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Showing posts from 2017

ऊधो, मन माने की बात

कच्ची धूप आ गयी है। चारपाई पर बैठ कर आभा कक्षा छठी की हिंदी की उत्तर पुस्तिकाएं जाँचने लगी। पहला वस्तुनिष्ठ प्रश्न था। सूर के पद किस भाषा में हैं। मेरी ओर देखते हुए कहती हैं- "सूर की भाषा"
मुझे लगता है बिना पूछे ही प्रश्न कर लिया है। हिंदी साहित्य का कक्षा से अधिकांश अनुपस्थित रहा विद्यार्थी तुरन्त उत्तर देता है- "ब्रज भाषा" मेरा उत्तर सुनकर सन्तुष्ट हो जाती हैं। उत्तर पुस्तिकाएं जाँचने लगती हैं। इस कार्य के बीच आँख उठाकर मुझे देखती हैं। जैसे कह रही हों कि आपकी यही दुनिया है मोबाइल और सोशल साइट्स।
ये समझकर मैं आरम्भ हो जाता हूँ।
मधुप करत घर कोरि काठ में, बंधत कमल के पात॥ ज्यों पतंग हित जानि आपुनो दीपक सो लपटात। सूरदास, जाकौ जासों हित, सोई ताहि सुहात॥
पद को उदघोषक की तरह स्पष्ट शब्द स्वर में पढ़ता हूँ। वे मेरी ओर देखती हैं। मैं व्याख्या करने लगता हूँ। भ्रमर सूखी लकड़ी में घर बनाना है किंतु वह कमल की पंखुड़ियों में क़ैद हो जाता है। जैसे पतंगा अपना हित समझकर स्वयं दीपक की लौ से लिपट जाता है। सूर जिसका जिसमें हित अथवा मन होता है उसे वही सुहाता है।
अभी तक सब कुशल मंगल है।

भीगे सलवटों भरे बिस्तर

किसी को छू लेने की, चूम लेने की, बाँहों में भर लेने की या साथ रह लेने की इच्छा होने पर लोग झूठ बोलने लगते हैं कि मुझे तुमसे प्रेम हो गया है।
इन झूठ से जितना जल्दी हो सके बाहर आना ताकि अपना समय और मन बरबाद होने से बचा सको। ताकि एक दिन झूठ का कालीन फट जाने पर पश्चाताप से न भर जाओ। ताकि कोई तुम्हारा नाम लेकर रोये नहीं कि तुमने प्यार-प्यार कहकर एक दिन छोड़ दिया।
मैंने ये कब सीखा. 
चाहना और प्रेम की धूमिल पहचान के बीच बनते-बिखरते सम्बन्धों के बीच निराशा, हताशा और अवसाद में कुछ साफ़ समझा न जा सकता था. अगर केवल चाहना भर थी. अगर उसे केवल देह के संसर्ग से पूर्ण हो जाना था तो हम उसे कुछ और कहकर क्यों पुकारते गये. अगर प्रेम था तो कहाँ गया? 
देह के आमंत्रणों और उपभोग के बाद मन उचट जाता है. बस यही सब करना है? तो इसके लिए दुनिया भर की परेशानी नहीं उठानी. ये लम्हा आएगा और बीत जाएगा. जितनी बार आएगा उतना अपना असर खोता जायेगा. एक रोज़ सम्बन्ध और उससे बड़ी बात कि प्रिय को सदा के लिए खो देना. 
तो क्या ये सब नहीं करेंगे?
मैं समझ ही नहीं पाता मगर खुद से कहता हूँ कि जो मन आये करना किन्तु इंतज़ार करना. अपने आप ह…

चाहना की प्रतिध्वनि

उसके होठों के छोर पर दो गोल बिंदियाँ रखीं थीं. उनको देखते हुए मैं एक अँधेरे में फिसलने लगा. 
अचानक किसी ने मेरा हाथ थाम लिया. मैं ही अपने सामने मेरा हाथ पकड़ कर खड़ा था और मुझे ही कह रहा था कि कि ऐसे चेहरे जिनके होठों की मुस्कान दो सुंदर गोल बिन्दुओं में सिमटी हों, वे अपनी चाहना उम्र भर किसी को नहीं कहते. 
मैं ख़ुद को कहते देखकर हैरत से भर जाता हूँ. मैं कहने वाले चेहरे की मुस्कान और होठों के सिरे देख लेना चाहता हूँ कि क्या उन होठों के किनारे दो गोल बिंदियाँ बनती हैं? 
लेकिन मैं अपना हाथ छोड़ देता हूँ. 
अँधेरे के भीतर फिसलने लगा. अपने हाथों की अँगुलियाँ खोल लीं. मुझे लगा कि यहीं-कहीं, भीतर गहरे दुःख और स्याह इच्छाएं ढक कर रखीं होंगी. कुछ पल अनवरत आँखें मूँदें स्याह असीमित अँधेरे के संसार में फिसलने के बाद हल्का उजास चारों ओर दिखाई देता है. दुःख और इच्छाओं को छूने की चाहना विस्मृत होने लगती हैं. 
एक लिहाफ के भीतर नीम उजाला. स्याह कुरते पर कोई सलवट नहीं. वह अपनी चमक और अनछुई छवि के साथ एक करवट लेता है. मौन में कोई कहता है कि इस पेट के भीतर असंख्य जटिलताएं हैं. वहां कोई दर्द रखा है क्या? ये …

जो तुम नहीं हो

एक ठिठक निगाह में उतरती है. एक पेड़ से थोड़ा आगे बायीं तरफ़ घर दीखता है. घर से इक पुराना सम्बन्ध है. जैसे कुछ लोग होते हैं. जिनसे हम कभी नहीं मिले होते लेकिन उनको अपने सामने पाकर बहुत पीछे तक सोचने लगते हैं. याद का हर आला, दराज़ खोजने लगते हैं कि इसे कहाँ देखा है. ये हमारा पुराना कुछ है. वैसे ही उस घर का दिखना हुआ. 
उस घर के अन्दर एक कॉफ़ी रंग के दरवाज़े के भीतर झांकते ही छोटा शयनकक्ष दिखाई दिया. बायीं ओर दीवार में ज़मीन को छूती हुई रैक के आगे कांच का पारदर्शी ढक्कन लगा था. बैड खाली था. वहां कोई न था कि ध्यान फिर से रैक की ओर गया. वहाँ पीले रंग की माइका का बना फर्श था. उस पर सफ़ेद चूहे थे. कोई दस बारह चूहे. उन चूहों के पीछे कोई छाया थी या एक गहरे भूरे रंग का चूहा था. 
लड़की ने कुछ कहा. मैंने उसे देखा था मगर वह दिखी नहीं थी. जैसे कई बार हम कोई आवाज़ सुनते हुए महसूस करते हैं कि कोई पास खड़ा है और उसी की आवाज़ है. थोड़ी देर बाद पाते हैं कि वहाँ कोई नहीं है. हम स्वयं को यकीन दिलाते रहते हैं कि यहाँ कोई था. उसी ने कहा है. इसी तरह वह लड़की दिखी नहीं. 
मैं उसे जानता था. उससे बहुत दिनों का परिचय था. हम पर…

क्या सचमुच !

ख़यालों के टूटते ही, किसी काम के ख़त्म होते ही, मैं जहाँ होता हूँ वहाँ से बाहर जाना चाहता हूँ. अभी वर्डपैड को खोलते ही लगा कि एक बार बाहर चला जाऊं. मैंने चारपाई के नीचे देखा. वहाँ मेरे जूते नहीं थे. मैं अपने जूते थोड़ी देर पहले फर्स्ट फ्लोर पर रख आया था. वहाँ से पतले गुलाबी चप्पल पहन कर चला आया. चारपाई के पास वे ही रखे हैं. क्या मैं इनको पहन कर बाहर नहीं जा सकता? देखता हूँ कि एक चप्पल में टूटन है. वह अंगूठे के नीचे की जगह से चटक गया है. चप्पल को देखने से बाहर आते ही मुझे लगता है कि कहीं बाहर चले जाना चाहिए. 
मेरे भीतर से कोई मुझे उकसाता है. मेरे ही भीतर से कोई मुझे लिए बैठा रहता है. 
कहाँ जाऊँगा? 
पलंग से चार हाथ की दूरी पर रखे फ़ोन से बीप की आवाज़ आई. मैंने समझा कि संदेशा आया है. उसमें लिखा है 'हाई'. पता नहीं लिखा क्या है पर मैंने यही सोचा. मैं फ़ोन तक नहीं जाना चाहता. मेरी हिम्मत नहीं है. अब से थोड़ी देर बाद फिर बीप की आवाज़ आएगी. शायद लिखा होगा 'बिजी?" मैं क्या सचमुच बिजी हूँ? शायद बहुत ज़्यादा. मेरा मन गुंजलक है. मेरे पास जवाब खत्म हो गए हैं. मैं केवल इस जगह से या जहाँ भी…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

फूल को चूमकर उड़ जाना

घर से बाहर गए पति की जान अकसर घर में अटकी रहती है। वह लगभग हर काम के बीच घर को याद करता रहता है। अकसर ये भी होता कि वो घर पर अपने अपडेट देने के मामले में फिसड्डी निकलता है। सोचता रहता है पर कह नहीं पाता। 
उधर बीवी के पास प्रेम पत्र तैयार रखे होते हैं- "आ गयी हमारी याद" इन चार शब्दों के बाद एक जानलेवा चुप्पी। इस चुप्पी को तोड़ने, बात को आगे बढ़ाने के लिए पति मुंह खोलता है, तो बोल नहीं पाता। वैसे ये कोई नई बात नहीं है। सब पति-पत्नी जानते हैं।
सुमेर के फार्म पर पार्टी थी। शाम होने को थी। हनुवंत सा पहाड़ी पर पड़े सुंदर पत्थर चुनने लगे। उन्होंने बहुत सारे पत्थर जमा किए। अपनी प्रिय के लिए सुंदर अनूठे पत्थर चुनते हुए उनकी अंगुलियां मचल-मचल रही थी। उनके साथ नरपत साहब भी लगे थे। एक साफ खुली जगह पर छोटा सा पत्थर उठाया तो चेतावनी सुनाई दी। शायद वाइपर था, हो सकता है कैरेट हो। लेकिन इतना तय था कि अगर एक मीठी दे देते तो जान आफत में पड़ जाती।
हनुवंत सा ने अपने चुने पत्थर मुझे दिखाए। कहा कि आप भी इनमें से ले सकते हैं। मैंने कहा- "मैं संजीदा हो गया हूँ। इस तरह पत्थर चुनते हुए आपने तो जान दा…

अचम्भे की बरत की तरह

स्याही के लिबास में आई नृत्यांगना शैतान की प्रेमिका की निकली। उसके नाच से जो चिंगारी बहकी थी। उसने शैतान के दिल को रुई की तरह जला दिया। शैतान सब बन्धनों से दूर आक के डोडे से उड़ा फूल हो गया। उसे प्रेम, प्रेम और प्रेम सुनाई देने लगा।
शैतान ने चाहा कि वह उसे छू सके। वह उसे चूम ले। उसे बाहों में भर ले। अनयास मृत्यु को याद कर रहे व्यक्ति को कभी मृत्यु जिस तरह अपने आगोश में ले लेती है। उसी तरह नृत्यांगना ने अपनी बाहें खोल दी। शैतान एक अचम्भे की बरत की तरह गहराई में उतर गया।
जादुई टैंट में फैले पीले उजास में शैतान की प्रेमिका का रंग व्हिस्की जैसा हो गया था। सुनहरा रंग। शैतान अपनी प्रेमिका के रंग पर गिर रही हर स्याह लकीर को चूम कर मिटा देना चाहता था।
लेकिन शैतान को अपने पहले के सब प्रेम बेवक़्त याद आये। उसने अपने चाहने वालों से कहा कि इस लम्हे को रोक लो। दूजे सब प्रेम की तरह ये प्रेम कहीं खो न जाये। मित्रों ने तस्वीरें उतार लीं।
लेकिन मोहब्बत तो अपने दिल को चाक करना और सीने के कारोबार ही निकला। आज की शाम रेत के वे धोरे दूर रह गए हैं। शैतान की प्रेमिका जाने कहाँ होगी। उसकी याद में मगर प्याला भर…

प्रेम करने के ख़याल की ख़ब्त

तुमको इस बात का यकीन न होगा किन्तु ये सच है कि हर व्यक्ति एक ख़ब्त का शिकार होता है। उसी ख़ब्त के साथ जीता है और उसी के साथ मर जाता है। तुम ख़ब्त को सनक समझना या फिर मैडनेस ज्यादा ठीक होगा।
मैं अपनी याददाश्त में जितना पीछे जा सकता हूँ, वहाँ से अपने भीतर एक ख़ब्त पाता हूँ। प्रेम करने के ख़याल की ख़ब्त। इसे प्रेम करना न समझना। बस प्रेम करने का ख़याल या विचार ही समझना। इसलिए कि ये दोनों अलग स्थितियां हैं। ये दो पायदान भी नहीं है। कहीं ऐसा न समझने लगो कि पहले ख़याल आएगा फिर प्रेम किया जाएगा या होगा।
प्रेम करने का, प्रेम के ख़याल से कोई वास्ता नहीं है। प्रेम एक स्वतः स्फूर्त, सदानीरा, असीम शै है। वह जिसके पास होती है, उसे प्रेम करना नहीं पड़ता। उसका प्रेम उसके आचरण में घुला रहता है। ऐसा व्यक्ति जहाँ कहीं होता है, जिस काम को करता है, वहाँ केवल प्रेम होता है।
प्रेम से भरा व्यक्ति, प्रेम करने के ख़याल से भरे व्यक्ति से अधिक ख़ब्ती होता है। इसलिए कि उसे आने और जाने वाले, बने और बिगड़े हुए से कुछ फर्क नहीं पड़ता। जब कोई जीवन से चला जाता है तो वह घर, बगीचे और दफ्तर से प्रेम करता रहता है। जब वह लौट आता तो उसस…

यादों की सुरंगें

मैंने अचानक फोन ऑन किया. मुझे याद आया कि कोई मेसेज बहुत दिनों से पड़ा है. उसे जवाब नहीं दिया. बस कॉल किया.
मैंने पूछा- "तुम्हारे पास समय है?"
उसने कहा- "आपको ये नहीं पूछना चाहिए. आपके लिए कभी भी..."
मुझे लगा कि शायद उसने अपने आस-पास देखा होगा. पल भर में लिए तय किया होगा कि बात करे या बाद में फोन पर बात करने का कह दे.
उसने कहा- "आप बहुत अच्छा लिखते हैं"
मैंने कहा- "एक ज़रूरी काम से फोन किया है तुमको"
उसे ज़रूर अचरज हुआ होगा. उसने कहा भी- "मुझसे ?"
मैंने कहा- "हाँ"
मैं सोच रहा था कि उसके चेहरे पर मुस्कान आई है. उसे बहुत कुछ भूल गया है. जितनी परेशानियाँ उसे घेरे रही होंगी, उन पर किसी अविश्वसनीय बात ने बम गिरा दिया है. सब दिक्कतें ढहने लगी हैं.
उसने कहा- "मुझे लगा कि कहीं बैठ जाना चाहिए तो मैंने यही किया है."
मैं चुप रहा.
उसने कहा- "हेलो. आप हैं उधर?"
"हाँ"
"बताइए क्या कहना था?"
मैंने कहा- "मुझे बहुत दिनों से लगता है कि मैंने बहुत सारे चूहे पाल लिए हैं. मैं उनकी ज़रूरतें पूरी करता हूँ. वे…

असल में कुछ नहीं हूँ मैं

पहले लोग दुआ सलाम करते हैं। फिर बात करने लगते हैं। उसके बाद अपना मन बांटते हैं। अपने बारे में सब बता देने के बाद जो उनको अच्छा लगा, वह पढ़कर सुनाते हैं। हज़ार बहाने खोजते हैं फोन पर एंगेज रखने के। उनको सुनते हुए। उनसे बात करते हुए। हम भी अपना मन कह देते हैं। फिर अचानक वे लोग कहीं खो जाते हैं। उनसे पूछो तो कहते हैं कि कोई बात है। तुम न समझोगे।
इस तरह अचानक अपनी इच्छा से आये लोग, अचानक खो जाते हैं।
अच्छी बात ये है कि अब तक उन्होंने वे बातें शायद सार्वजनिक न की जो हमने उनकी बातों के बहकावे में आकर कह दी थी।
उनका शुक्रिया। * * *

मैं आपे से बाहर आया समंदर हूँ
मैं स्याह जादुई रात हूँ
मैं बहुत समय से भूखा शिकारी जीव हूँ
मैं श्मशान में चिता की राख में लेटा अघोरी हूँ.

अनवरत मंत्र पाठ की तरह
संभावनाएं जताता रहूँ अपने बारे में
तो भी जिन अंगुलियों में है
मेरी अंगुलियां छूने की चाहना, वे छू लेती हैं।
असल में कुछ नहीं हूँ मैं
हर कोई अपने स्वप्न/दुस्वप्न को छूता है और जाग जाता है।
* * *

ख़यालों के अंडरपास

दो साल पहले उसने कहा- "मानव इज हॉट।" फिर मेरी आँखों में झांकते हुए कहा- "बट मिलिंद इज मिलिंद। ही इज अ माचोमैन..." उसके होठों पर मुस्कान और आंखों में शरारत भरी थी।
"अच्छा इस बार मानव कौल दिल्ली आए तो उससे मिलवाना।" मैंने कहा- "मानव मुझे नहीं जानते" "रहने दो। ही इज इन योर फ्रेंडलिस्ट एंड रेस्पोंडिंग टू यू"
मैंने देखा कि उसे मेरी बात का यकीन न था। साथ बैठी व्हिस्की पी रही ख़ूबसूरत दोस्त को उदास करना अच्छा न था। इसलिए मैंने कहा- "ठीक है।
साल भर बाद उसने कहा- "बुक फेयर में आये हो मिलोगे?" मैंने कहा कि दिल्ली में मेरा फोन नहीं लगता। बैटरी ड्रेन हो जाती है। नेट पुअर होता है इसलिए मैं वहीं मिलूंगा। न मिलूं तो हिन्द युग्म के स्टाल पर पूछना।"
उसे अच्छा न लगा। ये दोस्त होने जैसा भी न था कि ऐसे तो कोई भी मिल लेगा। वह नहीं आई। मेरे पास भी मेले में वक़्त न था। अचानक उसका मेसेज आया। "शाबाश। मानव कौल का इंटरव्यू कर रहे हो और बड़ी भीड़ लगा रखी है। बहुत अच्छा।"
इस बार मिले तो हम फिर व्हिस्की पी रहे थे। फिर अचानक उसे याद आया। …

बस एक बार के लिए

किताबों को सोचना अच्छा है। एक-दो किताब आस पास रहे तो एक अजाने संसार में प्रवेश किया जा सकता है। किताबें ऐसी खिड़कियाँ हैं, जो सबसे सुन्दर संसार में ले जाती हैं. 
आप सब किताबें नहीं पढ़ सकते। सबको पढ़ने की ज़रूरत भी नहीं है। आप इस दुनिया मे किताबें पढ़ने नहीं आये हैं। जैसे कोई कुम्हार केवल मृदा पात्र बनाने नहीं आता, लुहार लोहे की चीज़ें बनाने भर को नहीं आता। 
हमारे सम्मोहन होते हैं. हम प्यार करते हैं. हम प्यार करते हुए उसी को जीने लगते हैं. किताबें भी एक प्यार हो सकती हैं. जिसमें इस तरह डूब जाएँ कि हमें और कुछ न सूझे. लेकिन ये डूबना समय के किसी हिस्से के लिए हो सकता है. ये निरंतर होना असम्भव है. अगर संभव है तो फिर सचमुच कहीं कुछ गड़बड़ है. कि तुमने अन्य कलाओं, जीवित पौधों, सुन्दर पक्षियों, बहते पानी, ठहरी झीलों और जीवन के अनगिनत अचम्भों को खो दिया है. नृत्य के प्रेम में आकंठ डूबा एक नर्तक अर्धरात्रि को नाचने का मन होने पर नाच सकता है। द्रुत, अविराम और अनंत नृत्य। किन्तु वह बस एक बार के लिए हो सकता है। उसे फिर से लौट आना पड़ता है, उबाऊ, ढीले और बेस्वाद जीवन में।
जीवन के रास्ते में कुछ भी करते य…

हम फिर मिलते हैं

वो लम्हा पीछे छूट जाता है। सदा के लिए। एक स्मृति भर रह जाता है। हम जब कभी फिर से मिलते हैं तब हम वो नहीं होते, जो पिछली बार थे। अगर हम वही पिछले वाले होते तो हमारा मिलना असम्भव था। एक बीत चुकी मुलाक़ात दोबारा नहीं हो सकती। नई मुलाक़ात को ताबीर करने के लिए सबकुछ नया बनाना पड़ता है।
हम शायद फिर मिलेंगे लेकिन तुमसे कोई और मिलेगा, मैं किसी और से मिल रहा होऊंगा। मगर इस नएपन के बीज हैं, वे शायद कभी न बदलें। परसों सुबह ब्रेख्त की एक कविता पढ़ रहा था। मुझे लगा कि कई बार तुमसे मिलना चाहिए.
मैं तुम्हारे कॉलेज के दरवाजे के सामने की सड़क के पार बस स्टॉप पर बैठा हुआ देख सकता हूँ। तुम मुझे न देखोगी। मैं एक जाती हुई पीठ पर छितराये खुले बालों से मिल लूंगा। तुम मेट्रो स्टेशन पर आ रही होओगी। मैं इस बार फिर अपनी नज़र फेर लूंगा शायद कि मुझे यकीन न आएगा। तुम इतनी सुंदर कैसे हो जाती हो हर बार। मैं तुम्हारे दफ़्तर को जाती सीढ़ियों पर सामने से आता हुआ टकरा जाना चाहूँगा। ये मगर सम्भव न होगा कि उस वक़्त सब दफ़्तर जा रहे होंगे, दफ़्तर से आ कौन सकता है। इसलिए लन्च में दफ़्तर के निचले तल के पिछवाड़े में केंटीन से राजमा-चावल …

कि कहां तक

चाय का मग खिड़की के बीच रखा रहता। चिड़िया बालकनी में बंधे तार पर बैठी रहती।
मैं जब भी चाय बनाकर लाता। मग को खिड़की में रखता और चिड़िया को खोजने लगता। कभी-कभी चिड़िया आ जाती थी और कभी देर तक सूनापन बना रहता। फिर मैं सोचता कि क्या एक चाय और बना लूँ?
मैं बार-बार बाहर झांकता कि क्या चिड़िया लौट आई है। बिस्तर पर अधलेटा, कुर्सी में धंसा हुआ होता कि अचानक यकीन आता। उसे आना ही चाहिए कि कहानी में गोली चलने से पहले ही सब मुर्गाबियाँ उड़ जाती थी। वह तो एक चिड़िया जो अपनी मर्ज़ी से बालकनी में आती है।
मैं फिर कहानी के पन्ने को देखने लगता और याद करता कि कहां तक पढ़ा था... * * *
गुलाब के फूल का गलमा बाहर था. एक बकरी आई और इसके फूलों और पत्तियों को साफ़ कर गयी. तना और शाखाएं बची रह गयी. बस एक गमला था और गमले में सूनी शाखाएं. मैंने कहा कि कोई बात नहीं. अगर ज़िन्दगी बची है तो फिर से हरिया जाएगी. कुछ रोज़ बाद एक नन्हीं सी कोंपल का फूटना दिखाई दिया. दिल ने आराम लिया. जरा आहिस्ता से धड़का. फिर कुछ रोज़ बाद पत्तियां आ गयीं. फिर ये वाला फूल भी आ गया.

दुःख अकसर सबकुछ बुहार कर ले जाता है. मगर हम बचे रहें तो जीवन फिर से खिल …

बहुत दिनों बाद अनायास

अंगुलियों के बीच
कत्थे का एक गोल निशान रह गया है
जैसे एक बार रह गयी थी, उसके माथे की बिंदी।
* * *

बहुत दिनों बाद अनायास उसके न होने की याद आने पर फिर से महकने लगती हैं अंगुलियां। कितनी ही बातें ख़ुशबू की तरह पीछे छूट जाती है। जैसे अंगुलियों में छूटी स्याही की ख़ुशबू धुलने के बहुत दिनों बाद भी आती है। जैसे कोई फूल जो केवल देखा था उसकी तस्वीर के साथ, यहां भी महकने लगता है।
उसके होने को उसके होने की ज़रूरत नहीं है। ये बस मेरा लालच है कि वो यहाँ हो तो बाहों में भर लूँ। * * *
रहने दो।
शाम कब की ढल चुकी है। मजदूरों को अब तक उनकी गाड़ियों ने छोड़ दिया होगा, घर जाती पगडंडियों पर। कोई हल्का उजास, कोई चहल, कोई ठिठकी नज़र वे देख चुके होंगे। मैं भी एक अच्छा मजदूर होना चाहता रहा हूँ। मुझे भी सलीके से घर पहुंचना अच्छा लगता है। लेकिन मैं उससे बंध नहीं पाता। अकसर बीच मे कहीं भी ठहर जाता हूँ। इसलिए रहने दो।
किसी की चिंता न करो। प्रेम से बड़ी बहुत सी तकलीफें हैं। वे उनको सबकुछ भुला देंगी। ये भी कि वे इंतज़ार कर रहे थे। ये भी कि उनको कोई शिकायत करनी थी। क्या तुम्हारे पास थोड़ी सी शराब और थोड़ी जगह है? इतनी सी कि …

क्या होगा सोचकर

उसकी आँखें, रेत में हुकिए का बनाया कुआं थी. मैं किसी चींटी की तरह उसे खोजता रहता था. प्रेम पूर्वक उस भुरभरी रेत पर फिसल जाना चाहता था. उसके दांतों से मुक्ति मेरी एक कामना थी.

उसके होंठ बंद रहते थे, मैं देर तक चुप उनको देखता था. कि हंसी की उफनती लहर आएगी और मैं एक पतली नौका की तरह उसमें खो जाऊँगा. मगर जिस रोज़ मैंने जाना कि वह किसी के प्रेम है. उसी रोज़ मैं रेगिस्तान की रेत के नीचे छुप गया.
यहाँ रेत के नीचे सीलन है, अँधेरा है पर यहाँ भी कभी-कभी उसकी आँखें याद आती हैं, यहाँ भी उसके बंद होठ दीखते हैं.

इसके आगे मैं नहीं सोचता हूँ. क्या होगा सोचकर...
[हुकिया समझते हैं? आंटलायन]



बेपरवाह जीना

दालान और मुंडेरों पर परिंदों के कुछ पंख गिरे रहते हैं. जैसे वे छोड़ गए हों अपने होने की चिट्ठी. लेकिन तुम सबसे अच्छे निकले कि जाते-जाते सब रिश्ते भी बुहार ले गए.

जाने से पहले कुछ देर तक 
तुम रुके होवोगे खिड़की के पास.

ऐसा लगता है.
* * *

शाखों से बिछड़े पत्ते
हो सकता है
मिट्टी के दीवाने हों।
* * *


रेखाएं जब मिटी तो कुछ नई बन गई
रंग कितने भी उतरे कुछ नए आ ही गए।
* * *

बंद खिड़कियों की कतार में आखिरी खिड़की खुली रहती है। जब भी इन खिड़कियों के पास से निकलता हूँ तो कबाड़ की तरह पड़ा एक चरखा दिखाई देता है। मैं सोचता हूँ कि शायद और भी चरखे होंगे। चरखे अनुपयोगी और उदासीन पड़े हैं। एक रोज़ इसी तरह हर कोई चलन से बाहर हो जाता है। लेकिन जीवन रास्ता तलाश लेता है कि भवन की छत की मुंडेर से एक पौधा उग आता है।
जीवन कितना अद्भुत है कि कभी लाख जतन किये फलता नहीं और कभी बेपरवाह खिलता जाता है। बगीचे सूख जाते हैं, जंगल अपनी मौज में बढ़ता है।

याद करते हुए एक बरस

शाम के ढलने से कुछ पहले बची हुई कच्ची धूप में लम्बी परछाइयां सामने की दीवार को ढक लेती थी। इयरफोन से झरती बातों को सुनते हुए आर्म गार्ड रूम के पास तक के चक्कर काटते हुए, एक ढलती दोपहर को देखा कि बेरी पर लाल-पीले रंग मुस्कुरा रहे हैं। उस पहली बार देखने से ही लगा कि तुमसे मिलने का यही मौसम है।
दफ़्तर के भीतर आने पर मालूम होता कि कमीज़ की बायीं जेब में या कुर्ते के दाएं बाए या कभी जीन्स की अगली जेब में कच्चे हरे, आधे पीले या लाल बेर रखे हैं। बेर की ख़ुशबू से स्टूडियो भर जाता। कभी कुछ बेर घर तक साथ चले आते थे।
वे कभी टेबल, कभी छोटी अलमारी के ऊपर या बिस्तर पर पड़ी किताबों पर रखे मिलते। ऐसा लगता कि हमारी बातों के बचे हुए रंगीन छोटे कंचे रखे हैं।
एक रोज़ बातें ख़त्म हो गईं।
बेर मगर हर साल आते रहे। बेरी पर उनका रंग हंसता रहा। जैसे वो याद दिलाने का रंग बन गया कि यही तो वो मौसम था, जब उतरती धूप का मतलब था, तुम्हारा फोन आना। देर तक टहलते हुए बच्चों के बारे में सुनना। आर्ट क्लास में बीती दोपहर। सुबह छूट गई बस। खुले पैसे। और ये शिकवे भी कि दुनिया इतनी बड़ी क्यों है। लोग इतने दूर घर क्यों बनाते हैं।
कोई …

जोगी ही बन जाएँ मगर

अंगुली की मुद्रिका, कानों के कर्णफूल, गले का हार, जेब में रखा बटुआ और साथ चलने वाला हमें अत्यधिक प्रिय ही रहते हैं।
हम ही उनको चुनते हैं। अनेक बार नई मुद्रिका की ओर हमारा ध्यान जाता है। उसे दूसरी अंगुलियां बार-बार स्पर्श करके देखती है। गले मे बंधे हार का आभास होता रहता है। जेब को नया बटुआ अपने होने का संदेश देता रहता है। नए साथी की ओर बारम्बार हमारा ध्यान जाता है। उसके पास होने भर से सिहरन, लज्जा, मादकता जैसी अनुभूतियाँ हमारे भीतर अग्निशिखा की तरह लहराती रहती है।
समय के अल्पांश में मुद्रिका, कर्णफूल, हार और साथी हमारा हिस्सा हो जाते हैं। हम इस तरह उनके अभ्यस्त हो जाते हैं कि उनका होना ही भूल जाते हैं। कभी सहसा चौंकते हैं कि मुद्रिका है या नहीं। गले को स्पर्श कर पता करते हैं कि हार वहीं है न। कर्णफूल को स्पर्श कर आराम में आते हैं। साथी को असमय अपने पास न पाकर विचलित हो जाते हैं। भय के छोटे-छोटे टुकड़े हमें छूते हैं और सिहरन भर कर चले जाते हैं।

एक दिवस। मुद्रिका की याद नहीं रहती। कर्णफूल, हार और वह सब जिसे हमने चुना था। उसके होने की अनुभूति मिट जाती है। जेब में पड़ा बटुआ चुभना बंद हो जात…

उसकी आमद का ख़याल

शाम और रात के बीच एक छोटा सा समय आता है। उस समय एक अविश्वसनीय चुप्पी होती है। मुझे कई बार लगता है कि मालखाने के दो पहरेदार अपनी ड्यूटी की अदला बदली कर रहे हैं। 
उन्होंने मालखाने के ताले पर गहरी निगाह डाली है। इसके बाद चाबियों के गुच्छे की खनक के साथ चुप्पी टूट जाती है। दूर तक एक बीत चुके दिवस की स्मृति पसर जाती है। जैसे खाली प्याले के भीतर चाय की याद। * * *
मेरे गालों पर लाल लकीरें खींचने फिर सर्दी आएगी।
दस्तानों में अंगुलियां डालते मुझे एक गार्ड देख रहा होगा। जाने कितनी ही बार की कोशिश के बाद स्टार्ट होगा स्कूटर। तब तक शिफ्ट के बाकी लोग पहुंच चुके होंगे पास की कॉलोनी में अपने घर।
पहले मोड़ पे छूकर गुज़रेगी बर्फ। मैं सोचूंगा कि क्या इस वक़्त भी कोई क़ैदी जागता होगा जेल में। कुछ दूर आगे एसपी साहब की हवेली से आती होगी व्हाइट स्पायडर लिली के फूलों की मादक गंध। जिलाधिकारी के घर से दिख जाएंगे आदमकद स्वामी विवेकानन्द, अस्पताल जाने वालों को निर्विकार देखते अपने हाथ बांधे हुए।
मैं स्कूटर धीरे चलाऊंगा। मैं लम्बी सांसें लूंगा। मैं देखूंगा दूर तक कि कोई नहीं है और रास्ते सूने पड़े हैं। रात के सन्नाट…

तुम्हारे लिए हमेशा

"तुम आ जाओ। तुम्हारा इंतज़ार है।" ऐसा कहने वाले ने आने का रास्ता भी रखा हो, ये ज़रूरी नहीं होता। उसने किसी पुरानी बात को याद करके महज इसलिए कह दिया होगा कि वह ख़ुद को ग़लत साबित न करना चाहता होगा।
हम इस लम्हे को सच जानते हैं। किसी आवेश में कह देते हैं कि तुम्हारे लिए हमेशा हूँ। एक घड़ी में हमारा मन बदल जाता है। फिर हम कभी इतने सच्चे और हिम्मती नहीं होते कि उसे कह दें। अब वो मन न रहा। जाने किस मोह में मैंने ऐसा सोच लिया कि सबकुछ हमेशा के लिए हो सकता है।
बातें और रिश्ते कभी-कभी पारदर्शी कांच बन जाते हैं। उनके आगे का संसार दिखता तो है मगर वहां तक जाने का कोई रास्ता नहीं होता।
हम सम्बन्ध की इति को नहीं स्वीकारते और भँवरे की तरह बन्द रास्ते के पार पहुंचने की आस में वहीं टूट बिखर जाते हैं।

इत्ती सी बात है

शाम बुझ गयी है
मैं छत पर टहलता हूँ
अपने चप्पलों से
एड़ी को थोड़ा पीछे रखे हुए।

सोचता हूँ कि
समय से थोड़ा सा पीछे छूट रहा हूँ।

हालांकि फासले इतने बढ़ गए हैं
कि नंगे पांव रुककर
इंतज़ार करूँ, तो भी कुछ न होगा।
* * *

कितना अच्छा होता
कि जूते और चप्पल समय के साथ चले जाते
हम वहीं ठहरे रह जाते, जहाँ पहली बार मिले थे।

फिर सोचता हूँ कि न हुआ ऐसा
तो अच्छा ही हुआ
तुम वैसे न थे, जैसा पहली बार सोचा था।
* * *

क्या होगा अगर हम मिले?
जिस तरह रेल के इंतज़ार में
फाटक बंद रहता है
मन उसकी प्रतीक्षा करता है।

रेल के आने पर
रात में पटरियां चमकती हैं
एक धड़क सुर साधती है।

तपी हुई पटरियां धीरे से ठंडी हो जाती है।

इसी तरह हम क्या करेंगे मिलकर।
कोई रेल की तरह आगे निकल जायेगा
कोई पटरी की तरह इंतज़ार में पड़ा रहेगा।
* * *

मुझे तुम्हारी हंसी पसन्द है
हंसी किसे पसन्द नहीं होती।

तुम में हर वो बात है
कि मैं पानी की तरह तुम पर गिरूं
और भाप की तरह उड़ जाऊं।

मगर हम एक शोरगर के बनाये
आसमानी फूल हैं
बारूद एक बार सुलगेगा और बुझ जाएगा।

इत्ती सी बात है।
* * *

पता नहीं वह कौनसा शहर था
शायद मुम्बई ही होगा
मगर ये …

प्रिय को बदलते हुए देखकर

धीरे से बादल चले आये. दोपहर में शाम का भ्रम होने लगा.
बाहर निगाह डाली. खिड़की से दीखते सामने वाले घर की दीवार पर छाया उतरी हुई थी. एक गिलहरी ज़मीन की ओर मुंह किये लटकी थी. वह चुप और स्थिर थी मगर उसे इस तरह नीचे देखते हुए देखकर लगा कि वह है. उसे देखकर तसल्ली आई कि अभी सबकुछ ठहरा नहीं है.
शहतीर के नीचे उखड़े प्लास्टर में बने घरोंदे से झांकते तिनके हवा के साथ हिल रहे थे. लोहे के जंगले पर बैठी रहने वाली चिड़ियाँ गुम थी. इस तरह बाहर झांकते हुए लगने लगा कि ये कोई स्वप्न है. वही स्वप्न जिसमें ज्यादातर खालीपन पसरा होता है. दफ़अतन कुछ हमारे सामने आता है और हम उससे टकराने के भय से भरकर सिहर जाते हैं.
मन भी ऐसे ही सिहर गया. अचानक लगा तुम खिड़की के आगे से गुज़रे.
इस दौर में हमारे पास कितना साबुत मन बचा है. उसकी उम्र क्या है. इसलिए कि हम जल्दी-जल्दी लिखकर, तेज़-तेज़ बोलकर, कैमरा पर फटाफट देखकर, बाहों में भर लेने जैसा सबकुछ सच्चा-सच्चा लगने सा जी लेते हैं. और शिथिल होकर बैठ जाते हैं.
ठीक वैसे जैसे बादलों ने एक कड़ी दोपहर को छाँव से भर दिया हो.
आँखें सामने दिखती दीवार को देखती रहती है. कान, दूर तक जाकर किसी …

इतवार का स्वाद

मैं कहता हूँ- "तुम्हारे जैसे स्ट्रीक्स मेरे बालों में होते तो कितना अच्छा लगता." भावना मुझे थोड़ी ज्यादा आँखें खोलकर देखती है. मैं उसे समझाता हूँ कि ये जो तुम्हारे बाल हैं. इनमें दो रंग हैं. ऐसे बाल रंगवाने के लिए लोग पैसे खर्च करते हैं. भावना पूछती है- "कित्ते?" मैं कहता हूँ- "तीन हज़ार से तीस हज़ार रूपये" वह ऐसे हंसती हैं जैसे ऐसा हो ही नहीं सकता.
मैं कहता हूँ- "मुझे चोटी बनाने जित्ते लम्बे बाल अच्छे लगते हैं." भावना कहती है कि उसके भी चोटी बनती थी. अपने सर पर बालों को ऊपर की ओर लम्बा तानते हुए अंदाजा लगाती है- "इत्ती लम्बी तो थी." मैं कहता हूँ- "मैं इससे भी लम्बी चोटी और ऐसे स्ट्रीक्स वाले बाल बनाऊंगा." वह हंसती है. उसे लगता है कि मैं केवल उससे बातें बना रहा हूँ.
मैं अपने फेसबुक प्रोफाइल में अपनी चोटी वाली तस्वीर खोजने लगता लगता हूँ. वह अपनी ताई से कहती है- "ये क्या सब्जी है? उबलते-उबलते ही सौ घंटे लग जायेंगे." ताई कहती हैं- "ये तो अभी बन जाएगी. तेरी मम्मी बनाती है, सौ घंटे में ?" भावना कहती है- "पाप…

दफ़्तर के चूहे, बिल्ली और सांप

सांप चूहे खा जाते हैं। इसलिए बिल्लियां उनको पसन्द नहीं करती। वे उनको मार डालती हैं।
हमारा आकाशवाणी वन विभाग के छोर पर बना है तो बहुत सारे सांप आते रहते हैं। विषैले और विषहीन। इधर बिल्लियां भी रहती हैं। वे अक्सर ड्यूटी रूम के सोफे पर सोई मिलती हैं। उनके बच्चे भी सोफे को बहुत पसंद करते हैं। ड्यूटी रूम में आने वाले मेहमानों को अक्सर याद दिलाना पड़ता है कि देखिए बिल्ली के बच्चे हैं। उन पर न बैठ जाना।
एक शाम को उद्घोषक डरी हुई बाहर गेट तक चली आई। सर प्ले बैक स्टूडियो के दरवाज़े पर मैंने सांप देखा। गार्ड ने कहा कि अभी देखते हैं। सांप कहीं इधर-उधर हो गया। वह लौट कर अंदर जाने लगी तो जनाब फिर से दरवाज़े पर रास्ता खोज रहे थे। वह वापस भागी। सांप को फिर हटा दिया गया। वे स्टूडियो में डर रही थी। उनको कहा कि आप मैं तेरी दुश्मन गीत प्ले कीजिये। अमरीश साहब के आने का सोचकर सांप खिसक लेगा।
एक शाम एक उद्घोषक की उद्घोषणा अधूरी रह गयी। माइक से दरवाज़ा खुलने की आवाज़ भर आई। वे बाहर आये और बोले। सर स्टूडियो के कंसोल पर फेडर्स के बीच एक बिच्छू आ बैठा है। उनको सुझाव दिया कि बिछुआ मोरे साजन का प्यार गीत चला लें। रू…

दूर से आते हुए पिता

पहले तो दिख जाते थे
दूर से आते हुए पिता।
अब धुंधला जाती हैं आंखें
भरी-भरी गली में
नहीं दिखता उनका आना।

कभी-कभी
इससे भी अधिक उदास हो जाता हूँ।

उन पिताओं के बारे में सोचकर
जो इसी तरह जा चुके बच्चों का
भूल से करने लगते होंगे, इंतज़ार।
* * *

मैं सो नहीं सकता हूँ
कि मैं सो गया तो
कौन जागेगा तुम्हारी याद के साथ?

तुम्हारे बिना
इस खाली-खाली दुनिया मे
कितनी तन्हा हो जाएगी तुम्हारी याद।
* * *

बिछड़ने के बाद के नोट्स

बाद बरसों के देखते हुए  हालांकि हमें ज्यादा कुछ याद नहीं होता।  फिर भी लगता है कि  उसके चेहरे पर ऐसी उदासी पहले कभी न देखी थी। * * *
वह हमेशा उल्लास से भरी रहती। एक जगह एक ही भाव में रुकना उसका हिस्सा न था। जब हमने तय किया कि अब आगे हम एक साथ नहीं हो सकते। तब भी उसने ज़रा सी देर चुप रहने की जगह गहरी सांस ली। कुर्सी से उठी और जल्दी में कुछ खोजने लगी।
बाद बरसों के देखा कि वह टेबल पर झुकी कुछ पढ़ रही थी। वह क्या पढ़ रही थी, ये नहीं जाना जा सकता था। इतनी एकाग्रता से उसे पढ़ते हुए कभी नहीं देखा था। वह जो जेब से बाहर दिखते पेन को पसन्द न करती थी, उसी ने पेन को दांतों में दबा रखा था। उसके बाएं गाल पर बहुत ऊपर का बड़ा तिल अब और बड़ा हो गया था। उसके बाल अब भी पहले की ही तरह उलझे थे, यही एक बात नहीं बदली थी।
मैंने अपने पैरों की तरफ देखा। मैंने काले फॉर्मल शू पहने हुए थे। मैंने याद करना चाहा कि सेंडिल पहने घूमना कब बन्द कर दिया था। मैं बदल गया था। मैं बदलना नहीं चाहता था। मैं उसके लिए वैसा ही रहना चाहता था केजुअल सेंडिल, जीन्स और सफेद कमीज वाला।
इससे पहले कि वह मेरे जूते देख लेती, मैंने पीठ फेर ली। मुझे …

आस्ताने में दुबकी छाँव

धीरे से बादल चले आये. दोपहर में शाम का भ्रम होने लगा. 
बाहर निगाह डाली. खिड़की से दीखते सामने वाले घर की दीवार पर छाया उतरी हुई थी. एक गिलहरी ज़मीन की ओर मुंह किये लटकी थी. वह चुप और स्थिर थी मगर उसे इस तरह नीचे देखते हुए देखकर लगा कि वह है. उसे देखकर तसल्ली आई कि अभी सबकुछ ठहरा नहीं है. 
शहतीर के नीचे उखड़े प्लास्टर में बने घरोंदे से झांकते तिनके हवा के साथ हिल रहे थे. लोहे के जंगले पर बैठी रहने वाली चिड़ियाँ गुम थी. इस तरह बाहर झांकते हुए अचानक लगने लगा कि ये कोई स्वप्न है. वही स्वप्न जिसमें ज्यादातर खालीपन पसरा होता है. अचानक कुछ हमारे सामने आता है और हम उससे टकराने के भय से भरकर सिहर जाते हैं. 
मन भी ऐसे ही सिहर गया. अचानक लगा तुम खिड़की के आगे से गुज़रे.
इस दौर में हमारे पास कितना साबुत मन बचा है. उसकी उम्र क्या है. इसलिए कि हम जल्दी-जल्दी लिखकर, तेज़-तेज़ बोलकर, कैमरा पर फटाफट देखकर, बाहों में भर लेने जैसा सबकुछ सच्चा-सच्चा लगने सा जी लेते हैं. और शिथिल होकर बैठ जाते हैं. 
ठीक वैसे जैसे बादलों ने एक कड़ी दोपहर को छाँव से भर दिया हो. 
आँखें सामने दिखती दीवार को देखती रहती है. कान, दूर तक…

चश्मे के पीछे छुपी उसकी आँखें

छोटे बच्चे की तरह  अँगुलियों पर जाने क्या गिनता रहता है मन.
उसने कहा- "किशोर सर, स्मार्ट फोन में एक एप है. जो हमारे बोलने को लिखता है और लिखे हुए को पढ़कर सुनाता है. ये कितना अच्छा है" उसकी आवाज़ में उत्साह था. प्रसन्नता भी थी. उसकी ख़ुशी सुनकर मेरी आँखें मुस्कुराने लगी. हालाँकि उसे लिखना आता था. कुछ साल पहले उससे मिला था तब उसने कागज़ पर मेरा नाम उकेर कर दिया था. अपनी अंगुली से अपने ही लिखे उस नाम को पढ़ा, किशोर चौधरी. और फिर ऐसे हामी में सर हिलाया जैसे काम सही हो गया हो.
स्टूडियो में उसने पूछा. "क्या मेरे सामने माइक्रोफोन रखा है?" मैंने कहा- "हाँ आपके सामने है." उसने कहा- "माइक्रोफोन को छूना तो अच्छा नहीं होता न?" मैंने कहा- "आप चाहें तो छू सकती हैं" उसने अपने हाथ को चेहरे की सीध में लाने के बाद सामने बढ़ाया. मुझे लगा कि वो माइक को देख पा रही हैं. इतने सधे तरीके से माइक को छूना, मुझे एक ठहराव से भरने लगा. बेहद नाज़ुकी से उसकी अँगुलियों ने माइक की जाली की बुनावट को चारों तरफ से छुआ. उसके चेहरे पर संतोष था. अचानक कहा- "तो ये है वो माइक …

तुमसे कभी नहीं मिलना चाहिए था

बेचैनी के पांव नहीं थे। उसके आने की आहट नहीं सुनाई दी। आहिस्ता से हर चीज़ का रंग बदलने लगा। कमरे में खालीपन भरने लगा। पेशानी में और बल पड़े कि शायद बालकनी में भी एक चुप्पी आ बैठी होगी। तुम एक लकीर की तरह होते तो भी मिटाया न जा सकता था। कि तुम्हारे होने को अंगुलियां किस तरह छूती।
कोरे मन पर एक स्याह लकीर को छूना सबसे अधिक डरावना लगता है।
न इंतज़ार, न कोई आमद का ख़याल कि सब कुछ ठहरा हुआ। दुख भी कुछ नहीं। बस एक ठहरी हुई ज़िन्दगी। छू लो तो जाने किस जानिब चल पड़े, यही सोच कर अंगुलियां आपस में बांध ली।
आवाज़ के नन्हे टुकड़े फेंकती एक चिड़िया के फुर्र से उड़ जाने के बाद गिलहरी की लंबी ट्वीट से सन्नाटा टूट गया। एक सिहरन सब चीजों पर उतर गई। दोपहर का एक बजा होगा। शायद एक।
ये किस मौसम की दोपहर है। हल्की धूप है। कमरे में सर्द सीली गन्ध है। गुनगुनी छुअन वक़्त में कहीं नीचे दब गई है। अपने घुटने पेट की तरफ मोड़ते हुए लगता है कि मेरा होना थोड़ा और सिमट गया है।
कि अब खालीपन कम-कम छुएगा।
खिड़की से दिखते पहाड़ पर सब्ज़ा उग आया है। काश ऐसे ही इस अकेलेपन को भेदते हुए किसी आवाज़ के बूटे उग आएं। बेजान मन दो कदम दरवाज़े तक ज…

सर्द मौसम भला था

"ऐसे दूर हो। जैसे किसी और के पास हो।" इतना कहकर हमें चुप हो जाना चाहिए. इसे अधिक कोई क्या कह सकता है. जिस हगाह नज़र धुंधला जाये, जिस जगह पहाड़ शुरू होने लगे, जिस जगह गीलापन सूखने लगे. ऐसी हर जगह पर ठहर जाना चाहिए. बहुत गहरे विचार से पूरा समय लेकर तय करना चाहिए कि हमें अब किधर जाना चाहिए. 
सर्द दिनों में पहाड़
कोहरे से ढक जाते हैं।

सर्द दिनों में भीग जाती है
रेगिस्तान की रेत।

सर्द दिनों में समन्दर
हो जाते हैं बर्फ।

मेरा जाने क्या होगा?

कि जाने किससे हो जाये
तुमको प्रेम।
* * *

पिछली सर्दियों में तुमने बुनी थी
कहवा के प्याले के लिए स्वेटर।

इस बार के सर्द दिनों में
शायद तुम सिर्फ देख ही लो कभी, मेरी तरफ।

सर्द दिनों का केवल इसलिए इंतज़ार है।
* * *

सर्द दिनों में
कोई ध्यान नहीं देता
कि दरवाज़ा बन्द क्यों है?

इसलिये अच्छा है ये मौसम।
इसलिए भी अच्छा है
कि हम छुपा सकते हैं मुंह
और कोई नहीं पूछता
वो जो बेक़रारी थी,
वो जो इंतज़ार था कहाँ गया?
* * *

सर्द मौसम भला था
कि उन दिनों मिले थे हम।

अब भी भला होगा
कि ढके जा सकेंगे, पुराने हो चुके रिश्ते
सर्दी के नाम पर।
* * *

अक्सर ज़रूरी सवालों को समय की धूल ढक देती है…

किमाम लगी सिगरेट

किताबें धुएं से भरी रहती। आंगन पर राख बिखरी रहती।
आलों में और चारपाई पर सड़े हुए गले की तस्वीर के साथ केंसर की चेतावनी छपे खाली-भरे पैकेट पड़े रहते। तंबाकू की बासी गन्ध हर दीवार से चिपकी रहती और खिड़कियों के रास्ते रिसती जाती। मुंह का कसैले स्वाद से पुराना परिचय था। मगर एक लकीर के आगे धुआं असर खो देता। केवल तलब बची रह जाती है। जैसे सांकल में खुद अपना पैर रखा है और घसीट रहे हैं।
जैसे दसों दिशाओं से प्रेम में लिपटे रहने पर भी सुकून नहीं आता। बार-बार चाहना से भीगे कोड़े को अपनी पीठ पर फटकारने से आवाज़ तो आती मगर क़रार न आता। ऊब बढ़ती जाती। प्रेम किये दुःख होय की चेतावनी भूलकर प्रेम में ही रम जाने के बाद सहसा कभी बेदिली होती ही है। बेअसर रिश्ते को ढोते हुए एक रोज़ ऊब जाते हैं। हम उसे एक तरफ रख देते हैं।
दो चार दिन में ही तम्बाकू की गंध किताबों, दीवारों और खिड़कियों को छोड़कर चली जाती है। ऐसे ही किसी और से चाहा प्रेम भी एक रोज़ चला जाता है। हम एक खुली सांस लेते हैं।
जो अपने भीतर उपजे और दूजे पर आश्रित न हो वही प्रेम रखना।

प्रेम के आगे चेक का निशान

तुमने एक बार झाँका  और चले गए  ये कैसा प्रेम करते थे तुम.
रात टेबल पर पांव रखे थे. लम्बी कुर्सी पर अधलेटा था. पहला पहर ही बीत रहा था मगर बदन की नाव, नींद के दरिया में उतरने लगी थी. पहले हिचकोले में आँख खुली. दूजे हिचकोले के मोह में आँखें फिर से बंद हो गयी.
प्रेम स्वप्न ही है. नींद का हो तो और अच्छा.
हवा में कलाबाज़ी खाते बजरीगर की तरह प्रेम में चौंक थी. प्रेम में बंदरों वाला मौन था. क्षण भर ध्यान भरी प्रतीक्षा सा दीखता और क्षणभर बाद असंगत नृत्य में लीन मिलता. कभी-कभी प्रेम टीस भरा बेहद छोटा गाना था. कोई परिंदा मुंडेर पर बैठकर गाता और उड़ जाता. जब कुछ न होता तब प्रेम कीकर का सफ़ेद लम्बा काँटा हो जाता था.
मैंने जो महसूस किया, वो लिखा. तुमने समझ लिया कि मैं कोई जादूगर हूँ.
वे किताबें जिनसे तुमको अचानक मोहोब्बत हो जाती है, वे किताबें मेरी हसरतें न थीं. वे किसी लम्हे में बिना चाहना के उग आई थीं. उदासी, टूटन और हताशा थी. यही प्रेम भी था. किसी के साथ थे. तनहा थे. जहाँ जैसे थे, वैसा होने में ज्यादा शिकायतें न थी. प्रेम करते थे. फिर से प्रेम करने लगते थे. आते थे. रुकते थे. और चले जाते थे. इसी सब…

जाने किसलिए

हर बात, टीन ऐज़ का मसला नहीं है। यहां जो हासिल है, वही है। बाकी सब छोटी खुशियां हैं। जिनके बारे में पक्का कुछ पता नहीं होता। लोग फिर भी ख़्वाब सी ज़िन्दगी देखते हैं। 

एक ही रास्ते से गुज़रते हुए हम देखना बंद कर देते हैं कि आस पास क्या है. यही हाल असल में हम ज़िन्दगी के साथ भी करते हैं कि उसे जीते समय भूल जाते हैं कि ज़िन्दगी जी रहे हैं. 
रेलवे क्रोसिंग से पहले एक अंधा मोड़ पड़ता है। ड्राइवर देर तक विशल बजाता है। रेल की विशल के साथ परिंदे गोता लगाते हैं।
जब भी कहीं रुक जाना होता है किसी मज़बूरी में केवल तब ही सोचने लगता हूँ अपने बारे में  कि पल भर में आसमान स्याह होने लगता है। तारे टिमटिमाते हैं। जाने किसलिए। 
एक रोज़ पंख
मिट्टी में दबकर मिट गए,
आकाश नहीं टूटा
कभी किसी के लिए।
* * *

अब कहाँ वादे,
कहाँ मिलने का हौसला,
कहाँ ठोकरों पर ज़माना।

कभी कहीं पास हुए तो

तुमको झुककर चूम लेंगे।
* * *

ज़िन्दगी के सब दांव
हम खेल चुके हैं.

हम हैं, यही बड़ी बात है.
जब तक रहें शुक्रिया.
* * *