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Showing posts from August, 2016

तुम्हारे उसका क्या हाल है?

उसके हाथ साफ़ थे. अंगुलियाँ सब गिरहों को करीने से रखती जाती थीं. दिल और दिमाग भले कितनी ही जगह उलझे हों, फंदे के कसाव न कम होते थे न फैलते थे. जब तक थका हारा हुआ बदन ठंडा था. वो आराम गरमाहट भली सी लगती थी. लोग कहते थे कि ये बुनावट असल में उसकी अँगुलियों की ज़रूरत थी. वे अंगुलियाँ जो बचपन से अब तक नयी छुअन की तलबगार रही मगर अपने ही किसी डर के कारण चुप लगाकर बैठी रहती थी. जिस तरह बेशर्मी आती है. जिस तरह असर खत्म होता है. जिस तरह परवाह जाती रहती है. उसी तरह ये हुनर भी आया था. अलग-अलग सिरे बांधना और फंदे बुनते जाना. एक दोपहर उसने सिरा बाँधा. शाम को बात करते हैं. शाम को फंदा डाला. "वो बहुत दूर है. हालाँकि लौटने में कोई तीन दिन का फासला भर है. मगर तुम समझते हो न कि किसी का यूं लौट आना लौटना नहीं होता. बस आधी रात को फ्लाइट लेंड करेगी. दो एक घंटे में घर की डोरबेल बजेगी. उसके इंतज़ार में कदम वहीँ दरवाज़े के पास खड़े होंगे. वह अपने ट्रोली बैग को किनारे कर देगा. उसी तरफ जहाँ पिछली बार लाया हुआ एक पौधा रखा होगा. वाशरूम उधर ही है. रास्ता बेडरूम के अन्दर है. अगर उसी की आदत न हुई होती तो वो वो वहीँ…

उससे पहले

स्मृतियां गहरे से हल्के रंग की ओर बढ़ती हैं। फिर पीली पड़ जाती हैं। जैसे किसी तस्वीर का कागज़ उम्रदराज़ दिखने लगता है। उसके पीलेपन को देखते हुए लगता है कि एक हलके से मोड़ से टूट जाएगा। उस कागज़ को छूने से अंगुलियां डरती हैं। जाने किस छुअन से एक दरार आ जाये। आँखे चुप बैठी सोचती हैं। वो कितना ताज़ा लम्हा था। वक़्त की धूप छाया तक कैसे चली आती है। बंद कमरे की दीवार को भी धूप किस तरह छूती है। कि कागज़ अपना हरापन खो देता है। तस्वीर के कागजों की कुछ जड़ें हुई होती तो शायद कुछ और वक़्त तक अपना हरापन सींचती रहती। ऐसे ही स्मृतियां जिन कारणों से बची रहती हैं, वे सब कारण असल में बीत चुके कारण होते हैं। स्मृतियों के अक्स में एक पीलापन अपनी जगह बनाता रहता है। हम एक रोज़ स्मृति को छूने से डरते लगते हैं। सब स्मृतियां उन कारणों पर खिलती हैं जिनके पाए सम्मोहन होते हैं। ये सम्मोहनों की ही दुनिया है। सम्मोहन अपने भीतर ईर्ष्या और युद्ध के नक्शे लिए होते हैं। ये ऐसे संघर्ष है जिन्हें आप टाल नहीं सकते। इनसे लड़कर ही मुक्त हुआ जा सकता है। अकेलेपन का अभ्यस्त नित नए सम्बन्ध तलाशने में सुख पाता है। वह व्यक्ति आस पास की जड़ों…

असंयत उद्विग्न

आप कभी नहीं समझ पाएंगे कि आसान क्या है और मुश्किल क्या? इस दुनिया में सबकुछ अपनी न्यूनता और आधिक्य के साथ गुण-दोष में परिवर्तित होता रहता है। इधर कई रोज़ से आसमान में बादल हैं। सूरज दिखा नहीं। पूरे राजस्थान में बरसात किसी नवेले प्रिय की तरह बरस रही है। कुछ एक टुकड़े जो सूखे हैं, बादलों की छतरी उन पर भी बनी हुई है। रेगिस्तान तपता हुआ कितना कड़ा लगता है। पानी ही जीवन की इकलौती ज़रूरत जान पड़ती है। जहाँ तक आप देख पाते हैं, केवल सूखा और तपिश दिखाई देती है। इधर जब बादल आसाम पर डेरा डालते हैं और बिखरने का नाम नहीं लेते तब स्थिति प्रकृति के विपरीत हो जाती है। कैसी आदतें होती है न। सूखे, बियाबान और उजाड़ में जीने की आदत। प्यास, पसीना और तन्हाई की आदत। प्रेम की कामना, प्रतीक्षा और उसके अंत होने की चाहना। लेकिन कभी सब बदल जाता है। सडकों के किनारे काई जमी दिखने लगती है। हरियाली का बारीक अक्स हर तरफ उभर आता है। सीले कमरे, सीले पैराहन, सीले बिस्तर और भीगी भारी स्मृतियां। सफ़र के टुकड़े पांवों में चुभे रहते हैं। लंबे समय तक कहीं जाने की आदत नहीं होती। कभी यात्रा पर यात्रा आमंत्रित करती रहती है। नए पुराने श…