October 7, 2017

आस्ताने में दुबकी छाँव

धीरे से बादल चले आये. दोपहर में शाम का भ्रम होने लगा. 

बाहर निगाह डाली. खिड़की से दीखते सामने वाले घर की दीवार पर छाया उतरी हुई थी. एक गिलहरी ज़मीन की ओर मुंह किये लटकी थी. वह चुप और स्थिर थी मगर उसे इस तरह नीचे देखते हुए देखकर लगा कि वह है. उसे देखकर तसल्ली आई कि अभी सबकुछ ठहरा नहीं है. 

शहतीर के नीचे उखड़े प्लास्टर में बने घरोंदे से झांकते तिनके हवा के साथ हिल रहे थे. लोहे के जंगले पर बैठी रहने वाली चिड़ियाँ गुम थी. इस तरह बाहर झांकते हुए अचानक लगने लगा कि ये कोई स्वप्न है. वही स्वप्न जिसमें ज्यादातर खालीपन पसरा होता है. अचानक कुछ हमारे सामने आता है और हम उससे टकराने के भय से भरकर सिहर जाते हैं. 

मन भी ऐसे ही सिहर गया. अचानक लगा तुम खिड़की के आगे से गुज़रे.
इस दौर में हमारे पास कितना साबुत मन बचा है. उसकी उम्र क्या है. इसलिए कि हम जल्दी-जल्दी लिखकर, तेज़-तेज़ बोलकर, कैमरा पर फटाफट देखकर, बाहों में भर लेने जैसा सबकुछ सच्चा-सच्चा लगने सा जी लेते हैं. और शिथिल होकर बैठ जाते हैं. 

ठीक वैसे जैसे बादलों ने एक कड़ी दोपहर को छाँव से भर दिया हो. 

आँखें सामने दिखती दीवार को देखती रहती है. कान, दूर तक जाकर किसी आहट का पता कर आते हैं. चुप्पी है. आँखें मुंदने लगती हैं. कोई साया आहिस्ता से सीढियों को चढ़ता, खुली पतली बालकनी की ओर मुड़ जाता है. 

आँखें अचानक खुलकर खिड़की को एकटक देखने लगती हैं. कि वह साया दोबारा यही से गुज़रेगा. कोई नहीं गुज़रता. मन कहीं बहुत दूर किसी पुराने भव्य किले के द्वार पर जा बैठता है. बादल गुम गए हैं. दूर तक कड़ी धूप पसरी है. लम्बे दालान का फर्श गरम हो गया है. झरोखे खाली हैं. मेहराबें सूनी है. और कोई नहीं है. 

कोई नहीं. 

मन सोचता है यहाँ से उठ जाऊं. सामने सूने पड़े आस्ताने की तक चला जाऊं. वहां जाकर बैठ जाऊं. एक थकान रगों के रास्ते पूरे बदन में फैल जाती है. कि वहां बैठकर किसका इंतज़ार करना होगा. शाम कब तक आएगी. उसके बाद क्या होगा. क्यों कोई आएगा. कोई आया तो वो कौन होगा. क्या वह मेरे पास किसी खम्भे से पीठ टिकाकर बैठेगा. 

गिलहरी अब भी चुप है. नीचे देख रही है. जैसे हम अपने किसी प्रिय को बदलते हुए देखकर, हताशा में ठहर जाते हैं.

October 3, 2017

तुमसे कभी नहीं मिलना चाहिए था

बेचैनी के पांव नहीं थे। उसके आने की आहट नहीं सुनाई दी। आहिस्ता से हर चीज़ का रंग बदलने लगा। कमरे में खालीपन भरने लगा। पेशानी में और बल पड़े कि शायद बालकनी में भी एक चुप्पी आ बैठी होगी। तुम एक लकीर की तरह होते तो भी मिटाया न जा सकता था। कि तुम्हारे होने को अंगुलियां किस तरह छूती।

कोरे मन पर एक स्याह लकीर को छूना सबसे अधिक डरावना लगता है।

न इंतज़ार, न कोई आमद का ख़याल कि सब कुछ ठहरा हुआ। दुख भी कुछ नहीं। बस एक ठहरी हुई ज़िन्दगी। छू लो तो जाने किस जानिब चल पड़े, यही सोच कर अंगुलियां आपस में बांध ली।

आवाज़ के नन्हे टुकड़े फेंकती एक चिड़िया के फुर्र से उड़ जाने के बाद गिलहरी की लंबी ट्वीट से सन्नाटा टूट गया। एक सिहरन सब चीजों पर उतर गई। दोपहर का एक बजा होगा। शायद एक।

ये किस मौसम की दोपहर है। हल्की धूप है। कमरे में सर्द सीली गन्ध है। गुनगुनी छुअन वक़्त में कहीं नीचे दब गई है। अपने घुटने पेट की तरफ मोड़ते हुए लगता है कि मेरा होना थोड़ा और सिमट गया है।

कि अब खालीपन कम-कम छुएगा।

खिड़की से दिखते पहाड़ पर सब्ज़ा उग आया है। काश ऐसे ही इस अकेलेपन को भेदते हुए किसी आवाज़ के बूटे उग आएं। बेजान मन दो कदम दरवाज़े तक जाकर जूते देखने लगा। उनका रंग उड़ गया है या बारीक गर्द ने ढक लिया है।

थप-थप...

हवा में कोई बेचैनी फिर से उड़ी। सांस न लेने के लिए ख़ुद को रोक लिया। एक पत्थर की तरह कुछ पल खड़े रहकर जूते नीचे रख दिए। वाशरूम की दीवारों पर पीलापन पसर रहा है। सर पर गिरता पानी खालीपन को भर रहा है।

अचानक। घुटन के फंदे से बाहर आने को हाथ शॉवर को बंद करने के लिए दीवार को बेतरह छूते हैं। बिना हलचल की छटपटाहट पीछे की दीवार की ओर धकेल देती है। एक लंबी और डरावनी सांस आती है। दिल की धड़कन लम्बी सांस के सबसे ऊंचे शिखर पर अटक जाती है। शॉवर से पानी गिर रहा है।

मुझे तुमसे कभी नहीं मिलना चाहिए था।

कभी नहीं।
* * *

कहानियां कहना अच्छा होता है कि बहुत सी बातों को हम कहानी कहकर छिपा लेते हैं। देर तक किसी के सामने मुस्कुरा सकते हैं। उसी खालीपन में लौट जाने से पहले।

[Painting image courtesy : James McNill Whistler]

September 12, 2017

प्रेम के आगे चेक का निशान

तुमने एक बार झाँका 
और चले गए 
ये कैसा प्रेम करते थे तुम.

रात टेबल पर पांव रखे थे. लम्बी कुर्सी पर अधलेटा था. पहला पहर ही बीत रहा था मगर बदन की नाव, नींद के दरिया में उतरने लगी थी. पहले हिचकोले में आँख खुली. दूजे हिचकोले के मोह में आँखें फिर से बंद हो गयी.

प्रेम स्वप्न ही है. नींद का हो तो और अच्छा.

हवा में कलाबाज़ी खाते बजरीगर की तरह प्रेम में चौंक थी. प्रेम में बंदरों वाला मौन था. क्षण भर ध्यान भरी प्रतीक्षा सा दीखता और क्षणभर बाद असंगत नृत्य में लीन मिलता. कभी-कभी प्रेम टीस भरा बेहद छोटा गाना था. कोई परिंदा मुंडेर पर बैठकर गाता और उड़ जाता. जब कुछ न होता तब प्रेम कीकर का सफ़ेद लम्बा काँटा हो जाता था.

मैंने जो महसूस किया, वो लिखा. तुमने समझ लिया कि मैं कोई जादूगर हूँ.

वे किताबें जिनसे तुमको अचानक मोहोब्बत हो जाती है, वे किताबें मेरी हसरतें न थीं. वे किसी लम्हे में बिना चाहना के उग आई थीं. उदासी, टूटन और हताशा थी. यही प्रेम भी था. किसी के साथ थे. तनहा थे. जहाँ जैसे थे, वैसा होने में ज्यादा शिकायतें न थी. प्रेम करते थे. फिर से प्रेम करने लगते थे. आते थे. रुकते थे. और चले जाते थे. इसी सब में सारी परिभाषाएं समा गयीं थी.

इसलिए बहुत बार चुप रहे. 
* * *

फेसबुक पर बहुत से नौजवान लेखन की वजह से मुझसे जुड़ते रहते हैं. उन नौजवान पाठकों ने किताबें पढ़ीं तो तात्कालिक उल्लास में किताबों के साथ अपने फोटो टाँगे. लिखी हुई बातें उद्धृत कीं. अपनी सकल प्रशंसा के साथ टैग कर दिया. इनबॉक्स किया. नम्बर माँगा. नम्बर दे दिया. बात करनी चाही. और फिर रूठ गए.

मेरे पास बहुत थोड़ा समय है. उससे भी कम मन है.

मेरे पास कोई सहायक नहीं है, जो मेरी ओर से जवाब देता रहे. किसी को प्रतीक्षा न करनी पड़े. कोई उपेक्षित महसूस न करे. मेरे पास केवल मैं हूँ. अनगढ़, ला परवाह और किसी इल्यूजन में खोया हुआ. मेरे पास कहने के लिए एक ही बात है. जब मिलेंगे तब तुमसे सटकर बैठेंगे. जैसे दो प्रेमी बैठे हों.

प्रेम के आगे चेक का निशान लगाये रखो. 
* * *

दुनिया बहुत तंगहाल है. थोड़ा सा दिल बड़ा रखो. थोड़ा सा सब्र करो.

शुक्रिया.

[तस्वीर - गूगल सर्च]

September 4, 2017

सब खोए होंगे ख़यालों में

पूर्व प्रेयसियां भली थीं.

उन्होंने ब्रेकअप के बाद कहा कि वो मेरे पीछे था. उसने मेरे लिए क्या कुछ न किया. मैंने आखिरकार अपना सब कुछ सौंप दिया. वह बेवफ़ा निकला. मगर उन्होंने ये कभी न कहा कि वह अपनी बीवी से उकताया हुआ था. वह उसे पसंद नहीं करता था. इसलिए ही भली थी.

पूर्व प्रेमी भले नहीं थे.


उन्होंने सबकुछ नष्ट करके भी पीछा नहीं छोड़ा. वे मौसमी घास की तरह उग आते रहे. कभी-कभी बदतमीज भी थे. कभी रोते थे और रोने के बाद भूल जाते थे कि वे अभी-अभी रो रहे थे. वे हर बार उतना ही टूट कर प्रेम करते थे. मगर हर बार प्रेम करके भूल जाते थे. इसलिए ही शायद भले नहीं थे. 
* * *

बेवजह की बात एक बार ज़ेहन में आती है तो वहीँ अटक जाती है. जब तक उसे कह न दो, वह अटकी रहती है. जैसे हम अपने प्रेम की किसी निशानी को कहीं रख देते हैं और भूल नहीं पाते.

आज की रात चाँद खिला है. छत पर रोशनी है. दूर तक कुछ न कुछ दीखता है. मैं चारपाई पर अधलेटा. दो अलग ब्रांड की व्हिस्की को पीते हुए सोचता हूँ. उन लोगों का क्या होगा? वे जो अब प्रेम करेंगे. जाने क्या होगा मगर उनके लिए कुछ बेवजह की बातें

धोखा लगातार
प्रेम की टोह में रहता है।

पहले अंदेशे में
जो भाग नहीं पाते उनको
धोखा अपनी बाहों में भर लेता है।
* * *

धोखे के पास हर रंग होता है
वह घास में घास सा
छांव में छांव सा दिखता है।

प्रेम को रंग बदलना नहीं आता
इसलिए अक्सर मारा जाता है।
* * *

धोखे की पूंछ लम्बी होती है
उसे सम्भलना होता है हर दांव में।

प्रेम की पूंछ बहुत छोटी होती है
प्रेम को दांव नहीं खेलना होता है।
* * *

धोखा देख सकता है
बेहद कम रोशनी में।

प्रेम कभी नहीं देखता, कुछ भी।
* * *

धोखा चुनता है
रास्ते और सही अवसर।

प्रेम खोया रहता है, जाने किस ख़याल में।
* * *

प्रेम का
मौसम आता है।

धोखा सदाबहार है।
* * *

हज़ार धोखे हैं।
मगर प्रेम लाख हैं।

ताकि चलता रहे कारोबार।
* * *

रात के इस वक़्त कौन प्रेमी पढ़ रहा होगा कुछ. सब खोए होंगे ख़यालों में. दुआ कि सबको प्रेम मिले.



[Picture credit : Pragati Singh]

September 1, 2017

इमोटिकॉन्स - भाषा में मोक्ष का मार्ग

कोई किस हाल में जी रहा है, ये तुम कभी भी जान और समझ नहीं सकते हो. इसलिए सबके लिए थोड़ा प्यार रखना. कुछ बोलकर किसी का भी दिल न दुखाना.
* * *

कल सुबह बारिश हो रही थी. बारिश के सुर में जीवन के आलाप को सुनते, मैं बहुत देर तक बालकनी से बादलों के बरसते हुए फाहे देखता रहा. चाय की ख़ुशबू, कहानी की किताबों के पन्ने, बाहर दूर तक फैली हरी झीनी चादर के बीच बने रास्ते सम्मोहक थे. जीवन में एक ठहरा हुआ सुकून भरा पल कितनी हीलिंग से भरा होता है? ये हम अक्सर समझ नहीं पाते हैं.

अगस्त की आखिरी शाम को जयपुर की सड़कों से भीड़ गायब थी.

जगतपुरा से विद्याधर नगर वहां से मानसरोवर होते हुए मालवीय नगर तक आते हुए देखा कि शहर किसी सुस्ती में डूबा है. शायद बारिश ने शहर की बदहवास दौड़ पर आराम का कोई फाहा रखा होगा.

मॉल्स पर भीड़ नहीं थी. मैंने आभा से कहा- "बताओ क्या उपहार लिया जाये. कल आपका जन्मदिन है" आभा ने अपनी आँखों से इशारा किया जिसका अर्थ था- "मैं बेहद ख़ुश हूँ और जीवन ने जो दिया है, वह बहुत है." क्या सचमुच एक इशारे भर से इतना कहा जा सकता है? आप इससे असहमत हो सकते हैं. लेकिन वास्तविकता ये है कि भाषा के संकेत कुछ नहीं कहते हैं. हमने ही उन संकेतों के अर्थ तय किये हैं. लेकिन चेहरे के संकेत, आँखों के इशारे और हमारे बदन की लय एक अलिखित और बेहद व्यापक अर्थों वाली भाषा है.

हम जिस दौर में जी रहे हैं, उसमें संकेतों की एक नई भाषा है. ईमेल से सोशल एप तक के लम्बे सफ़र में इमोटिकॉन्स हमारे संवाद का अविभाज्य हिस्सा हो गए हैं. इमोटिकॉन्स की खोज किसने की थी? आप इसे गूगल करेंगे तो एक ठीक नाम पाएंगे स्कॉट फह्लमैन. गूगल आपको ये भी बताएगा कि इस खोज का वर्ष था, उन्नीस सौ बयासी.

अल्प विरामों और बोधक चिन्हों के मेल से किसी चेहरे के साथ अनुभूति का मिश्रण इमोटिकॉन है. इमोशन और आइकॉन से मिलकर बना ये शब्द और ये जादू अद्भुत है. मैं अपने दोस्तों, चाहने वालों और प्रसंशकों से बातचीत में बहुत बार या ज्यादातर इस तरह बात करता हूँ कि शब्द दो चार लिखता हूँ और इमोटिकॉन्स सौ-डेढ़ सौ. उनको हमेशा इस बात से तकलीफ होती है. वे कहते हैं हम बोलते रहते हैं. बक-बक करते हैं. आप केवल स्माइली बनाकर चलते बनते हैं.

मैं किसी से प्रेम करूँ तो उसके लिए प्रतिक्रिया में दिल बना दूँ. मैं अपनी तारीफ सुनकर एक लजाता चेहरा बना दूँ. ब्लश करने को आप कभी उतना अच्छा नहीं लिख सकते जितना कि ब्लश करती स्माइली से अभिव्यक्त कर पाते हैं. आप किसी अच्छी बात के लिए एक तारीफ भरा अंगूठा दिखा सकते हैं. आप किसी के बुरे व्यवहार के लिए माथे पर सलवटों से भरा लाल चेहरा बना सकते हैं.

ये सब है तो क्यों अपने आपको शब्दों में बेजा खर्च करें. आपके पास कितना समय है कि गप करते जाये. अपने काम भूलकर किसी को प्रसन्न रखने के लिए लिखें. बेमन जवाब देते जाएँ. दुनिया जितनी सिमटी है, आदमी के पास वक़्त की उतनी ही कमी हुई है. आप ग्लोबल होने की जगह ग्रामीण होकर देखिये. आप पाएंगे कि उम्र लम्बी हो गयी है. लेकिन हम ग्लोबल होने को अभिशप्त हैं. इसलिए लम्बे उबाऊ संवादों की जगह अनेक अर्थ देने वाली स्माइली मुझे ज्यादा उपयोगी लगती है.

इसे आप एक बेहद मामूली और अस्थायी कहकर बिसरा सकते हैं. लेकिन ये भाषा के भीतर उपस्थित विद्रोही हैं. इमोटिकॉन्स, अक्षरों से बनी शब्दों की भाषा को चुनौती है. हमारी संस्कृति, भाषा और संवाद पर कब्ज़ा करने की अविराम होड़ में इमोटिकोंस कम तनाव और भद्र विरोधों की नयी कल्चर को आगे बढ़ा रहे हैं.

जब भी कोई बड़ी असहमति होती है तब अगर बोला या लिखा न जाये और संकेतों से विरोध जता दिया जाये तो जीवन में एक अविश्वसनीय आसानी उग सकती है. हम अपने कहे और लिखे को लेकर लम्बे कष्ट उठाते हैं. लेकिन अक्सर संकेतों की भाषा में की गयी प्रतिक्रिया के कारण कम तकलीफ पाते हैं.

हमारी संकेतों की प्राचीन दुनिया के बीजक अभी तक पढ़े नहीं जा सके हैं. हम चाँद सितारों को जान लेने के लिए जितना काम कर रहे हैं, वह बहुत महत्वपूर्ण है. लेकिन हमारे पुरखे संकेतों की जो भाषा गुफाओं, तहखानों, पिरामिडों और ज़मीं में दबे हुए खंडहरों में छोड़ गए हैं. उसे पढने के लिए इतना काम नहीं कर सके हैं. मनुष्य वस्तुतः अपने भविष्य को लेकर जितना संवेदनशील हैं. अतीत के लिए ठीक उतना ही असंवेदन से भरा है.

हम होड़ में हैं इसलिए आगे ही देखना चाहते हैं. हम बीजकों में छिपे रहस्य भरे सूत्रों को समझने में वक़्त इसलिए नहीं गंवाना चाहते कि उस आनंद की प्राप्ति के प्रति आश्वस्त नहीं है. हम मंगल पर नया जीवन बसा पाएंगे या नहीं मगर इस सम्भव के लिए आशा रखते हैं.

इमोटिकॉन्स पर दुनिया भर में हजारों शोध किये गए हैं. ये शोध सामाजिक, व्यावहारिक और भाषा के साथ मनोविज्ञान से सरोकार रखते हैं. ये शोध अस्सी के दशक में हुए इस अविष्कार के उपयोग और फिर नब्बे के दशक में जापान में टेलीकम्युनिकेशन की भाषा में शामिल आइकॉन के प्रभाव को बहुत व्यापक बताते हैं. सबसे पहले जापान में ज्यादातर टेली ओपरेटर स्माइली की लेंग्वेज को अपडेट कर रहे थे. लोग इनका तेज़ी से उपयोग करने लगे थे. बहुत से लोग ये मानते हैं कि जापान ही स्माइली की उर्वरा भूमि है. जिसने इनको सुन्दर और प्रचलित बनाया है. वहीँ से इमोजी शब्द से हमारा परिचय हुआ है.

राकयेल एम ब्रिग्ग्स ने अपने शोध में इमोटिकॉन्स के बारे में कहा हैं- "मनुष्य के वृहद् सामाजिक इतिहास में हमारे व्यवहार विकास और सामाजिक अनुभव में इमोटिकोंस की उपस्थिति महत्त्वपूर्ण और व्यापक है."

इमोटिकॉन्स के बाद ये स्माइली, पिक्चर मेसेज के अगले पायदान पर है. जापान और चीन में तीन पीढियां इनके माध्यम से संवाद कर रही है. स्पेनिश लोग तो कलात्मक रूप से इनका उपयोग कर रहे हैं. सुविधाओं के उच्च शिखर पर बैठे दुनिया के शोषक अमेरिकन भी अपने हताश जीवन में नयी आशा के लिए स्माइली, इमोटिकॉन्स, पिक्चर मेसेज पर गहरा शोध कर रहे हैं.

भारत देश को बहुत बार सौ साल पीछे होने के लिए कोसा जाता है. पाश्चात्य अविष्कारों के सर्वाधिक प्रयोगकर्ता देश के सर पीछे होने का लेबल बेजा नहीं है. हम असल में सन्यास की अवधारणा और निठल्ले होने में सुख खोजने वाले लोग हैं. दुनिया भर के स्पेस कार्यक्रम को भारत ने अंगूठा दिखा दिया है. अन्तरिक्ष में उपग्रह स्थापित करने के कारोबार को भारत अगले दस साल में अधिग्रहित कर ले तो भी कोई आश्चर्य नहीं होगा. असल में आश्चर्य तब होगा जब हम फिर से नदी के घाट और सूने रेगिस्तान की बावड़ी के किनारे बैठकर सोचना शुरू करेंगे. कि धरती कैसे बनी है. प्राणी क्या हैं और हम सब कहाँ जायेंगे?

ये इमोटिकॉन्स हमारी भाषा में मोक्ष का मार्ग बना रहे हैं.

साल दो हज़ार दस से दुनिया भर में प्रचलित हुई नयी भाषा के स्टीकर अद्भुत हैं. लेकिन भारत में पिक्चर मेसेज ज्यादातर उधार के हैं. हमें जिस किसी एप ने जो दिया हमने अपना लिया. हमारे अपने ओरिजनल काम में दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस कॉलेज में हिंदी की एसो. प्रोफ़ेसर अपराजिता शर्मा बेहतरीन हैं. उनके नाम और काम से मेरा परिचय नीलिमा चौहान की किताब पतनशील पत्नियों के नोट्स में किये गए इलेस्ट्रेशन से हुआ था. उसके बाद मैंने फेसबुक पर उनके बहुत सारे काम को देखा. अपराजिता का काम इसलिए अच्छा है कि वे अपनी कल्पना की कश्ती को व्योम में उतार देती हैं. जब तक वे कल्पना को ठहरने न देंगी ये काम और सुन्दर होता जायेगा. लेखन और कलाएं कल्पनाशक्ति से ही प्राण पाती हैं.

आज की सुबह मैंने आभा को व्हाट्स एप पर एक बेहद सुन्दर बधाई भेजी है. ये अपराजिता का 'सितम्बर महीने का स्वागत' है. मेरे लिए सितम्बर का पहला दिन स्वागत का ही दिन है कि इसी दिन वो लडकी दुनिया में आई जिसने मुझे अपने बराबर बनाये रखा. जो मेरी तमाम खामियों और खूबियों को सहजता से स्वीकारती रही. जिसने मुझे लिखने के लिए स्पेस दिया. जिसने प्यार किया.

हैप्पी बर्थडे आभा.

August 27, 2017

प्रेम का जाने क्या होता है

सायकिल के कॅरियर पर बैठे
उनींदे बच्चे के पांव से गिरे
कच्चे हरे नीले रंग के जूते की तरह।

अक्सर कहीं पीछे छूट जाता है, प्रेम।
* * *

मैं चलते हुए अचानक रुक गया. जैसे कोई चिट्ठी जेब से गिर गयी. मुझे बहुत सालों से किसी ने चिट्ठी लिखी न थी. मैंने रेत में चारों तरफ देखा. वहां कोई चिट्ठी न थी. कोई कागज़ का टुकड़ा भी न था. एक काला मोती, सोने जैसी रेत में पड़ा था. अचानक मुझे याद आया कि उसके नाक पर बेढब तरीके से बैठा काला तिल सुन्दर दिखता है. उसके बच्चे बड़े हो गए हैं. मगर वह तिल उतना ही वहीँ ठहरा हुआ है.

मैंने कभी उससे नहीं कहा कि तुम्हारे नाक पर ये तिल कैसा लगता है. उसका वहां होना ही ठीक था. जैसे हम दोनों का एक साथ होते हुए भी एक साथ न होना ठीक था. ऐसे ही रेत में पड़ा काला मनका रेत के साथ होने पर ही सुन्दर था.

जाने क्यों प्रेम भी काले मोती की तरह रेत में सुन्दर दीखता तो है मगर बहुत जल्द खो जाता है.
* * *


छोटी नीली चिड़िया को
चाहिए होती है जितनी जगह
एक पतली सी टहनी पर।

सबको
बस उतना सा प्यार चाहिए होता है।
* * *

मेरी ज़रूरतें बहुत कम है
और तुम बहुत से अधिक हो।

मेरे लिए
तुम्हारा थोड़ा सा साथ
काफी से बढ़कर होता है।
* * *

शुक्रिया कहने का सलीका
नहीं सीखा जा सका, मुझसे।

मेरे पास तुम्हारे लिए, सदा भीगे होठ रहे।
* * *

तुमसे जो भी मिला
वह चाहना से ज्यादा निकला।

मिलने की बेचैनी बहुत गहरी रही
तुमसे बिछड़कर आंसू टूटकर बहे।
* * *

ठेलों पर पड़े
पुराने कपड़ों की तरह
पुराना प्रेम
बचा रहा स्मृति के खटोले पर।
* * *

समय रुक नहीं जाता था
घड़ी के बंद हो जाने पर।

इसलिए हम चाबी भरते रहे।

रुक गए प्रेम को
आगे बढ़ाने की जुगत न मिली।
* * *

पंछी उड़कर
फिर लौट आता है घोंसले पर।

कभी अचानक
हमेशा के लिए नहीं भी आता।

प्रेम का जाने क्या होता है।
* * *

धूप में पड़ी कुर्सी
एक दिन मर गयी।

दिल मे छुपाकर रखा प्रेम भी नहीं बचा।
* * *


प्रेम नदी के बीच का सफेद भंवर न था. वह भूरे पहाड़ की स्याह उपत्यका भी न था. उसने कहा- "आप मिलने के बाद भूल जाते हो" मैंने बहुत देर तक सोचा. मैं कितना खराब आदमी हूँ. इस तरह साथ होता हूँ जैसे इसके सिवा कहीं का नहीं हूँ. फिर इस तरह चला जाता हूँ कि जैसे कुछ था ही नहीं.

कमसिन लड़कियां और लड़के कभी नहीं समझ पाते कि उनकी ज़रूरत क्या है.

मैं जो समझता हूँ, वह तुम न समझो तो अच्छा है. प्रेम-प्रेम करना बड़ा रूमानी काम है. लेकिन दोस्त मुझे सिर्फ तुम्हारी ज़रूरत होती है. इतना समझ आता है. इसमें कितना प्रेम है? इस बारे में मैंने कभी सोचा नहीं.

तुम भी अगर न सोचोगे तो सुख पाओगे.
* * *

August 12, 2017

मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 

पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 

दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो. 
* * *

मेरी आँखों में
मेरे होठों पर
मेरे चश्मे के आस पास
तुम्हारी याद की कतरनें होनी चाहिए थी.
लेकिन नहीं है.

ऐसा हुआ नहीं या मैंने ऐसा चाहा नहीं
जाने क्या बात है?
* * *

मैं नहीं सोचता हूँ
गुमनाम ख़त लिखने के बारे में.
मेरे पास कागज़ नहीं है
स्याही की दावत भी
एक अरसे से खाली पड़ी है.

एक दिक्कत ये भी है
कि मेरे पास एक मुकम्मल पता नहीं है.
* * *

कल रात तुम्हें शुभ रात कहने के
बहुत देर बाद तक नींद नहीं आई.

मैं सो सकता था
अगर
मैंने ईमान की किताबें पढ़ीं होती

मुझे किसी कुफ़्र का ख़याल आता
मैं सोचता किसी सज़ा के बारे में
और रद्द कर देता, तुम्हें याद करना.

मैं अनपढ़ तुम्हारे चेहरे को
याद में देखता रहा
न कुछ भूल सका, न सो पाया.

कल रात तुम्हें शुभ रात कहने के बहुत देर बाद तक.
* * *

तुमको
पहाड़ों से बहुत प्रेम था.

तुम अक्सर मेरे साथ
किसी पहाड़ पर होने का सपना देखती थी

ये सपना कभी पूरा न हो सका
कि पहले मुझे पहाड़ पसंद न थे
फिर तुमको मुझसे मुहब्बत न रही.

आज सुबह से सोच रहा हूँ
कि तुम अगर कभी मिल गयी
तो ये किस तरह कहा जाना अच्छा होगा?

कि मैं
एक पहाड़ी लड़की के प्रेम पड़ गया हूँ.

फिर अचानक डर जाता हूँ
अगर तुमको ये बात मालूम हुई
तो एक दूजे से मुंह फेरकर जाते हुए
हम ऐसे दिखेंगे
जैसे पहाड़ गिर रहा हो
रेत के धोरे बिखर रहे हों
समन्दर के भीतर कुछ दरक रहा हो.

और आखिरकार मैं पगला जाता हूँ
कि मैंने उस पहाड़ी लड़की को अभी तक कहा नहीं है
कि मैं तुमसे प्रेम करता हूँ.

हमारे बीच बस इतनी सी बात हुई है
कि एक रोज़
वह मेरे घुटनों पर अपना सर रखकर रोना चाहती है.
* * *

मैं कितना नादान था।

हर बात को इस तरह सोचता रहा
जैसे हमको साथ रहना है, उम्रभर।

दफ़अतन आज कुछ बरस बाद
हालांकि तुम मेरे सामने खड़ी हो।

तुमको देखते हुए भी
नहीं सोच पा रहा हूँ
कि एक रोज़ तुम अपने नए प्रेमी के साथ
इस तरह रास्ते मे मिल सकती हो।

तुम पूछा करती थी
क्या हम कभी एक साथ हो सकते हैं?

मैं हंसकर कहता-
कि क्या नहीं हो सकता इस दुनिया में।

अब सोचता हूँ
कि सचमुच क्या नहीं हो सकता इस दुनिया में।

मैं कितना नादान था।

[Painting courtesy : Jean Haines]

August 9, 2017

और कोई प्रेम नहीं तुमको

सघन दुःख की भाषा में ठीक से केवल हिचकियाँ लगीं होती हैं.

दुःख जब घना होता है तब हम जिस भाषा में प्रखर होते हैं, उसी भाषा में अल्प विराम ( , ) अर्द्ध विराम ( ; ) पूर्ण विराम ( । ) विस्मयादिबोधक चिह्न ( ! ) प्रश्नवाचक चिह्न ( ? ) योजक चिह्न ( - ) अवतरण चिह्न या उद्धरणचिह्न ( '' '' ) लोप चिह्न (...) लगाना भूल जाते हैं.

ठीक वाक्य विन्यास और बात सरलता से समझ आये, ये तो कठिन ही होता है. 

* * *

दुःख के सामने घुटने मत टेको. दुःख को उबालो और खा-पी जाओ. 

आलू, अंडे और कॉफ़ी की एक पौराणिक कथा है. एक बेटी ने पिता से कहा- "पापा मेरे सामने असंख्य समस्याएं हैं. मैं दुखी हो गयी हूँ." पिता उसे रसोई में ले गए. तीन मर्तबानों में पानी डाला और उनको आंच पर रख दिया. एक मर्तबान में आलू डाला, दूजे में अंडा और तीसरे में कॉफ़ी. कुछ देर आंच पर रखने के बाद पिता ने कहा- "देखो, इन तीन चीज़ों के सामने एक सी विषम परिस्थिति थी. इस आंच को सहने के बाद, आलू जो कि सख्त था. वह नरम हो गया है. अंडा जो कि एक कच्चे खोल में तरल था, वह सख्त हो गया है. और कॉफ़ी ने तो पूरे पानी को ही, अपने जैसा कर लिया है."बेटी ने अपना सर हिलाया और कहा- "हाँ" पिता ने कहा- "मुश्किलें कैसी भी हों. हम उनका सामना करके क्या बनते हैं? ये महत्वपूर्ण है. हमें कॉफ़ी की तरह दुखों को ख़ुद में घोल लेना चाहिए.उन पर हावी हो जाना चाहिए" 

मैं होता तो बेटी से कहता- "तुम क्या पहले खाना पसंद करोगी? आलू या अंडा?" 

इसलिए कि ज्यादा फर्जी ज्ञान अच्छा नहीं होता. ज्ञान के नाम पर किसी को बरगलाने से अच्छा है कि तुमको जो अच्छा लगे वह पहले खा लो मगर ध्यान रखो कि कॉफ़ी ठंडी न हो जाये. वर्ना दोबारा गर्म करनी पड़ेगी. 
* * *

महाभारत में धर्म और न्याय के नाम पर जितनी मनुष्यता की क्षति हुई, उसमें तेरहवें दिन की क्षति सबसे भारी थी. हरेक युद्ध मनुष्यता की राह का रोड़ा है. लेकिन चक्रव्यूह के भीतर भी नियम तोड़ दिए जाएँ तो ये अति की पराकाष्ठा है. अभिमन्यु ने चक्रव्यूह में प्रवेश किया लेकिन राजा जयद्र्थ ने पांड्वो को अंदर आने से रोक दिया था. चक्रव्यूह में अभिमन्यु ने असंख्य योद्धाओ को मार गिराया. इनमें वृह्द्व्ला, कोसल और करथा के राजा, भोजराज , शल्य पुत्र रुक्मरथ शामिल थे. इनके अलावा उसने दुर्योधन के पुत्र को भी मार दिया. दुर्योधन ने क्रोधित होकर दुशाशन के पुत्र दुर्माशन को अभिमन्यु को मारने भेजा किन्तु वो स्वयं मारा गया.

इस पर क्रोधित दुर्योधन ने अपने सभी योद्धाओ को एक साथ आक्रमण करने को कहा. अभिमन्यु अपना रथ, घोड़ा,तलवार और कवच तक खो चुका था. उस पर कई बाणों के साथ वार किया गया लेकिन अभिमन्यु अकेला, उन महारथियों पर रथ का पहिया लेकर टूट पड़ा. अपनी अंतिम सांस तक लड़कर, अभिमन्यु वीरगति को प्राप्त हो गया. 

इसी तरह हिंदी का पाठक हर असाहित्यिक युद्ध के चौथे, पांचवें या तेरहवें दिन मारा जाता है. गुरु-शिष्य, प्रवचनकर्ता-श्रोता या गडरिये-भेड़ के खोल से कांव-कांव करते पक्षी बाहर आते हैं. अपमानित स्त्री के पक्ष में अपमान करने वाले की स्त्री को नोचना चाहते हैं. बेटी को इस कीच में घसीटना चाहते हैं.
साहित्य की इस कुमति बेल ने अकूत वंश वृद्धि कर ली है. अब हर कोई किसी न किसी की ज़ुबान से गिर पड़ता है. 
* * *

प्रगतिशील. जनवादी, लोक कल्याणकारी, स्त्रीवादी होने में, देखना-सोचना-समझना भूल गए हो. प्रिये तुम अपने सारे वाद एक बार उतार कर नीचे रख दो. ये बोझ हो गए हैं. तुम कहना कुछ चाहते हो और तुम्हारे मुंह से निकल कुछ और रहा है. तुम जिसके विरोध में हो, उसी के पाले में खड़े हो. नीचे देखो. लाइन कहाँ हैं? 

और कोई प्रेम नहीं तुमको. 
* * *

अपनी समस्त खामियों के लिए क्षमा याचना करते हुए.

July 31, 2017

कभी इस तरह थाम सकोगे


टिंग टिंग टिंग ट्विंग
सेलफोन में कोई वाद्य बजता रहता है. स्क्रीन एक बार नीला होने के बाद चमकने लगता है. अंगुलियाँ फोन नहीं उठाती. आँखें टेबल पर पड़े फोन को देखती रहती है.

दोपहर की गहरी नींद ढली हुई शाम में खुलती है. रात आये ब्रश करते हुए. कई दिनों की बाकी शेव पर रेजर फिराते. कस्तूरी की गंध का आफ्टर शेव हथेली में लिए आईने में देखना. शोवर के नीचे खड़े हुए पानी की बूंदों को पीठ पर गिरते हुए महसूस करना. कुछ महीनों की गर्द से भरे काले जूतों को झाड़ कर सफ़ेद जुराबें खोजना. साल दो हज़ार ग्यारह की ख़ुशबू से भरी एक चेक वाली कमीज एनयू 87 और खाकी ट्राउजर.

ड्रेसअप होकर कहाँ जाओगे? ड्रिंक लेने?

बालकनी में खड़े यही सवाल दिल में आया था. कल रात उस वक़्त दस बजकर बारह मिनट हुए थे. 
* * *

ज़िन्दगी एक कहानी है. ये बहुत जगह स्किप होती रहती है. जीए हुए पलों की तस्वीर से बहुत से सीन गायब रहते हैं.

याद के नन्हे गुरिल्ला सिपाही हमला करके छुप जाते हैं.

अचानक चौंक कर बहुत पीछे किसी तनहा लम्हे में दूर तक फैली रेत पर बैठे हुए ख़ुद को याद आता हूँ. वह लगभग पूरे आसमान को देखने की एक रात थी. तारे थे. उतने ही साफ़ जितने किसी सूने रेगिस्तान की रात में होते हैं. किसी तरफ उफ़क के पास एक धुंधली लकीर थी. यही एक रूमानी बात थी.

कभी-कभी आप चाहते हैं कि रेत किसी नाज़ुक छुअन भरे दरिया की तरह बहने लगे. आप उसकी बाँहों में समा जाएँ.

ज़िन्दगी में अकेले जीना अच्छा होता है मगर कभी-कभी अच्छा नहीं होता. उस कभी-कभी में प्यास को पानी में फेंकते जाना और हाँफते जाना होता है. वही उस कभी-कभी की टूटन की मरम्मत होता है. 
* * *

एक सुबह उसकी बाहों में जागने पर याद न आया कि दुनिया के किस कोने में पड़े हैं.

मगर बाद बरसों के अचानक याद आता है. जब वह अपना गोल सा चेहरा गरदन के पास रख देती थी न. तब लगता था कि कोई ऊन का गोला है. जिससे रह रहकर गुनगुनी भाप सी हवा आती है.

वह जहाँ रहती थी, कस्बे की अनेक हवेलियों के बीच की एक हवेली थी. उसके सबसे ऊपरी हिस्से में अनेक कमरे थे. वह जिस कमरे में रहती थी. वही एक कमरा था. जिसमें कोई रहता था. उसका कहना था कि ये लम्बी खुली छत कितनी सुकूनदेह और कितनी डरावनी है. मैं कभी बता नहीं सकती. उसने ये भी कहा था कि जब आते हो न तभी यहाँ दो लोग होते थे.

कई-कई बार के आने में एक बार के आने पर उसने कहा था- "मुझे कभी इस तरह थाम सकोगे कि मुझे लगे तुम्हें हमेशा के लिए मेरी ज़रूरत है."

बाद सालों के हँसते हुए किसी ने गाली दी थी- कैसोनोवा. 
* * *

नशे के बारे में शायद तुम जानते नहीं हो. ये कैसी तलब होता है और इसकी ज़रूरत क्योंकर होती है.

मैं जानता हूँ. मगर इन दिनों कुछ नहीं करता. 
* * *

शायद कल की रात, कोई भीगा नशीला सिरा पकड़ना था. मगर वह बीत गयी. उम्र की घड़ी तेज़ चल रही है. कि बीती जिंदगी की दो बातें लिखने में भी दो घंटे चले जाते हैं.

दस मिनट लिखने के बाक़ी उसे याद करते हुए खो जाने के. 
* * *

July 5, 2017

मैं क्या कहता उसको?



तुम ख़ुशी की तलाश में 
एक खंडहर के सामने खड़े हो. 

हालाँकि मुझे तुम्हारे लिए ख़ुशी है. कि एक रोज़ तुम बीती ज़िंदगी को जानोगे. गुज़रे वक़्त के निशान पढना सीखोगे. समझोगे कि परमानन्द किसी साबुत चीज़ में नहीं है.

बीज का परमानन्द मिट्टी, पानी और हवा के साथ मिलकर फूट जाने में हैं. शाखों का परमानन्द हरा रंग छोड़कर भूरे हो जाने में हैं. एक बेहद बूढ़े पेड़ का परमानन्द आँख मूंदकर ठूंठ हो जाने में है. इसी तरह हर एक जो ज़िन्दा है. उसका परमानन्द अपनी गति को पा जाने में है.

प्रेम की भव्यता अधूरे होने में है और परमानंद नष्ट होकर बिखर जाने में. 
* * *

मैंने कहा- "अब जो भी लिखता हूँ बड़ा सतही और ग़ैर ज़रूरी सा लगता है." उस लड़की ने बहुत दिनों से रफ ड्राइव न किया था. सिगरेट बहुत रोज़ पीछे कभी पी थी. व्हिस्की के बारे में उसने कुछ बताया था मगर मुझे याद न रहा. उसने मेरी इस बात पर कहा- "केसी शराब को मेच्योर होने में वक़्त लगता है. आपने जो कुछ सात-आठ साल पहले लिखा है. वह आपको पसंद है. लेकिन यकीन जानो कि आज जो लिख रहे हो. वह सात आठ साल बाद वैसा ही अच्छा लगने लगेगा."

शाम की हवा गुम थी.

शायद बरसातें होने लगें. मैं आसमान में बादलों के फाहों को देखने लगा. उसकी आवाज़ फिर से आई- "मैं शायद उससे बात करना छोड़ दूँ" मैंने पूछा- "क्यों?" उसने कहा- "अब बार-बार प्रेम में पड़ने की हिम्मत नहीं रही. वही करीब होने का सोचना, मेल्स लिखते जाना, घबराये हुए रहना, सब कामों को भूल जाना. ये सब अब न हो पायेगा." मैंने कहा- "तुम भी थक जाओगी तो.." वह बोली- "तो.." जरा सा चुप रहा और फिर धीरे से कहा- "कुछ नहीं. अच्छा सुनो. क्या तुम्हें इस बात का एतबार होगा कि मैंने अपना एक बेकार सा सपना लिखकर एक लड़की को भेज दिया."

छत तक गली में हंस रहे बच्चों की आवाज़ आई.

मैंने नीचे झांककर देखा. वे दोनों बच्चे हंसी के जाल में फंस गए थे. एक दूजे को देखते और हंसने लगते. एक बूढ़ा आदमी इस हंसी से बेख़बर चारपाई पर बैठा था.

उसने पूछा- "फिर क्या जवाब आया?"

मैं क्या कहता उसको? 
* * *

सपनों के बारे में मुझे बस इतना पता है कि वे उसे बाँहों में भर लेने जैसे होते हैं. जिनके बारे में ठीक-ठीक नहीं समझा जा सकता कि ये सब क्या है? ठीक-ठीक किसी को कहा नहीं जा सकता कि क्या होगा. 
* * *

वह जो तुम्हारे पास इक ठहरी हुई निगाह थी न. वह अच्छी थी, केसी. 
* * *

July 4, 2017

धुएं के नीम नशे में स्वप्न


ये एक सामान्य दोपहर थी. उमस कम थी. एक सिगार के पैकेट में पड़े हुए कुछ सिगार बहुत पुराने हो चुके थे. क्या उनका स्वाद अब भी वैसा ही है. जबकि तम्बाकू पर बंधे हुए पत्ते में दरारें आ गयीं थी. बीस एक सिगारों में निचले वाली परत से उल्फत ने एक साबुत दीखता हुआ सिगार निकाला.- "लीजिये इसे ट्राय कीजिये." वह सिगार घुमाकर देखने से साबुत दिख रहा था. उसकी ख़ुशबू अभी तक काफ़ी बाकी थी. 

शहर के स्टेशन रोड पर हलके बादलों की छाँव कभी कभी शामियाना तान रही थी. बाज़ार में लोग कम थे. शादियों का आखिरी सावा निकल चुका था. निम्बू वाले गायब थे. बारिशो में पिलपिले हुए आमों से ठेला भरे हुए खड़ा आदमी ख़ुद बेहद गंदा था. उसे देखते सिगार के धुंएँ को खींचने के यत्न करते हुए पाया कि सिगरेट से इसका स्वाद अलग है. जीभ पर एक नीम कड़वाहट उतर आई है मगर गला अभी धुएं की खरोंच से बचा हुआ है. 

घर आया तो दोपहर अलसाने लगी. आँखों में नींद ने अपने पाँव पसार लिए. 

और स्वप्न की आहट हुई. 

विदेश में कहीं किसी काउंटी का क्लब था. जैसे हमारे बगीचे होते हैं. एक लम्बा रास्ता. उसके पास लोहे की फेंसिंग में हेजिंग के लिए खड़ी हरी झाड़ियों की कतार. आगे जाकर एक चौकोर बड़ा भवन जिसके नादर अलग अलग कमरे होंगे ऐसा आभास था. उसी हाल के बायीं तरफ बास्केटबाल का कोर्ट था. मैंने डॉक् हार सीढियाँ चढ़कर बायीं तरफ मुड़ते समय देखा कि वहां चार पांच लोग हैं. उनमें एक नौजवान था. एक अधेड़ उम्र का कपल था. बाकी दो लड़के थे. उनके बारे में ठीक से नहीं मालूम मगर वे कुल पांच लोग थे. 

औरत धीरे से बास्केटबाल कोर्ट की तरफ बढ़ी. मैंने देखा कि वह हवा में उछली. उसने कलाबाज़ी खाते हुए बास्केट रिंग की तरफ छलांग लगाई थी. ,उझे आश्चर्य हुआ कि वह इतना ऊँचा कैसे कूद सकती है. वह असल में बास्केट करने वाले खिलाडी की तरह कूदी ज़रूर थी लेकिन वह रिंग के ऊपर जाकर बैठ गयी.

एक छोटा सा गेप आया. जैसे अँधेरा फैल गया हो. 

वे चार लोग कहीं जा रहे थे. औरत बास्केट बाल बोर्ड के बराबर ऊँचाई पर लोहे के सपोर्ट पर बैठी थी. मैं उसकी तरफ बढ़ा. उस सपोर्ट तक पहुँचने से पहले मैंने देखा कि औरत में रुमान भर आया है. औरत बैठी थी. उसने पाने पाँव लम्बे किये हुए थे. वह मुझे पास न आने के संकेत की तरह ख़ुद को मुझसे दूर कर रही थी. असल में वह दूसरी तरफ झुक गयी थी. मैंने इसको नज़र अंदाज़ किया. मैं उसके करीब पहुंचा. एक छुअन को दो तीन बार दोहराया.  मैंने अपना सर उसकी दायीं जांघ पर रख दिया. आँखें बंद कर ली. 

अचानक औरत उन चार लोगों के साथ उसी रास्ते वापस जाती हुई दिखी. जिस रास्ते से मैं इस क्लब में आया था. औरत उनसे कह रही थी कि मैं इस बात की शिकायत करुँगी. मुझे लगा कि वह अपने पार्टनर के बारे में कह रही है. औरत और वे लोग बाहर चले गए तब वह नौजवान अचानक मेरे पास से गुज़रा. उसने मुझे कहा- "आपने ये क्या किया?"

नौजवान इतना कहकर खो गया. औरत का पार्टनर उस बड़ी बिल्डिंग के एक रास्ते पश्चिम की और जाता दिखाई दिया. उसकी बायीं जेब से एक लम्बी पिस्तौल झांक रही थी. उसका रंग चमकीला था. जैसे वह चाँदी से बनी है. वह आदमी अचानक पलटा. इसके पलटने के साथ मुझे ये अहसास हुआ कि वह मुझे खोज रहा है. शायद वह गोली चलाएगा. मैं दीवार के एक तरफ छिप गया. 

सहसा लगा कि वह आदमी मुझे खोजते हुए लुका छिपी की तरह दीवार के सहारे चलता हुआ मुझे देख लेना चाहता है. मैं गिव अप के हाल में पहुंच गया था. मैंने सोचा कि इस आदमी के साथ इस खेल में हार जाऊँगा. 

इसी भय में स्वप्न टूट गया.
* * *

दिन इतने तनहा है कि किसी आवाज़ में कोई रुमान नहीं आता. असल में मुझ तक मेरी या किसी की आवाज़ ही नहीं आती. 

June 30, 2017

चुड़ैल तू ही सहारा है

रेगिस्तान में चुड़ैलों के कहर का मौसम है. वे चुपके से आती हैं. औरतों की चोटी काट देती हैं. इसके बाद पेट या हाथ पर त्रिशूल जैसा ज़ख्म बनाती हैं और गायब हो जाती हैं.

सिलसिला कुछ महीने भर पहले आरम्भ हुआ है. बीकानेर के नोखा के पास एक गाँव में चोटी काटने की घटना हुई. राष्ट्रीय स्तर के एक टीवी चैनल ने इस घटना को कवर किया. पीड़ित और परिवार वालों के इंटरव्यू रिकॉर्ड किये. कटी हुई चोटी दिखाई. बदन पर बनाया गया निशान दिखाया. गाँव के बाशिंदों की प्रतिक्रिया दर्ज की. पुलिस वालों के मत लिए. इसके बाद इसे एक कोरा अंध विश्वास कहा. घटना के असत्य होने का लेबल लगाया. टीवी पर आधा घंटे का मनोरंजन करने के बाद इस तरह सोशल मिडिया के जरिये फैल रही अफवाह को ध्वस्त कर दिया.

इसके बाद इस तरह की घटनाओं का सिलसिला चल पड़ा. बीकानेर के बाद जोधपुर जिले की कुछ तहसीलों में घटनाएँ हुईं. जोधपुर से ये सिलसिला बाड़मेर तक आ पहुंचा. सभी जगहों पर एक साथ पांच-सात स्त्रियों के साथ ऐसी घटनाएँ हुईं. उनकी कटी हुई चोटी का साइज़ और काटने का तरीका एक सा सामने आया. शरीर पर बनने वाले निशानों की साइज़ अलग थी मगर पैटर्न एक ही था.

बाड़मेर के महाबार गाँव में तीन औरतों के साथ एक साथ ऐसा हुआ. ये समाचार शहर और जिले भर में तुरंत फैल गया. इसे कुछ समाचार चैनल के संवाददाताओं ने आगे राज्य स्तर और राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया. समाचार ने एक भय मिश्रित कौतुक जगाया लोग अस्पताल की ओर भागे. उपचार के लिए भर्ती की गयी इन पीड़ित महिलाओं को देखने पुलिस-प्रशासन के अधिकारी और जन प्रतिनिधि पहुंचे.

चुड़ैल की शिकार सभी महिलायें गहरे सदमें में थी. सदमें की वजह चोटी काटने के बाद आने वाला संकट था. ज़ुबानी, सोशल और अन्य माध्यमों में ये प्रचारित है कि जिस महिला के साथ इस तरह का हादसा पेश आता है, उसकी तीसरे रोज़ मौत हो जाती है.

परसों रात कोई एक बजा होगा कि लोहे के चद्दर से बने दरवाज़ा पीटने के शोर और लाठियों के ज़मीन पर पटकने के शोरगुल से आँख खुली. मैं किसी बुरे स्वप्न में था. शोर सुनकर मैं तेज़ी से चारपाई से उठा. नींद में ही तेज़ कदम रेलिंग के उस छोर पर पहुँच गया, जिस तरफ से आवाज़ें आ रही थी. मोहल्ले भर के लोग जाग गए थे. ज्यादातर छतों पर ही सो रहे थे बाकी छत पर चले आये. शोरगुल पांच सात मिनट चला और उसके बाद लोगों के ऊँचे स्वर में बतियाने की आवाजें आने लगी. कहीं-कहीं आवाज़ में हलकी हंसी के साथ थोड़ा उपहास भी था.

मैं चौंका की इस तरह नींद में रेलिंग तक चले आना खतरनाक था. मुझे हड़बड़ी में जागते ही ऐसा न करना चाहिए था. तीसरी मंजिल से अगर गिरता तो चुड़ैल मेरी चोटी काटने की जगह हाथ-पाँव तो तोड़ ही देती. या चुड़ैल को कहानियां सुनना प्रिय होता और वह एक लेखक को ख़रगोश या चूहा बनाकर अपने साथ ही ले जाती.

पड़ोस की तीसरी गली में शोरगुल थम गया था. छतों पर खड़े लोग सामान्य हो रहे थे. मैं वापस चारपाई पर लेट गया. चुड़ैल की वापसी हो चुकी थी. मोहल्ले में घंटे भर बाद सन्नाटा छा गया था.

मुझे हलकी नींद आई और मैं भी चौंक पड़ा. अपना सर ऊपर किया और देखने लगा कि छत पर कोई है तो नहीं. सीढियों के पीछे कोई छुपा तो नहीं है. कहीं ऐसा तो नहीं कि चुड़ैल चारपाई के नीचे ही रेंग रही हो. मुझे ख़याल आया कि चुड़ैलों को शराब पीनी चाहिए या सिगरेट. इससे उनकी उपस्थिति का पता चल सकता है. एल्कोहल की महक या जलती हुई चिंगारी देख कर पहचाना जा सकता है. लेकिन जिस तरह मनुष्य समाज भले लोगों से भरा है. जो शराब और सिगरेट से दूर रहते हैं. उसी तरह संभव है कि चुड़ैल समाज भी सभ्य चुड़ैलों से भरा हों. ऐसे ख़यालों के बीच मुझे नींद आ गयी थी.

सुबह मालूम हुआ कि भूराराम के घर पर सो रही उसकी बच्ची चिल्लाते हुए जगी. उसने कहा कि चुड़ैल आ गयी है. वह मेरे बाल काटने ही वाली थी कि मेरी आँख खुल गयी. मेरे जागते ही वह कहीं छुप गयी है. परिजनों ने दरवाज़ा पीटना और शोर मचाना शुरू किया. लड़की की नींद उड़ चुकी थी. कुछ जागरूक नौजवान गली भर में डंडा बजाते हुए घूमे कि देखो चुड़ैल डरकर भाग चुकी है.

जिला अस्पताल में उपचार को आई एक महिला को डॉक्टर ने दो-चार थप्पड़ लगा दिए. डॉ साहेब जाने किस भोपे, तांत्रिक या झाड़ागर से एमबीबीएस करके आये थे. उन्होंने विधिवत अगरबत्ती जलाई और हाथ उठाया. आस पास उपस्थित लोगों ने इसका विडिओ बनाया. आज के अख़बार में ख़बर है कि उन डॉ साहेब को सेवा से निलम्बित कर दिया गया. जयपुर के बड़े भोपों ने उनको हाजरी देने अपने पास बुला लिया है.

महाबार मेरा प्रिय गाँव है. लेकिन बाड़मेर शहर की सीमा से लगा महाबार गाँव महज एक गाँव नहीं है. ये एक अघोषित राष्ट्र है और इसका संविधान अलिखित है. यहाँ की अनूठी और विरल जीवन शैली से रोचक तथ्य सामने आते रहते हैं. कभी महाबार से कच्ची शराब की आपूर्ति हुआ करती थी. कभी चोरी गए माल को महाबार और आगे के गांवों के धोरों से बरामद किया जाता था. कभी सिलसिले से लोग अकाल मृत्यु को प्राप्त होते थे. कभी संस्कृति एवं पर्यटन को बढ़ावा देने को महाबार के धोरों पर जमूरे इक्कठे हुआ करते थे. सरकारी लवाजमा आता. बेरिकेडिंग होती. शहर भर के लोग आते. नाच गाना होता. कभी मुम्बैया सिने संसार के गवैये आते.

मुझे कोई आश्चर्य न हुआ कि बाड़मेर में चुड़ैल का प्रकोप इस गाँव से शुरू हुआ. गाँव में चर्चा थी कि सत्तर-अस्सी साधुओं का एक दल आया हुआ है. वे तीन चार लोगों के समूह में बंटकर घूमते हैं. वे इस तरह की घटनाओं के लिए ज़िम्मेदार है. वे भिक्षा के लिए घर घर जाते हैं. जो कोई अन्न देता है. उसका कुछ नहीं होता. जिस परिवार ने दस बीस रुपये दिए थे. उनके घरों में ही चोटी कटने की घटनाएँ हुई.

मैं जब दस बारह साल का था तब पिताजी ने लुहारों के बास में एक कच्चा घर बनाया था. वह घर लुहारों के घरों से ज्यादा विलासी दीखता था. कि उसकी छत भी थी. लुहारों के पास घास फूस की छत वाले पड़वे थे. उनके पास आग की छोटी भट्टियाँ थीं. वे खेती बाड़ी में काम आने वाले औजार बनाते थे. साथ ही घर के लिए ज़रूरी चीज़ों का निर्माण भी करते थे. ये गाडोलिया लुहार नेहरू जी के आदेश से बसाए गए थे. इसलिए मोहल्ले का नाम नेहरू नगर रखा गया था.

एक दोपहर हल्ला हुआ कि आग लग गयी है. मैं भी भागा. मैंने देखा कि पड़ोस के एक झोंपड़े में आग लगी है. आग घास फूस की छत वाली चोटी में लगी थी. उसे तुरंत बुझा दिया गया. इसके बाद ये सिलसिला चल पड़ा कि हर दिन किसी न किसी झोंपड़े में आग लगती. इस आग से लपटें उठती. इसे तुरंत काबू कर लिया जाता. किसी भी प्रकार की हानि नहीं होती. इस जादुई आग के पीछे कहा जाने लगा कि एक लुहारण किसान बोर्डिंग के आगे सामान बेच रही थी. वहां कोई साधू चिमटा खरीदने आया. ग्राहक और दुकानदार के बीच अप्रिय संवाद हुआ. दुकानदार को साधू ने श्राप दिया कि जिस तरह तुमको तपना पड़ता है उसी तरह अब जलते भी रहना. आखिरकार इस श्राप से बाहर आने को बाबा रामदेव से विनती की गयी. उनकी कृपा से आग लगनी बंद हो गयी. बाबा रामदेव ने साधू के श्राप को डीएक्टिवेट कर दिया. उनके इस उपकार के बदले एक मन्दिर का निर्माण किया गया. बाबा रामदेव के ये मंदिर अब भी मोहल्ले में उपस्थित है लेकिन एक निजी संपत्ति हो गया है.

कुछ साल बाद मैंने सुना कि कोई प्रेतात्मा आ गयी है. वह क़स्बों में लोगों के घरों के बाहर दरवाज़े पर लाल स्याही की चौकड़ी बनाकर चली जाती है. जिस घर के दरवाज़े पर चौकड़ी बनती है. उसके किसी सदस्य की मृत्यु हो जाती है. लोग भय से भर गए थे. वे चौकड़ियाँ किसने बनायीं और बाद में उनका क्या हुआ याद नहीं. मगर अब सोचता हूँ. जिस तरह ये चोटी काटने वाली घटनाएँ याद के किसी कोने में दब जाएँगी वैसा ही कुछ उनके साथ भी हुआ होगा.

आपने मॉस साय्कोजेनिक इलनेस के बारे में सुना है? इसे समाज की सामूहिक बीमारी भी कहा जाता है. ये बहुत जटिल है. इसके अनेक रूप हो सकते हैं. इसके फैलने की गति अविश्वसनीय हो सकती है. किसी समूह या स्थान के लोग एक साथ इस बीमारी की चपेट में आते हैं. हम हर तरह की छानबीन करते हैं. तथ्य जुटाते हैं. जो कुछ भी जाना जा सकता है हम जानते हैं. लेकिन फिर भी हम कोई ठीक-ठीक कारण नहीं जान पाते हैं. हमको पहली नज़र में लगता है कि मरीजों द्वारा की जाने वाली हरकतें लगभग एक सी हैं. उनके ख़ुद के द्वारा किया जाना संभव है. किन्तु तर्क और सबूतों से आगे इन बीमारों की बढती तादाद हमको भ्रमित करने लगती है. हम तुरंत अपने ज्ञान को एक तरफ रखकर अलौकिक शक्तियों के संसार की बातों की तरफ अपना ध्यान लगा देते हैं.

इंग्लेंड के मनोविज्ञानी साइमन वेस्सेली कहते हैं कि सामूहिक उद्विग्नता माने इज़्तराब माने एंजायटी बचपन से ही हमारे भीतर घर कर लेती है. हम अपनी कल्पना शक्ति से भयावह स्थितियों के दृश्य बुनने लगते हैं. ये सामूहिक उद्विग्नता किसी भी क्षेत्र, उम्र के लोगों में आ सकती है. नाचते हुए कपड़े उतार देना. नाचते हुए हंसना. भीड़ में कोई डरावना दृश्य बनाना, करतब करना.

सोलहवीं शताब्दी में यूरोप में नाचना एक मेनिया हो गया था.

युवा से अधेड़ होने की उम्र की ओर बढती औरतें इस सामाजिक हिस्टीरिया का सर्वाधिक शिकार होती हैं. अपने बाल खोल लेना. कपड़े फेंक देना. हुमक हुमक कर बेतहाशा नाचना. लगातार चिल्लाना. राग निकाल कर रुदन करना. लगातार गोल गोल झूमते जाना. ऐसी क्रियाएं अनवरत दुनिया के हर कोने में होती हैं. ज्यादातर ऐसा करने वाली औरतें होती हैं. कहीं कहीं पुरुष भी ऐसा करते हैं. वे गालियाँ देते हैं. अलग मोटी, भारी या बारीक आवाजें निकालते हैं. धमकियाँ देते हैं. हमला करने पर उतारू हो जाते हैं. ये व्यक्तिगत हिस्टीरिया है. यही बातें सिलसिले से अनेक घरों में होने लगे तो इसे मॉस हिस्टीरिया कहा जाता है.

असल में हमारा अकेलापन, असंतोष, बेचैनी और घुटन इन क्रियाओं के मूल में है.

रेगिस्तान में ही नहीं वरन हर जगह औरतों के पास अपना कुछ नहीं है. वे किसी एक पुरुष के अधीन हैं. ऐसा पुरुष जो उसे अपनी प्रोपर्टी के रूप में देखता, समझता और परोटता है. दूसरे पुरुष इसी समझ के पहरेदार बने रहते हैं. अपना घर छोड़कर दूसरे घर में बसने वाली औरत से धीरे से सब सुख छूट जाते हैं. वह एक ऐसे परिवार के सुखों का कन्धा बनती है, जिनमें उसका योगदान शून्य गिना जाता है. घर की चारदीवारी में क़ैद जीवन. चौबीस घंटे की नौकरी. झिड़की, पहरे और उलाहनों से भरे दिन रात. ऐसे में जीवन कितना कठिन हो जाता है ये समझना उस आदमी के बस की बात नहीं है. जो आदमी औरत का मालिक कहा जाता है.

मैं मनोविज्ञान का विद्यार्थी नहीं हूँ. मुझे जादू भी नहीं आता है. लेकिन इतना ज़रूर लगता है कि ऐसे में सोशल हिस्टीरिया ही इकलौता सहारा है. कि हमारी तरफ भी देखो.

ओ वीर बहादुर आदमियों 
औरतों की ये कटी हुई चोटियाँ 
तुम किसी मैडल की तरह 
अपने साफे-टोपी में क्यों नहीं टांग लेते?

June 9, 2017

वजह कुछ भी हो सकती थी


अच्छा क्या परेशां होते हो?

नहीं

क्यों?

इसलिए कि इतनी दूर से जब तुम अपना मन कहते हो. तब मुझे समझ आता है कि ये अभी की ज़रूरत है. इस वक़्त मुझे होना चाहिए. मैं चुपचाप लगातार सुनूँ.

क्यों?

कि ये लम्हा इसी लम्हे के लिए है. बाद में नहीं रहेगा.

अच्छा जो कुछ सुना कहा जाता है उससे बाद में रिग्रेट नहीं होता?

कभी कभी होता है कि आदमी औरत का मन ऐसा क्यूँ बनाया है. चाहनाएँ वन लताओं की तरह उलझी-उलझी क्यों उगती हैं.

इसलिए कि तुम सुलझाओ.

कबूतर के पंखों की आवाज़ आई. कबूतर जानबूझकर अपने पंखों को आपस में टकराकर बजाता है. इसलिए कि उसे लगता है कुछ गलत होने वाला है.

लड़के ने सोचा क्या गलत होगा. अब तक कितनी ही लड़कियां और अधेड़ होने को भागी जाती औरतों को वह जानता है. एक-एक के कितने कितने सम्मोहन. कितने-कितने रिश्ते. वे मानती नहीं थी. मगर उसने ख़ुद देखा है. वे संदेशे भेजकर छेड़ में लगी रहती थी.

एक रोज़ लड़की ने कहा- “ये ट्राय एंड एरर मेथड है. चाबी को हर ताले में ट्राय करो. जो खुल जाये सो अच्छा. इसी तरह तुम मेरे आस आये थे न?” वह भौंचक था. इसलिए नहीं कि ये बात सच थी. उसके पास तो बीसियों न्योते रखे होते. इत्ते साफ कि कहो तो मर जाएँ. उन न्योतों पर ही ही ही का वर्क लगा होता था. ये वर्क इसलिए होता कि अपनी असल चाहना को हंसी से कुछ अलग रंग दिया जाये.

लड़की का पहला सवाल था- “मुझसे पहले कितनी थी?”

जवाब में लड़के ने कहा- “तुम बीसवीं हो?”

इसके बाद लड़की ने बीसियों के बारे में जानना चाहा. किन्तु लड़का केवल दो के बारे में बातें किया करता था. दो के बारे में बताने के पीछे एक कारण ये हो सकता था कि लड़का एक निर्लज्ज कामी व्यक्ति कहलाने की जगह थोडा ख़राब प्रेमी सा कहलाये. एक और वजह हो सकती थी कि वास्तव में ऐसा कुछ कभी हुआ ही न हो. 
* * *

अचानक एक शाम लड़के का फोन गिर गया. उस फोन पर बहुत से स्क्रेच आ गये. उसने थके मन से फोन को उठाया. वह वास्तव में कुछ महीनों से फोन को बदल लेना चाहता था. उसने सोचा कि फोन के स्क्रीन पर आखिरी बार अंगुली घुमाए. लेकिन उसने ऐसा किया नहीं.

रात हो चुकी थी. सड़क पर कम लोग थे. 
* * *

एक कठिन मौसम होता है घर से भाग जाने का लेकिन ख़ुद से दूर भाग जाने का मौसम सबसे कड़ा होता है.
* * *

June 7, 2017

भाग जाने के मौसम की याद

औरत ने एक लम्बा कोट पहना हुआ था. गरदन को मफलर से ढका हुआ था. हाथ कोट की आगे वाली जेबों में थे. आदमी एक फॉर्मल कोट में था. उसके सफ़ेद शर्ट पर गहरी नीली टाई बाँध रखी थी. टाई का जरा सा ऊपरी हिस्सा और गांठ दिख रही थी. उन्होंने हाथ मिलाये. दोनों के हाथ एक से गर्म थे लेकिन सख्ती की तासीर अलग थी. 

“कभी सोचा न था इस तरह?” आदमी के चेहरे पर मुस्कान थी. 

औरत की आँखों में हलकी चमक थी- “मुझे मालूम था कि हम किसी शहर में फिर से एक साथ होंगे.” 

टेबल का टॉप गहरे भूरे रंग का था. उस पर एक गुलदान रखा था. उसमें दो टहनियों के सिरे पर लगे दो फूल रखे थे. आदमी ने उसे अपने दायें हाथ से किनारे कर दिया. उसे ऐसा करते हुए औरत ने देखा. और आदमी ने जब औरत को देखते हुए देखा तो पूछा- “क्या..” 

“क्या करते हो?

“कुछ नहीं करता.”

औरत की आँखों में जो मुस्कान थी. वह अब उसके होठों पर आ गयी- “कुछ नहीं करने के लिए दिन भर क्या करना पड़ता है?”

“सीरियसली... कुछ नहीं. आज सुबह इसी ख़याल में जागा था कि हमको मिलना है. फिर पता है मैं दो घंटे तक कुर्सी पर बुद्ध हुआ बैठा रहा.” इतना कहकर आदमी फिर बुद्ध होने की तरह हो गया. औरत ने एक बार आहिस्ता से मुड़कर देखा. सब टेबल खाली थी. एक कोने में बैठे अकेले लड़के के सिवा. अपनी नज़र को लौटाकर औरत ने कहा- “पूछो मुझे क्या याद आया?”

“क्या?”

“मुझे वह शाम याद आई, जब मैं बास्केटबाल की प्रेक्टिस के लिए आई थी. तुम स्कूल की दीवार पर बैठे थे. मैंने पूछा था कि यहाँ क्या कर रहे हो. तो तुमने कहा था कुछ नहीं. और इसके बाद कुछ और पूछा तो तुमने सीरियसली कहा था. तुमने आज भी कहा- सीरियसली” 

आदमी अचानक असहज होने लगा. उसे लगा कि कोट धूल में बदल कर झरने लगा है. टाई का कसाव गुम हो रहा है. ऐसा कभी हो नहीं सकता था कि कपडे अचानक धूल होकर झरने लगें. लेकिन फिर भी उसने अपने सीने की तरफ देखा. उसने टाई को छुआ. उसके चेहरे पर एक बेहद फीकी सी मुस्कान आई. वह शर्मिंदा होने लगा कि जाने क्या समझेगी. 

उसने देखा कि औरत दीवार की तरफ देख रही है. 

गले को आवाज़ किये बिना साफ़ करते हुए उसने औरत से पूछा- “क्या हुआ...”

औरत ने दीवार की तरफ देखते हुए ही कहा- “तुम हंस पड़ोगे.”

“बताओ”

“नहीं”

“पक्का नहीं हसूंगा” 

औरत की आँखों में वही हलकी चमक आने लगी- “मुझे लगा कि खूँटी पर टंगा मेरा ओवर कोट रेत होकर बिखर रहा है” 

हँसना तो दूर, आदमी मुस्कुराया भी नहीं. उसने कहा- “हमारी उम्र मौसमों के टुकड़ों से बनी है.”

औरत उसे देख रही थी. उसे अचम्भा था कि मेरे बेतुके ख़याल को सुनकर इसे ज़रा भी हंसी न आई. और ये उम्र के मौसमों की बात करने लगा. 

आदमी ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा- “तुम्हें याद है केन्टीन के आगे वाली खुली जगह. जहाँ चौकोर पत्थर लगे थे. वहां एक सायकिल स्टेंड था. जिन शामों को स्कूल में स्पोर्ट्स प्रेक्टिस नहीं होती थी न, उन सब शामों को मैं वहां जाया करता था. उस खाली पड़े रहने वाले स्टेंड पर बैठा रहता था. वहां कोई नहीं आता था.”

“कोई नहीं आता था तो ?”

“तो भी मुझे लगता था कि जैसे कोई आएगा”

औरत को इस बात पर एतबार नहीं हुआ. उसे लगा कि वह कहानी बना रहा है. औरत ने कहा- “मैंने तुम्हें कभी वहां नहीं देखा. तुम्हें पता है न उस जगह के सामने ई ब्लॉक है. हमारा क्वाटर वहीँ था.”

आदमी ने कहा- “सीरियसली” 

“क्या सीरियसली...”

“वो जो बचपन के बाद का मौसम था न, वह बस वही था. उस रुत में जो फूल खिलते थे न, वे उदास होते थे. उस मौसम में लगता था कि कहीं भाग जाएँ. उसी मौसम में ये मालूम न था कि भाग कर जायेंगे कहा?” 

औरत के चेहरे पर कोई सलवट नहीं आई थी. मगर उसे लग रहा था कि उसके चेहरे पर सलवटें उतर रही हैं. और ये आदमी जाने क्या सोचने लगा होगा. ये कैसे हो सकता है कि उस दिनों मैं भी भाग जाने का सोचा करती थी. मुझे भी घर उदास करता था और मैं बाहर खुले में बैठना चाहती थी. 

“कुछ सोच रही हो?”

“हाँ कि तुम सही कहते हो. वह एक उम्र का टुकड़ा होने से अधिक एक मौसम था.” 

आदमी ने पूछा- “तुम क्या करती हो?”

“एक स्कूल में काउंसलर हूँ. बच्चों से बातें करती हूँ. उनकी दोस्त हूँ?”

इतने में दो कप कॉफ़ी और एक छोटा सा केक का टुकड़ा चला आया. बाहर ठंडी हवा चल रही थी. दोपहर के तीन बजे थे. मौसम का एक और टुकड़ा उन दो लोगों को लिख रहा था. 

जब वे बाहर आ रहे थे तब औरत ने कहा- “स्कूल के उस आखिरी साल की बात करते हुए अचानक मुझे लगा कि मैंने कुछ ज्यादा गरम कपड़े पहन लिए हैं.” आदमी उसकी ओर देख रहा था. औरत ने कहा- “ऐसा न समझो कि तुमसे मिलने के लिए ऐसे कपड़े पहने हैं. मैं इतने सारे ही कपड़े पहनती हूँ. मुझे बहुत ठण्ड लगती है.”

आदमी ने कहा- “एक मज़ेदार बात बताता हूँ. हँसना मत”

“हाँ बताओ” 

“मैं कोट और टाई कम पहनता हूँ. इनको पहनने से मुझे स्कूल का पासिंग आउट डिनर याद आता है. फिर जी उदास होने लगता है.”

वे दोनों अभिवादन करके अलग हो गए थे. 

आदमी पता नहीं क्या सोचता हुआ गया मगर औरत ने सोचा कि उसने मनोविज्ञान में मास्टर्स करने के दिनों में क्या पढ़ा था? जब वह अपने प्रेक्टिकल के लिए प्रश्नावली लिए यूनिवर्सिटी के हर डिपार्टमेंट में घूमती थी. लड़के और लड़कियों से सवाल-जवाब वाले फॉर्म भरवाती थी. उनमें क्या सवाल होते थे? 

उसकी आँखों में चमक आई. उसने तय किया कि वह अगली बार से सीनियर विंग के बच्चों की पर्सनल काउंसलिंग में ये ज़रूर पूछेगी कि क्या वे घर से भाग जाना चाहते हैं?
* * *

मौसम कहीं जाते नहीं है. वे केवल रुख बदल लेते हैं. आपके पास तहें खोलने का समय और मन हो तो वे आस पास मिल जाते हैं. 

June 5, 2017

कोई ज़रूरी है कि सबकुछ कहूँ?

कोई दीवार ही होते तो कितना अच्छा होता
मौसमों के सितम सहते और चुप रहते.

इक दिन बिखर जाते, बिना किसी से कोई शिकवा किये हुए.
***

"आपके आसपास अदृश्य आवरण है. मुझे नहीं पता कि इसे कैसे कहूँ. इस औरा के भीतर आने का रास्ता नहीं मिलता. या कई बार मन चाह कर भी भीतर आने से मुकर जाता है. दूर बैठकर देखता रहता है.

मुझे आपसे बहुत कुछ कहना है. मेरी चाहना है कि आप सुनें. आप मेरे पास बैठे रहें. नहीं, मैं आपके पास रहूँ. आप कितने बंद-बंद से हैं. आपकी ओर से कभी ऐसा फील नहीं आता कि लगे आपने मेरे बारे में सोचा. आपने चाहा हो कि मैं कुछ कहूँ. आपने कभी आगे होकर कोई बात नहीं की. कई बार मैंने इंतज़ार किया. थकान हुई और फिर बंद कर दिया.

मुझे लगता है कि मिल लेना, पास बैठ लेना. बात कर लेना जैसी छोटी-छोटी बातें भी कितनी दुश्वार हैं. बाकी ज़िन्दगी का तो क्या कहूँ. कितनी थकान होती है. कभी डिप्रेशन आने लगता है और भी जाने क्या- क्या? जाने दीजिये आप नहीं समझेंगे."

एक चुप्पी आ बैठी. वह देर तक बैठी रहती इससे पहले मैंने तोड़ दिया. "ऐसा थोड़े ही होता है कि जो जैसा दिखे वैसा ही हो. कई बार हो सकता है कि जिसे आप आवाज़ देना चाहते हैं, वह आपका इंतज़ार कर रहा हो."

आसमान को देखते हुए ख़याल आया कि शायद चाँद वाली दसवीं रात होगी. हवा मद्धम थी. दो रोज़ पहले की बरसात की ख़ुशबू बाक़ी थी. या शायद कहीं आस पास कुछ बरसा होगा. हवा उस ख़ुशबू को अपने साथ ले आई होगी.

जाने क्यों इतना इंतज़ार करना रास आता है. कितनी सरल सी बात है. साफ़ कह देनी चाहिए, तुम्हारे पास होना है. बस.

क्या होगा? इस पर कभी नहीं सोचना चाहिए. कि ज़िन्दगी बहुत कुछ को बहुत जल्दी भुला देने का हुनर जानती है.
* * *

अचानक लगा
कि घिर आई है शाम.

फिर लगा कि ये तुम हो.

कभी भरे-पूरे घर में खालीपन उतरते देखा है? कि आँखें बुझती जा रही है. कि साँस भारी हो गयी है. कि थकान ने मार गिराया है, मन, देह और आत्मा को. साँस एक मरोड़ बनकर ठहर जाये. गले के बीच अटकी हुई. सीने में कोई पत्थर बढ़ता हुआ. 

उस वक़्त जब लगे कि अगले पल जाने क्या होगा. अगला पल कैसे आएगा?
* * *

कोई ज़रूरी है कि सबकुछ कहूँ? इतना कहना काफ़ी होता है कि अभी आ जाओ.
* * *

May 25, 2017

मालूम था कि तुम मेरे नहीं थे

तुमने मोहा, गले लगाया. चूमा. तुम गये तो ज़िन्दगी को आंसुओं, बेचैनी और इंतज़ार से भरकर गए. तुम न होते तो खाली-खाली जीवन को लेकर जाने कहाँ-कहाँ भटकना पड़ता.

जीवन को इतना आसान कर देने के लिए मेरे दयालु सद्गुरु तुम्हारा आभार. 
* * *

पुराने रेलवे स्टेशन से बाहर आने वाले गलियारे के आखिरी छोर पर सुबह उतर रही थी. रेलवे स्टेशन के सूनेपन को तोड़ने के लिए कोई न था. इतने बड़े शहर में भीड़ गुम थी. दायीं तरफ कुछ दूर आकर रुकी एक कार ने इस नीरवता को भंग किया. इसके साथ ही आगे पीछे से कुछ लोग गुज़रने लगे. ऐसा लगा कि ठहरे हुए समय की रुकी सुई को किसी ने आहिस्ता से छू दिया. और ठहरी ज़िन्दगी चल पड़ी.

अपने जूतों पर जमी बारीक धूल को देखकर ज़रा नज़र उठायी तो देखा कि कार के अगले दरवाज़े से एक आदमी उतर रहा था. पिछली खिड़की से एक हाथ हिल रहा था. दिल धक् से एक बार धड़क कर देर तक ठहरा रहा. तुम्हारी साफ़ कलाई से बंधी घड़ी का काला पट्टा किसी धागे की तरह चमक रहा था.

उस हाथ के सिवा कुछ नहीं दिख रहा था मगर जाने क्यूँ लगा कि तुम मुस्कुरा रहे हो. तुम्हारा मुस्कुराना सोचकर मेरी आँखें पनियल होने लगीं.

मैंने चाहा कि तुमसे रुख फेरकर वापस चलूँ. तुमको अभी बहुत जीना है. तुम कब तक दुःख उठाये फिरोगे. तुमको अभी ख़ुश रहना चाहिए. तुमको कहकहों से भरी पार्टियों और ख़ुशनुमा दोपहरों में हमउम्र लड़के-लड़कियों के साथ होना चाहिए. इसी सोच में मैंने जब सोचा कि तुम बेहद कमसिन हो. मेरे पैर ठहर गए थे.

छुअन से ख़यालों का ओपेरा टूट गया था. उस आदमी ने मेरे हाथ से थैला ले लिए था. वह मुस्कुरा रहा था. 
* * *

“आपकी ज़रूरत थी” इतना कहते हुए उसने सूटकेस खोला. उसमें से कुछ छोटी-बड़ी स्पायरल डायरियां निकाल कर बाहर रख दी. ग्रेफाइट की डिबिया से एक पतली सींक निकाली. मुड़कर पास आते कहा- “हो सके तो समझना कि ये मेरी ख़ुशी के लिए था.” 
* * *

बाद तेरे बरसों तक उड़ती रही धूल 
ज़िंदगी चुभती रही, बारीक कांटे सी.

जबकि मालूम था कि तुम मेरे नहीं थे. 
* * *

[Painting : Shanti Marie]

May 17, 2017

अगर फूल कह देता

कनॉट प्लेस के इनर सर्कल में एक पेड़ गहरे लाल फूलों से भरा समाधिस्थ था। हवा के झौंके आते। पेड़ के फूलों को चूमते और चले जाते। फूल इसी चूमने से प्रसन्न होकर हवा के पीछे उड़ने लगते। मैंने चाहा कि एक फूल को अपनी अंगुलियों से छूकर पूछूँ- "ये तुम किस ख़ानाबदोश के प्रेम में गिरे। तुमने सोचा तक नहीं कि हवा है और हवा का ठिकाना क्या है?" मैंने फूल को नही उठाया। इसलिए कि अगर फूल कह देता "बाबू, तुम क्या जानो प्रेम?" तो मैं क्या जवाब देता।

"बहुत गर्मी है।" कल दोपहर ऐसा कहते हुए आदमी ने पसीना पौंछ कर उदास मुँह बना लिया। उसके पास खड़े आदमी ने कहा- "हाँ" मैंने देखा कि दोनों आदमी स्वस्थ थे और एक मामूली सी गर्म रुत से परेशान थे। क्या सचमुच आदमी केवल सुख से छींके में पड़ा रहने को दुनिया मे आया है?

मैं जब छुट्टियों पर होता हूँ तब मुझे बेवजह पैदल चलना। नए लोगों को देखते जाना और शाम को दोस्तों के साथ बिता देना। बस यही अच्छा लगता है। आज की सुबह अच्छी है। बादल हैं। अचानक बारिश की छोटी बूंदें गिरने लगती हैं। मैं पैदल चलते हुए रुक कर सड़क पर चलते लोगों को देखता हूँ।

मेरे सामने तिपहिया सायकल पर एक असमर्थ लड़का गरदन को एक तरफ लटकाए हुए पड़ा था। उसकी सायकिल और उसमें कोई हरक़त नहीं थी। सामने से एक दूजा वैसा ही आदमी आया। वह अधेड़ उम्र का था। उसने अपना रिक्शा पास लगाया और पूछा- "क्या हुआ? तबियत ठीक नही? क्या बात है? बोलो बताओ?" लड़के ने कुछ जवाब दिया था। 

वह अधेड़ अपने रिक्शे को उसके पास ही लगाए रहा। उस अधेड़ की आंखों में हौसला था। वह उस हौसले को लड़के के साथ बांट रहा था। मुझे उस आदमी की याद आई जो कल अपने दो पैरों पर खड़ा था। स्वस्थ था और गर्मी को कोस रहा था। उसकी बेबसी और नाकामी याद आई।

असमर्थ असल में वह है, जो दूसरों का दुःख न पूछ सके।

May 13, 2017

जाने को कह देंगे?

मैं उनसे कहता हूँ- "क्या पाओगे? किसी उदासी में करीब बैठोगे. किसी गहरी थकान में अपना सर कंधे पर रख दोगे. किसी गहरे दुःख को कहने लगोगे. किसी यकीन में कहोगे, मेरा हाथ न छोड़ना. इसके बाद..."

"इसके बाद?"

"जैसे पहले बहुत से लोग करते आये हैं. कुछ रोज़ सबकुछ भूलकर दीवाने रहे और बाद में चले गए. वैसे चले जाना होगा"

"तो आप जाने को कह देंगे?"

"नहीं. आपका मुझसे जो सम्मोहन है. वह पूरा हो जायेगा."

"फिर?"

"फिर कुछ नहीं. सबके पास नए सम्मोहन होते हैं, सबके पास हज़ार बहाने और झूठ होते हैं, किसी को भी कोसने के लिए."

"आपको ये सब लगता है? तो ये भी लगता होगा कि आपको बदनाम किया जायेगा."

"नहीं ये नहीं लगता. इसलिए कि बदनामी तो उस बात में होती है, जिसको छिपाना पड़े. मैं तो सबसे कह देता हूँ कि हाँ ऐसा किया था."

शाम की नीरवता फोन में भी पसर जाती है.
* * *

आज की सुबह सवा दस बजे थे. कितनी अजीब बात है न. ऐसा तो रोज़ होता होगा. अगर कोई ज़िन्दा रहे और होशियार हो तो हर सुबह देख सकता है कि सवा दस बजे हैं. कई बार कुछ वक़्त के पैमाने ऐसी शक्लों में ढल जाते हैं कि उनको उसी तरह देखने की आदत हो जाती है. 

इस आदत में समय एक खालीपन हो जाता है. जिन लोगों से बचकर चलते हैं वे दफ्तर से लुप्त हो जाते हैं. लगता है कि वे लोग सदियों से गुम हैं. वे शायद यहाँ कभी थे ही नहीं. असल में आज घड़ी पर उस वक़्त ध्यान नहीं जाना था मगर उसी वक़्त गया. 

बंद कमरे में बैठे हुए लगने लगता है कि बाहर बादल घिर आये हैं. धूप का लिबास अब धूसर हो चला है. हवा में बादलों की छाया की गंध है. कैसा होता है न आदमी. बंद कमरे से मौसम पढ़ लेता है. 

मैं कहता हूँ- "जाओ केसी, बाहर जाकर देखो. मौसम को तुम्हारा इंतजार है."
* * *

May 12, 2017

ख़ुश होकर जाओ

मैं था तो शागिर्दी के लायक भी नहीं 
मगर उनकी फ्रेंड रिक्वेस्ट आ गयी है.

फेसबुक पर फ्रेंड रिक्वेस्ट वाले बटन पर लाल बत्ती चमकी तो देखा कि सआदत हसन मंटो साहब की ओर से दोस्ती का हाथ आया है. ज़रूर उनके किसी चाहने वाले ने ऐसा किया होगा. 

सआदत हसन मंटो ने अफ़सानों से एक लकीर खींच दी थी. जिसके उस पार अगर दुनिया जा सकती तो मंटों नहीं रोकते. बरसों से दुनिया वहीँ पड़ी हुई थी. वे मेरे कॉलेज जाने से साल भर पहले के दिन थे. फिर कॉलेज जाने लगा तब ख़याल आता था कि इक्कीसवीं सदी आ रही है और मंटो की कहानियां गुज़रे ज़माने की याद भर बनकर रह जाएँगी. मुझे कहाँ समझ थी कि इस रहती दुनिया को उस लकीर के इस तरफ ही जीना है. जहाँ वही सब है जो मंटो लिख गए. मंटो के ज़माने से भी तेज़ कदम और बे हया.

कल मंटोमयी फेसबुक को देखना सचमुच अच्छा था. इधर एक दोस्त ने अपनी पोस्ट को हैशटैग ही मंटोमई दे दिया था. मानो मई का महीना हो तो मंटो के नाम ही होना चाहिए. उन्होंने मंटो के नाटक पढ़ते हुए उनके कुछ हिस्से शेयर किये. वे कुछ एक संवाद पढना ही गहरी सोच में डूब जाने को काफी था. उन पोस्ट्स के साथ मंटो की कहानियों का एक काफिला कदमताल करता हुआ आ ठहरता.

कल जब बहुत सी पोस्ट आ रही थी तो उनको ध्यान से देखता. मैं कहानियों के शीर्षक याद करने लगता. कि ये कौनसी कहानी थी. मैंने पढ़ी या नहीं? मैं ख़ुश था, मंटो को इतना याद किया जाना देखकर. मुझे दूर-दूर तक कोई दोस्त याद न आया जिसने मंटो को न पढ़ा हो.

मेरे पेज* पर आते ही कई बार कुछ दोस्त लगातार पढ़ते जाते हैं. उनको लगता है उनकी ही बातें लिखी हैं. वे उन बातों को शेयर करते हैं. कॉपी पेस्ट करते हैं. टैग करते हैं. पोस्टर बनाते हैं. और जो कुछ उनका किया जा सकता है. कल एक नौजवान आये थे. सुबह उनका संदेशा आया. "सर मैंने आपके पेज से बहुत सारी पोस्ट कॉपी पेस्ट कर ली है और आपको क्रेडिट भी नहीं दिया." मैंने कहा- "कोई बात नहीं. नाम न भी लिखो तो भी चलेगा." वे खुश हो गए.

मेरे साथ ऐसा पहले भी हुआ है. मेरी बातें बेवजह लोगों ने अपने नाम से छाप ली तो मेरे दोस्त नाराज़ हुए. जबकि मैंने कहा- "मेरा लिखा जो कुछ भी है. वह सब अपने नाम से छाप लो." क्या असल में ये कोई ऐसा रचनात्मक उत्पाद है, जिसका कॉपी राइट लिया या दावा किया जाये. क्या मैं अपने लिखे से कुछ यश, धन, लाभ बनाना चाहता हूँ? क्या इस लिखे हुए की उम्र अक्षुण है? मैं अपने ही प्रश्नों के साफ़ जवाब देता हूँ कि ये मेरे क्षणिक आवेश मात्र हैं. मैंने किसी गहरी पीड़ा में कोई कहानी लिखी. मैंने तरल उदासी में डूबते हुए कोई बेवजह की बात कही. मैंने किसी की याद में किसी को कोसना भेजा. मैंने दुआ की कि जाओ खुश रहो. ये अपनी अनुभूतियों को शब्द देना भर था. ऐसा करने पर किसी को प्रिय लगे. कोई उसे बाँटना चाहे. तो क्या बुरा है.

एक रोज़ सब ठाट धरा रह जायेगा.

प्रेम करना. पास बिठाना. मीठे से बोलना. सही बातें बताना. जो ठोकरें खाई हैं, वे सुनाना. अपने अनुभवों के सबक साझा करना. बाहँ पकड़ कर बैठना चाहे तो उसकी भी बाहँ पकड़ना. जाना चाहे तो कहना- खुश होकर जाओ और सदा खुश रहना.

पचास साठ साल बाद कॉपी राइट मर जाता है. मगर लेखक ज़िन्दा रहता है.

ये मंटो साहब के नाम से जिसने भी प्रोफाइल बनायीं है. पढ़ा लिखा है. मंटो के प्रोफाइल कवर पर चार्ली चैपलिन का होना दुखों की पराकाष्ठा है.

लव यू.

Kishore Choudhary Page

May 10, 2017

दुःख एक अश्लील चुटकला है

कभी-कभी होता तो इसे भूल कह लेता
मगर मैंने दुखों को अक्सर आगे बढ़कर चूमा है.

बुद्ध का बताया तीसरा आर्यसत्य है- दुःख निरोध. कारण के होने पर ही कार्य उत्पन्न होता है. अतः कारण के न रहने पर कार्य भी नहीं रह सकता. दुःख कार्य है अतः उसके कारण को दूर कर देने पर दुःख का निरोध संभव है.

मैंने इंटरनेट नहीं त्यागा. मैंने व्हाट्स एप को त्याग दिया. इंटरनेट जीवन सदृश्य है. व्हाट्स एप उस पर आश्रित उत्पाद है. इंटरनेट ही त्याग दिया होता तो समस्त दुखों से मुक्ति हो जाती. किन्तु प्रकृति के विरुद्ध जाकर, हमें जीवन का त्याग नहीं करना करना चाहिए. वह जिन संयोगों से हमें मिला है, उनके वियोग में परिवर्तित होने के समय तक प्रतीक्षा करनी चाहिए. इसलिए इंटरनेट बना हुआ है. व्हाट्स एप साल भर पहले अनइंस्टाल कर दिया है.

दुःख के त्याग में कुछ दिनों तक प्रतिबद्धता बनी रहती है. स्वयं का निर्णय है. कुछ और दिन बाद वे दुःख स्वयं को याद दिलाने पड़ते हैं. जिनके कारण व्हाट्स एप को विदा कहा था. उसके और कुछ महीने बाद अचानक किसी दोपहर, शाम या रात. या कभी नीम नशे में, या किसी पुरानी टीस के उभरने से बेहद खालीपन पसरने लगता है. मन कहीं किसी से कोई संवाद करना चाहता है. अंगुलियाँ फोन के स्क्रीन को ऑन करने के लिए आगे बढ़ना चाहती हैं.

तभी स्मृति के घने अँधेरे में एक हल्का सा उजास आता है.

आप थे मगर आपने रीड तक न किया. आपने रीड किया, जवाब नहीं दिया. आप ऑनलाइन थे और उत्तर देने में कोई रूचि न थी. किसको जवाब देते हैं और किसको नहीं देते हैं? हमें भी बताएं. रात आपका लास्ट सीन तीन बयालीस का था. किसकी याद में नींदें गुम हैं. या किसी को उस समय भी आप जवाब देते हैं. हमें भरी दोपहर में भी एक जवाबी स्माइली नहीं मिलती. तो आप हमारी चैट मिटाते नहीं है. ताकि समय आने पर सबको दिखा सकें कि हम ही आपके पीछे पड़े थे. दस मेसेज के बाद एक स्माइली भेजते हैं. जैसे कोई अहसान किया है. या शायद हम ओछे हैं. आप बड़े हैं. आपने मेरा नम्बर ब्लॉक करने का सोचा तो ये बताते जाना कि किसका नहीं करेंगे. सुनिए आप अच्छा लिखते हैं इसलिए हम बहक गए. घर हमारा भी अच्छा है. अच्छा आपको मन की बात कह दी तो अब आप ऐसा व्यवहार करेंगे कि हमारा कोई मोल ही नहीं. सुनिए, लव यू और इसके जवाब में ये न कहना आपको भी बहुत सारा प्रेम.

दर्शनशास्त्र में स्नातक किया था. पास होने के लिए बौद्ध दर्शन का सार कई बार पढ़ा. लगातार तीन साल तक पढ़ा. जीवन में ये पढाई, इतनी भर काम आई है कि व्हाट्स एप जैसे एक दुःख से अस्थायी मुक्ति पा ली.

दुःख एक अश्लील चुटकला है. इसे सुनकर सभ्य लोग सामने गंभीर हो जाते हैं और पीठ के पीछे खिलखिलाकर हँसते हैं.

इसलिए मैंने अपने हर नए प्रेम को पुराने प्रेम के बारे में कुछ नहीं बताया. 
* * *

बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर किसी के प्रेम में पड़िए. दुखों को आमंत्रित कीजिये ताकि दुःख के संदर्भ में चार आर्यसत्य और आर्य अष्टांगिक मार्ग को समझने का दिन आये. बुद्ध द्वारा ये सब जानने के लिए उठाये गए कष्टों का सम्मान कर सकें.

आ जाना कभी. दोनों एक दूजे के आस-पास आँखें बंद किये बैठे रहेंगे. अपने भीतर तक उतरते हुए, प्रेम में आचरण से उपजे दुखों को क्षमा कर देंगे. और फिर एक नया दुःख बुन लेंगे.

लव यू. 
* * *

April 21, 2017

ख़ामोशी से भरा घर

हवा ने कितनी ही थपकियाँ दी होंगी. आज सुबह मैं उस दरवाज़े के सामने खड़ा था. दरवाज़ा चुप था. ऐसे चुप जैसे कोई किसी अपने के लौट आने पर हतप्रभ चुप खड़ा होता है.वह पूछना भी नहीं चाहता कि अब किसलिए आये हो? जब गए थे तब सोचा न था कि जाने के बाद क्या होगा. घर, रिश्ते, चीज़ें सब एकांत में छीजने लगते हैं. मैं झुकर थैले के आगे वाली जेब में चाबी खोजता हूँ. 

ख़ामोशी से भरा घर हमें पुकारता होगा?

ना. मैं अपने आप से ना कहता हूँ. इसलिए कि घर तब तक है जब तक कोई उसके लिए है. जब वहां कोई नहीं है तब घर एक निर्जीव चीज़ है. अपने पक्ष में इस तरह की तकरीर करते हुए चाबी निकाल लेता हूँ. घर के दरवाज़े पर लगी कुण्डी का अन्दर वाला एक स्क्रू गिर गया है. असल में कई बार उसे कसा मगर पेच बचा नहीं था. अक्सर रिश्तों के, प्रेम के, नफरत के, ईर्ष्या के और लगभग हर अनुभूति के पेच मर जाते हैं. 

उन पेचों को हम बार-बार कसना चाहते हैं मगर चूड़ी होती नहीं है. इसी तरह मैंने हत्थी के पेच को कई बार कसा मगर कुछ रोज़ बाद फिर से ऊपर की तरफ से ढीला हो जाता. की-होल में चाबी आसानी से घूमती नहीं है. कुण्डी को पकड़ के बाहर की ओर खींचो तब एक बार फिर और खींचो तब दूसरी बार घूमती है. अंगुलियाँ हत्थी से हटती तब तक पक्का सोचा कि इस बार बदलवा लूँगा. 

रेल की खिड़कियों से आई गर्द में सने कपडे. हाथों में लोहे और पसीने की मिली जुली गंध. बाल चिपके हुए. दरवाज़ा खुलते ही गर्द की एक बारीक चादर के पार रखे हुए सोफे. आहिस्ता से आगे बढ़ने पहले मैं स्विच ऑन करता हूँ. छोटा पिट्ठू थैला आँगन पर रखूं? फिर ठहर जाता हूँ. एक कमरे का दरवाज़ा खोलकर बिस्तर पर रखता हूँ. चादर पर एक कवर बिछा है. कवर पर भी बारीक गर्द है. कवर हटाते हुए चादर पर अंगुलियाँ फेरता हूँ. वह चादर भी बारीक धूल से भरी है. ज़रा सा झुक कर सूंघता हूँ कि पिछली बार हमारे यहाँ होने की गंध कितनी बची है. वहां हमारी गंध नहीं है. बस गर्द है. 

तुम हमारे किसी तरह न हुए 
वरना दुनिया में क्या नहीं होता. 

शायर मोमिन खां मोमिन की तरह बेचैनी छुपाये हुए शिकवे को सरल करता हूँ. सादगी से कहता हूँ कि तुम्हारा ही होने को जी चाहता है. मगर हर बार घर से निकलता हूँ. इस घर ही नहीं, जहाँ कहीं रहता हूँ. वहां से कहीं न कहीं निकलना होता है. 

अब लौट आया हूँ तो जी चाहने लगा कि बैठ जाऊं. सोफ़ा पर डाले हुए कवर हटा दूँ. चाय के लिए इन्डक्शन ऑन कर लूँ. सेंडल खोलकर चप्पल पहन लूँ. कोई दूसरा टी पहन लूँ, कोई शोर्ट डाल लूँ. मगर सोचता हूँ करता कुछ नहीं. जिस सोफ़ा से कवर हटाया था उसपर बैठ जाता हूँ. 

किस काम को कहाँ से शुरू करूँ, ये बात समझ नहीं आती. 

अचानक देखता हूँ कि दोपहर के बारह बजने को आये. दो बार चाय बन गयी. घर से डस्टिंग क्लीनिंग हो गयी. बर्तन धुल गए. थैला खुल गया. कपड़े बिस्तर पर फ़ैल गए. चादरें धुल कर बाहर सूखने गयी. वह जो कुछ घंटे पहले उदास घर था, अब उदास नहीं रहा. एक बात सुनो. कुछ एक घंटों में इतना कुछ बदल जाता है. तो किसी के चले जाने के बाद ज़िन्दगी कितनी बदल चुकी होती होगी. 

एक चिड़िया जाली पर बैठकर घर के अन्दर झांकती है. मैं देखता हूँ कि उसके गुलाबी पैर बहुत सुन्दर है. 

April 20, 2017

दो झपकी के ख़याल में

शाम जाने कैसी बीते? हो सकता है सात बजे तक आने वाले धुंधलके के बाद गरमी छंट जाये. हलकी ठंडी हवा चलने लगे. गरम दिन में यही एक ख़याल ऐसा था, जिसके भरोसे मैंने तत्काल में रिजर्वेशन लिया और स्लिपर कोच में चढ़ गया. पिछले दस एक रोज़ से वायरल बुखार था. आधी रात या भरी दोपहर में बुखार अचानक से आता. बदन तपने लगता और फिर नीम बेहोशी छाने लगती. दवा लो तो कुछ देर बाद पसीना होता और भीग कर मैं जाग जाता था. ऐसे में लगता नहीं था कि जयपुर की यात्रा कर सकूंगा. इसलिए पहले टिकट न ली. क्या कभी हम इस तरह कुछ स्थगित कर सकते हैं? 

शिथिल मन और थकन से भरा बदन कहता है- जाने दो. जो जिस तरह बीतता है बीते. निश्चेष्ट पड़े रहो. जैसे भोर के बाद बड़े वाला उल्लू पड़ा होता है. उसे कुछ दीखता नहीं है. वह उड़कर सुरक्षित जगह नहीं जा सकता है. मगर ऐसा भी नहीं है कि वह जीना नहीं चाहता है. रौशनी ने उससे रास्ता छीन लिया है. इसी तरह बुखार में हम करना बहुत कुछ चाहते हैं. लेकिन ये करना सम्भव नहीं होता. इसलिए उसी उल्लू की तरह रौशनी के अँधेरे में ठोकरे खाते हुए अपने अनुकूल समय की प्रतीक्षा करते हैं. 

शाम को चलने वाली रेल से उतनी उम्मीद ही की जा सकती है, जितना किसी के वादे पर भरोसा करना. 

मैं अपने आस-पास बैठे लोगों से परिचय नहीं करता हूँ. मैं उनके यात्रा प्रयोजन से अनभिग्य ही रहना चाहता हूँ. मैं चाहता हूँ कि कुछ छूटे हुए ब्लॉग पढ़ लूं. मगर रेल के शोर खिडकियों से आती धूल, यात्रियों की ऊँची आवाज़, चाय वालों का आना जाना, मुझे ब्लॉग पढने नहीं देता. मैं फेसबुक देखता रहता हूँ. एक पोस्ट, एक तस्वीर एक कोई अजनबी चेहरा. 

जैसे रेल आगे बढती जाती है. यात्री आपसी सम्बन्ध में बंधने लगते हैं. वे चेहरों और हावभाव से पहचान गढ़ते हैं. वे अजनबियत को खोने लगते हैं. उनमें एक भाव जागता है कि हम साथ सफ़र कर रहे हैं, साथी हैं. आहिस्ता से सब सामान्य होने लगता है. बदन की अकड़, सख्त ठहरी हुई ऑंखें, सीधे रखे हुए पाँव. अक्सर दो तीन घंटे के सफ़र में यात्री एक दूजे के इस तरह से अपने हो जाते हैं कि सामान की हिफाज़त के लिए कह कर रेल कोच से बाहर चले जाते हैं. 

ज़िन्दगी भी ऐसी ही नहीं? पहली मुलाकात में सख्त, अकड़ी और चुप. बाद में आहिस्ता से वह हमारे कन्धों पर सवार हो जाती है. हम जीने की जगह जीने का बोझ ढ़ोने लगते हैं. हर समय इसी हिफाज़त में लग जाते हैं कि जिंदगी को कुछ हो न जाए. इसलिए खिड़की से बाहर की दुनिया में झांकते हुए जिस तरह सामान पर नज़र रखते हैं, वैसे ही ज़िन्दगी के साथ पेश आते हैं. एक ऐसा सामान जो खो ही जाना है, उसी की हिफाज़त में जीते जाना. 

मेरे कूपे के सब यात्री गांधीनगर स्टेशन पर उतरने वाले हैं. 

रात ठंडी हो जाती है. मौसम में लू की हलकी सी चुभन बाकी रह जाती है. एक बेडशीट बिछाए हुए करवटें लेते जाना और सोचना कि महीनों बाद घर जाने पर साफ़ सफाई में पूरा दिन ही गुज़र जायेगा. शायद इसीलिए कई बार कुछ रिश्ते लौटने से डरते हैं. कहाँ से बुहारेगे, कहाँ से फटकेंगे, किस तरह बारीक गर्द को धोयेंगे. 

जिस तरह छूटा हुआ घर पूरी तरह कभी खत्म नहीं होता. वैसे ही न लौटने पर भी रिश्ते तो रहते ही हैं.  

एक छोटा सा ख्वाब अचानक टूटता है. रेलगाड़ी चलकर रुक गयी है. मैं फिर से करवट लेता हूँ, दिन के उजाले में फंसे उल्लू की तरह. कि जहाँ, जब जाना होगा, जाएगी ज़िन्दगी. चुप लेटे रहो. रात के खत्म होने तक दो झपकी ले लो.
* * *

[Painting courtesy ; Natalie Graham]

के सी

My photo

Kishore Choudhary is a poet and fiction writer from Barmer (Rajasthan). His writing career took a formal leap from his personal journals to make him a hugely popular blogger on two of his blogs- Kahaniyan and Hathkadh.

Having spent most of his formative years in the desert, the life there is his favourite canvas to contextualise his poetry and stories. His followers from across the world vouch for his realistic and authentic portrayal of the desert life and its typical dilemmas, fused beautifully and almost effortlessly with some stunning images of the desert and its folklore.

Kishore in a way pioneered the incorporation of pre-publishing interactions and feedback with his readers on his blogs and across social media platforms in his final works. His style is known for its lucid and unexampled metaphors that he exquisitely uses to express universal feelings like love, loneliness, hope, pain, longing and fantasy. 

His first collection of stories Chaurahe Par Seedhiyan (2012)was such a thumping bestseller that the first issue was sold out within 50 days of its launch.All the stories skilfully bring the rich and exotic background of the desert come alive and make the reader delve deeper into the layers of human emotions.This much sought after collection raised the bar for all contemporary Hindi works of short fiction and brought in a fresh change in the existing status quo for Hindi short stories. 

The second collection titled Dhoop Ke Aaiyne Mein(2013)had an array of short stories that looked at life through a multi-dimensional prism, lending each one of them a distinctive charm. Kishore being a poet first, his stories are more like poetic fiction. Having a great affinity to the stream of consciousness novels by English literary greats like James Joyce and Virginia Woolf his stories defy the conventional rules of a definitive beginning, middle and end. 

Kishore’s first publication was a collection of poetry Baatein Bewajah, an alluring and bewitching series of short poems which capture the vast expanse of human emotions and have images that have a rare haunting quality.

Kishore is a Radio Broadcaster by profession and has a special fondness for classical & folk music. Articles about him and his interviews are available across many major newspapers and websites. Kishore certainly is the Avant-garde flavour in contemporary Hindi writing and his ever expanding avid readership eagerly waits for his next chartbuster.

Kishore's latest is another collection called "Jaadu Bhari Ladki". This collection has his same imitable style of stories but the contexts and places are beyond the desert as well. 
His deep understanding of the complexity of modern relationships and how they play out in our minds, homes and workplaces makes it a very unique almost post-modern work in Hindi Fiction.

http://www.goodreads.com/author/show/7361739.Kishore_Chaudhary

हेंगओवर सिलसिला

Labels

अफीम अमज़द इस्लाम अमर अमीर कज़ालबाश अम्बानी अरुंधती अर्नका बोहम असकर खाँ आखा तीज आत्मकथा आबिदा परवीन आर एस हरियाणवी 'रतन' इक़बाल अज़ीम इब्ने इंशा इशरत आफ़रीन ईथोपिया उत्तरलाई एटेल जुडिक एमी वाइनहॉउस एलोनोरा फेगन क़मर जलालाबादी कल्लजी कवास कवि कविता कहानी कार्टून कासानोवा केन्द्रीय विद्यालय ख़त ख़्वाब गणेश गफूर खां मांगणियार गाय ग़ालिब गालियां गिब्रेलपेरी गुडाळ गुरुद्वारा कबूतरसर गुलाम अली ग्रामीण भोज ग्रीन लेबल चाईल्ड मोलेस्टेशन छोटे सरकार जगजीत सिंह ज़फर हुसैन खां जया ज़िन्दगी जिप्सम हाल्ट जेम्स डगलस मोरिसन जोधपुर टाल्सटॉय ठुमरी डिक नोर्टन तीसरा प्रहर त्यौहार थारपारकर द बेल जार दिनेश जोशी दिमित्रोफ़ दूरदर्शन देजो कोस्तोलान्यी देसो सोमोरी देहरादून धोखा धोधे खां नज़ीर बनारसी नया साल नरसिंह बाकोलिया नष्टोमोह नसरुद्दीन नसीम देहलवी नागौर नाटक नानी नासिर काज़मी नुसरत नोस्टेल्जिया पतनशील पत्रकारिता पर्व पापा पेन्सिल प्रेम प्रेस कांफ्रेंस प्लेटफार्म नंबर तीन फ़रहत शहज़ाद फ़रीद अयाज़ फिर से फ़िराक फ़ीचर फैज़ फैंव्किस बर्नियर फ्रिजेश कारिंथी बाघ बाढ़ बातें बेवजह बी बी एल भटनागर बीकानेर बेख़याल बेगम अख्तर बेल्ली होलीडे बेस्ट स्कालर ब्रिटनी मर्फी भाई भुट्टा खाँ भूख मकबूल फ़िदा हुसैन मतीरा मंहगाई महमूद दरवेश महाजन माओवादी मास्टर मिर्ज़ा साहब मूमल मेकडोवेल्स मेथी मेहदी हसन मेहनसर मेहरुन्निसा परवेज़ मैगी मौसम यात्रा वृतांत याद यानोश कांदोलान्यी यू आई डी रांगेय राघव राहत रुकमा रेडियो रेवाण रेशमा लंगा लायोश ज़िलाही लायोश बीरो लेखन लोकगीत वसीम बरेलवी वाईट मिस्चीफ़ विकास विकीलीक्स विजय माल्या विभूति नारायण राय विवेकानंद विस्की व्यर्थ अभिमाना शराब शादी शाम शाहनवाज़ हुसैन शिनचैन शुजात हुसैन शेखावटी श्रेया घोषाल सपना सबा समंदर खान सलेटी जींस सहवाग साईमन मार्क मोंजेक सिल्विया प्लेथ सुदर्शन फ़ाकिर सुनो [जा]ना सुल्तान खां सूरतगढ़ स्कायलार्क स्टीफन क्रेन स्त्री विमर्श स्फिंक्स हंगरी हबीब वली मोहम्मद हम तुम हवेलियाँ होली ह्यूम

सर्वाधिक पढ़ी गयी पोस्ट्स

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने या खूबसूरत स्त्री को इरादतन चूमने जितना ही अवैध है.

पलटे गए पन्ने

Google+ Followers