December 14, 2017

क्या सचमुच !

ख़यालों के टूटते ही, किसी काम के ख़त्म होते ही, मैं जहाँ होता हूँ वहाँ से बाहर जाना चाहता हूँ. अभी वर्डपैड को खोलते ही लगा कि एक बार बाहर चला जाऊं. मैंने चारपाई के नीचे देखा. वहाँ मेरे जूते नहीं थे. मैं अपने जूते थोड़ी देर पहले फर्स्ट फ्लोर पर रख आया था. वहाँ से पतले गुलाबी चप्पल पहन कर चला आया. चारपाई के पास वे ही रखे हैं. क्या मैं इनको पहन कर बाहर नहीं जा सकता? देखता हूँ कि एक चप्पल में टूटन है. वह अंगूठे के नीचे की जगह से चटक गया है. चप्पल को देखने से बाहर आते ही मुझे लगता है कि कहीं बाहर चले जाना चाहिए. 

मेरे भीतर से कोई मुझे उकसाता है. मेरे ही भीतर से कोई मुझे लिए बैठा रहता है. 

कहाँ जाऊँगा? 

पलंग से चार हाथ की दूरी पर रखे फ़ोन से बीप की आवाज़ आई. मैंने समझा कि संदेशा आया है. उसमें लिखा है 'हाई'. पता नहीं लिखा क्या है पर मैंने यही सोचा. मैं फ़ोन तक नहीं जाना चाहता. मेरी हिम्मत नहीं है. अब से थोड़ी देर बाद फिर बीप की आवाज़ आएगी. शायद लिखा होगा 'बिजी?" मैं क्या सचमुच बिजी हूँ? शायद बहुत ज़्यादा. मेरा मन गुंजलक है. मेरे पास जवाब खत्म हो गए हैं. मैं केवल इस जगह से या जहाँ भी रहूँ वहाँ से कही बाहर चले जाना चाहता हूँ. 

मैं फ़ोन को देखता हूँ. एक छोटी संकेतक बत्ती चमक रही है. मैं उसे देखता रहता हूँ. उसके फिर से चमकने का इंतज़ार करने लगता हूँ. बत्ती काफी देर से चमकती है. उसके चमकते ही लगता है कि इंतज़ार पूरा हुआ. फिर से याद आता है कि मैं यहाँ से बाहर जाना चाहता हूँ. 

मैं अपनी गरदन को एक झटके से बाईं तरफ करता हूँ. एक साथ चार-पाँच कट-कट की आवाज़ आती है. मेरी गरदन अकड़ गयी थी. मैं क्या देख रहा था? मैं दफ़्तर के स्टूडियो में इन दिनों बार-बार बुलाया गया. वहां सीलन नहीं थी. गर्माहट थी. मशीनों की गर्माहट. बाहर की ठंडी हवा से ये जगह अच्छी थी. कुछ लोग काम कर रहे थे. मुझे केवल इतना भर बताना था कि काम बन गया या नहीं? 

वे लोग काम कर रहे थे. मैं उनको देखते हुए सोच रहा था कि क्या सचमुच कोई काम कभी बन जाता है? जैसे अगर मैं किसी से मिलना चाहता हूँ. मैं उससे मिल लूँगा. ये एक काम है. ये एक काम मिल लेने पर बन गया है. क्या सचमुच ऐसा कह सकूँगा? नहीं. पक्का नहीं. वह जो मिल लेना होगा, वह और अधिक अधूरा कर देगा. वह काम और अधिक बाकी हो जायेगा. इसलिए काम बन जाना एक भ्रम है. वह असल में काम का और ख़राब हो जाना है. 

मैं ये सब और नहीं लिखना चाहता. मैं यहाँ से बाहर जाना चाहता हूँ. मैं कहता हूँ कि मेरा फ़ोन ऑटो आंसर मोड़ पर आ जाये. वह सबको जवाब देने लगे कि सर्दी इतनी ज़्यादा है और लिहाफों की छुअन के सम्मोहन खो गए हैं.  

हम क्यों किसी के प्यार में नहीं पड़ जाते. इतने सारे तो लोग हैं? 

November 30, 2017

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।

मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"

यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

November 22, 2017

फूल को चूमकर उड़ जाना

घर से बाहर गए पति की जान अकसर घर में अटकी रहती है। वह लगभग हर काम के बीच घर को याद करता रहता है। अकसर ये भी होता कि वो घर पर अपने अपडेट देने के मामले में फिसड्डी निकलता है। सोचता रहता है पर कह नहीं पाता। 

उधर बीवी के पास प्रेम पत्र तैयार रखे होते हैं- "आ गयी हमारी याद" इन चार शब्दों के बाद एक जानलेवा चुप्पी। इस चुप्पी को तोड़ने, बात को आगे बढ़ाने के लिए पति मुंह खोलता है, तो बोल नहीं पाता। वैसे ये कोई नई बात नहीं है। सब पति-पत्नी जानते हैं।

सुमेर के फार्म पर पार्टी थी। शाम होने को थी। हनुवंत सा पहाड़ी पर पड़े सुंदर पत्थर चुनने लगे। उन्होंने बहुत सारे पत्थर जमा किए। अपनी प्रिय के लिए सुंदर अनूठे पत्थर चुनते हुए उनकी अंगुलियां मचल-मचल रही थी। उनके साथ नरपत साहब भी लगे थे। एक साफ खुली जगह पर छोटा सा पत्थर उठाया तो चेतावनी सुनाई दी। शायद वाइपर था, हो सकता है कैरेट हो। लेकिन इतना तय था कि अगर एक मीठी दे देते तो जान आफत में पड़ जाती।

हनुवंत सा ने अपने चुने पत्थर मुझे दिखाए। कहा कि आप भी इनमें से ले सकते हैं। मैंने कहा- "मैं संजीदा हो गया हूँ। इस तरह पत्थर चुनते हुए आपने तो जान दांव पर लगा दी थी"

सब पत्नियों को समझना चाहिए कि बाहर गए पति के पास फोन पर अपडेट देने के सिवा भी ज़रूरी काम होते हैं। वह आपको भूलता नहीं है। वह आपको रिझाने, ख़ुश करने, अपने प्रेमपाश में बांधे रखने के लिए जान के ख़तरे उठाता जाता है।

मैं भी अगर किसी की आंखों में डूब जाता हूँ तो याद रखता हूँ कि वापस घर जाना है कि नहीं जाना। जब मैं नौवीं कक्षा में था। तब मेरे एक बड़े भाईसाहब ने मुझे प्यार से पास बिठाकर समझाया था। एक भँवरे की तरह फूल को चूमकर उड़ जाओ। फूल पर चिपक कर बैठे मत रहो।

मैं उन पर हंसता रहता था मगर बात उन्होंने शायद अपने गहन अनुभव से कही थी।

November 20, 2017

अचम्भे की बरत की तरह



स्याही के लिबास में आई नृत्यांगना शैतान की प्रेमिका की निकली। उसके नाच से जो चिंगारी बहकी थी। उसने शैतान के दिल को रुई की तरह जला दिया। शैतान सब बन्धनों से दूर आक के डोडे से उड़ा फूल हो गया। उसे प्रेम, प्रेम और प्रेम सुनाई देने लगा।

शैतान ने चाहा कि वह उसे छू सके। वह उसे चूम ले। उसे बाहों में भर ले। अनयास मृत्यु को याद कर रहे व्यक्ति को कभी मृत्यु जिस तरह अपने आगोश में ले लेती है। उसी तरह नृत्यांगना ने अपनी बाहें खोल दी। शैतान एक अचम्भे की बरत की तरह गहराई में उतर गया।

जादुई टैंट में फैले पीले उजास में शैतान की प्रेमिका का रंग व्हिस्की जैसा हो गया था। सुनहरा रंग। शैतान अपनी प्रेमिका के रंग पर गिर रही हर स्याह लकीर को चूम कर मिटा देना चाहता था।

लेकिन शैतान को अपने पहले के सब प्रेम बेवक़्त याद आये। उसने अपने चाहने वालों से कहा कि इस लम्हे को रोक लो। दूजे सब प्रेम की तरह ये प्रेम कहीं खो न जाये। मित्रों ने तस्वीरें उतार लीं।

लेकिन मोहब्बत तो अपने दिल को चाक करना और सीने के कारोबार ही निकला। आज की शाम रेत के वे धोरे दूर रह गए हैं। शैतान की प्रेमिका जाने कहाँ होगी। उसकी याद में मगर प्याला भरा है।

चीयर्स।



November 12, 2017

प्रेम करने के ख़याल की ख़ब्त

तुमको इस बात का यकीन न होगा किन्तु ये सच है कि हर व्यक्ति एक ख़ब्त का शिकार होता है। उसी ख़ब्त के साथ जीता है और उसी के साथ मर जाता है। तुम ख़ब्त को सनक समझना या फिर मैडनेस ज्यादा ठीक होगा।

मैं अपनी याददाश्त में जितना पीछे जा सकता हूँ, वहाँ से अपने भीतर एक ख़ब्त पाता हूँ। प्रेम करने के ख़याल की ख़ब्त। इसे प्रेम करना न समझना। बस प्रेम करने का ख़याल या विचार ही समझना। इसलिए कि ये दोनों अलग स्थितियां हैं। ये दो पायदान भी नहीं है। कहीं ऐसा न समझने लगो कि पहले ख़याल आएगा फिर प्रेम किया जाएगा या होगा।

प्रेम करने का, प्रेम के ख़याल से कोई वास्ता नहीं है। प्रेम एक स्वतः स्फूर्त, सदानीरा, असीम शै है। वह जिसके पास होती है, उसे प्रेम करना नहीं पड़ता। उसका प्रेम उसके आचरण में घुला रहता है। ऐसा व्यक्ति जहाँ कहीं होता है, जिस काम को करता है, वहाँ केवल प्रेम होता है।

प्रेम से भरा व्यक्ति, प्रेम करने के ख़याल से भरे व्यक्ति से अधिक ख़ब्ती होता है। इसलिए कि उसे आने और जाने वाले, बने और बिगड़े हुए से कुछ फर्क नहीं पड़ता। जब कोई जीवन से चला जाता है तो वह घर, बगीचे और दफ्तर से प्रेम करता रहता है। जब वह लौट आता तो उससे प्रेम में बना रहता है। ऐसे व्यक्ति के पास शिकवे नहीं होते। ऐसे व्यक्ति पत्थरों के बीच की घास होते हैं। हर हाल में, अपने स्वभाव में बने रहते हैं।

लेकिन प्रेम करने के ख़याल में होने की ख़ब्त व्यक्ति को कनखजूरा बना देती है। वह अपने ख़यालों के असंख्य पांवों पर भागता फिरता है। अंधेरे कोनों में दुबका रहता है। उसका जीवन प्रेम की रोशनी में कम और इंतज़ार के अंधेरों में अधिक बीतता है। जब वह रोशनी से गुज़रता है तो उसे देखने वाले सब घबराये रहते हैं। उनको लगता है कि वह कहीं उनके प्रेम को अपने नाखूनों से ज़ख़्मी न कर दे। जबकि उसे किसी के प्रेम से वास्ता नहीं होता। क्योंकि वह प्रेम करने से परे रहता है। वह होता है प्रेम करने के ख़याल की ख़ब्त में डूबा हुआ।

असल में प्रेम करने के ख़याल में होना, प्रेम की बारहमासी नदी से अधिक सम्मोहक होता है।

कितने ख़ब्ती, कितनी ही ख़ब्त। जैसे लिखना।

November 11, 2017

यादों की सुरंगें

मैंने अचानक फोन ऑन किया. मुझे याद आया कि कोई मेसेज बहुत दिनों से पड़ा है. उसे जवाब नहीं दिया. बस कॉल किया.

मैंने पूछा- "तुम्हारे पास समय है?"

उसने कहा- "आपको ये नहीं पूछना चाहिए. आपके लिए कभी भी..."

मुझे लगा कि शायद उसने अपने आस-पास देखा होगा. पल भर में लिए तय किया होगा कि बात करे या बाद में फोन पर बात करने का कह दे.

उसने कहा- "आप बहुत अच्छा लिखते हैं"

मैंने कहा- "एक ज़रूरी काम से फोन किया है तुमको"

उसे ज़रूर अचरज हुआ होगा. उसने कहा भी- "मुझसे ?"

मैंने कहा- "हाँ"

मैं सोच रहा था कि उसके चेहरे पर मुस्कान आई है. उसे बहुत कुछ भूल गया है. जितनी परेशानियाँ उसे घेरे रही होंगी, उन पर किसी अविश्वसनीय बात ने बम गिरा दिया है. सब दिक्कतें ढहने लगी हैं.

उसने कहा- "मुझे लगा कि कहीं बैठ जाना चाहिए तो मैंने यही किया है."

मैं चुप रहा.

उसने कहा- "हेलो. आप हैं उधर?"

"हाँ"

"बताइए क्या कहना था?"

मैंने कहा- "मुझे बहुत दिनों से लगता है कि मैंने बहुत सारे चूहे पाल लिए हैं. मैं उनकी ज़रूरतें पूरी करता हूँ. वे दिनों दिन बढ़ते जा रहे हैं.उनके बढ़ने के साथ-साथ मेरे को और ज्यादा काम करना पड़ता है. मैं दफ्तर से भागता हुआ घर आता हूँ. मैं दफ्तर डरा-डरा जाता हूँ. मुझे वहाँ भी लगता है कि चूहे हैं. कोई उनको कुचल न दे. कोई उनको दुःख न पहुंचाए. एक रोज़ मैंने पाया कि चूहे बहुत बढ़ गए हैं. मैं उनके नीचे दब गया हूँ. मैं जिन चूहों से इतना प्रेम करता था. जिनको मैंने इस तरह पाला था. उनको ही लात मार दी. अचानक चूहे, मुझसे दूर एक दूजे पर कूदने लगे."

उसने पूछा- "सचमुच ऐसा है या कोई सपना या कहानी कह रहे हैं?"

मैंने कहा- "ज़रूरी बात ये नहीं है कि ये सपना है या कहानी ज़रूरी बात ये है कि तुमसे पूछना था. मैंने लात मार कर अच्छा किया या नहीं.?"

उसने कहा- "अच्छा किया"

मैंने कहा- "थैंक यू. सॉरी मैं तुमसे इतने दिन तक बात न कर पाया. अच्छा बताओ, तुमको मुझसे क्या बात करनी थी.?"

उसने कहा- "मैंने भी चूहे पाल लिए थे."

फिर हम दोनों हंसे. हमने तय किया कि फिर कभी बात करेंगे. उसने मुझसे पूछा- "क्या जब कभी हम मिलेंगे तो शराब पियेंगे?"

मैंने पूछा- "उससे क्या होता है?"

उसने कहा- "होता कुछ नहीं, बस थोड़ी हेल्प करेगी."
* * *

उससे बात करके मैं सोचता रहा कि एक ही बात को कितने लोग एक ही तरीके से बोलते हैं न. एक लड़की थी. उसने कभी यही कहा था. हम कभी नहीं मिले. ये बात कहने के बाद से अब तक उसका बेटा स्कूल जाने लगा. उसके बेटे को एक छोटा भाई भी मिल गया.

यादों की सुरंगें कहाँ से कहाँ जाती है, कोई नहीं जान सकता. मैंने भी किस याद से बाहर आने को फोन किया और जाने किस याद में जा गिरा.

[Painting image courtesy : Shanna Bruschi]

November 9, 2017

असल में कुछ नहीं हूँ मैं

पहले लोग दुआ सलाम करते हैं। फिर बात करने लगते हैं। उसके बाद अपना मन बांटते हैं। अपने बारे में सब बता देने के बाद जो उनको अच्छा लगा, वह पढ़कर सुनाते हैं। हज़ार बहाने खोजते हैं फोन पर एंगेज रखने के। उनको सुनते हुए। उनसे बात करते हुए। हम भी अपना मन कह देते हैं। फिर अचानक वे लोग कहीं खो जाते हैं। उनसे पूछो तो कहते हैं कि कोई बात है। तुम न समझोगे।

इस तरह अचानक अपनी इच्छा से आये लोग, अचानक खो जाते हैं।

अच्छी बात ये है कि अब तक उन्होंने वे बातें शायद सार्वजनिक न की जो हमने उनकी बातों के बहकावे में आकर कह दी थी।

उनका शुक्रिया।
* * *


मैं आपे से बाहर आया समंदर हूँ
मैं स्याह जादुई रात हूँ
मैं बहुत समय से भूखा शिकारी जीव हूँ
मैं श्मशान में चिता की राख में लेटा अघोरी हूँ.

अनवरत मंत्र पाठ की तरह
संभावनाएं जताता रहूँ अपने बारे में
तो भी जिन अंगुलियों में है
मेरी अंगुलियां छूने की चाहना, वे छू लेती हैं।
 
असल में कुछ नहीं हूँ मैं
हर कोई अपने स्वप्न/दुस्वप्न को छूता है और जाग जाता है।
* * *

November 7, 2017

ख़यालों के अंडरपास

दो साल पहले उसने कहा- "मानव इज हॉट।" फिर मेरी आँखों में झांकते हुए कहा- "बट मिलिंद इज मिलिंद। ही इज अ माचोमैन..." उसके होठों पर मुस्कान और आंखों में शरारत भरी थी।

"अच्छा इस बार मानव कौल दिल्ली आए तो उससे मिलवाना।"
मैंने कहा- "मानव मुझे नहीं जानते"
"रहने दो। ही इज इन योर फ्रेंडलिस्ट एंड रेस्पोंडिंग टू यू"

मैंने देखा कि उसे मेरी बात का यकीन न था। साथ बैठी व्हिस्की पी रही ख़ूबसूरत दोस्त को उदास करना अच्छा न था। इसलिए मैंने कहा- "ठीक है।

साल भर बाद उसने कहा- "बुक फेयर में आये हो मिलोगे?" मैंने कहा कि दिल्ली में मेरा फोन नहीं लगता। बैटरी ड्रेन हो जाती है। नेट पुअर होता है इसलिए मैं वहीं मिलूंगा। न मिलूं तो हिन्द युग्म के स्टाल पर पूछना।"

उसे अच्छा न लगा। ये दोस्त होने जैसा भी न था कि ऐसे तो कोई भी मिल लेगा। वह नहीं आई। मेरे पास भी मेले में वक़्त न था। अचानक उसका मेसेज आया। "शाबाश। मानव कौल का इंटरव्यू कर रहे हो और बड़ी भीड़ लगा रखी है। बहुत अच्छा।"

इस बार मिले तो हम फिर व्हिस्की पी रहे थे। फिर अचानक उसे याद आया। उसने फोन को ऑन किया और दिखाया। "शिट। लुक दिस पिक। मिलिंद अट्ठारह साल की लड़की से डेट कर रहा है।" मैंने उदास मुंह बनाया और कहा। "वह लड़की तुमसी सुंदर भी नहीं है"

फिर हम थोड़ा ज्यादा मुस्कुराए।

कार में कोई एफएम चल रहा था। विद्या बालन कह रही थी मैं हूँ तुम्हारी सुलु... हम दोनों ने एक दूजे की ओर देखा। कहा किसी ने कुछ न था मगर देखने का अर्थ था कि मानव को भी जाने दो। कोई और देखेंगे। इसी चुप्पी में मैंने चाहा कि काश इस रास्ते में फिर से अंडरपास आएं। उनसे गुज़रते हुए ऐसा लगता है जैसे दुनिया ऊपर रह गयी है। हम कहीं गुप्त रास्ते से किसी दूसरे देश जा रहे हैं।
* * *

लव यू मिलिंद। हमतो तुम्हारे चाहने वाले हैं इसलिए रश्क करते हैं। बाकी दिल यही कहता है कि हर कोई उसके साथ हो सके, जिसकी चाहना हो। आमीन।
* * *

[Photograph by Harold Ross]

November 6, 2017

बस एक बार के लिए

किताबों को सोचना अच्छा है। एक-दो किताब आस पास रहे तो एक अजाने संसार में प्रवेश किया जा सकता है। किताबें ऐसी खिड़कियाँ हैं, जो सबसे सुन्दर संसार में ले जाती हैं. 

आप सब किताबें नहीं पढ़ सकते। सबको पढ़ने की ज़रूरत भी नहीं है। आप इस दुनिया मे किताबें पढ़ने नहीं आये हैं। जैसे कोई कुम्हार केवल मृदा पात्र बनाने नहीं आता, लुहार लोहे की चीज़ें बनाने भर को नहीं आता। 

हमारे सम्मोहन होते हैं. हम प्यार करते हैं. हम प्यार करते हुए उसी को जीने लगते हैं. किताबें भी एक प्यार हो सकती हैं. जिसमें इस तरह डूब जाएँ कि हमें और कुछ न सूझे. लेकिन ये डूबना समय के किसी हिस्से के लिए हो सकता है. ये निरंतर होना असम्भव है. अगर संभव है तो फिर सचमुच कहीं कुछ गड़बड़ है. कि तुमने अन्य कलाओं, जीवित पौधों, सुन्दर पक्षियों, बहते पानी, ठहरी झीलों और जीवन के अनगिनत अचम्भों को खो दिया है. नृत्य के प्रेम में आकंठ डूबा एक नर्तक अर्धरात्रि को नाचने का मन होने पर नाच सकता है। द्रुत, अविराम और अनंत नृत्य। किन्तु वह बस एक बार के लिए हो सकता है। उसे फिर से लौट आना पड़ता है, उबाऊ, ढीले और बेस्वाद जीवन में।

जीवन के रास्ते में कुछ भी करते या न करते हुए अचानक भीड़ बढ़ जाती है। तब किसी अंडरपास से निकल जाना चाहिए। एक रोज़ अंडरपास को भी भीड़ शिथिल कर देगी। तब कोई और रास्ता देखना। किसी भी काम मे कभी देरी नहीं होती। ऐसा केवल हमें लगता है कि देर हो रही है। सबकुछ एक गति से चल रहा है। एक रोज़ छुएगा और आगे बढ़ जाएगा। कोई काम जो अधूरा दिखता है, वास्तव में उसका अधूरा होना ही उसकी पूर्णता है। कि वह बस इतना काम ही था।

जब भी कोई आस पास हो तो किताब एक तरफ रख देना। कि पास में बैठा व्यक्ति, जानवर या पक्षी दुनिया की किसी भी किताब से अद्भुत है। वह आपको इतना कुछ दे सकता है, जितना कई क़िताबें मिलकर शायद न दे पाए। 

* * *

November 4, 2017

हम फिर मिलते हैं

वो लम्हा पीछे छूट जाता है। सदा के लिए। एक स्मृति भर रह जाता है। हम जब कभी फिर से मिलते हैं तब हम वो नहीं होते, जो पिछली बार थे। अगर हम वही पिछले वाले होते तो हमारा मिलना असम्भव था। एक बीत चुकी मुलाक़ात दोबारा नहीं हो सकती। नई मुलाक़ात को ताबीर करने के लिए सबकुछ नया बनाना पड़ता है।

हम शायद फिर मिलेंगे लेकिन तुमसे कोई और मिलेगा, मैं किसी और से मिल रहा होऊंगा। मगर इस नएपन के बीज हैं, वे शायद कभी न बदलें। परसों सुबह ब्रेख्त की एक कविता पढ़ रहा था। मुझे लगा कि कई बार तुमसे मिलना चाहिए.

मैं तुम्हारे कॉलेज के दरवाजे के सामने की सड़क के पार बस स्टॉप पर बैठा हुआ देख सकता हूँ। तुम मुझे न देखोगी। मैं एक जाती हुई पीठ पर छितराये खुले बालों से मिल लूंगा। तुम मेट्रो स्टेशन पर आ रही होओगी। मैं इस बार फिर अपनी नज़र फेर लूंगा शायद कि मुझे यकीन न आएगा। तुम इतनी सुंदर कैसे हो जाती हो हर बार। मैं तुम्हारे दफ़्तर को जाती सीढ़ियों पर सामने से आता हुआ टकरा जाना चाहूँगा। ये मगर सम्भव न होगा कि उस वक़्त सब दफ़्तर जा रहे होंगे, दफ़्तर से आ कौन सकता है। इसलिए लन्च में दफ़्तर के निचले तल के पिछवाड़े में केंटीन से राजमा-चावल लिए तुम्हारा इंतज़ार करूँगा।

हम मिले तो चौंक कर मुस्कुरायेंगे। जैसे अब क्या करें?
* * *

कहीं बहुत दूर से डूबे स्वर सुनाई देते हैं। उन पर ठिठका और ध्यानमग्न हुआ मन, अचानक सुनना स्थगित कर देता है। पूर्णमासी का प्रकाश चीजों को आलोकित करता है किन्तु स्याही के बूटे खिले रहते हैं। धुंधले अनचीन्हे स्वर सुघड़ होने लगते हैं। क्या कोई मुझे ही पुकार रहा है?

मैं देखता हूँ कि चांद ने कोई जादू फूंका है और असर बाकी है।
* * *

November 3, 2017

कि कहां तक

चाय का मग खिड़की के बीच रखा रहता। चिड़िया बालकनी में बंधे तार पर बैठी रहती।

मैं जब भी चाय बनाकर लाता। मग को खिड़की में रखता और चिड़िया को खोजने लगता। कभी-कभी चिड़िया आ जाती थी और कभी देर तक सूनापन बना रहता। फिर मैं सोचता कि क्या एक चाय और बना लूँ?

मैं बार-बार बाहर झांकता कि क्या चिड़िया लौट आई है। बिस्तर पर अधलेटा, कुर्सी में धंसा हुआ होता कि अचानक यकीन आता। उसे आना ही चाहिए कि कहानी में गोली चलने से पहले ही सब मुर्गाबियाँ उड़ जाती थी। वह तो एक चिड़िया जो अपनी मर्ज़ी से बालकनी में आती है।

मैं फिर कहानी के पन्ने को देखने लगता और याद करता कि कहां तक पढ़ा था...
* * *

गुलाब के फूल का गलमा बाहर था. एक बकरी आई और इसके फूलों और पत्तियों को साफ़ कर गयी. तना और शाखाएं बची रह गयी. बस एक गमला था और गमले में सूनी शाखाएं. मैंने कहा कि कोई बात नहीं. अगर ज़िन्दगी बची है तो फिर से हरिया जाएगी. कुछ रोज़ बाद एक नन्हीं सी कोंपल का फूटना दिखाई दिया. दिल ने आराम लिया. जरा आहिस्ता से धड़का. फिर कुछ रोज़ बाद पत्तियां आ गयीं. फिर ये वाला फूल भी आ गया.

दुःख अकसर सबकुछ बुहार कर ले जाता है. मगर हम बचे रहें तो जीवन फिर से खिल उठता है.  
* * * 

November 2, 2017

बहुत दिनों बाद अनायास

अंगुलियों के बीच
कत्थे का एक गोल निशान रह गया है
जैसे एक बार रह गयी थी, उसके माथे की बिंदी।
* * *

बहुत दिनों बाद अनायास उसके न होने की याद आने पर फिर से महकने लगती हैं अंगुलियां। कितनी ही बातें ख़ुशबू की तरह पीछे छूट जाती है। जैसे अंगुलियों में छूटी स्याही की ख़ुशबू धुलने के बहुत दिनों बाद भी आती है। जैसे कोई फूल जो केवल देखा था उसकी तस्वीर के साथ, यहां भी महकने लगता है।

उसके होने को उसके होने की ज़रूरत नहीं है। ये बस मेरा लालच है कि वो यहाँ हो तो बाहों में भर लूँ।
* * *

रहने दो।

शाम कब की ढल चुकी है। मजदूरों को अब तक उनकी गाड़ियों ने छोड़ दिया होगा, घर जाती पगडंडियों पर। कोई हल्का उजास, कोई चहल, कोई ठिठकी नज़र वे देख चुके होंगे। मैं भी एक अच्छा मजदूर होना चाहता रहा हूँ। मुझे भी सलीके से घर पहुंचना अच्छा लगता है। लेकिन मैं उससे बंध नहीं पाता। अकसर बीच मे कहीं भी ठहर जाता हूँ। इसलिए रहने दो।

किसी की चिंता न करो। प्रेम से बड़ी बहुत सी तकलीफें हैं। वे उनको सबकुछ भुला देंगी। ये भी कि वे इंतज़ार कर रहे थे। ये भी कि उनको कोई शिकायत करनी थी। क्या तुम्हारे पास थोड़ी सी शराब और थोड़ी जगह है? इतनी सी कि मैं अपने पांव लम्बे कर सकूं।

नहीं है तो कोई बात नहीं। रहने दो।
* * *

सुख, अनचीन्हा रह जाने से अकसर कम-कम लगता है।


[Man Painting his boat ; Georges Seurat ]

October 28, 2017

क्या होगा सोचकर

उसकी आँखें, रेत में हुकिए का बनाया कुआं थी. मैं किसी चींटी की तरह उसे खोजता रहता था. प्रेम पूर्वक उस भुरभरी रेत पर फिसल जाना चाहता था. उसके दांतों से मुक्ति मेरी एक कामना थी.

उसके होंठ बंद रहते थे, मैं देर तक चुप उनको देखता था. कि हंसी की उफनती लहर आएगी और मैं एक पतली नौका की तरह उसमें खो जाऊँगा. मगर जिस रोज़ मैंने जाना कि वह किसी के प्रेम है. उसी रोज़ मैं रेगिस्तान की रेत के नीचे छुप गया.

यहाँ रेत के नीचे सीलन है, अँधेरा है पर यहाँ भी कभी-कभी उसकी आँखें याद आती हैं, यहाँ भी उसके बंद होठ दीखते हैं.


इसके आगे मैं नहीं सोचता हूँ. क्या होगा सोचकर...

[हुकिया समझते हैं? आंटलायन]



October 26, 2017

बेपरवाह जीना



दालान और मुंडेरों पर परिंदों के कुछ पंख गिरे रहते हैं. जैसे वे छोड़ गए हों अपने होने की चिट्ठी. लेकिन तुम सबसे अच्छे निकले कि जाते-जाते सब रिश्ते भी बुहार ले गए.

जाने से पहले कुछ देर तक 
तुम रुके होवोगे खिड़की के पास.

ऐसा लगता है.
* * *

शाखों से बिछड़े पत्ते
हो सकता है
मिट्टी के दीवाने हों।
* * *


रेखाएं जब मिटी तो कुछ नई बन गई
रंग कितने भी उतरे कुछ नए आ ही गए।
* * *

बंद खिड़कियों की कतार में आखिरी खिड़की खुली रहती है। जब भी इन खिड़कियों के पास से निकलता हूँ तो कबाड़ की तरह पड़ा एक चरखा दिखाई देता है। मैं सोचता हूँ कि शायद और भी चरखे होंगे। चरखे अनुपयोगी और उदासीन पड़े हैं। एक रोज़ इसी तरह हर कोई चलन से बाहर हो जाता है। लेकिन जीवन रास्ता तलाश लेता है कि भवन की छत की मुंडेर से एक पौधा उग आता है।

जीवन कितना अद्भुत है कि कभी लाख जतन किये फलता नहीं और कभी बेपरवाह खिलता जाता है। बगीचे सूख जाते हैं, जंगल अपनी मौज में बढ़ता है।


October 25, 2017

याद करते हुए एक बरस

शाम के ढलने से कुछ पहले बची हुई कच्ची धूप में लम्बी परछाइयां सामने की दीवार को ढक लेती थी। इयरफोन से झरती बातों को सुनते हुए आर्म गार्ड रूम के पास तक के चक्कर काटते हुए, एक ढलती दोपहर को देखा कि बेरी पर लाल-पीले रंग मुस्कुरा रहे हैं। उस पहली बार देखने से ही लगा कि तुमसे मिलने का यही मौसम है।

दफ़्तर के भीतर आने पर मालूम होता कि कमीज़ की बायीं जेब में या कुर्ते के दाएं बाए या कभी जीन्स की अगली जेब में कच्चे हरे, आधे पीले या लाल बेर रखे हैं। बेर की ख़ुशबू से स्टूडियो भर जाता। कभी कुछ बेर घर तक साथ चले आते थे।

वे कभी टेबल, कभी छोटी अलमारी के ऊपर या बिस्तर पर पड़ी किताबों पर रखे मिलते। ऐसा लगता कि हमारी बातों के बचे हुए रंगीन छोटे कंचे रखे हैं।

एक रोज़ बातें ख़त्म हो गईं।

बेर मगर हर साल आते रहे। बेरी पर उनका रंग हंसता रहा। जैसे वो याद दिलाने का रंग बन गया कि यही तो वो मौसम था, जब उतरती धूप का मतलब था, तुम्हारा फोन आना। देर तक टहलते हुए बच्चों के बारे में सुनना। आर्ट क्लास में बीती दोपहर। सुबह छूट गई बस। खुले पैसे। और ये शिकवे भी कि दुनिया इतनी बड़ी क्यों है। लोग इतने दूर घर क्यों बनाते हैं।

कोई रूठकर चला जाये कहीं तो क्या होता है?

बेरियां फिर लद जाती हैं कच्चे बेरों से 
याद करते हुए एक बरस और बीत ही जाता है।
* * *


October 24, 2017

जोगी ही बन जाएँ मगर

अंगुली की मुद्रिका, कानों के कर्णफूल, गले का हार, जेब में रखा बटुआ और साथ चलने वाला हमें अत्यधिक प्रिय ही रहते हैं।

हम ही उनको चुनते हैं। अनेक बार नई मुद्रिका की ओर हमारा ध्यान जाता है। उसे दूसरी अंगुलियां बार-बार स्पर्श करके देखती है। गले मे बंधे हार का आभास होता रहता है। जेब को नया बटुआ अपने होने का संदेश देता रहता है। नए साथी की ओर बारम्बार हमारा ध्यान जाता है। उसके पास होने भर से सिहरन, लज्जा, मादकता जैसी अनुभूतियाँ हमारे भीतर अग्निशिखा की तरह लहराती रहती है।

समय के अल्पांश में मुद्रिका, कर्णफूल, हार और साथी हमारा हिस्सा हो जाते हैं। हम इस तरह उनके अभ्यस्त हो जाते हैं कि उनका होना ही भूल जाते हैं। कभी सहसा चौंकते हैं कि मुद्रिका है या नहीं। गले को स्पर्श कर पता करते हैं कि हार वहीं है न। कर्णफूल को स्पर्श कर आराम में आते हैं। साथी को असमय अपने पास न पाकर विचलित हो जाते हैं। भय के छोटे-छोटे टुकड़े हमें छूते हैं और सिहरन भर कर चले जाते हैं।


एक दिवस। मुद्रिका की याद नहीं रहती। कर्णफूल, हार और वह सब जिसे हमने चुना था। उसके होने की अनुभूति मिट जाती है। जेब में पड़ा बटुआ चुभना बंद हो जाता है। पास में बैठे साथी को सोचने पर भी कुछ नहीं होता। उसके छू लेने पर भी वह स्पर्श जो हमें ज्वाला की तरह नृत्य में धकेल सके, गायब रहता है। सब कुछ का होना, न होने जैसा हो जाता है।

हमें आभास ही नहीं होता कि मुद्रिका पहनी है। कर्णफूल सजे हैं। हार दमक रहा है। बटुआ भरा-भरा जेब में रखा है। वो यहीं है, मेरे पास।

मुद्रिका, कर्णफूल, हार और बटुआ हमारे जीवन को आसान करने वाली वस्तुएं हैं। ये जीवन व्यापार में एक प्रकार का बीमा है। कहीं किसी कठिनाई में काम आती हैं। हमारा साथी जब साथ होता है तब एक आश्वस्ति साथ चलती है। हमारे पास मन बांटने को एक ठीया होता है लेकिन फिर किस प्रकार ऐसा हो जाता है कि इन अनमोल वस्तुओं और सम्बन्ध को हमारी चेतना इस प्रकार अंगीकार करती है कि उनका होना ही बिसरा देती है।

इनका होना कितना महत्वपूर्ण है। ये कोई भी समझ सकता है। किंतु प्रभायुक्त मुद्रिका, सौंदर्यवान कर्णफूल, अनमोल हार, धन से भरा बटुआ और योग्य साथी पर अक्सर चोर दृष्टि पड़ती ही है। हर कोई इन सबको पाना ही चाहता है। इनके पीछे कितने लोग लगे हैं, ये हम कभी जान नहीं पाते हैं। इनको बचाने के लिए हम अपना क्या गंवा सकते हैं, सोचना कठिन है।

इब्ने इंशा साहब कहते हैं कूचे को तेरे छोड़कर जोगी बन जाएँ मगर तो क्या साधु बन जाएं। त्याग दें कीमती, सुंदर वस्तएं। त्याग दें सुंदर योग्य साथी। या हठी होकर इन सबकी सुरक्षा के लिए रात और दिन अर्पित कर दें?

जीवन हर हाल में कठिन ही नहीं दुश्वार भी है। 
* * *

इक गांठ समझ नहीं आती कि आगे और दिखने लगती हैं। चीयर्स।

October 23, 2017

उसकी आमद का ख़याल

शाम और रात के बीच एक छोटा सा समय आता है। उस समय एक अविश्वसनीय चुप्पी होती है। मुझे कई बार लगता है कि मालखाने के दो पहरेदार अपनी ड्यूटी की अदला बदली कर रहे हैं। 

उन्होंने मालखाने के ताले पर गहरी निगाह डाली है। इसके बाद चाबियों के गुच्छे की खनक के साथ चुप्पी टूट जाती है। दूर तक एक बीत चुके दिवस की स्मृति पसर जाती है।
जैसे खाली प्याले के भीतर चाय की याद।
* * *

मेरे गालों पर लाल लकीरें खींचने फिर सर्दी आएगी।

दस्तानों में अंगुलियां डालते मुझे एक गार्ड देख रहा होगा। जाने कितनी ही बार की कोशिश के बाद स्टार्ट होगा स्कूटर। तब तक शिफ्ट के बाकी लोग पहुंच चुके होंगे पास की कॉलोनी में अपने घर।

पहले मोड़ पे छूकर गुज़रेगी बर्फ। मैं सोचूंगा कि क्या इस वक़्त भी कोई क़ैदी जागता होगा जेल में। कुछ दूर आगे एसपी साहब की हवेली से आती होगी व्हाइट स्पायडर लिली के फूलों की मादक गंध। जिलाधिकारी के घर से दिख जाएंगे आदमकद स्वामी विवेकानन्द, अस्पताल जाने वालों को निर्विकार देखते अपने हाथ बांधे हुए।

मैं स्कूटर धीरे चलाऊंगा। मैं लम्बी सांसें लूंगा। मैं देखूंगा दूर तक कि कोई नहीं है और रास्ते सूने पड़े हैं। रात के सन्नाटे ज़िंदा कर देंगे, तन्हा सूना रेगिस्तान। मैं उसे बाहों में भर लूंगा आधी रात को।

हर बार जब भी सर्दियां आएंगी भीड़ छंट जाएगी जल्दी-जल्दी। मुझे रेगिस्तान में भीड़ अच्छी नहीं लगती।

October 22, 2017

तुम्हारे लिए हमेशा

"तुम आ जाओ। तुम्हारा इंतज़ार है।" ऐसा कहने वाले ने आने का रास्ता भी रखा हो, ये ज़रूरी नहीं होता। उसने किसी पुरानी बात को याद करके महज इसलिए कह दिया होगा कि वह ख़ुद को ग़लत साबित न करना चाहता होगा।

हम इस लम्हे को सच जानते हैं। किसी आवेश में कह देते हैं कि तुम्हारे लिए हमेशा हूँ। एक घड़ी में हमारा मन बदल जाता है। फिर हम कभी इतने सच्चे और हिम्मती नहीं होते कि उसे कह दें। अब वो मन न रहा। जाने किस मोह में मैंने ऐसा सोच लिया कि सबकुछ हमेशा के लिए हो सकता है।

बातें और रिश्ते कभी-कभी पारदर्शी कांच बन जाते हैं। उनके आगे का संसार दिखता तो है मगर वहां तक जाने का कोई रास्ता नहीं होता।

हम सम्बन्ध की इति को नहीं स्वीकारते और भँवरे की तरह बन्द रास्ते के पार पहुंचने की आस में वहीं टूट बिखर जाते हैं।

October 20, 2017

इत्ती सी बात है

शाम बुझ गयी है
मैं छत पर टहलता हूँ
अपने चप्पलों से
एड़ी को थोड़ा पीछे रखे हुए।

सोचता हूँ कि
समय से थोड़ा सा पीछे छूट रहा हूँ।

हालांकि फासले इतने बढ़ गए हैं
कि नंगे पांव रुककर
इंतज़ार करूँ, तो भी कुछ न होगा।
* * *

कितना अच्छा होता
कि जूते और चप्पल समय के साथ चले जाते
हम वहीं ठहरे रह जाते, जहाँ पहली बार मिले थे।

फिर सोचता हूँ कि न हुआ ऐसा
तो अच्छा ही हुआ
तुम वैसे न थे, जैसा पहली बार सोचा था।
* * *

क्या होगा अगर हम मिले?
जिस तरह रेल के इंतज़ार में
फाटक बंद रहता है
मन उसकी प्रतीक्षा करता है।

रेल के आने पर
रात में पटरियां चमकती हैं
एक धड़क सुर साधती है।

तपी हुई पटरियां धीरे से ठंडी हो जाती है।

इसी तरह हम क्या करेंगे मिलकर।
कोई रेल की तरह आगे निकल जायेगा
कोई पटरी की तरह इंतज़ार में पड़ा रहेगा।
* * *

मुझे तुम्हारी हंसी पसन्द है
हंसी किसे पसन्द नहीं होती।

तुम में हर वो बात है
कि मैं पानी की तरह तुम पर गिरूं
और भाप की तरह उड़ जाऊं।

मगर हम एक शोरगर के बनाये
आसमानी फूल हैं
बारूद एक बार सुलगेगा और बुझ जाएगा।

इत्ती सी बात है।
* * *

पता नहीं वह कौनसा शहर था
शायद मुम्बई ही होगा
मगर ये याद है
कि तुमने कहा था, रम अच्छी है
ये हमारी मदद करेगी।

मुझे रम बिल्कुल नहीं पसन्द
मैंने सब जाड़े व्हिस्की के साथ बिताए।

कैसी बात है न
फिर भी मुस्कुराता हूँ
कि तुम रम पिये हो और मेरे साथ हो।
* * *

October 17, 2017

प्रिय को बदलते हुए देखकर

धीरे से बादल चले आये. दोपहर में शाम का भ्रम होने लगा.

बाहर निगाह डाली. खिड़की से दीखते सामने वाले घर की दीवार पर छाया उतरी हुई थी. एक गिलहरी ज़मीन की ओर मुंह किये लटकी थी. वह चुप और स्थिर थी मगर उसे इस तरह नीचे देखते हुए देखकर लगा कि वह है. उसे देखकर तसल्ली आई कि अभी सबकुछ ठहरा नहीं है.

शहतीर के नीचे उखड़े प्लास्टर में बने घरोंदे से झांकते तिनके हवा के साथ हिल रहे थे. लोहे के जंगले पर बैठी रहने वाली चिड़ियाँ गुम थी. इस तरह बाहर झांकते हुए लगने लगा कि ये कोई स्वप्न है. वही स्वप्न जिसमें ज्यादातर खालीपन पसरा होता है. दफ़अतन कुछ हमारे सामने आता है और हम उससे टकराने के भय से भरकर सिहर जाते हैं.

मन भी ऐसे ही सिहर गया. अचानक लगा तुम खिड़की के आगे से गुज़रे.

इस दौर में हमारे पास कितना साबुत मन बचा है. उसकी उम्र क्या है. इसलिए कि हम जल्दी-जल्दी लिखकर, तेज़-तेज़ बोलकर, कैमरा पर फटाफट देखकर, बाहों में भर लेने जैसा सबकुछ सच्चा-सच्चा लगने सा जी लेते हैं. और शिथिल होकर बैठ जाते हैं.

ठीक वैसे जैसे बादलों ने एक कड़ी दोपहर को छाँव से भर दिया हो.

आँखें सामने दिखती दीवार को देखती रहती है. कान, दूर तक जाकर किसी आहट का पता कर आते हैं. चुप्पी है. आँखें मुंदने लगती हैं. कोई साया आहिस्ता से सीढियों को चढ़ता, खुली पतली बालकनी की ओर मुड़ जाता है.

आंखें खुलकर खिड़की को एकटक देखने लगती हैं. कि वह साया दोबारा यही से गुज़रेगा. कोई नहीं गुज़रता. मन कहीं बहुत दूर किसी पुराने भव्य किले के द्वार पर जा बैठता है. बादल गुम गए हैं. दूर तक कड़ी धूप पसरी है. लम्बे दालान का फर्श गरम हो गया है. झरोखे खाली हैं. मेहराबें सूनी है. और कोई नहीं है.

कोई नहीं.

मन सोचता है यहाँ से उठ जाऊं. सामने सूने पड़े आस्ताने तक चला जाऊं. वहां जाकर बैठ जाऊं. एक थकान रगों के रास्ते पूरे बदन में फैल जाती है. कि वहां बैठकर किसका इंतज़ार करना होगा. शाम कब तक आएगी. उसके बाद क्या होगा. क्यों कोई आएगा. कोई आया तो वो कौन होगा. क्या वह मेरे पास किसी खम्भे से पीठ टिकाकर बैठेगा.

गिलहरी अब भी चुप है. नीचे देख रही है. जैसे हम अपने किसी प्रिय को बदलते हुए देखकर, हताशा में ठहर जाते हैं.

October 16, 2017

इतवार का स्वाद

मैं कहता हूँ- "तुम्हारे जैसे स्ट्रीक्स मेरे बालों में होते तो कितना अच्छा लगता." भावना मुझे थोड़ी ज्यादा आँखें खोलकर देखती है. मैं उसे समझाता हूँ कि ये जो तुम्हारे बाल हैं. इनमें दो रंग हैं. ऐसे बाल रंगवाने के लिए लोग पैसे खर्च करते हैं. भावना पूछती है- "कित्ते?" मैं कहता हूँ- "तीन हज़ार से तीस हज़ार रूपये" वह ऐसे हंसती हैं जैसे ऐसा हो ही नहीं सकता.

मैं कहता हूँ- "मुझे चोटी बनाने जित्ते लम्बे बाल अच्छे लगते हैं." भावना कहती है कि उसके भी चोटी बनती थी. अपने सर पर बालों को ऊपर की ओर लम्बा तानते हुए अंदाजा लगाती है- "इत्ती लम्बी तो थी." मैं कहता हूँ- "मैं इससे भी लम्बी चोटी और ऐसे स्ट्रीक्स वाले बाल बनाऊंगा." वह हंसती है. उसे लगता है कि मैं केवल उससे बातें बना रहा हूँ.

मैं अपने फेसबुक प्रोफाइल में अपनी चोटी वाली तस्वीर खोजने लगता लगता हूँ. वह अपनी ताई से कहती है- "ये क्या सब्जी है? उबलते-उबलते ही सौ घंटे लग जायेंगे." ताई कहती हैं- "ये तो अभी बन जाएगी. तेरी मम्मी बनाती है, सौ घंटे में ?" भावना कहती है- "पापा बनाते हैं."

"तो फिर पापा सब्जी बनाने का कहकर सो जाते होंगे."

भावना और ताई के सवाल जवाब सुनते हुए मुझे याद आया कि मेरे पापा तो कभी रसोई में नहीं जाते थे. उन्होंने मुझे बताया था कि कभी एक दो बार उन्होंने रोटी बनाई थी. उन्होंने साग कभी नहीं बनाया था. मगर पापा बाल बनवाने के मामले में बड़े सख्त थे. वे एक ऐसे नाई के पास ले जाते थे. जिसने मेरे दादा जी के भी बाल बनाये थे. प्रताप हेयर ड्रेसर वाले प्रताप चंद, हमारे सर को टेढ़ा नीचा करके बाल बनाना भूल जाते थे.

जब वहां से छूट जाते थे तो लगता था कि ज़िन्दगी कितनी खूबसूरत है. इस मुक्ति के बाद इतवार का स्वाद, इस दुनिया का सबसे मीठा स्वाद होता था.

October 14, 2017

दफ़्तर के चूहे, बिल्ली और सांप

सांप चूहे खा जाते हैं। इसलिए बिल्लियां उनको पसन्द नहीं करती। वे उनको मार डालती हैं।

हमारा आकाशवाणी वन विभाग के छोर पर बना है तो बहुत सारे सांप आते रहते हैं। विषैले और विषहीन। इधर बिल्लियां भी रहती हैं। वे अक्सर ड्यूटी रूम के सोफे पर सोई मिलती हैं। उनके बच्चे भी सोफे को बहुत पसंद करते हैं। ड्यूटी रूम में आने वाले मेहमानों को अक्सर याद दिलाना पड़ता है कि देखिए बिल्ली के बच्चे हैं। उन पर न बैठ जाना।

एक शाम को उद्घोषक डरी हुई बाहर गेट तक चली आई। सर प्ले बैक स्टूडियो के दरवाज़े पर मैंने सांप देखा। गार्ड ने कहा कि अभी देखते हैं। सांप कहीं इधर-उधर हो गया। वह लौट कर अंदर जाने लगी तो जनाब फिर से दरवाज़े पर रास्ता खोज रहे थे। वह वापस भागी। सांप को फिर हटा दिया गया। वे स्टूडियो में डर रही थी। उनको कहा कि आप मैं तेरी दुश्मन गीत प्ले कीजिये। अमरीश साहब के आने का सोचकर सांप खिसक लेगा।

एक शाम एक उद्घोषक की उद्घोषणा अधूरी रह गयी। माइक से दरवाज़ा खुलने की आवाज़ भर आई। वे बाहर आये और बोले। सर स्टूडियो के कंसोल पर फेडर्स के बीच एक बिच्छू आ बैठा है। उनको सुझाव दिया कि बिछुआ मोरे साजन का प्यार गीत चला लें। रूमान से भरकर बिच्छू लौट सकता है।

इधर कोबरा का एक परिवार रहता था। एक को ड्राइवर ने मार डाला। बाकायदा अंधविश्वास की जै जैकार करते हुए उसे अग्नि को समर्पित किया गया। एक कोबरा का हमारे इंजीनियर साथी ने बेहद क्रूरता से अंत कर दिया था। मुझे उसका भी गहरा दुख हुआ।

मैं एक शाम स्कूटर के पास पहुंचा तो कोई चीज़ तेज़ी से हिली। कैरेत फेमिली का छोटा सा बच्चा चेतावनी दे रहा था। दूर रहना प्यारे कहानीकार वरना सारी कहानियां यहीं धरी रह जायेगी। मैंने गार्ड को बुलाया और उनसे कहा कि अपना ख़याल रखियेगा। ये छोटे साहब इधर शिकार पर निकले हैं। इनके भाई बहन भी आस पास होंगे।

रेगिस्तान की रात में उमस के बढ़ते ही बिल में दुबके विषधर बाहर चले आते हैं। कई बार उनको स्टूडियो के बाहर तफरीह करते। बिल्लियों से लड़ते हुए, जान बचाकर भागते हुए देखा जाता है। इधर हैज़हॉग भी बहुत सारे हैं। ये झाऊ चूहे कभी पकड़ में आ जाते हैं तो फिर कोई उनसे बहुत देर तक खेलता रहता है। सावधानी से उठाने पर उनके कांटे नहीं चुभते। वे थोड़ी देर बाद अपनी थूथन को बाहर निकाल कर देखते हैं कि कहां फंस गए हैं। तब थ्री इडियट्स का डायलॉग ज़रूरी होता है। तू अंदर ही रहना चैम्प। बाहर बहुत सर्कस है।

इस सांप को कल रात अपनी जान गंवानी पड़ी है। सुबह से स्टूडियो के दरवाजे के पास इसकी देह पड़ी है। मैं इसकी तस्वीर उतार अंदर आकर बैठ गया। देर तक ख़याल रहे। क्या कुदरत है। कैसा जीवन है। मृत्यु जाने कहाँ प्रतीक्षा में बैठी है। इसी सोच में अभी थोड़ी देर पहले बिल्ली भी ड्यूटी रूम की खिड़की से अंदर आई। जैसे ही उसने मुंह अंदर घुसाया तो मैंने उससे कहा- "हत्यारिन कहाँ से आ रही हो?" उसने मुझे इग्नोर किया है और सोफे पर बैठ गयी है।

जालमा तू बड़ा वो है...

October 11, 2017

दूर से आते हुए पिता

पहले तो दिख जाते थे
दूर से आते हुए पिता।

अब धुंधला जाती हैं आंखें
भरी-भरी गली में
नहीं दिखता उनका आना।

कभी-कभी
इससे भी अधिक उदास हो जाता हूँ।

उन पिताओं के बारे में सोचकर
जो इसी तरह जा चुके बच्चों का
भूल से करने लगते होंगे, इंतज़ार।
* * *

मैं सो नहीं सकता हूँ
कि मैं सो गया तो
कौन जागेगा तुम्हारी याद के साथ?

तुम्हारे बिना
इस खाली-खाली दुनिया मे
कितनी तन्हा हो जाएगी तुम्हारी याद।
* * *

October 8, 2017

बिछड़ने के बाद के नोट्स

बाद बरसों के देखते हुए 
हालांकि हमें ज्यादा कुछ याद नहीं होता। 
फिर भी लगता है कि 
उसके चेहरे पर ऐसी उदासी पहले कभी न देखी थी।
* * *

वह हमेशा उल्लास से भरी रहती। एक जगह एक ही भाव में रुकना उसका हिस्सा न था। जब हमने तय किया कि अब आगे हम एक साथ नहीं हो सकते। तब भी उसने ज़रा सी देर चुप रहने की जगह गहरी सांस ली। कुर्सी से उठी और जल्दी में कुछ खोजने लगी।

बाद बरसों के देखा कि वह टेबल पर झुकी कुछ पढ़ रही थी। वह क्या पढ़ रही थी, ये नहीं जाना जा सकता था। इतनी एकाग्रता से उसे पढ़ते हुए कभी नहीं देखा था। वह जो जेब से बाहर दिखते पेन को पसन्द न करती थी, उसी ने पेन को दांतों में दबा रखा था। उसके बाएं गाल पर बहुत ऊपर का बड़ा तिल अब और बड़ा हो गया था। उसके बाल अब भी पहले की ही तरह उलझे थे, यही एक बात नहीं बदली थी।

मैंने अपने पैरों की तरफ देखा। मैंने काले फॉर्मल शू पहने हुए थे। मैंने याद करना चाहा कि सेंडिल पहने घूमना कब बन्द कर दिया था। मैं बदल गया था। मैं बदलना नहीं चाहता था। मैं उसके लिए वैसा ही रहना चाहता था केजुअल सेंडिल, जीन्स और सफेद कमीज वाला।

इससे पहले कि वह मेरे जूते देख लेती, मैंने पीठ फेर ली। मुझे लगा कि मैंने किसी अजनबी के जूते पहन लिए हैं। उन काले फॉर्मल जूतों के साथ तेज़ क़दम मैं उससे बहुत दूर निकल आया।

हालांकि हमारे बीच का सम्बंध बहुत साल पहले से ख़त्म था।
* * *

हम एक रोज़ दोबारा कभी नहीं मिलने के लिए बिछड़ गए थे।

फिर एक सुबह नियति ने हमें एक ही वेटिंग रूम में लाकर छोड़ दिया। बैंच के किनारों पर बैठे हुए दोनों ने शायद कई बार सोचा कि उठ जाएं। मगर जाने क्या बात थी कि कोई नहीं उठ पाया।

मैंने जैसे ही बैकपैक की पट्टियों को पकड़ा, उसने आंखें बंद कर ली। वह मुझे जाते हुए नहीं देखना चाहती थी या मेरे चले जाने के लिए आंखें मूंदे थी। मैं नहीं जानता। मगर उन बन्द आंखों को देखते हुए वेटिंग रूम से बाहर आना आसान था। 
* * *

बंद रास्ते अच्छे होते हैं। हम जानते हैं कि लौट जाना है। किन्तु खुले रास्तों पर हताश मन को कभी समझ नहीं आता कि वह किधर जाए।
* * *

October 7, 2017

आस्ताने में दुबकी छाँव

धीरे से बादल चले आये. दोपहर में शाम का भ्रम होने लगा. 

बाहर निगाह डाली. खिड़की से दीखते सामने वाले घर की दीवार पर छाया उतरी हुई थी. एक गिलहरी ज़मीन की ओर मुंह किये लटकी थी. वह चुप और स्थिर थी मगर उसे इस तरह नीचे देखते हुए देखकर लगा कि वह है. उसे देखकर तसल्ली आई कि अभी सबकुछ ठहरा नहीं है. 

शहतीर के नीचे उखड़े प्लास्टर में बने घरोंदे से झांकते तिनके हवा के साथ हिल रहे थे. लोहे के जंगले पर बैठी रहने वाली चिड़ियाँ गुम थी. इस तरह बाहर झांकते हुए अचानक लगने लगा कि ये कोई स्वप्न है. वही स्वप्न जिसमें ज्यादातर खालीपन पसरा होता है. अचानक कुछ हमारे सामने आता है और हम उससे टकराने के भय से भरकर सिहर जाते हैं. 

मन भी ऐसे ही सिहर गया. अचानक लगा तुम खिड़की के आगे से गुज़रे.
इस दौर में हमारे पास कितना साबुत मन बचा है. उसकी उम्र क्या है. इसलिए कि हम जल्दी-जल्दी लिखकर, तेज़-तेज़ बोलकर, कैमरा पर फटाफट देखकर, बाहों में भर लेने जैसा सबकुछ सच्चा-सच्चा लगने सा जी लेते हैं. और शिथिल होकर बैठ जाते हैं. 

ठीक वैसे जैसे बादलों ने एक कड़ी दोपहर को छाँव से भर दिया हो. 

आँखें सामने दिखती दीवार को देखती रहती है. कान, दूर तक जाकर किसी आहट का पता कर आते हैं. चुप्पी है. आँखें मुंदने लगती हैं. कोई साया आहिस्ता से सीढियों को चढ़ता, खुली पतली बालकनी की ओर मुड़ जाता है. 

आँखें अचानक खुलकर खिड़की को एकटक देखने लगती हैं. कि वह साया दोबारा यही से गुज़रेगा. कोई नहीं गुज़रता. मन कहीं बहुत दूर किसी पुराने भव्य किले के द्वार पर जा बैठता है. बादल गुम गए हैं. दूर तक कड़ी धूप पसरी है. लम्बे दालान का फर्श गरम हो गया है. झरोखे खाली हैं. मेहराबें सूनी है. और कोई नहीं है. 

कोई नहीं. 

मन सोचता है यहाँ से उठ जाऊं. सामने सूने पड़े आस्ताने की तक चला जाऊं. वहां जाकर बैठ जाऊं. एक थकान रगों के रास्ते पूरे बदन में फैल जाती है. कि वहां बैठकर किसका इंतज़ार करना होगा. शाम कब तक आएगी. उसके बाद क्या होगा. क्यों कोई आएगा. कोई आया तो वो कौन होगा. क्या वह मेरे पास किसी खम्भे से पीठ टिकाकर बैठेगा. 

गिलहरी अब भी चुप है. नीचे देख रही है. जैसे हम अपने किसी प्रिय को बदलते हुए देखकर, हताशा में ठहर जाते हैं.

October 6, 2017

चश्मे के पीछे छुपी उसकी आँखें

छोटे बच्चे की तरह 
अँगुलियों पर जाने क्या गिनता रहता है मन.

उसने कहा- "किशोर सर, स्मार्ट फोन में एक एप है. जो हमारे बोलने को लिखता है और लिखे हुए को पढ़कर सुनाता है. ये कितना अच्छा है" उसकी आवाज़ में उत्साह था. प्रसन्नता भी थी. उसकी ख़ुशी सुनकर मेरी आँखें मुस्कुराने लगी. हालाँकि उसे लिखना आता था. कुछ साल पहले उससे मिला था तब उसने कागज़ पर मेरा नाम उकेर कर दिया था. अपनी अंगुली से अपने ही लिखे उस नाम को पढ़ा, किशोर चौधरी. और फिर ऐसे हामी में सर हिलाया जैसे काम सही हो गया हो.

स्टूडियो में उसने पूछा. "क्या मेरे सामने माइक्रोफोन रखा है?" मैंने कहा- "हाँ आपके सामने है." उसने कहा- "माइक्रोफोन को छूना तो अच्छा नहीं होता न?" मैंने कहा- "आप चाहें तो छू सकती हैं" उसने अपने हाथ को चेहरे की सीध में लाने के बाद सामने बढ़ाया. मुझे लगा कि वो माइक को देख पा रही हैं. इतने सधे तरीके से माइक को छूना, मुझे एक ठहराव से भरने लगा. बेहद नाज़ुकी से उसकी अँगुलियों ने माइक की जाली की बुनावट को चारों तरफ से छुआ. उसके चेहरे पर संतोष था. अचानक कहा- "तो ये है वो माइक जिससे रेडियो पर बोला जाता है"

एलईडी की रोशनी से भरे स्टूडियो की दीवारों पर लगे आवाज़ सोखने वाले परदे चुप थे. हरे रंग की मेज चुप थी. नीला कालीन चुप था. काले चश्मे के पीछे छुपी उसकी आँखें शायद कुछ बोल रही होंगी कि उसके होठों पर मुस्कान थी.

"किशोर सर, यहाँ बैठने के लिए और कुर्सी है तो आप बैठ जाइए. मैं आपसे सुनना चाहती हूँ, ये आल इण्डिया रेडियो है. अब हमारी सभा आरम्भ होती है." मैं हंसने लगा.

इसके बाद मैंने बहुत देर तक उससे बातें की. वे बातें पढने, लिखने और स्याही से भरी ज़िन्दगी को जीने के बारे में थी. मैंने पूछा- "आपको कैसे मालूम होता है कि दिन है या रात?" उसने कहा- "मैं तापमान से पता कर लेती हूँ. दिन और रात में हर समय का तापमान अलग होता है. मुझे उसी से पता चलता है कि सुबह होने को है या शाम ढलने को है या दोपहर में आज कितनी कड़ी धूप है"

उसने कहा- "सर आप रेडियो पर कितना अलग बोलते हैं. ऐसा लगता है जैसे कोई बहुत बड़ा आदमी बोल रहा है. और आप फोन पर तो ऐसे नहीं बोलते."

मैंने कहा- " फोन पर बोलने के पैसे नहीं मिलते इसलिए..."

हम देर तक हँसे.

एक अक्टूबर की सुबह उगते सूरज की तस्वीर खींची थी. उस तस्वीर को देखकर भी उसकी याद आई. कि वह अपने घर में इस उगते हुए सूरज को महसूस कर रही होगी. हम कितने अभागे हैं कि खुली आँखों से कुछ नहीं देखते, कुछ महसूस नहीं कर पाते.

October 3, 2017

तुमसे कभी नहीं मिलना चाहिए था

बेचैनी के पांव नहीं थे। उसके आने की आहट नहीं सुनाई दी। आहिस्ता से हर चीज़ का रंग बदलने लगा। कमरे में खालीपन भरने लगा। पेशानी में और बल पड़े कि शायद बालकनी में भी एक चुप्पी आ बैठी होगी। तुम एक लकीर की तरह होते तो भी मिटाया न जा सकता था। कि तुम्हारे होने को अंगुलियां किस तरह छूती।

कोरे मन पर एक स्याह लकीर को छूना सबसे अधिक डरावना लगता है।

न इंतज़ार, न कोई आमद का ख़याल कि सब कुछ ठहरा हुआ। दुख भी कुछ नहीं। बस एक ठहरी हुई ज़िन्दगी। छू लो तो जाने किस जानिब चल पड़े, यही सोच कर अंगुलियां आपस में बांध ली।

आवाज़ के नन्हे टुकड़े फेंकती एक चिड़िया के फुर्र से उड़ जाने के बाद गिलहरी की लंबी ट्वीट से सन्नाटा टूट गया। एक सिहरन सब चीजों पर उतर गई। दोपहर का एक बजा होगा। शायद एक।

ये किस मौसम की दोपहर है। हल्की धूप है। कमरे में सर्द सीली गन्ध है। गुनगुनी छुअन वक़्त में कहीं नीचे दब गई है। अपने घुटने पेट की तरफ मोड़ते हुए लगता है कि मेरा होना थोड़ा और सिमट गया है।

कि अब खालीपन कम-कम छुएगा।

खिड़की से दिखते पहाड़ पर सब्ज़ा उग आया है। काश ऐसे ही इस अकेलेपन को भेदते हुए किसी आवाज़ के बूटे उग आएं। बेजान मन दो कदम दरवाज़े तक जाकर जूते देखने लगा। उनका रंग उड़ गया है या बारीक गर्द ने ढक लिया है।

थप-थप...

हवा में कोई बेचैनी फिर से उड़ी। सांस न लेने के लिए ख़ुद को रोक लिया। एक पत्थर की तरह कुछ पल खड़े रहकर जूते नीचे रख दिए। वाशरूम की दीवारों पर पीलापन पसर रहा है। सर पर गिरता पानी खालीपन को भर रहा है।

अचानक। घुटन के फंदे से बाहर आने को हाथ शॉवर को बंद करने के लिए दीवार को बेतरह छूते हैं। बिना हलचल की छटपटाहट पीछे की दीवार की ओर धकेल देती है। एक लंबी और डरावनी सांस आती है। दिल की धड़कन लम्बी सांस के सबसे ऊंचे शिखर पर अटक जाती है। शॉवर से पानी गिर रहा है।

मुझे तुमसे कभी नहीं मिलना चाहिए था।

कभी नहीं।
* * *

कहानियां कहना अच्छा होता है कि बहुत सी बातों को हम कहानी कहकर छिपा लेते हैं। देर तक किसी के सामने मुस्कुरा सकते हैं। उसी खालीपन में लौट जाने से पहले।

[Painting image courtesy : James McNill Whistler]

September 20, 2017

सर्द मौसम भला था

"ऐसे दूर हो। जैसे किसी और के पास हो।" इतना कहकर हमें चुप हो जाना चाहिए. इसे अधिक कोई क्या कह सकता है. जिस हगाह नज़र धुंधला जाये, जिस जगह पहाड़ शुरू होने लगे, जिस जगह गीलापन सूखने लगे. ऐसी हर जगह पर ठहर जाना चाहिए. बहुत गहरे विचार से पूरा समय लेकर तय करना चाहिए कि हमें अब किधर जाना चाहिए. 

सर्द दिनों में पहाड़
कोहरे से ढक जाते हैं।

सर्द दिनों में भीग जाती है
रेगिस्तान की रेत।

सर्द दिनों में समन्दर
हो जाते हैं बर्फ।

मेरा जाने क्या होगा?

कि जाने किससे हो जाये
तुमको प्रेम।
* * *

पिछली सर्दियों में तुमने बुनी थी
कहवा के प्याले के लिए स्वेटर।

इस बार के सर्द दिनों में
शायद तुम सिर्फ देख ही लो कभी, मेरी तरफ।

सर्द दिनों का केवल इसलिए इंतज़ार है।
* * *

सर्द दिनों में
कोई ध्यान नहीं देता
कि दरवाज़ा बन्द क्यों है?

इसलिये अच्छा है ये मौसम।

इसलिए भी अच्छा है
कि हम छुपा सकते हैं मुंह
और कोई नहीं पूछता
वो जो बेक़रारी थी,
वो जो इंतज़ार था कहाँ गया?
* * *

सर्द मौसम भला था
कि उन दिनों मिले थे हम।

अब भी भला होगा
कि ढके जा सकेंगे, पुराने हो चुके रिश्ते
सर्दी के नाम पर।
* * *

अक्सर ज़रूरी सवालों को समय की धूल ढक देती है। अक्सर हम भी तब तक उन सवालों को एक तरफ रखा मान लेते हैं।
* * *

September 13, 2017

किमाम लगी सिगरेट

किताबें धुएं से भरी रहती। आंगन पर राख बिखरी रहती।

आलों में और चारपाई पर सड़े हुए गले की तस्वीर के साथ केंसर की चेतावनी छपे खाली-भरे पैकेट पड़े रहते। तंबाकू की बासी गन्ध हर दीवार से चिपकी रहती और खिड़कियों के रास्ते रिसती जाती। मुंह का कसैले स्वाद से पुराना परिचय था। मगर एक लकीर के आगे धुआं असर खो देता। केवल तलब बची रह जाती है। जैसे सांकल में खुद अपना पैर रखा है और घसीट रहे हैं।

जैसे दसों दिशाओं से प्रेम में लिपटे रहने पर भी सुकून नहीं आता। बार-बार चाहना से भीगे कोड़े को अपनी पीठ पर फटकारने से आवाज़ तो आती मगर क़रार न आता। ऊब बढ़ती जाती। प्रेम किये दुःख होय की चेतावनी भूलकर प्रेम में ही रम जाने के बाद सहसा कभी बेदिली होती ही है। बेअसर रिश्ते को ढोते हुए एक रोज़ ऊब जाते हैं। हम उसे एक तरफ रख देते हैं।

दो चार दिन में ही तम्बाकू की गंध किताबों, दीवारों और खिड़कियों को छोड़कर चली जाती है। ऐसे ही किसी और से चाहा प्रेम भी एक रोज़ चला जाता है। हम एक खुली सांस लेते हैं।

जो अपने भीतर उपजे और दूजे पर आश्रित न हो वही प्रेम रखना।

September 12, 2017

प्रेम के आगे चेक का निशान

तुमने एक बार झाँका 
और चले गए 
ये कैसा प्रेम करते थे तुम.

रात टेबल पर पांव रखे थे. लम्बी कुर्सी पर अधलेटा था. पहला पहर ही बीत रहा था मगर बदन की नाव, नींद के दरिया में उतरने लगी थी. पहले हिचकोले में आँख खुली. दूजे हिचकोले के मोह में आँखें फिर से बंद हो गयी.

प्रेम स्वप्न ही है. नींद का हो तो और अच्छा.

हवा में कलाबाज़ी खाते बजरीगर की तरह प्रेम में चौंक थी. प्रेम में बंदरों वाला मौन था. क्षण भर ध्यान भरी प्रतीक्षा सा दीखता और क्षणभर बाद असंगत नृत्य में लीन मिलता. कभी-कभी प्रेम टीस भरा बेहद छोटा गाना था. कोई परिंदा मुंडेर पर बैठकर गाता और उड़ जाता. जब कुछ न होता तब प्रेम कीकर का सफ़ेद लम्बा काँटा हो जाता था.

मैंने जो महसूस किया, वो लिखा. तुमने समझ लिया कि मैं कोई जादूगर हूँ.

वे किताबें जिनसे तुमको अचानक मोहोब्बत हो जाती है, वे किताबें मेरी हसरतें न थीं. वे किसी लम्हे में बिना चाहना के उग आई थीं. उदासी, टूटन और हताशा थी. यही प्रेम भी था. किसी के साथ थे. तनहा थे. जहाँ जैसे थे, वैसा होने में ज्यादा शिकायतें न थी. प्रेम करते थे. फिर से प्रेम करने लगते थे. आते थे. रुकते थे. और चले जाते थे. इसी सब में सारी परिभाषाएं समा गयीं थी.

इसलिए बहुत बार चुप रहे. 
* * *

फेसबुक पर बहुत से नौजवान लेखन की वजह से मुझसे जुड़ते रहते हैं. उन नौजवान पाठकों ने किताबें पढ़ीं तो तात्कालिक उल्लास में किताबों के साथ अपने फोटो टाँगे. लिखी हुई बातें उद्धृत कीं. अपनी सकल प्रशंसा के साथ टैग कर दिया. इनबॉक्स किया. नम्बर माँगा. नम्बर दे दिया. बात करनी चाही. और फिर रूठ गए.

मेरे पास बहुत थोड़ा समय है. उससे भी कम मन है.

मेरे पास कोई सहायक नहीं है, जो मेरी ओर से जवाब देता रहे. किसी को प्रतीक्षा न करनी पड़े. कोई उपेक्षित महसूस न करे. मेरे पास केवल मैं हूँ. अनगढ़, ला परवाह और किसी इल्यूजन में खोया हुआ. मेरे पास कहने के लिए एक ही बात है. जब मिलेंगे तब तुमसे सटकर बैठेंगे. जैसे दो प्रेमी बैठे हों.

प्रेम के आगे चेक का निशान लगाये रखो. 
* * *

दुनिया बहुत तंगहाल है. थोड़ा सा दिल बड़ा रखो. थोड़ा सा सब्र करो.

शुक्रिया.

[तस्वीर - गूगल सर्च]

September 8, 2017

जाने किसलिए

हर बात, टीन ऐज़ का मसला नहीं है। यहां जो हासिल है, वही है। बाकी सब छोटी खुशियां हैं। जिनके बारे में पक्का कुछ पता नहीं होता। लोग फिर भी ख़्वाब सी ज़िन्दगी देखते हैं। 


एक ही रास्ते से गुज़रते हुए हम देखना बंद कर देते हैं कि आस पास क्या है. यही हाल असल में हम ज़िन्दगी के साथ भी करते हैं कि उसे जीते समय भूल जाते हैं कि ज़िन्दगी जी रहे हैं. 

रेलवे क्रोसिंग से पहले एक अंधा मोड़ पड़ता है। ड्राइवर देर तक विशल बजाता है। रेल की विशल के साथ परिंदे गोता लगाते हैं।

जब भी कहीं रुक जाना होता है किसी मज़बूरी में केवल तब ही सोचने लगता हूँ अपने बारे में  कि पल भर में आसमान स्याह होने लगता है। तारे टिमटिमाते हैं। जाने किसलिए। 

एक रोज़ पंख
मिट्टी में दबकर मिट गए,
आकाश नहीं टूटा
कभी किसी के लिए।
* * *

अब कहाँ वादे,
कहाँ मिलने का हौसला,
कहाँ ठोकरों पर ज़माना।

कभी कहीं पास हुए तो

तुमको झुककर चूम लेंगे।
* * *

ज़िन्दगी के सब दांव
हम खेल चुके हैं.

हम हैं, यही बड़ी बात है.
जब तक रहें शुक्रिया.
* * *

September 4, 2017

सब खोए होंगे ख़यालों में

पूर्व प्रेयसियां भली थीं.

उन्होंने ब्रेकअप के बाद कहा कि वो मेरे पीछे था. उसने मेरे लिए क्या कुछ न किया. मैंने आखिरकार अपना सब कुछ सौंप दिया. वह बेवफ़ा निकला. मगर उन्होंने ये कभी न कहा कि वह अपनी बीवी से उकताया हुआ था. वह उसे पसंद नहीं करता था. इसलिए ही भली थी.

पूर्व प्रेमी भले नहीं थे.


उन्होंने सबकुछ नष्ट करके भी पीछा नहीं छोड़ा. वे मौसमी घास की तरह उग आते रहे. कभी-कभी बदतमीज भी थे. कभी रोते थे और रोने के बाद भूल जाते थे कि वे अभी-अभी रो रहे थे. वे हर बार उतना ही टूट कर प्रेम करते थे. मगर हर बार प्रेम करके भूल जाते थे. इसलिए ही शायद भले नहीं थे. 
* * *

बेवजह की बात एक बार ज़ेहन में आती है तो वहीँ अटक जाती है. जब तक उसे कह न दो, वह अटकी रहती है. जैसे हम अपने प्रेम की किसी निशानी को कहीं रख देते हैं और भूल नहीं पाते.

आज की रात चाँद खिला है. छत पर रोशनी है. दूर तक कुछ न कुछ दीखता है. मैं चारपाई पर अधलेटा. दो अलग ब्रांड की व्हिस्की को पीते हुए सोचता हूँ. उन लोगों का क्या होगा? वे जो अब प्रेम करेंगे. जाने क्या होगा मगर उनके लिए कुछ बेवजह की बातें

धोखा लगातार
प्रेम की टोह में रहता है।

पहले अंदेशे में
जो भाग नहीं पाते उनको
धोखा अपनी बाहों में भर लेता है।
* * *

धोखे के पास हर रंग होता है
वह घास में घास सा
छांव में छांव सा दिखता है।

प्रेम को रंग बदलना नहीं आता
इसलिए अक्सर मारा जाता है।
* * *

धोखे की पूंछ लम्बी होती है
उसे सम्भलना होता है हर दांव में।

प्रेम की पूंछ बहुत छोटी होती है
प्रेम को दांव नहीं खेलना होता है।
* * *

धोखा देख सकता है
बेहद कम रोशनी में।

प्रेम कभी नहीं देखता, कुछ भी।
* * *

धोखा चुनता है
रास्ते और सही अवसर।

प्रेम खोया रहता है, जाने किस ख़याल में।
* * *

प्रेम का
मौसम आता है।

धोखा सदाबहार है।
* * *

हज़ार धोखे हैं।
मगर प्रेम लाख हैं।

ताकि चलता रहे कारोबार।
* * *

रात के इस वक़्त कौन प्रेमी पढ़ रहा होगा कुछ. सब खोए होंगे ख़यालों में. दुआ कि सबको प्रेम मिले.



[Picture credit : Pragati Singh]

September 1, 2017

इमोटिकॉन्स - भाषा में मोक्ष का मार्ग

कोई किस हाल में जी रहा है, ये तुम कभी भी जान और समझ नहीं सकते हो. इसलिए सबके लिए थोड़ा प्यार रखना. कुछ बोलकर किसी का भी दिल न दुखाना.
* * *

कल सुबह बारिश हो रही थी. बारिश के सुर में जीवन के आलाप को सुनते, मैं बहुत देर तक बालकनी से बादलों के बरसते हुए फाहे देखता रहा. चाय की ख़ुशबू, कहानी की किताबों के पन्ने, बाहर दूर तक फैली हरी झीनी चादर के बीच बने रास्ते सम्मोहक थे. जीवन में एक ठहरा हुआ सुकून भरा पल कितनी हीलिंग से भरा होता है? ये हम अक्सर समझ नहीं पाते हैं.

अगस्त की आखिरी शाम को जयपुर की सड़कों से भीड़ गायब थी.

जगतपुरा से विद्याधर नगर वहां से मानसरोवर होते हुए मालवीय नगर तक आते हुए देखा कि शहर किसी सुस्ती में डूबा है. शायद बारिश ने शहर की बदहवास दौड़ पर आराम का कोई फाहा रखा होगा.

मॉल्स पर भीड़ नहीं थी. मैंने आभा से कहा- "बताओ क्या उपहार लिया जाये. कल आपका जन्मदिन है" आभा ने अपनी आँखों से इशारा किया जिसका अर्थ था- "मैं बेहद ख़ुश हूँ और जीवन ने जो दिया है, वह बहुत है." क्या सचमुच एक इशारे भर से इतना कहा जा सकता है? आप इससे असहमत हो सकते हैं. लेकिन वास्तविकता ये है कि भाषा के संकेत कुछ नहीं कहते हैं. हमने ही उन संकेतों के अर्थ तय किये हैं. लेकिन चेहरे के संकेत, आँखों के इशारे और हमारे बदन की लय एक अलिखित और बेहद व्यापक अर्थों वाली भाषा है.

हम जिस दौर में जी रहे हैं, उसमें संकेतों की एक नई भाषा है. ईमेल से सोशल एप तक के लम्बे सफ़र में इमोटिकॉन्स हमारे संवाद का अविभाज्य हिस्सा हो गए हैं. इमोटिकॉन्स की खोज किसने की थी? आप इसे गूगल करेंगे तो एक ठीक नाम पाएंगे स्कॉट फह्लमैन. गूगल आपको ये भी बताएगा कि इस खोज का वर्ष था, उन्नीस सौ बयासी.

अल्प विरामों और बोधक चिन्हों के मेल से किसी चेहरे के साथ अनुभूति का मिश्रण इमोटिकॉन है. इमोशन और आइकॉन से मिलकर बना ये शब्द और ये जादू अद्भुत है. मैं अपने दोस्तों, चाहने वालों और प्रसंशकों से बातचीत में बहुत बार या ज्यादातर इस तरह बात करता हूँ कि शब्द दो चार लिखता हूँ और इमोटिकॉन्स सौ-डेढ़ सौ. उनको हमेशा इस बात से तकलीफ होती है. वे कहते हैं हम बोलते रहते हैं. बक-बक करते हैं. आप केवल स्माइली बनाकर चलते बनते हैं.

मैं किसी से प्रेम करूँ तो उसके लिए प्रतिक्रिया में दिल बना दूँ. मैं अपनी तारीफ सुनकर एक लजाता चेहरा बना दूँ. ब्लश करने को आप कभी उतना अच्छा नहीं लिख सकते जितना कि ब्लश करती स्माइली से अभिव्यक्त कर पाते हैं. आप किसी अच्छी बात के लिए एक तारीफ भरा अंगूठा दिखा सकते हैं. आप किसी के बुरे व्यवहार के लिए माथे पर सलवटों से भरा लाल चेहरा बना सकते हैं.

ये सब है तो क्यों अपने आपको शब्दों में बेजा खर्च करें. आपके पास कितना समय है कि गप करते जाये. अपने काम भूलकर किसी को प्रसन्न रखने के लिए लिखें. बेमन जवाब देते जाएँ. दुनिया जितनी सिमटी है, आदमी के पास वक़्त की उतनी ही कमी हुई है. आप ग्लोबल होने की जगह ग्रामीण होकर देखिये. आप पाएंगे कि उम्र लम्बी हो गयी है. लेकिन हम ग्लोबल होने को अभिशप्त हैं. इसलिए लम्बे उबाऊ संवादों की जगह अनेक अर्थ देने वाली स्माइली मुझे ज्यादा उपयोगी लगती है.

इसे आप एक बेहद मामूली और अस्थायी कहकर बिसरा सकते हैं. लेकिन ये भाषा के भीतर उपस्थित विद्रोही हैं. इमोटिकॉन्स, अक्षरों से बनी शब्दों की भाषा को चुनौती है. हमारी संस्कृति, भाषा और संवाद पर कब्ज़ा करने की अविराम होड़ में इमोटिकोंस कम तनाव और भद्र विरोधों की नयी कल्चर को आगे बढ़ा रहे हैं.

जब भी कोई बड़ी असहमति होती है तब अगर बोला या लिखा न जाये और संकेतों से विरोध जता दिया जाये तो जीवन में एक अविश्वसनीय आसानी उग सकती है. हम अपने कहे और लिखे को लेकर लम्बे कष्ट उठाते हैं. लेकिन अक्सर संकेतों की भाषा में की गयी प्रतिक्रिया के कारण कम तकलीफ पाते हैं.

हमारी संकेतों की प्राचीन दुनिया के बीजक अभी तक पढ़े नहीं जा सके हैं. हम चाँद सितारों को जान लेने के लिए जितना काम कर रहे हैं, वह बहुत महत्वपूर्ण है. लेकिन हमारे पुरखे संकेतों की जो भाषा गुफाओं, तहखानों, पिरामिडों और ज़मीं में दबे हुए खंडहरों में छोड़ गए हैं. उसे पढने के लिए इतना काम नहीं कर सके हैं. मनुष्य वस्तुतः अपने भविष्य को लेकर जितना संवेदनशील हैं. अतीत के लिए ठीक उतना ही असंवेदन से भरा है.

हम होड़ में हैं इसलिए आगे ही देखना चाहते हैं. हम बीजकों में छिपे रहस्य भरे सूत्रों को समझने में वक़्त इसलिए नहीं गंवाना चाहते कि उस आनंद की प्राप्ति के प्रति आश्वस्त नहीं है. हम मंगल पर नया जीवन बसा पाएंगे या नहीं मगर इस सम्भव के लिए आशा रखते हैं.

इमोटिकॉन्स पर दुनिया भर में हजारों शोध किये गए हैं. ये शोध सामाजिक, व्यावहारिक और भाषा के साथ मनोविज्ञान से सरोकार रखते हैं. ये शोध अस्सी के दशक में हुए इस अविष्कार के उपयोग और फिर नब्बे के दशक में जापान में टेलीकम्युनिकेशन की भाषा में शामिल आइकॉन के प्रभाव को बहुत व्यापक बताते हैं. सबसे पहले जापान में ज्यादातर टेली ओपरेटर स्माइली की लेंग्वेज को अपडेट कर रहे थे. लोग इनका तेज़ी से उपयोग करने लगे थे. बहुत से लोग ये मानते हैं कि जापान ही स्माइली की उर्वरा भूमि है. जिसने इनको सुन्दर और प्रचलित बनाया है. वहीँ से इमोजी शब्द से हमारा परिचय हुआ है.

राकयेल एम ब्रिग्ग्स ने अपने शोध में इमोटिकॉन्स के बारे में कहा हैं- "मनुष्य के वृहद् सामाजिक इतिहास में हमारे व्यवहार विकास और सामाजिक अनुभव में इमोटिकोंस की उपस्थिति महत्त्वपूर्ण और व्यापक है."

इमोटिकॉन्स के बाद ये स्माइली, पिक्चर मेसेज के अगले पायदान पर है. जापान और चीन में तीन पीढियां इनके माध्यम से संवाद कर रही है. स्पेनिश लोग तो कलात्मक रूप से इनका उपयोग कर रहे हैं. सुविधाओं के उच्च शिखर पर बैठे दुनिया के शोषक अमेरिकन भी अपने हताश जीवन में नयी आशा के लिए स्माइली, इमोटिकॉन्स, पिक्चर मेसेज पर गहरा शोध कर रहे हैं.

भारत देश को बहुत बार सौ साल पीछे होने के लिए कोसा जाता है. पाश्चात्य अविष्कारों के सर्वाधिक प्रयोगकर्ता देश के सर पीछे होने का लेबल बेजा नहीं है. हम असल में सन्यास की अवधारणा और निठल्ले होने में सुख खोजने वाले लोग हैं. दुनिया भर के स्पेस कार्यक्रम को भारत ने अंगूठा दिखा दिया है. अन्तरिक्ष में उपग्रह स्थापित करने के कारोबार को भारत अगले दस साल में अधिग्रहित कर ले तो भी कोई आश्चर्य नहीं होगा. असल में आश्चर्य तब होगा जब हम फिर से नदी के घाट और सूने रेगिस्तान की बावड़ी के किनारे बैठकर सोचना शुरू करेंगे. कि धरती कैसे बनी है. प्राणी क्या हैं और हम सब कहाँ जायेंगे?

ये इमोटिकॉन्स हमारी भाषा में मोक्ष का मार्ग बना रहे हैं.

साल दो हज़ार दस से दुनिया भर में प्रचलित हुई नयी भाषा के स्टीकर अद्भुत हैं. लेकिन भारत में पिक्चर मेसेज ज्यादातर उधार के हैं. हमें जिस किसी एप ने जो दिया हमने अपना लिया. हमारे अपने ओरिजनल काम में दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस कॉलेज में हिंदी की एसो. प्रोफ़ेसर अपराजिता शर्मा बेहतरीन हैं. उनके नाम और काम से मेरा परिचय नीलिमा चौहान की किताब पतनशील पत्नियों के नोट्स में किये गए इलेस्ट्रेशन से हुआ था. उसके बाद मैंने फेसबुक पर उनके बहुत सारे काम को देखा. अपराजिता का काम इसलिए अच्छा है कि वे अपनी कल्पना की कश्ती को व्योम में उतार देती हैं. जब तक वे कल्पना को ठहरने न देंगी ये काम और सुन्दर होता जायेगा. लेखन और कलाएं कल्पनाशक्ति से ही प्राण पाती हैं.

आज की सुबह मैंने आभा को व्हाट्स एप पर एक बेहद सुन्दर बधाई भेजी है. ये अपराजिता का 'सितम्बर महीने का स्वागत' है. मेरे लिए सितम्बर का पहला दिन स्वागत का ही दिन है कि इसी दिन वो लडकी दुनिया में आई जिसने मुझे अपने बराबर बनाये रखा. जो मेरी तमाम खामियों और खूबियों को सहजता से स्वीकारती रही. जिसने मुझे लिखने के लिए स्पेस दिया. जिसने प्यार किया.

हैप्पी बर्थडे आभा.

August 27, 2017

प्रेम का जाने क्या होता है

सायकिल के कॅरियर पर बैठे
उनींदे बच्चे के पांव से गिरे
कच्चे हरे नीले रंग के जूते की तरह।

अक्सर कहीं पीछे छूट जाता है, प्रेम।
* * *

मैं चलते हुए अचानक रुक गया. जैसे कोई चिट्ठी जेब से गिर गयी. मुझे बहुत सालों से किसी ने चिट्ठी लिखी न थी. मैंने रेत में चारों तरफ देखा. वहां कोई चिट्ठी न थी. कोई कागज़ का टुकड़ा भी न था. एक काला मोती, सोने जैसी रेत में पड़ा था. अचानक मुझे याद आया कि उसके नाक पर बेढब तरीके से बैठा काला तिल सुन्दर दिखता है. उसके बच्चे बड़े हो गए हैं. मगर वह तिल उतना ही वहीँ ठहरा हुआ है.

मैंने कभी उससे नहीं कहा कि तुम्हारे नाक पर ये तिल कैसा लगता है. उसका वहां होना ही ठीक था. जैसे हम दोनों का एक साथ होते हुए भी एक साथ न होना ठीक था. ऐसे ही रेत में पड़ा काला मनका रेत के साथ होने पर ही सुन्दर था.

जाने क्यों प्रेम भी काले मोती की तरह रेत में सुन्दर दीखता तो है मगर बहुत जल्द खो जाता है.
* * *


छोटी नीली चिड़िया को
चाहिए होती है जितनी जगह
एक पतली सी टहनी पर।

सबको
बस उतना सा प्यार चाहिए होता है।
* * *

मेरी ज़रूरतें बहुत कम है
और तुम बहुत से अधिक हो।

मेरे लिए
तुम्हारा थोड़ा सा साथ
काफी से बढ़कर होता है।
* * *

शुक्रिया कहने का सलीका
नहीं सीखा जा सका, मुझसे।

मेरे पास तुम्हारे लिए, सदा भीगे होठ रहे।
* * *

तुमसे जो भी मिला
वह चाहना से ज्यादा निकला।

मिलने की बेचैनी बहुत गहरी रही
तुमसे बिछड़कर आंसू टूटकर बहे।
* * *

ठेलों पर पड़े
पुराने कपड़ों की तरह
पुराना प्रेम
बचा रहा स्मृति के खटोले पर।
* * *

समय रुक नहीं जाता था
घड़ी के बंद हो जाने पर।

इसलिए हम चाबी भरते रहे।

रुक गए प्रेम को
आगे बढ़ाने की जुगत न मिली।
* * *

पंछी उड़कर
फिर लौट आता है घोंसले पर।

कभी अचानक
हमेशा के लिए नहीं भी आता।

प्रेम का जाने क्या होता है।
* * *

धूप में पड़ी कुर्सी
एक दिन मर गयी।

दिल मे छुपाकर रखा प्रेम भी नहीं बचा।
* * *


प्रेम नदी के बीच का सफेद भंवर न था. वह भूरे पहाड़ की स्याह उपत्यका भी न था. उसने कहा- "आप मिलने के बाद भूल जाते हो" मैंने बहुत देर तक सोचा. मैं कितना खराब आदमी हूँ. इस तरह साथ होता हूँ जैसे इसके सिवा कहीं का नहीं हूँ. फिर इस तरह चला जाता हूँ कि जैसे कुछ था ही नहीं.

कमसिन लड़कियां और लड़के कभी नहीं समझ पाते कि उनकी ज़रूरत क्या है.

मैं जो समझता हूँ, वह तुम न समझो तो अच्छा है. प्रेम-प्रेम करना बड़ा रूमानी काम है. लेकिन दोस्त मुझे सिर्फ तुम्हारी ज़रूरत होती है. इतना समझ आता है. इसमें कितना प्रेम है? इस बारे में मैंने कभी सोचा नहीं.

तुम भी अगर न सोचोगे तो सुख पाओगे.
* * *

August 18, 2017

सराह एप - ओट से चलते बाण

असल में ऐप के पीछे छुपा हुआ शुभचिंतक आपकी हर तरह से हत्या का इरादा रखता है। आप समझ नहीं रहे।

मेरे पिता के ज़माने के लोग कहा करते थे कि अपनों को मुंह पर डांटते रहिये, पीठ के पीछे उनकी प्रसंशा कीजिये। एक ऐंटी सोशल एप ने बुजुर्गों की ये बात याद दिला दी है। अब चुपके से बिना नाम बताए ढेर तारीफें फेंकी जा रही हैं।

लेकिन मेरा एक डर अभी बाकी है। ये अदृश्य लोग कितने ख़तरनाक हैं। ये आपकी अच्छाइयों को आपके सामने स्वीकारते नहीं हैं। ये लोग आपके सामने प्यार और इज्ज़त से देखते नहीं लेकिन पसमंज़र में आपके लिए दिल उछाले जा रहे हैं। आपको अपना क्रश बता रहे हैं। आपको डेट पर चलने के न्योते दे रहे हैं।

किसी भी व्यक्तित्व को सम्मान और प्रेम चाहिए होता है। वह आपके मुख से अपने बारे में दो मीठी बातें सुनकर ख़ुश भी रहना चाहता है। हम ऐसा नहीं करते हैं।

एप पर आये संदेशे अगर आपने ख़ुद ख़ुदको नहीं भेजे हैं तो सावधान रहिये।

मैंने एप का उपयोग नहीं किया। अगर किया होता और कोई मुझे गुप्त तरीके से कहता कि आप अच्छी कहानियां लिखते हैं। तो ये हौसला अफ़ज़ाई क्या सचमुच होती? ऐसा क्यों है कि आप किसी को अच्छा कहने के लिए मुंह छुपाये रखना चाहते हैं। क्या किसी को सामने अच्छा कहने से आपका मुंह काला हो रहा है?

एप के पीछे छिपे लोग, आप जिन बातों के लिए डिजर्व करते हैं, उन गुणों के हत्यारे हैं।

आवाज़ के कुछ टुकड़े

के सी

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Kishore Choudhary is a poet and fiction writer from Barmer (Rajasthan). His writing career took a formal leap from his personal journals to make him a hugely popular blogger on two of his blogs- Kahaniyan and Hathkadh.

Having spent most of his formative years in the desert, the life there is his favourite canvas to contextualise his poetry and stories. His followers from across the world vouch for his realistic and authentic portrayal of the desert life and its typical dilemmas, fused beautifully and almost effortlessly with some stunning images of the desert and its folklore.

Kishore in a way pioneered the incorporation of pre-publishing interactions and feedback with his readers on his blogs and across social media platforms in his final works. His style is known for its lucid and unexampled metaphors that he exquisitely uses to express universal feelings like love, loneliness, hope, pain, longing and fantasy. 

His first collection of stories Chaurahe Par Seedhiyan (2012)was such a thumping bestseller that the first issue was sold out within 50 days of its launch.All the stories skilfully bring the rich and exotic background of the desert come alive and make the reader delve deeper into the layers of human emotions.This much sought after collection raised the bar for all contemporary Hindi works of short fiction and brought in a fresh change in the existing status quo for Hindi short stories. 

The second collection titled Dhoop Ke Aaiyne Mein(2013)had an array of short stories that looked at life through a multi-dimensional prism, lending each one of them a distinctive charm. Kishore being a poet first, his stories are more like poetic fiction. Having a great affinity to the stream of consciousness novels by English literary greats like James Joyce and Virginia Woolf his stories defy the conventional rules of a definitive beginning, middle and end. 

Kishore’s first publication was a collection of poetry Baatein Bewajah, an alluring and bewitching series of short poems which capture the vast expanse of human emotions and have images that have a rare haunting quality.

Kishore is a Radio Broadcaster by profession and has a special fondness for classical & folk music. Articles about him and his interviews are available across many major newspapers and websites. Kishore certainly is the Avant-garde flavour in contemporary Hindi writing and his ever expanding avid readership eagerly waits for his next chartbuster.

Kishore's latest is another collection called "Jaadu Bhari Ladki". This collection has his same imitable style of stories but the contexts and places are beyond the desert as well. 
His deep understanding of the complexity of modern relationships and how they play out in our minds, homes and workplaces makes it a very unique almost post-modern work in Hindi Fiction.

http://www.goodreads.com/author/show/7361739.Kishore_Chaudhary

हेंगओवर सिलसिला

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Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने या खूबसूरत स्त्री को इरादतन चूमने जितना ही अवैध है.

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