December 31, 2015

पुराने जूते पहनकर नए साल में जाना

कभी एक उदास झांक में खोये हुए बहुत दूर तक सफ़र हो जाता है. हम कहीं नहीं जाते. हमारी नज़र ठहर जाती है. मन के भीतर से लावा की तरह कुछ बहता हुआ दूर तक पसरने लगता है. ऐसा लगता है कि रंग फीके पड़ते हुए राख़ के रंग में ढलते जा रहे हैं. चारों और पसरे सूखे-भुरभुरे, पपड़ीदार या हलके दलदली विस्तार पर निगाहें अपने कदम नहीं रखती. निग़ाह ठहरी हुई स्थिर उड़ान में हो जाती है.

दुःख है?

नहीं ये एक अवस्था है. कुछ सोचते हुए खो जाने की अवस्था. ऐसी अवस्था में पंछी और जानवर दुःख नहीं करते. वे इसे भोगते हुए टाल देते हैं. मैं कई बार उनको देखता हूँ. लगभग सांस रोके पड़े हुए जानवर मृत दिखाई देते हैं. जैसे जीवन विदा ले चुका हो और नष्ट होने के इंतज़ार में देह पड़ी हो. उनको देखते हुए मैं ठहर जाता हूँ. अपने अतीत की ओर हाथ बढ़ाकर कुछ चीज़ें टटोलने जैसी कोशिश करता हूँ. जैसे कभी नाव में बैठे हुए पानी को छूने का मन होता है. उसी तरह मैं खुद को यकीन दिलाता हूँ कि हाँ अतीत के पानी पर ज़िन्दगी की नाव खड़ी है या तैर रही है.

सोच की ये अवस्था पतझड़ है.

मैं अपने आप से कहता हूँ कि चीज़ों का नष्ट होना, उनकी चाहना और नियति है. फल को खाया जा सकता है. आदमी खायेगा, जानवर खायेगा, पंछी खायेंगे. इनमें से किसी ने नहीं खाया तो कुदरत कीड़ों को मौका देगी. वह एक आखिरी मौका होगा. उसी तरह चीज़ें बनी होती हैं. वे अपनी और बुलाती हैं. ये उनकी प्रकृति है. वे बुलाये बिना रह नहीं सकती. उनकी पूर्णता इन्हीं बुलावों में छिपी हैं. तुम क्यों दुःख मनाते हो? क्या कोई ऐसी चीज़ तुमने इस दुनिया में देखी, जो अपने आपको बचाए हुए हो? ऐसा कुछ नहीं है. बदलाव में ही जीवन है. चीज़ों को गिरने दो. उनको नष्ट होने दो. उनका लोभ त्याग दो. उनके भले की जो तुम कामना करते हो असल में वह उनकी आंतरिक प्रवृति का विरोध है. उन्हें नष्ट होने के लिए कोई माध्यम चाहिए ही.

यूं ही सोचते हुए अचानक से जानवर उठ बैठता है या पंछी उड़ जाता है. जैसे कुछ हुआ ही न था. कोई ठहराव था ही नहीं. रुकना भी नहीं था. बस वह एक अवस्था थी. जीवन के प्रवाह में एक ज़रूरी ठहराव. अब उसे भूल जाओ और नए तिनके तलाश करो. नयी जगहों का फेरा दो.मैं इन पंछियों और जानवरों से यही एक बात नहीं सीख पाया हूँ कि आगे बढ़ जाऊं. नष्ट होती चीज़ों को जाने दूँ.

शाम के धुंधलके में चलना कठिन होता है.
चीज़ें डूबते हुए उजास में वो शक्ल खोने लगती है जिसे देखने के हम अभ्यस्त होते हैं. चीज़ों के बाहरी आवरण से टकराकर रौशनी हम तक आती है. इसी रौशनी की रूकावट से हम शक्ल तय करते हैं. जहाँ रौशनी बिना किसी कठिनाई के पार हो जाती है वहां कुछ है, ये समझना कठिन होता है. जैसे कि कुछ शीशे इतने पारदर्शी होते हैं कि रौशनी को रोक नहीं पाते. वे शीशे होते हुए भी हमें दिखाई नहीं देते. जहाँ रौशनी का टकराकर लौटना न हुआ वहां कोई वस्तु है ये समझना भी मुश्किल होगा. 

शाम के धुंधलके में रौशनी का कमतर होते जाना चीज़ों के होने के इल्म को बुझा देता है.

रिश्तों में अक्सर धुंधलके आते हैं. तब समझना चाहिए कि हमें जिस बात का यकीन दिलाया जा रहा है कि अब ऐसा नहीं है, असल में उसपर से रौशनी भर हटाई गयी है. चीज़ें वहीँ छोड़ दी गयी हैं.

अक्सर, त्याग एक आडम्बर बनकर आता है. जैसे भूल से बिछावन पर पानी गिर पड़ने के बाद सीले बिस्तर पर एक और चादर बिछा दी जाये. देखो अब नहीं है सीलापन. वह मगर वहीँ होता है. लालच एक मोह जगाता है. हम ऐसा नहीं करते कि सीलेपन को धूप में डाल देते. उसे तब तक हर जगह से सुखाते जब तक कि उसका होना पूरी तरह मिट न जाये.

जहाँ आप होना चाहते हैं वहां अगर सीलापन है और वह आपको सुहाता नहीं है तो से सुखाइये. एक और ज़रूरी बात याद रखिये कि चादर पर चादर बिछाना सीलेपन को सहेजना है. सीलेपन को मिटाना नहीं है.

मेरे दफ़्तर के ऊपरी माले में सब कमरे लगभग बंद पड़े रहते हैं. एक कमरे में कबूतर का एक जोड़ा जमा रहता था. कमरे के पास के छज्जे से उसे उड़ाने के खूब जातां किये जाते थे. वे कबूतर किसी न किसी तरीके से लौट आते. एक रोज़ बेख़याली टूटी तो उधर ध्यान गया जहाँ कबूतर बैठे रहते थे. वह जगह सूनी पड़ी थी. कमरे में कितना कचरा है? ये देखने के लिए मैंने जैसे ही देखा तो पाया कि वहां एक अंडा फूटा पड़ा है. कुछ एक तिनके बिखरे हैं मगर कबूतरों की गन्दी लगभग नहीं है.

अगले दिन उसी जगह जब कबूतरों को नहीं देखा तो निगाहें उधर-उधर कबूतरों को खोजने लगी. पास ही के एक छज्जे पर दो जोड़े बैठे थे. उनको देखकर मैं कभी नहीं कह सकता कि ये वहीँ कबूतर हैं जो जिद्दी थे और उस जगह को नहीं छोड़ते थे. लेकिन असल में वह जगह खाली पड़ी हुई थी. तो ऐसा क्या हुआ? मैंने कई सारी बातें सोची. वजहें तलाशी.

क्या कबूतरों ने उस जगह को दुःख के कारण छोड़ दिया था? क्या कबूतर समझते हैं कि जब तक वे फिर से अंडे न दे सकें तब तक अंडे के फूट जाने के इस दुःख से दूर हो जाएँ. अगर दो-एक रोज़ कबूतर वहां रुकते तो उनकी गंदगी से फूटे हुए अंडे की छवि ढक जाती. वे अपनी प्रिय जगह पर रह सकते थे. क्या सचमुच पंछी दुखी होते हैं? क्या वे ये भी समझते हैं कि दुखों का इलाज सिर्फ दुखों का त्याग है?

कबूतरों के जीवन में जो सीलापन आया, उसे छोड़कर उन्होंने नयी जगह चुनी. मैं कई बार उदास होता हूँ. मेरी समझ ठहर जाती है. मुझ में उदासी के प्रति समर्पण करने की हताशा जागती है. फिर मैं कई बार उन कबूतरों को याद करता हूँ. मुझे नहीं मालूम कि मैंने उनके बारे में जो सोचा वह एक कल्पना भर है या किसी वास्तविकता के आस-पास की बात है. लेकिन ये मुझे थोड़ा हौसला देता है. तुम एक मनुष्य हो. मनुष्य चिंतनशील हो सकते हैं. उदासी और दुखों के बारे में ये सोचकर तय क्यों नहीं करते कि तुम जिसके साथ हो वह उड़कर कहीं तुम्हारे साथ जा बैठता है या सीलेपन पर परदे डालता रहता है.

धुंधलका है तो जीवन गति को मंथर कर लो, दुनिया कहीं नहीं जा रही है.

नया साल मुबारक हो. चीयर्स.


December 21, 2015

उस रोज़ आप ये भी जान लेते हैं

सर्द दिन की दोपहर में किसी की सलाइयाँ छूट गयी, जीने पर. रिश्तों जैसे जो धागे थे, वे उलझे होते तो सुलझाने के जतन में बिता देते नर्म सुबहें और ठंडी शामें मगर बदनसीबी ये कि वे धागे लगभग टूट चुके हैं. सलाइयों को देखता हूँ तो ख़याल आता है कि आँखें ऊन के गोले हुई होती तो उनमें सलाइयाँ पिरो कर रख देता किसी आले में. 


रात के बाजूबन्द से
झरती है, ठण्डी हवा।
* * *

सर्द आह थी किसी की
या मौसम का झौंका छूकर गुज़रा था।
* * *

वे सब जो
विपरीत होने का बोध थे,
असल में एक ही चीज़ थे.
* * *

भ्रम
प्रेम का सबसे बड़ा सहारा है.
* * *

अक्सर कोई कहता है
तुम उसे छोड़ क्यों नहीं देते
अक्सर दिल मुस्कुराकर बढ़ जाता है आगे.

जाने क्या बदा है?
* * *

उम्मीद से अच्छा
और उम्मीद से अधिक मारक कुछ नहीं है.
* * *

फूलों के चेहरे से स्याही बुहारती,
भीगी हरी घास पर रोशनी छिड़कती, ओ सुबह!
आ तुझे बाहों में भर लूँ।
* * *

इस बियाबां के दरवाज़े हैं
और सब बंद है. यहाँ कौन आता है?
* * *

उदास किवाड़ों पर
बेचैन मौसमों की दस्तकों में
दिल के एक कोने में
जलता हुआ किसी धुन का अलाव.

और सोचें उसे, जबकि वो, अब वो नहीं है.
* * *

आँखों में कुछ फूल उकेरे हुए दीखते थे
जो असल में थे नहीं
लफ़्ज़ों में कहानियां कही हुई मालूम होती थी
जो असल में थी नहीं.
जैसे पंद्रह दिन में किसी रोज़ चाँद दिखता है
आधे से ज़रा सा ज्यादा मगर वो होता तो उतना ही है
जितना कभी था.

इसी तरह झूठ अपने ऊपर लगा लेता है
हंसी, उदासी और शिकवों का वर्क
आधे से थोड़ा सा ज्यादा थोड़ा कम मगर
असल में होता वह झूठ ही है.

दोपहरों के इंतज़ार में अक्सर सच साफ़ दिखाई देता है और रातों की स्याही में उम्मीदें ज्यादा अच्छी लगती हैं. बशर्ते आप ख़ुद को रोने से रोक लें और सोच सकें कल के बारे में.
* * *

जिस रोज़ आप जान लेते हैं कि कोई साध रहा है एक साथ दो तीन रिश्ते. उस रोज़ आप ये बात भी जान लेते हैं कि आप एक कटते हुए पेड़ के नीचे खड़े हैं. मगर आप वहां से हटने की जगह ये सोचते रहते हैं कि किस तरफ गिरेगा.
* * *

December 2, 2015

कितनी तहें हैं, और रंग कितने हैं

दिसम्बर का महीना आरम्भ हो गया है. हल्की ठंड है मगर सर्द दिन ही हैं. सुबह धूप में बैठे हुए मुझे पुलिस दरोगा ओचुमेलोव की याद आई. और उसके साथ एक ग्रे हाउंड किस्म का मरियल कुत्ता और सुनार खुकिन याद आया. चेखव की कहानी 'गिरगिट' हमें बचपन में पढ़ाई गयी थी. शिक्षा विभाग ने सोचा होगा कि ऐसी कहानियां पढ़कर बच्चे सीख लेंगे. लेकिन बच्चों ने इस कहानी को पढ़ते और समझते हुए क्या सीखा मुझे नहीं मालूम मगर मैंने जो सीखा वह साफ़ सुथरा था. 

एक- मनुष्य के स्वभाव एवं व्यवहार की जानकारी लेना
दो- कथा की विषयवस्तु को अपने अनुभवों से जोड़ना
तीन- नवीन शब्दों के अर्थ जानना और अपने शब्द भंडार में वृद्धि करना
चार- नैतिक मूल्यों में वृद्धि करना

इनके सिवा जो कुछ और बातें कहानी के बारे में बनायीं जा सकती थीं, वे छात्र को आधा अतिरिक्त अंक दिलवा सकती थी. इसमें आगे हमारे अध्यापक कहते थे कि इस तरह की कहानियां पढने से कथा कौशल में वृद्धि होती है. 

कहानी आपने पढ़ी होंगी. इस कहानी में एक कुत्ता व्यक्ति की अंगुली काट लेता है. कुत्ते की पकड़ के हंगामे के दौरान सख्त और क़ानून की हिफाज़त के लिए प्रतिबद्ध दरोगा ओचुमेलोव अपने सिपाही साथी के साथ वहां पहुँचता है. सुनार अपनी अंगुली काटे जाने का हर्जाना मांगता है. दरोगा कहता है कि वह ऐसे आवारा कुत्तों से मनुष्यों को होने वाली हानि बर्दाश्त नहीं करेगा. भीड़ से अचानक आवाज़ आती है कि ये कुत्ता तो जनरल जिगालोव का है. इसके बाद दरोगा को बारी-बारी से ठण्ड और गर्मी लगती है. वह अपना कोट उतारता और पहनता है. अंततः ये मालूम होता है कि कुत्ता जनरल के भाई का है और वे इन दिनों यहाँ आये हुए हैं. दरोगा कहता है- अरे मुझे बताया ही नहीं गया कि वे यहाँ आये हुए हैं. कब तक रुकेंगे?” 

इसके बाद सुनार को एक उपद्रवी बताकर धमका कर दफ़ा कर दिया जाता है. कुत्ते को अपनी गोदी में उठाकर दरोगा साहब चल देते हैं. 

वे इस कहानी को कक्षा में इस तरह पढ़ाते थे कि ये व्यवस्था और चाटुकारों की कहानी है. इसमें व्यवस्था का चरित्र खुलकर सामने आता है. जहाँ कहीं व्यवस्था है वहां नैतिकता होने पर ही समाज का भला हो सकता है. आह !! काश उन्होंने इस कहानी को मनोविज्ञान की तरह पढ़ाया होता. मुझे समझाते कि बेटा इस दुनिया के आदमी का कोई भरोसा नहीं है. वह अपने लाभ और हित के लिए कितने ही स्वांग कर सकता है. तुम उसके कहे शब्दों को अंतिम न मान लेना. वह बाहर से जो दीखता है असल में अंदर से वैसा नहीं है. 

पुलिस दरोगा ओचुमेलोव काश तुम आखिरी गिरगिट होते. 

इस कहानी के नाट्य रूपांतरण को दुनिया भर में बेहिसाब खेला गया है. बहुत से कलाकार इन पात्रों को अपनी आत्मा से जोड़कर निभा सके है. इसलिए कि गिरगिट होने का गुण मनुष्य के भीतर बखूबी उपस्थित है.

November 29, 2015

तलवे चाटते लोगों की स्मृति में

एक पत्थर की मूरत थी, उस पर पानी गिरता था. एक सूखा दरख्त था उसे सुबह की ओस चूमती थी. एक कंटीली बाड़ थी मगर नमी से भीगी हुई. असल में हम जिसे सजीव देह समझते हैं, वे सब मायावी है. वे छल हैं. वे जागते धोखे हैं. वे असल की शक्ल में भ्रम हैं. उनके फरेब प्रेम की शक्ल हैं मगर असल में पत्थर और पानी के मेल जैसे सम्मोहक किन्तु अनछुए हैं. वे साथ हैं मगर दूर हैं. 

अचानक याद आया कि बीते दिनों मैं ज़िन्दा था. अचानक याद आया कि कोई जैनी थे, तो अचानक याद आया कि बौद्ध भी तो थे. उन्हीं बौद्धों के महामना बुद्ध की बातों की स्मृति से भरी कुछ बेवजह की बातें. 

महाभिनिष्क्रमण
साधारण मनुष्यों के लिए नहीं है।

वृद्ध, रोगी, मृतक और परिव्राजक को
देखना और समझना
छः वर्षों की कठिन तपस्या के बाद
मार-विजय प्राप्त कर
अज्ञान के अंधकार से बाहर चल देना।

ये केवल बुद्ध का काम हो सकता है।

बाकी दलाल मन उम्र भर दलाली ही कर सकता है।
उसकी आत्मा को इसी कार्य में सुख है। यही उसकी गति है, यही उसका निर्वाण।

[सम्यक सम्बुद्ध : मतिहीन प्रबुद्ध - 1]
* * *

विचित्र संयोग ही था कि
बुद्ध का जन्म, बोधि-प्राप्ति और निर्वाण
ये तीनों घटनाएं
एक ही दिन वैशाख पूर्णिमा को हुई।

कुछ लोगों पर मगर
उम्रभर ऐसा अंधकार छाया रहा
कि वे जिनसे मिलना तक गवारा नहीं करते थे
उनके तलवे चाटते रहे।

सब पूर्णिमाएं व्यर्थ गईँ।

[सम्यक सम्बुद्ध : मतिहीन प्रबुद्ध - 2]
* * *

बुद्ध उपदेशों के संकलन
विनयपिटक और सुत्तपिटक
थेरवादियों की कल्पनों से भरे पड़े हैं।

सत्य अलोप होने को शापित है।

[सम्यक सम्बुद्ध : मतिहीन प्रबुद्ध - 3]
* * *

सुख की खोज के सूत्रों को
लिपिबद्ध करने को आयोजित
चार प्रमुख बौद्ध संगीति
दुखों के आडम्बरों में डूबकर विदा हुई।

मूल को निष्काषित कर कल्पना अधिकार कर लेती है।

[सम्यक सम्बुद्ध : मतिहीन प्रबुद्ध - 4]
* * *

सत्य एक शाखीय है,
असत्य की अनेक शाखाएं होती हैं।

बुद्धत्व
हीनयान और महायान में विभक्त हुआ
इसके बाद थेरवाद, सर्वास्तिवाद
और सौन्त्रान्तिक शाखाएं उगी।

अफ़सोस कि बुद्धत्व शायद
हो गया होगा विदा, बुद्ध के ही साथ।

[सम्यक सम्बुद्ध : मतिहीन प्रबुद्ध - 5]
* * *

चुप्पी चोरों का सहारा
विद्वानों का आभूषण
धूर्तों का हथियार है।

बुद्धत्व का इन तीनों से कोई लेना-देना नहीं है।

[सम्यक सम्बुद्ध - मतिहीन प्रबुद्ध - 6]
* * *

चार आर्यसत्यों में
पहला कहता है संसार दुःखमय है।

कभी प्रिय किसी का अस्त्र बन जाता है
कभी प्रिय आपको अस्त्र बना देता है।

दुःख या तो पहलू में बैठे हैं या फिर दिल में।

[सम्यक सम्बुद्ध : मतिहीन प्रबुद्ध - 7]
* * *

अकारण कुछ नहीं होता
कार्य-कारण की श्रृंखला लंबी है।

वह आया तो कोई कारण था
उसके जाने का भी कारण होगा
इस द्वादशाङ्ग से बाहर आओ।

दुःख पर मिट्टी डालो।

[सम्यक सम्बुद्ध : मतिहीन प्रबुद्ध - 8]
* * *

ये सम्भावना कम
और वास्तविकता अधिक है
कि आत्मपीड़ा में आसक्ति दुःखमय है।

भिक्षु, प्रव्रज्या के लिए इस अंत का सेवन न करो।

[सम्यक सम्बुद्ध : मतिहीन प्रबुद्ध - 9]
* * *

जिनका त्याग करना था
वे भौतिक चीज़ें नहीं थीं।

मगर आडम्बर बिना
धर्म और प्रेम दोनों कठिन होते हैं।

[सम्यक सम्बुद्ध : मतिहीन प्रबुद्ध - 10]
* * *

November 20, 2015

जाने क्या बात थी, उस उदासी में

विलासिता की चौंध से दूर. मन के नीम अँधेरे कोने में रखे किसी अहसास के करीब. खाली लम्हे में कभी सुनी गयी धड़कन की याद में डूबे हुए. बीत लम्हों की तस्वीरों से उड़कर आते रंगों के हल्के शालीन कोलाज में ज़िन्दगी है. बातें बेवजह कहने में ज़िन्दगी हैं. उसे बेहद प्रिय है मेरा इस तरह कहना. कहना कि ज़िन्दगी तुम बे परदा मेरे साथ चल रही हो. मैं तुम्हें रिश्तों और पाबंदियों में नहीं जीता. मैं किसी बोसे के गीलेपन में, किसी छुअन के ताप में और इंतज़ार की नीली शांत रौशनी में वैसा ही लिखता हूँ, जैसा महसूस करता हूँ. मैं ख़राब था और मैंने हमेशा चाहा कि ज़रा और खराब होते जाने कि गुंजाइश हमेशा बची रहे. मैं तनहा था और मैंने चाहा कि और तन्हा होते जाने के सबब बने रहे. मैं प्रेम में था और सोचा कि प्रेम मुझे किसी शैतान नासमझी के कोहरे में ढककर मुझे चुरा ले. 

यही चाहना, यही जीना है. 

मैंने जब कहानियां कहनी शुरू की तो दोस्तों ने कहा- "केसी, ये कहानियां किताब की शक्ल में चाहिए." मैं विज्ञान छोड़कर हिंदी साहित्य का विद्यार्थी हुआ था, मैंने ही मित्रों से कहा- “आपने ब्लॉग पर पढ़ ली न. अब क्या करना है इनका? मुझे लेखक या कवि कहानीकार कहलाने की चाह नहीं है. मैं सिर्फ ख़ुद को लिखना भर चाहता हूँ.” 

इसके तीन साल बाद मेरी कहानी की पहली किताब आई. चौराहे पर सीढ़ियाँ. मित्र सच्चे थे. उन्होंने पचास दिन में ही पहला संस्करण खरीद लिया. जाने उस उदासी और टूटन में क्या बात थी कि नए लोगों को भी खूब पसंद आई. एक अच्छे जीवन में एक ऐसा लम्हा होता है, जब लगता है कि हम ये सब क्यों कर रहे हैं? बस उन्हीं लम्हों की वे कहानियां है. जीवन में कुछ चीज़ें और हाल, बिम्बों के माध्यम से बेहतर बयान होते हैं. ये बिम्ब ही थे, जिन्होंने उधड़ी हुई ज़िन्दगी को पैबन्दों से ढक कर एक बेहतर किस्सा बना दिया. 

एक कविता की किताब आई थी. बातें बेवजह शीर्षक वाली इस किताब के चाहने वाले अलग थे. वे जो भी थे दीवानावार थे. उनको इन बातों से सम्मोहन था. खरगोश, शराब, शैतान की प्रेमिका, रेगिस्तान की गरम हवा, इंतज़ार और खालीपन के बिम्बों से कही गयी कुछ मामूली बातें ख़ास बनकर दोस्तों के दिल में बैठ गईं. ये कविता संग्रह ऑनलाइन कम ही उपलब्ध रहा. पुस्तक मेलों में दोस्त आये और खरीद ले गए. दोस्तों ने बताया कि किताब आ गयी है. कुछ एक को अभी तक न मिली. मैं अक्सर सोचता हूँ कि मायामृग जी से पूछूँ कि किताब का क्या हाल है? लेकिन बुझे मन में चाह जागती ही नहीं. ये स्थागित होता जाता है. 

अचानक एक दोस्त ने अपनी खरीदी हुई किताब में पेन्सिल से अनुवाद करना शुरू कर दिया. ये इसी बरस जून महीने की बात होगी. कुछ महीने पहले मेरे पास डाक से आया एक पार्सल रखा था. मुझे अपनी ही किताब मिली. मैंने अचरज से खोला. उसमें जो कुछ पाया, उसे देखकर क्या महसूस हुआ? उसका बयान मुमकिन नहीं है. मेरे पास शुक्रिया और तारीफें नहीं थी. इसलिए कि ये काम इन चीज़ों के लिए नहीं किया गया था. 

मैंने शैलेश भारतवासी से पूछा कि इस किताब को कहीं से छपवा सकते हैं? 

शैलेश जी ने कहा कि कुछ अंग्रेजी प्रकाशकों को भेजते हैं. मैंने कहा- “नहीं. अव्वल तो कविता कौन खरीदता है. उस पर अनुवाद की हुई कविता. तिस पर ये केसी है कौन?” इसलिए कोई ऐसा प्रकाशक जो किताब छापने में वे सवाल न करे, जो साहित्य और प्रकाशन के नाम करके सिर्फ हतोत्साहित किया जाता है. वे बस उसे ऑनलाइन उपलब्ध करवा दे. इन नीले रंग से भरी चाहनाओं, हलके नीले रंग की बरबादियों और उससे भी हलके नीले रंग की उम्मीदों के लिए हमने तय किया इसका लिमिडेट एडिशन छापते हैं. लिमिटेड एडिशन माने कम प्रतियाँ. वे लोग जो इसका प्री ऑर्डर करेंगे और बाकी सौ किताबें. मेरी किताब का पहला एडिशन एक हज़ार कॉपी का छपता है लेकिन हम इसकी दो सौ प्रतियाँ ही छापेंगे. यही सब आज तय किया. 

एक अरसे बाद लैपटॉप को इसलिए ऑन किया है कि मैं लिखने से जुड़ा कोई काम शुरू करने जा रहा हूँ. मैं शुरू करूँगा तो शायद बहुत कुछ लिखूंगा. 

कुछ एक आपके लिए 
[आंग्ल भाषा में मेरा हाथ तंग है. मैं जैसा पढ़ पाया हूँ वैसा मैंने कॉपी कर दिया है. अग्रिम मुआफ़ी.]

At last
my smile came back.

When I thought
That the sorrow of
not being with you
is only one lifelong.
* * *

There can’t be a worst sorrow than this.

That someone is kissing you right next to your neck
and you are thinking of someone else.
* * *

Hot winds pierce the leaves bodies
sparrow keep hoping on a branch
life in desert moves on. 

Resting against the wall
the devil thinks about his beloved.

Like a pulley in a dry well
a separated heart cries
and like a blade cutting wood
shines love in separation.

Nearby the sounds of marriage drums sing
Devil’s beloved, devil’s beloved, devil’s beloved.

And the devil dies in her memory.
* * *

They confiscated my dice
and ostracised me 
saying 
I am the cheapest gambler. 

On all side of my dice was your name. 
* * *  

[Painting courtesy : Molly Prince]

November 18, 2015

वादे की टूटी हुई लकीर पर

काश बालकनी में उग आती
एक बेरी.

कोई शाख झांकती खिड़की से अंदर
कोई काँटा फंस जाता स्वेटर की बाह में.

अचानक लगता कि तुम आ गए.
* * *

उलझे होते काँटों में
और पीड़ा भरी होती पोर-पोर में.

मगर काश हम होते.
* * *

आंधियां आकर उड़ा ले जाती है गर्द
इंतज़ार आकर ढक देता है गर्द से.

तुम्हारे बिना ज़िन्दगी
आसान है या मुश्किल, कहना कठिन है.
* * *

एक तड़प सी बची है
दो धडकनों के बीच.

एक ज़िन्दगी थी सो तुम्हारे साथ चली गयी.
* * *

साँझ के झुटपुटे में
आती है उडती हुई चिड़ियाँ
दौड़ते हुए खो जाते हैं खरगोश.

रात की मुंडेर पर बैठा मैं
भर लेता हूँ दो कासे.

एक मज़बूरी से दूजा इंतज़ार से.
* * *

जैकेट की जेब के अन्दर की तरफ
छुपा लेता हूँ व्हिस्की भरा गिलास.

जैसे सहेज रहा होऊं
हताशा में उदासी
नाकामी में इंतज़ार.
* * *

रेत के धोरे की किनार पर
नदी किनारे के किसी घाट की आखिरी सीढ़ी पर
पहाड़ की तलहटी के किसी पत्थर पर बैठे हुए
आँख में एक आंसू था मगर लुढ़क न सका.

ज़िन्दगी इसके सिवा तुमसे कोई शिकवा नहीं
कि वो यूं भी न मेरा था, न वो हो सकता है.
* * *

परित्यक्त किले की
दीवार से झांक रही थी दरारें.

जाने क्यों मुझे मेरा होना याद आया.
* * *

वे गिरफ़्तार थे
एक-दूजे की बाहों में
जैसे पसरी हुई हो रेत, सूने आँगन में.


वे उलझे थे, बेरी के काँटों में
किसी पुराने अख़बार की तरह.

अब जब
कई बार मैं पी लेता हूँ दो पैग
मुझे ख़ुशी होती है, कि वे थे.
* * *

तय होनी चाहिए कोई तारीख
हर बरबादी की.

ये बहुत बुरा होता है
कि कोई छोड़ जाये अचानक.
* * *

कभी कभी
मैं कर रहा होता हूँ दस्तखत
कि अब कुछ नहीं चाहिए.

कभी-कभी
मैं स्थगित कर देता हूँ मृत्यु
कि शायद अब भी
तुम कुछ कहना चाहते हो मुझको.
* * *

आखिरी बेवजह की बात में
मैं तुम्हें करना चाहता हूँ एक मेसेज.

मगर मैं जिसके लिए हूँ
उससे किया वादा नहीं तोडूंगा.

दुआ कर कि एक आखिरी नींद आये.
* * *

सुबह दूधिया है. 
कोहरा दीवारों, छतों, मेहराबों और रास्तों को चूमता हुआ ठहर गया है. दूर खड़े पहाड़ों से एक शांति की धुन आती है. आँखों के किनारों पर सुरमेदानी से आई ठंडी ताज़ा लकीरें रखीं हैं. सलेटी रंग के टी पर सलवटें नहीं हैं. रात किस तरह सोये थे, रात कहाँ गुम थे, रात तुमने कोई करवट ही न ली या ये बात कुछ और है. कच्चे हरे बेरों से भरी है बेरी. कहीं बोर की पीली गुच्छियाँ हैं. गिलहरियों ने अपनी सुबह की दावत शुरू कर ली है. मैं अपनी हथेली को खुला रखता हूँ. इस पर ठण्ड उतर रही है. ठण्ड दिखती नहीं, महसूस होती है. जैसे कोई होता है मगर दीखता नहीं. जैसे बातें बेवजह चली आती हैं ज़िन्दगी में. जैसे एक वादे की टूटी हुई लकीर पर खड़ी होती है कोई अजनबी परछाई. जी चाहता है इस टूटन में खुद को भर दूं और वादा बचा लूं. जी होता है शैतान का आह्वान करूँ, बस जाओ हर कहीं. रहो मेरे आस पास कि मुझे कोई दुःख दुःख न लगे, प्रतीक्षा इतनी आसान हो जाये जैसे पत्थर पर बरसते रुई के फ़ाहे. एक सख्त मन हो जो न याद करे कुछ. मगर मैं इन चाहनाओं पर आमीन कहे बिना उठ जाता हूँ. मैं जाता हूँ महबूब की याद के रास्ते. आहिस्ता और थका हुआ.

[Painting : Tsuyoshi Imamura]

November 15, 2015

बड़ी तकलीफ़ की छोटी कहानियां

रात आहिस्ता सरकती रहे मगर मन और दिमाग ठहरे रहें, एक ही बात कि तुम कब तक अपने आपको सताओगे. कब तक पागलपन के झूले पर सवार रहोगे. कोई दिन आएगा? जब ज़रा सा खुद का फेवर करोगे, बिना किसी को सताए हुए. मन को कुछ समझ नहीं आता. वह बस इसी एक बात पर सहमत होता है कि फिलहाल चुप रहो कि तुम समझ चुके हो चीज़ें सरल नहीं है. इसलिए प्लीज एक बार अपना फेवर करो कि तुम वह कर चुके हो जो किसी चीज़ को टूटने से बचाने के लिए तुम्हारे लिए ज़रूरी था. वह आवाज़ तुम दे चुके हो, जिसे देना तुम्हारी ज़रूरत थी. अब तुम खुद को हर बात के लिए माफ़ कर दो. यही सब सोचते हुए कुछ एक सच्ची और तकलीफ़ भरी बातें लिखीं. आप इन्हें सच समझें या कहानी इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. इससे फर्क पड़ता है कि अपने आस पास के धोखों को जल्दी पहचानना सीखना. ताकि आप गहरे दुःख से तब बाहर आ सको जब आने का अवसर हो न कि तब जब आपकी ज़रूरत हो. 
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हमारे घर में चार कमरे हैं और वहां हम दो लोग रहते हैं. मुझे बहुत डर लगता है.
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जब उसने मुझे ये बात बताई कि मैं जिससे प्रेम करती हूँ वह किसी और के साथ घूम रहा है, तब मैंने उसे झिड़क दिया था. मैंने इससे बड़ी भूल कभी नहीं की. 
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मेरे कुलीग फिजिकल टीचर ने मेरा शारीरिक शोषण किया था. मैंने अठाईस साल तक अकेले जीवन जीया था. बाद में घर वालों ने जबरन मेरी शादी तय कर दी. जब मैं नए घर में गयी तो मेरे लेक्चरर पति ने मुझसे कहा- वे बारहवीं में पढने वाली एक लड़की के साथ सम्बन्ध में हैं. 
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वह नवनियुक्त आईपीएस था. मैं उसे कॉलेज के दिनों से जानती थी. मैंने उससे कहा कि मुझे सिविल सर्विस की तैयारी में मदद कर दो. वह अक्सर मदद करने आता था. मैं इस काम से उकता गयी. आखिर मैंने तय किया मैं मर जाऊं.
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एक रोज़ माँ को पिताजी ने बहुत मारा. मैंने अगली सुबह शादी के लिए हाँ कर दी. 
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वह उसके ठीक सामने कार से उतरते हुए, उसे फोन पर कह रही थी. भीड़ बहुत है, मैं पैदल चलकर आ रही हूँ. तुम कहाँ खड़े हो? 
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वह एक रात मेरे पाँव के नाखून चूमता रहा. उसने कहा कि ये रंग बहुत प्यारा है. मुझे उसी रात उसे छोड़ देना चाहिए था. 
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उसे नहाने की आदत थी. वह अक्सर वाशरूम में बहुत देर तक नहाता था. मुझे उसे कहना चाहिए था कि अब बस. 
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उस शाम जब मैं घर पहुंची तब वह सब्जी बनाने की तैयारी कर रहा था. मैं जिस टूटन से भरी घर आई थी, उसे ऐसा करते देखकर और ज्यादा टूट गयी. 
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ये उस क्रीम की गंध नहीं थी, जो हमारे घर में रखी रहती थी. 
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मैं एक डरपोक हूँ. काश उसे कभी कह सकती कि उस रात तुमने मुझे क्या कहकर बुलाया था.
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गले में स्कार्फ बांधे देखकर सहपाठी ने कहा- डू यू हैव बॉय फ्रेंड. उसने जवाब दिया- नो, आई एम मेरिड. उनके सामने एक मॉडल पीठ किये थी. वह उसकी पीठ को देखने लगी. 
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अब ये रोज़ होने लगा कि वह खाने की थाली को दूर सरका देता. बुरा सा मुंह बनाता और घर से बाहर चला जाता था. 
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क्या तुम समझ नहीं सकते कि मुझे आज ही मिसकेरेज हुआ है इस हाल में किसी पार्टी में नहीं जा सकती हूँ. उसके पति ने कहा- मैं कुछ नहीं कर सकता, ये बात तुम जानो और माँ जाने. 
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मेरे एक बच्ची नहीं होती या मेरे पास कोई नौकरी होती तो मैं नरक से बहुत पहले बाहर जा चुकी होती. 
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वह मेरा एटीएम कार्ड अपने पास रखता है. 
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मुझे मालूम है कि वह क्या कर रही है. ईश्वर उसे दंड देगा.
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उसने मेरा हाथ बदतमीजी से पकड़े रखा. वह कह रहा था- हमारी शादी होने वाली है. जब मैंने ये बात माँ को बताई तो उन्होंने कहा कि इस उम्र में ऐसा होना कोई अजीब बात नहीं है. मुझे दुख है कि माँ ने मुझसे झूठ बोला था. 
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[Painting Image : Luqman Reza Mulyono]

November 7, 2015

मिट जाने तक कोई वैसे

तुम इस वक़्त बिस्तर की सलवटों में गुम हो
मैं इस वक़्त हूँ तुम्हारी याद के मुहाने पर 

लड़के ने कहा- उस जादुई नदी का नाम हिनातुँ है. 

आसमान से दो सितारे एक के बाद एक टूटे. लड़का उन टूटे तारों को देखने लगा. वह भूल गया कि उसने अभी जिस जादुई नदी का नाम लिया, उसे किसी ने सुना या नहीं. आसमान से गिरते सितारे बुझते हुए अंगारों के जैसे न होकर किसी पीले उजास के कम होते जाने जैसे थे. लड़के ने अपना हाथ आगे किया कि सितारों की राख़ उसकी हथेली को चूम ले. उसकी हथेलियाँ खाली पड़ी रहीं. उन पर अगर कोई गर्द बरसी थी तो वह उसे महसूस नहीं कर पाया था. 

रात के बारह बजने को थे. वह अपने काम से घर जाते समय रास्ते के रेलवे पुल पर रुक गया था. वह खाली पुल टूटी हुई चूड़ी का टुकड़ा दिख रहा था. उसने पुल की चौड़ाई को देखकर सोचा कि ये पुल चूड़ी नहीं किसी भरवाँ कंगन का टुकड़ा है. पुल की सड़क को गहरा लाल या रात के कसूम्बल रंग में रंग दिया जाये तो ये किसी कलाई में सजा आधा कंगन हो. और वह इस कंगन की किनार पर खड़ा है.

वो गर्द नहीं आई. ये कंगन का टुकड़ा स्थिर रहा. 

रेल के इंजन की रोशनी आई. पटरियों को चूमती और बलखाती हुई. मोड़ पर बबूलों के झुरमुट को चूमकर रौशनी ने प्लेटफ़ॉर्म की सीध में रास्ता कर लिया. रेल धक-धड़क की मद्धम हलकी आवाज़ करती हुई पुल के नीचे से गुज़र कर स्टेशन की ओर बढ़ गयी. लड़का वहीँ खड़ा था. उसने अपने हाथ समेट लिए. 

क्या उसे हवा छू रही है. क्या हवा में ठंडक है? क्या रात की नमी है? क्या कुछ ऐसा है, जिसे वह लड़का महसूस कर सके. लड़का एक अचेत चलती फिरती देह में बदल गया था. उसे हवा, ठंड और नमी का अहसास नहीं हो रहा था. उसके पास एक ही अहसास था कि उसके सर में कुछ बह रहा है. वहां कोई आसवन हो रहा है. अपशिष्ट तल में जमते जा रहे हैं और निर्मल जल सुन्दर रोचक प्रवाह बुन रहा है. 

लड़के के ख़याल कुंद थे. उनकी धार खत्म हो गयी थी. वह प्रेम के बारे में सोचने लगा. क्या उसे कोई इस तरह प्रेम नहीं कर सकता जैसे वह करता है. बस जिससे प्रेम हो उसके सिवा किसी की ज़रूरत न हो. लड़के ने खुद को समझाया. असल में वह दो दिन से खुद को समझा ही रहा था कि इस दुनिया में हर किसी को बहुत सी चीज़ों की ज़रूरत होती है. हर कोई इस तरह इकहरे प्रेम में नहीं जी सकता है. हर किसी को एकरस होने पर ऊब आती है. परिचितों, मित्रों, संगियों, सहपाठियों और इस तरह के जाने ही कितने सम्बन्ध ज़रूरी होते हैं. 

उसने खुद से पूछा- मेरे लिए ऐसा सब क्यों ज़रूरी नहीं है? मैं क्यों इतना निष्ठुर हूँ कि सबकुछ ठुकरा कर जीए जाता हूँ. मुझे क्यों एक से ही चैन आता है. मैं क्यों इस तरह का जीवन नहीं जी सकता, जिसमें एक व्यवस्थित दिनचर्या हो. मित्र हों, परिवार और ज़रा कम या ज्यादा प्रेमी हो. मैं क्यों हर वक़्त एक ही ट्रांस में रहता हूँ. मैं गलत हूँ. मुझे सचमुच ठीक-ठीक रसायनों की ज़रूरत है. 


कुछ साल पहले फिलिपिन्स में पानी के भीतर बनी गुफाओं के बीच बहने वाली रंगीन नदी के बारे में गोताखोरों को मालूम हुआ, जैसे उस लड़के को अचानक वह लड़की मिली. गहरे अवसाद के दिनों में नीली दवाओं के जादुई नशे के बीच. लड़के को लगा कि पानी में डूबी वे गुफाएं उसके दिमाग जैसी हैं. जाने कहाँ से शुरू होकर कहाँ खत्म होती हैं. एक से निकलो तो दूसरी शुरू हो जाती है. और उन गुफाओं के बीच बहने वाली नीले रंग की मीठी विद्युतीय चमक से भरी नदी, उसकी प्रिय लड़की ही है. 

वह लड़की निरंतर निर्मल रूप में नदी की तरह उसके भीतर बह रही है. 

नीले रंग के दो शेड्स को पहने हुए. नीले पानी के किनारे बैठी हुई. नीले आसमान के नीचे दूर खड़ी अट्टालिकाओं से सजे बैकड्राप से बनी तस्वीर उसके दिमाग में स्थिर है. एक प्रवाहमय स्थिर. शांत और मधुर. अचानक हलके रंग के अपर पर कुछ फूल खिल आये हैं. वो अपर रंग बदलता जा रहा है. फूल खिलकर उसे ढक रहे हैं. पानी के रंग की पत्तियां बढ़ी आ रही हैं. आहिस्ता से वह पल्लवित-पुष्पित दृश्य एक नदी में ढल जाता है. 

लड़के ने सोचा कि काश उस लड़की ने अभी सुना होता जादुई नदी का नाम तो वह चहक कर कह उठती- हम दोनों वहां चलेंगे. 

लेकिन आधा टूटा कंगन का टुकड़ा चुप पड़ा था. लड़के के दिमाग में नीली गोलियां घुल रही थी. हवा शांत थी. ज़िन्दगी उदास थी. मन अजनबी था. दुनिया थी मगर नहीं थी. बुझ गया था सबकुछ. लड़के ने रुआंसा होते हुए एक दुआ पढ़ी. ओ दुनिया के मालिक इस तकलीफ से तो अच्छा है कि सबकुछ बुझा ही दो. 

लड़के ने लोहे की ठंडी रेलिंग पर अँगुलियों से लिखा- “मिट जाने तक कोई वैसे प्रेम नहीं कर सकेगा. तुम इस दुनिया से जाओगे इंतज़ार से भरे हुए और तन्हा.” इसके बाद लड़के ने कोलोन और केपिटल डी लिखा और चला गया.
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[Painting courtesy ; Michele Traggakiss]

November 4, 2015

देखना उसको, जैसे पेड़ के भीतर झांकना

ये उस साल के नम्बर की बात है जिस साल एक बूढ़ा फ़कीर अचानक सामने आ खड़ा हुआ. उसने कहा- क्या दिखाई दे रहा है? वे दोनों देर तक दूर-दूर तक देखते रहे. उन्होंने सही जवाब देने के लिए सबकुछ देख लेना चाहा. वे चाहते थे कि उनका जवाब सुनकर फ़कीर खुश हो जाये. फ़कीर ने एक हरे रंग का कुरता पहना हुआ था. उसके गले में आसमानी रंग के पत्थरों की माला थी. उसके हाथों में कत्थई रंग के मनके थे. 

फ़कीर ने कहा- मेरे बच्चे ज़िन्दगी बहुत छोटी है. जल्दी देखो और जवाब दो. 

वे दोनों अपनी चाहना के फलीभूत होने के लिए सबकुछ देखने में ही लगे थे मगर आख़िरकार फ़कीर चलने को हुआ तब उन्होंने कहा- हाँ हमने देखा. अब आप पूछिए. 

फ़कीर ने फिर वही सवाल किया- तुमने क्या देखा मेरे बच्चों? 

हड़बड़ी में वे एक साथ बोलने लगे. एक दूजे को बोलता सुनकर दोनों एक साथ रुके. फिर लड़के ने इशारा किया तुम रुको. मुझे बोलने दो. फ़कीर के चेहरे पर जवाब के इंतज़ार के सिवा कोई भाव नहीं था. 

लड़के ने कहा- एक सड़क है. इसके किनारे पेड़ खड़ा है. इसके आगे विश्वविध्यालय का मुख्य दरवाज़ा है. उस दरवाजे के प्रवेश के पास एक घुमटी है. उसमें एक गार्ड बैठा है. दूर एक टेम्पो आ रहा है. उसके पीछे एक बड़ा शोरूम दिख रहा है. 

फ़कीर ने कुछ न कहा. वह जाने क्या सोचता हुआ चुप खड़ा रहा. 

फ़कीर कि चुप्पी को देखकर लड़की ने कहा- मुझे एक पेड़ दिख रहा है. 

अचानक से बिना चमके ही फ़कीर की आँखें रोशन होने लगी. वह लड़की पर केन्द्रित होने लगा. लड़की से उसने कहा- और क्या देखा? लड़की ने कहा- शाखाएं देखीं. 

फ़कीर ने झोली से एक कटोरा निकाला और कहा बेटी तुम्हारे पास जो पानी है उसे इसमें भर दो. 

लड़की ने अपने पिट्ठू बैग से पानी की बोतल निकाली और पानी को कटोरे में उड़ेल दिया. पानी पीने के बाद फ़कीर ने कहा- बेटी शाख के आगे भी देखना. वहां कच्ची शाखाएं होंगी. उन पर पत्ते होंगे. देख सको तो देखना कि वहां कोंपलें भी होंगी. 

वह चला गया. 

लड़का उदास खड़ा रहा. उसे आशा थी कि फ़कीर कोई चमत्कार करेंगे. उसकी ज़िन्दगी संवर जाएगी. लड़की कहीं खो गयी थी. शायद पेड़ में. 

अचानक उसने उदास लड़के का हाथ थामा और अपनी तरफ खीच लिया- तुम मुझसे प्रेम करते हो? 

हाँ
तो आओ मुझे प्रेम करो
कैसे
जैसे हम पेड़ के पत्ते-पत्ते को पढ़ें 

वे दोनों भरी दोपहर एक दूजे में खोये रहे. उन्होंने प्रेम को हर जगह से चखा. वे सब कुछ भूल गए. यहाँ तक कि फ़कीर भी उनकी स्मृति में न रहा. ये सब देखते हुए समय कपूर की तरह उड़ गया. वे दोनों प्रेम में डूबे रहे. 

उस फ़कीर को गए हुए एक साल बीत गया. 

उन्होंने दुआ की- बहार का मौसम फिर आये. बवंडर के आने से पहले की ख़ामोशी की तरह कुछ समय बीता और अचानक वे एक दूजे करीब थे. उनके बीच में फासला न बचा था. वे दो थे और बाकी दुनिया उनकी बायीं या दायीं तरफ से शुरू होती थी. 

उनके वहां से उठ जाने के बाद लड़की ने कहा- अब मुझे तुम्हारे साथ सोने से अधिक सुख तुम्हारे साथ घूमने से होता है. 

एक तरफ टप टप टप रात टपकती रही. स्याही में कोई नया रंग नहीं दिखा. बदन ने अपने आपको छोड़ दिया. उदासे मन ने अपना चेहरा झुका लिया. वह कैसे जीएगा उस लड़की को छुए बिना. कैसे उसे बता पायेगा कि प्रेम क्या है? कैसे उनको सुख आएगा. अचानक लड़के को उस फ़कीर की खूब याद आने लगी. दूसरी तरफ लड़की ने सोचा कि यही वक़्त है. हम आगे बढ़ आये हैं. जब तक हम पेड़ के तने के पास थे, हम उसे बाहों में भर सकते थे. अब हम शाखों पर हैं तो टहनियों को हथेली में थाम सकते हैं. कल जब हम पत्तों के पास होंगे तब उनको सिर्फ होठों से चूम सकेंगे. पत्तों को बाहों में नहीं भरा जा सकेगा. फिर कभी हम कोंपलें देखेंगे तब सिर्फ उनको आँखों से सहला सकेंगे. 

लड़के ने दो दिन बाद लड़की से कहा- मैं समझ गया. 
लड़की की आँखों में वह फ़कीराना चमक नहीं आई. वह अब भी जानती थी कि ये पागल है. न समझा है, न समझेगा. एक दिन मेरे लिए अपने आप को मिटा देगा.
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[Painting Image : Darryl Steele]

November 3, 2015

इस छुअन का कोई नाम है



ज़िन्दगी की उदास सतर में
फिर कोई बुझी-बुझी सी लहर 
रात के पहले पहर.
कैसी हवा है न?

लड़के ने कहा- “मौसम बदल गया है. ये हवा ज़रा ठंडी, ज़रा गरम, ज़रा बेख़ुदी से भरी हुई है.” लड़का जब ये बात कह रहा था, पीले फूल रात की स्याही से भर गए थे. बस एक साया था. घनेरा, एक रंग और चुप खड़ा हुआ. किसने सोचा था कि रौशनी के डूब जाने पर रंग अपने पूरे वुजूद में बने रहने के बाद एक स्याही से ढक जायेंगे.

“वह मुझे बुला रहा है” लड़की ने कहा. लड़के को उसकी आवाज़ न सुनाई दी. अक्षरों को पढ़कर ये जानना कठिन था कि उसकी उदासी घनी है या उसकी मज़बूरी. वह उस वक़्त क्या सोच, कर या लिख रही थी, ये ठीक-ठीक जानना असंभव था. वह अपने मन में खोयी थी या किसी से मुखातिब थी, ये कहना एक कयास लगाना भर था. लड़के ने एक उलझी हुई लम्बी सांस भरी और ख़ुद से कहा- “तुम बने रहो उसके लिए, हर हाल में हर समय. फिर भी कुछ छूट गया तो भी तुम सुकून में रहोगे कि तुमने वही जीया जिसका वादा था.”

एक बार उस लड़की ने कहा था कि सब कुछ सरल होना चाहिए. ज़िन्दगी आसान होनी चाहिए. हमें अपना समय, अपनी जगह, अपना मन जीने का हक़ होना चाहिए. मैं जहाँ चाहूँ, जब चाहूँ तब वहां जा सकूँ. क्या हमारा हम पर ही कोई अधिकार नहीं. लड़के ने कहा- “हमने गुलामी चुन ली है. दूसरे गुलाम इसे तोड़ देने की जगह इसे बचाए रखने को वचनबद्ध है.” 


वे लोग ऐसी दुनिया में जी रहे थे जहाँ आज़ादी एक भयभीत करने वाला विचार था. बंधनों के समाज में सुरक्षा की आश्वस्ति थी.

लड़का नहीं चाहता कि वह लड़की को दुनिया की असलियत के बारे में ज्यादा बताता. दुःख भरे दिनों में किसी स्वप्न को तोड़ना बुरी बात होती है. लड़का अपने हाल के बारे में सोचता था कि वे दोनों किसी चिड़ियाघर में दो अलग पिंजरों में क़ैद जीव थे. वे कभी-कभी एक-दूजे को देख और सुन सकते थे मगर नुमाइश और जरूरत के कारोबार के कारण उन पर बेहिसाब बंदिशें थी. जैसे कभी बाद बरसों के चाँद को ग्रहण लगता है, कभी सूरज और धरती के रास्ते में चाँद के आने से आसमान में हीरे की अंगूठी सी शक्ल बनती है. उसी तरह वे शापित और न दोहराए जा सकने वाले मिलन के गवाह भर हो सकते थे.

लड़के के कहा-“ये ज़िन्दगी है, इसका कोई हल नहीं”

लड़की ने कहा- “हाँ”

इसके बाद एक टूटी हुई चुप्पी बोलती रही. शहर भर में रोशनियों से लेम्पपोस्ट सज गए थे. दीवारों के बीच ठहरी हुई सड़कें अजनबी शक्ल में बदल गयी थी. उस कमरे की खिड़की पर एक भारी परदा था. परदा ऐसे स्थिर था जैसे कोई मरुस्थल ठहर गया हो. उस कमरे तक रुत के बदलने की आहट आई थी या अनदेखी कर दी गयी थी कि ए सी ऑन था. इसके सिवा और वहां जो कुछ था या हो सकता था, वह एक उदासीन परिंदे के पंखों की एक ठहर के साथ आती आवाज़ थी. जैसे अँधेरे में कुछ कहीं अटक गया हो. जैसे किसी उलझी हुई रस्सी में पड़ा हुआ पाँव, ज़रा रुक कर कोई सिरा तलाश करे और फिर नियति के हाथ खुद को छोड़कर शांत हो जाये.

स्याह सलवटें. स्याह छुअन. स्याह बेकसी.

हालाँकि कई बार उसने चेहरे से चादर को हटाया मगर अँधेरा घना था. देखने को कुछ न था और चादर के अंदर और बाहर सांस एक सी आ रही थी. उसने कहा- “शुक्रिया ज़िन्दगी, सलामत रहो”


[काश उसके पास एक फीकी हंसी हुई होती. ये बात इस कहानी का हिस्सा नहीं थी. बस कहीं से मेरे ज़ेहन में दफअतन टपक गयी थी. जाने किसलिए .वैसे उस लड़की का बदन पतले धागे जैसा था ,जब वह दसवीं जमात में पढ़ती थी. उसके ख्वाब पानी जैसे थे तब उसने चाहा कि वह कहीं बह जाये. लड़का जब कॉलेज जाने लगा था, तब उसके पास एक ख्वाब था कि कोई ऐसी ही लड़की कहीं है. अगर वह मिली तो उसका नया नाम रखेगा और उसे नाम से बुलाएगा. इसलिए काश एक फीकी हंसी की जगह उनके पास ज़िन्दगी का एक दिन होता. वे मिलकर सूखे हुए गमलों में कुछ नए पौधे लगा देते और सोचते कि इनपर जल्द ही फूल आयेंगे.]
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[Painting Courtesy : Nik Lamley Brown ]

November 2, 2015

एक प्रेम अलभ्य था

सैंकड़ों दोस्त और हज़ारों फॉलोवर में ख़ुशी की एक बूँद नहीं मिली। संख्या बढती जाती, संदेशे बढ़ते जाते, वाह-वाही बढती जाती. इस बढ़त में भी अनमना अरुचि का सागर मिला। कम ओ बेश हर कोई वही दे रहा था जो उसे स्वयं के लिए चाहिए था. जिस तरह मैं तुम्हें सराहूँ उसी तरह तुम भी आओ चंदन के शीतल लेप लेकर. बस एक प्रेम अलभ्य था. कहाँ मन था ऐसा कि किसी इसी तरह कि दुनिया बाशिंदे होते. बस जो मिला उसमें पाया कि आत्ममुग्धता के आवरण में बन्दी व्यक्तियों के संसार में रचनात्मकता एक प्रदर्शन मात्र थी। चेतना का आंकलन अनुपयोगी कचरे के ढेर से था। विमर्श और चिंतन की उपलब्धि गुणात्मक न होकर संख्या पर आंकी जा रही थी। 

प्रेम पीठ खुजाने जैसी वृतियों से परिभाषित था। 

सलिए उचटा हुआ मन इस संसार के प्रति अनिच्छा की पुनरावृति में निबद्ध था। दम्भ अथवा चापलूसी की क्रिया अनुभूतियों से घिरे व्यक्तियों के प्रति समर्थन भरे प्रदर्शनकारी क्रियाकलापों में आबद्ध होना आतंरिक प्रवृति के विरुद्ध था। इसे जड़ता कहा जाये तो भी ये अपनी पसन्द प्रदर्शित करने के सस्तेपन से श्रेष्ठ अवस्था समझ आई। 

तुमसे लगावट जब प्रेम की सीमारेखा को स्पर्श कर भीतर की ओर प्रवेश करती है, तब पाया कि मेरे प्रिय का इतना कथित सहज और सरल होना अशोभनीय और निम्न होना भर रह जाता है। हम सहज सरल होते हैं, ये मानव का श्रेष्ठ गुण है. मैं स्वयं भी ऐसा होना चाहता हूँ मगर ऐसा होने के पश्चात् पाता कि इससे सुख की जगह पश्चाताप आता है. मेरे अपने अनुभव इस तरह के हैं कि सहज-सरल आचरण से किसी भी विध प्रसन्न होने के स्थान पर अथवा इसके प्रति उदासीन रहने से अलग व्यथा ही आती है.  

प्रिये जब मैं एक क्षणांश में उसका त्याग करता हूँ जो तुम्हे प्रिय नहीं है, इसको क्रूर होना समझना गलत आंकलन है। वास्तव में मेरी समझ ने जो मुझे सीख दी है, वह केवल इतनी भर है कि प्रेम के असीम होने में भी अपने प्रिय की नापसन्द का सम्मान करना मेरी आवश्यकता में सबसे ऊपर है। सुखों और चाहनाओं के भार से श्रेष्ठ है इकलौते अथवा अल्प के संग जीना। मेरे लिए तुम हो तो अतिरिक्त जो कुछ है, वह अनचाहा है। सांसारिक गतिविधि वास्तव में भीतर की क्रिया होनी चाहिए और अनेक द्वारा रचित सम्पादित कार्यों से सांसारिक स्वरूप का बनना, होना चाहिए। 

हम सोच और स्वभाव के स्तर पर भिन्न हैं। चेतनापूर्ण रचनात्मकता के संग प्रवाहित होने में तुमसे जुड़े अथवा तुम जिसने जिनसे जुड़े हो के बारे में सोचना वास्तव में बाधा भर है। 

प्रेम मगर प्रेम है। कभी-कभी वैसी ही क्रियाओं में लपेट लेता है जिनसे अनुराग नहीं है। 
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[Painting Image Courtesy;  Navin Tan]

October 31, 2015

तुम ये क्या बना रहे हो चित्रकार?

चित्रकार ने तस्वीर में थोड़ी सी ठंडी हवा बनाई. 

बहुत सी खाली कुर्सियां, कुछ एक लोग, हल्की रौशनी, और हल्का इंतज़ार बनाया. गलबहियां डाले हुए एक टीन-एज जोड़ा बनाया. उस जोड़े के झरता बहुत सारा प्रेम उससे अधिक उत्तेजना और उससे अधिक अबखाई बनाई. 

कि दुनिया में बहुत कम जगहें बची थी निजता भरा प्रेम जीने की. 

चित्रकार ने और जो कुछ बनाया वह किसी सड़क किनारे रेस्तराओं का सिलसिला था. वहां लेम्प पोस्ट थे. उनपर धर्मेद्र और हेमा के जमाने की फिल्मों के पोस्टर लगे थे. चित्रकार ने अमिताभ का कोई पोस्टर न बनाया. इसलिए कि अपनी 'डैन' में आराम करते हुए राजेश खन्ना के चेहरे पर एक अफ़सोस रखा था कभी-कभी हम ऐसे लोगों का साथ दे देते हैं, जिनमें सिर्फ दूसरों के पाँव काटकर खुद के लिए सीढियाँ बनाने का हुनर होता है. 

चित्रकार ने एक इंतज़ार बनाया. जैसे रंग बनाने वाले बोर्ड पर नीले रंग की ओर बहता हुआ कोई और रंग. उसने टेबल के नीचे पैरों में हरकत बनायीं. उन हरकतों में छुअन भरी. छुअन में अपनापा बनाया. और जिस आदमी पर छुअन के छींटे बनाये उसी आदमी के चेहरे पर एक सवाल बनाया. कि काश तुम एक पारदर्शी रंग होते. 

चित्रकार थक गया होगा कि अचानक उसने विदा बनाई. 

धक्-धक्, धकड़-धकड़. हवा की सांय-सांय, रेल इंजन की विशल, सेलफोन, अँधेरा, और अनमनी करवटें. किसी ने कान में कहा- कैसा प्रेम? सेलफोन छुपाये, घबराए हुए आना. ये कैसा आवरण है. ये कैसी निजता है. ये असल में अजनबियत है. जो कहती है मेरी दुनिया में तुम एक कोना भर हो. तुम मेरी दुनिया नहीं हो. तुम समझते क्यों नहीं? 

धक्-धक्, धकड़-धकड़. शू. शा. शीई. 

ज़िन्दगी का बुरादा अपनी ही सांस में घुलता रहा. उसके पास देने के लिए भारी सांसों के सिवा कुछ नहीं था. अचानक, आधी रात के बाद एक झटके से रुक गया सब कुछ. कोई ठिकाना आया. 

क्या सबकुछ?

अचानक चित्रकार लौट आया. उसने एक तीन साल की नन्हीं लड़की बनायीं. उसकी पीठ को सीट से टिकाया. उसका सर खिड़की के शीशे के सहारे रखा. उसकी आँखों में उनींदे स्वप्न रखे. उसके बदन में एक अनगढ़ नृत्य की लय रखी. 

चित्रकार ने रेल में यात्रा कर रही एक नन्ही प्यारी लड़की बनाते हुए पास की बर्थ पर सोये आदमी के मन पर स्याह रेख बनायी. न जी सकने लायक बेचैनी से भरी हुई स्याह रेख. 

हुश-हुश, हश-हश, सूं ऊऊ की आवाज़ों में धक्के खाती हुई ठण्ड से भरी ज़िन्दगी और एक तुम. 

तुम, तुम तुम.

[Painting Courtesy : Judi Light]

October 29, 2015

एक तेरे आने की, याद के सिवा



तल्ख़ दिन 
अचानक बरसों पीछे छूट गए. 

खिड़की और दरवाज़ों के पल्ले वेगवती हवाओं से अपने आप उढक गए. एक बार सब कुछ कांपा और फिर शांत हो गया. बरसों से कोई अँधेरा गर्द की चादर के नीचे पड़ा हुआ था. कसक से भरे विकल मन की कोई ठांव न थी. अव्वल तो ज़िन्दगी कहने लायक तकलीफें देती ही नहीं है. फिर भी कोई ऐसी तकलीफ़ जिसे मनमीत से बाँट सकें तो भी उम्र की छीजत इस सुख को भी छीन लेती है. 

अब कहाँ बचा है कोई मीत.

दूर तक एक उजाड़ उदासी है. आबाद चीज़ें बेपर्दा हो गईं है. कोई सुख एक स्मृति है और अधिकतर स्मृतियाँ सुख नहीं हैं. अधिकतर माने जिस तरफ टटोलिये उखड़े हुए पैबंद हैं. ज़िन्दगी जो हादसों की शक्ल में सीख देती है वे सीखें बहुत कुछ छीन लेती है. यकीन, आसरा, उम्मीद, दिलचस्पियाँ... सब पर धब्बे पड़ जाते हैं. ऐसे तेजाबी धब्बे जिनसे सिर्फ दाग नहीं छेद बनते हैं. 

एक कंधे पर लटकने वाला थैला तब तक साथ रखने का मन है जब तक दुनियादार हूँ. इस पर लिखा है आखिरी उम्मीद. जैसे कि आखिरी में आप फिर से एक जुआरी की तरह हारते जाएँ. इससे ज़िन्दगी ज़रा आसान लगती है. आसान कुछ नहीं होता बस भुलावा है और भुलावा बड़ी चीज़ है.


सब्र के प्याले को खाली न होने देना. 

जब खुद से ऐसा कहता हूँ तो दुनिया के कारोबार में लगे जगमग और अँधेरे चेहरों के पार एक तार का बाजा सुनाई पड़ता है. जा रहा है, जा रहा है, जा रहा है वक़्त. हर जगह बीत रहा है, रौशनी में और अँधेरे में भी. फिर किस चाह में, किस उम्मीद के खातिर और किस बिना पर? 

वेगवती हवाएं जब दीवारों से टकराकर जा चुकी थी, तब उसने कहा- ऐसी आभा देखी है कभी? इतना पीला उजास ओढा कभी? इतनी मोहक छवि धरती की सोची थी कभी? 

सोचा तो ये भी न था कि 
फिर एक चुप लग जाती है मगर मौसम मन के भीतर से उगता है. तल्खी की रुखसती. 

धूप, हवाओं का शोर, बारिश और शाम सब कुछ बुझ चुके हैं. बालकनी के दरवाज़े के पार दूर सड़क पर गोल घेरे में दिखती हुई रोशनियों के नीचे कुछ सरपट रोशनियाँ हैं. वे सम्मोहन की तरह हैं. वे एक के बाद एक अनियत और अद्वितीय हैं. 

कभी ठहरो तो गिरते हुए लम्हों को देखना, ठहरना बुरा न लगेगा. 

October 25, 2015

तुम जो मिलोगे इस बार तो



उदासी के झोंके ने 
गिरा दिया शाख से पत्ता 

ज़िंदगी को इतना भी यूनिक क्यों होना चाहिए कि जीया हुआ लम्हा बस एक ही बार के लिए हो. कुछ क्लोन होने चाहिए कि हम उसी लम्हे को फिर से जी सकें. एक याद का मौसम जब भी छू ले, उसी पल कोई दरवाज़ा बना लें. दरवाज़े के पीछे एक छुअन हो. एक लरज़िश हो. एक धड़क हो. इस तरह याद जब उदासी और नया इंतज़ार घोले, उससे पहले हम उसी लम्हे को फिर से बुला लें. 

जिस तरह गिरते हुए पत्ते ख़ुद को धरती को सौंप देते हैं, उसी तरह कभी हम ख़ुद को प्रेम को सौंप दें. प्रेम लुहार की तरह हमें लाल आंच में तपाकर बना देगा कोमल. किसी बुनकर की तरह बुन देगा एकसार. किसी राजमिस्त्री की तरह चुन देगा भव्य. 

वह जो दरवाज़े के पीछे अँगुलियों के रास्ते बदन में उतर आई लरज़िश थी. वह उसी एक पल के लिए न थी. उसका काम बस उतना सा ही न था. 

तुम जो मिलोगे इस बार तो पूछेंगे ये हवा क्या है, उदासी कैसी है और तन्हाई कब तक है? 

October 23, 2015

ये भी तो किसने सोचा था कि


एक ठहरी हुई सांस 

बेचैन निग़ाह में उदासी घोलती है.

बारिश नहीं थी मगर थी. एक आवाज़ ने बुनी बारिश. एक सूखी रात का ये पहला पहर था. बंद आँखों में कहीं दूर हिलते हुए होठ खिले थे कि कोई संगीतकार, साजिंदों को अपनी छड़ी से प्रवाहित कर रहा था. मुझे उसे कहना था कि सांस लेने में कठिनाई है. मगर उसकी आवाज़ दवा थी. एक ठहर के बाद प्रतिध्वनी गूंजती. क्या बारिश रुक गयी है? कोई जवाब आता. तीन बार. वह जवाब मुझे बाहर बारिश की ओर खींच ले जाता. उसकी आवाज़ में बारिशें बुनने का हुनर था. 

क्या हम पहले कहीं मिले थे? अगर नहीं तो फिर ऐसा क्यों लगता है कि तुम बिन कुछ नहीं. बचपन में पढ़ी प्रेम कहानियों से ऊब होती थी. ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई दो, एक होकर अंतिम विदा का गीत गाकर चुप हो जाते हैं. बचपन में रूह का नाम न सुना था. तब सिर्फ प्रेतों के किस्से थे. शाम के धुंधलके में बाहर जाना निषेध था. ये प्रेतों का समय था. ये भय और जिज्ञासा के मारक मिलन का समय था. 

काश, बचपन में रूह का कोई किस्सा सुना होता. रूह के मिलने का समय मालूम होता. यकीनन मैं उस समय को अपने भटकने के हिस्से में जमा रखता. 

कि कहीं रूह मिले. 

तो क्या तुम रूह हो? बदन तो कहीं पर भी मिल जाता है. किसी न किसी तरह. किसी लम्बे छोटे इंतज़ार के बाद. बदन उदास नज़र के रंग में घुले अनमने मौसम को विदा नहीं कह सकता. उसे रूह ही बुहार सकती है. तुम्हें छूकर, तुम्हें छूने के अहसास से गुजरकर, तुम्हें बेहिसाब याद करके लगता है कि रेत के बीच पड़े हुए सीपियों के खोल में हवा कुछ लिख रही है. ये हवा है या तुम्हारी रूह है. 

एक कोड़ा बरसता है. कि कोई है, मुझे जाना है, तुम भी जाओ. अब न होगा. विदा, विदा, विदा. इस कोड़े की तड़प में याद की बही से गर्द उड़ती है. ऐसा पहली बार कब कहा था. ये विदूषक की हंसी के भीतर का कड़वा अनुभव है. ये नकार के खोल में लिपटी हुई जाने की चाहना है. ये सच है मगर सच की तरह कहा नहीं गया है.

मुमकिन है
हम इस तरह बिछड़ जायेंगे
कि कभी न मिलें.
ये भी तो किसने सोचा था
कि हम मिलेंगे. 

[Painting Image Courtesy ; Fabio Cembranelli ]

October 21, 2015

उदासी नींद, बावरा स्वप्न

सिसकियाँ ख़ामोशी हिचकी और ज़रा ठंडी हवा

रात जिस ढलान पर चली थी, सरकती गयी. हलकी स्याही में एक वही पुराना स्वप्न. जो पहले भी कई बार देखी हुई जगहों से होकर गुज़रता है.

घर के आँगन के बीच दक्खिन में एक पानी जमा करने का भूमिगत हौद बना हुआ है. इसकी जगत ज़मीन से तीन एक फीट ऊँची है. इस हौद की छत एकदम पारदर्शी. पानी भी इसमें ऐसा कि दस फीट नीचे तल में पड़ी हुई सुई को देखा जा सके.

प्यास लग आई.

हम दो लोग थे वहां पर. मैंने पानी खींचने के लिए टाँके यानी हौद के अन्दर देखा. वहां एक धारीदार लम्बा घोड़ा पड़ा हुआ था. वह टाँके के तल पर लेटा हुआ सा जान पड़ता था. मगर मैंने समझ लिया कि घोडा पानी के अंदर है तो मर चुका है. मन में एक चिंता आई कि पानी दो दिन बाद सड़ जाएगा. अब उस घोड़े को बाहर निकालने के लिए एक लम्बे बांस के सहारे रस्सी का फंदा बनना था. उस फंदे को घोड़े की किसी टांग में डालकर बांस निकालकर फिर रस्सी के सहारे घोड़े को उपर खींच लेना था.

घोड़े को निकालने के लिए कुछ सामान चाहिए थे.

एक दूकान है. जो कि ज़मीन से चार पांच फीट ऊँची है. उसके आगे सीढियां है और एक तीन फीट का रास्ता है. वहां से फुटबाल की पेलेंटी लेने की तैयारी हो रही थी. एक लड़का फिर लड़की और फिर एक लड़का. वे तीनों एक ही पंक्ति में उसी तीन फीट के रास्ते को रोक कर लाइन में खड़े थे. लड़की किसी बेले नर्तकी की तरह दो बार गोल घूमकर किक लेने के रास्ते से हट जाती है. लड़के भी एक तरफ हो जाते हैं. और फिर वहां कोई फुटबाल और कोई पेनल्टी स्ट्रोक लगाने वाला नहीं होता.

वहां पर तीन गोरे होते हैं. वे डॉक्टरी की पढ़ाई कर रहे होते हैं. उनमें से एक हँसता है. मैं उसे कहता हूँ कि तुम क्या कहना चाहते हो. वह कुछ जवाब देता है मगर मैं उसे सुने बिना कहता हूँ- इसके दो ही परिणाम हो सकते थे. पहला कोई ऐसा इशारा था जो किसी जीत के लिए किया जाता हो अथवा शालीन हो. उस इशारे के बार में मुझे कुछ याद नहीं रहता मगर दूसरा इशारा था मिडल फिंगर को अश्लील तरीके से दिखाना. इस पर मेरे पास यानि पीछे खड़े किसी प्रिय ने कहा- ऐसा न करो.

वह भाई ही था. या मंझला या छोटे वाला. हमारे पास एक सायकिल थी. किसी बहुत बड़े मानव निर्मित पुल की ढलान की ओर चढ़ते हुए भाई ने कहा- हमें शायद उस रास्ते जाना चाहिए था. लेकिन नहीं जब हम उपर पहुंचे तो देखा कि ढलान पर पानी जमा हुआ है और वह काई से भर गया है. ज़रा देर बाद भाई ने कहा हम निकल सकते हैं. पानी के किनारे सूखे थे और कहीं कहीं बेहद कम पानी था.

वहां खरगोश थे. वे घास में कूद रहे थे. उनको किसी का डर नहीं था. वे खरगोश होकर बिल्लियों की तरह सीधे ऊपर की और छलांग लगा रहे थे. मैंने चाहा कि एक खरगोश को उठालूं. लेकिन खरगोश के बिल्लियों जैसे नाखून थे. मुझे लगा कि वे अजनबी हाथों को खरोंच सकते हैं.

एक घासफूस के छज्जे वाले घर के भीतर बक्सों के ऊपर एक खरगोश बैठा था. ये उन चार खरगोशों में से एक था, जो बड़े पुल के पास घास में खेल रहे थे. मैंने चाहा कि इस धूसर काले रंग वाले खरगोश की जगह काश वह सुनहरा खरगोश आ जाता.

स्वप्न फिर से घर में ले आया तो वहां पापा मिले. उन्होंने बताया कि पानी का भूमिगत हौद खाली हो चुका है. मैंने पूछा कि ये कैसे किया? अंदर देखा तो वहां सोया हुआ या मरा हुआ घोड़ा नहीं था. कुछ और इतने छोटे जानवर थे जैसे वे बच्चे हों. टाँके के तल को एक तरफ से छेद दिया गया था और पानी पूरा बह चुका था. पापा ख़ामोश रहते हैं. मगर वे ज़रूरी बात कहते हैं. वे जरूरी बात पूछते हैं. मैं उनको जवाब देता हूँ.

अचानक एक औरत मुझे पीठ की तरफ से पकड़ लेती है. उसकी बाहें मेरे सीने पर आगे की तरफ कस जाती हैं. मैं कहता हूँ- ये क्या? वो कहती है- हाँ ये ही. एक हल्की उत्तेजना होने लगती है.

स्वप्न रेगिस्तान की सुबह की ठंडी हवा की कंपकपी के कारण टूटता है. वह उत्तेजना असल में ठंड थी.

* * *

मैं जाग गया हूँ. मैं खोया हुआ हूँ. मैं घर से बाहर निकल जाना चाहता हूँ. कहीं सड़क पर चलता जाऊं. बाहर किसी से कोई काम नहीं है. बस कहीं जाकर बैठना चाहता हूँ. ऐसी जगह जहाँ खुला खुला हो सबकुछ.

October 20, 2015

तेरे बाद की रह जाणा

मौसम ऐसा है कि कमरे अंदर ठंडे और बाहर गरम। प्लास्टिक के सफ़ेद छोटे कप चाय से भरे हुए। नया हारमोनियम।। जमील बाजा के बारे में कुछ और बताते हुए गुनगुनाना शुरू करते हैं। तेरे बाद की रह जाणा... मैं कहता हूँ गाते जाइए। जमील मुस्कुराते हुए स्वरपटल पर अंगुलियां रखे हुए अपनी आँखें मेरी आँखों में उलझा देते हैं। मैं डूबता जाता हूँ। सचमुच तुम्हारे बाद जीवन में क्या बचा रह जायेगा। उदासी, तन्हाई और बेकसी। आकाशवाणी के विजिटर रूम में ढोलक की हलकी थाप से सजी संगत और सिंधी-पंजाबी के मिले जुले मिसरों का मुखड़ा, गहरी टीस से भरता रहता है। 

जमील अपने कुर्ते के कॉलर ठीक कर एक लम्बे सूती अजरक प्रिंट के अंगोछे को गले में डाल कर बिना सहारा लिए आँगन पर बैठे हैं। ग़फ़ूर सोफे पर बैठे हैं। मैं अधलेटा सोफे का सहारा लिए सामने खिड़की की ग्रिल पर पाँव रखे हुए। मैं कहता हूँ ये हारमोनियम कितने का आया? ग़फ़ूर कहते हैं कल ही अट्ठारह हज़ार में लिया। मैंने पूछा कलकत्ता का है? बोले- नहीं! पंजाब की बॉडी है और सुर... मैं कहीं खो गया कि ये न सुन पाया सुर कहाँ के हैं। मेरा मन उकस रहा था कि कहूँ कोई बिछोड़ा सुना दो। ऐसा विरह गीत की आँख भर आये। 

सिगरेट का धुंआ, सुरों की गमक फिर भी आबाद खालीपन। 

वे कलाकार अपने साज़ कसते रहते हैं। थाप लगाकर देखते हैं। मैं थके कदम बाहर आ जाता हूँ। एक कमायचा बजाने वाला नहीं आया है। उसका इंतज़ार है। स्टूडियो बिल्डिंग के साये में खड़े हुए देखता हूँ बड़ी भूरी चिड़ियां अपने साथ की चिड़िया को कुछ कह रही है। जाने क्या? मुझे लगा कि वो दो ही बातें समझा रही है। पहली बात बुद्ध की- ये संसार दुखों की खान है। दूसरी बात-सन्यास सुख का पड़ोसी है। अगली चिड़िया शायद कोई शंका रखती थी तो उसने कुछ पुछा। बड़ी भूरी चिड़िया ने अपने परों को फैलाया और कहा चलो। वे मेरे पास से उड़कर नीम पर चली गयी। 

मुझे साँस नहीं आ रही। कनपटी से पसीना आ रहा है। मैं उसे बिना छुए गरदन के रास्ते नीचे उतरने देता हूँ। मालूम है क्यों? इसलिए कि मेरे दिमाग में एक सी सा झूला है। नष्टोमोह की कामना है और कुछ नहीं जाने देने का वादा भी है। मैन गेट के पास से वॉयलिन कवर पीठ पर लटकाये हुए एक आर्टिस्ट आता है। मैं स्टील के पाइप से सहारा हटाकर अंदर की ओर चल देता हूँ। साफ पानी की मशीन के पास खड़ा होकर एक पन्नी से छोटी नीली गोली निकालता हूँ और गटक जाता हूँ। दुनिया के उस पहले आदमी या औरत के नाम जो पहली बार किसी को छोड़कर गया था।

बाजे की बॉडी तो पंजाब की है पर सुर कहाँ के हैं?

October 19, 2015

उस रुत झड़ गये थे पत्ते, इस बार?

अलमारी की ऊपरी दराज़ में यूएसबी केबल्स रखीं हैं। अंगुलियां उनमें उलझकर सब्र भूल जाती हैं। सब्र जो पहले से ही चुकता जा रहा था। एक पतली पन्नी चाहिए। जिसमें कुछ साल्ट रखे हों। किसी कोने में अँधेरे और ठण्डी दीवार के सिवा कुछ हाथ नहीं लगता। 

रात ठहर गयी है। आधे रास्ते में कोई और काली दीवार आ खड़ी हुई। रात को दीवार के पार कोई रास्ता नहीं है। रोशनियाँ नाकाम टूट-टूट कर वहीँ गिर पड़ती हैं जहाँ से उगी थीं। हर रौशनी रेंगने से लाचार तलछट को पीलेपन से रंगकर खो जाती है। 

अचानक साँस की लड़ी टूटती है। एक अल्पविराम। अगली साँस के लिए कुएं से रहट खींचते हुए निर्जन उजाड़ चुप टोह लेता है। एक लहर सी पंजों से सर तक दौड़ती है। ज़हर की तड़प से भरी आंत के मरोड़ जैसी। 

धप धप धप... सीढ़ियों पर थके अबकाये कदम कभी तेज़ कभी दीवानावार पहले तल से दूसरे तल और कभी छत पर। अलमारियों, दराजों और किताबों के आलों में पीछे छूटी जगहों पर हाथ घूमकर टटोलते हुए पन्नियों की तलाश खत्म नहीं होती। एक ऐसी गोली, ऐसा रसायन, ऐसा जैसे जान बख़्श दिए जाने की आस जगे। मगर नहीं मिलता।

मौसमों की बड़ी बातें लिखीं। उनकी बेवफ़ाई और मेहरों पर तकरीरें की मगर भूल गए कि मन का बन्धन अंततः धोखा ही साबित होगा। अब तक कोई ऐसा न मिला था तो कैसे इस रुत को समझ लिया कि अब उजाड़ और वीराना सिर्फ किताबों और यादों में बचा रह जायेगा। 

सुबह के चार बजे डॉक्टर नहीं आया होगा। उस चारागर को किसी से मोहोब्बत हो जाये तो बेवक़्त क्लीनिक खोलकर इंतज़ार करने लगे। मगर नौ बजे सफ़ेद रंग की कार से उतर कर दरवाज़े की और बढ़ते हुए आँखों से दुआ सलाम हो जाती है। 

एक छः सात साल का लड़का है। कमीज के बटन खोल कर बेंच पर बराबर बैठा है। उसके पेट से एक गाँठ निकाल दी है मगर चीरे की जगह टाँके नहीं लगाए हैं। वह चीरा पट्टी उतर जाने से ऐसा दीखता है जिसे रात इसी रास्ते से आई होगी। उसे देखते हुए अंगुलियां मुड़ने लगती है। मन को लगता है कहीं कोई अंगुली पकड़ कर उस चीरे से छुआ न दे। 

उस रुत पत्ते झड़ गए थे मगर कोई कोंपल बची रह गयी थी। इस बार? 

साँस फिर उखड़ती है। कदम बदन का बोझा उठाये बाहर आते हैं। क्या कहूँगा? डॉक्टर! कोई ऐसी दवा है आपके पास जिससे आंसू आते हों?

September 20, 2015

ढब सब उलटे पड़े हो जहां

इंतज़ार की कोई मियाद नहीं होती.

तपते हुए दिन और रेगिस्तान पर कुछ एक हरे टप्पे से दीखते खेत पीले पड़ते जा रहे थे. कोई राह में मिलता तो कहता इस बार जमाना ख़राब. फसलें कहीं कहीं दिख रही हैं बाकि सब जगह सुनसान. वो सप्ताह भर जो पानी बरसा था जाने किस काम लगा. भीगे दिन भीगी रातें और धूप का इंतज़ार. कुछ एक दिन बाद बरसातें इस तरह गुम हुई कि गोया रेगिस्तान सदियों से सूखा ही था. कल शाम अचानक से हवा चली और ज़रा देर बाद शहर को भिगो गयी. एक बारिश सब कुछ बदल देती है. रात अँधेरी, छपरे पर गिरती पानी की बूंदों की आवाज़. कुछ एक मुरझाई हुई ककड़ी कि फांकें. उनका फीका स्वाद. और एक पुरानी व्हिस्की से भरा प्याला. कितना तो इंतज़ार था और कैसे अचानक खत्म हो गया. उसकी इतनी ही उम्र थी. रात भर बिजली गुल. हवा बंद. आसमान से छींटे. पलंग पर से भारी गद्दों को उठाकर बाहर बालकनी में डालकर लेटे हुए, भूले भटके आते हवा के झोंकों को शुक्रिया कहते हुए रात बीत गयी. 

असल नींद उस वक़्त आई जो शैतानों के सोने का समय होता है. 

स्मार्ट फोन में बेटरी के सिवा हर बात में स्मार्टनेस है. वह तुरंत दुनियावी षड्यंत्रों, जालसाजियों, धोखों, उदासियों को घेरकर लाता है और पेश कर देता है. सूचनाएं अनिर्वचनीय हैं. वे अपने असर को लीप कर जाती हैं. वे अतीत की कुदाल है तो भविष्य की आधुनिक मशीनें हैं. पल भर में आपके सुख को खोदकर रख देती हैं. कितने जतन से दिन को किसी खाली जगह में सरकाया था, कितने श्रम से शाम कमाई थी, सब बेकार. शिकवे, शिकवे और शिकवे. पेड़ अँधेरे में हिलता है. हेजिंग के नीचे कोई सरसराहट जागती है. सीढियों के पास कोई साया लहराता है.

सुबह जब आँख खुलती है तो बिजली फिर गुल. सेलफोन अपनी निद्रा में. ०.

ऑफिस चले जाओ. वहां बिजली मिलेगी. अचानक दुष्यंत कहता है पापा कोई आपसे मिलने आये. जोधपुर विश्व विद्यालय में पढने के दिनों के साथी. त्रिलोक सर. गले मिलते हैं. मैं अपनी पीठ को ज़रा सावचेत करता हूँ. और फिर हम दोपहर भर उन दिनों की, उन दिनों के लोगों की, उन दिनों के चिंतारहित जीवन की बातें करते हैं. सर बास्केटबाल की टीम लेकर आये हैं. राज्यभर से सत्रह और उन्नीस साल समूह की बालिकाएं खेलने आई हैं. मैं बंद पड़े फोन को देखता हूँ. त्रिलोक सर अपने चालू फोन को देखते हैं. साढ़े तीन बजे उनकी टीम का मैच है. चाहना के कितने रंग होते हैं. मैं अपने फोन को चालू देखना चाहता हूँ. त्रिलोक सर फोन को अवॉयड करते जाते हैं. 

दोपहर बाद एक दौड़ से दफ़्तर जाता हूँ. फोन चल पड़े मगर वहां होना क्या होता है. चुप दफ़्तर का काम करने लगता हूँ. अवकाश के दिनों में दफ़्तर का सूनापन रूमानी होता है. कोई दुआ सलाम नहीं. खिडकियों के रास्ते आता परिंदों का शोर. सड़क से गुज़रते वाहनों की आवाजें. मैं उठकर लम्बे गलियारे को पार करके बाहर आ जाता हूँ. खाली खाली मन कहता है चलो शाम छत पर गुज़ारो. एक ज़रा सुकून और एक छोटी बेख़याली में दुशु की आवाज़ आती है. पापा कोई मिलने आये. मैं देखता हूँ महेश कुमार गुप्ता खड़े हैं. कहते हैं, मैं कई दिनों से सोचता रहा कि आपसे मिल आऊँ. किसी हड़बड़ी में कहीं कुछ मिस होता रहा, आज पक्का था कि आपसे ज़रूर मिलना है. 

मैं शाम की तीसरी चाय बनाता हूँ. चाय बनाते हुए सोचता हूँ कि इस दिन का कोई ढब है? 

September 10, 2015

तन्हा और खुश रहना

तुम जब पूछते हो कि इस जीवन में स्वयं का परिष्कार करने का ढंग क्या है ? मैं उस वक़्त अपने आपको देखता हूँ. मुझे वहां एक ही बात दिखाई पड़ती है कि मैंने जीवन को साधने के यत्न करने की जगह उसका आनन्द लिया है. ख़ुशी क्या है? ये समझ आये तो उसके लिए जीयो. बस. क्योंकि जीवन को यंत्रों, सींखचों और आदर्शों में बांध कर किसी विशेष रूप में ढालना मुझे अच्छा नहीं लगता. तुम्हें मालूम है कि मेरे पास कई बांसुरियां हैं. मेरे बच्चे उनसे डांडिया खेलने लगते थे. वे प्रिय बांसुरियां टूट जाती थी. मैं नयी बांसुरी ले आता था. जहाँ से बांसुरी खरीदता रहा हूँ वहां बांसुरियां संदूकों के अँधेरे में पड़ी होती थी. मैं उनको छूकर देखता. उनके रंग और आकर को देखकर अपने साथ ले आता. घर लाकर उनको किसी दीवार पर टांग देता या वे मेरी अलमारी में पड़ी रहती थी. जाने कितने ही बरस हुए वे बांसुरियां मेरे साथ हैं. वे मुझे प्रिय हैं मगर मैं उनको बजाता नहीं हूँ. कभी किसी रोज़ कोई बांसुरी मेरे होठों से लगकर बजने लगेगी तब तक के लिए मैं खुद को किसी ऐसे परिश्रम में नहीं झोंकना चाहता हूँ जहाँ मन न हो बस बांसुरी बजाने का गुण आने की चाह हो. मेरी ही तरह तुम ऐसा कोई काम न चुनना जो तुम्हें ख़ुशी देने की जगह सिर्फ मंझा हुआ दिखाने में सहयोगी हो.

मगर बांसुरियां मुझे प्रिय हैं, वे मेरे साथ हैं.

तुम परिष्कृत क्यों होना चाहते हो? क्या ये विचार तुम्हारे अन्दर से आया है? अगर ऐसा नहीं है तो ये चिंता की बात है कि तुम दुनिया को दिखाने के लिए वह सब करना चाहते हो जिसकी तुम्हें ख़ुशी नहीं और जिसके बाद एक कठोर ठहराव है. नृत्य, गायन, वादन, अभिनय, चित्रकला, शिल्प, लेखन जैसी कलाएं मनुष्य को उच्चतर बनती हैं. हर एक कला के भीतर अनेक कलाएं छुपी होती हैं. उनके रस होते हैं. रस निष्पत्ति के विलक्षण तरीके होते हैं. एक ही रस और राग हर मनुष्य में अलग तरीके से बजता और प्रस्फुटित होता है. इस असीमता में तुम एक चीज़ जो सीखना चाहते हो वह कितनी छोटी है. उससे भी बड़ी बात कि वह तुम्हारे मन की नहीं है और जल्द ही एक थकान तुम्हें घेर लेगी. तुम ऊब से भरने लगोगे. इसलिए जब तक भीतर से कोई मचल न हो. भीतर से कोई उकसावा न आये तब तक दुनिया को दिखाने या प्रसंशा पाने के लिए कुछ न करना. वह करना जो अंदर उपजता हो. वह साधना जिसकी सीख हमारा मन ले रहा हो.

मैं चुप हो जाता हूँ, लोगों से दूर चला जाता हूँ. ऐसा अक्सर आस-पास के लोगों को लगता होगा. लेकिन ये सिर्फ बाहरी लक्षण है. असल में मैं अपने पास लौटता हूँ. मेरे लिए मेरा एकांत प्रिय है और उसी से ख़ुशी है. तो आप कहीं जाते नहीं हैं. योग्य-गुणी, अध्यापकों और गुरुओं से कुछ सीखते नहीं हैं. फिर ये जीवन को नष्ट करना न हुआ? मुझे नहीं लगता कि कोई कुछ सिखा सकता है. सिखाना एक अंध क्रिया है. आप एक सुर लगाते हैं और कहते हैं ऐसा ही करो. मैंने सुर की नक़ल की. क्या ये सीखना हुआ? नहीं ये सिर्फ सिखाना हुआ. सीखना तब होगा जब आप सुर लगायेंगे और मैं भीतर से उनसे जुड़ जाऊँगा. फिर मेरा मन उसी सुर को दोहराएगा. एक दिन साध लेगा. अब बताओ सीखना के लिए कहाँ जाना हुआ? कहीं बाहर या अपने भीतर. परिष्कार यानि खुद को निर्मलता की ओर लेजाना. अशुद्ध को त्याग कर शुद्ध होना. ख़राब को बाहर कर अच्छा होना. तो परिष्कार के लिए क्या किया? कहाँ गए, किससे मिले, किसको पढ़ा. सबकुछ खुद का किया ही काम आया. बाहर से दोष आते हैं.

दफ्तरों में काम करने वाले या पूरे समय घर की देखभाल करने वाले पुरुष और स्त्री. वे जो कुछ कर रहे होते हैं वह कितना नीरस और अनुपयोगी जान पड़ता है. कुछ किया ही नहीं. सीखे ही नहीं. व्यर्थ ही सबकुछ. जीवन बीत रहा है. हमें कुछ आता नहीं. लोग देखो क्या क्या जानते हैं. ऐसे सवाल हमारे मन में आते हैं. तब हम कभी खुद से ये नहीं पूछते कि लोगों को क्या आता है? वे किन कारणों से वह सब करते हैं. उससे भी बड़ी बात की उनके किये की आयु क्या है. कितने बरसों और सदियों तक उनके किये को स्मृत किया जायेगा. इसका जवाब बहुत जल्द मिल जाता है. फिर हमारे मन में आता है बाद में कुछ हो न हो मगर अभी तो वह ख़ास है. तब सोचना कि इस ख़ास होने में अगर उसका मन शामिल नहीं है तो? क्या घर में रहने वाले पुरुष और स्त्रियाँ अपना जीवन व्यर्थ कर रहे होते हैं. कभी नहीं. जो कोई जहाँ है जो कुछ करता है वही उसका साध्य हो तो यही परिष्कार है.

मैं फिर कभी तुम्हें चिट्ठी लिखूंगा मगर फिलहाल ये सोचो कि कहीं तुम एक गलत व्यक्ति के साथ तो नहीं हो. जो अपनी ख़ुशी के लिए बाहरी चीज़ों से आकर्षित नहीं है. जो बांसुरी लिए बैठा रहता है और बजाना नहीं सीखता. और ऐसी बांसुरी किस काम की जो मन ही में बजे. मगर है ऐसा ही. 

मेरा मक़सद है तन्हा और खुश रहना.

[Painting image courtesy ; Vishal Mishra]

September 7, 2015

स्थायी दुःख से कैसलिंग


काश बहुत से हैं जैसे गिरहें जब पैर में उलझी तब गिर पड़ने की सीख को पहले उठाया होता और ख़ुद बाद में उठता. आज ढलती हुई शाम में रेल पटरी पर बने पुल से गुज़रते हुए सोच रहा था कि पुल के उपर से देखने पर नीचे का दृश्य ज्यादा समझ आता है. इसी तरह जीवन बिसात को देखा समझा होता. बीते दिनों के किसी अफ़सोस की दस्तक के साथ फिर एक काश आता है. काश उन दिनों कुछ सोचा जा सकता परिस्थिति से थोडा ऊपर उठकर.

एक गिर पड़ने का ख़याल और एक ज़रा उपर से गिरहों को देखने की समझ. थोडा सा फासला कितना कुछ बदल देता है. सुख के भेष में दुखों को आमंत्रण पत्र लिखते समय सोचा होता कि रेगिस्तान के तनहा पेड़ सूखे के स्वागत में कुछ ज्यादा रूखे और ज्यादा कंटीले हो जाते हैं तो हमने ख़ुद के लिए क्या तैयारी की है?

मगर कुछ नहीं होता. 
बेख़याली में समय की ढलान पर फिसलते हुए दिन रात, बरस के बरस लील लेते हैं. इस छीजत में उदास काले धब्बे, अनामंत्रित खरोंचें, अनगढ़ सूरत बची रह जाती है. दुःख आता है कि बीते वक़्त रिश्तों, सम्मोहनों और कामनाओं के प्रवाह में किनारा देखा होता. खो देने के भय में लुढकते खोखले ढोल से बाहर आ गए होते. सोचा होता जिस तरह पुराने दुःख बुझी हुई भट्टी की तरह ठन्डे पड़ गए हैं आगामी दुःख भी अस्त हो जायेंगे. एक ख़ामोशी की दीवार चुनी होती. एक पत्थर का पर्दा बनाया होता. एक बार खुद से कहा होता, नहीं. कहा होता जाने दो. कहा होता कि जाने देना ही सुख है.

शतरंज के खेल में राजा और हाथी के बीच, जगह की अदला-बदली वाली कैसलिंग की सुविधा की तरह काश एक पुराना दुःख नए दुखों के सामने खड़ा कर दिया होता. काश एक स्थायी दुःख के मोल को समझा जा सकता. काश किसी स्थायी दुःख से कैसलिंग कर ली होती.

September 6, 2015

नासमझी के टूटे धागों में


कुछ काम अरसे से बाकी पड़े रहते हैं. उनके होने की सूरत नहीं बनती. कई बार अनमने कदम रुकते हैं और फिर किसी दूजी राह मुड़ जाते हैं. फिर अचानक किसी दिन पल भर में सबकुछ इस तरह सध जाता है कि विश्वास नहीं होता. क्या ये कोई नियति है. घटित-अघटित, इच्छित-फलित भी किसी तरह कहीं बंधे है? क्या जीवन के अंत और उसके प्रवाह के बारे में कुछ तय है? मैं अक्सर पेश चीज़ों और हादसों और खुशियों के बारे में सोचने लगता हूँ. अब क्यों? अचानक किसलिए? और वह क्या था जो अब तक बीतता रहा. मुझे इन सवालों के जवाब नहीं सूझते. एक चींटी या मकड़ी की कहानी कई बार सुनी. बार-बार सुनी. निरंतर असफल होने के बाद नौवीं या कोई इसी तरह की गिनती के पायदान पर सफलता मिली. मैं यहाँ आकर फिर से उलझ जाता हूँ. कि पहले के जो प्रयास असफल रहे वे असफल क्यों थे और एक प्रयास क्यों सफल हुआ.

हम कब तक जी रहे हैं और हम कब न होंगे. आदेश श्रीवास्तव. अलविदा. गीता का संदेश इसी नासमझी का सन्देश है कि कर्म किये जा और फल की इच्छा मत कर. 
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हाथों में आ गया जो कल रुमाल आपका

मेरा पेशा ही इतना मीठा है कि कभी खुद पर रश्क़ होने लगता है. रेडियो स्टेशन के ठन्डे सीले स्टूडियोज में कहीं बैठे हुए फिल्म संगीत सुनते सुनाते जाना से बेहतर क्या हो सकता है. रात ग्यारह बजे के आस पास जब ट्रांसमिशन के पूरे होने में कुछ मिनट भर बचे हों, उस वक़्त पाकीज़ा फिल्म से गीत प्ले हो रहा हो चलते चलते यूँ ही कोई.. और फिर रेल इंजन की विशल से फिल्म संगीत सम्पन्न हो रहा हो. या लग जा गले के फिर ये हंसी रात हों न हो गीत पूरा होने से पहले उसके आखिरी में ऐ ऐ ऐ सुनते हुए समाचारों से पहले की बीप बजने लगे. ऐसे जादुई मौसमों में संगीत और संगीत की दुनिया के लोगों के नाम बोलते हुए, साजों पर उनकी कलाकारी सुनते हुए, गीतों के बोलों को गिरहों में पिरोते हुए सुनना. कितना बेशकीमती है, मैं कभी कह नहीं पाऊंगा.

ऐसे ही पहली बार जब आदेश श्रीवास्तव का नाम बोला था वह गीत था, हाथों में आ गया जो कल रुमाल आपका. आज सचमुच आदेश का ख़याल मुझे बेचैन कर गया है. परसों ही मैंने आदेश के स्वास्थ्य के बारे में समाचार सुना था. उसे सुनते हुए मुझे वह शानदार व्यक्तित्व का धनी याद आया जो एक ड्रमर था. कहीं किसी टीवी शो के बारे में मालूम हुआ कि आज आदेश उसके गेस्ट हैं. मैंने उसे देखने के लिए समय निकला. वे आये और आते ही उन्होंने ड्रम को चुना. शायद कुछ प्रेम कभी बिसराए नहीं जा सकते. संगीत रचनाकार के मन का प्यारा साज़ हमेशा उसे अपने पास खींच लेता है. मैं ड्रम बजने वालों को बड़े सम्मोहन से देखता आया हूँ. शायद इसलिए कि स्कूल कॉलेज के दिनों में ड्रम बजाने वाले लड़कों से सब लड़के लड़कियां खूब प्यार करते थे. लेकिन मैं संगीत का अ आ कभी न सीख पाया. स्वप्नजीवी होने का यही एक दुःख है.

मैंने शाम के ट्रांसमिशन ही किये हैं. मुझे सवेरे जागने और पांच बजे स्टूडियो पहुँचने में रूचि नहीं रही. दोपहर आलस भरी होती थी. इसलिए मैं हमेशा चाहता था कि शाम की ड्यूटी लग जाये. और फिर उदघोषणा करते जाना. फिल्म संगीत के ईपी और एलपी छांटना. शाम की सभा के फिल्म संगीत में चलत के गाने बजाने में बड़ा सुख होता है. मेरा रेडियों में आना उन्हीं दिनों हुआ था जब आदेश श्रीवास्तव संगीतकार बनकर आये थे. और मैंने लगभग तब तक लगातार उदघोषणाएं की जब उनके आखिरी दौर की फिल्म आई होगी. कुछ बरस पहले दीवार फिल्म का गीत चलिए वे चलिए.. मुझे इस तरह अपने सम्मोहन में बांध चुका था कि फिल्म संगीत चुनते हुए हर दूसरे तीसरे दिन में उसे प्ले कर देता था. आदेश की बीट्स के साथ मेरा चेहरा अक्सर ख़ुशी से भरा हुआ हिलता रहता था. स्टूडियो के उस तरफ बैठा कोई इंजिनियर साथी जब मुझे इस तरह मुस्कुराते हुए खुश देखता तो वह भी प्रसन्न हो जाता था. ये आदेश श्रीवास्तव का जादू है जो देश और देश के बाहर और जाने कहा-कहाँ कितने लोगों को स्पंदित करता है और करता रहेगा.

इस बीच राजनीति फिल्म में आदेश का संगीत आया,. कहाँ वे रुमाल और सोणा सोणा जैसे गीत और कहाँ मोरा पिया मोसे बोलत... ये ही जीवन सफ़र है और यही सीखना है. आदेश का संगीत भी एक गहराई में अपना घर कर चुका था. अनुभूतियों से जब थोथी चीज़ें उड़ने लगती हैं, उसी समय जीवन बीज अपने सबसे लघुतम और सर्वाधिक उपयोगी रूप में हमारे सामने आता है. एक ड्रमर संगीत के अपने सफ़र में कैसी अद्भुत मिठास तक पहुँचता है यही कहानी आदेश श्रीवास्तव की याद है.

आदेश श्रीवास्तव, आप मेरे लिए स्पन्दन हैं और हमेशा रहेंगे. यकीनन मोरा पिया मैं कभी प्ले न करना चाहूँगा... आखिर रोने का भीगा गीला सीला मौसम कौन जान बूझकर अपनी झोली में भरे. लव यू.

August 23, 2015

सुनो [जा]ना, व्यर्थ अभिमाना- 2

मेरे पास दो रास्ते नहीं है. मेरे पास दो मन नहीं है. मेरे पास दो कुछ नहीं है. मैं रूई का फाहा हूँ. जब तक डाल से बंधा हूँ, डाल का हूँ. जब हवा से मिलूँगा तो उसका हो जाऊँगा. मैं पहले कहाँ था, मैं अब कहाँ हूँ और मैं कल कहाँ होऊंगा, इसकी स्मृति और भविष्य कुछ नहीं है. मैं जब शाख पर खिल रहा था, प्रेम में था. मैं जब हवा से मिला प्रेम में रहा. मैं जब धूल में मिलूँगा तब प्रेम में होऊंगा. मेरा उदय और मेरा अस्त होना एक ही क्रिया की भिन्न अवस्थाएं हैं. 

मैं सुनता हूँ तुम्हारी आवाज़ में एक कोमल धुन. जो इस तरह कोमल है कि फरेब भरी जान पड़ती है. पत्थरों पर पानी तभी तक पड़ा रहता है जब तक धूप का संसर्ग न हो. तुम्हारी भाषा भी कुछ विषयों पर बदल जाती है. मगर मैं जो था वह हूँ, शायद वही रहूँ. कुछ रोज़ से फिर अपनी पढ़ाई के दिन याद आ रहे थे. कुछ रोज़ से एक छूटी हुई पोस्ट याद आ रही थी. आज सुनो आगे की बात.... 
______________________

कितने-कितनों को संदेशे भेजे
कितनों के मन की शाखों पर अपने सुख का झूला, झूला.
कितनों की बुद्धि पर झूठे नेह की कलमें रोपी.

सुनो जाना,

आवाज़ों का रेला आता
कर्म-मल गहराता जाता.

संवर के बारे में ज़रूर भगवान् महावीर ने कुछ कहा होगा. 

मानस व्यापार, नैतिक आचरण 
और कर्म क्रियाओं के बारे में कुछ सुना होगा

तुम एक पदार्थ हो, जो दूजे पदार्थ के उपभोग में लगे हो.

॥सुनो [जा]ना, व्यर्थ अभिमाना/24॥
* * *

तुम्हारी श्रद्धा, मित्र के आवरण में
एक जोंक की तरह है.

तुम्हारे धवल दंत
विषधर की तरह अटके हुए हैं अनेक हृदयों में
तुम्हारी जिह्वा इस दंश के सिवा, सहला रही बाकी काल्पनिक दुखों को.

सम्यक चरित्र किसे कहते हैं. वे पञ्च व्रत क्या थे?

॥सुनो [जा]ना, व्यर्थ अभिमाना/25॥
* * *

उपहास के रणदे से
संबंधों की छाल को छिलते देख देखकर
कैसी अव्यक्त मुस्कान आती है न तुम्हारे चहरे पर.

निर्जरा, निर्जरा, निर्जरा.

वे जैन साधू कैसे थे
जिन्होंने दर्शन, ज्ञान और चरित्र की रगड़ से कर्म-मल को साफ़ किया.

तुम्हारी देह एक बोरा है
ज़रा एक बार भीतर झाँकों. 

॥सुनो [जा]ना, व्यर्थ अभिमाना/26॥
* * *
मुमुक्षु के वरघोड़े के छद्म भेष में
मित्र बनकर तुमने जहाँ कहीं पदार्पण किया.

वहां-वहां खिले हुए उपेक्षा के पुष्प.

क्या लोकाकाश के ऊपर कोई सिद्द्शिला नहीं
भला हुआ कि तुम्हें अब तक कोई तुमसा मिला नहीं.

॥सुनो [जा]ना, व्यर्थ अभिमाना/27॥
* * *

तुम्हारी बौनी खिलखिलाहट नाशवान है प्रिय.

वस्तुवाद, वस्तुवाद, वस्तुवाद
अंततः हर एक की सीमा है.

॥सुनो [जा]ना, व्यर्थ अभिमाना/28॥
* * *




August 17, 2015

अपनी अँगुलियों से कह दो

मौसम किसी उदास परिंदे के बदन सा था. थकन से भरा और अनमना. 

विचित्र छायाओं के स्याह-सुफेद चित्र बनाते हुए बादल ठहर-ठहर कर किसी यात्रा में फिर शामिल हो जाते. हवा ख़याल से अचानक बाहर आये बच्चे की तरह टोह लेकर फिर से अपने आप में गुम हुई जाती थी. तन्हाई की स्याही से बदन के कोरेपन पर शाम लिख रही थी- कोई तुमसा नहीं होगा प्यारे. तुम अकेले ही थे. तुमने अपने असल अकेलेपन से घबराकर सम्बन्धों का चुनाव किया. ये भी हो सकता है कि वह एक चुनाव न होकर किसी हड़बड़ी में कहीं छुप जाना भर हो. घर के छज्जे के नीचे शहतीर पर बैठी नन्हीं चिड़िया की तरह ये चुनाव और बाध्यता में से कुछ भी हो सकता है. हो सकता है कि ये दोनों न हों. 

ज़िदगी ने जो लिखा है उसका पाठ सदा अधूरा था. अधूरा ही रहे कि जिस दिन पढ़ लिया गया उस दिन एक विस्तृत और रंगहीन दृश्य क़ैद कर लेगा. जहाँ कोई अनुभूति न होगी. जहाँ कोई आवाज़. कोई परछाई कोई भय कोई चाहना न बुन सकेगी.
***

हर किसी के जीवन में कितने ही द्वार खुले हैं. कितनी ही चीज़ों का आकर्षण-विकर्षण बसा हुआ है. न वह तुम्हें बताएगा, न वह सब जानकार कुछ लाभ होगा. कुछ भी कहीं क्यों है? ये जानना एक मीठी चाहत ज़रूर है मगर हर हासिल के आगे एक नयी तकलीफ है. किसी और सिम्त बढ़ जाने, कुछ और जान लेने की. 

मैं एक कोने में रखता हूँ अपना प्याला जिसमें जिंदगी नहीं वरन एक बहाना भरा है. बहाना वक़्त के गुज़र जाने के इंतज़ार का. 
***

हल्की नीली रोशनी के कालीन पर बनती हुई आदमकद छायाओं के बेढब पैबंद ठहरे हुए हैं। लोग बार चेयर पर सहारे को पंजे रखे ज़रा सीधे और बहुत से गुम बैठे, उदासियों को तरल में घोलते चुप पी रहे हैं। इत्र की ख़ुशबू में घुला हुआ धुंआ और नीम रोशनी में भी नहीं छुप पाता लोगों की बेख़याली का अक्स।

ड्रेस अप होकर, कोने के सोफ़ा पर बैठा सोचता हूँ कि क्या पहले खत्म हो जाये तो अच्छा. 
***

उस रात बहुत देर हो गयी थी।
एक पार्टी में बच्चे लोकसंगीत सुन रहे थे। मैं लॉन में एक मोढ़े पर बैठा था। अचानक उसने कहा- सर वन मोर। मैंने कहा- नो थैंक्यू। उसने जाने क्या सोच कर पूछा- आर यू वर्किंग फॉर केयर्न। मैंने कहा- नो आई वर्क्स फॉर आल इण्डिया रेडियो। उसकी शांत आँखों में पहाड़ की किसी लड़की की सूरत कौंधी होगी। उसने कहा- सर माई फेवरिट सॉन्ग इज लग जा गले के फिर ये हंसी रात हो न हो।
***

उसकी वर्दी अच्छी है। उसकी वर्दी से ज्यादा अच्छी उसकी पहाड़ी आँखें हैं। इससे भी अच्छा है कि वह कई साल से रेगिस्तान में है। उसका ये कहना सबसे अच्छा लगता है कि वह यहाँ खुश है। शायद पहाड़ के लड़के भी एक दिन जान जाते हैं कि रेगिस्तान के दुःख पहाड़ों से अलग नहीं है।

वह ज़रा झुका हुआ था, जब उसने कहा- सर, नाइस टू सी यू। मैंने समझा उसने पूछा है- ब्लैक डॉग ऐंड क्लासिक अल्ट्रा माइल्ड।
***

उल्फ़त,
अपनी कत्थई अँगुलियों से कह दो
कि वे ज़रा मेरे नाम को छू लें।
***

प्रेम कल्पना में भव्य
और असल में
जीने की साधारण ज़रूरत होता है।
***

भरे प्यालों में
खत्म होने का इन्तज़ार है,
खाली प्यालों में भरे जाने का।
***

हमेशा सुनने का मन रखना।
इससे बड़ा उपकार कुछ नहीं है।
***

[Painting by Johnny Morant]

के सी

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Kishore Choudhary is a poet and fiction writer from Barmer (Rajasthan). His writing career took a formal leap from his personal journals to make him a hugely popular blogger on two of his blogs- Kahaniyan and Hathkadh.

Having spent most of his formative years in the desert, the life there is his favourite canvas to contextualise his poetry and stories. His followers from across the world vouch for his realistic and authentic portrayal of the desert life and its typical dilemmas, fused beautifully and almost effortlessly with some stunning images of the desert and its folklore.

Kishore in a way pioneered the incorporation of pre-publishing interactions and feedback with his readers on his blogs and across social media platforms in his final works. His style is known for its lucid and unexampled metaphors that he exquisitely uses to express universal feelings like love, loneliness, hope, pain, longing and fantasy. 

His first collection of stories Chaurahe Par Seedhiyan (2012)was such a thumping bestseller that the first issue was sold out within 50 days of its launch.All the stories skilfully bring the rich and exotic background of the desert come alive and make the reader delve deeper into the layers of human emotions.This much sought after collection raised the bar for all contemporary Hindi works of short fiction and brought in a fresh change in the existing status quo for Hindi short stories. 

The second collection titled Dhoop Ke Aaiyne Mein(2013)had an array of short stories that looked at life through a multi-dimensional prism, lending each one of them a distinctive charm. Kishore being a poet first, his stories are more like poetic fiction. Having a great affinity to the stream of consciousness novels by English literary greats like James Joyce and Virginia Woolf his stories defy the conventional rules of a definitive beginning, middle and end. 

Kishore’s first publication was a collection of poetry Baatein Bewajah, an alluring and bewitching series of short poems which capture the vast expanse of human emotions and have images that have a rare haunting quality.

Kishore is a Radio Broadcaster by profession and has a special fondness for classical & folk music. Articles about him and his interviews are available across many major newspapers and websites. Kishore certainly is the Avant-garde flavour in contemporary Hindi writing and his ever expanding avid readership eagerly waits for his next chartbuster.

Kishore's latest is another collection called "Jaadu Bhari Ladki". This collection has his same imitable style of stories but the contexts and places are beyond the desert as well. 
His deep understanding of the complexity of modern relationships and how they play out in our minds, homes and workplaces makes it a very unique almost post-modern work in Hindi Fiction.

http://www.goodreads.com/author/show/7361739.Kishore_Chaudhary

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हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने या खूबसूरत स्त्री को इरादतन चूमने जितना ही अवैध है.

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