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Showing posts from July, 2018

अमलतास के पीले गीत

कभी हम इस तरह प्यार में पड़ जाते हैं कि हर समय उनके साथ मिलते हैं। मेरे दफ़्तर की टेबल, मेरे अधलेटे पढ़ने का बिस्तर और जिन कोनों में बैठकर लिखता हूँ उनके आस पास हमेशा पेंसिलें, इरेजर और शार्पनर रहते हैं।

स्कूल जाने के पहले-पहले दिनों में इन्होंने मुझे मोह लिया था। इतने लम्बे जीवन में कोई गैज़ेट इसको रिप्लेस नहीं कर पाया।

कभी अचानक तुम सामने आकर बैठ जाओ तब मैं हैरत से भरकर इनको भूल जाता हूँ। तुम्हारे जाने के बाद ख़याल आता है कि तुमको ठीक से देखा ही नहीं।

बुझ चुकी शाम में अंगुलियां बहुत देर तक पेंसिल से खेलती रहती हैं। मन सोचता रहता है कि क्या ऐसा लिख दूँ -"तुम आया करो" फिर होंठ मुस्कुरा उठते हैं कि तुम कब बोले जो अब कुछ बोलोगे।
* * *

इन रातों में बादल छाये रहते हैं. कुछ एक रात से चाँद के होने का अहसास आता है और बुझ जाता है. रात के दस बजे के आस-पास पड़ोस की छत पर रखे रेडियो की आवाज़ ज़रा तेज़ हो जाती है. फ़िल्मी गीत बजने लगते हैं.

गीत के ख़याल में गुम होकर अक्सर हम कुछ सोचने लगते हैं. किसी रेस्तरां में दोपहर के खाने की याद, किसी सिटी बस के सफ़र में हुई अबखाई, कभी बिस्तर में पड़े हुए गीत की …

पीले पन्नों के झड़ जाने से पहले

एक बन्द डायरी थी। उसे किसी को पढ़ाना नहीं था। वह केवल लिख देना भर था कि लिखने से मन थोड़ा सा मुक्त हो जाता। एक बार का ऐसा लगता कि एड़ी से कोई कांटा निकालकर दूर फेंक दिया है।

अब इस डायरी को सहेजना भी एक काम हो गया और फिर इन कांटों का किसी से सीधा वास्ता न रहा। उस पर ये पीले पड़ते पन्ने जाने कब फट जाएं, जाने कब स्याही के अक्षर धुल जाएं। इसलिए तुम भी पढ़ लो कि हो सकता है कोई बात तुम्हारे काम की निकले। तुमको भी ऐसे ही किसी की याद आए और ये सोचकर मुस्कुरा सको कि तुमने जो जीया है, वैसा और भी लोग जीते हैं।

26 March 2013 ·

वह एक नया रिश्ता बनाते हुए इस सोच में गुम रहता है कि पुराने रिश्ते उघड़ तो नहीं रहे।

24 May ·2013

हम अपनी कांटेक्ट लिस्ट में दानों से भरी बालियाँ जमा करते जाते हैं लेकिन चुपके से सारे दाने कहीं चले जाते हैं और भूसा बचा रह जाता है.

17 July 2013 ·

टीन की छतें बरसात में बादलों का तबला हो जाती हैं। जैसे किसी पुरानी याद में हम खाली कासा हो जाते हैं। बांसुरी की आवाज़ से भरा हुआ एक खाली कासा।

3 November 2014 ·

पेड़ों के पत्ते चुप हैं। पंछी दृश्य की परिधि से गायब हैं। ऐसी ही थी वह दोपहर जब मुझे…

घसियारा मन

क्या हम गुज़र चुकी बारिश को आवाज़ देते हैं।
या नई बारिशों का इंतज़ार करते हैं, ज़रा कहो?

इस समय अचानक बादल बरसने लगे हैं। बोरोसिल के ग्लास में भरी बकार्डी की रम में बारिश की बूंदें गिर रही है मगर मन जाने कहाँ खोया है? किसे होना था और कौन नहीं है, कुछ समझ नहीं आता।

वैसे नासमझी एक अच्छी शै है।

घास की तरह
उग आते हैं बीते दिन
बैठे-चलते मन
घसियारा हो जाता है।
एक बस छोटी बात
लिखना चाहता है दिल
मगर बात के साथ
गुँथ जाते हैं मौसम।

मैं पहुंच जाता हूँ
कहीं का कहीं
और कहीं छूट जाता हूँ मैं।

हरे पेचों को छूकर आती हवा

खिड़की के रास्ते गरम चुभन से भरी सीली हवा का झोंका आता है। बरसात कब की जा चुकी मगर यहाँ-वहाँ उग आये हरे पेचों से सीलापन हवा के साथ उड़ता रहता है।

एक बेहद हल्की ख़ुशबू आती है। जैसे कोई मन चटक कर खिल रहा हो।

बिल्ली मुझे देखती है। मैं उसे पूछता हूँ कि जिस तरह स्वप्न चटक कर खिलता है और मौसम में घुलकर अदृश्य हो जाता है, उसी तरह मन भी बह जाता होगा?

लघुत्तम मौन के बाद बिल्ली कूद कर खिड़की में बैठ जाती है। अगली छलांग में वह गायब हो जाती है। जैसे एक स्वप्न।

तेरी ओर तेरी ओर

सुरों की पेटी खोलने वाला क्या सुरों को ठीक रास्ता बता सकता है? क्या कहीं बीच में ही झर जाते हैं सुर जैसे आकाश को ताकती लता के फूल ज़मीन पर गिरते रहते हैं।

हम स्वप्न में किसी फूल को देखते हैं तब क्या फूल को भी ऐसा कोई स्वप्न आता है?

स्वप्न अलोप होता हुआ एक रेखाचित्र है। कभी वह लिखित संदेशे नहीं छोड़ता।

मगर क्यों?

हवा का झोंका फिर आता है।

एक गीत का मिसरा उलझकर सांसों में टँग जाता हैं। पीठ को पीछे की ओर किये खिड़की से बाहर देखते जाना कि एक बार बारिश कितनी हरियाली फैला देती है।

उसने क्या पहना था? एक गहरा रंग। रंग के साथ कोई हल्की किनारी…

बाक़ी कामों से भरी जिंदगी

ज़िन्दगी में काम पेंडिंग पड़े रहें इससे अच्छी बात सिर्फ एक ही होती है कि उन कामों को भुला ही दिया जाए। काम पूरे हो जाएंगे तो क्या करेंगे? लेकिन मन कई बार होता है कि कुछ काम पूरे कर लिए जाएं। उन कामों में लगते ही कुछ रोज़, कुछ घण्टे या कुछ ही देर में मन उचट जाता है।

हर काम के होने का कोई मतलब होता है। जैसे कुछ काम पेंडिंग होने को ही होते हैं। कुछ कभी न होने के लिए होते हैं।

कुछ किया, कुछ न किया। ज़िन्दगी चलती रही। फेसबुक को फोन से नहीं हटाया, मन से हटा दिया। क्या हमारे समय का इतना सा मोल रह गया है कि स्क्रॉल करें, अपडेट करने को सोचें या फिर इनबॉक्स किये जाएं। असल में फेसबुक ज़िन्दगी की एक बहुत मामूली सी बात है। ज़िन्दगी का विस्तार इतना है कि हम अचरज भरे उचक सकते हैं, चौंक कर ठहर सकते हैं या फिर कुछ न करने के परमानंद को पा सकते हैं।

अब बस मेल पर बात कर लेना ठीक लगता है। और कहने सुनने लायक बात हो तो फोन पर कर लेता हूँ। मेल का पता yourkc@yahoo.com हैं। यहीं से सब बातें हो जाती हैं।

आज लोक संगीत रिकॉर्ड कर रहा था। मुल्तान ख़ाँ साहब ने नौजवानी भरा गीत गाया। मैं उनको कहने लगा कि आपको कौन कहेगा कि …

वो जो दिल ने सोचा

घर में एक पेड़ है। हर सुबह एक चिड़िया आती है। वह सबसे ऊंची शाख पर झूलती है। शाख लचकती है। चिड़िया इस लचक के साथ गाना गाती है। मैं दोनों को देखता हूँ। 
अचानक मोगरे का नया फूल मुझसे पूछता है। "तुम क्या देख रहे हो?" मैं अचरज से भरा हुआ मोगरे के फूल से पूछता हूँ- "तुमको कैसे पता कि मैं कुछ देख रहा हूँ?" 
"तो क्या कर रहे हो?" 
"मैं सुन रहा हूँ" 
"क्या चिड़िया का गाना?" 
"नहीं उसकी बातें" 
"अच्छा तुमको कैसे समझ आता है कि वह गा नहीं रही।"
"मुझे नहीं समझ आता मगर मेरे भीतर एक चिड़िया है वह समझती है" 
मोगरे के नए फूल ने अपनी ठोडी पर एक पत्ती रखी और कहा- "तो बताओ चिड़िया ने क्या कहा?"
मैने कहा- "चिड़िया पेड़ से कहती है कि तुम हर सुबह बड़ा होने का स्वप्न लिए जागते हो।" 
मोगरे का फूल कुछ सोचने लगा तभी एक बुलबुल मुझसे बोली- "तुम उसकी बातें नहीं समझते हो" 
मैंने पूछा- "तुमको कैसे पता?" 
"इसलिए कि मैंने सुना था चिड़िया रोज़ उससे कहती है कि तुम पेड़ नहीं हो। तुम एक झूला हो" 
मोगरे का …