January 31, 2013

इस वक़्त चाँद गायब है


मैं उनींदा हूँ। मैं सपने में हूँ। मैं जागने से पहले के लम्हे की गिरफ़्त में हूँ। मैं जाने किधर हूँ। देखूँ तो पाता हूँ कि मैं अपने घर की छत पर बैठा हूँ। हवा में हल्की ठंड है। पहाड़ पर एक प्रार्थना की तरह प्रकाश विस्तार पा रहा है। मैं कहता हूँ, ओ प्रकाश, मुझ तक भी आओ। मेरे पास कुछ नहीं आता इसलिए एक नयी कामना करता हूँ। मुझे ज्यादा ठंडी हवा का स्पर्श चाहिए। मुझे आइस क्यूब चाहिए। मैं अपने भीतर की तनहाई को बर्फ के साथ जमा देना चाहता हूँ। मेरी तनहाई एक आग है। मेरी चाह है कि आग पानी में क़ैद हो जाए। कई रात पहले एक तारा टूटा। उसी रात मैंने उसे देखा। उसी वक़्त मैंने चाहा कि एक नाम भूल जाऊँ। किसी ने कुछ नहीं कहा भूलने या याद रखने के बारे में, इसलिए मैंने खुद से कहा कि इंतज़ार करो। एक दिन सबकी टूटने की बारी आती है। एक दिन सबके दरवाजे से झांक रही होती है महबूब की आँखें। उस एक आखिरी दिन के लिए, कई रातों पहले वाली तारा टूटने वाली रात को देखने के लिए, तुम रख देना अपनी आत्मा मेरी आँखों के सामने.... 

इस वक़्त तुम जाने कहाँ हो
किस जगह रखे हैं तुम्हारे पाँव?
मगर इस याद का किस्सा शुरू होता है
उस पल से
जब शैतान के पाँवों पर खड़े होकर
तुमने उसकी आँखों में बुना ख़्वाहिशों का घोंसला
और लचक गयी ज़िंदगी की डाल।

ये मुमकिन नहीं कि मिटाया जा सके, वाटर कलर को
हालांकि एक दिन सूख जाता है पानी, उड़ जाता है रंग।

ये भी फिजूल की बात है
कि हम वक़्त के पहिये की किसी तीली पर
बांध लें उम्मीद का झूला
और एक दिन मर जाएँ इन्हीं धागों में घुट कर
मगर जीना चाहिए ऐसे ही रेशों के पैरहन के साथ
जिनसे दिखती हों महबूब की सूरत।
तुम्हारी अनुपस्थिति में भी सांस लेती हैं मुहब्बत
वरना तुम्हारे होते हुये उसे कहाँ फुरसत है
वह उचक कर चूम लेना चाहती है तुम्हारी परछाई भी।

ये चाहे कितना भी बेढब लगे
मगर मान लेना चाहिए
कि उस लम्हे की उम्र हज़ार साल से बढ़ कर होनी चाहिए
जब उसकी आमद से ही आ जाती हों अनगिनत चीज़ें
कि जैसे प्रेम किसी तूफान की तरह उड़ा लता है अपने साथ जाने क्या क्या।

इस वक़्त चाँद गायब है, हवा भी कम कम है
किसी को नहीं मालूम कि क्या बजा है?
इस वक़्त तुम जाने कहाँ हो, किस जगह रखे हैं तुम्हारे पाँव...
* * *
[तस्वीर सौजन्य : पल्लवी त्रिवेदी] 

January 21, 2013

Best seller - A collection of stories written by Kishore Choudhary : The second edition


These stories comprise a world revolving around the relationship between man and woman. What keeps the reader glued to the stories is the writer’s way of rendering the ‘normal’ day-to-day incidents with unconventional metaphors and images, leaving the reader overwhelmed. The characters and situations evolving out of these incidents, however, do not turn these stories into mere escapist fantasies, but pull the reader towards themselves, painting a live picture of all the characters—creating a sense of déjà-vu.

The stories do not seek perfection in human lives by passing judgments of any kind, but encompass the complexity of the minutest of human emotions, weaving a melancholic but realistic face of life. The protagonists, often caught in a web of life—in the strands of love, lust and emotions, keep going to-and-fro, tossing like a boat on the waves of their physical and sentimental world.

The stories run in a style which is poetic in narration, carrying the knowledge that rises after experiencing the adversities of life. This not only compels the reader to read the stories uninterrupted on his computer’s screen, but also hold the writer accountable for hypnotizing him with his words.





अहा जिंदगी 

नई किताब

सच की कहानियाँ 

कहानी संग्रह चौराहे पर सीढ़ियाँ वर्ष 2012 की बेहतरीन किताबों की सूची में शामिल है। अपनी पहली ही किताब से नया कीर्तिमान स्थापित करने वाले किशोर चौधरी के इस संग्रह में चौदह कहानियाँ हैं। सभी में शुरू से अंत तक बांधे रखने का भरपूर सामर्थ्य है। हर कहानी का अपना रंग है। जो बहुत गहरे तक आपने मन पर अपनी छाप छोड़ जाता है क्योंकि कहानियाँ आपके आस पास की और अपनी सी लगती हैं। इन कहानियों की सबसे बड़ी खूबी है भाषा और शैली। किशोर चौधरी बहुत ही सरल शब्दों में नायक या नायिका के भावों को इस तरह प्रस्तुत करते हैं कि हर पात्र से हमें खुद को जुड़ा होने का का अहसास होता है। हर कहानी अपने आप में एक स्वतंत्र लोक है।...  हर कहानी कभी कविता सी बहती नज़र आती है तो कभी अपना अलग शब्द संसार गढ़ती नज़र आती है। सूक्ष्म से सूक्ष्म अनुभूतियों को इनमें मार्मिक अभिव्यक्ति मिली है। भिन्न भिन्न सामाजिक स्तर के प्रसंगों और अनुभवों से बुनी गयी यह कहानियाँ जीवन का एक अद्भुत कसीदा जड़ती है। इन में घर परिवार के जीवन को यथार्थ के साथ अंकित किया गया है। इन कहानियों को पढ़ने के बाद बार बार पढ़ने को जी चाहेगा। कहानियों के जाने कितने अंश दिल में समेट लेने की लालसा जगेगी। किताब की अधिकांश कहानियों में कभी आप अपने आपको देखनेगे कभी अपने कभी अपने जाने पहचाने चेहरों को। इन कहानियों की बुनावट और अंत भी सहज, लेकिन अप्रत्याशित होता है कुल मिलकर इस संग्रह के बारे में यह कहा जा सकता है कि इसकी सभी कहानियाँ आनंद देने वाली हैं। 


दैनिक जागरण

साप्ताहिक पुनर्नवा 

पुस्तक चर्चा - आभासी जगत की कमसिन प्रेम कहानियाँ 

किशोर चौधरी आभासी जगत के कथाकार हैं। किसी भी पत्र पत्रिका में कभी भी इनकी कहानियाँ नहीं छपी परंतु इनकी चौदह कहानियों का संकलन "चौराहे पर सीढ़ियाँ" आश्चर्यजनक ताज़गी और सौंदर्यबोध से पाठक को मोहविष्ठ कर लेता है। नितांत खुरदरे यथार्थ से टकरा कर लहूलुहान होती संवेदनाओं के ताने बाने से रची गई प्रेम कथाएँ जैसे मन में रूमानियत का मीठा अमल घोल देती है। इन कहानियों में भाषा संबंधी अद्भुत प्रयोग दृष्टव्य है जैसे "रात पखावज सी बज रही थी" या "सूखे पुदीने जैसी स्मृतियाँ थी। जिंदगी की चाक स्नेहा के स्पर्श से और भी गीली हो गयी थी।"

यदि आप किशोरवय की कलुष से अछूती, भोली भाली प्रणय अनुभूतियों में डूब जाना चाहते हों तो ये किताब अवश्य पढ़ें। निराश नहीं करेगी।

[श्री राजेंद्र राव] 

Reviewes for Chaurahe par Seedhiyan

A remarkable story collection

This wonderful story collection takes readers in an exceptionally joyful voyage of a colorful cosmos of human feelings and emotions. Writer constructs a multifaceted world of human psyche which consists of various emotions and feelings like love, happiness, desire, lust, hate, greed, anxiety, apathy, jealousy, pain, melancholy, pity, stress, confusion, angst, guilt and compulsions etc. This world is carefully conceived, crafted, weaved and enriched with literary endowments by Kishore. In the labyrinths of castles of these emotions anybody would love to get lost in. To walk on the lanes of this world is an unparallel experience. Most of the stories explore the very complex and convoluted psychological world lying between man and women of our time. Writer observes, experiences and perceives his surrounding very deeply. He sees something which is hidden, something which is not spoken but happened right within and beside us. KIshore’s pristine style of narration holds the unique capability to capture the unexpressed. This man can make Intangible entities which form the complex psychological world of ours speak, play, sing and dance. His words are like beautiful butterflies flying in the garden of emotions; his language is as adorable as colors playing on the canvas. His literary craft is just superb. Writer’s unique proficiency of expressing the subtlety of emotions through beautifully crafted imagery is something which will keep you reminding about him for a very long time. His skillfully crafted metaphors are so powerful that even non-living things and simple natural processes start pulsating with emotions and are forced to behave like characters of a play to communicate the feeling and emotions. In a time when repetition and imitation are not very unusual literary habits, Kishore breaks the ‘prison of prevalence’ at the level of language. He comes to us with an unfermented and pristine language. Gargiputra - Infibeam store 


A masterpiece waiting to sweep off the Hindi literary world...

if words and their composition have any kind of hypnotism power, Kishore Chaudhary certainly knows how to use it. Well, he has got mastery on this power and this first of his many upcoming story-books "Chaurahe Par Seedhiyan" is one hell of an example of this mastery...

I am a big fan of his writing since last four years or so and must have requested him thousand times to get his stories published, but this shy freind of mine wouldn't bother.Thanx to "Hind Yugm", finally the book is out and now the rest of the world will get to know KC's magic which have been wooing us for so long.just two days back, the book has been delivered on my door steps in superb binding and eye-catching cover...have started going through slowly lingering here n there, cherishing the flair, the poetic contrast of an otherwise lyrical prose as most of the stories have already taken me to an awestruck-mesmerised state of mind long back on his blogs. Whoever is reading through this review, JUST TRUST ME...CLOSE YOUR EYES AND PLACE THE ORDER...and then thank me :-) 

wish you all the best KC...and i am more than sure that "chaurahe par seedhiyan" is going to create some new kind of publishing history for Hindi literature...just wait n watch ! Gautam Rajrishi - Flipkart 

दिल को छू लेने वाली कहानियां, चौराहे पर सीढ़ियाँ..

‘चौराहे पर सीढ़ियाँ’ किशोर चौधरी जी की पहली किताब है, लेकिन पढ़ते हुए ऐसा लगा जैसे किसी महान लेखक की किताब पढ़ रही हूँ, ये किताब मेरे बुक शेल्फ की शोभा बढ़ा रही है, जहाँ पहले से बड़े बड़े लेखकों जैसे फणीश्वर नाथ रेनू, मुंशी प्रेम चंद, भगवती चरण वर्मा और धर्मवीर भारती जी की किताबें रखी हैं, किशोर जी की हर कहानी हमें एक अलग ही दुनिया की सैर कराती है, सरल शब्दों में वो नायक या नायिका के भावों को इस तरह प्रस्तुत करते हैं, के हर एक पात्र से हम खुद को जुडा हुआ महसूस करते हैं, हर कहानी शुरू से अंत तक बांधे रखती है, अगली किताब का इंतज़ार है. Nirja Kumari - Flipkart 

चौराहे पर सीढिया.....चढ़ते जाइए.....चाँद पर पहुंचना तय है.

बेहतरीन पुस्तक......एक बार हाथ में लेने के बाद आप रख नहीं पायेंगे.किशोर चौधरी बधाई के पात्र हैं इस सुन्दर पुस्तक ने सृजन के लिए... हर कहानी अपने आप में एक अलग संसार समेटे हुए.....एक अलग रंग लिए हुए.....कभी तो ये भी लग सकता है कि क्या ये सभी कहानियाँ एक ही लेखक की हैं??? अरसे बाद ऐसी उत्कृष्ट हिन्दी कहानी संग्रह हाथ आया है......आपके हाथ आएगा तो आप भी यही कहेंगे. शुभकामनाएँ. अनु Anulata Raj Nair - Flipkart 

Excellent

चौराहे पर सीढियां.....हर सीढ़ी धीरे धीरे मन में उतरती जाती हैं.....हर कहानी में गुम सी हो जाती हूँ बस....मन करता हैं बस बार बार पढते रहो....सच में किशोर जी कलम में जादू सा छा जाता हैं.....मन के भीतर तक समां जाती हैं किशोर जी लेखनी..... :-)

A review by Rajendra Rao, Literary Editor, Dainik Jagaran

प्रिय शैलेश भारतवासी जी,

आपके द्वारा कृपापूर्वक भेजा गया कथा संकलन 'चौराहे पर सीढ़ियां' मिला।आपके पत्र में दी गई जानकारी से चकित होकर इसे पढ़ना शुरू किया तो ऎसा मन रमा कि पढ़ता चला गया।इस पढ़त में कभी तो धारोष्ण कच्चे दूध जैसा स्वाद मिला तो कभी खट्टी कैरी जैसा।इससे पहले मैंने कभी किशोर चौधरी का नाम नहीं सुना था लेकिन इन कहानियों ने अपनी संरचना और टटकी हुई धारदार भाषा से लगभग मोहाविष्ट कर दिया।इनमें गजब की ताजगी और कमनीयता है।यह सचमुच आश्चर्य का विषय है कि यह खूबसूरती से पल्लवित हो रही प्रतिभा अभी तक प्रकाश में क्यों नहीं आई है।आभासी संसार बहुत क्लीनिकल और सेनिटाइज्ड है।इसमें जीवन के ताप से झुलसी त्वचा वाले कठोर पाठक कम हैं।मेरे विचार से किशोर चौधरी को हिंदी के रंगमंच पर अवतरित होना चाहिये।मैं भी अपने ढंग से प्रयास करूंगा। इस किताब से रू ब रू कराने के लिए आपके प्रति आभार व्यक्त करता हूं।

राजेन्द्र राव
साहित्‍य संपादक:
दैनिक जागरण पुनर्नवा

Chaurahe par seedhiyan : Available at all leading online stores 


About the author 

Kishore Choudhary is a writer and Radio Broadcaster from Barmer (Rajasthan). He may be living in a far-off place like Barmer (Rajasthan), but he has followers not only within the country, but also abroad. Through his two blogs, he has reached far and wide, 

Kishore is a classic example of what online media can do as a tool of communication, when you are practically sitting in the farthest end of the country, with no access to literary festivals and the likes. Kishore has created his fan following base purely out of his blog and he now has wide reader base coming to his blog from all across the globe. 

With simple yet unique metaphors drawn from the culture and place he belongs, Kishore writes about feelings that are universal - love, pain, loss, fear, loneliness, companionship, hope and fantasy. His stories are that of longingness, of relationships gone awry, of heartbreaks and betrayals, and yet there is a sense of hope and life that continues to flow. 

Most of the readers and followers that he has are from far-flung places and Tier II cities, who would want to read him but wouldn't know how to. Not only that, he has a wide listener base also, which is awaiting his work to be published. Kishore's columns in local newspapers of Rajasthan are immensely popular, and he is a known name in the literary circles. 

If his collection of short stories are available online, it is sure to find to many takers from across the Hindi hinterland. The number of followers on Facebook and the two blogs that he has stand testimony to that.
[Anu Singh Choudhary : Film maker, Journalist]


January 14, 2013

याद की रेज़गारी के बीच


एक बेपरवाही का पर्दा है। मुसलसल हवा की आमद के साथ हिलता है और धोखा होता है कि कोई आया। दीवार पर बीते दिन की महीन परछाई है। उड़ते हुये रंगों की याद का कोलाज है। फूल सा फाहा है स्मृति का। हालांकि नहीं लौट कर आता कुछ भी फिर भी दुआ भी कोई चीज़ है। जहां रहे खुश रहे, आक के डोडे से बिछुड़ा हुआ सफ़ेद पंख लगा उम्मीद सरीखा बीज सा पल। उदासियों की विदाई की कुछ बातें हैं, बेवजह बातें।

कि जिंदगी के बस्ते में रखी याद की रेज़गारी के बीच
एक चेहरा खड़ा है,
रुत बदलने की उम्मीद लिए खड़े किसी पेड़ की तरह।
* * *

याद करना चाहिए उस दुख को
जिसके साथ पहली बार आया था मुक्ति का खयाल।

मैं मगर दिल में रखता हूँ, गिरफ़्त होने की घड़ी को।
* * *

तुम यहाँ सिर्फ जी नहीं रहे हो
तुम हो यहाँ पर किसी विहंगम दृश्य को देखने के लिए नियुक्त पहरेदार
तुम में भरी है अद्भुत शराब।

तुम छूकर आए थे, एक लिफ्ट के आखिरी क्षणों में महबूबा के बाल।
* * *

और मेरी पसंद के बारे में पूछते ही
मैं खो गया रंगों के ऐंद्रजाल में
मगर उचक कर दिया मैंने जवाब कि सवाल ही गलत है।

इसलिए कि हर कोई जानता है
मेरा महबूब रख दे जिस रंग पर नज़र, मुझे वही पसंद है।
* * *

हमें
इससे कोई मतलब नहीं होना चाहिए
कि लोग मिलते हैं और खो जाते हैं।
* * *

प्रेम, एक अर्धचेतना का बिछौना है
भयावह रेतीले वर्तुलों में
चमकीली धातुओं के बारीक टुकड़ों की चौंध से भरा।

ये बातें किसी की स्मृति भर है कि
उसकी एक नज़र, कई ख्वाब, बुझ गया मायावी धोखा।
* * *

तुम्हारे बारे में सच क्या है?

आखिरी बार पूछा वर्दी पहने हुये आदमी ने
कि दुआ और उम्मीद के सिवा भी कुछ कहो।
* * *

उसने जकड़ लिया बाहुपाश में
चूमा बेतरह, उधेड़ दी बखिया उदासियों की
फिर मुस्कुरा कर बोला।

मैंने सुना है, अवसर एक ही बार आता है।
* * *

अचानक से एक उम्मीद विदा हो गयी
सूखी पत्तियों जैसी किसी आवाज़ में।

मैंने कहा
सुनो,
तुम सामने बैठे रहो तो हज़ार और उम्मीदें है मेरे पास।
* * *

कोई वजह नहीं उम्मीद के लिए कि 
उम्मीद को कोई वजह क्यों चाहिए होगी।
* * *

यात्रा के आख़िरी पड़ाव पर
हमें बिछड़ना चाहिए भय के साथ
भय एक दूजे को खो देने का।

मगर चीज़ें बनी है किसी मक़सद के लिए
मेरा मक़सद तूँ है।
* * *

[पेंटिंग की इमेज एक दोस्त के घर की दीवार से]

January 12, 2013

मैं इधर तन्हा बैठा हुआ हूँ

मैं रूआँसा हूँ। विवेकानंद चौराहे से आती माँ भारती की आरती के स्वर से आँख खुली। सुबह के छह बजे थे। हल्का उजास दरवाज़ों और पर्दों के बीच से जगह बनाता हुआ आ रहा था। मुझे लगा कि दो साल से टूटे फूटे चौराहे के बीच धूल मिट्टी से भरी आदमक़द प्रस्तर प्रतिमा पर अनेक फूलों की मालाएँ पड़ी हुई है। सामने बिछी हुई दरियों पर कुछ बच्चे और पीछे लगी हुई कुर्सियों पर वृद्ध लोग बैठे हुये हैं। मैं इन आवाज़ों को रिकॉर्ड कर लेना चाहता हूँ। इन आवाज़ों में सम्मोहन है। मैंने स्कूल यूनिफ़ोर्म में ऐसी प्रतिमाओं के फेरे लगाए हैं। मैंने लाउड स्पीकरों पर बजते हुये सुना है हिम्मत वतन की हम से हैं। इन शब्दों और सुरों ने मेरे पाँवों में जान फूंकी। चुपके से एक उत्साह मन में उतर आया। कोई शब्द मुझे नाचने जैसी ऊर्जा से भरता रहा है। कई बार मेरी आँखों की कोरों तक अपने वतन से प्रेम की नमी का दरिया आकर ठहर गया।

ज तीसरी रात है जब मैं ठीक से सो नहीं पाया हूँ। पिछली तीन रातें करवटें बदलते हुये, नामाकूल ख्वाब देखते हुये बीती। हरारत और उलझा हुआ मन लिए जागा। बड़ी मुश्किलों से ताज़ा सुबहों को बिताया। इन उलझनों को कोई नहीं समझ सकता है कि मनुष्य बड़ी सीमित बुद्धि के साथ इस दुनिया में आया है। वह सदा अपने लघुतम ज्ञान से इस आदमी के जटिल मन की थाह लेने की कोशिशें करता रहता है। अक्सर पाता हूँ कि जिनसे मेरी दुनिया बनती हैं वे मुझे मेरे हाल पर क्यों छोड़ नहीं देते। कैसा तो प्रेम होता है और कैसे किया जाता है? मुझे मालूम नहीं है। अवसाद की चुप्पी और अजनबीयत को बरदाश्त करना सीख पाना कठिन काम है। इसे तुम कभी सीख न पाओगे। मुझे यकीन है कि ज़िंदगी जा रही है। इसी पल चली गयी है, चली ही जा रही है।

व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे ।
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्‌ ॥

इस रास्ते पर उलझनें हैं, बेखयाली है, कोहरा है, नासमझी है कि ज़िंदगी मुझे कई सारी बातें एक साथ कह रही है। इसके कारण मेरी बुद्धि सम्मोहित हो गयी है। मैं अनेक बातों के बीच उलझ गया हूँ। मैं चाहता हूँ कि एक ही बात कहे। कायदे की बात कहे ताकि मैं कल्याण को प्राप्त हो सकूँ। मुझे मेहनतकशों और वतन के लिए लड़ने का पाठ पढ़ाया था। मैं इस पाठ को भूल कर रूआँसा बैठा हुआ इस वक़्त सिर्फ अपने पापा से बात करना चाहता हूँ। मैं उनसे पूछना चाहता हूँ कि पापा मैं रोने जैसा क्यों हूँ। मुझे किस चीज़ की कमी है। मैं कहाँ उलझ गया हूँ कि मुझे किसी से प्रेम, किसी से नफ़रत की हविश ही नहीं है। मैं कुछ न पाना चाहता हूँ न ही कुछ खोना। फिर ये सौदा क्या है। इसकी दीवानगी क्यों मेरे सर पर सवार है। मैं बेक़रार क्यों हूँ।

मुझ पर समाज के हाल का सदमा है। हालातों से लड़ रहे लोगों को देखते हुये उदास होने लगता हूँ कि मंज़िल बहुत दूर है। व्यवस्था एक पठार और आंदोलन इसे चीरती हुई जल धाराएँ। इस रूढ़िवादी, चारित्रिक रूप से कुपोषित, बदशक्ल हो रहे समाज को बदला ही जाना चाहिए। नौवीं कक्षा के तीसरे या चौथे पीरियड में पापा सामाजिक विज्ञान पढ़ा रहे थे। उन्होने कहा "जिसे हम धारण करते हैं, वह धर्म है।" सोच रहा हूँ कि मैंने क्या धारण किया हुआ है, उदासी। समाज ने क्या धारण किया हुआ है, दुश्चरित्र। राज्य ने क्या धारण किया हुआ है, भ्रष्टाचार। दुनिया ने क्या धारण किया है, लालच। हम सबका धर्म कैसा हो गया है।

मुद्दत के बाद उसने जो की लुत्फ की निगाह
जी खुश तो हो गया, मगर आँसू निकल पड़े।

कैफ़ी साहब मुझे ऐसा हाल भी किसी सूरत नज़र नहीं आता। न कोई निगाह होती है न कोई लुत्फ आता है। घबरा कर मयकशी को बैठो तो उसी से जी उचटने लगता है। बंद कमरे से बाहर खुली छत तक कुर्सी को खींच लाता हूँ। सर्द हवा में गालों पर कोई छूअन, रात के पहलू में कोई अजनबी तसव्वुर, बेहिसाब अंधेरे में रोशनियों के दीये, बीता हुआ ज़माना और बेड़ियों में जकड़े हुये आज के बीच, एक के बाद एक पैमाना खाली मगर वही हाल। सुकून गायब, सीढ़ियाँ उतर कर खाने की मेज तक सिर्फ इसलिए जाना कि देर से नीचे जाने पर उसे ज्यादा दुख होगा। उठने से पहले सोचता हूँ कि रात जा रही है और मैं इधर तन्हा बैठा हुआ हूँ। कभी सोचता हूँ कि उसे कह दूँ ऊपर का माला खराब हो चुका है। मैं अपने ही वश में नहीं हूँ। मैं होना ही नहीं चाहता हूँ।

कोई न दो आवाज़ मेरे नाम को कि मैं बरबाद हूँ। मैं फ़िनिश्ड हूँ और किसी उम्मीद में मैंने रेडियो की आवाज़ को तेज़ कर दिया।

January 10, 2013

कमअक्ल ये सब क्योंकर सोचता हूँ

शैतान की अक्ल भी जवाब देने लगी है। अच्छा खासा आराम की ज़िंदगी बसर कर रहा है मगर खयाल ऐसे लिखने लगा है कि कल को कोई कह दे, चलो बुलावा आया है। फिर सोचता है कि यूं भी ज्यादा से ज्यादा बीस एक साल बची है उम्र। साथ वाले कितने ही लोग बिना कुछ कहे निकल लिए है। हम जाते हुये दिल की बात तो कह कर जाएँ।

वो जो क़ाफ़िला है बख्तरबंद कारों का और घूमता फिरता है अपने ही वतन की गलियों में, अपने ही लोगों के चेहरों के बीच किस खौफ से घिरा है, क्यों इस कदर पेट्रोलिंग दस्तों में महफूज,  पायलट कारों के दिखाये रास्ते पर है बढ़ता, कौन है दुश्मन इन बख्तरबंद कारों में बैठे गोरे चिट्टे नाज़ुक लोगों का?

मैं सिपाही सीमा की सर्द चट्टानों पे बैठा सोचता हूँ
मैं सिपाही सीमा की तपती रेत पे बैठा सोचता हूँ।

वे खुशबाश गंधों से नहाये, शोफरों के सजदों से बेपरवाह, जिनके बस्ते नौकर उठाए, जो चल के जाएँ तो लगे कि गुलाबी रुई के फाहे उड़ते जाते हैं। उनके लिए ब्रितानी और अमरीकी स्कूलों के दरवाजे खुले हैं, वे कौन है बच्चे?

मैं सिपाही स्कूल जाते बिना पोलिश जूते पहने बच्चों को देखता हूँ
मैं सिपाही स्कूल जाते ट्रेक्टर में बैठे धूल सने बच्चों को देखता हूँ।

वे जो बाथ टबों में खिल कर के आयें, वे जिनका पसीना इत्र सा महके, वे जिनके कपड़ों का कोई ढब ही नहीं है, वे जिनसे डरते हैं खुद कानून वाले, वे जो जादू से भरी औरतें हैं, जिनको छूने की हिम्मत छली देवताओं की भी नहीं हैं, वे कौन औरतें है?

मैं सिपाही चूल्हे के पास बैठी एक भाभी को सोचता हूँ
मैं सिपाही चारे का गट्ठर उठाए थकी हुई औरत को सोचता हूँ।
हाँ सोचता हूँ कि ये एक ही मुल्क में क्या दो दो मुल्कों के लोग हैं रहते और ये किसका है सिस्टम ये किसने बनाया और क्यों कर इसे हम पाले जा रहे हैं लेकिन फिर सोचता हूँ कि मैं दसवीं पास कमअक्ल ये सब क्योंकर सोचता हूँ।

January 9, 2013

नहीं लौटना चाहता हूँ दम तन्हा

उन दो मामूली लोगों के लिए जिनकी याद में कीमती लोगों के मुंह पर थूकने को जी चाहता है


हाँ उनके ही लिए बहुत सारे दुख उठाने होंगे लोगों को
हाँ उनके ही खातिर, अगर आप करते हैं प्रेम अपने लोगों से।
इस वक़्त, अपना हाथ उठाना वे लोग
सिर्फ वे जो कह सके कि मैंने क्या बोया है
क्या खो दिया इस कोशिश में
किस तरह से लड़ा हूँ इसके लिए
सिर्फ उन्हीं के दिलों को हक़ है इज़्ज़त से सर उठाने का।

मुझे प्रेम है अपनी मातृभूमि से
मैं बहता हुआ आँसू हूँ, उन सिपाहियों के लिए जो न आ सके लौट कर
मैं हिकारत से देखता हूँ उन लोगों को जो उनके न लौटने की नाजायज वजह बने

कि मुझे नहीं खेला जाता आस्तीन के साँपों के साथ
कि ये कमजोरी है मेरे जींस के साथ आई है
कि मैं नहीं गया कंधार, मैंने नहीं गाया, कोई गीत आगरा का
कि मैं खराब हूँ किसी धतूरे के बीज की तरह, किसी बीज के बीच के लाल रंग की तरह
कि एक दिन हथियारों के खिलाफ हम लड़ेंगे सब्ज़े के लिए
कि एक दिन....

दुआ करूंगा कि रास्ते में न मिल जाएँ उन सिपाहियों के बच्चे
कि नहीं लौटना चाहता हूँ दम तन्हा, मैं अपने घर। 


January 8, 2013

नया साल मुबारक हो।


शाम हो आई है। सीढ़ियाँ चढ़ कर छत पर आते हुये देखा कि रोशनियाँ कोहरे के जादू को अपने आस पास गोल गोल बुन रही है। इसी मौसम में पिछले साल रात के दस बजे अमर कढ़ी उबाल रहा था और मैं विस्की का ग्लास थामे हुये रसोई में खड़ा हुआ साल उन्नीस सौ नब्बे को याद कर रहा था। जोधपुर के पास दईजर गाँव की पहाड़ियों में वक़्त के सितमों से अनजान लड़कों की मस्तियों और साथी लड़की कड़ेट्स के लिए असीम जिज्ञासा से भरी परछाइयाँ। कई बेतरतीब नगमे और सिपाहियों के चुट्कुले और अफसरान साहिबों जैसा बन जाने के हसरत लिए हुये बीतते दिनों की याद। ज़िंदगी है तो हादसे पेश आते ही रहते हैं, हादसे हमारा पीछा करते हैं। वे कभी कभी सामने से घेर कर हमें मार गिराना चाहते हैं। कुछ लोग अलग मिट्टी के बने होते हैं वे ऐसे हादसों के बाद उसे चिढ़ाना नहीं भूलते। इसलिए अमर कढ़ी बना रहा था तभी मैंने कहा- सरदारों को इतनी तल्लीनता से काम नहीं करना चाहिए। अमर ने मुड़ कर मुसकुराते हुये अपना ग्लास उठा लिया। उस सरकारी रसोई में दो बिहार से आए हुये प्यारे बच्चे काम कर रहे थे। वे मुझे देख कर मुस्कुराने लगे। 

आभा ने कढ़ी बनाई है। लाल मिर्च की चटनी भी। मैंने साबुत लाल मिर्च को पानी से धोया और फिर बीज निकाल कर उसे हल्का सा चौप करने को रख दिया था। लहसुन आधे आधे छीले माने आधे आभा ने आधे मैंने। उसकी तबीयत ज़रा उदास है। मैंने कहा- इस दुनिया में तकलीफ का कोई हिसाब नहीं होता है। ज़िंदगी हर हाल में मुस्कुराने का हुनर जानती है। ऐसी ही बातों में लाल मिर्च और लहसुन के साथ आभा ने हरा धनिया भी ग्राईंड कर दिया। उसे अच्छा नहीं लगा कि चटनी का लाल रंग कोई और रंग हो गया। मैंने कहा अगली बार चटनी में हरा धनिया ऐसे डालेंगे कि लाल चटनी में हरी पत्तियाँ साफ दिखती रहे। हालांकि जिंदगी को रिवाईंड करने का कोई तरीका नहीं है फिर भी आगे के लिए कुछ चीजों को ठीक करने की उम्मीद तो की ही जा सकती है। सिर्फ एक उम्मीद। 

दोपहर बड़ी गुंजलक थी। समझ नहीं आ रहा था कि अब तक की ज़िंदगी के दिनों को जिस दांव पर लगा दिया था वह सही था या गलत। वे कैसी जगहें थी जहां हमारे दिन और रात गिरते गए। उनकी खुशबू का कोई टुकड़ा कहीं बचा है क्या? दफ्तर के गलियारों में सूनापन था, जाहिर है कि चीज़ें एक दिन उन कामों को करना बंद कर देती है जिनके लिए वे बनाई गयी होती हैं। इसे भी तकसीम हुये कई साल बीत गए हैं। यहाँ कभी क़हक़हों और प्रोग्रेमरों के कदमों का शोर हुआ करता था। आज इसी जगह मैं बिदेस से आए दोस्त के एक फोन काल को सुनते हुये उसकी आवाज़ की पहचान को दर्ज़ करता हुआ तनहा टहल रहा हूँ। मैंने सोचा कि कितने तो ज़रूरी काम पड़े हुये हैं और मैं वक़्त के काले सफ़ेद खानों में उचकता हुआ सा कोई ठीक रास्ता बना ही नहीं पा रहा हूँ। मेरे पास कुछ कहानियाँ है, वे मेरे मेल में सेव की हुई है। मैं अगर शाम को घर जाने से पहले मर गया तो वे भी हमेशा के लिए मर जाएगी। अचानक लगा कि कोई दोस्त अपने पुराने मेल चेक करेगा और ब्लॉग फीड से आई किसी कहानी को खोज निकालेगा। मेरे मर जाने के बाद सब उन कहानियों की खूब खुले दिल से तारीफ करेंगे। कि ज़िंदा आदमी का कोई भरोसा नहीं होता है। आज उसकी तारीफ करो और कल उसका नामालूम 'चरितर' कैसा निकले। कल वह तारीफ करने वाले को ही नालायक कह बैठे। इसीलिए मैंने खुद को कहा कि ये कुछ ड्राफ्ट्स पड़े हैं इन पर काम कर ही लो। मरने के बाद फिर इसी कहानी कहने के काम में लगना कितना वाहियात होगा। 

शाम को जब घर आया तो मालूम हुआ कि दुष्यंत को पतंग और मंजा चाहिए। जयपुर में रेलवे स्टेशन जाते समय भी रास्ते में बहुत सारी पतंगों वाली दुकाने दिखाई दी थी। हमने उसे हर बार छेड़ा था। देखो दुशु पतंग की दुकान। वह अपनी एक खास मुस्कान के साथ एक दो बार बर्दाश्त करता और फिर कहता गाड़ी रोक लो न, खरीद लेते हैं। कानजी ने अपनी सब्जी की दुकान के पास वाली दुकान में कुछ पतंगें और चरखियाँ रखी हुई हैं। दुशु को काँच वाला मंजा चाहिए। ये एक सख्त कानून बनाने की इच्छा जैसा मामला है। वह चाहता है कि दखल देने और अनुशासनहीनता करने वाली पतंगों को सबक सिखाया जा सके। मैं कहता हूँ- बेटा काँच वाले मंजे से कई निर्दोष और बेज़ुबान पंछियों के पर कट जाते हैं। कानजी कहते हैं- अरे नहीं इस मंजे से करंट आ जाता है कि इसके ऊपर काँच लगा होता है। एक सौ चालीस रुपये में पाँच पतंग एक मंजे से भरी चरखी, एक खाली छोटी चरखी लेकर हम घर आ जाते हैं। अभी ये सारा सामान करीने से मेरे सामने वाले आले में सजा हुआ है। अब इस कमरे में दो तरह की चीज़ें हैं। एक पतंग उड़ाने से जुड़ी हुई दूसरी शराब और किताबें। शराब अच्छी नहीं बची है। सिर्फ रॉयल स्टेग की दो बोतलें हैं। पतंगों के बारे में कुछ कहना मेरे बूते की बात नहीं है। 

मैंने अच्छी कवितायें सिर्फ इसलिए लिखी कि मैं प्रेम करता हूँ। मैंने बुरी कवितायें इसलिए नहीं लिखी कि मैं प्रेम नहीं करता था। बीते सर्दी के मौसम में एक लड़की मिली थी। उसके दिमाग में कुछ अजब तरह के रसायन थे। वह अपनी उम्र से ज्यादा सोचा करती थी। मैं उसके बारे में सोचते हुये डरता था। उसके लिए एक कविता में लिखा था कि पगले ज़हीन होना भी एक रोग है। वक़्त का बे-पटरी का पहिया घूमता रहा और मैं उससे मिलकर बिछड़ गया। ये ज़िंदगी का ही उसूल है। चीज़ें और रिश्ते जब तक आभासी हों प्यार बना रहता है। जब वे हक़ीक़त में ढलते हैं तो उनको बचाए रखने लिए बहुत सारे एफर्ट करने होते हैं। लेकिन अक्सर मालूम ये होता है कि उसे जाना कहीं और था मुझे कहीं और। लेकिन ये वो झूठ होता है जो हम खुद से बोलते हैं, सच ये होता है कि हमने एफर्ट लेने बंद कर दिये होते हैं। अच्छी बात सिर्फ ये होती है कि हम उन दिनों में भरे भरे रहते हैं। जैसे उसके फोन नंबर मांगने से लेकर सेलफोन पर चमकते हुये उसके नाम को देख कर खुशी से चौंक उठते हैं। बाद महीनों के उसका नाम नहीं चमकता और हर तरफ एक उदासी आ बैठती है। ना मैं हाल पूछता हूँ ना वो हाल पूछती है। याद मगर आता है कि बेहतर लिखने को एक खयाल भर ही काफी है। 

अभी जब से इधर बैठा हूँ बहुत सारी कवितायें लिखने का मन हो रहा है। कई दिनों से पुरानी कवितायें अपने फेसबुक पन्ने पर लगा रहा हूँ। नए नए दोस्त आ रहे हैं। वे लाइक करते हैं तो मैं खुश हो जाता हूँ कि चलो मेरी बात किसी और के दिल की बात भी है। वे सब अच्छे हैं मगर मैं ज़रा बुरा बुरा सा हूँ। जैसे मैं अभी चाहता हूँ कि ये लिखना बंद करूँ और विस्की का एक पेग बना लूँ। ऐसा इलसिए नहीं कर रहा हूँ कि फिर जाने क्या लिखने लगूँ। होश में होने का भरम भी बड़ा अच्छा भरम होता है। आप इसे भ्रम भी कह सकते हैं। अचानक से आप पाते हैं कि आप इगनोर हुये जाते हैं। अक्ल कहती है कि चुप रहो, दिल कहता है कह दो कि तुम सिर्फ दोस्त ही नहीं हो, तुमसे प्यार भी है। फिर इस तरह के बेढब स्पीड ब्रेकर्स से गुज़रने की उम्र विदा हो चुकी है। आज मगर दफ्तर के आहाते में लगी बेरी के बेर खाते हुये खट्टे दिनों की खूब याद आई। मिट्टी में गिरे हुये बेर उठा कर जींस से रगड़ते हुये सोचा कि कोई प्यार करता है तो क्या और न करता हो तो क्या? 

यूं तुम उदास न होना कि फरेबी बातें करने में भी बड़ा मजा है। नया साल मुबारक हो। 
* * *

बीते साल के आखिरी दिनों की ये तस्वीर तोषी की है। आपका पूरा नाम कबीर चौधरी है। आप हैरत से इतनी रंग बिरंगी गेंदों को देख रहे हैं और समझने की कोशिश मैं है कि आखिर पापा और मेरे भाई बहन कर क्या रहे हैं। 

आवाज़ के कुछ टुकड़े

के सी

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Kishore Choudhary is a poet and fiction writer from Barmer (Rajasthan). His writing career took a formal leap from his personal journals to make him a hugely popular blogger on two of his blogs- Kahaniyan and Hathkadh.

Having spent most of his formative years in the desert, the life there is his favourite canvas to contextualise his poetry and stories. His followers from across the world vouch for his realistic and authentic portrayal of the desert life and its typical dilemmas, fused beautifully and almost effortlessly with some stunning images of the desert and its folklore.

Kishore in a way pioneered the incorporation of pre-publishing interactions and feedback with his readers on his blogs and across social media platforms in his final works. His style is known for its lucid and unexampled metaphors that he exquisitely uses to express universal feelings like love, loneliness, hope, pain, longing and fantasy. 

His first collection of stories Chaurahe Par Seedhiyan (2012)was such a thumping bestseller that the first issue was sold out within 50 days of its launch.All the stories skilfully bring the rich and exotic background of the desert come alive and make the reader delve deeper into the layers of human emotions.This much sought after collection raised the bar for all contemporary Hindi works of short fiction and brought in a fresh change in the existing status quo for Hindi short stories. 

The second collection titled Dhoop Ke Aaiyne Mein(2013)had an array of short stories that looked at life through a multi-dimensional prism, lending each one of them a distinctive charm. Kishore being a poet first, his stories are more like poetic fiction. Having a great affinity to the stream of consciousness novels by English literary greats like James Joyce and Virginia Woolf his stories defy the conventional rules of a definitive beginning, middle and end. 

Kishore’s first publication was a collection of poetry Baatein Bewajah, an alluring and bewitching series of short poems which capture the vast expanse of human emotions and have images that have a rare haunting quality.

Kishore is a Radio Broadcaster by profession and has a special fondness for classical & folk music. Articles about him and his interviews are available across many major newspapers and websites. Kishore certainly is the Avant-garde flavour in contemporary Hindi writing and his ever expanding avid readership eagerly waits for his next chartbuster.

Kishore's latest is another collection called "Jaadu Bhari Ladki". This collection has his same imitable style of stories but the contexts and places are beyond the desert as well. 
His deep understanding of the complexity of modern relationships and how they play out in our minds, homes and workplaces makes it a very unique almost post-modern work in Hindi Fiction.

http://www.goodreads.com/author/show/7361739.Kishore_Chaudhary

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Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने या खूबसूरत स्त्री को इरादतन चूमने जितना ही अवैध है.

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