February 16, 2017

कुछ फूल बैंगनी

इस दुनिया में
ये कितनी अच्छी बात है
कि जिसे हम चाहते हैं,
उसे आवाज़ भी नहीं दे सकते।

वरना एक रोज़ सब ख़त्म हो जाता।
• * *

अगर हमें न मिलते घटिया अध्यापक
तो कोर्स की किताबों के सिवा कुछ नहीं सीख सकते थे हम।
• * *

कभी कभी हम सोचते हैं
कि यही सब मुमकिन है।

वो सोचता क्या, चाहता क्या और करता क्या है
ये कभी सोचा नहीं जा सकता।
• * *

कुछ फूल बैंगनी
और संकेत विदा का।

इतनी भर ज़िन्दगी।
• * *

February 11, 2017

जोगी तुम्हारा घर इतना दूर क्यों है


दिल बीते दिनों के गट्ठर से कोई बात पुरानी खोजता है. एक सिरा सुलगा देता है. बात सुलगती रहती है. जैसे मूमल का इंतज़ार सुलगता था. महबूब ने काश पूछा होता कि "ओ मूमल तुम किसके साथ सो रही हो." एक धुंधली छवि देखकर हार गया. इस तरह गया कि लौटा तक नहीं. आह ! मोहोब्बत, तुम जितनी बड़ी थी. उतनी ही नाज़ुक भी निकली. 

सूमल देखो
हवा उसके बालों से खेल रही है
बिना पासों का खेल.

उसके ऊंट का रंग
घुलता जा रहा है शाम में.

वो अभी पहुंचा नहीं है किले की घाटी के पास
फिर ये कौन चढ़ रहा है
मेरे दिल की सीढियों पर.

ये किसकी आवाज़ है
धक धक धक.

मेरी बहन मूमल
ये ढका हुआ झरोखा काँप रहा है
तुम्हारे इंतज़ार से.

* * *

ओ सूमल
कौन संवारता होगा उसकी जुल्फें
जो मैं बिगाड़ कर भेजती हूँ.

कितने आईने चटक गए होंगे अब तक
उसके चेहरे पर मेरी रातों की सियाही देखकर.

मेरी कितनी करवटें झड़ती होंगी
उसके सालू से.

मेरी बहन मूमल
वो कहाँ जाता है हर सुबह
वो कहाँ आता है हर रात

तुम्हारी कमर में हाथ डालती हैं कच्ची रातें
तुम्हें बोसे देती हैं सुबह की हवा.

पिया जितना पिया
उससे बड़ा उसका स्मरण है.
* * *

सूमल
मेरा जी चाहता है
लिख दूँ उन सब चिड़ियों के बारे में
जो बैठी रहती हैं झरोखे के पास.

लिख दूँ रोज़ शाम जलने वाले
अलाव की आंच को.

लिख दूँ कानों में सरगोशी करती हवा के शब्द
कि तुम भीग गयी हो जान.

आह मूमल
पानी ही बरस रहा है इस रेगिस्तान में
तुम तप रही हो प्रतीक्षा के ज्वर से.
* * *

February 10, 2017

पतनशील पत्नियों के नोट्स

फरवरी का पहला सप्ताह जा चुका है मगर कुछ रोज़ पहले फिर से पहाड़ों पर बर्फ गिरी तो रेगिस्तान में भी ठण्ड बनी हुई है. रातें बेहिसाब ठंडी हैं. दिन बेहद सख्त हैं. कमरों में बैठे रहो रजाई-स्वेटर सब चाहिए. खुली धूप के लिए बाहर आ बैठो तो इस तरह की चुभन कि सबकुछ उतार कर फेंक दो. रेगिस्तान की फितरत ने ऐसा बना दिया है कि ज्यादा कपड़े अच्छे नहीं लगते. इसी के चलते पिछले एक महीने से जुकाम जा नहीं रहा. मैं बाहर वार्मर या स्वेटर के ऊपर कोट पहनता हूँ और घर में आते ही सबको उतार फेंकता हूँ. एक टी और बैगी पतलून में फिरता रहता हूँ. याद रहता है कि ठण्ड है मगर इस याद पर ज़ोर नहीं चलता. नतीजा बदन दर्द और कुत्ता खांसी. 

कल दोपहर छत पर घनी धूप थी. चारपाई को आधी छाया, आधी धूप में डाले हुए किताब पढने लगा. शादियों का एक मुहूर्त जा चुका है. संस्कारी लोगों ने अपनी छतों से डैक उतार लिए हैं. सस्ते फ़िल्मी और मारवाड़ी गीतों की कर्कश आवाज़ हाईबर्नेशन में चली गयी है. मैं इस शांति में पीले रंग के कवर वाली किताब अपने साथ लिए था. नीलिमा चौहान के नोट्स का संग्रह है. पतनशील पत्नियों के नोट्स. 

तेज़ धूप में पैरों पर सुइयां सी चुभती हैं. मैं उनको बारी-बारी से धूप में रखता हूँ और किताब पढता जाता हूँ. संग्रह के पहले अध्याय के नोट्स का शीर्षक है क़ैद में है बुलबुल. मैं बुलबुल के ख़याल से बाहर दूजी जगह पहुँच जाता हूँ. वह जगह है बाबा मोहम्मद याहया खान का एक नावेल. पिया का रंग काला. वहां पर कहानी रहस्यमयी है. बचपन में एक नन्हा सुनहला दिखने वाला प्यारा सा सांप जैसे जैसे बड़ा होता है, उसकी रंगत काले रंग में बदलती जाती है. अंततः वह भयावह काला, विशालकाय और बेहद डरावना हो जाता है. उसके पूरे स्याह बदन में केवल आँखें सफ़ेद होती है. वह सांप जब चाहे आदमी-औरत का रूप धारण कर लेता है. इस रहस्य और जुगुप्सा से भरी कहानी की याद नीलिमा चौहान के नोट्स के साथ आना मुझे हैरत में नहीं डालता. 

हमारे बचपन की नन्हीं जिज्ञासाएं एक रोज़ भयावह कामुक अपराधों भरी सोच में बदल जाती है. औरत और आदमी का जीवन सहगामी है. किसी एक के बिना क्या जीवन. मैं साफ़ आसमान में कुछ सफ़ेद फाहे और क्षितिज पर बादलों की एक लकीर देखता हूँ. सोचता हूँ कि आदमी और औरत ही क्या, हर एक जो हमारे जीवन से गायब हो उसके बिना कितना अधूरा सा होता है. पंछियों, बादलों, तारों के बिना आसमान भी कैसा होता? एक और सवाल आता है कि आदमी और औरत के बीच कुदरती भिन्नता अथवा पूरक होने का ये सुन्दर सहज रूप शोषक और शोषित के दो खेमों में क्यों बंट जाता है. इसका भान बहुत देर से और बहुत कम लोगों को क्यों होता है. कम ओ बेश कुंठाएं पल्लवित होती जाती हैं. समाज का आदमियों के वर्चस्व वाला खेमा उनको अपनाता जाता है. इस पर किसी को कोई अचरज नहीं होता, कोई लज्जा नहीं आती. याहया खाना साहब के नन्हे सुनहले सांप की तरह काम इच्छाओं का नन्हा सुनहला सांप बड़ा होकर क्या कुछ निगल जायेगा, इसकी कल्पना कोई नहीं करता. हम नहीं सोचते कि लस्ट, पोर्न और सेक्स के स्याह अँधेरे से रिस रहा आसव आदमी और औरत के बीच कैसा लिजलिजा सम्बन्ध स्थापित करता है? 

मैं और बेटी दो दिन पुस्तक मेला में घूमें. कुछ मेरे दोस्त हैं, उनसे मिलने और बतियाने का सुख बटोरा. तीसरे रोज़ हमें कुछ किताबें खरीदनी थीं. उनमें से एक किताब ये भी थी. पतनशील पत्नियों के नोट्स. कहीं किसी अख़बार या पत्रिका में छपे नोट्स में से कोई एक दो नज़र से गुज़रे होंगे. तभी सोचा कि ये संग्रह पढना चाहिए. पहली नज़र में किताब को देखते ही आपको राजकमल से आई रविश कुमार की किताब की याद आयेगी. आवरण का रंग, रेखांकन और छोटे-छोटे नोट्स. हालाँकि इश्क़ में शहर होना, उन लम्हों की कल्पना है. जो रविश जी नहीं पाते और दुनिया को अपने पत्रकारिता जैसे काम के बाहर देखते हुए रचते हैं. वे लघु प्रेम कहानियां हैं. ऐसी कहानियां जो आपको शहर के भूगोल की प्रोपर्टी पर बिठा देती है. वहां से आपको जीवन की छूटी हुई अनुभूतियों की छोटी गहरी याद दिलाती है. उस किताब में भी सुन्दर रेखांकन हैं. ऐसा रेखांकन की कई बार आपको लग सकता है किताब के दो बराबर के हिस्से हैं. एक लेखक का दूसरा चित्रकार का. रविश हर दिन हर पल समाज के छिछले ओछे आवरणों से रु ब रु होते हैं और उनको सवाल की शक्ल में हमारे सामने रखते हैं. तो उनकी लघु प्रेम कहानियाँ ये आशा दिखाती है कि इस आदमी को अबतक रुखा और कठोर हो जाना चाहिए था लेकिन बचा हुआ है. पतनशील पत्नियों के नोट्स वाली नीलिमा जी प्रोफ़ेसर हैं और उनका सामना बच्चों से होता है. वे ऐसी चिंताएं करती हैं जो आने वाली पीढ़ी के लिए हैं. वे आज को लिखकर सवाल करना चाहती हैं कि कल को कैसा बनाओगे. इस किताब में सुन्दर रेखांकन हैं. अपराजिता शर्मा ने हमारे दिमाग में बसी फूहड़ छवियों को कोमलता से शालीन और ज़रूरी छवियों में बदल दिया है.  

इस तरह धूप-छाँव में लेटे पढ़ते हुए, मुझे अचानक से याद आता है कि रूमी ने कहा कि जहाँ कहीं खराबा है उम्मीद का खजाना भी वहीँ हैं. पतनशील नोट्स पढ़ते हुए एक संत कवि दार्शनिक की कही बात का याद आना फ़ौरी तौर पर बेवजह लग सकता है. कहाँ ये पतनशील बातें और कहाँ वह आध्यात्म से भरा सूफी जीवन. लेकिन ये इसलिए याद आता है कि हम खराब हो चुके हैं और मैं इस खराबे में उम्मीद तलाशना चाहता हूँ. नोट्स का संग्रह औरत के शरीर, काम और इच्छाओं के विज्ञापनी संसार से खींचकर आपको उस जगह ले जाता है, जहाँ से आपकी चाहनाओं और हरकतों की बद सूरत सामने आती है. इसी दुनिया के दो हिस्सों में आदमियों के फूहड़ लतीफे और औरतों की भद्दी मसखरियां एक परदे के इस और उस तरफ ख़ूब एंजॉय की जाती हैं. नीलिमा के नोट्स इस परदे को हटा देते हैं. पढ़ते हुए जिन छुपी बातों पर मजे लेना चाहते हैं. उन्हीं बातों से आत्मा के पैरहन उतरने लगते हैं. अपनी नंगई किसी और के शब्दों में पढ़ते जाना कुछ ऐसा है कि दिल से आह उठती रहे और मुंह उसे दबाये हुए चुप बैठा रहे. ऐसे चुप कि कुछ हुआ नहीं है

विनोद अथवा प्रहसन और खास तौर से सामाजिक मुद्दों पर लिखे गए ऐसे लेख जो हमारी कुरूपता पर सीधे प्रहार करने की जगह चिकौटी काटते हों. लोकप्रिय होते हैं. उनकी उम्र बड़ी लम्बी होती है. इसलिए कि आदमी का स्वभाव बदलने में कई पीढियां लग जाती हैं. वाणी प्रकाशन से आये इस संग्रह को नॉन फिक्शन के अलावा फेमिनिज्म और ह्यूमर की क्लास में भी रखा गया है. इसमें फेमिनिज्म कितना है ये कहना बड़ा मुश्किल है. लेकिन इसमें मनुष्यता की आशा भरपूर है. ऐसी किताबें हर भाषा में आती रहती हैं. अक्सर व्यंग्य अपने सस्तेपन का शिकार हो जाता है. लतीफों के अनुवाद और विस्तार भर शेष रहते हैं. 

मानु जब पांच साल के आस पास थी तब मैं उसे कहानियां सुनाया करता था. मानु ने जो कहानियां बार-बार सुनी वे इब्न ए इंशा साहब की किताब से ली गयी थी. किताब का शीर्षक है- उर्दू की आखिरी किताब. मैंने व्यंग्य कम पढ़ा है. हालाँकि मैंने सबकुछ बहुत कम पढ़ा है. फिर भी उर्दू की आखिरी किताब मेरी प्रिय किताबों में से एक है. उर्दू किताबों की चर्चा में कुछ बरस पहले हुसैन अहमद शेराज़ी साहब की किताब की काफी चर्चा हुई थी. किताब का शीर्षक है बाबू नगर. ये किताब बाबू साहेब कहे जाने वाले छोटे से बड़े क्लर्क तक के जीवन और उनके आचरण पर कसाव भरी चुटकियाँ लेने वाली कही जाती है. इस किताब का कलेवर भी पतनशील पत्नियों के नोट्स जैसा ही है. यानी रंग तो पीला ही रहेगा, चाहे कोई भी व्यंग्य लिखे. वैसे पीला रंग किताबों के लिए बेहतर भी माना जाता है. इस किताब में भी मशहूर कलाकार जावेद साहब का इलेस्ट्रेशन है. 

नीलिमा चौहान की किताब के शुरूआती नोट्स औरतों के निजी हिस्सों के बाबत आदमी की सोच का खाका है. ये ठीक ऐसा नहीं है मगर आप ऐसे समझिये कि नीलिमा जी ने हमारी ढकी हुई सोच को उल्ट कर सामने रख दिया है. ये प्राइवेट पार्ट्स और लाइफ के बारे में आदमी की सोच को इनसाइड आउट सुखा देने जैसा है. कहीं कोई-कोई बात इतनी सीधी है, जैसे दो धार वाली तलवार होती है. जो जाते हुए भी चीरती है और लौटते हुए भी. आगे के लेख आपको अनुभूतियों की ओर ले जाते हैं. जीवन के छोटे दृश्यों के पीछे की गहरी संवेदना भी छूटती नहीं है. मन के कोनों में दबे-छुपे स्त्री होने के अहसास को नई शक्ल और नया ढब देकर उकेरा है. 

पतनशील पत्नियाँ कहाँ होती हैं. वे पतनशील क्यों हैं. ये सब पढने की बात है. 

मैं धूप के और तल्ख़ होते जाने से बेपरवाह किताब पढता रहता हूँ. सोचता हूँ कि समय हमारे साथ कभी अन्याय नहीं करता. मेरी बेटी जब पांच साल की थी तब मैं उसे इब्ने इंशा साहब द्वारा आगे बढाई गयी कहानियां सुनाता था. जैसे "टोपियाँ बेचने वाला व्यापारी और बंदर" कहानी आप सब ने पढ़ी ही होगी. लेकिन इसे इब्ने इंशा साहब ने इस तरह आगे बढ़ा दिया. “टोपीवाला व्यापारी जंगल से गुज़रते हुए थककर एक पेड़ के नीचे आराम करने लगता है. उसे नींद आ जाती है. कुछ बन्दर आते हैं और उसकी सब टोपियाँ ले जाते हैं. वह जागता है तो टोपियाँ बंदरों के पास देखकर अक्ल से काम लेता है और बंदरों को दिखाकर अपनी टोपी फेंक देता है. बन्दर भी उसकी नक़ल करते हुए टोपियाँ फेंक देते हैं. अगली बार व्यापारी का बेटा वहां से जाता है. यही घटना फिर होती है तो व्यापारी का बेटा अपनी टोपी फेंकता तो एक नन्हा बन्दर जिसे टोपी नहीं मिली होती है, वह उसे लेकर पेड़ पर चढ़ जाता है. नया व्यापारी अचरज से कहता है कि मेरे अब्बू ने कहा था कि उन्होंने जब ऐसे टोपी फेंक दी तो सब बंदरों ने भी फेंक दी थी. इस पर एक बन्दर कहता है- क्या तुम्हारे ही अब्बू थे, हमारे नहीं थे.”

तब मेरी बेटी के पास सुनने को इंशा जी की कहानियां थी. अब जब वह दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ती है तो उसका वास्ता ऐसी किताबों से भी पड़ना चाहिए जो पतनशील पत्नियों के नोट्स जैसी हों. लेखक पीछे छूटते जाते हैं तो इसका अर्थ ये नहीं है कि उन खाली जगहों को भरने कोई आता नहीं है.

February 7, 2017

कब तक बचोगे?

बौद्ध मठों की घंटी
मोर का एक पंख
बुद्ध की स्फिटिक मूरत.

कितना कुछ तो है, ज़िन्दगी में.

बस वे जो तीन तिल हैं न तुम्हारी गर्दन के नीचे
उनमें से दो गायब हैं.
* * *

प्रेतबाधा के बारे में ये भी कहा जाता है कि वह दिवस अथवा रात्रि के एक निश्चित समय पर उपस्थित होती है. मेरे साथ भी कुछ रोज़ से ऐसा होने लगा है कि बारह बजते ही दफ्तर में बेचैन होने लगता हूँ. मेरे पांवों से पहले मन घर की ओर भागने लगता है. फिर मैं भी खिंचा हुआ चला आता हूँ. एक बजते ही बैडरूम में चला आता हूँ. मैं तेज़ी से कपड़े बदलता हूँ. अलमारी के हेंगर में टांगने की जगह दरवाज़ा टेबल जो भी दिखा वहीँ कपडे जमा. फिर अगले दस पंद्रह मिनट में नींद. चार पांच या छ बजे तक उठता हूँ. तब तक प्रेत बाधा जा चुकी होती है. 

आज मैंने खींच तान कर इस समय को आगे सरकाया है. अभी तक जाग रहा हूँ. वैसे दिल कहता है सो जाओ, आखिर बुढापे से कब तक बचोगे?
* * *

February 6, 2017

शर्त जो उसने रखी


ससुराल से आई मीठी बूंदी खा रहा हूँ। जितनी मीठी है उतनी ही सुन्दर भी। ज्यादातर पीली है मगर कुछ एक रानी रंग की भी है। इसी बूंदी में कुछ एक टुकड़े जलेबी के भी हैं। मैंने पक्का कर लिया था कि एक भी बूंदी गिरने न पाए। लेकिन ध्यान भंग हो रहा है। कुछ एक नीचे गिर रही हैं।

मैं आस-पास देखता हूँ कि कोई है तो नहीं? फिर उसे उठाकर छोटे बच्चे की तरह फूंक मारकर मुंह में रख लेता हूँ। फिर आस पास देखता हूँ कि किसी ने देखा तो नहीं फिर मुंह चलाना शुरू करता हूँ।

मेरे साथ एक लड़का पढ़ता था। वह अपना लंच लेने के लिए किसी एकान्त में जाता था। वहां वह उसे धीरे धीरे खाता था। खाते समय कहीं खो जाता था। जब भी वह देखता कि कोई उसे खाते हुए देख रहा है, वह लंच बॉक्स को बंद कर देता था।

एकान्त, आपकी याददाश्त की मरम्मत करता है।
* * *

मैंने मुल्तवी कर दिया
पूछना उसका नाम।

शर्त जो उसने रखी, बेजा न थी।
* * *

February 5, 2017

मेरी ज़िन्दगी से रश्क न करना



अब नहीं घबराता है दिल
दोपहर की नींद से जागते ही.

कोई इतनी तकलीफ देगा, कभी सोचा न था.
* * *


एक के बाद एक
उठकर चल देते हैं
विरह, प्रतीक्षा और संताप.

एक ख़ूबसूरत रंग से
भर उठती है तन्हाई.

और फिर, कुर्सी पर अधलेटे यूं तारों को देखना.

[तुम मेरी ज़िन्दगी से रश्क न करना, इसे ऐसा बनाने को ख़ुद को सताना बहुत पड़ता है.]

आवाज़ के कुछ टुकड़े

के सी

My photo

Kishore Choudhary is a poet and fiction writer from Barmer (Rajasthan). His writing career took a formal leap from his personal journals to make him a hugely popular blogger on two of his blogs- Kahaniyan and Hathkadh.

Having spent most of his formative years in the desert, the life there is his favourite canvas to contextualise his poetry and stories. His followers from across the world vouch for his realistic and authentic portrayal of the desert life and its typical dilemmas, fused beautifully and almost effortlessly with some stunning images of the desert and its folklore.

Kishore in a way pioneered the incorporation of pre-publishing interactions and feedback with his readers on his blogs and across social media platforms in his final works. His style is known for its lucid and unexampled metaphors that he exquisitely uses to express universal feelings like love, loneliness, hope, pain, longing and fantasy. 

His first collection of stories Chaurahe Par Seedhiyan (2012)was such a thumping bestseller that the first issue was sold out within 50 days of its launch.All the stories skilfully bring the rich and exotic background of the desert come alive and make the reader delve deeper into the layers of human emotions.This much sought after collection raised the bar for all contemporary Hindi works of short fiction and brought in a fresh change in the existing status quo for Hindi short stories. 

The second collection titled Dhoop Ke Aaiyne Mein(2013)had an array of short stories that looked at life through a multi-dimensional prism, lending each one of them a distinctive charm. Kishore being a poet first, his stories are more like poetic fiction. Having a great affinity to the stream of consciousness novels by English literary greats like James Joyce and Virginia Woolf his stories defy the conventional rules of a definitive beginning, middle and end. 

Kishore’s first publication was a collection of poetry Baatein Bewajah, an alluring and bewitching series of short poems which capture the vast expanse of human emotions and have images that have a rare haunting quality.

Kishore is a Radio Broadcaster by profession and has a special fondness for classical & folk music. Articles about him and his interviews are available across many major newspapers and websites. Kishore certainly is the Avant-garde flavour in contemporary Hindi writing and his ever expanding avid readership eagerly waits for his next chartbuster.

Kishore's latest is another collection called "Jaadu Bhari Ladki". This collection has his same imitable style of stories but the contexts and places are beyond the desert as well. 
His deep understanding of the complexity of modern relationships and how they play out in our minds, homes and workplaces makes it a very unique almost post-modern work in Hindi Fiction.

http://www.goodreads.com/author/show/7361739.Kishore_Chaudhary

हेंगओवर सिलसिला

Labels

अफीम अमज़द इस्लाम अमर अमीर कज़ालबाश अम्बानी अरुंधती अर्नका बोहम असकर खाँ आखा तीज आत्मकथा आबिदा परवीन आर एस हरियाणवी 'रतन' इक़बाल अज़ीम इब्ने इंशा इशरत आफ़रीन ईथोपिया उत्तरलाई एटेल जुडिक एमी वाइनहॉउस एलोनोरा फेगन क़मर जलालाबादी कल्लजी कवास कवि कविता कहानी कार्टून कासानोवा केन्द्रीय विद्यालय ख़त ख़्वाब गणेश गफूर खां मांगणियार गाय ग़ालिब गालियां गिब्रेलपेरी गुडाळ गुरुद्वारा कबूतरसर गुलाम अली ग्रामीण भोज ग्रीन लेबल चाईल्ड मोलेस्टेशन छोटे सरकार जगजीत सिंह ज़फर हुसैन खां जया ज़िन्दगी जिप्सम हाल्ट जेम्स डगलस मोरिसन जोधपुर टाल्सटॉय ठुमरी डिक नोर्टन तीसरा प्रहर त्यौहार थारपारकर द बेल जार दिनेश जोशी दिमित्रोफ़ दूरदर्शन देजो कोस्तोलान्यी देसो सोमोरी देहरादून धोखा धोधे खां नज़ीर बनारसी नया साल नरसिंह बाकोलिया नष्टोमोह नसरुद्दीन नसीम देहलवी नागौर नाटक नानी नासिर काज़मी नुसरत नोस्टेल्जिया पतनशील पत्रकारिता पर्व पापा पेन्सिल प्रेम प्रेस कांफ्रेंस प्लेटफार्म नंबर तीन फ़रहत शहज़ाद फ़रीद अयाज़ फिर से फ़िराक फ़ीचर फैज़ फैंव्किस बर्नियर फ्रिजेश कारिंथी बाघ बाढ़ बातें बेवजह बी बी एल भटनागर बीकानेर बेख़याल बेगम अख्तर बेल्ली होलीडे बेस्ट स्कालर ब्रिटनी मर्फी भाई भुट्टा खाँ भूख मकबूल फ़िदा हुसैन मतीरा मंहगाई महमूद दरवेश महाजन माओवादी मास्टर मिर्ज़ा साहब मूमल मेकडोवेल्स मेथी मेहदी हसन मेहनसर मेहरुन्निसा परवेज़ मैगी मौसम यात्रा वृतांत याद यानोश कांदोलान्यी यू आई डी रांगेय राघव राहत रुकमा रेडियो रेवाण रेशमा लंगा लायोश ज़िलाही लायोश बीरो लेखन लोकगीत वसीम बरेलवी वाईट मिस्चीफ़ विकास विकीलीक्स विजय माल्या विभूति नारायण राय विवेकानंद विस्की व्यर्थ अभिमाना शराब शादी शाम शाहनवाज़ हुसैन शिनचैन शुजात हुसैन शेखावटी श्रेया घोषाल सपना सबा समंदर खान सलेटी जींस सहवाग साईमन मार्क मोंजेक सिल्विया प्लेथ सुदर्शन फ़ाकिर सुनो [जा]ना सुल्तान खां सूरतगढ़ स्कायलार्क स्टीफन क्रेन स्त्री विमर्श स्फिंक्स हंगरी हबीब वली मोहम्मद हम तुम हवेलियाँ होली ह्यूम

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने या खूबसूरत स्त्री को इरादतन चूमने जितना ही अवैध है.

Popular Post's

Google+ Followers

पलटे गए पन्ने