June 9, 2017

वजह कुछ भी हो सकती थी


अच्छा क्या परेशां होते हो?

नहीं

क्यों?

इसलिए कि इतनी दूर से जब तुम अपना मन कहते हो. तब मुझे समझ आता है कि ये अभी की ज़रूरत है. इस वक़्त मुझे होना चाहिए. मैं चुपचाप लगातार सुनूँ.

क्यों?

कि ये लम्हा इसी लम्हे के लिए है. बाद में नहीं रहेगा.

अच्छा जो कुछ सुना कहा जाता है उससे बाद में रिग्रेट नहीं होता?

कभी कभी होता है कि आदमी औरत का मन ऐसा क्यूँ बनाया है. चाहनाएँ वन लताओं की तरह उलझी-उलझी क्यों उगती हैं.

इसलिए कि तुम सुलझाओ.

कबूतर के पंखों की आवाज़ आई. कबूतर जानबूझकर अपने पंखों को आपस में टकराकर बजाता है. इसलिए कि उसे लगता है कुछ गलत होने वाला है.

लड़के ने सोचा क्या गलत होगा. अब तक कितनी ही लड़कियां और अधेड़ होने को भागी जाती औरतों को वह जानता है. एक-एक के कितने कितने सम्मोहन. कितने-कितने रिश्ते. वे मानती नहीं थी. मगर उसने ख़ुद देखा है. वे संदेशे भेजकर छेड़ में लगी रहती थी.

एक रोज़ लड़की ने कहा- “ये ट्राय एंड एरर मेथड है. चाबी को हर ताले में ट्राय करो. जो खुल जाये सो अच्छा. इसी तरह तुम मेरे आस आये थे न?” वह भौंचक था. इसलिए नहीं कि ये बात सच थी. उसके पास तो बीसियों न्योते रखे होते. इत्ते साफ कि कहो तो मर जाएँ. उन न्योतों पर ही ही ही का वर्क लगा होता था. ये वर्क इसलिए होता कि अपनी असल चाहना को हंसी से कुछ अलग रंग दिया जाये.

लड़की का पहला सवाल था- “मुझसे पहले कितनी थी?”

जवाब में लड़के ने कहा- “तुम बीसवीं हो?”

इसके बाद लड़की ने बीसियों के बारे में जानना चाहा. किन्तु लड़का केवल दो के बारे में बातें किया करता था. दो के बारे में बताने के पीछे एक कारण ये हो सकता था कि लड़का एक निर्लज्ज कामी व्यक्ति कहलाने की जगह थोडा ख़राब प्रेमी सा कहलाये. एक और वजह हो सकती थी कि वास्तव में ऐसा कुछ कभी हुआ ही न हो. 
* * *

अचानक एक शाम लड़के का फोन गिर गया. उस फोन पर बहुत से स्क्रेच आ गये. उसने थके मन से फोन को उठाया. वह वास्तव में कुछ महीनों से फोन को बदल लेना चाहता था. उसने सोचा कि फोन के स्क्रीन पर आखिरी बार अंगुली घुमाए. लेकिन उसने ऐसा किया नहीं.

रात हो चुकी थी. सड़क पर कम लोग थे. 
* * *

एक कठिन मौसम होता है घर से भाग जाने का लेकिन ख़ुद से दूर भाग जाने का मौसम सबसे कड़ा होता है.
* * *

June 7, 2017

भाग जाने के मौसम की याद

औरत ने एक लम्बा कोट पहना हुआ था. गरदन को मफलर से ढका हुआ था. हाथ कोट की आगे वाली जेबों में थे. आदमी एक फॉर्मल कोट में था. उसके सफ़ेद शर्ट पर गहरी नीली टाई बाँध रखी थी. टाई का जरा सा ऊपरी हिस्सा और गांठ दिख रही थी. उन्होंने हाथ मिलाये. दोनों के हाथ एक से गर्म थे लेकिन सख्ती की तासीर अलग थी. 

“कभी सोचा न था इस तरह?” आदमी के चेहरे पर मुस्कान थी. 

औरत की आँखों में हलकी चमक थी- “मुझे मालूम था कि हम किसी शहर में फिर से एक साथ होंगे.” 

टेबल का टॉप गहरे भूरे रंग का था. उस पर एक गुलदान रखा था. उसमें दो टहनियों के सिरे पर लगे दो फूल रखे थे. आदमी ने उसे अपने दायें हाथ से किनारे कर दिया. उसे ऐसा करते हुए औरत ने देखा. और आदमी ने जब औरत को देखते हुए देखा तो पूछा- “क्या..” 

“क्या करते हो?

“कुछ नहीं करता.”

औरत की आँखों में जो मुस्कान थी. वह अब उसके होठों पर आ गयी- “कुछ नहीं करने के लिए दिन भर क्या करना पड़ता है?”

“सीरियसली... कुछ नहीं. आज सुबह इसी ख़याल में जागा था कि हमको मिलना है. फिर पता है मैं दो घंटे तक कुर्सी पर बुद्ध हुआ बैठा रहा.” इतना कहकर आदमी फिर बुद्ध होने की तरह हो गया. औरत ने एक बार आहिस्ता से मुड़कर देखा. सब टेबल खाली थी. एक कोने में बैठे अकेले लड़के के सिवा. अपनी नज़र को लौटाकर औरत ने कहा- “पूछो मुझे क्या याद आया?”

“क्या?”

“मुझे वह शाम याद आई, जब मैं बास्केटबाल की प्रेक्टिस के लिए आई थी. तुम स्कूल की दीवार पर बैठे थे. मैंने पूछा था कि यहाँ क्या कर रहे हो. तो तुमने कहा था कुछ नहीं. और इसके बाद कुछ और पूछा तो तुमने सीरियसली कहा था. तुमने आज भी कहा- सीरियसली” 

आदमी अचानक असहज होने लगा. उसे लगा कि कोट धूल में बदल कर झरने लगा है. टाई का कसाव गुम हो रहा है. ऐसा कभी हो नहीं सकता था कि कपडे अचानक धूल होकर झरने लगें. लेकिन फिर भी उसने अपने सीने की तरफ देखा. उसने टाई को छुआ. उसके चेहरे पर एक बेहद फीकी सी मुस्कान आई. वह शर्मिंदा होने लगा कि जाने क्या समझेगी. 

उसने देखा कि औरत दीवार की तरफ देख रही है. 

गले को आवाज़ किये बिना साफ़ करते हुए उसने औरत से पूछा- “क्या हुआ...”

औरत ने दीवार की तरफ देखते हुए ही कहा- “तुम हंस पड़ोगे.”

“बताओ”

“नहीं”

“पक्का नहीं हसूंगा” 

औरत की आँखों में वही हलकी चमक आने लगी- “मुझे लगा कि खूँटी पर टंगा मेरा ओवर कोट रेत होकर बिखर रहा है” 

हँसना तो दूर, आदमी मुस्कुराया भी नहीं. उसने कहा- “हमारी उम्र मौसमों के टुकड़ों से बनी है.”

औरत उसे देख रही थी. उसे अचम्भा था कि मेरे बेतुके ख़याल को सुनकर इसे ज़रा भी हंसी न आई. और ये उम्र के मौसमों की बात करने लगा. 

आदमी ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा- “तुम्हें याद है केन्टीन के आगे वाली खुली जगह. जहाँ चौकोर पत्थर लगे थे. वहां एक सायकिल स्टेंड था. जिन शामों को स्कूल में स्पोर्ट्स प्रेक्टिस नहीं होती थी न, उन सब शामों को मैं वहां जाया करता था. उस खाली पड़े रहने वाले स्टेंड पर बैठा रहता था. वहां कोई नहीं आता था.”

“कोई नहीं आता था तो ?”

“तो भी मुझे लगता था कि जैसे कोई आएगा”

औरत को इस बात पर एतबार नहीं हुआ. उसे लगा कि वह कहानी बना रहा है. औरत ने कहा- “मैंने तुम्हें कभी वहां नहीं देखा. तुम्हें पता है न उस जगह के सामने ई ब्लॉक है. हमारा क्वाटर वहीँ था.”

आदमी ने कहा- “सीरियसली” 

“क्या सीरियसली...”

“वो जो बचपन के बाद का मौसम था न, वह बस वही था. उस रुत में जो फूल खिलते थे न, वे उदास होते थे. उस मौसम में लगता था कि कहीं भाग जाएँ. उसी मौसम में ये मालूम न था कि भाग कर जायेंगे कहा?” 

औरत के चेहरे पर कोई सलवट नहीं आई थी. मगर उसे लग रहा था कि उसके चेहरे पर सलवटें उतर रही हैं. और ये आदमी जाने क्या सोचने लगा होगा. ये कैसे हो सकता है कि उस दिनों मैं भी भाग जाने का सोचा करती थी. मुझे भी घर उदास करता था और मैं बाहर खुले में बैठना चाहती थी. 

“कुछ सोच रही हो?”

“हाँ कि तुम सही कहते हो. वह एक उम्र का टुकड़ा होने से अधिक एक मौसम था.” 

आदमी ने पूछा- “तुम क्या करती हो?”

“एक स्कूल में काउंसलर हूँ. बच्चों से बातें करती हूँ. उनकी दोस्त हूँ?”

इतने में दो कप कॉफ़ी और एक छोटा सा केक का टुकड़ा चला आया. बाहर ठंडी हवा चल रही थी. दोपहर के तीन बजे थे. मौसम का एक और टुकड़ा उन दो लोगों को लिख रहा था. 

जब वे बाहर आ रहे थे तब औरत ने कहा- “स्कूल के उस आखिरी साल की बात करते हुए अचानक मुझे लगा कि मैंने कुछ ज्यादा गरम कपड़े पहन लिए हैं.” आदमी उसकी ओर देख रहा था. औरत ने कहा- “ऐसा न समझो कि तुमसे मिलने के लिए ऐसे कपड़े पहने हैं. मैं इतने सारे ही कपड़े पहनती हूँ. मुझे बहुत ठण्ड लगती है.”

आदमी ने कहा- “एक मज़ेदार बात बताता हूँ. हँसना मत”

“हाँ बताओ” 

“मैं कोट और टाई कम पहनता हूँ. इनको पहनने से मुझे स्कूल का पासिंग आउट डिनर याद आता है. फिर जी उदास होने लगता है.”

वे दोनों अभिवादन करके अलग हो गए थे. 

आदमी पता नहीं क्या सोचता हुआ गया मगर औरत ने सोचा कि उसने मनोविज्ञान में मास्टर्स करने के दिनों में क्या पढ़ा था? जब वह अपने प्रेक्टिकल के लिए प्रश्नावली लिए यूनिवर्सिटी के हर डिपार्टमेंट में घूमती थी. लड़के और लड़कियों से सवाल-जवाब वाले फॉर्म भरवाती थी. उनमें क्या सवाल होते थे? 

उसकी आँखों में चमक आई. उसने तय किया कि वह अगली बार से सीनियर विंग के बच्चों की पर्सनल काउंसलिंग में ये ज़रूर पूछेगी कि क्या वे घर से भाग जाना चाहते हैं?
* * *

मौसम कहीं जाते नहीं है. वे केवल रुख बदल लेते हैं. आपके पास तहें खोलने का समय और मन हो तो वे आस पास मिल जाते हैं. 

June 5, 2017

कोई ज़रूरी है कि सबकुछ कहूँ?

कोई दीवार ही होते तो कितना अच्छा होता
मौसमों के सितम सहते और चुप रहते.

इक दिन बिखर जाते, बिना किसी से कोई शिकवा किये हुए.
***

"आपके आसपास अदृश्य आवरण है. मुझे नहीं पता कि इसे कैसे कहूँ. इस औरा के भीतर आने का रास्ता नहीं मिलता. या कई बार मन चाह कर भी भीतर आने से मुकर जाता है. दूर बैठकर देखता रहता है.

मुझे आपसे बहुत कुछ कहना है. मेरी चाहना है कि आप सुनें. आप मेरे पास बैठे रहें. नहीं, मैं आपके पास रहूँ. आप कितने बंद-बंद से हैं. आपकी ओर से कभी ऐसा फील नहीं आता कि लगे आपने मेरे बारे में सोचा. आपने चाहा हो कि मैं कुछ कहूँ. आपने कभी आगे होकर कोई बात नहीं की. कई बार मैंने इंतज़ार किया. थकान हुई और फिर बंद कर दिया.

मुझे लगता है कि मिल लेना, पास बैठ लेना. बात कर लेना जैसी छोटी-छोटी बातें भी कितनी दुश्वार हैं. बाकी ज़िन्दगी का तो क्या कहूँ. कितनी थकान होती है. कभी डिप्रेशन आने लगता है और भी जाने क्या- क्या? जाने दीजिये आप नहीं समझेंगे."

एक चुप्पी आ बैठी. वह देर तक बैठी रहती इससे पहले मैंने तोड़ दिया. "ऐसा थोड़े ही होता है कि जो जैसा दिखे वैसा ही हो. कई बार हो सकता है कि जिसे आप आवाज़ देना चाहते हैं, वह आपका इंतज़ार कर रहा हो."

आसमान को देखते हुए ख़याल आया कि शायद चाँद वाली दसवीं रात होगी. हवा मद्धम थी. दो रोज़ पहले की बरसात की ख़ुशबू बाक़ी थी. या शायद कहीं आस पास कुछ बरसा होगा. हवा उस ख़ुशबू को अपने साथ ले आई होगी.

जाने क्यों इतना इंतज़ार करना रास आता है. कितनी सरल सी बात है. साफ़ कह देनी चाहिए, तुम्हारे पास होना है. बस.

क्या होगा? इस पर कभी नहीं सोचना चाहिए. कि ज़िन्दगी बहुत कुछ को बहुत जल्दी भुला देने का हुनर जानती है.
* * *

अचानक लगा
कि घिर आई है शाम.

फिर लगा कि ये तुम हो.

कभी भरे-पूरे घर में खालीपन उतरते देखा है? कि आँखें बुझती जा रही है. कि साँस भारी हो गयी है. कि थकान ने मार गिराया है, मन, देह और आत्मा को. साँस एक मरोड़ बनकर ठहर जाये. गले के बीच अटकी हुई. सीने में कोई पत्थर बढ़ता हुआ. 

उस वक़्त जब लगे कि अगले पल जाने क्या होगा. अगला पल कैसे आएगा?
* * *

कोई ज़रूरी है कि सबकुछ कहूँ? इतना कहना काफ़ी होता है कि अभी आ जाओ.
* * *

May 25, 2017

मालूम था कि तुम मेरे नहीं थे

तुमने मोहा, गले लगाया. चूमा. तुम गये तो ज़िन्दगी को आंसुओं, बेचैनी और इंतज़ार से भरकर गए. तुम न होते तो खाली-खाली जीवन को लेकर जाने कहाँ-कहाँ भटकना पड़ता.

जीवन को इतना आसान कर देने के लिए मेरे दयालु सद्गुरु तुम्हारा आभार. 
* * *

पुराने रेलवे स्टेशन से बाहर आने वाले गलियारे के आखिरी छोर पर सुबह उतर रही थी. रेलवे स्टेशन के सूनेपन को तोड़ने के लिए कोई न था. इतने बड़े शहर में भीड़ गुम थी. दायीं तरफ कुछ दूर आकर रुकी एक कार ने इस नीरवता को भंग किया. इसके साथ ही आगे पीछे से कुछ लोग गुज़रने लगे. ऐसा लगा कि ठहरे हुए समय की रुकी सुई को किसी ने आहिस्ता से छू दिया. और ठहरी ज़िन्दगी चल पड़ी.

अपने जूतों पर जमी बारीक धूल को देखकर ज़रा नज़र उठायी तो देखा कि कार के अगले दरवाज़े से एक आदमी उतर रहा था. पिछली खिड़की से एक हाथ हिल रहा था. दिल धक् से एक बार धड़क कर देर तक ठहरा रहा. तुम्हारी साफ़ कलाई से बंधी घड़ी का काला पट्टा किसी धागे की तरह चमक रहा था.

उस हाथ के सिवा कुछ नहीं दिख रहा था मगर जाने क्यूँ लगा कि तुम मुस्कुरा रहे हो. तुम्हारा मुस्कुराना सोचकर मेरी आँखें पनियल होने लगीं.

मैंने चाहा कि तुमसे रुख फेरकर वापस चलूँ. तुमको अभी बहुत जीना है. तुम कब तक दुःख उठाये फिरोगे. तुमको अभी ख़ुश रहना चाहिए. तुमको कहकहों से भरी पार्टियों और ख़ुशनुमा दोपहरों में हमउम्र लड़के-लड़कियों के साथ होना चाहिए. इसी सोच में मैंने जब सोचा कि तुम बेहद कमसिन हो. मेरे पैर ठहर गए थे.

छुअन से ख़यालों का ओपेरा टूट गया था. उस आदमी ने मेरे हाथ से थैला ले लिए था. वह मुस्कुरा रहा था. 
* * *

“आपकी ज़रूरत थी” इतना कहते हुए उसने सूटकेस खोला. उसमें से कुछ छोटी-बड़ी स्पायरल डायरियां निकाल कर बाहर रख दी. ग्रेफाइट की डिबिया से एक पतली सींक निकाली. मुड़कर पास आते कहा- “हो सके तो समझना कि ये मेरी ख़ुशी के लिए था.” 
* * *

बाद तेरे बरसों तक उड़ती रही धूल 
ज़िंदगी चुभती रही, बारीक कांटे सी.

जबकि मालूम था कि तुम मेरे नहीं थे. 
* * *

[Painting : Shanti Marie]

May 17, 2017

अगर फूल कह देता

कनॉट प्लेस के इनर सर्कल में एक पेड़ गहरे लाल फूलों से भरा समाधिस्थ था। हवा के झौंके आते। पेड़ के फूलों को चूमते और चले जाते। फूल इसी चूमने से प्रसन्न होकर हवा के पीछे उड़ने लगते। मैंने चाहा कि एक फूल को अपनी अंगुलियों से छूकर पूछूँ- "ये तुम किस ख़ानाबदोश के प्रेम में गिरे। तुमने सोचा तक नहीं कि हवा है और हवा का ठिकाना क्या है?" मैंने फूल को नही उठाया। इसलिए कि अगर फूल कह देता "बाबू, तुम क्या जानो प्रेम?" तो मैं क्या जवाब देता।

"बहुत गर्मी है।" कल दोपहर ऐसा कहते हुए आदमी ने पसीना पौंछ कर उदास मुँह बना लिया। उसके पास खड़े आदमी ने कहा- "हाँ" मैंने देखा कि दोनों आदमी स्वस्थ थे और एक मामूली सी गर्म रुत से परेशान थे। क्या सचमुच आदमी केवल सुख से छींके में पड़ा रहने को दुनिया मे आया है?

मैं जब छुट्टियों पर होता हूँ तब मुझे बेवजह पैदल चलना। नए लोगों को देखते जाना और शाम को दोस्तों के साथ बिता देना। बस यही अच्छा लगता है। आज की सुबह अच्छी है। बादल हैं। अचानक बारिश की छोटी बूंदें गिरने लगती हैं। मैं पैदल चलते हुए रुक कर सड़क पर चलते लोगों को देखता हूँ।

मेरे सामने तिपहिया सायकल पर एक असमर्थ लड़का गरदन को एक तरफ लटकाए हुए पड़ा था। उसकी सायकिल और उसमें कोई हरक़त नहीं थी। सामने से एक दूजा वैसा ही आदमी आया। वह अधेड़ उम्र का था। उसने अपना रिक्शा पास लगाया और पूछा- "क्या हुआ? तबियत ठीक नही? क्या बात है? बोलो बताओ?" लड़के ने कुछ जवाब दिया था। 

वह अधेड़ अपने रिक्शे को उसके पास ही लगाए रहा। उस अधेड़ की आंखों में हौसला था। वह उस हौसले को लड़के के साथ बांट रहा था। मुझे उस आदमी की याद आई जो कल अपने दो पैरों पर खड़ा था। स्वस्थ था और गर्मी को कोस रहा था। उसकी बेबसी और नाकामी याद आई।

असमर्थ असल में वह है, जो दूसरों का दुःख न पूछ सके।

May 13, 2017

जाने को कह देंगे?

मैं उनसे कहता हूँ- "क्या पाओगे? किसी उदासी में करीब बैठोगे. किसी गहरी थकान में अपना सर कंधे पर रख दोगे. किसी गहरे दुःख को कहने लगोगे. किसी यकीन में कहोगे, मेरा हाथ न छोड़ना. इसके बाद..."

"इसके बाद?"

"जैसे पहले बहुत से लोग करते आये हैं. कुछ रोज़ सबकुछ भूलकर दीवाने रहे और बाद में चले गए. वैसे चले जाना होगा"

"तो आप जाने को कह देंगे?"

"नहीं. आपका मुझसे जो सम्मोहन है. वह पूरा हो जायेगा."

"फिर?"

"फिर कुछ नहीं. सबके पास नए सम्मोहन होते हैं, सबके पास हज़ार बहाने और झूठ होते हैं, किसी को भी कोसने के लिए."

"आपको ये सब लगता है? तो ये भी लगता होगा कि आपको बदनाम किया जायेगा."

"नहीं ये नहीं लगता. इसलिए कि बदनामी तो उस बात में होती है, जिसको छिपाना पड़े. मैं तो सबसे कह देता हूँ कि हाँ ऐसा किया था."

शाम की नीरवता फोन में भी पसर जाती है.
* * *

आज की सुबह सवा दस बजे थे. कितनी अजीब बात है न. ऐसा तो रोज़ होता होगा. अगर कोई ज़िन्दा रहे और होशियार हो तो हर सुबह देख सकता है कि सवा दस बजे हैं. कई बार कुछ वक़्त के पैमाने ऐसी शक्लों में ढल जाते हैं कि उनको उसी तरह देखने की आदत हो जाती है. 

इस आदत में समय एक खालीपन हो जाता है. जिन लोगों से बचकर चलते हैं वे दफ्तर से लुप्त हो जाते हैं. लगता है कि वे लोग सदियों से गुम हैं. वे शायद यहाँ कभी थे ही नहीं. असल में आज घड़ी पर उस वक़्त ध्यान नहीं जाना था मगर उसी वक़्त गया. 

बंद कमरे में बैठे हुए लगने लगता है कि बाहर बादल घिर आये हैं. धूप का लिबास अब धूसर हो चला है. हवा में बादलों की छाया की गंध है. कैसा होता है न आदमी. बंद कमरे से मौसम पढ़ लेता है. 

मैं कहता हूँ- "जाओ केसी, बाहर जाकर देखो. मौसम को तुम्हारा इंतजार है."
* * *

May 12, 2017

ख़ुश होकर जाओ

मैं था तो शागिर्दी के लायक भी नहीं 
मगर उनकी फ्रेंड रिक्वेस्ट आ गयी है.

फेसबुक पर फ्रेंड रिक्वेस्ट वाले बटन पर लाल बत्ती चमकी तो देखा कि सआदत हसन मंटो साहब की ओर से दोस्ती का हाथ आया है. ज़रूर उनके किसी चाहने वाले ने ऐसा किया होगा. 

सआदत हसन मंटो ने अफ़सानों से एक लकीर खींच दी थी. जिसके उस पार अगर दुनिया जा सकती तो मंटों नहीं रोकते. बरसों से दुनिया वहीँ पड़ी हुई थी. वे मेरे कॉलेज जाने से साल भर पहले के दिन थे. फिर कॉलेज जाने लगा तब ख़याल आता था कि इक्कीसवीं सदी आ रही है और मंटो की कहानियां गुज़रे ज़माने की याद भर बनकर रह जाएँगी. मुझे कहाँ समझ थी कि इस रहती दुनिया को उस लकीर के इस तरफ ही जीना है. जहाँ वही सब है जो मंटो लिख गए. मंटो के ज़माने से भी तेज़ कदम और बे हया.

कल मंटोमयी फेसबुक को देखना सचमुच अच्छा था. इधर एक दोस्त ने अपनी पोस्ट को हैशटैग ही मंटोमई दे दिया था. मानो मई का महीना हो तो मंटो के नाम ही होना चाहिए. उन्होंने मंटो के नाटक पढ़ते हुए उनके कुछ हिस्से शेयर किये. वे कुछ एक संवाद पढना ही गहरी सोच में डूब जाने को काफी था. उन पोस्ट्स के साथ मंटो की कहानियों का एक काफिला कदमताल करता हुआ आ ठहरता.

कल जब बहुत सी पोस्ट आ रही थी तो उनको ध्यान से देखता. मैं कहानियों के शीर्षक याद करने लगता. कि ये कौनसी कहानी थी. मैंने पढ़ी या नहीं? मैं ख़ुश था, मंटो को इतना याद किया जाना देखकर. मुझे दूर-दूर तक कोई दोस्त याद न आया जिसने मंटो को न पढ़ा हो.

मेरे पेज* पर आते ही कई बार कुछ दोस्त लगातार पढ़ते जाते हैं. उनको लगता है उनकी ही बातें लिखी हैं. वे उन बातों को शेयर करते हैं. कॉपी पेस्ट करते हैं. टैग करते हैं. पोस्टर बनाते हैं. और जो कुछ उनका किया जा सकता है. कल एक नौजवान आये थे. सुबह उनका संदेशा आया. "सर मैंने आपके पेज से बहुत सारी पोस्ट कॉपी पेस्ट कर ली है और आपको क्रेडिट भी नहीं दिया." मैंने कहा- "कोई बात नहीं. नाम न भी लिखो तो भी चलेगा." वे खुश हो गए.

मेरे साथ ऐसा पहले भी हुआ है. मेरी बातें बेवजह लोगों ने अपने नाम से छाप ली तो मेरे दोस्त नाराज़ हुए. जबकि मैंने कहा- "मेरा लिखा जो कुछ भी है. वह सब अपने नाम से छाप लो." क्या असल में ये कोई ऐसा रचनात्मक उत्पाद है, जिसका कॉपी राइट लिया या दावा किया जाये. क्या मैं अपने लिखे से कुछ यश, धन, लाभ बनाना चाहता हूँ? क्या इस लिखे हुए की उम्र अक्षुण है? मैं अपने ही प्रश्नों के साफ़ जवाब देता हूँ कि ये मेरे क्षणिक आवेश मात्र हैं. मैंने किसी गहरी पीड़ा में कोई कहानी लिखी. मैंने तरल उदासी में डूबते हुए कोई बेवजह की बात कही. मैंने किसी की याद में किसी को कोसना भेजा. मैंने दुआ की कि जाओ खुश रहो. ये अपनी अनुभूतियों को शब्द देना भर था. ऐसा करने पर किसी को प्रिय लगे. कोई उसे बाँटना चाहे. तो क्या बुरा है.

एक रोज़ सब ठाट धरा रह जायेगा.

प्रेम करना. पास बिठाना. मीठे से बोलना. सही बातें बताना. जो ठोकरें खाई हैं, वे सुनाना. अपने अनुभवों के सबक साझा करना. बाहँ पकड़ कर बैठना चाहे तो उसकी भी बाहँ पकड़ना. जाना चाहे तो कहना- खुश होकर जाओ और सदा खुश रहना.

पचास साठ साल बाद कॉपी राइट मर जाता है. मगर लेखक ज़िन्दा रहता है.

ये मंटो साहब के नाम से जिसने भी प्रोफाइल बनायीं है. पढ़ा लिखा है. मंटो के प्रोफाइल कवर पर चार्ली चैपलिन का होना दुखों की पराकाष्ठा है.

लव यू.

Kishore Choudhary Page

May 10, 2017

दुःख एक अश्लील चुटकला है

कभी-कभी होता तो इसे भूल कह लेता
मगर मैंने दुखों को अक्सर आगे बढ़कर चूमा है.

बुद्ध का बताया तीसरा आर्यसत्य है- दुःख निरोध. कारण के होने पर ही कार्य उत्पन्न होता है. अतः कारण के न रहने पर कार्य भी नहीं रह सकता. दुःख कार्य है अतः उसके कारण को दूर कर देने पर दुःख का निरोध संभव है.

मैंने इंटरनेट नहीं त्यागा. मैंने व्हाट्स एप को त्याग दिया. इंटरनेट जीवन सदृश्य है. व्हाट्स एप उस पर आश्रित उत्पाद है. इंटरनेट ही त्याग दिया होता तो समस्त दुखों से मुक्ति हो जाती. किन्तु प्रकृति के विरुद्ध जाकर, हमें जीवन का त्याग नहीं करना करना चाहिए. वह जिन संयोगों से हमें मिला है, उनके वियोग में परिवर्तित होने के समय तक प्रतीक्षा करनी चाहिए. इसलिए इंटरनेट बना हुआ है. व्हाट्स एप साल भर पहले अनइंस्टाल कर दिया है.

दुःख के त्याग में कुछ दिनों तक प्रतिबद्धता बनी रहती है. स्वयं का निर्णय है. कुछ और दिन बाद वे दुःख स्वयं को याद दिलाने पड़ते हैं. जिनके कारण व्हाट्स एप को विदा कहा था. उसके और कुछ महीने बाद अचानक किसी दोपहर, शाम या रात. या कभी नीम नशे में, या किसी पुरानी टीस के उभरने से बेहद खालीपन पसरने लगता है. मन कहीं किसी से कोई संवाद करना चाहता है. अंगुलियाँ फोन के स्क्रीन को ऑन करने के लिए आगे बढ़ना चाहती हैं.

तभी स्मृति के घने अँधेरे में एक हल्का सा उजास आता है.

आप थे मगर आपने रीड तक न किया. आपने रीड किया, जवाब नहीं दिया. आप ऑनलाइन थे और उत्तर देने में कोई रूचि न थी. किसको जवाब देते हैं और किसको नहीं देते हैं? हमें भी बताएं. रात आपका लास्ट सीन तीन बयालीस का था. किसकी याद में नींदें गुम हैं. या किसी को उस समय भी आप जवाब देते हैं. हमें भरी दोपहर में भी एक जवाबी स्माइली नहीं मिलती. तो आप हमारी चैट मिटाते नहीं है. ताकि समय आने पर सबको दिखा सकें कि हम ही आपके पीछे पड़े थे. दस मेसेज के बाद एक स्माइली भेजते हैं. जैसे कोई अहसान किया है. या शायद हम ओछे हैं. आप बड़े हैं. आपने मेरा नम्बर ब्लॉक करने का सोचा तो ये बताते जाना कि किसका नहीं करेंगे. सुनिए आप अच्छा लिखते हैं इसलिए हम बहक गए. घर हमारा भी अच्छा है. अच्छा आपको मन की बात कह दी तो अब आप ऐसा व्यवहार करेंगे कि हमारा कोई मोल ही नहीं. सुनिए, लव यू और इसके जवाब में ये न कहना आपको भी बहुत सारा प्रेम.

दर्शनशास्त्र में स्नातक किया था. पास होने के लिए बौद्ध दर्शन का सार कई बार पढ़ा. लगातार तीन साल तक पढ़ा. जीवन में ये पढाई, इतनी भर काम आई है कि व्हाट्स एप जैसे एक दुःख से अस्थायी मुक्ति पा ली.

दुःख एक अश्लील चुटकला है. इसे सुनकर सभ्य लोग सामने गंभीर हो जाते हैं और पीठ के पीछे खिलखिलाकर हँसते हैं.

इसलिए मैंने अपने हर नए प्रेम को पुराने प्रेम के बारे में कुछ नहीं बताया. 
* * *

बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर किसी के प्रेम में पड़िए. दुखों को आमंत्रित कीजिये ताकि दुःख के संदर्भ में चार आर्यसत्य और आर्य अष्टांगिक मार्ग को समझने का दिन आये. बुद्ध द्वारा ये सब जानने के लिए उठाये गए कष्टों का सम्मान कर सकें.

आ जाना कभी. दोनों एक दूजे के आस-पास आँखें बंद किये बैठे रहेंगे. अपने भीतर तक उतरते हुए, प्रेम में आचरण से उपजे दुखों को क्षमा कर देंगे. और फिर एक नया दुःख बुन लेंगे.

लव यू. 
* * *

April 21, 2017

ख़ामोशी से भरा घर

हवा ने कितनी ही थपकियाँ दी होंगी. आज सुबह मैं उस दरवाज़े के सामने खड़ा था. दरवाज़ा चुप था. ऐसे चुप जैसे कोई किसी अपने के लौट आने पर हतप्रभ चुप खड़ा होता है.वह पूछना भी नहीं चाहता कि अब किसलिए आये हो? जब गए थे तब सोचा न था कि जाने के बाद क्या होगा. घर, रिश्ते, चीज़ें सब एकांत में छीजने लगते हैं. मैं झुकर थैले के आगे वाली जेब में चाबी खोजता हूँ. 

ख़ामोशी से भरा घर हमें पुकारता होगा?

ना. मैं अपने आप से ना कहता हूँ. इसलिए कि घर तब तक है जब तक कोई उसके लिए है. जब वहां कोई नहीं है तब घर एक निर्जीव चीज़ है. अपने पक्ष में इस तरह की तकरीर करते हुए चाबी निकाल लेता हूँ. घर के दरवाज़े पर लगी कुण्डी का अन्दर वाला एक स्क्रू गिर गया है. असल में कई बार उसे कसा मगर पेच बचा नहीं था. अक्सर रिश्तों के, प्रेम के, नफरत के, ईर्ष्या के और लगभग हर अनुभूति के पेच मर जाते हैं. 

उन पेचों को हम बार-बार कसना चाहते हैं मगर चूड़ी होती नहीं है. इसी तरह मैंने हत्थी के पेच को कई बार कसा मगर कुछ रोज़ बाद फिर से ऊपर की तरफ से ढीला हो जाता. की-होल में चाबी आसानी से घूमती नहीं है. कुण्डी को पकड़ के बाहर की ओर खींचो तब एक बार फिर और खींचो तब दूसरी बार घूमती है. अंगुलियाँ हत्थी से हटती तब तक पक्का सोचा कि इस बार बदलवा लूँगा. 

रेल की खिड़कियों से आई गर्द में सने कपडे. हाथों में लोहे और पसीने की मिली जुली गंध. बाल चिपके हुए. दरवाज़ा खुलते ही गर्द की एक बारीक चादर के पार रखे हुए सोफे. आहिस्ता से आगे बढ़ने पहले मैं स्विच ऑन करता हूँ. छोटा पिट्ठू थैला आँगन पर रखूं? फिर ठहर जाता हूँ. एक कमरे का दरवाज़ा खोलकर बिस्तर पर रखता हूँ. चादर पर एक कवर बिछा है. कवर पर भी बारीक गर्द है. कवर हटाते हुए चादर पर अंगुलियाँ फेरता हूँ. वह चादर भी बारीक धूल से भरी है. ज़रा सा झुक कर सूंघता हूँ कि पिछली बार हमारे यहाँ होने की गंध कितनी बची है. वहां हमारी गंध नहीं है. बस गर्द है. 

तुम हमारे किसी तरह न हुए 
वरना दुनिया में क्या नहीं होता. 

शायर मोमिन खां मोमिन की तरह बेचैनी छुपाये हुए शिकवे को सरल करता हूँ. सादगी से कहता हूँ कि तुम्हारा ही होने को जी चाहता है. मगर हर बार घर से निकलता हूँ. इस घर ही नहीं, जहाँ कहीं रहता हूँ. वहां से कहीं न कहीं निकलना होता है. 

अब लौट आया हूँ तो जी चाहने लगा कि बैठ जाऊं. सोफ़ा पर डाले हुए कवर हटा दूँ. चाय के लिए इन्डक्शन ऑन कर लूँ. सेंडल खोलकर चप्पल पहन लूँ. कोई दूसरा टी पहन लूँ, कोई शोर्ट डाल लूँ. मगर सोचता हूँ करता कुछ नहीं. जिस सोफ़ा से कवर हटाया था उसपर बैठ जाता हूँ. 

किस काम को कहाँ से शुरू करूँ, ये बात समझ नहीं आती. 

अचानक देखता हूँ कि दोपहर के बारह बजने को आये. दो बार चाय बन गयी. घर से डस्टिंग क्लीनिंग हो गयी. बर्तन धुल गए. थैला खुल गया. कपड़े बिस्तर पर फ़ैल गए. चादरें धुल कर बाहर सूखने गयी. वह जो कुछ घंटे पहले उदास घर था, अब उदास नहीं रहा. एक बात सुनो. कुछ एक घंटों में इतना कुछ बदल जाता है. तो किसी के चले जाने के बाद ज़िन्दगी कितनी बदल चुकी होती होगी. 

एक चिड़िया जाली पर बैठकर घर के अन्दर झांकती है. मैं देखता हूँ कि उसके गुलाबी पैर बहुत सुन्दर है. 

April 20, 2017

दो झपकी के ख़याल में

शाम जाने कैसी बीते? हो सकता है सात बजे तक आने वाले धुंधलके के बाद गरमी छंट जाये. हलकी ठंडी हवा चलने लगे. गरम दिन में यही एक ख़याल ऐसा था, जिसके भरोसे मैंने तत्काल में रिजर्वेशन लिया और स्लिपर कोच में चढ़ गया. पिछले दस एक रोज़ से वायरल बुखार था. आधी रात या भरी दोपहर में बुखार अचानक से आता. बदन तपने लगता और फिर नीम बेहोशी छाने लगती. दवा लो तो कुछ देर बाद पसीना होता और भीग कर मैं जाग जाता था. ऐसे में लगता नहीं था कि जयपुर की यात्रा कर सकूंगा. इसलिए पहले टिकट न ली. क्या कभी हम इस तरह कुछ स्थगित कर सकते हैं? 

शिथिल मन और थकन से भरा बदन कहता है- जाने दो. जो जिस तरह बीतता है बीते. निश्चेष्ट पड़े रहो. जैसे भोर के बाद बड़े वाला उल्लू पड़ा होता है. उसे कुछ दीखता नहीं है. वह उड़कर सुरक्षित जगह नहीं जा सकता है. मगर ऐसा भी नहीं है कि वह जीना नहीं चाहता है. रौशनी ने उससे रास्ता छीन लिया है. इसी तरह बुखार में हम करना बहुत कुछ चाहते हैं. लेकिन ये करना सम्भव नहीं होता. इसलिए उसी उल्लू की तरह रौशनी के अँधेरे में ठोकरे खाते हुए अपने अनुकूल समय की प्रतीक्षा करते हैं. 

शाम को चलने वाली रेल से उतनी उम्मीद ही की जा सकती है, जितना किसी के वादे पर भरोसा करना. 

मैं अपने आस-पास बैठे लोगों से परिचय नहीं करता हूँ. मैं उनके यात्रा प्रयोजन से अनभिग्य ही रहना चाहता हूँ. मैं चाहता हूँ कि कुछ छूटे हुए ब्लॉग पढ़ लूं. मगर रेल के शोर खिडकियों से आती धूल, यात्रियों की ऊँची आवाज़, चाय वालों का आना जाना, मुझे ब्लॉग पढने नहीं देता. मैं फेसबुक देखता रहता हूँ. एक पोस्ट, एक तस्वीर एक कोई अजनबी चेहरा. 

जैसे रेल आगे बढती जाती है. यात्री आपसी सम्बन्ध में बंधने लगते हैं. वे चेहरों और हावभाव से पहचान गढ़ते हैं. वे अजनबियत को खोने लगते हैं. उनमें एक भाव जागता है कि हम साथ सफ़र कर रहे हैं, साथी हैं. आहिस्ता से सब सामान्य होने लगता है. बदन की अकड़, सख्त ठहरी हुई ऑंखें, सीधे रखे हुए पाँव. अक्सर दो तीन घंटे के सफ़र में यात्री एक दूजे के इस तरह से अपने हो जाते हैं कि सामान की हिफाज़त के लिए कह कर रेल कोच से बाहर चले जाते हैं. 

ज़िन्दगी भी ऐसी ही नहीं? पहली मुलाकात में सख्त, अकड़ी और चुप. बाद में आहिस्ता से वह हमारे कन्धों पर सवार हो जाती है. हम जीने की जगह जीने का बोझ ढ़ोने लगते हैं. हर समय इसी हिफाज़त में लग जाते हैं कि जिंदगी को कुछ हो न जाए. इसलिए खिड़की से बाहर की दुनिया में झांकते हुए जिस तरह सामान पर नज़र रखते हैं, वैसे ही ज़िन्दगी के साथ पेश आते हैं. एक ऐसा सामान जो खो ही जाना है, उसी की हिफाज़त में जीते जाना. 

मेरे कूपे के सब यात्री गांधीनगर स्टेशन पर उतरने वाले हैं. 

रात ठंडी हो जाती है. मौसम में लू की हलकी सी चुभन बाकी रह जाती है. एक बेडशीट बिछाए हुए करवटें लेते जाना और सोचना कि महीनों बाद घर जाने पर साफ़ सफाई में पूरा दिन ही गुज़र जायेगा. शायद इसीलिए कई बार कुछ रिश्ते लौटने से डरते हैं. कहाँ से बुहारेगे, कहाँ से फटकेंगे, किस तरह बारीक गर्द को धोयेंगे. 

जिस तरह छूटा हुआ घर पूरी तरह कभी खत्म नहीं होता. वैसे ही न लौटने पर भी रिश्ते तो रहते ही हैं.  

एक छोटा सा ख्वाब अचानक टूटता है. रेलगाड़ी चलकर रुक गयी है. मैं फिर से करवट लेता हूँ, दिन के उजाले में फंसे उल्लू की तरह. कि जहाँ, जब जाना होगा, जाएगी ज़िन्दगी. चुप लेटे रहो. रात के खत्म होने तक दो झपकी ले लो.
* * *

[Painting courtesy ; Natalie Graham]

April 10, 2017

करने से होने वाली चीज़ें

कोई पल जो बेहद भारी लगता है, वह कुछ समय के बाद एक गुज़री हुई बात भर रह जाता है. 

रात की हवा में शीतलता थी. दिन गरम था. साँझ के झुटपुटे में मौसम जाने किससे गले मिला कि सब तपिश जाती रही. हवा झूलने की तरह झूल रही थी. रह-रहकर एक झोंका लगता. आसमान साफ़. तारे मद्धम. कोलाहल गुम. रात का परिंदा आसमान की नदी में बहता जाता है. इसी सब के बीच आँखें अबोध सी शांत ठिठकी हुई. 

बदन के रोयों पर शीतल हवा की छुअन से लगता कि हरारत भर नहीं तपिश भी है. जिसे बहुत सारी शीतलता चाहिए. नींद की लहरें आँखों को छूने लगतीं. धीमे से सब बुझ जाता. 

एक बेकरारी की मरोड़ जागती है. करवट दर करवट. रात की घड़ी से एक हिस्सा गिरा. दूसरी करवट के बाद दूसरा. तीसरी करवट के समय अचानक उठ बैठना. सोचना कि हुआ क्या है? क्यों नींद ठिठकी खड़ी है. किसलिए बदन करवटें लेता जा रहा है. समय का पहिया आगे नहीं बढ़ता. 

बिस्तर ठंडा जान पड़ता है. हाथ सूती कपडे से छूते हैं तो सुहाना लगता है. बुखार अपने चरम पर आता. जहाँ सबकुछ एक सामान तपिश से भर जाता है. दवा लेकर आँख बंद किये सोचता हूँ. होठ गुलाबी हो गए हैं. कच्चे, एकदम कच्चे. वे जगह जगह से फट गए हैं. जैसे किसी ने नन्हे बच्चे के होठों को बार-बार काट खाया हो. जीभ घुमाता हूँ. होठों पर पपड़ियाँ उभर आई हैं. होठों में दर्द भी है. अचानक बुखार में अध दिमाग बहक गया है. गुलाबी होठ भूलकर दूर तक एक गुलाबी रंग देखने लगता हूँ. जैसे किसी ने बेहद कच्चे गुलाबी रंग के खेत उगाये हैं. मैं उनके भीतर जाने के ख़याल भर से डर जाता हूँ. कि ये गुलाबी खेत भी मेरे होठों की तरह नाज़ुक और कटे-फटे हो गए होंगे. इनको छूते ही दर्द की कच्ची सी लहर उठेगी. 

नींद खुलती है तो पाता हूँ कि पसीने ने मुझे भिगो दिया है. एक लाल रंग का टी पहने हुए हूँ. इसे कई महीनों तक बचाए हुए रखा था. इसलिए कि बेहद प्यारा था. फिर इसे जाने कब से घर में पहनना शुरू कर दिया याद नहीं. वही टी इस तरह भीग चुका था जैसे पानी की बाल्टी से निकाला है. जरा घबराया हुआ ज़रा चौंक से भरा समझता हूँ कि दवा लेते ही मुझे गहरी नींद आ गयी थी. इसी नींद में पसीना हुआ है. बिस्तर भीग गया है. बड़ा पलंग है इसलिए भीगी जगह से दूर सरक कर फिर से सो जाता हूँ. 

बुखार की चौथी रात है. इसकी सुबह होने वाली है.
मैं अकसर नहीं समझ पाता हूँ कि मन कहाँ गया है? ये क्यों नहीं लिखना चाहता? इसे क्या ऐसा चाहिए कि लिखने की गत पकडे. किसी से दिल लगा लो. कोई नशा कर लो. कोई तलब जगा लो. मगर करने से होने वाली चीज़ें ज्यादा बेअसर ठहरती हैं. इसलिए इस शांति को भोगो. कुछ न करने को जीयो. जीवन यूं भी जा ही रहा है. 

April 9, 2017

वो जाने क्या शै थी?



छतरी के जैसे खिले हुए दो फूल याद आते रहे.

रात चाँद था. खुली छत पर गरम मौसम की सर्द हवा थी. बदन की हरारत पत्थरों की तरह टूटती रही. भारीपन और बेअसर करवटें. दवा नाकाम. जाग में नींद का इंतज़ार. इंतज़ार में कुछ करने की चाह. इस चाह में कुछ न कर पाने की बेबसी. जैसे किसी योद्धा का का गर्व चूर होता है. सब कुछ ठोकरों पर रखे हुए. जीवन के उड़नखटोले पर बेखयाली में गुजरते दिनों पर कोई प्रेत का साया गिरा. मन एक भीगा हुआ फाहा होकर सब उड़ना भूल गया.

क्यों और अच्छा लगता जाता है आपको?

फिर इसी सवाल पर बहाने बनाते हुए. झूठी दलीलें देते हुए. सोचना- "तुम कह क्यों नहीं देते कि कई बार वहीँ होने का मन होता है. जहाँ छुअन एक सम्मोहन से परे बड़ी ज़रूरत हो." इधर आ जाओ. ये सुनकर मैं कहता हूँ- "आज मैं खुद मुझे अच्छा नहीं लग रहा" सुबह से बिस्तर पर पड़े हुए कभी सीधे कभी औंधे लेटे हुए. ये देखते हुए कि क्या बजा है. ये सोचकर हताश होते हए कि समय रुक गया है.

बहुत दूर कहीं. किसी जगह जहाँ गायों के गले में बंधी घंटियों का हल्का स्वर सुनाई देता है. जहाँ शाम ढले एक अलाव हर मौसम में जलाता है. जैसे असमाप्य बिछोह की अमरजोत जलती हो. उसी बहुत दूर की जगह के बारे में ख़याल आता है. क्या सचमुच हम कभी ये सोचते हैं कि ज़िन्दगी में क्या कुछ कहाँ रखा है. क्या हम दूरियां देखते हैं? क्या हम समय के लम्बे रास्ते पर कोई ऐसा विश्राम स्थल सोचते हैं जहाँ दूरियां एक बार के लिए मिट जाती हों. शायद नहीं. 

रेगिस्तान के वीराने में हवा गाती रहती है एक गीत तुम्हारे आने तक.

बादलों की छतरी तले
सोने जैसी रेत पर
खिल उठता है बैंगनी फूल.

जैसे
एक रात का मुसाफिर
सोया न हो रात भर.

हल्का उजास होने को होता है. मुरकियों और गिरहों से भरे शब्द समझ नहीं आते. एक ही पंक्ति सुनकर उसी के साथ आँख मूंदे देखना कि रौशनी बढती जा रही है. गली में आवाज़ें तेज़ हो रही हैं. मैं उठकर बाहर जाता हूँ. बालकनी से देखता हूँ कि सामने के घर का एक बच्चा दरवाज़े के आगे बनी सीढी पर बैठा है. वह बुद्ध की तरह शांत है. रात पीछे छूट गए जीवन से बेख़बर जाने क्या सोचता है.

मैं तेज़ी से घर के सब काम करता हूँ. आभा मंडी से बहुत सी सब्जियां ले आये तब तक सब गर्द पौंछ दूँ. घर की चीज़ें करीने से रख दूँ. वे चीज़ें जो पिछले तीन दिन में बिखर गयी थीं. पीठ में अचानक एक सेंटीपीड रेंगता है. मैं रुक कर उसे महसूस करता हूँ और अगले काम पर लग जाता हूँ.

क्यों किया है इतना सारा काम?

इसलिए कि प्रेम केवल बाँहों में भर लेने को नहीं कहते हैं.

एक गीत अचानक जाने किस वजह से याद आया, मैं समझ नहीं पाता हूँ. तेईस साल की उम्र में जब रेडियो की नौकरी करने लगा था तब इसे ख़ूब प्ले किया करता था. आज सोचा है कि इसे फिर से खोजूंगा. एक छोटे से रेडियो स्टेशन पर गीत कम होते हैं मगर वे इतने होते हैं कि आप जी भरके प्रेम में डूबे रह सकते हैं.

गुंचे लगे हैं कहने, फूलों से भी सुना है, तराना प्यार का... 
* * *

[Doodle courtesy : http://weeklydoodles.blogspot.in]

April 7, 2017

इतने सारे दुःख उगाने के लिए


ईर्ष्या मत कीजिये 
इतने सारे दुःख उगाने के लिए 
मैंने बहुत सारी चाहनाएँ बोईं थीं.

धूल भरी आंधियां चलने लगीं. रेलवे स्टेशन पर किसी नये ब्रांड का लेबल था. पानी की ख़ुशबू बोतलों में बंद थी. अचानक मन ने कहा- “अच्छा हुआ.” धूल भरी आंधी. गरमी को पौंछने लगीं थी. एक तकलीफ गयी तो दूसरी आ गयी. पहले बदन पसीने से तर था. अब बदन को धूल ने संवारना शुरू कर दिया. बिखरे बालों के बीच बची हुई जगह पर बारीक धूल भरने लगीं. रुमाल उदासा जेब में पड़ा रहा. कई बार हाथ जेब तक गया मगर खाली लौट आया. क्या होगा इतना सा पौंछ देने से?

जब बहुत सा कुछ आता हो तो उसे रोकने के लिए बहुत थोड़ा काम में नहीं लेना चाहिए.

कभी-कभी बहुत सी खुशियाँ आती हैं. अचानक. लहराती. हरहराती. अचम्भित करती हुई. उस वक़्त पीछे छूट गए छोटे-बड़े दुखों का बांध बनाना बेकार है. दो रोज़ पहले कुछ एक घंटे की यात्रा बाकी थी तब कोच सहायक चादरें समेटने लगा था. उसने हमारे कूपे के परदे में जरा सा झाँका. उसकी शर्मीली झाँक में ख़याल रहा होगा कि काश ये चादरें भी समेट ली जाएँ. वह नहीं रुका. जो चीज़ें जहाँ जाकर खत्म होती हैं. उन्हें वहां तक जाने देना चाहिए. मैंने सोचा कि इस सहायक को मालूम होना चाहिए कि ये यात्रा अवश्य खत्म होगी. ये यात्री कुछ देर में उतर जायेंगे. मगर शायद उसे कोई जल्दी थी. जैसे किसी टूटते हुए रिश्ते में लोग इंतज़ार नहीं करते. वे उसे टूटता जानकर उसी पल तोड़ देना चाहते हैं.

कहाँ जा रहे हो? जब भी कोई मुझसे पूछता है तो मेरे पास एक पक्का जवाब होता है. जब भी ये सवाल मैं ख़ुद से पूछता हूँ तो चिंता में घिरने लगता हूँ. मैं अपने प्रयोजन और किसी दिशा में चलते जाने को सोचने लगता हूँ. किसी और के पूछने पर बताते हुए जो काम बेहद सार्थक लगता है. वही ख़ुद के पूछने पर निरर्थक जान पड़ता है. जब भी कोई मुझसे पूछता है कि कहानियां क्यों लिखते हो तो मैं उसे बताता हूँ- “कहानियां लिखने से मेरे मन को आराम आता है” जब यही सवाल मैं ख़ुद से पूछता हूँ तो अपने भीतर खोज में दौड़ने लगता हूँ कि कहानी लिखने से जो आराम आना था, वह कहाँ रखा है? मैं थकने लगता हूँ. मुझे अपना आराम कहीं नहीं मिलता.

मैं सोचने लगता हूँ कि कहानी लिखना कहीं ऐसा तो नहीं कि एक भंवरा कमरे में बंद हो गया है. वह बाहर जाने के लिए खिड़की से आती रौशनी की ओर उड़ता है. जाली से टकराता है और गिर पड़ता है. वह कोई दूसरा रास्ता नहीं तलाशता. वह एक बार रुककर चारों तरफ नहीं देखता. कहीं कोई झिरी. कोई छेद. कोई खुला दरवाज़ा. वह कुछ नहीं देखता. उसकी मति भ्रष्ट हो चुकी होती है. एक ही तरफ जाने को कहती है. क्या मैं कहानियां लिखकर जिस आराम को सोचता हूँ. ये कहीं ऐसा ही कुछ तो नहीं.

लेकिन

अतीत की दस्तकें जब लिख दी जातीं है तो उनका शोर कम हो जाता है. ये अच्छी बात है.

लौटते हुए. ऐसा कहना ठीक नहीं है. वापसी कहना अच्छा है. लौटने के लिए मन भी चाहिए होता है. वापसी में केवल उसी स्थान तक जाना होता है जहाँ से चले थे. ये बात आधी रात को याद आई. एक युवती किसी दूसरे पेसेंजर से कह रही थी कि क्या आप अपनी बर्थ बदल लेंगे. मेरे पिता बेहद बीमार हैं. मेरी माँ का वजन बहुत ज्यादा है. वह व्यक्ति बर्थ बदलने को राज़ी हो गया और हमारे कूपे में ऊपर वाली बर्थ पर आ गया. रात पौने तीन बजे हमें उतर जाना था. इसी गरज में मैंने कोच के दरवाजे तक का फेरा दिया. बूढा आदमी अपनी साइड लोवर पर बैठा हुआ था. उसने पर्दे के बीच से अपना सर गैलेरी में निकाल रखा था. वह कातर आँखों से चलती रेल के बंद कोच में कुछ देख लेना चाहता था. गाड़ी लेट थी. मैं वापस अपनी जगह आया. मैंने अपनी तरफ के पर्दे को ज़रा सा हटा दिया कि उस आदमी को देख सकूं.

वह आदमी आठ दस मिनट के अंतराल से अपने पाँव सीट से नीचे करता. कुछ सोचता और फिर वापस ऊपर कर लेता. युवती की माँ गहरी नींद सो रही थी. युवती को मैंने देखा नहीं था. उसके वहां होने का कोई आभास भी न था. मुझे केवल सोयी हुई भारी बदन वाली औरत दिख रही थी. उसी औरत के साथ उम्र गुज़ार देना वाला आदमी जीवन से कोई स्थायी हल चाहता था. उसके चेहरे पर एक जानी-पहचानी बेचैनी थी. जैसी कभी मुझमें हुआ करती थी. मैं नयी जगह जाना चाहता था. ताकि तकलीफ कम हो जाये. लेकिन वहां पहुँचते ही तकलीफ सामने खड़ी होती थी. मैं उस आदमी को अँधेरे में देख रहा कि अचनक मुस्कुराने लगा. मैंने ख़ुद से कहा- “कितनी बेकार और दूर की सोचते रहते हो. संभव है कि इस आदमी को मानसिक परेशानी हो ही नहीं. हो सकता है केवल लघुशंका के अनियत हो जाने से परेशान हों.

कई-कई बार बहुत से रिश्ते वहां खत्म हो जाते हैं जहाँ कुछ नहीं होता.

गरम मौसम की रात बेहद ठंडी थी. मैं दरवाज़े पर खड़ा हुआ प्रतीक्षा कर रहा था कि अगला स्टेशन आये. जान लूँ कि कहाँ तक पहुंची है. मैं दरवाज़ा बंद कर देता हूँ. फिर वही सवाल कि कहाँ जा रहा हूँ. किसी के दरवाज़ा पीटने की आवाज़ से चौंकता हूँ. कोई रिजर्व कोच में आना चाहता है. मैं तुरंत दरवाज़ा खोल देता हूँ. लेकिन वहां कोई नहीं होता. दरवाज़ा पीटने की आवाज़ मुसलसल आती रहती है. दूर तक देखता हूँ. नावां सिटी स्टेशन पर पसरे हुए वीराने में एक अधेड़ और किशोरी तीसरे कोच के पास खड़े हुए प्रतीक्षा करते हैं कि दरवाज़ा खुल जाए. उनकी बेचैनी इस तरह बढ़ी होती है कि उनके पाँव लगातार आगे पीछे होते रहते है. मैं उनकी तरफ हाथ से इशारा करता हूँ. शायद वे समझ जाएँ कि कोई दरवाज़ा खुला है. 
रेल चल पड़ती है. मैं ये नहीं देखना चाहता हूँ कि वे चढ़ पाए या नहीं. मैं ये देख नहीं सकता हूँ कि उनकी गाड़ी छूट गयी है. छूटना मुझे हताश करता है. मुझे रुलाता है. इसलिए मैं वाशबेसिन के शीशे में देखने लगता हूँ. वहां पर मुझे वही बूढा आदमी दीखता है. मुझे देखकर अचानक पलट जाता है. मुझे फिर अफ़सोस होने लगता है कि इस आदमी को सचमुच लघुशंका की तकलीफ नहीं है.

मैं सिहर जाता हूँ.

एक बार एक लड़का मिला था. उसने अपनी अँगुलियों पर ब्लेड से चीरे लगा रखे थे. मैं अजनबियों से बात नहीं करता हूँ. मुझे इसमें कोई ख़ुशी नहीं मिलती. उनसे बात करना ऐसा है जैसे किसी दूसरे के दुखों में झांक लेना. लेकिन उस लड़के ने मुझसे किताब मांग ली थी. आठ दस पन्ने पढ़कर लौटा दी. मैंने पूछा- “पसंद नहीं आई?” उसने कहा- “पसंद आने पर भी पढ़ नहीं सकूँगा” मैंने पूछा- “आपकी अँगुलियों में लगे चीरों में दर्द के कारण?” वह बोला- “नहीं. ये मैं खुद लगाता हूँ. कभी स्मैक पीता था. न मिलने पर तकलीफ होती थी. इसलिए एक चीरा भरते ही दूजा लगा लेता हूँ ताकि दर्द पर ध्यान रहे.”

मैं उसे कहना चाहता था लेकिन नहीं कहा. कि अच्छा हुआ स्मैक ही पी थी. प्रेम नहीं किया था. 
* * *

तुमने सोच लिया है न ?
* * *

[Painting image courtesy : Saatchi art]

March 7, 2017

के तब तक हम न मिले तो?

बस एक ही बात थी
वो भी कही नहीं गयी.
* * *

पीली चादर ओढ़े दो भंवरे बड़े दिनों बाद कल दिखे. उनकी उड़ान में लय थी. उनके गान में सुर था. वे हवा में थोड़ा स्थिर होते और फिर हलकी मचल के साथ नृत्य करते. मैं बालकनी में खड़ा हुआ था. उनके साथ जाल के पेड़ टंगे एक पुराने घोंसले को देखने लगता. डेजर्ट डव का घोंसला है. बिखरे-बिखरे तिनके हैं. एक टहनी पर बैठी डव, कभी भंवरों का उल्लास देखती है और कभी मुझे. अचानक एक हवा का वर्तुल आता है. डव अपनी पांखें खोलकर बड़ी हो जाती है. हवा के साथ उड़ने को तैयार. भंवरे जाल के भीतर कहीं गुम हो जाते हैं. हवा अपना फेरा देकर जाती है तो डव अपने पंख समेट लेती है. भंवरे अपनी बांसुरी लेकर लौट आते हैं. जीवन में हवा के झोंके जैसे असहज दिन-रात कई बार आते हैं. हम उनको कोसते हैं. हम उनको भूलते भी नहीं हैं. लेकिन डव और भंवरों का जोड़ा उसे भूल कर फिर से जुट जाता है, अपनी मोहोब्बत को जीने के काम में. 

शुक्रिया. 
* * *

बस इतना भर याद है कि
तुम्हें डर है भविष्यवाणियों से.

के तब तक हम न मिले तो?
* * *

हर प्यार की तरह
वह भी आला मूर्ख था.

मर गया प्यार ही में.
* * *

दिल चाहता है कि
एक भविष्यवाणी कर दे
कि मैं पड़े रहूँ तुम्हारी बाँहों में.

मगर
न दिल का भरोसा है, न भविष्य का.
* * *

भविष्य बहुत सरल है
अगर कल्पनाएँ न हों.

जैसे तुमसे प्रेम करना.
* * *

सौभाग्य से घड़ी
टिक टिक कर आगे बढ़ रही है.

वरना न तुम मर पाते
न तुमको प्यार मिलता.
* * *

अतीत और भविष्य
एक सी सा झूला है.

आप जब तक किसी एक को छोड़ न देंगे
ज़िन्दगी पेंडुलम बनी रहेगी.
* * *

February 11, 2017

जोगी तुम्हारा घर इतना दूर क्यों है


दिल बीते दिनों के गट्ठर से कोई बात पुरानी खोजता है. एक सिरा सुलगा देता है. बात सुलगती रहती है. जैसे मूमल का इंतज़ार सुलगता था. महबूब ने काश पूछा होता कि "ओ मूमल तुम किसके साथ सो रही हो." एक धुंधली छवि देखकर हार गया. इस तरह गया कि लौटा तक नहीं. आह ! मोहोब्बत, तुम जितनी बड़ी थी. उतनी ही नाज़ुक भी निकली. 

सूमल देखो
हवा उसके बालों से खेल रही है
बिना पासों का खेल.

उसके ऊंट का रंग
घुलता जा रहा है शाम में.

वो अभी पहुंचा नहीं है किले की घाटी के पास
फिर ये कौन चढ़ रहा है
मेरे दिल की सीढियों पर.

ये किसकी आवाज़ है
धक धक धक.

मेरी बहन मूमल
ये ढका हुआ झरोखा काँप रहा है
तुम्हारे इंतज़ार से.

* * *

ओ सूमल
कौन संवारता होगा उसकी जुल्फें
जो मैं बिगाड़ कर भेजती हूँ.

कितने आईने चटक गए होंगे अब तक
उसके चेहरे पर मेरी रातों की सियाही देखकर.

मेरी कितनी करवटें झड़ती होंगी
उसके सालू से.

मेरी बहन मूमल
वो कहाँ जाता है हर सुबह
वो कहाँ आता है हर रात

तुम्हारी कमर में हाथ डालती हैं कच्ची रातें
तुम्हें बोसे देती हैं सुबह की हवा.

पिया जितना पिया
उससे बड़ा उसका स्मरण है.
* * *

सूमल
मेरा जी चाहता है
लिख दूँ उन सब चिड़ियों के बारे में
जो बैठी रहती हैं झरोखे के पास.

लिख दूँ रोज़ शाम जलने वाले
अलाव की आंच को.

लिख दूँ कानों में सरगोशी करती हवा के शब्द
कि तुम भीग गयी हो जान.

आह मूमल
पानी ही बरस रहा है इस रेगिस्तान में
तुम तप रही हो प्रतीक्षा के ज्वर से.
* * *

February 10, 2017

पतनशील पत्नियों के नोट्स

फरवरी का पहला सप्ताह जा चुका है मगर कुछ रोज़ पहले फिर से पहाड़ों पर बर्फ गिरी तो रेगिस्तान में भी ठण्ड बनी हुई है. रातें बेहिसाब ठंडी हैं. दिन बेहद सख्त हैं. कमरों में बैठे रहो रजाई-स्वेटर सब चाहिए. खुली धूप के लिए बाहर आ बैठो तो इस तरह की चुभन कि सबकुछ उतार कर फेंक दो. रेगिस्तान की फितरत ने ऐसा बना दिया है कि ज्यादा कपड़े अच्छे नहीं लगते. इसी के चलते पिछले एक महीने से जुकाम जा नहीं रहा. मैं बाहर वार्मर या स्वेटर के ऊपर कोट पहनता हूँ और घर में आते ही सबको उतार फेंकता हूँ. एक टी और बैगी पतलून में फिरता रहता हूँ. याद रहता है कि ठण्ड है मगर इस याद पर ज़ोर नहीं चलता. नतीजा बदन दर्द और कुत्ता खांसी. 

कल दोपहर छत पर घनी धूप थी. चारपाई को आधी छाया, आधी धूप में डाले हुए किताब पढने लगा. शादियों का एक मुहूर्त जा चुका है. संस्कारी लोगों ने अपनी छतों से डैक उतार लिए हैं. सस्ते फ़िल्मी और मारवाड़ी गीतों की कर्कश आवाज़ हाईबर्नेशन में चली गयी है. मैं इस शांति में पीले रंग के कवर वाली किताब अपने साथ लिए था. नीलिमा चौहान के नोट्स का संग्रह है. पतनशील पत्नियों के नोट्स. 

तेज़ धूप में पैरों पर सुइयां सी चुभती हैं. मैं उनको बारी-बारी से धूप में रखता हूँ और किताब पढता जाता हूँ. संग्रह के पहले अध्याय के नोट्स का शीर्षक है क़ैद में है बुलबुल. मैं बुलबुल के ख़याल से बाहर दूजी जगह पहुँच जाता हूँ. वह जगह है बाबा मोहम्मद याहया खान का एक नावेल. पिया का रंग काला. वहां पर कहानी रहस्यमयी है. बचपन में एक नन्हा सुनहला दिखने वाला प्यारा सा सांप जैसे जैसे बड़ा होता है, उसकी रंगत काले रंग में बदलती जाती है. अंततः वह भयावह काला, विशालकाय और बेहद डरावना हो जाता है. उसके पूरे स्याह बदन में केवल आँखें सफ़ेद होती है. वह सांप जब चाहे आदमी-औरत का रूप धारण कर लेता है. इस रहस्य और जुगुप्सा से भरी कहानी की याद नीलिमा चौहान के नोट्स के साथ आना मुझे हैरत में नहीं डालता. 

हमारे बचपन की नन्हीं जिज्ञासाएं एक रोज़ भयावह कामुक अपराधों भरी सोच में बदल जाती है. औरत और आदमी का जीवन सहगामी है. किसी एक के बिना क्या जीवन. मैं साफ़ आसमान में कुछ सफ़ेद फाहे और क्षितिज पर बादलों की एक लकीर देखता हूँ. सोचता हूँ कि आदमी और औरत ही क्या, हर एक जो हमारे जीवन से गायब हो उसके बिना कितना अधूरा सा होता है. पंछियों, बादलों, तारों के बिना आसमान भी कैसा होता? एक और सवाल आता है कि आदमी और औरत के बीच कुदरती भिन्नता अथवा पूरक होने का ये सुन्दर सहज रूप शोषक और शोषित के दो खेमों में क्यों बंट जाता है. इसका भान बहुत देर से और बहुत कम लोगों को क्यों होता है. कम ओ बेश कुंठाएं पल्लवित होती जाती हैं. समाज का आदमियों के वर्चस्व वाला खेमा उनको अपनाता जाता है. इस पर किसी को कोई अचरज नहीं होता, कोई लज्जा नहीं आती. याहया खाना साहब के नन्हे सुनहले सांप की तरह काम इच्छाओं का नन्हा सुनहला सांप बड़ा होकर क्या कुछ निगल जायेगा, इसकी कल्पना कोई नहीं करता. हम नहीं सोचते कि लस्ट, पोर्न और सेक्स के स्याह अँधेरे से रिस रहा आसव आदमी और औरत के बीच कैसा लिजलिजा सम्बन्ध स्थापित करता है? 

मैं और बेटी दो दिन पुस्तक मेला में घूमें. कुछ मेरे दोस्त हैं, उनसे मिलने और बतियाने का सुख बटोरा. तीसरे रोज़ हमें कुछ किताबें खरीदनी थीं. उनमें से एक किताब ये भी थी. पतनशील पत्नियों के नोट्स. कहीं किसी अख़बार या पत्रिका में छपे नोट्स में से कोई एक दो नज़र से गुज़रे होंगे. तभी सोचा कि ये संग्रह पढना चाहिए. पहली नज़र में किताब को देखते ही आपको राजकमल से आई रविश कुमार की किताब की याद आयेगी. आवरण का रंग, रेखांकन और छोटे-छोटे नोट्स. हालाँकि इश्क़ में शहर होना, उन लम्हों की कल्पना है. जो रविश जी नहीं पाते और दुनिया को अपने पत्रकारिता जैसे काम के बाहर देखते हुए रचते हैं. वे लघु प्रेम कहानियां हैं. ऐसी कहानियां जो आपको शहर के भूगोल की प्रोपर्टी पर बिठा देती है. वहां से आपको जीवन की छूटी हुई अनुभूतियों की छोटी गहरी याद दिलाती है. उस किताब में भी सुन्दर रेखांकन हैं. ऐसा रेखांकन की कई बार आपको लग सकता है किताब के दो बराबर के हिस्से हैं. एक लेखक का दूसरा चित्रकार का. रविश हर दिन हर पल समाज के छिछले ओछे आवरणों से रु ब रु होते हैं और उनको सवाल की शक्ल में हमारे सामने रखते हैं. तो उनकी लघु प्रेम कहानियाँ ये आशा दिखाती है कि इस आदमी को अबतक रुखा और कठोर हो जाना चाहिए था लेकिन बचा हुआ है. पतनशील पत्नियों के नोट्स वाली नीलिमा जी प्रोफ़ेसर हैं और उनका सामना बच्चों से होता है. वे ऐसी चिंताएं करती हैं जो आने वाली पीढ़ी के लिए हैं. वे आज को लिखकर सवाल करना चाहती हैं कि कल को कैसा बनाओगे. इस किताब में सुन्दर रेखांकन हैं. अपराजिता शर्मा ने हमारे दिमाग में बसी फूहड़ छवियों को कोमलता से शालीन और ज़रूरी छवियों में बदल दिया है.  

इस तरह धूप-छाँव में लेटे पढ़ते हुए, मुझे अचानक से याद आता है कि रूमी ने कहा कि जहाँ कहीं खराबा है उम्मीद का खजाना भी वहीँ हैं. पतनशील नोट्स पढ़ते हुए एक संत कवि दार्शनिक की कही बात का याद आना फ़ौरी तौर पर बेवजह लग सकता है. कहाँ ये पतनशील बातें और कहाँ वह आध्यात्म से भरा सूफी जीवन. लेकिन ये इसलिए याद आता है कि हम खराब हो चुके हैं और मैं इस खराबे में उम्मीद तलाशना चाहता हूँ. नोट्स का संग्रह औरत के शरीर, काम और इच्छाओं के विज्ञापनी संसार से खींचकर आपको उस जगह ले जाता है, जहाँ से आपकी चाहनाओं और हरकतों की बद सूरत सामने आती है. इसी दुनिया के दो हिस्सों में आदमियों के फूहड़ लतीफे और औरतों की भद्दी मसखरियां एक परदे के इस और उस तरफ ख़ूब एंजॉय की जाती हैं. नीलिमा के नोट्स इस परदे को हटा देते हैं. पढ़ते हुए जिन छुपी बातों पर मजे लेना चाहते हैं. उन्हीं बातों से आत्मा के पैरहन उतरने लगते हैं. अपनी नंगई किसी और के शब्दों में पढ़ते जाना कुछ ऐसा है कि दिल से आह उठती रहे और मुंह उसे दबाये हुए चुप बैठा रहे. ऐसे चुप कि कुछ हुआ नहीं है

विनोद अथवा प्रहसन और खास तौर से सामाजिक मुद्दों पर लिखे गए ऐसे लेख जो हमारी कुरूपता पर सीधे प्रहार करने की जगह चिकौटी काटते हों. लोकप्रिय होते हैं. उनकी उम्र बड़ी लम्बी होती है. इसलिए कि आदमी का स्वभाव बदलने में कई पीढियां लग जाती हैं. वाणी प्रकाशन से आये इस संग्रह को नॉन फिक्शन के अलावा फेमिनिज्म और ह्यूमर की क्लास में भी रखा गया है. इसमें फेमिनिज्म कितना है ये कहना बड़ा मुश्किल है. लेकिन इसमें मनुष्यता की आशा भरपूर है. ऐसी किताबें हर भाषा में आती रहती हैं. अक्सर व्यंग्य अपने सस्तेपन का शिकार हो जाता है. लतीफों के अनुवाद और विस्तार भर शेष रहते हैं. 

मानु जब पांच साल के आस पास थी तब मैं उसे कहानियां सुनाया करता था. मानु ने जो कहानियां बार-बार सुनी वे इब्न ए इंशा साहब की किताब से ली गयी थी. किताब का शीर्षक है- उर्दू की आखिरी किताब. मैंने व्यंग्य कम पढ़ा है. हालाँकि मैंने सबकुछ बहुत कम पढ़ा है. फिर भी उर्दू की आखिरी किताब मेरी प्रिय किताबों में से एक है. उर्दू किताबों की चर्चा में कुछ बरस पहले हुसैन अहमद शेराज़ी साहब की किताब की काफी चर्चा हुई थी. किताब का शीर्षक है बाबू नगर. ये किताब बाबू साहेब कहे जाने वाले छोटे से बड़े क्लर्क तक के जीवन और उनके आचरण पर कसाव भरी चुटकियाँ लेने वाली कही जाती है. इस किताब का कलेवर भी पतनशील पत्नियों के नोट्स जैसा ही है. यानी रंग तो पीला ही रहेगा, चाहे कोई भी व्यंग्य लिखे. वैसे पीला रंग किताबों के लिए बेहतर भी माना जाता है. इस किताब में भी मशहूर कलाकार जावेद साहब का इलेस्ट्रेशन है. 

नीलिमा चौहान की किताब के शुरूआती नोट्स औरतों के निजी हिस्सों के बाबत आदमी की सोच का खाका है. ये ठीक ऐसा नहीं है मगर आप ऐसे समझिये कि नीलिमा जी ने हमारी ढकी हुई सोच को उल्ट कर सामने रख दिया है. ये प्राइवेट पार्ट्स और लाइफ के बारे में आदमी की सोच को इनसाइड आउट सुखा देने जैसा है. कहीं कोई-कोई बात इतनी सीधी है, जैसे दो धार वाली तलवार होती है. जो जाते हुए भी चीरती है और लौटते हुए भी. आगे के लेख आपको अनुभूतियों की ओर ले जाते हैं. जीवन के छोटे दृश्यों के पीछे की गहरी संवेदना भी छूटती नहीं है. मन के कोनों में दबे-छुपे स्त्री होने के अहसास को नई शक्ल और नया ढब देकर उकेरा है. 

पतनशील पत्नियाँ कहाँ होती हैं. वे पतनशील क्यों हैं. ये सब पढने की बात है. 

मैं धूप के और तल्ख़ होते जाने से बेपरवाह किताब पढता रहता हूँ. सोचता हूँ कि समय हमारे साथ कभी अन्याय नहीं करता. मेरी बेटी जब पांच साल की थी तब मैं उसे इब्ने इंशा साहब द्वारा आगे बढाई गयी कहानियां सुनाता था. जैसे "टोपियाँ बेचने वाला व्यापारी और बंदर" कहानी आप सब ने पढ़ी ही होगी. लेकिन इसे इब्ने इंशा साहब ने इस तरह आगे बढ़ा दिया. “टोपीवाला व्यापारी जंगल से गुज़रते हुए थककर एक पेड़ के नीचे आराम करने लगता है. उसे नींद आ जाती है. कुछ बन्दर आते हैं और उसकी सब टोपियाँ ले जाते हैं. वह जागता है तो टोपियाँ बंदरों के पास देखकर अक्ल से काम लेता है और बंदरों को दिखाकर अपनी टोपी फेंक देता है. बन्दर भी उसकी नक़ल करते हुए टोपियाँ फेंक देते हैं. अगली बार व्यापारी का बेटा वहां से जाता है. यही घटना फिर होती है तो व्यापारी का बेटा अपनी टोपी फेंकता तो एक नन्हा बन्दर जिसे टोपी नहीं मिली होती है, वह उसे लेकर पेड़ पर चढ़ जाता है. नया व्यापारी अचरज से कहता है कि मेरे अब्बू ने कहा था कि उन्होंने जब ऐसे टोपी फेंक दी तो सब बंदरों ने भी फेंक दी थी. इस पर एक बन्दर कहता है- क्या तुम्हारे ही अब्बू थे, हमारे नहीं थे.”

तब मेरी बेटी के पास सुनने को इंशा जी की कहानियां थी. अब जब वह दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ती है तो उसका वास्ता ऐसी किताबों से भी पड़ना चाहिए जो पतनशील पत्नियों के नोट्स जैसी हों. लेखक पीछे छूटते जाते हैं तो इसका अर्थ ये नहीं है कि उन खाली जगहों को भरने कोई आता नहीं है.

के सी

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Kishore Choudhary is a poet and fiction writer from Barmer (Rajasthan). His writing career took a formal leap from his personal journals to make him a hugely popular blogger on two of his blogs- Kahaniyan and Hathkadh.

Having spent most of his formative years in the desert, the life there is his favourite canvas to contextualise his poetry and stories. His followers from across the world vouch for his realistic and authentic portrayal of the desert life and its typical dilemmas, fused beautifully and almost effortlessly with some stunning images of the desert and its folklore.

Kishore in a way pioneered the incorporation of pre-publishing interactions and feedback with his readers on his blogs and across social media platforms in his final works. His style is known for its lucid and unexampled metaphors that he exquisitely uses to express universal feelings like love, loneliness, hope, pain, longing and fantasy. 

His first collection of stories Chaurahe Par Seedhiyan (2012)was such a thumping bestseller that the first issue was sold out within 50 days of its launch.All the stories skilfully bring the rich and exotic background of the desert come alive and make the reader delve deeper into the layers of human emotions.This much sought after collection raised the bar for all contemporary Hindi works of short fiction and brought in a fresh change in the existing status quo for Hindi short stories. 

The second collection titled Dhoop Ke Aaiyne Mein(2013)had an array of short stories that looked at life through a multi-dimensional prism, lending each one of them a distinctive charm. Kishore being a poet first, his stories are more like poetic fiction. Having a great affinity to the stream of consciousness novels by English literary greats like James Joyce and Virginia Woolf his stories defy the conventional rules of a definitive beginning, middle and end. 

Kishore’s first publication was a collection of poetry Baatein Bewajah, an alluring and bewitching series of short poems which capture the vast expanse of human emotions and have images that have a rare haunting quality.

Kishore is a Radio Broadcaster by profession and has a special fondness for classical & folk music. Articles about him and his interviews are available across many major newspapers and websites. Kishore certainly is the Avant-garde flavour in contemporary Hindi writing and his ever expanding avid readership eagerly waits for his next chartbuster.

Kishore's latest is another collection called "Jaadu Bhari Ladki". This collection has his same imitable style of stories but the contexts and places are beyond the desert as well. 
His deep understanding of the complexity of modern relationships and how they play out in our minds, homes and workplaces makes it a very unique almost post-modern work in Hindi Fiction.

http://www.goodreads.com/author/show/7361739.Kishore_Chaudhary

हेंगओवर सिलसिला

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