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Showing posts from April, 2011

सब अक्षर धुल जायेंगे...

लायोश ज़िलाही एक अच्छे कवि और कथाकार थे. उनका लिखा नाटक फायरबर्ड उन्नीसवी सदी के आरम्भ में लन्दन के चर्चित नाटकों में से एक था. इस प्ले को कई सालों तक मंचित किया गया. पिछले महीने भर से उनकी एक कहानी के बारे में जब भी लिखने बैठता हूँ, तीन पंक्तियों के बाद मन बिखर जाता रहा है. कहानी का शीर्षक है 'यान कोवाच का अंत". इसे पढ़ते समय और एकांत के पलों में कई सारे ख़याल मेरे मन में संचरित होते रहते हैं.

कहानी का प्लाट कुछ इस तरह से है. एक दिन वह मर गया. पांच साल बाद उसकी एक रिश्तेदार महिला की मृत्यु हो गयी. इसके चौदह साल बाद उसकी चचेरी बहन मर गयी. चचेरी बहन की मृत्यु के इक्कीस माह बाद केरेपेशी के शराबखाने में एक टेबल पर बैठ कर शराब पीते हुए टेक्सी चालकों ने उसे याद किया, जो मर गया था. इसके भी पांच साल बाद एक अधेड़ महिला ने मरते समय एक लडके को याद किया. जिसने गेंहू के खेतों में उसका हाथ थामा था और उस रात पहली बार ज़िन्दगी का सुख जाना था.

इसके दो साल बाद वह चर्च आग से ध्वस्त हो गया, जिसमें जन्म और मृत्यु का ब्यौरा दर्ज था. दो और साल बाद अत्यधिक ठण्ड से बचने के लिए उसकी कब्र …

बस ख़ुदा का शुक्र है...

आह ! अब जाकर आराम आया. सप्ताह भर से मन में अजीब सी बेचैनी थी. भविष्य के बायस्कोप में झांकने का साहस ही नहीं हो रहा था. नए भारत का ख़याल मात्र आते ही रूह काँप जाती थी. नियम कायदे से जीना सब से मुश्किल काम होता है. इस बार जैसी हवा चल रही थी उसके हिसाब से तो आने वाले दिनों में जीना असंभव हो जाता. ऐसा कहते हुए गधा आराम से नसरुद्दीन के बराबर बैठ गया.

उसने पनवाड़ी को कहा कि आज ऐसा हठीला पान लगाओ की शाम खिंची चली आये. गधे के बदन का एक-एक रोंयां ख़ुशी के मारे झूम रहा था. जबकि नसरुद्दीन ठोडी को हथेली पर टिकाये गुम-ख़याल था. गधे ने कहा हालाँकि मैंने सिगरेट पीना छोड़ दिया है पर सच कहूं तो आज ये मन हो रहा है कि धुंएँ के छल्ले बनाऊँ. उन छल्लों की एक जंजीर बने, उस के सहारे आसमान तक चढ़ कर ख़ुदा का शुकराना अदा करूं, इतनी बड़ी ख़ुशी बख्शने के लिए.

उसका जी था कि आस पास खड़े हुए सबको एक करारी दुलत्ती का इनाम भी दे. लेकिन इस महान अवसर पर उसने शब्द शक्ति का ही दामन थाम कर रखा. उसने दो बार नसरुद्दीन के हाथ पर अपनी गरदन रगड़ी और कहा. उस पढ़े लिखे ठेले वाले का सत्यानाश हो जिसने देशों में आग लगवा दी…

ऐ दुनिया, अपनी दुनिया ले जाओ...

हवा में तपिश थी और कई दिनों से मौसम थके हुए सरकारी हरकारों की तरह उखड़े हुए जवाब देने लगा था. कहवाघर के मालिक ने अपने कान को खुजाने के लिए अंगुली को सीधा किया तो उसकी आँख किसी यन्त्र की तरह बंद होने लगी यानि जब अंगुली ठीक कान को छू गयी उसी समय एक पलक बंद हुई. नसरुद्दीन की नज़र तीसरे घर के मेहराब से टकरा रही थी और गधा थका हुआ सा उदास बैठा था. अपने दाई तरफ करवट लेते हुए गधे ने कहा. वे अगर क्रीमिया में युद्ध के सिपाही न बने होते तो क्या वार ऐंड पीस नहीं लिखते ?

नसरुद्दीन ने जवाब नहीं दिया. वह अक्सर ऐसा ही करता है. उसका मानना है कि अपनों का कहा हुआ सुनने के लिए होता है, जवाब देने के लिए नहीं. इसलिए उसने एक प्यार भरी निगाह मात्र डाली. गधे ने उसी करवट के एंगल में थोड़ा सा उठाव लाते हुए किसी ज्ञानी की तरह एक साँस भर का मौन धारण किया और कहने लगा.

रात, मैंने एक सपना देखा. उस सपने का भूगोल कई सपनों में पहले भी देखा हुआ है यानि इसी सपने को मैंने कोई पांचवीं बार देखा. एक तीन मंजिला दुकानों वाली बिल्डिंग है. उसमें से एक पतला सा दरवाज़ा किसी होटल में ले जाता है. वहां सीलन भरे कमरे और एक बड़ा…