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Showing posts from May, 2017

मालूम था कि तुम मेरे नहीं थे

तुमने मोहा, गले लगाया. चूमा. तुम गये तो ज़िन्दगी को आंसुओं, बेचैनी और इंतज़ार से भरकर गए. तुम न होते तो खाली-खाली जीवन को लेकर जाने कहाँ-कहाँ भटकना पड़ता.
जीवन को इतना आसान कर देने के लिए मेरे दयालु सद्गुरु तुम्हारा आभार.  * * *
पुराने रेलवे स्टेशन से बाहर आने वाले गलियारे के आखिरी छोर पर सुबह उतर रही थी. रेलवे स्टेशन के सूनेपन को तोड़ने के लिए कोई न था. इतने बड़े शहर में भीड़ गुम थी. दायीं तरफ कुछ दूर आकर रुकी एक कार ने इस नीरवता को भंग किया. इसके साथ ही आगे पीछे से कुछ लोग गुज़रने लगे. ऐसा लगा कि ठहरे हुए समय की रुकी सुई को किसी ने आहिस्ता से छू दिया. और ठहरी ज़िन्दगी चल पड़ी.
अपने जूतों पर जमी बारीक धूल को देखकर ज़रा नज़र उठायी तो देखा कि कार के अगले दरवाज़े से एक आदमी उतर रहा था. पिछली खिड़की से एक हाथ हिल रहा था. दिल धक् से एक बार धड़क कर देर तक ठहरा रहा. तुम्हारी साफ़ कलाई से बंधी घड़ी का काला पट्टा किसी धागे की तरह चमक रहा था.
उस हाथ के सिवा कुछ नहीं दिख रहा था मगर जाने क्यूँ लगा कि तुम मुस्कुरा रहे हो. तुम्हारा मुस्कुराना सोचकर मेरी आँखें पनियल होने लगीं.
मैंने चाहा कि तुमसे रुख फेरकर वापस च…

बाद मुद्दत के अपने घर

बालकनी की जाली से एक काली चिड़िया पिछली कुछ शामों से आ रही थी. जब हम इस घर में नहीं रहते तब भी आती होगी. वह वाशरूम के एग्जास्ट के पास के कोने में दुबक कर बैठती है. मैं शाम होते ही बालकनी में आता हूँ. हम दोनों एक दूजे को देखते हैं. वह सोचती होगी कि ये अचानक कौन चला आया है.

बाद मुद्दत के अपने ही घर लौटने से सवाल खत्म नहीं हो जाते हैं.

सोफ़ा कवर से ढका रहता है मगर गर्द फिर भी आती है. कवर हटाते ही एक धूसर परत दिखती है. कॉफ़ी टेबल के नीचे रखी एक मैगजीन और एक उपन्यास भी उतनी ही धूल से भरे रहते हैं. जितना हमारा बिछड़ना होता है. तुम्हें पता ही होगा कि इंतजार में भी कोई अकेला नहीं होता. तन्हाई कम करने को सब पर गर्द आती रहती है.

अगर फूल कह देता

कनॉट प्लेस के इनर सर्कल में एक पेड़ गहरे लाल फूलों से भरा समाधिस्थ था। हवा के झौंके आते। पेड़ के फूलों को चूमते और चले जाते। फूल इसी चूमने से प्रसन्न होकर हवा के पीछे उड़ने लगते। मैंने चाहा कि एक फूल को अपनी अंगुलियों से छूकर पूछूँ- "ये तुम किस ख़ानाबदोश के प्रेम में गिरे। तुमने सोचा तक नहीं कि हवा है और हवा का ठिकाना क्या है?" मैंने फूल को नही उठाया। इसलिए कि अगर फूल कह देता "बाबू, तुम क्या जानो प्रेम?" तो मैं क्या जवाब देता।
"बहुत गर्मी है।" कल दोपहर ऐसा कहते हुए आदमी ने पसीना पौंछ कर उदास मुँह बना लिया। उसके पास खड़े आदमी ने कहा- "हाँ" मैंने देखा कि दोनों आदमी स्वस्थ थे और एक मामूली सी गर्म रुत से परेशान थे। क्या सचमुच आदमी केवल सुख से छींके में पड़ा रहने को दुनिया मे आया है?
मैं जब छुट्टियों पर होता हूँ तब मुझे बेवजह पैदल चलना। नए लोगों को देखते जाना और शाम को दोस्तों के साथ बिता देना। बस यही अच्छा लगता है। आज की सुबह अच्छी है। बादल हैं। अचानक बारिश की छोटी बूंदें गिरने लगती हैं। मैं पैदल चलते हुए रुक कर सड़क पर चलते लोगों को देखता हूँ।
मेरे सामने…

जहां पिछले बरस

वो साल भर पहले का ठीक यही दिन था। सुस्त क़दम चलते। प्लेटफॉर्म पर अनमने खड़े। रेल गाड़ी का इंतज़ार करते हुए। अजनबियों से उचटी हुई नज़र अतीत में कहीं झांक रही थी। आज वहीं हूँ। सोचता हूँ कि जीवन कितने अचरजों से भरा है। पिछले बरस इसी समय, इसी प्लेटफार्म पर था। उसी रेलगाड़ी की प्रतीक्षा कर रहा था, जिसमें आज जाना है। उसी जगह, जहां पिछले बरस गया था।

लेकिन जीवन जो था, अब बहुत बदल गया है। मैं अपने होठों पर मद्धम मुस्कान देखता हूँ। इतनी सी कि जिसे केवल मैं देख सकूँ। शुक्रिया कहता हूँ।

अकसर अनजाने हम ग़लत फैसले करते हैं। इसमें कुछ ग़लत नहीं है। ऐसा होता रहता है लेकिन जब हम ये जान लें। उसके बाद भी वहीं बने रहें। हालात को कोसें। किस्मत जैसी किसी सुनी-सुनाई चीज़ को दोष दें। ये ग़लत है।

उस रोज़ थकान थी। कैसलापन था। ऊब थी। घृणा थी। आज कुछ नहीं है। अभी ट्रेन में बैठ जाऊंगा और मेरे पास एक लंबी कहानी है, बीस हज़ार शब्दों की। उसे ठीक करूँगा। कहीं- कहीं गैरज़रूरी ब्यौरे हैं। कहीं कहानी के प्रवाह को तोड़ने वाले वाक्य हैं।

अगर चार्जिंग पॉइंट न मिला तो मेरे पास एक चार सौ पन्नों का उपन्यास भी है। कभी- कभी जब हम बोझ उतार द…

काश! ऐसा होता

राजमार्गों से रास्तों,
हरीतिमा से सजे पैदल पथों,  किनारे बने भव्य भवनों के ठीक बीच  विलासी प्रदर्शन से ऐंठे बाजार के छोटे शराबघर में  बीच की टेबल पर उतरी दोपहर थी।

मगर लगता ऐसा था  कि दुनिया के किसी छोर पर बैठे हैं। 
और इसके सिवा कुछ नहीं चाहिए। * * *


स्मृति ही समझ सकती है स्मृति को।  दुःख ही जानते हैं दूसरे दुःख को।

काश! ऐसा होता। * * *

उस शाम की ड्राइव में कई चीजें हमसफ़र हो गयी। तेज़ हवा, धूल, उड़ते हुए पत्ते और ज़रा दूर चमकती बिजली बाद पूरे बरस के एक शाम, कभी नहीं बुझती।

जाने को कह देंगे?

मैं उनसे कहता हूँ- "क्या पाओगे? किसी उदासी में करीब बैठोगे. किसी गहरी थकान में अपना सर कंधे पर रख दोगे. किसी गहरे दुःख को कहने लगोगे. किसी यकीन में कहोगे, मेरा हाथ न छोड़ना. इसके बाद..."

"इसके बाद?"

"जैसे पहले बहुत से लोग करते आये हैं. कुछ रोज़ सबकुछ भूलकर दीवाने रहे और बाद में चले गए. वैसे चले जाना होगा"

"तो आप जाने को कह देंगे?"

"नहीं. आपका मुझसे जो सम्मोहन है. वह पूरा हो जायेगा."

"फिर?"

"फिर कुछ नहीं. सबके पास नए सम्मोहन होते हैं, सबके पास हज़ार बहाने और झूठ होते हैं, किसी को भी कोसने के लिए."

"आपको ये सब लगता है? तो ये भी लगता होगा कि आपको बदनाम किया जायेगा."

"नहीं ये नहीं लगता. इसलिए कि बदनामी तो उस बात में होती है, जिसको छिपाना पड़े. मैं तो सबसे कह देता हूँ कि हाँ ऐसा किया था."

शाम की नीरवता फोन में भी पसर जाती है.
* * *

आज की सुबह सवा दस बजे थे. कितनी अजीब बात है न. ऐसा तो रोज़ होता होगा. अगर कोई ज़िन्दा रहे और होशियार हो तो हर सुबह देख सकता है कि सवा दस बजे हैं. कई बार कुछ वक़्त के पैमाने ऐसी …

ख़ुश होकर जाओ

मैं था तो शागिर्दी के लायक भी नहीं  मगर उनकी फ्रेंड रिक्वेस्ट आ गयी है.
फेसबुक पर फ्रेंड रिक्वेस्ट वाले बटन पर लाल बत्ती चमकी तो देखा कि सआदत हसन मंटो साहब की ओर से दोस्ती का हाथ आया है. ज़रूर उनके किसी चाहने वाले ने ऐसा किया होगा. 
सआदत हसन मंटो ने अफ़सानों से एक लकीर खींच दी थी. जिसके उस पार अगर दुनिया जा सकती तो मंटों नहीं रोकते. बरसों से दुनिया वहीँ पड़ी हुई थी. वे मेरे कॉलेज जाने से साल भर पहले के दिन थे. फिर कॉलेज जाने लगा तब ख़याल आता था कि इक्कीसवीं सदी आ रही है और मंटो की कहानियां गुज़रे ज़माने की याद भर बनकर रह जाएँगी. मुझे कहाँ समझ थी कि इस रहती दुनिया को उस लकीर के इस तरफ ही जीना है. जहाँ वही सब है जो मंटो लिख गए. मंटो के ज़माने से भी तेज़ कदम और बे हया.
कल मंटोमयी फेसबुक को देखना सचमुच अच्छा था. इधर एक दोस्त ने अपनी पोस्ट को हैशटैग ही मंटोमई दे दिया था. मानो मई का महीना हो तो मंटो के नाम ही होना चाहिए. उन्होंने मंटो के नाटक पढ़ते हुए उनके कुछ हिस्से शेयर किये. वे कुछ एक संवाद पढना ही गहरी सोच में डूब जाने को काफी था. उन पोस्ट्स के साथ मंटो की कहानियों का एक काफिला कदमताल करता हुआ…

दुःख एक अश्लील चुटकला है

कभी-कभी होता तो इसे भूल कह लेता
मगर मैंने दुखों को अक्सर आगे बढ़कर चूमा है.

बुद्ध का बताया तीसरा आर्यसत्य है- दुःख निरोध. कारण के होने पर ही कार्य उत्पन्न होता है. अतः कारण के न रहने पर कार्य भी नहीं रह सकता. दुःख कार्य है अतः उसके कारण को दूर कर देने पर दुःख का निरोध संभव है.
मैंने इंटरनेट नहीं त्यागा. मैंने व्हाट्स एप को त्याग दिया. इंटरनेट जीवन सदृश्य है. व्हाट्स एप उस पर आश्रित उत्पाद है. इंटरनेट ही त्याग दिया होता तो समस्त दुखों से मुक्ति हो जाती. किन्तु प्रकृति के विरुद्ध जाकर, हमें जीवन का त्याग नहीं करना करना चाहिए. वह जिन संयोगों से हमें मिला है, उनके वियोग में परिवर्तित होने के समय तक प्रतीक्षा करनी चाहिए. इसलिए इंटरनेट बना हुआ है. व्हाट्स एप साल भर पहले अनइंस्टाल कर दिया है.
दुःख के त्याग में कुछ दिनों तक प्रतिबद्धता बनी रहती है. स्वयं का निर्णय है. कुछ और दिन बाद वे दुःख स्वयं को याद दिलाने पड़ते हैं. जिनके कारण व्हाट्स एप को विदा कहा था. उसके और कुछ महीने बाद अचानक किसी दोपहर, शाम या रात. या कभी नीम नशे में, या किसी पुरानी टीस के उभरने से बेहद खालीपन पसरने लगता है. मन कहीं…

उसी की शर्तों पर

प्रेम को लाख सरल कहो, मगर हज़ार आफ़तें हैं।

बोरोसिल का ग्लास खाली हो तो लुढ़क जाता है। अगले झौंके में चप्पल उड़ जाते हैं। ज़रा और बेख़याल रहो तो स्नेक्स का डिब्बा लुढ़कने लगता है। पूनम की रात है। हवा तेज़ है।

रेगिस्तान में उसी की शर्तों पर जीना पड़ता है।

[Painting courtesy : Jill Karsner]

एक बेहद पुरानी स्मृति

“कभी ऐसा हुआ कि हवा की आवाज़ में, चिड़ियों के शोर में, चारा काटने की मशीन में, पास से गुज़री मोटरकार की घरघराहट में, दूर कहीं मजदूर की गेंती की चोट में, कहीं भी, किसी भी, कैसी भी आवाज़ में केवल एक ही नाम सुनाई पड़ा हो?”

उसने क्षणांश में कहा- “हाँ”

उसके हाँ के पूरा होने से पहले ही कहा- “फिर सचमुच तुम जानते कि प्रेम होता है तो फिर किस कदर होता है. और शैतान को क्यों सुनाई पड़ता है. शैतान की प्रेमिका, शैतान की प्रेमिका, शैतान की प्रेमिका.”

ये सुनकर क्षणांश में उत्तर देने वाले चेहरे पर एक बेहद पुरानी स्मृति की लम्बी छाया फैल गयी.

चीज़ों के प्रति क्षोभ

कभी अचानक आवरण के भीतर झांकने की लत लग जाती है. फिर चीज़ों को बिना खोले भीतर से देखने लगते हैं. जैसे कोई चित्रकार पहले स्केलेटन बनाना सीखता है. उसके बाद मांस-मज्जा. फिर वह कटाव बनाता है. फिर एक ऐसी शक्ल सामने आती है, जिससे हमारा रोज़ का वास्ता होता है. हम चित्रकार नहीं होते हैं. इसलिए देखी हुई चीज़ों को जब उलटे क्रम में खोलते हैं. तब ख़ुद को याद दिलाना चाहिए कि ये सीखना नहीं है. ये असल में चीज़ों के प्रति क्षोभ है. ये उनको नकार देने की हद तक जान लेने की चाहना है.

हम तेज़ी से बदलते हैं, हमें इसपर कड़ी नज़र रखनी चाहिए.