थी. वहीँ पास ही बैठे हुए जतिन और सुरिन की दुनिया अलग थी. लड़का किसी एकांत से उपजे खालीपन में खेल भर रहा था. सुरिन इतनी ज्यादा भरी हुई थी कि कुछ खालीपन जुटाना चाहती थी. जतिन ने खालीपन और भरे होने के भावों को स्थगित कर रखा था. उसके ठीक सामने तीन साल बाद सुरिन थी और वह इन लम्हों को सलीके जीना और स्मृति में बचा लेना चाहता था. जब सुरिन उसके जीवन वृत्त से बाहर कदम रख चुकी थी तब जतिन ये याद करने की कोशिश करता था कि सुरिन के इस वृत्त में होने से क्या था और न होने से क्या नहीं है?

“तुम” सुरिन ने कहा.

“मैं क्या?” जतिन ने पूछा.

“क्या सोच रहे हो?”

“मैं सोच रहा हूँ कि हम जो कुछ करते हैं उसकी कोई पक्की वजह होती है.”

“जैसे?”

“जैसे हम मिलते थे. फिर हम सालों नहीं मिले. जैसे अभी एक दूजे के सामने बैठे हैं और शायद..."

जतिन ने कांच के पार देखा. वो जो बादल चला गया था, उसकी स्मृति भर बची थी. सड़क धूप से भरी थी. दोपहर का रंग वैसा ही था. जैसा बादल के आने से पहले था.

जतिन को इस तरह बाहर देखते हुए देखकर सुरिन ने कहा- “ये पीले पत्थरों से बनी सड़कें कितनी अच्छी लगती है न”

“हाँ बहुत अच्छी”

“क्यों ?”

“पीले पत्थरों से बनी सड़कें इसलिए अच्छी लगती है कि हमने सडकों के बारे में जो सोच रखा है उससे अलग हैं.”

“अगर हमने ये पहले से न सोच रखा होता कि सड़क कोलतार से बनी होती है. वह दूर तक अनगिनत मोड़ों और हादसों से भरी होती हैं. तो क्या ये पीले पत्थर वाली सड़क अच्छी न लगती?”

“हाँ”

“तो अगर हमने जीवन के बारे में पहले से कुछ न सोच रखा होता तो वह भी हमें अच्छा लगता?”

प्रश्न सिर्फ शब्दों में नहीं था. प्रश्न स्वर में था. प्रश्न सुरिन की आँखों में भी था. हर प्रश्न का उत्तर नहीं होता है. कुछ प्रश्नों के उत्तर केवल प्रश्न ही हो सकते हैं. इसलिए जतिन ने प्रतिप्रश्न किया- “तुमने जीवन के बारे में क्या सोच रखा था?”

“मैं उस घर में गयी, जहाँ मुझे उम्र भर होना था. वहां बुजुर्ग नहीं थे. वे आशीर्वाद देने आये थे और देकर लौट गए. उनका तय था कि वे उसी क़स्बे में रहेंगे जहाँ पुश्तैनी घर है. एक बड़े भैया और उनका परिवार था. वह बराबर के मकान में रहता था. उनके वहां आना-जाना और बोलना न बोलना कुछ भी नियमों में नहीं बांधा हुआ था. मन हो तो आओ, न हो न आओ. अकेले नहीं रहना तो जब तक चाहो दोनों उसी घर में रह लो. क्या पहनना-ओढना है सब अपने मन का चुनो. कब सोना-जागना है, तुम स्वयं समझदार हो.”

“ये कितना आदर्श भरा घर है न?”

“हाँ.”

“फिर...”

“क्या तुमने कभी फूल को डाली से टूटकर गिरते देखा है?”

“हाँ”

“क्या कभी पत्ते झड़ते हुए देखे हैं?”

“हाँ”

“बस ऐसा ही है.”

“माने?”

“जहाँ प्रसन्नता पर प्रसन्नता न हो और दुःख पर दुःख... ऐसा साधा हुआ जीवन.”

“लोग यही चाहते हैं”

“बुद्धिहीन हैं लोग.” एक चटकता हुआ रूखापन जाने कहाँ से सुरिन के स्वर में घुलकर गिरा. “वे ऐसा चाहते हैं तो मगर ऐसा बरतने का धैर्य, साहस और श्रम कब सीखे हैं?”

सुरिन ने जतिन को छुआ. जैसे बरसात की पहली बूँद अचानक ललाट पर गिरती हो. जैसे नंगी पीठ पर पंख फिसलता हो. जैसे पानी में रखे पैर के तलवे को कोई गुदगुदा दे. जतिन की अंगुलियाँ सुरिन की अँगुलियों से बाहर आ रही थी. जतिन की हथेलियाँ भीग चुकी थीं. वह जिस अनुभूति से भर गया था, उसका कोई उपचार नहीं था.

उसने कांपते स्वर में अधूरा प्रश्न किया- “क्या तुम...?”

सुरिन ने अधूरे प्रश्न को बिना समझे कहा- “नहीं”

[हर टूटती पत्ती के पीछे एक कोंपल खिल रही होती है, एक दुःख के पीछे...]

Picture courtesy : Jyoti Singh 

March 24, 2016

किसी ख़राब साधू का दिया हुआ शाप

उस दिन जब वे दोनों एक नयी जगह पर बैठे हुए दूसरी बार कॉफ़ी पी रहे थे तभी सुरिन ने पूछा- “मैं जब भी बुलाऊं तब क्या तुम हर बार इस तरह कॉफ़ी पीने आ सकोगे?” 

जतिन ने कहा- “हाँ अगर मैं कहीं नौकर न हो गया तो...” 
“तो क्या अब जिस तरह हम मिलते हैं वैसे हमेशा मिलना नहीं होगा?”
“नहीं होगा”
“क्यों नहीं होगा?” 
“इसलिए कि हमारे पास हमेशा मिलने की इच्छा से भरा ये आज का मन नहीं बचेगा” 

सुरिन को उस दिन इस बात पर यकीन नहीं हुआ था. मगर आज वह सचमुच तीन साल बाद जतिन के साथ बैठकर कॉफ़ी पी रही थी. कैसे न? सबकुछ बदल जाता है. इस पल लगता है कि जीवन स्थिरता से भरा है. मन जो चाहता है वही हो रहा है. हम कल फिर से इसी तरह मिलने की अकाट्य आशा कर सकते हैं. और अचानक.... 

जतिन कुछ खाने को लेकर आया. इस बार वह चुनने को नहीं कह सकता था. उसने कहा- “फिर आगे क्या हुआ?”

“हम मिले थे. कई-कई बार मिले. शादी का दिन बहुत दूर था. वह फोन करता था. आ जाओ कहीं घूमने चलते हैं. मैं जाने क्यों डरती ही न थी. किस तरह ये विश्वास मेरे भीतर आया कि वह मुझे ऐसी किसी जगह न ले जायेगा जहाँ कुछ गलत हो. वह सचमुच कभी न ले गया. बस वह अपने स्कूटर पर अगली सीट पर होता और मैं पीछे. हम शहर भर का लम्बा चक्कर लगाते हुए बातें करते थे. वह बीच-बीच में पूछता था. कुल्फी वाला आ रहा है. चाट वाला आया. चाय की दूकान है. मैं कहती- मुझे कुछ नहीं खाना. फिर भी वह कहीं न कहीं रुकता और कुछ खिला देता था. बस फिर घर पर ड्राप करता और कहता फिर मिलते हैं” सुरिन के चेहरे पर शांति थी. 

“प्यार नहीं करता था?” 
“करता था.”
“अच्छा... कैसे?”

“एक बार मैंने अपना पर्स स्कूटर की डिक्की में रख दिया था. फिर उसे लेना भूल गयी. कई बार सोचा मम्मा के फोन से उसके फोन पर फोन करूँ और कहूँ कि मेरा फोन रहा गया है. मैं नहीं कर सकी. लेकिन रात नौ बजे डोरबेल बजी. वह खड़ा था. मालूम है क्या बोला?”
“क्या?” 
“तेरे से तो ये फोन ही अच्छा है, जो मेरे पास रहना चाहता है.”

जतिन ने देखा कि सुरिन के होठों के पास ज़रा सा केचअप लगा रह गया है. उसने सोचा कि क्या वह अपनी अंगुली से इसे मिटा दे. उसे सचमुच समझ न आया कि क्या करे. उसने कहा- “ऐसे अच्छे आदमी से मैं कभी मिलूँगा” 

“अच्छे आदमियों से कभी न मिलना, वहां बहुत ऊब होती है”

बहुत देर से मैच देख रहे सर्विस बॉय के मुंह से निकला- “यस, यस... यस” टीवी के स्क्रीन पर स्लो मोशन में एक गेंद विकेट को छूकर जा रही थी और गिल्ली हवा में कलाबाजी खाती हुई आहिस्ता से ज़मीन की ओर जा रही थी. 

[जीवन किसी ख़राब साधू का दिया हुआ शाप है जो कभी फलता नहीं मगर हमेशा डराता रहता है]

सुरिन तुम्हें याद है? वहां एक नन्हा गुमोहर था- चार

Image courtesy : Jyoti Singh

March 23, 2016

कोई ऐसी जगह मालूम है?

एक बार उसने सुरिन से कहा था- “हम कॉफ़ी पीने के लिए आते हैं या कोई और वजह है?” सवाल सुनकर सुरिन के बंद होठों पर हंसी ठहर गयी थी. सुरिन ने कहा- “पगले ये उबला हुआ पानी पीने कौन आता है? ये कॉफ़ी तो बहाना है. असल में तुम्हारे साथ बैठने में मजा आता है. मैं बहुत सी बातें भूल जाती हूँ. जब तक हम साथ होते हैं मन जाने क्यों सब सवालों को एक तरफ रख देता है.” 

ये सुनकर जतिन ने पीठ से कुर्सी की टेक ले ली थी. उसे ऐसे देखकर सुरिन मुस्कुराई थी. जतिन ने पूछा- “अब किस बात की मुस्कान है?” सुरिन ने टेबल पर रखे सेल फोन को गोल घुमाते हुए कहा- “कभी बताउंगी तुमको” जतिन टेक छोड़कर सीधा हो गया- “अभी बताओ” सुरिन फिर से मुस्कुराई. जतिन ने फिर से कहा- “प्लीज अभी बताओ” सुरिन ने उसे कुछ न बताया- “तुम अभी ये समझने के लायक ही नहीं हो” 

जतिन ने उसकी अँगुलियों के बीच गोल घूम रहे फोन को उठा लिया. “अब ये नहीं मिलेगा. जब तक नहीं बताओगी, मैं दूंगा ही नहीं.” 

“है क्या तुमको... गधे कहीं के” सुरिन ने लगभग झल्लाते हुए उसके पास से फोन छीन लेना चाहा. जतिन ने कुछ देर हाथ पीछे किये रखे मगर उसे लगा कि सुरिन लगभग रोने जैसी होने वाली है. “ये क्या? तुम मजाक करो तो कुछ नहीं. मैं करूँ तो पल में रुआंसा.” 

सुरिन चुप बैठी रही. वह कुछ न बोली. जतिन ने फिर से कहा- “अरे ऐसे ही लिया था, सचमुच का ले थोड़े ही जाता.”

जतिन ने कई बार कहा और फिर वह चुप हो गया. सुरिन उदास बैठी रही. उसने सामने रखे फोन को नहीं छुआ. 

भरी गरमी के मौसम में बाहर सडक पर कोई छाँव का टुकड़ा आया. कोई राह भूला हुआ बादल हवा की मद्धम लय के इस तरह बह रहा था जैसे रुका हुआ हो. वे दोनों बाहर उसी छाँव को देख रहे थे. छाँव धीरे-धीरे उनसे दूर जा रही थी. 

“चलते हैं” ऐसा कहते हुए सुरिन ने अपने थैले में पानी की बोतल रखी. फोन को अगली जेब में रखा. छोटा वाला पर्स बाहर निकाल कर हाथ में ले लिए. सुरिन बिना इंतजार किये रवाना हो गयी. जतिन उसके पीछे था. वे बाहर जाने के पतले से, नीम अँधेरे वाले रास्ते में फोम पर बिछे हुए कारपेट पर चल रहे थे. ऐसा लगता था जैसे कोई रुई के फाहों से बना रास्ता है. छोटे दरवाज़े तक आते ही सुरिन रुकी. उसने पीछे देखा. जतिन उसके पास ही खड़ा था. वह जतिन को देखने लगी और जतिन चुप खड़ा रहा. कुछ पल देखने के बाद सुरिन मुड़ी और चल पड़ी. 

वे सड़क तक आये. जतिन ने कुछ न बोला. सुरिन ने एक ऑटो वाले को रुकवाया. उसने पूछा कहाँ जाना है. सुरिन ने जतिन को कहा- “अब बताओ इसको कहाँ जाना है?” जतिन ने कहा- “मुझे क्या मालूम. बिना बताये तुम उठकर आई हो.” 

“कोई ऐसी जगह मालूम है जहाँ अच्छी कॉफ़ी मिलती हो?” 

“हाँ” 

वे दोनों ऑटो में बैठे हुए थे. सुरिन ने कहा- “एक बार मम्मा ने पापा से कहा कि आज शाम को बाहर चलते हैं. पापा ने बिना किसी भाव के कहा- हाँ चलो. हम तीनों बाहर गए. अजीब सा हाल था. न मम्मा ने पापा से कुछ कहा, न उन्होंने कुछ पूछा. हम जहाँ गए थे, वहां बड़ा सुन्दर माहौल था. बहुत से लोग थे. आपस में हंसते हुए, एक दूजे से सटकर खड़े कुछ खाते पीते हुए. हमने भी वहीँ कुछ खाया. मम्मा जो खुद अपने मन से बाहर जाना चाहती थी, वह खुश नहीं दिखी. मुझे इतना दुःख हुआ कि मैं सोचती रही कि काश मैं साथ न आती. पापा नार्मल थे. हम लोग घर लौट आये. मैं अपने कमरे में चली गयी. मैं बहुत देर तक सोचती रही. काश पापा ने थोड़ा गर्मजोशी से कहा होता- हाँ बाहर चलते हैं.” 

[ठंडी हवा जब लोहे को छूकर गुजरती है तब वह भी शीतल हो जाता है. आदमी मगर ये बात नहीं समझता.]

सुरिन तुम्हें याद है? वहां एक नन्हा गुलमोहर था – तीन 

Image courtesy : apkconcepts

March 22, 2016

चीज़ें बदल चुकी होती हैं

सुरिन टेबल की तरफ नज़र किये चुप बैठी थी. जतिन उठकर कुछ लेने गया. सुरिन ने जब नज़र उठाई जतिन उसके सामने बैठा था. जतिन ने दोनों प्यालों की ओर देखते हुए सुरिन से पूछा- “बोलो कौनसा?”

सुरिन ने दोनों प्यालों को नहीं देखा. वह जतिन की आँखों में देखते हुए हलके से मुस्कुराई. जतिन ने कहा- “चुन लो, फिर कहोगी तुम्हारे कारण पीना पड़ा.”

“दोनों में क्या है?”

“कॉफ़ी”

“इसमें कौनसी”

“फ्लेट वाइट”

“और इसमें”

“फ्लेट वाइट”

अचानक से सुरिन की आँखों से मुस्कराहट खो गयी- “क्या तुम कभी थोड़े से बड़े हो जाओगे? मुझे तुम्हारी कुछ चीज़ें जो अच्छी लगती थी, अब उनका न बदलना अच्छा नहीं लगता.”

जतिन ने पूछा- “त्तुम्हारा हाथ छू लूँ?”

सुरिन की आँखें से खोई मुस्कान से बनी खाली जगह को भरने के लिए दो बूंदें चली आई. “मुझे मालूम है. मेरे हाँ कहने पर तुम कहोगे कि छूना थोड़े ही था, पूछना था”

गरम रुत थी. हवा बुहारने के काम पर लगी थी. बड़े शीशे के पार कुछ एक कागज़ के टुकड़े उड़ते जा रहे थे. कबूतरों ने आकाश के सूनेपन को बिखेरने के लिए फिर से एक फेरा दिया. वे लयबद्ध कलाबाज़ी खाते हुए खिड़कियों, छज्जों, मुंडेरों और तारों पर बैठ गए.

“वो पहली बार इस तरह घर आया जैसे वहां पहले बहुत बार आ चुका हो. वह सोफे पर इस तरह बैठा जैसे हमेशा से वहीँ बैठता रहा हो. मेरे घर वाले बहुत कुछ औपचारिक सी तैयारी करके बैठे थे. चाय की पूछताछ हुई तो वह खड़ा होकर रसोई कहाँ है पूछता हुआ मम्मा के पीछे चल दिया. मम्मा हैरत से देख रही थी. वह अचानक मुस्कुराई और कहा आइये. मम्मा आगे और वह पीछे. उसने कहा अदरक कहाँ रखी है. जवाब मिलने से पहले ही फ्रीज़ खोलकर अदरक निकाल चुका था और उसे कूटने के लिए कुछ खोजने लगा.” सुरिन की आँखों में एक चेहरा था. वह उसी को देखते हुए जतिन को कह रही थी.

जतिन ने कहा- “हाँ आज भी अगर तुम हां कहती तो भी मैं तुम्हारे हाथ नहीं छूता... वैसे वो कैसे छूता है?”

"शटअप"

"क्या?"

“कुछ नहीं... मालूम है सब चौंक गए थे. चाय पीने के ठीक बाद उसने कहा- अब चलते हैं. उसके साथ उसके भाई और भाभी थे. वे अचकचाए किन्तु वह खड़ा हो गया था. मेरे पापा कुछ न बोले. मम्मा बोली थी- खाना खाकर जाइए. वह हँसते हुए कहने लगा- मेरी खाना बनाने की इच्छा नहीं है.” अपनी बात को बीच में रोक कर सुरिन ने प्याले की ओर देखते हुए कहा- “चीनी तुम डालोगे या मैं डालूं?”

जतिन ने कहा- “चख लो”

कॉफी मीठी थी. सुरिन से जतिन ने कहा- “तुमको कैसा लगा था?”

“मुझे अजीब लगा था. अव्वल तो ये ही अजीब है कि कोई किसी लड़की को देखने आये. फिर ये सब तमाशा करना. मगर जब हम सब बाहर आये न तब उसने मुझे कहा- एक मिनट इधर आना तो... मैंने देखा कि मम्मी और पापा उसके भैया भाभी के सामने देखने लगे थे. उन्होंने मुझसे नज़रें फेर ली थी. मैं उसकी तरफ गयी. उसने कहा- सॉरी, ये सब मुझे अच्छा नहीं लगता. मैंने पहले ही हाँ कर दी थी. मगर घरवाले माने ही नहीं. कहते रहे जाओ देखकर आओ. फिर मैंने सोचा देखने के बहाने तुमसे पूछ लूँगा कि क्या मैं तुमको पसंद हूँ.”

जतिन ने कहा- “वो बेहद अच्छा आदमी है”

सुरिन ने जतिन के होठ पर लगे कॉफ़ी के छोटे से झाग को अपनी अंगुली से मिटाते हुए कहा-“हाँ वो बेहद अच्छा आदमी है”

[मुस्कुराते हुए होठ कई बार एक ठहरी हुई छवि भी हो सकते हैं, अक्सर समय बह चुका होता है और चीज़ें बदल चुकी होती हैं]

सुरिन भाग दो 

March 21, 2016

सुरिन तुम्हें याद है, वहां एक नन्हा गुलमोहर था - एक

तुम कब से बैठी हो? 

चालीस मिनट से. 

सब मेज खाली पड़ी हुई थी. बिना खिड़की वाली इकलौती साबुत दीवार के बीच टंगे टीवी पर क्रिकेट मैच का प्रसारण था. उसे देखने वाला कोई नहीं था. दुनिया के किसी कोने में खिलाड़ी अपने खेल में मग्न थे. एक उड़ती निग़ाह उस तरफ डाल लेने के बाद जतिन ने सामने की कुर्सी को थोड़ा पीछे खींचा. मेज पर कोहनियाँ टिका कर बैठ गया. 

चालीस मिनट? 

"हाँ" कहते हुए सुरिन ने जतिन की आँखों में देखा. आँखों में झाँक से नीचे उतरते हुए सुरिन ने देखा कि जतिन की आँखों के नीचे हलकी स्याही थी. स्याही के नीचे गालों पर कुछ बेहद छोटी लाल फुंसियाँ निकली हुई थी. बाल लम्बे थे और कलमें बेतरतीब थी. 

वह उसे देख रही थी तभी उसका ध्यान टूटा. जतिन कह रहा था- तुम्हारे ब्रेसलेट के सुरमई पत्थर अच्छे हैं. तुम्हें सलेटी रंग पसंद है न ? हाँ मगर हल्का. 

काउंटर पर एक लड़का बैठा हुआ था. बाकी कोई दिख नहीं रहा था. प्रीपेड था सबकुछ. वे वहां आराम से बैठ सकते थे. जब तक कि बहुत से लोग न आ जाएँ और मेजें खाली न बचें. काउंटर वाला लड़का क्रिकेट मैच से अनजान ऊँचे स्टूल पर दीवार का सहारा लिए बैठा था. जतिन और सुरिन ने एक आध बार उसकी तरफ निग़ाह डाली और फिर वे लम्बे शीशे के बाहर पसरी हुई दुपहरी को देखने लगे. 

"ये चुभता है" 

सुरिन ने कहा. क्या? 

समय. 

जतिन का मन अचानक किसी छोटे बच्चे की तरह एक सीढ़ी से गिर पड़ा.- "क्या हुआ है?" 

"कुछ नहीं.." 

"क्या कुछ नहीं?" 

उस शहर में बेहिसाब कबूतर थे मगर सब रोशनदानों और छज्जों पर चुप बैठे थे. 

जतिन ने फिर से कहा- "बताओ !!" 

सुरिन ने जाने किस से मुंह फेर रखा था जतिन से या अपने आप से मगर उसके मुंह से एक शब्द निकला- "ज़िन्दगी." 

बाहर सड़क पर पड़े कागज़ के खाली कप को हवा उड़ाकर अपने साथ ले गयी. 

[हवा के झोंके से उड़ा पत्ता जाने कहाँ गिरे, तुम हैरत करना दुःख न करना ]

March 18, 2016

सामने खड़ी पीछे छूटी हुई चीज़ें

तुम दो बरस का मतलब जानते हो?

कल की दोपहर मुझसे यही पूछती रही. रेगिस्तान की हवा खिड़कियों के रास्ते धूल लिए चली आ रही थी. हवा की आवाज़ में सिहरन थी मगर मन इस सांय-सांय से बेखबर अपने दूजे ख़यालों में डूबा रहा. एक सूखा पत्ता सोने के कमरे में पलंग के पांवों तक चला आया. साफ़ आँगन में बारीक धूल की परत पर पड़ा हुआ सूखा पत्ता. जब मौसम शबाब पर होता है तब दीवारों के पार तक आता है. पतझड़ भी आँगन, बरामदे के रास्ते होता हुआ कहाँ तक न पहुंचा. एक बार मन हुआ कि इस पत्ते को उठा लूँ. लेकिन फिर टूटी हुई चीज़ों को सहेजने की तकलीफ के दिन याद आये. मैंने जो हाथ उस पते की तरफ बढाया न था, उस हाथ को वापस खींच लिया.

पल, घडी, दिन, रात और बरस.

तुम देख रहे थे. तुम पढ़ रहे थे. तुम समझ रहे थे. क्यों फिर इस तरह आँख मूंदे रहे. क्यों तुमने चुना कि आँखों में धोखे का सम्मोहन भरो और बने रहो.

एक धुंधलाती हुई शाम है. एक सुल्फी है. माने चिलम है. एक तम्बाकू की पोटली है. जले हुए तम्बाकू की गंध से भरा पैरहन है. एक ऊंट है. और एक वीराना है. उसने पूछा- "ये कैसी गंध है?" मैं अपने बाजू को उठाता हुआ सूँघता हूँ. वहां सिर्फ पसीने और बीते सफ़र की गर्द की गंध है. मैं बहुत दूर चला आया हूँ. पीछे की ओर देखता हूँ. एक ठिकाना याद आता है. कोई कह रहा था- "तुम बिन न जीया जायेगा" मैं अपना थैला उठाकर, उसका लम्बा पट्टा गले में पहन लेता हूँ. मेरी कमर के दायीं तरफ भूरे रंग का थैला लटका रहता है. आखिरी बार लगातार कुछ एक पल उसकी तरफ सख्त निगाह से देखता हूँ. एक भीगी उदास आवाज़ आती है- "मैंने किया कुछ न था. वो बस यूं ही मिला करता था"

दो पट्टियों वाले सेंडल में पाँव रखता हूँ. मेरे लम्बे पांवों पर हल्का सा पानी बचा हुआ है. मैं जब भी नहाकर आता हूँ, तोलिये से पाँव नहीं पोंछ पाता. वे भीगे ही रहते हैं. तलवे अक्सर भीगे हुए सेंडल या जूतों को पहन लेते हैं. सीलापन तलवों से आँखों तक. सेंडल की पट्टी को कसते हुए आखिरी बार उसकी तरफ देखता हूँ. उसकी आँखों में एक अफ़सोस दीखता है. अपने किये का नहीं, मेरे वहां से जाने का.

तीन बार सीढियों पर मुड़ते हुए एक खुली सड़क आ जाती है. मेरे पास सिर्फ एक थैला है, बाकी सबकुछ मैंने छोड़ दिया. मैं राह चलता हुआ दुकानों के भीतर झांकता हूँ. क्या मुझे कुछ खाना चाहिए? मुझे बहुत दूर तक सफ़र करना है. मैं एक-दो दुकानों के आगे रुकता हूँ मगर नहीं रुकता. मन खाने का नहीं है. दिमाग कहता है- खा लो. पहले मोड़ पर पान की दूकान पर रुकता हूँ.- "क्लासिक" दूकान वाला इशारा करता है. सामने सफ़ेद और सोने के रंग वाली पेकिंग रखी थी. मैंने सोने के रंग वाली पेकिंग की तरफ इशारा किया. बैग की जेब टटोलता हूँ.

लाइटर पीछे छूट गया था. 

एक फ़ाइल में कुछ एक तस्वीरें थी. वे अनायास गिरीं. उसने मेरा थैला खोला और लाइटर लेकर, वे तस्वीरें जला दी.

बस अपने नियत स्टॉप्स पर रूकती रही. जितनी सवारियां चढ़ीं उससे ज्यादा लू चढ़ी. खिड़कियों के कांच ताप गए. ख़यालों में खोये हुए. सड़क के किनारे खड़े दरख्तों के साए में बैठे लड़के लड़कियों को देखते हुए मैं आख़िरकार उस क़स्बे तक आ गया जहाँ नौकरी के लिए रहता था. अपने कमरे तक पहुंचा तो देखा कि जीप बेहद बुरे हाल में है. उसको कहीं से भी छू सकना संभव नहीं है. उसका आर्मी वाला रंग पूरी तरह धूसर हो चुका है. कमरे की कुण्डी खोलकर अन्दर गया तो वही धूसर रंग पसरा हुआ था. एक कोने में पड़े बिस्तर पर गर्द ही गर्द थी. आलों में रखी किताबें, अलगनी से टंगे कपड़े और ऑडियो प्लेयर भी उदास धूल से सने थे. वहां रुकने का मन न था. मैं जिस तरह सफ़र से आया था उसी तरह बाहर निकल गया. सोचा कई बार कि फिर से नहा लूँ. नहीं नहाया कि सुबह ही तो नहाया था. उसके लम्बे चौड़े वाशरूम में कुछ देर ये सोचना कितना कठिन था कि अब कभी न आऊंगा. मन रोया या उदास था मालूम नहीं मगर वहां खड़े होना और ये सब सोचना अच्छा नहीं था.

स्टेरिंग थामे हुए रेगिस्तान  के धोरों, कहीं-कहीं दीखते दरख्तों, गाँवों के बाज़ारों से होकर गुज़रती सडकें देखता रहा. सब कुछ चुप पीछे छूटता जाता था. मन के किसी कोने में एक ही बात बार-बार फिरती. किसलिए? क्यों हमारी गुज़र किसी एक के साथ नहीं हो सकती. पसीना, लू और सूनापन. तीन-एक घंटे बाद हाथ थक जाते हैं. एक्सीलरेटर वाला पाँव अकड़ जाता है. सड़क किनारे के छाँव के पास गाड़ी रोक देता हूँ. कुछ एक बेतरतीब पड़े पत्थरों में भी एक लय थी. शायद कोई पहले भी यहाँ बैठा था. क्या इसी तरह हताशा से भरा हुआ या किसी के इंतजार में? नहीं मालूम. कि वो जो था जा चुका था.

जो जा चुके हों उनका क्या होता है?

कल शाम फिर बेहिसाब अपनी खुद की याद आई. लानतें दी, कोसने भेजे. बहुत साल पहले तुमने तय किया था कि एक ज़िन्दगी में दो साल बहुत बड़े होते हैं. तुम कैसे इनको बर्बाद कर सकते हो. और बाद सालों के तुमने फिर से यही किया है. तुम अंधे हो. तुम बहरे हो. तुम मूर्ख हो.

एक आखिरी ठोकर मारो खुद को कि 

March 17, 2016

वहां जाने और भी क्या रखा हो

मैं जाने क्या खोज रही थी. मुझे याद नहीं था लेकिन मेरी अंगुलियाँ अतीत की राख से भरी थीं.

खिड़की के परदे खुले हुए थे. हवा खिड़की के रास्ते आती और दरवाज़े से होती हुई बरामदे की ओर गुम हो रही थी. खिड़की के पास दीवार में बनी छोटी अलमारी के दोनों पल्ले उढ़के हुए थे. एक कोने के नीचे की तरफ नीली स्याही का धब्बा बना हुआ था.

उस दिन की याद आई जब दवात से स्याही भरते समय अंगुलियाँ सन गयीं थीं. पेन में स्याही इसलिए भरी थी कि लग रहा था, आज बहुत कुछ है लिखने के लिए. लिखने से ही अच्छा लगेगा. हाँ, तो वो एक जगह लिखकर रखा था न. कहाँ, जाने कहाँ रखा उसे. मुझे अच्छा नहीं लगता जब कुछ इस तरह भूल जाती हूँ. मैंने अगर लिखा था तो उसे इस तरह रखने की क्या ज़रूरत थी. कौन मुझसे कहता कि तुमने ऐसा क्यों लिखा है. अगर कोई कह भी देता तो क्या फर्क पड़ता. प्यार और सम्बन्ध जैसी चीज़ें वास्तव में है थोड़े ही. ये सिर्फ गिनाने भर को बचा है. हम ये हैं. हम तुम्हारे वो हैं. अगर ऐसे तुम इतने कुछ मेरे हो तो पढोगे वो पन्ना, जो मैंने एक अजाने को याद करते हुए लिखा. फिर शांत होकर किसी उत्साह में पूछोगे कि और बताओ उसके बारे में.

मैं उठकर अलमारी के पल्ले पर लगी हत्थी पर अगुलियां आहिस्ता से रखती हूँ. ये हत्थियाँ मैंने बहुत बार छूई हैं. इस अलमारी में मैं रहती थी. यानी मेरी किताबें. मेरा थैला. मेरी पसंद की सब चीज़ें. मैं उनको अक्सर सलीके से जमाया करती थी. इस अलमारी में चीज़ों की जगहें तय थी. मैं कई बार इस अलमारी को खोले हुए इसके सामने घंटों बैठी रह जाती थी. फिर किसी की आवाज़ आती. कोई मुझे पुकार रहा होता तब इस अलमारी को आहिस्ता से बंद करती जैसे अपनी किसी सखी को कह रही हूँ कि अब मैं जाती हूँ. फिर आउंगी.

जिस तरह दुखी मन गहरे एकांत से भरा होता है. तनहा होने की तड़प खिली रहती है. उससे लगता है कि मेरी डायरी में भी यही सब दर्ज़ होगा. अब मुझे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता. मैंने तकलीफों को अपना लिया है. उन सालों जब मैं बेहिसाब रोई थी, तब मैंने पाया था कि ये सिर्फ अपने आपको खाली करना है. अगर मैं दुःख को नोच कर फेंक देती तो ये किसी अपने ही हिस्से को बेदर्दी से काटना होता. मुझे ऐसा करना अच्छा नहीं लगा इसलिए मैंने आंसुओं से दुखों को धोकर मिटाया.

मुझे बहुतों ने कहा था अब तुम बड़ी हो गयी हो.

बड़ी होना क्या होता है. मेरा शरीर बदल गया था मगर मुझे बेहद पसंद था. मैं जैसी खुद को देखना चाहती थी, वैसी ही थी.

हाँ बड़ा होना ये हो सकता था कि उन दिनों मैं बेतरतीब चीज़ों के बीच अपने लिए ठीक रास्ता सोचती थी. मगर रातों की तन्हाई में अपनी कमसिन बाँहों के बीच पसरे कुछ न करने के मौसम को चुपचाप जीती रही. शेक्सपीयर, कीट्स, शैली और इलियट को पढ़ती थी. भद्दे, बदतमीज लोगों की गालियों के बीच गुज़रे दिन को याद करती थी. एक सखी से उसकी रिलेशनशिप के किस्से सुनती थी. मुझे उसकी बातें सुनते हुए कुछ अच्छा बुरा नहीं लगता था. बस मैं सुनती थी. उस रिश्ते का हासिल सिफ़र था. वह कहती- "हम दोनों एक दूजे की बाहों में पड़े रहते हैं. हम और कुछ नहीं करते." मैं इस बात को भी चुपचाप सुनती. उसे भी शायद कोई जवाब नहीं चाहिए होता था.

एक रात वह मेरे पास ही रुक गयी थी. आधी रात को हलके सफ़ेद चादर के नीचे से उसकी फुसफुसाहट थी. “तुम मुझे अपनी बाहों ले लो. आओ इस रात कैसे भी आओ” मैं उसको इससे आगे नहीं सुन पाई. मैं कहीं खो गयी थी. कोई भी व्यक्ति क्या दे सकता है. उसे क्या मिलेगा उन बाँहों में? क्या वहां कोई सुख है. क्या वहां इतनी मादकता है कि जब वे एक दूजे के सामने बैठे हों तब भी उनके मन में एक दूजे को बाहों में जकड़े रहें. उस रात वह कब सोई मुझे नहीं पता. सुबह वह दस बजे के बाद उठी. मैं जब वापस कमरे में आई वह शोर्ट और एक बेहद ढीला टी पहने हुए बिस्तर से नीचे पाँव लटकाए हुए बैठी थी. उसने मुझे देखा और भोहें ऊपर की और गाने लगी.

व्हेन आई डू काउंट द क्लॉक देट टेल्स द टाइम 
एंड सी द ब्रेव डे संक इन हिडीएस नाइट 
वेन आई बीहोल्ड द...

नथिंग.. फकसम... ही ही ही . एक अल्हड ताज़ा हंसी से कमरा भर गया.

कुछ चीज़ें ज़िन्दगी से चली जाती हैं. जैसे वे सब रातें ऐसे आती थी जैसे कोई भूली हुई याद. किसी डर के अहसास के बाद का सिहरन भरा खालीपन. किसी ख़्वाब के बिखरे हुए टुकड़े. उन रातों से एक सुकून भी आता था. वे रातें आती नहीं भी उनको लाना होता था दिन और शाम को काट कर.

अपनी राख की तलाशी में मुझे वह कहीं हाथ न लगी.

वह मेरी ज़िन्दगी, जो आस-पास किसी साजिश की तरह टूट कर गिरी. जो किसी दोस्त की तरह आई थी. और जाने क्यों चली गयी जबकि मैं कभी किसी को छोड़कर न गयी. इस दुनिया के कुछ भय हैं, जो हमेशा मुझे उदासीन कर देते हैं. मैं रुख फेर कर बैठ जाती हूँ. मैंने ऐसा ही किया.

मेरी डायरी के हर पन्ने में कुछ न कुछ दर्ज़ था. कहीं-कहीं वह लड़की भी जो मेट्रो के लिए नीचे उतरती सीढियों की ओर मुंह करके खड़ी होती. हाथ में पकडे हुए अदृश्य माइक्रोफोन से, एक अदृश्य बेहिसाब भीड़ को संबोधित करती थी- "दोस्तों जिंदगी सिर्फ वो है. वो माने वो. एक झंडू चीज़, जिसे हम विलक्षण बनाना चाहते हैं. आज आपसे बात करते हुए मुझे कन्फ्यूशियस कही ये बात याद आ रही है. लाइफ इज रिअली सिम्पल, बट वी इंसिस्ट ऑन मेकिंग इट कोम्पलीकेटेड" मेट्रो गाड़ी, स्टेशन पर आती दिखती और वह जल्दी से अदृश्य माइक को फेंक कर बोलती- "चल भाग, अम्मा आ गयी है." हम दोनों दौड़ते हुए सीढियाँ उतर जाते.

मेरी डायरी में गहरी याद और उदासी के पन्ने हैं. किसी पन्ने पर ये भी लिखा है कि मैं तुमसे रुख फेरे दीवार से सहारा लिए बैठी थी. इसलिए कि मुझे तुम्हारा सहारा नहीं मिल सकता था.

[किसी दरख्त से बीज लेकर एक फाहा हवा में उड़ रहा था]



March 9, 2016

मौसमों के बीच फासले थे - अंतिम

“घर चाहे जितना छोटा हो असल में बहुत बड़ा होता है. घर के किसी कोने, दरवाज़े के सामने, खिड़की के पास, छत पर कभी ठीक बीच में, कभी मुंडेरों के आस पास. मन कोई जगह चुन लेता है. हम उसी जगह पर जाकर बैठना, खड़े होना पसंद करते हैं. फिर कभी वह जगह छूट जाती है. एक रोज़ जब फिर से उसी जगह पर जाते हैं तो पाते हैं कि समय वहीँ ठहरा हुआ है. हम उस जगह को इस तरह देखते हैं जैसे अपनी अनुपस्थिति के ब्योरे दे रहे हों.” आदमी की आँखों में झांकते हुए औरत कह रही थी.
“असल में हमारे जीवन के उतने हिस्से हैं, जितनी हमारी पसंद की जगहें हैं. तुम याद करना उस जगह को और फिर वहीँ बैठकर देखना. ऐसा लगेगा कि हम जो कुछ यहाँ छोड़ गए थे, वह फिर से शुरू हो रहा है.”
आदमी ने कहा- “शायद ऐसा होता होगा”
“तम्हें कोई जगह याद है?” 
“हाँ”

हामी भरने के बाद आदमी ने सोचा कि वह कितना बताये. कहाँ से शुरू करे? आदमी ने औरत की ओर देखा. उसके कंधे पर धूप की एक फांक पड़ी थी. ये फांक शायद कंधे से होती हुई कमर के नीचे तक जा रही होगी. वह उठकर देख लेना चाहता था.
वह उठा नहीं. उसने एक बार अपने सर को दायें घुमाया. जितनी दूर देख सकता था, उतनी दूर तक देखा. फिर उसी तरफ देखते हुए ही बोलने लगा. “हम जब मिले थे न, तब हम एक दूजे के लिए इस तरह बेसब्र थे कि एक एक पल किसी एक के बिना काटना मुमकिन न था. फिर जब हम साथ हुए न, हमने खूब प्यार किया. ये आत्मा और शरीर दोनों माध्यमों से था. हम रसोई में चिपके खड़े रहते थे. हम दोपहरों में घंटों नीम अँधेरा किये पड़े रहते थे. इसके बाद हम कभी-कभी साथ हुआ करते थे. फिर हम बातें करते थे मगर किसी और से. हम एक दूजे को कुछ नहीं बोलते थे. मैं उसका पति हूँ, वह मेरी पत्नी है.”
आदमी ने औरत की तरफ मुंह फेरते हुए कहा- “अब बस यही है कि हम एक छत के नीचे रहते हैं”
“तो ऐसा क्यों हुआ? क्या खो गया?”
आदमी ने कहा- “शायद हमें कुछ ऐसा चाहिए होता है जिसकी नवीनता कभी खत्म न हो”
औरत के चहरे पर इस जवाब से संतोष नहीं उपजा- “नवीनता ही चाहना होती तो हम अपने अतीत के कुछ रिश्तों में कभी न अटके रहते.”
“मेरा अतीत कुछ नहीं है. वह रेगिस्तान से गुज़रे मुसाफिरों के सफ़र जैसा है जिनके पांवों के निशाँ आंधियां लाख बार बुहार चुकी हैं. अब वहां एक स्मृति है जो निरंतर क्षीण होती जा रही है” आदमी की आवाज़ ठहरी हुई थी.
आदमी ने अचानक एक सवाल पूछा- “अपनी प्रिय जगहों पर लौटना, उन रिश्तों तक लौटना नहीं है जिनको आप किन्ही कारणों से छोड़ चुके होते हैं?
औरत ने कहा- “मैं वास्तव में किसी भी रिश्ते को छोड़ नहीं पाती हूँ. सब मेरे साथ चलते हैं. मैं जब कभी फिर से किसी पुरानी जगह पर होती हूँ तो उससे जुड़ जाती हूँ. ठीक वहीँ से जहाँ वह छूट गया था”
औरत ने कहा- “मैं पानी लेकर आती हूँ.” वह चाय के मग उठाकर सीढियाँ उतर गयी.
आदमी झूले पर बैठा हुआ सोचने लगा कि जब मैंने इसे बताया कि मैं अपनी पत्नी को घर से जाते हुए देखता हूँ. वह हर समय कहीं किसी से बात कर रही होती है. मेरी ये बात सुनकर इसने नज़रें नीचे कर ली थी. क्या वह मेरी इस बात से सहमति रखती है कि रिलेशन में धोखा सिर्फ ये नहीं होता कि आप क्या करते, चुनते हैं. ये भी धोखा होता है कि आप अपने मन को कई आवरणों से ढक देते हैं.
आदमी की सोच के प्रवाह में औरत की आवाज़ ने दखल दिया. “इधर आओ” 
औरत पानी की बोलत लिए छत पर लौट आई थी. वह सीढियों के पास मुंडेर पर कोहनियाँ रखकर खड़ी हुई थी. नीम के पेड की एक उंची शाख मुंडेर के इस हिस्से पर छाया उकेर रही थी. यहाँ खड़े होने से दूर तक गली दिखती थी. बंद पड़े मकानों के दरवाज़े और छोटी दीवारें एक तस्वीर थे.

आदमी झूले से उठकर औरत के पास आ गया. औरत ने उसे और नजदीक आने को कहा. “यहाँ आओ, इस जगह खड़े होकर गली को देखो” आदमी पास आया. गली जितनी लम्बी और सूनी थी, आदमी और औरत के बीच उसके उल्ट नजदीकी थी. उनके बदन कहीं कहीं से छू रहे थे.
औरत ने कहा- “तुम यहाँ खड़े होकर कितनी देर तक इस गली को देख सकते हो?”
आदमी ने एक बार गली को देखा फिर औरत को देखा फिर गली को देखते हुए बोला- “अगर वह मेरे पास यहाँ खड़ी होती तो मैं इस गली को तब तक देख सकता जब तक वह यहाँ रहती.”
“तुम्हें मालूम है मैं इस गली को यहाँ अकेले खड़े होकर देखती हूँ”
लड़की ने कुरते की बांह को फोल्ड करके एक बटन में टांक रखा था. उसकी कलाई से लेकर जहाँ तक बांह दिखाई पड़ रही थी. एक सफ़ेद गुलाबी आभा थी. उसकी मुट्ठी बंद थी मगर तर्जनी में पहनी अंगूठी का पीला पत्थर चमक रहा था. आदमी ने उसकी बांह पर अपनी तर्जनी से छुआ. जैसे वह एक लम्बी लकीर खींच रहा हो. वह अपनी अंगुली को उसकी अंगूठी तक ले गया.
“सुनो” औरत में कहा. “यही वो जगह है जहाँ खड़ी होकर मैं सच बोलती हूँ.”
आदमी ने सुनो कहते समय ही झटके से अपनी अंगुली को उसकी बांह से हटा लिया था. वह औरत की तरफ देखने लगा. औरत का चेहरा लाली से भरा हुआ था. उसके होठ कांप रहे थे. उसकी नज़रें गिर रही थी और वह उनको जबरन उठाये हुए थी.
आदमी ने कहा- “मैं तुम्हें इसी वक़्त बांहों में भरकर चूम लेना चाहता हूँ.”
औरत ने कुछ न कहा.
आदमी ने आगे कहा- “मैं उसे घर से जाते हुए और लोगों से बोलते हुए देखता हूँ तो मेरी नफरत, मेरा तिरस्कार जगा रहता है. मैं उसका इंतजार करता हूँ कि वो लौट आएगी. अगर मैं तुमको चूम लूँ तो उसके प्रति मेरी नफरत और तिरस्कार खत्म हो जायेगा. उसमें और मुझमे कोई फर्क न बचेगा. ऐसा होते ही मैं उससे कहूँगा कि अब हम अलग हो जाते हैं.”
“और मैं उसे खोना नहीं चाहता हूँ” ये कहकर आदमी चुप हो गया.
औरत ने उसकी हथेली को अपनी हथेली पर रखा. उस पर अपनी दूसरी हथेली रखी. “मुझे ख़ुशी है कि इस जगह खड़े होने वाला हर कोई सच ही बोलता है.”
“मैं भी...” इतना सा और कहकर औरत चुप हो गयी.
आदमी ने पूछा- “क्या मैं भी?”
“तुम अपने आपको धोखा दे रहे हो. और मैं भी यही कर रही हूँ.”
“मैंने सोचा तुम कह रही हो कि तुम भी मुझे बांहों में भर लेना चाहती हो”
औरत मुस्कुराई. “हाँ..."
आदमी पानी पर गिरा हुआ पत्ता था. एक तरफ से भीगा और एक तरफ से सूखा. औरत अनंत प्रतीक्षा के आवेग से भरी उफनती, गरजती नदी थी किन्तु किसी पहाड़ पर खड़े भव्य किले सी चुप खड़ी थी.
[ज़रूरी नहीं है कि हर बार ज़िन्दगी तुम्हारी अंगुली पकड़ कर चले, कभी-कभी तुम्हें भी आगे बढ़कर उसकी अंगुली थामनी चाहिए. ]


Painting courtesy : pinterest

March 6, 2016

मौसमों के बीच फासले थे - पांच

आदमी ने कहा- “छत पर कोई कोना है जहाँ तुम सच बोलती हो” औरत चुपचाप आदमी की तरफ देखती रही. आदमी ने अगला सवाल किया.- “क्या तुम उसी जगह बैठी हो” 

आसमान पर छाये हुए बादल छितराने लगे. हलकी सी धूप आई. जितनी धूप आई, उससे ज्यादा हवा चली. झूले पर बैठी औरत ने अपने हाथ बाँध लिए. उसके चेहरे की शान्ति में थोड़ी सी उदासी घुलने लगी. गमलों से उठती गंध, छत की मुंडेर से टकराती हवा, पड़ोस के छत पर टहलते अजनबी जोड़े, गली से गुजरने वालों की आवाज़ों के वृन्द में चुप्पी साफ़ सुनी जा सकती थी. 

“हम कभी सच नहीं बोलते” औरत की आवाज़ में भारीपन था. “हमारी आत्मा सच बोलती है, दिल उसे बरगलाता है और दिमाग आखिरकार मूर्ख निकलता है.” 

“सुनो, मैं तुम्हें अपने बारे में बताती हूँ.” औरत झूले पर ठीक से बैठी. आदमी उसकी ओर देखता रहा. 

“मेरा एक सपना था कि अपना घर होगा. बहुत छोटा सा घर. उस घर में मैं रहूंगी. उसमें एक कोना रसोई बनाने को होगा, एक पढने को और एक आराम करने को. इन तीन कोनों के सिवा मुझे चौथा कोना जो चाहिए था, वह पूरी तरह खाली चाहिए था. खाली कोने मुझे बहुत अच्छे लगते हैं. मुझे लगता था कि जब मैं अपने घर के उस खाली कोने को देखूंगी तब मुझे लगेगा कि ये घर नया है. इसमें अभी बहुत कुछ आना शेष है. इस तरह आने की आशा का होना बहुत अच्छा होता है. मुझे ये आशा भरी प्रतीक्षा बहुत प्रिय थी. मैं यही करना चाहती थी.”

आदमी ने कहा- “आशा कैसी और प्रतीक्षा किसकी?” 

“मुझे नहीं मालूम कि आशा क्या थी. शायद बचपन से ही लगता था कि ऐसा घर हो जहाँ मुझे कोई कुछ न कहे. मैं अपनी पसंद की सुविधा में जी सकूँ. मैं इस तरह नहीं जीना चाहती कि बाहर की दुनिया की होड़ में, अपने भीतर भी होड़ को बसा लो. वो दुनिया भाग रही है तो हम भी घर में भागें. ज्यादा पढ़ें, जल्दी पढ़ें, जल्दी काम पूरे करें, जल्दी नौकरी पर जाएँ. बाहर से देखकर आयें कि दुनिया कहाँ तक पहुंची है. फिर लौटकर जल्दी खाना बनायें, जल्दी सो जाएँ ताकि कल जल्दी फिर वही सबकुछ कर सकें. मेरी आशा थी कि अपने घर में सुख भरे कदम बढ़ें. आहिस्ता से कुछ अच्छा बनाऊं. कुछ अच्छा पढूं. कुछ अच्छा सुनूँ. कुछ अच्छा सा आराम करूँ.”

आदमी सुन रहा था. गहरे मन से सुन रहा था. उसे लगा कि बातें गहराती जा रही हैं. औरत के चेहरे पर उदास स्याही उतरने लगी है. आदमी ने इसीबढती स्याही को रोक लेने के लिए कहा- “अच्छा सा आराम क्या होता है? क्या कोई खराब आराम भी होता?”

“हाँ ख़राब आराम भी होता है. आप बिस्तर पर पड़े हों और जीवन जीने का मन न हो. इस तरह के पड़े रहने को दुनिया आराम करना कहती है. ये एक खराब आराम है. अच्छा आराम वो होता है जहाँ आप बिस्तर या आँगन पर लेट कर दीवार और छत को कहते हैं, आओ मुझसे बातें करों. मुझे अपनी बाँहों में भर लो. जब मैं सो जाऊं तब तुम मेरा ख़याल रखना. दीवार तुम अपनी घड़ी को मेरे लिए उस वक़्त जोर से बजाना जब मैं आराम कर चुकी होऊं.” 

अल्पांश चुप्पी के बाद औरत ने कहा- “तुम्हें पता है प्रतीक्षा भी अच्छी और बुरी होती है.”

आदमी ने कहा- “मैं समझता हूँ” उस आदमी की आँखों में पीला डूबा हुआ सा उजास था. “मैंने चाहा मुझे कोई मिलेगी. उसके साथ मेरा घर होगा. मैं जहाँ रहूँगा, वह साथ होगी. वह जहाँ होगी मैं साथ रहूँगा. फिर हम जब मिले तो ऐसे ही थे. उसके पास मेरे लिए इतना सारा वक़्त था कि उसकी हर अंगड़ाई में, उसकी हर निगाह में प्रेम देखा जा सकता था.  लेकिन इसके बाद उसने खाली समय को अकेलेपन का नाम दिया. और अपने अकेलेपन में चाहा कि किसी से बात करे. उसने बातें करनी शुरू की. कुछ लोग जीवन का हिस्सा होते गए. उसने ख़ुद उन लोगों को चुना. उसका कहना था कि वह सिर्फ इसलिए बात करती है कि बंद होकर बैठना जीवन को समाप्त कर देना भर होगा. फिर इसके बाद से अब वह यही सब करती है.” 

उस आदमी की आँखों में उदासी थी, आंसू नहीं थे- “मैं प्रतीक्षा करता हूँ कि वह एक दिन मेरे साथ, मेरे लिए रहे” 

औरत ने कहा- “ये अच्छी वाली प्रतीक्षा है न?

आदमी ने कहा- “नहीं”

औरत उसकी तरफ देखते हुए अचानक नीचे देखने लगी. 

छितराए हुए बादल फिर से सघन होने लगे. रौशनी कम होती गयी. भरी दोपहर शाम का घना धुंधलका छा गया. वे दोनों वहीँ थे. झूले में कोई मचल नहीं थी. चाय खत्म हो चुकी थी. ज़िन्दगी बाक़ी थी. 

[वह जो जा चुका हो और साथ रहता हो. उसकी प्रतीक्षा सबसे कड़ी प्रतीक्षा है]

Image : Pinterest 

March 5, 2016

मौसमों के बीच फासले थे - चार

छत पर रखे गमलों के पास एक झूला था. या झूले के आस-पास बहुत से गमले रखे थे. वह आदमी इस औरत से मिलने आया था या इस औरत ने मिलने की चाहना की थी. जिस तरह झूला और गमले थे. उनको अलग देखने पर दोनों के बीच कोई रिश्ता नज़र नहीं आता था. साथ रखने पर ये समझ नहीं आता कि कौन किसके लिए हैं. झूला गमलों के लिए या गमले झूले के लिए. या ये महज एक संयोग है. या किसी रिक्त स्थान की आवश्यक पूर्ति भर.

जब वे सीढियां चढ़कर छत की ओर आ रहे थे तब आदमी ने देखा कि औरत ने हलके हरे रंग का कुरता पहना था. उस पर न...ीले रंग के छोटे फूल खिले थे. नीली जींस चप्पलों को चूम रही थी. औरत के पीछे सीढियाँ चढ़ते हुए उसने देखा कि पीठ जहाँ से खुली थी, वहीँ बाएं कंधे पर बैठा हुआ तिल भी उचक-उचक कर सीढियाँ चढ़े जा रहा था. औरत ने एक बार मुड़कर देखा था कि वह ठीक से आ रहा है या नहीं. आदमी ने उसके क्षणभर के देखने को अपने देखने से आश्वस्त किया कि वह आ रहा है. औरत के हाथ में चाय की ट्रे थी. आदमी के हाथ में कुछ न था.

“आओ बैठते हैं” ऐसा कहकर औरत खड़ी रही. उसने आदमी के बैठ जाने की प्रतीक्षा की. आदमी ने उसके कहे को सुनते हुए कुछ पल देखा और फिर किसी मूक संवाद में बनी सहमती से दोनों एक ही झूले के दो छोर पर बैठ गये. बीच की जगह पर चाय की ट्रे रख दी गयी.

आदमी ने चाय का प्याला हाथ में लेते हुए कहा- “मौसम अजीब है और इससे भी बड़ी बात कि ये ठहर गया है. कई रोज़ हुए न धूप भली लगती है न छाँव में बैठना.” औरत ने चाय के मग को उठाया नहीं था. वह बस स्थिर भाव से आदमी को देख रही थी. जैसे इस पल उसे देखना ही इकलौता सुख था. वह मूरत की तरह स्थिर थी. इसी मुद्रा में उसके होठ कांपने की तरह हिले. “ये कितना अच्छा है न कि तुम्हें मौसम के बारे में पता है. तुम जब अभी मौसम का कहने लगे तो मुझे ख़याल आया कि मैंने जाने कब से इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया."

आदमी ने कहा- “ऐसा होता है. एक बार मुझे कई साल बाद याद आया कि ज़िन्दगी से बहुत से साल गुम हैं. वे कुछ बरस कहाँ गए मैं अभी तक नहीं समझ पाया. कुछ याद ही नहीं आता कि उन बरसों में क्या किया कहाँ रहा?”

औरत की आवाज़ में खनक थी। “सचमुच. तुम यकीन न करोगे मगर मेरे साथ भी ऐसा हुआ है. मैं बचपने के कुछ साल भूल गयी हूँ. मुझे उन सालों से पहले का और बाद का याद आता है मगर कुछ बरस याद से गायब हैं”

औरत की आँखों में हैरत थी. एक समान से अनुभव की हैरत. आदमी उसे देख रहा था. झूले में हलकी सी मचल आ गयी थी. आदमी को ऐसा लगा जैसे इस औरत से अधिक करीब का कोई रिश्ता नहीं है. वे इसी झूले पर इसी तरह बैठने को बने हैं. आदमी ने कहा- “सुकून है” औरत ने प्रतीक्षा की कि आदमी कुछ और कहे. आदमी ने औरत की इस प्रतीक्षा को पढ़ा और कहने लगा- “ जैसे कि कोई काम नहीं बुला रहा. जैसे कहीं जाना नहीं है. जैसे सब दौड़ खत्म हो गयी हो. बस ऐसा कि जैसे अब कुछ करना नहीं है”

औरत उसे सुनते हुए अचानक चौंकी. उसने अपने घुटने से अपना हाथ उठा लिया. उसे लगा कि शायद उसने अपना हाथ उस आदमी के घुटने पर रख दिया था.

आदमी ने झूले से सटी पीठ को सीधा किया. उसे लगा कि अभी-अभी उसका हाथ था और अब नहीं है.

गमलों में हर रंग के फूल थे. आदमी की आँखें बैंगनी रंग को खोजने लगीं.

[ज़िन्दगी में जब आप महसूस करते हैं कि उसने छू लिया है तो सचमुच उसने छू लिया होता है. छूने को छूने की ज़रूरत नहीं होती.]

Painting : Lisa

March 4, 2016

सिरे के उस तरफ

क्यों किया था ऐसा?

तुमने कहाँ गलती की थी केसी. तुम किस तरह नाकाफी हो गए. अपना सबकुछ सौंप देने के बाद भी लगातार महीने दर महीने तुम्हारी झोली में क्या गिरता रहा. तुम एक ज़हीन आदमी न सही मगर इतना तो समझते ही थे कि अब तक जो भोगा है, उसकी पुनरावृति कैसे रुक सकती है. यही फिर से लौट-लौट कर न आना होता तो पहली बार ही ऐसा न होता. तुम जिस यकीन को मोहोब्बत की बिना पर लिए बैठे रहे उसी पर लगातार चोट होती रही. अपनेपन में आने वाली उदासियों की ठोकरों पर, तुमने झांक-झांक कर देखा, तुमने बार-बार पाया कि यही सब हो रहा है. तुमने खुद को किसी और के लिए धोखे दिए. तुम उसके आहत न होने की कामना में खुद को सताते रहे. तुम क्या चीज़ हो केसी. तुम्हें खुद से नफरत नहीं होती क्या? 

एक एक सांस रुक रुक कर आती है. दफ्तर के सूनेपन में एक जाने पहचाने दुःख पर आंसू बहाने में असमर्थ, सीने में दर्द की तीखी चुभन लिए हुए. रो सकने से लाचार. ऐसे क्यों बैठे हुए हो. तुम जानते तो हो ही. तुम्हें मालूम तो सब है है. फिर भी.

आओ आंसुओं 
घने पतझड़ की झर की तरह 
लू के बोसों की तपिश की तरह. 

रुखसारों पर 
बढई के रणदे की तरह. 

वसंत के पीले चोगे 
गरम रुत के चौंधियाते उजास 
सावन के लम्बे इंतजार 
सर्द दिनों की कठोर छुअन 
की स्मृतियों से बाहर. 

देखो, छल और कपट के तेज़ धार वाले अस्त्र 
समझो, मन की गिरहों से झांकती आँखों को. 

और ख़त्म कर दो 
आखिरी उम्मीद. 

एक शातिर, धूर्त और नक्काल 
अपनी रोनी सूरत से 
अपने रंगे हुए दिल से 
अपनी बेबसी के ढोंग से 
उसके जरिये तुमको काट रहा है छोटे-छोटे टुकड़ों में. 

अविराम 
अनंत 
निरंतर 
हत्या, हत्या, हत्या, 

तुम खून से भीगे हुए अपनी ही लाश उठाये हो. 

मगर चल रहे हो. 

[Painting : Tilen Ti] 

March 2, 2016

मौसमों के बीच फासले थे - तीन

उन्हीं दिनों लड़की ने एक बार कहा- ना.
सर्द दिनों की दोपहर को कोट उतार कर बिस्तर पर लापरवाही से फेंक दिया. एक लम्बी दोपहर के स्वागत में दीवार घड़ी की ओर देखा. लड़की जिस किराये के घर में थी उसके आस-पास के ज्यादातर घर खाली पड़े थे. जब भी लड़की उन घरों के पास से गुजरती उसे लगता कि इन घरों से एक अजीब सी हूक उठती है. उसने माँ को कहा- “हाउसिंग बोर्ड के इन घरों में लोग रहते नहीं है. मैं मगर कुछ बुरा फील नहीं करती हूँ.” माँ ने शायद चिंता जताई होगी कि लड़की फोन पर कह रही थी- “माँ क्या फर्क पड़ता है? कोई क्या करेगा किसी का. कोई डाकू-लुटेरा आया तो कहूँगी भाई ये एक एटीएम है मेरे पास और इसका पिन ये है इससे चालीस हज़ार रूपया निकलेगा. जा निकाल लेना.” लड़की हंस रही थी.
सटाक-सटाक दिन गिरे. फटाक-फटाक उदासियाँ आई.
दफ़्तर के माहौल में वह लड़की एक जींस थी. सहकर्मियों ने चीज़े इस शक्ल में ढाल दी कि लड़की का अकेला होना एक अभिशाप की तरह पेश किया जाने लगा. उसके अकेले होने से जो ईर्ष्या थी, उसे अभिशाप के रूप में पेश किया जाने लगा. उपेक्षा को हथियार की तरह लगातार उपयोग में लिया गया. साल भर के फासले में उस रुआंसा लड़की को एक सहकर्मी ने कहा- “क्या मैं तुमको पसंद हूँ?”
वह पसंद नहीं था.
एक रोज़ वे दोनों शादी के मंडप में थे.
इसके बाद लड़की ने पाया कि वह सही थी. वह उसे पसंद नहीं था. जिस कमजोर पल में उसने लोगों को जवाब देने के लिए फैसला किया था, वही पल उसके लिए लाजवाब हो गया था. वह देखती थी कि जिसने कंधे पर हाथ रखा था, वह अब उसे जींस की तरह इस्तेमाल करना ही चाहता था. कुछ एक असहमतियों पर छिटपुट कार्रवाही और जवाबी कार्रवाही के बाद दफ़्तर में जो असुविधा थी उसने अपनी जगह बदल कर घर में डेरा जमा लिया.
जब धूप की चौंध में उसका चेहरा झिलमिला रहा था. जब वह अपने बीते ग्यारह बरस का फेरा दे रही थी. तभी उसके घर की डोरबेल बजी.
उसने दरवाज़ा खोला. सामने आदमी की शक्ल में वही लड़का खड़ा था जो कभी डिपार्टमेंट के सामने वाले बरामदे में दीखता था. जिसने कहा था- तुम पानी की बोतल साथ नहीं लाती? जिसको उसने कहा था मैं एंगेज हूँ और जा रही हूँ. जिस लड़के ने उसे जाने से पहले कुछ नहीं कहा था.
आओ 
कैसी हो?
मैं अच्छी हूँ मगर इस बात से खुश हूँ कि तुम आये. 
मैंने सोचा था कि न आऊँ मगर आ गया 
क्यों सोचा ऐसा?
इसलिए कि हम क्या बात करेंगे

ज़रा देर रुक कर आदमी बोला- असल बात ये है कि हम बात करके भी क्या कर सकेंगे?
लड़की हंसी- “अच्छा तो तुम अब बोलना सीख गए हो?”
बोलना तो तब भी आता था मगर लगता था तुमको खो दूंगा इसलिए चुप रहा 
माने 
माने कि तुम शायद लौट आओगी, मुझे लगा था

उस वक़्त की लड़की जो इस वक़्त एक औरत थी चुप से आगे बढ़ी. उसने कहा- आओ यहाँ बैठते हैं.
ड्राइंग रूम की दीवारों में आले बने थे. उनमें कुछ एक मिटटी के गुलदस्ते रखे थे. उनमें फूल नहीं थे. उन पर कोई चित्रकारी भी नहीं थी. एक फानूस खूब नीचे तक लटकाया हुआ था. आदमी जब इसे देख रहा था तब औरत ने कहा- मुझे इसकी रौशनी पसंद है. मैं अक्सर रात में इसके नीचे बैठती हूँ.
आदमी मुस्कुराने लगा.
“क्या मैं तुम कहूँ?” 
हाँ, यही कहो वर्ना बड़ी परेशानी होगी.

फिर एक हल्की हंसी. एक छोटी चुप्पी. एक सरल सा अंतराल. एक अनकहा अपनापन उगा.
औरत ने कहा- “तुम्हारा जीवन कैसे चल रहा है?”
मेरे एक बीवी है. हमारे कोई बच्चा नहीं है. और हम एक साथ हैं.
औरत ने सोचा कि वह आगे कैसे और किस तरह सवाल करे. ज़रा देर असमंजस में रहने के बाद उसने कहा- “मैं चाय लेकर आती हूँ.” वह उठते हुए रुकी और बोली- “तुम चाय पीते हो न?” आदमी मुस्कुराने लगा- “हाँ मैं कुछ भी पी लेता हूँ?”
औरत ने कहा- “ये कुछ ज्यादा नहीं हो गया?”
आदमी उसे देखता रहा. औरत ज़रा देर बाद रसोई की ओर चल दी. वह जब लौटी तो चाय के साथ खाने को भी कुछ लेकर आई.
आदमी ने कहा- “अपने बारे में कुछ बताओ”
औरत ने सोचा कहाँ से शुरू करूँ और कितना बताऊँ.
इस तरह ग्यारह साल बाद मिले को कोई कैसे कुछ और क्या बता सकता है? जीवन प्रवाह के बारे में बात करना आसान नहीं होता है. लोग जज करते हैं. लोग साथ देने का दिखावा करके एकल में उपहास करते हैं. लोग अवेलेबल समझने लगते हैं. लोग कुछ भी यानी कुछ भी कर सकते हैं.
मगर उसने कहा- “क्या तुम ये चाय मेरे साथ छत पर बैठ कर पीना चाहोगे?
आदमी चुप था.

औरत ने कहा- “छत पर एक कोना है, जहाँ मैं सच बोलती हूँ.”
वे दोनों ऊपर चले गए. वहां बहुत सारे गमले थे. हरियाली थी. उतनी हरियाली आदमी ने अपने रिश्तों में कभी नहीं देखी थी. एक वीराना था. एक दूर तक फैली हुई बंजर ज़मीं थी.
[इंतज़ार एक नया खिला फूल है जो बूढ़ा होने में वक़्त लगाता है]
Painting courtesy : kauber Carol

March 1, 2016

मौसमों के बीच फासले थे - दो

वो लड़का जो सामने के डिपार्टमेंट में था, उस घटना के बाद कुछ न बोला. उसका जीवन प्रेक्टिकल फाइल्स बनाने, फूलों को पहचानने, उनका डिसेक्शन करने, स्लाइड्स बनाने में बीतता रहा. नौकरी लगने की उसे कोई आशा नहीं थी. वह इससे परेशान भी नहीं था. उसे नहीं मालूम था कि जीवन से उसे क्या चाहिए.
उसे एक लड़की मिली. वह लड़की एक बार नहीं कई बार उसे देखकर मुस्कुराई. फिर उसके फोन आने लगे. अच्छा लगता था. कई बार अच्छे से ज्यादा अच्छा लगता था. लड़की उसे हर संभव और असंभव अवसर पर फोन करती थी. भरी दोपहर या आधी रात हो, फोन करने के लिए कोई बाधा न थी.
मैं तुमसे प्यार करती हूँ.
लड़का सर से पाँव तक सिहर उठता. उत्तेजना की लहरें उसे विचलित करने लगती. फोन रखने के घंटों बाद तक वह उसी असर में डूबा रहता. उसे फोन का इंतज़ार रहने लगा. उसने कई बार लड़की से कहा कि वह कोई नियत समय बताये कि कब फोन करेगी. इस तरह लगातार इंतज़ार में जीना कठिन है. उसके भीतर ऐसी चाहना मचलने लगती है कि दौड़कर लड़की के पास पहुँच जाये. लड़की शायद मुस्कुराती थी. शरारत भरी मुस्कान.
एक दिन सिक्का उलट गया. जो लड़की उसके लिए जितने एफर्ट लेती थी, उससे अधिक लड़के ने लेने शुरू कर दिए. सिक्के की दूसरी तरफ लड़की की बेरुखी थी. ये बेरुखी बिछोह की आग में ज्वलनशील तरल की तरह गिरती थी. इसी ताप में वह लड़का अचानक उसके पास पहुँच गया. उसने कहा- “अभी मिलने आओ” लड़की ने कहा- “तुम पागल हो क्या? उसने कहा- “तुम आती हो या मैं जाऊं?”
वे मिले.
रेस्तरां में लड़की ने उसके हाथ को अपनी हथेलियों में लिया. “तुम इतने बेसब्र क्यों हो?”
मैं चाहता हूँ कि तुम मुझसे शादी कर लो.
अभी?
हाँ इसी वक़्त.
वह लड़की हंसने लगी. कॉफी की दो प्यालियों में बने दिल पर मिठास उड़ेलते हुए टेढ़ी निग़ाह से देखकर लड़की ने आँख से इशारा किया. उसका मतलब था कि अब क्या सोच रहे हो. लड़के ने कोई प्रतिक्रिया नहीं की. वह अटल था कि उसे जवाब चाहिए वह कब शादी करेगी.
मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ, हम साथ में होंगे. मगर इस तरह कैसे संभव है?
तुम अचानक कहाँ गायब हो जाती हो?
मेरे एग्जाम थे.
क्या अचानक आ गए?
नहीं, मगर हर रोज़ एक तरीके से बात नहीं हो सकती
क्यों?
क्या पागलपन है. समझते क्यों नहीं हो?
मैं समझता हूँ और आखिरी बात सुनो, मुझे कल शाम को फोन करके बताना कि कब शादी होगी अगर न बता सको तो फिर फोन न करना.
लड़की ने उसके हाथों को फिर से छुआ और बड़ी कोमलता से कहा- प्लीज समझो न . मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ.
लड़का कॉफ़ी के सिप इस तरह लेने लगा जैसे किसी अजनबी के साथ किसी मज़बूरी में बैठा है. लड़की ने टेबल के नीचे से उसके पाँव को अपने पाँव से छुआ. उसने पैर के अंगूठे से लड़के की जुराब को नीचे करना चाहा. लड़के ने अपनी टांग पीछे खीच ली . लड़की बोली- “चिढ़ते क्यों हो?”
वे उठ गए.
लड़की ने बाहर जाने के रास्ते के बीच रुक कर रेस्तरां के लड़के से पूछा- “वाशरूम किधर है?” फिर उसने कहा- "थोड़ी दूर वाशरूम तक मेरे साथ आओ." वे दोनों वहां पहुंचे तो थोड़ी सी तन्हाई में लड़की ने उसे खींचकर गले लगा लिया. सिक्के के इस दूसरे रुख में बेरुखी न थी. लड़के ने उसे और करीब लेकर इस तरह बाहों में जकड़ लिया जैसे वे किसी निजी कक्ष में अकेले हों.
याद आईने के आ-पार खड़ी थी.
उसके बालों में कुछ सफ़ेद बाल झांक रहे थे. वह अपने आपको देखने के लिए आईने के सामने खड़ा हुआ था कि अगर वह मिलने जायेगा तो कैसा दिखेगा. लेकिन उदास दिनों की शुरुआत के मादक दिन, पक्की याद की तरह उसके साथ खड़े थे.
ये जो वे पति पत्नी हैं. ये जो दोनों के बीच का रिश्ता है. इसके बारे में वह किस तरह कह सकता है कि रिश्ता ठंडेपन से भर गया है. या बहुत पहले ही भर चुका था. अगर वह किसी से कहे कि उसकी बीवी दफ़्तर जाने से पहले घर के काम करती है. फिर उसके पास आती है. उसे अपने आलिंगन में बाँध लेती है. और फिर वे अपने निजी पलों से बाहर आते हैं. फिर वो दफ्तर जाती है. और कोई क्या कर सकता है किसी के लिए भी.
वह सोचता है कि अगर वह किसी से कहे कि उन कुछ पलों के बाद अगले कुछ ही पलों में वह लड़की जो उसकी बीवी है, रोज़ तेज़ क़दम बाहर जाती दिखती है. वह जो रात से सुबह तक कहीं खोयी थी. दरवाजे के पास पहुँचते हुए कहती है- “अब तो खुश? यही चाहिए था न?”
वह सोचता है सोफे पर धम्म से गिर जाये. वह गिर नहीं पाता. वह सोचता है कि ये सब वह कब चाहता था. ऐसा कब था कि यही चाहिए था? वह दरवाज़ा बंद करने नहीं जाता. उसे लगता है कि शायद वह एक बार वापस आएगी और उसे पूछेगी कि तुम दिन भर क्या करने वाले हो? वह खिड़की से देखता है. उसकी बीवी फोन कान से लगाये हुए तेज़ कदम बिल्डिंग के मुख्य दरवाज़े से बाहर निकल रही है.
मास्टर बैडरूम की खिड़की में कबूतरों ने घोंसला बनाया है. उसे कोई रोज़ सुबह इसी खिड़की के पास देखे तो समझ सकता है कि वह कबूतरों को देख रहा है. उसे कबूतरों को देखना पसंद है. एक रोज़ वह कबूतरों को दाना डालने जायेगा अपनी बहुत सी तस्वीरें खिंचवायेगा. फिर उन तस्वीरों को फेसबुक पर पोस्ट कर देगा. उसे जानने वाले सब समझ सकेंगे कि वह कबूतरों से प्रेम करता है.
[इंतज़ार की कहानियां उतनी उदास नहीं है जितना इंतज़ार]

Painting courtesy : Maris Renfro

आवाज़ के कुछ टुकड़े

के सी

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Kishore Choudhary is a poet and fiction writer from Barmer (Rajasthan). His writing career took a formal leap from his personal journals to make him a hugely popular blogger on two of his blogs- Kahaniyan and Hathkadh.

Having spent most of his formative years in the desert, the life there is his favourite canvas to contextualise his poetry and stories. His followers from across the world vouch for his realistic and authentic portrayal of the desert life and its typical dilemmas, fused beautifully and almost effortlessly with some stunning images of the desert and its folklore.

Kishore in a way pioneered the incorporation of pre-publishing interactions and feedback with his readers on his blogs and across social media platforms in his final works. His style is known for its lucid and unexampled metaphors that he exquisitely uses to express universal feelings like love, loneliness, hope, pain, longing and fantasy. 

His first collection of stories Chaurahe Par Seedhiyan (2012)was such a thumping bestseller that the first issue was sold out within 50 days of its launch.All the stories skilfully bring the rich and exotic background of the desert come alive and make the reader delve deeper into the layers of human emotions.This much sought after collection raised the bar for all contemporary Hindi works of short fiction and brought in a fresh change in the existing status quo for Hindi short stories. 

The second collection titled Dhoop Ke Aaiyne Mein(2013)had an array of short stories that looked at life through a multi-dimensional prism, lending each one of them a distinctive charm. Kishore being a poet first, his stories are more like poetic fiction. Having a great affinity to the stream of consciousness novels by English literary greats like James Joyce and Virginia Woolf his stories defy the conventional rules of a definitive beginning, middle and end. 

Kishore’s first publication was a collection of poetry Baatein Bewajah, an alluring and bewitching series of short poems which capture the vast expanse of human emotions and have images that have a rare haunting quality.

Kishore is a Radio Broadcaster by profession and has a special fondness for classical & folk music. Articles about him and his interviews are available across many major newspapers and websites. Kishore certainly is the Avant-garde flavour in contemporary Hindi writing and his ever expanding avid readership eagerly waits for his next chartbuster.

Kishore's latest is another collection called "Jaadu Bhari Ladki". This collection has his same imitable style of stories but the contexts and places are beyond the desert as well. 
His deep understanding of the complexity of modern relationships and how they play out in our minds, homes and workplaces makes it a very unique almost post-modern work in Hindi Fiction.

http://www.goodreads.com/author/show/7361739.Kishore_Chaudhary

हेंगओवर सिलसिला

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Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने या खूबसूरत स्त्री को इरादतन चूमने जितना ही अवैध है.

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