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Showing posts from 2015

पुराने जूते पहनकर नए साल में जाना

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कभी एक उदास झांक में खोये हुए बहुत दूर तक सफ़र हो जाता है. हम कहीं नहीं जाते. हमारी नज़र ठहर जाती है. मन के भीतर से लावा की तरह कुछ बहता हुआ दूर तक पसरने लगता है. ऐसा लगता है कि रंग फीके पड़ते हुए राख़ के रंग में ढलते जा रहे हैं. चारों और पसरे सूखे-भुरभुरे, पपड़ीदार या हलके दलदली विस्तार पर निगाहें अपने कदम नहीं रखती. निग़ाह ठहरी हुई स्थिर उड़ान में हो जाती है.
दुःख है?
नहीं ये एक अवस्था है. कुछ सोचते हुए खो जाने की अवस्था. ऐसी अवस्था में पंछी और जानवर दुःख नहीं करते. वे इसे भोगते हुए टाल देते हैं. मैं कई बार उनको देखता हूँ. लगभग सांस रोके पड़े हुए जानवर मृत दिखाई देते हैं. जैसे जीवन विदा ले चुका हो और नष्ट होने के इंतज़ार में देह पड़ी हो. उनको देखते हुए मैं ठहर जाता हूँ. अपने अतीत की ओर हाथ बढ़ाकर कुछ चीज़ें टटोलने जैसी कोशिश करता हूँ. जैसे कभी नाव में बैठे हुए पानी को छूने का मन होता है. उसी तरह मैं खुद को यकीन दिलाता हूँ कि हाँ अतीत के पानी पर ज़िन्दगी की नाव खड़ी है या तैर रही है.
सोच की ये अवस्था पतझड़ है.
मैं अपने आप से कहता हूँ कि चीज़ों का नष्ट होना, उनकी चाहना और नियति है. फल को खाया जा सकत…

उस रोज़ आप ये भी जान लेते हैं

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सर्द दिन की दोपहर में किसी की सलाइयाँ छूट गयी, जीने पर. रिश्तों जैसे जो धागे थे, वे उलझे होते तो सुलझाने के जतन में बिता देते नर्म सुबहें और ठंडी शामें मगर बदनसीबी ये कि वे धागे लगभग टूट चुके हैं. सलाइयों को देखता हूँ तो ख़याल आता है कि आँखें ऊन के गोले हुई होती तो उनमें सलाइयाँ पिरो कर रख देता किसी आले में. 

रात के बाजूबन्द से
झरती है, ठण्डी हवा।
* * *

सर्द आह थी किसी की
या मौसम का झौंका छूकर गुज़रा था।
* * *

वे सब जो
विपरीत होने का बोध थे,
असल में एक ही चीज़ थे.
* * *

भ्रम
प्रेम का सबसे बड़ा सहारा है.
* * *

अक्सर कोई कहता है
तुम उसे छोड़ क्यों नहीं देते
अक्सर दिल मुस्कुराकर बढ़ जाता है आगे.

जाने क्या बदा है?
* * *

उम्मीद से अच्छा
और उम्मीद से अधिक मारक कुछ नहीं है.
* * *

फूलों के चेहरे से स्याही बुहारती,
भीगी हरी घास पर रोशनी छिड़कती, ओ सुबह!
आ तुझे बाहों में भर लूँ।
* * *

इस बियाबां के दरवाज़े हैं
और सब बंद है. यहाँ कौन आता है?
* * *

उदास किवाड़ों पर
बेचैन मौसमों की दस्तकों में
दिल के एक कोने में
जलता हुआ किसी धुन का अलाव.

और सोचें उसे, जबकि वो, अब वो नहीं है.
* * *

आँखों में कुछ फूल उकेरे हुए दीखते थे
जो असल …

कितनी तहें हैं, और रंग कितने हैं

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दिसम्बर का महीना आरम्भ हो गया है. हल्की ठंड है मगर सर्द दिन ही हैं. सुबह धूप में बैठे हुए मुझे पुलिस दरोगा ओचुमेलोव की याद आई. और उसके साथ एक ग्रे हाउंड किस्म का मरियल कुत्ता और सुनार खुकिन याद आया. चेखव की कहानी 'गिरगिट' हमें बचपन में पढ़ाई गयी थी. शिक्षा विभाग ने सोचा होगा कि ऐसी कहानियां पढ़कर बच्चे सीख लेंगे. लेकिन बच्चों ने इस कहानी को पढ़ते और समझते हुए क्या सीखा मुझे नहीं मालूम मगर मैंने जो सीखा वह साफ़ सुथरा था. 
एक- मनुष्य के स्वभाव एवं व्यवहार की जानकारी लेना
दो- कथा की विषयवस्तु को अपने अनुभवों से जोड़ना
तीन- नवीन शब्दों के अर्थ जानना और अपने शब्द भंडार में वृद्धि करना
चार- नैतिक मूल्यों में वृद्धि करना
इनके सिवा जो कुछ और बातें कहानी के बारे में बनायीं जा सकती थीं, वे छात्र को आधा अतिरिक्त अंक दिलवा सकती थी. इसमें आगे हमारे अध्यापक कहते थे कि इस तरह की कहानियां पढने से कथा कौशल में वृद्धि होती है. 
कहानी आपने पढ़ी होंगी. इस कहानी में एक कुत्ता व्यक्ति की अंगुली काट लेता है. कुत्ते की पकड़ के हंगामे के दौरान सख्त और क़ानून की हिफ…

तलवे चाटते लोगों की स्मृति में

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एक पत्थर की मूरत थी, उस पर पानी गिरता था. एक सूखा दरख्त था उसे सुबह की ओस चूमती थी. एक कंटीली बाड़ थी मगर नमी से भीगी हुई. असल में हम जिसे सजीव देह समझते हैं, वे सब मायावी है. वे छल हैं. वे जागते धोखे हैं. वे असल की शक्ल में भ्रम हैं. उनके फरेब प्रेम की शक्ल हैं मगर असल में पत्थर और पानी के मेल जैसे सम्मोहक किन्तु अनछुए हैं. वे साथ हैं मगर दूर हैं. 
अचानक याद आया कि बीते दिनों मैं ज़िन्दा था. अचानक याद आया कि कोई जैनी थे, तो अचानक याद आया कि बौद्ध भी तो थे. उन्हीं बौद्धों के महामना बुद्ध की बातों की स्मृति से भरी कुछ बेवजह की बातें. 
महाभिनिष्क्रमण
साधारण मनुष्यों के लिए नहीं है।

वृद्ध, रोगी, मृतक और परिव्राजक को
देखना और समझना
छः वर्षों की कठिन तपस्या के बाद
मार-विजय प्राप्त कर
अज्ञान के अंधकार से बाहर चल देना।

ये केवल बुद्ध का काम हो सकता है।

बाकी दलाल मन उम्र भर दलाली ही कर सकता है।
उसकी आत्मा को इसी कार्य में सुख है। यही उसकी गति है, यही उसका निर्वाण।

[सम्यक सम्बुद्ध : मतिहीन प्रबुद्ध - 1]
* * *

विचित्र संयोग ही था कि
बुद्ध का जन्म, बोधि-प्राप्ति और निर्वाण
ये तीनों घटनाएं

जाने क्या बात थी, उस उदासी में

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विलासिता की चौंध से दूर. मन के नीम अँधेरे कोने में रखे किसी अहसास के करीब. खाली लम्हे में कभी सुनी गयी धड़कन की याद में डूबे हुए. बीत लम्हों की तस्वीरों से उड़कर आते रंगों के हल्के शालीन कोलाज में ज़िन्दगी है. बातें बेवजह कहने में ज़िन्दगी हैं. उसे बेहद प्रिय है मेरा इस तरह कहना. कहना कि ज़िन्दगी तुम बे परदा मेरे साथ चल रही हो. मैं तुम्हें रिश्तों और पाबंदियों में नहीं जीता. मैं किसी बोसे के गीलेपन में, किसी छुअन के ताप में और इंतज़ार की नीली शांत रौशनी में वैसा ही लिखता हूँ, जैसा महसूस करता हूँ. मैं ख़राब था और मैंने हमेशा चाहा कि ज़रा और खराब होते जाने कि गुंजाइश हमेशा बची रहे. मैं तनहा था और मैंने चाहा कि और तन्हा होते जाने के सबब बने रहे. मैं प्रेम में था और सोचा कि प्रेम मुझे किसी शैतान नासमझी के कोहरे में ढककर मुझे चुरा ले. 
यही चाहना, यही जीना है. 
मैंने जब कहानियां कहनी शुरू की तो दोस्तों ने कहा- "केसी, ये कहानियां किताब की शक्ल में चाहिए." मैं विज्ञान छोड़कर हिंदी साहित्य का विद्यार्थी हुआ था, मैंने ही मित्रों से कहा- “आपने ब्लॉग पर पढ़ ली न. अब क्या करना है इनका? मुझे लेखक य…

वादे की टूटी हुई लकीर पर

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काश बालकनी में उग आती
एक बेरी.

कोई शाख झांकती खिड़की से अंदर
कोई काँटा फंस जाता स्वेटर की बाह में.

अचानक लगता कि तुम आ गए.
* * *

उलझे होते काँटों में
और पीड़ा भरी होती पोर-पोर में.

मगर काश हम होते.
* * *

आंधियां आकर उड़ा ले जाती है गर्द
इंतज़ार आकर ढक देता है गर्द से.

तुम्हारे बिना ज़िन्दगी
आसान है या मुश्किल, कहना कठिन है.
* * *

एक तड़प सी बची है
दो धडकनों के बीच.

एक ज़िन्दगी थी सो तुम्हारे साथ चली गयी.
* * *

साँझ के झुटपुटे में
आती है उडती हुई चिड़ियाँ
दौड़ते हुए खो जाते हैं खरगोश.

रात की मुंडेर पर बैठा मैं
भर लेता हूँ दो कासे.

एक मज़बूरी से दूजा इंतज़ार से.
* * *

जैकेट की जेब के अन्दर की तरफ
छुपा लेता हूँ व्हिस्की भरा गिलास.

जैसे सहेज रहा होऊं
हताशा में उदासी
नाकामी में इंतज़ार.
* * *

रेत के धोरे की किनार पर
नदी किनारे के किसी घाट की आखिरी सीढ़ी पर
पहाड़ की तलहटी के किसी पत्थर पर बैठे हुए
आँख में एक आंसू था मगर लुढ़क न सका.

ज़िन्दगी इसके सिवा तुमसे कोई शिकवा नहीं
कि वो यूं भी न मेरा था, न वो हो सकता है.
* * *

परित्यक्त किले की
दीवार से झांक रही थी दरारें.

जाने क्यों मुझे मेरा होना याद आया.
* * *

वे गिरफ़्तार थे
एक-दूजे की बाहों…

बड़ी तकलीफ़ की छोटी कहानियां

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रात आहिस्ता सरकती रहे मगर मन और दिमाग ठहरे रहें, एक ही बात कि तुम कब तक अपने आपको सताओगे. कब तक पागलपन के झूले पर सवार रहोगे. कोई दिन आएगा? जब ज़रा सा खुद का फेवर करोगे, बिना किसी को सताए हुए. मन को कुछ समझ नहीं आता. वह बस इसी एक बात पर सहमत होता है कि फिलहाल चुप रहो कि तुम समझ चुके हो चीज़ें सरल नहीं है. इसलिए प्लीज एक बार अपना फेवर करो कि तुम वह कर चुके हो जो किसी चीज़ को टूटने से बचाने के लिए तुम्हारे लिए ज़रूरी था. वह आवाज़ तुम दे चुके हो, जिसे देना तुम्हारी ज़रूरत थी. अब तुम खुद को हर बात के लिए माफ़ कर दो. यही सब सोचते हुए कुछ एक सच्ची और तकलीफ़ भरी बातें लिखीं. आप इन्हें सच समझें या कहानी इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. इससे फर्क पड़ता है कि अपने आस पास के धोखों को जल्दी पहचानना सीखना. ताकि आप गहरे दुःख से तब बाहर आ सको जब आने का अवसर हो न कि तब जब आपकी ज़रूरत हो.  * * * 
हमारे घर में चार कमरे हैं और वहां हम दो लोग रहते हैं. मुझे बहुत डर लगता है. * * * 
जब उसने मुझे ये बात बताई कि मैं जिससे प्रेम करती हूँ वह किसी और के साथ घूम रहा है, तब मैंने उसे झिड़क दिया था. मैंने इससे बड़ी भूल कभी नहीं की.  …

मिट जाने तक कोई वैसे

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तुम इस वक़्त बिस्तर की सलवटों में गुम हो
मैं इस वक़्त हूँ तुम्हारी याद के मुहाने पर 
लड़के ने कहा- उस जादुई नदी का नाम हिनातुँ है. 
आसमान से दो सितारे एक के बाद एक टूटे. लड़का उन टूटे तारों को देखने लगा. वह भूल गया कि उसने अभी जिस जादुई नदी का नाम लिया, उसे किसी ने सुना या नहीं. आसमान से गिरते सितारे बुझते हुए अंगारों के जैसे न होकर किसी पीले उजास के कम होते जाने जैसे थे. लड़के ने अपना हाथ आगे किया कि सितारों की राख़ उसकी हथेली को चूम ले. उसकी हथेलियाँ खाली पड़ी रहीं. उन पर अगर कोई गर्द बरसी थी तो वह उसे महसूस नहीं कर पाया था. 
रात के बारह बजने को थे. वह अपने काम से घर जाते समय रास्ते के रेलवे पुल पर रुक गया था. वह खाली पुल टूटी हुई चूड़ी का टुकड़ा दिख रहा था. उसने पुल की चौड़ाई को देखकर सोचा कि ये पुल चूड़ी नहीं किसी भरवाँ कंगन का टुकड़ा है. पुल की सड़क को गहरा लाल या रात के कसूम्बल रंग में रंग दिया जाये तो ये किसी कलाई में सजा आधा कंगन हो. और वह इस कंगन की किनार पर खड़ा है.
वो गर्द नहीं आई. ये कंगन का टुकड़ा स्थिर रहा. 
रेल के इंजन की रोशनी आई. पटरियों को चूमती और बलखाती हुई. मोड़ पर बबूलों के झुरमु…

देखना उसको, जैसे पेड़ के भीतर झांकना

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ये उस साल के नम्बर की बात है जिस साल एक बूढ़ा फ़कीर अचानक सामने आ खड़ा हुआ. उसने कहा- क्या दिखाई दे रहा है? वे दोनों देर तक दूर-दूर तक देखते रहे. उन्होंने सही जवाब देने के लिए सबकुछ देख लेना चाहा. वे चाहते थे कि उनका जवाब सुनकर फ़कीर खुश हो जाये. फ़कीर ने एक हरे रंग का कुरता पहना हुआ था. उसके गले में आसमानी रंग के पत्थरों की माला थी. उसके हाथों में कत्थई रंग के मनके थे. 
फ़कीर ने कहा- मेरे बच्चे ज़िन्दगी बहुत छोटी है. जल्दी देखो और जवाब दो. 
वे दोनों अपनी चाहना के फलीभूत होने के लिए सबकुछ देखने में ही लगे थे मगर आख़िरकार फ़कीर चलने को हुआ तब उन्होंने कहा- हाँ हमने देखा. अब आप पूछिए. 
फ़कीर ने फिर वही सवाल किया- तुमने क्या देखा मेरे बच्चों? 
हड़बड़ी में वे एक साथ बोलने लगे. एक दूजे को बोलता सुनकर दोनों एक साथ रुके. फिर लड़के ने इशारा किया तुम रुको. मुझे बोलने दो. फ़कीर के चेहरे पर जवाब के इंतज़ार के सिवा कोई भाव नहीं था. 
लड़के ने कहा- एक सड़क है. इसके किनारे पेड़ खड़ा है. इसके आगे विश्वविध्यालय का मुख्य दरवाज़ा है. उस दरवाजे के प्रवेश के पास एक घुमटी है. उसमें एक गार्ड बैठा है. दूर एक टेम्पो आ रहा है. उस…

इस छुअन का कोई नाम है

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ज़िन्दगी की उदास सतर में फिर कोई बुझी-बुझी सी लहर  रात के पहले पहर. कैसी हवा है न?

लड़के ने कहा- “मौसम बदल गया है. ये हवा ज़रा ठंडी, ज़रा गरम, ज़रा बेख़ुदी से भरी हुई है.” लड़का जब ये बात कह रहा था, पीले फूल रात की स्याही से भर गए थे. बस एक साया था. घनेरा, एक रंग और चुप खड़ा हुआ. किसने सोचा था कि रौशनी के डूब जाने पर रंग अपने पूरे वुजूद में बने रहने के बाद एक स्याही से ढक जायेंगे.
“वह मुझे बुला रहा है” लड़की ने कहा. लड़के को उसकी आवाज़ न सुनाई दी. अक्षरों को पढ़कर ये जानना कठिन था कि उसकी उदासी घनी है या उसकी मज़बूरी. वह उस वक़्त क्या सोच, कर या लिख रही थी, ये ठीक-ठीक जानना असंभव था. वह अपने मन में खोयी थी या किसी से मुखातिब थी, ये कहना एक कयास लगाना भर था. लड़के ने एक उलझी हुई लम्बी सांस भरी और ख़ुद से कहा- “तुम बने रहो उसके लिए, हर हाल में हर समय. फिर भी कुछ छूट गया तो भी तुम सुकून में रहोगे कि तुमने वही जीया जिसका वादा था.”
एक बार उस लड़की ने कहा था कि सब कुछ सरल होना चाहिए. ज़िन्दगी आसान होनी चाहिए. हमें अपना समय, अपनी जगह, अपना मन जीने का हक़ होना चाहिए. मैं जहाँ चाहूँ, जब चाहूँ तब वहां जा सकूँ. क्या…

एक प्रेम अलभ्य था

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सैंकड़ों दोस्त और हज़ारों फॉलोवर में ख़ुशी की एक बूँद नहीं मिली। संख्या बढती जाती, संदेशे बढ़ते जाते, वाह-वाही बढती जाती. इस बढ़त में भी अनमना अरुचि का सागर मिला। कम ओ बेश हर कोई वही दे रहा था जो उसे स्वयं के लिए चाहिए था. जिस तरह मैं तुम्हें सराहूँ उसी तरह तुम भी आओ चंदन के शीतल लेप लेकर. बस एक प्रेम अलभ्य था. कहाँ मन था ऐसा कि किसी इसी तरह कि दुनिया बाशिंदे होते. बस जो मिला उसमें पाया कि आत्ममुग्धता के आवरण में बन्दी व्यक्तियों के संसार में रचनात्मकता एक प्रदर्शन मात्र थी। चेतना का आंकलन अनुपयोगी कचरे के ढेर से था। विमर्श और चिंतन की उपलब्धि गुणात्मक न होकर संख्या पर आंकी जा रही थी। 
प्रेम पीठ खुजाने जैसी वृतियों से परिभाषित था। 
इसलिए उचटा हुआ मन इस संसार के प्रति अनिच्छा की पुनरावृति में निबद्ध था। दम्भ अथवा चापलूसी की क्रिया अनुभूतियों से घिरे व्यक्तियों के प्रति समर्थन भरे प्रदर्शनकारी क्रियाकलापों में आबद्ध होना आतंरिक प्रवृति के विरुद्ध था। इसे जड़ता कहा जाये तो भी ये अपनी पसन्द प्रदर्शित करने के सस्तेपन से श्रेष्ठ अवस्था समझ आई। 
तुमसे लगावट जब प्रेम की सीमारेखा को स्पर्श कर भीतर की …

तुम ये क्या बना रहे हो चित्रकार?

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चित्रकार ने तस्वीर में थोड़ी सी ठंडी हवा बनाई. 
बहुत सी खाली कुर्सियां, कुछ एक लोग, हल्की रौशनी, और हल्का इंतज़ार बनाया. गलबहियां डाले हुए एक टीन-एज जोड़ा बनाया. उस जोड़े के झरता बहुत सारा प्रेम उससे अधिक उत्तेजना और उससे अधिक अबखाई बनाई. 
कि दुनिया में बहुत कम जगहें बची थी निजता भरा प्रेम जीने की. 
चित्रकार ने और जो कुछ बनाया वह किसी सड़क किनारे रेस्तराओं का सिलसिला था. वहां लेम्प पोस्ट थे. उनपर धर्मेद्र और हेमा के जमाने की फिल्मों के पोस्टर लगे थे. चित्रकार ने अमिताभ का कोई पोस्टर न बनाया. इसलिए कि अपनी 'डैन' में आराम करते हुए राजेश खन्ना के चेहरे पर एक अफ़सोस रखा था कभी-कभी हम ऐसे लोगों का साथ दे देते हैं, जिनमें सिर्फ दूसरों के पाँव काटकर खुद के लिए सीढियाँ बनाने का हुनर होता है. 
चित्रकार ने एक इंतज़ार बनाया. जैसे रंग बनाने वाले बोर्ड पर नीले रंग की ओर बहता हुआ कोई और रंग. उसने टेबल के नीचे पैरों में हरकत बनायीं. उन हरकतों में छुअन भरी. छुअन में अपनापा बनाया. और जिस आदमी पर छुअन के छींटे बनाये उसी आदमी के चेहरे पर एक सवाल बनाया. कि काश तुम एक पारदर्शी रंग होते. 
चित्रकार थक गया…

एक तेरे आने की, याद के सिवा

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तल्ख़ दिन  अचानक बरसों पीछे छूट गए. 
खिड़की और दरवाज़ों के पल्ले वेगवती हवाओं से अपने आप उढक गए. एक बार सब कुछ कांपा और फिर शांत हो गया. बरसों से कोई अँधेरा गर्द की चादर के नीचे पड़ा हुआ था. कसक से भरे विकल मन की कोई ठांव न थी. अव्वल तो ज़िन्दगी कहने लायक तकलीफें देती ही नहीं है. फिर भी कोई ऐसी तकलीफ़ जिसे मनमीत से बाँट सकें तो भी उम्र की छीजत इस सुख को भी छीन लेती है. 
अब कहाँ बचा है कोई मीत.
दूरतक एक उजाड़ उदासी है. आबाद चीज़ें बेपर्दा हो गईं है. कोई सुख एक स्मृति है और अधिकतर स्मृतियाँ सुख नहीं हैं. अधिकतर माने जिस तरफ टटोलिये उखड़े हुए पैबंद हैं. ज़िन्दगी जो हादसों की शक्ल में सीख देती है वे सीखें बहुत कुछ छीन लेती है. यकीन, आसरा, उम्मीद, दिलचस्पियाँ... सब पर धब्बे पड़ जाते हैं. ऐसे तेजाबी धब्बे जिनसे सिर्फ दाग नहीं छेद बनते हैं. 
एक कंधे पर लटकने वाला थैला तब तक साथ रखने का मन है जब तक दुनियादार हूँ. इस पर लिखा है आखिरी उम्मीद. जैसे कि आखिरी में आप फिर से एक जुआरी की तरह हारते जाएँ. इससे ज़िन्दगी ज़रा आसान लगती है. आसान कुछ नहीं होता बस भुलावा है और भुलावा बड़ी चीज़ है.


सब्र के प्याले को खाली न …

तुम जो मिलोगे इस बार तो

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उदासी के झोंके ने  गिरा दिया शाख से पत्ता 
ज़िंदगी को इतना भी यूनिक क्यों होना चाहिए कि जीया हुआ लम्हा बस एक ही बार के लिए हो. कुछ क्लोन होने चाहिए कि हम उसी लम्हे को फिर से जी सकें. एक याद का मौसम जब भी छू ले, उसी पल कोई दरवाज़ा बना लें. दरवाज़े के पीछे एक छुअन हो. एक लरज़िश हो. एक धड़क हो. इस तरह याद जब उदासी और नया इंतज़ार घोले, उससे पहले हम उसी लम्हे को फिर से बुला लें. 
जिस तरह गिरते हुए पत्ते ख़ुद को धरती को सौंप देते हैं, उसी तरह कभी हम ख़ुद को प्रेम को सौंप दें. प्रेम लुहार की तरह हमें लाल आंच में तपाकर बना देगा कोमल. किसी बुनकर की तरह बुन देगा एकसार. किसी राजमिस्त्री की तरह चुन देगा भव्य. 
वह जो दरवाज़े के पीछे अँगुलियों के रास्ते बदन में उतर आई लरज़िश थी. वह उसी एक पल के लिए न थी. उसका काम बस उतना सा ही न था. 
तुम जो मिलोगे इस बार तो पूछेंगे ये हवा क्या है, उदासी कैसी है और तन्हाई कब तक है? 

ये भी तो किसने सोचा था कि

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एक ठहरी हुई सांस 
बेचैन निग़ाह में उदासी घोलती है.
बारिश नहीं थी मगर थी. एक आवाज़ ने बुनी बारिश. एक सूखी रात का ये पहला पहर था. बंद आँखों में कहीं दूर हिलते हुए होठ खिले थे कि कोई संगीतकार, साजिंदों को अपनी छड़ी से प्रवाहित कर रहा था. मुझे उसे कहना था कि सांस लेने में कठिनाई है. मगर उसकी आवाज़ दवा थी. एक ठहर के बाद प्रतिध्वनी गूंजती. क्या बारिश रुक गयी है? कोई जवाब आता. तीन बार. वह जवाब मुझे बाहर बारिश की ओर खींच ले जाता. उसकी आवाज़ में बारिशें बुनने का हुनर था. 
क्या हम पहले कहीं मिले थे? अगर नहीं तो फिर ऐसा क्यों लगता है कि तुम बिन कुछ नहीं. बचपन में पढ़ी प्रेम कहानियों से ऊब होती थी. ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई दो, एक होकर अंतिम विदा का गीत गाकर चुप हो जाते हैं. बचपन में रूह का नाम न सुना था. तब सिर्फ प्रेतों के किस्से थे. शाम के धुंधलके में बाहर जाना निषेध था. ये प्रेतों का समय था. ये भय और जिज्ञासा के मारक मिलन का समय था. 
काश, बचपन में रूह का कोई किस्सा सुना होता. रूह के मिलने का समय मालूम होता. यकीनन मैं उस समय को अपने भटकने के हिस्से में जमा रखता. 
कि कहीं रूह मिले. 
तो क्या तुम रूह हो…

उदासी नींद, बावरा स्वप्न

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सिसकियाँ ख़ामोशी हिचकी और ज़रा ठंडी हवा

रात जिस ढलान पर चली थी, सरकती गयी. हलकी स्याही में एक वही पुराना स्वप्न. जो पहले भी कई बार देखी हुई जगहों से होकर गुज़रता है.

घर के आँगन के बीच दक्खिन में एक पानी जमा करने का भूमिगत हौद बना हुआ है. इसकी जगत ज़मीन से तीन एक फीट ऊँची है. इस हौद की छत एकदम पारदर्शी. पानी भी इसमें ऐसा कि दस फीट नीचे तल में पड़ी हुई सुई को देखा जा सके.

प्यास लग आई.

हम दो लोग थे वहां पर. मैंने पानी खींचने के लिए टाँके यानी हौद के अन्दर देखा. वहां एक धारीदार लम्बा घोड़ा पड़ा हुआ था. वह टाँके के तल पर लेटा हुआ सा जान पड़ता था. मगर मैंने समझ लिया कि घोडा पानी के अंदर है तो मर चुका है. मन में एक चिंता आई कि पानी दो दिन बाद सड़ जाएगा. अब उस घोड़े को बाहर निकालने के लिए एक लम्बे बांस के सहारे रस्सी का फंदा बनना था. उस फंदे को घोड़े की किसी टांग में डालकर बांस निकालकर फिर रस्सी के सहारे घोड़े को उपर खींच लेना था.

घोड़े को निकालने के लिए कुछ सामान चाहिए थे.

एक दूकान है. जो कि ज़मीन से चार पांच फीट ऊँची है. उसके आगे सीढियां है और एक तीन फीट का रास्ता है. वहां से फुटबाल की पेलेंटी लेन…

तेरे बाद की रह जाणा

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मौसम ऐसा है कि कमरे अंदर ठंडे और बाहर गरम। प्लास्टिक के सफ़ेद छोटे कप चाय से भरे हुए। नया हारमोनियम।। जमील बाजा के बारे में कुछ और बताते हुए गुनगुनाना शुरू करते हैं। तेरे बाद की रह जाणा... मैं कहता हूँ गाते जाइए। जमील मुस्कुराते हुए स्वरपटल पर अंगुलियां रखे हुए अपनी आँखें मेरी आँखों में उलझा देते हैं। मैं डूबता जाता हूँ। सचमुच तुम्हारे बाद जीवन में क्या बचा रह जायेगा। उदासी, तन्हाई और बेकसी। आकाशवाणी के विजिटर रूम में ढोलक की हलकी थाप से सजी संगत और सिंधी-पंजाबी के मिले जुले मिसरों का मुखड़ा, गहरी टीस से भरता रहता है। 
जमील अपने कुर्ते के कॉलर ठीक कर एक लम्बे सूती अजरक प्रिंट के अंगोछे को गले में डाल कर बिना सहारा लिए आँगन पर बैठे हैं। ग़फ़ूर सोफे पर बैठे हैं। मैं अधलेटा सोफे का सहारा लिए सामने खिड़की की ग्रिल पर पाँव रखे हुए। मैं कहता हूँ ये हारमोनियम कितने का आया? ग़फ़ूर कहते हैं कल ही अट्ठारह हज़ार में लिया। मैंने पूछा कलकत्ता का है? बोले- नहीं! पंजाब की बॉडी है और सुर... मैं कहीं खो गया कि ये न सुन पाया सुर कहाँ के हैं। मेरा मन उकस रहा था कि कहूँ कोई बिछोड़ा सुना दो। ऐसा विरह गीत की आँख भ…

उस रुत झड़ गये थे पत्ते, इस बार?

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अलमारी की ऊपरी दराज़ में यूएसबी केबल्स रखीं हैं। अंगुलियां उनमें उलझकर सब्र भूल जाती हैं। सब्र जो पहले से ही चुकता जा रहा था। एक पतली पन्नी चाहिए। जिसमें कुछ साल्ट रखे हों। किसी कोने में अँधेरे और ठण्डी दीवार के सिवा कुछ हाथ नहीं लगता। 
रात ठहर गयी है। आधे रास्ते में कोई और काली दीवार आ खड़ी हुई। रात को दीवार के पार कोई रास्ता नहीं है। रोशनियाँ नाकाम टूट-टूट कर वहीँ गिर पड़ती हैं जहाँ से उगी थीं। हर रौशनी रेंगने से लाचार तलछट को पीलेपन से रंगकर खो जाती है। 
अचानक साँस की लड़ी टूटती है। एक अल्पविराम। अगली साँस के लिए कुएं से रहट खींचते हुए निर्जन उजाड़ चुप टोह लेता है। एक लहर सी पंजों से सर तक दौड़ती है। ज़हर की तड़प से भरी आंत के मरोड़ जैसी। 
धप धप धप... सीढ़ियों पर थके अबकाये कदम कभी तेज़ कभी दीवानावार पहले तल से दूसरे तल और कभी छत पर। अलमारियों, दराजों और किताबों के आलों में पीछे छूटी जगहों पर हाथ घूमकर टटोलते हुए पन्नियों की तलाश खत्म नहीं होती। एक ऐसी गोली, ऐसा रसायन, ऐसा जैसे जान बख़्श दिए जाने की आस जगे। मगर नहीं मिलता।
मौसमों की बड़ी बातें लिखीं। उनकी बेवफ़ाई और मेहरों पर तकरीरें की मगर भूल…

ढब सब उलटे पड़े हो जहां

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इंतज़ार की कोई मियाद नहीं होती.
तपते हुए दिन और रेगिस्तान पर कुछ एक हरे टप्पे से दीखते खेत पीले पड़ते जा रहे थे. कोई राह में मिलता तो कहता इस बार जमाना ख़राब. फसलें कहीं कहीं दिख रही हैं बाकि सब जगह सुनसान. वो सप्ताह भर जो पानी बरसा था जाने किस काम लगा. भीगे दिन भीगी रातें और धूप का इंतज़ार. कुछ एक दिन बाद बरसातें इस तरह गुम हुई कि गोया रेगिस्तान सदियों से सूखा ही था. कल शाम अचानक से हवा चली और ज़रा देर बाद शहर को भिगो गयी. एक बारिश सब कुछ बदल देती है. रात अँधेरी, छपरे पर गिरती पानी की बूंदों की आवाज़. कुछ एक मुरझाई हुई ककड़ी कि फांकें. उनका फीका स्वाद. और एक पुरानी व्हिस्की से भरा प्याला. कितना तो इंतज़ार था और कैसे अचानक खत्म हो गया. उसकी इतनी ही उम्र थी. रात भर बिजली गुल. हवा बंद. आसमान से छींटे. पलंग पर से भारी गद्दों को उठाकर बाहर बालकनी में डालकर लेटे हुए, भूले भटके आते हवा के झोंकों को शुक्रिया कहते हुए रात बीत गयी. 
असल नींद उस वक़्त आई जो शैतानों के सोने का समय होता है. 
स्मार्ट फोन में बेटरी के सिवा हर बात में स्मार्टनेस है. वह तुरंत दुनियावी षड्यंत्रों, जालसाजियों, धोखों, उदासियों…

तन्हा और खुश रहना

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तुम जब पूछते हो कि इस जीवन में स्वयं का परिष्कार करने का ढंग क्या है ? मैं उस वक़्त अपने आपको देखता हूँ. मुझे वहां एक ही बात दिखाई पड़ती है कि मैंने जीवन को साधने के यत्न करने की जगह उसका आनन्द लिया है. ख़ुशी क्या है? ये समझ आये तो उसके लिए जीयो. बस. क्योंकि जीवन को यंत्रों, सींखचों और आदर्शों में बांध कर किसी विशेष रूप में ढालना मुझे अच्छा नहीं लगता. तुम्हें मालूम है कि मेरे पास कई बांसुरियां हैं. मेरे बच्चे उनसे डांडिया खेलने लगते थे. वे प्रिय बांसुरियां टूट जाती थी. मैं नयी बांसुरी ले आता था. जहाँ से बांसुरी खरीदता रहा हूँ वहां बांसुरियां संदूकों के अँधेरे में पड़ी होती थी. मैं उनको छूकर देखता. उनके रंग और आकर को देखकर अपने साथ ले आता. घर लाकर उनको किसी दीवार पर टांग देता या वे मेरी अलमारी में पड़ी रहती थी. जाने कितने ही बरस हुए वे बांसुरियां मेरे साथ हैं. वे मुझे प्रिय हैं मगर मैं उनको बजाता नहीं हूँ. कभी किसी रोज़ कोई बांसुरी मेरे होठों से लगकर बजने लगेगी तब तक के लिए मैं खुद को किसी ऐसे परिश्रम में नहीं झोंकना चाहता हूँ जहाँ मन न हो बस बांसुरी बजाने का गुण आने की चाह हो. मेरी ही तरह …

स्थायी दुःख से कैसलिंग

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काश बहुत से हैं जैसे गिरहें जब पैर में उलझी तब गिर पड़ने की सीख को पहले उठाया होता और ख़ुद बाद में उठता. आज ढलती हुई शाम में रेल पटरी पर बने पुल से गुज़रते हुए सोच रहा था कि पुल के उपर से देखने पर नीचे का दृश्य ज्यादा समझ आता है. इसी तरह जीवन बिसात को देखा समझा होता. बीते दिनों के किसी अफ़सोस की दस्तक के साथ फिर एक काश आता है. काश उन दिनों कुछ सोचा जा सकता परिस्थिति से थोडा ऊपर उठकर.
एक गिर पड़ने का ख़याल और एक ज़रा उपर से गिरहों को देखने की समझ. थोडा सा फासला कितना कुछ बदल देता है. सुख के भेष में दुखों को आमंत्रण पत्र लिखते समय सोचा होता कि रेगिस्तान के तनहा पेड़ सूखे के स्वागत में कुछ ज्यादा रूखे और ज्यादा कंटीले हो जाते हैं तो हमने ख़ुद के लिए क्या तैयारी की है?
मगर कुछ नहीं होता.  बेख़याली में समय की ढलान पर फिसलते हुए दिन रात, बरस के बरस लील लेते हैं. इस छीजत में उदास काले धब्बे, अनामंत्रित खरोंचें, अनगढ़ सूरत बची रह जाती है. दुःख आता है कि बीते वक़्त रिश्तों, सम्मोहनों और कामनाओं के प्रवाह में किनारा देखा होता. खो देने के भय में लुढकते खोखले ढोल से बाहर आ गए होते. सोचा होता जिस तरह पुराने …

नासमझी के टूटे धागों में

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कुछ काम अरसे से बाकी पड़े रहते हैं. उनके होने की सूरत नहीं बनती. कई बार अनमने कदम रुकते हैं और फिर किसी दूजी राह मुड़ जाते हैं. फिर अचानक किसी दिन पल भर में सबकुछ इस तरह सध जाता है कि विश्वास नहीं होता. क्या ये कोई नियति है. घटित-अघटित, इच्छित-फलित भी किसी तरह कहीं बंधे है? क्या जीवन के अंत और उसके प्रवाह के बारे में कुछ तय है? मैं अक्सर पेश चीज़ों और हादसों और खुशियों के बारे में सोचने लगता हूँ. अब क्यों? अचानक किसलिए? और वह क्या था जो अब तक बीतता रहा. मुझे इन सवालों के जवाब नहीं सूझते. एक चींटी या मकड़ी की कहानी कई बार सुनी. बार-बार सुनी. निरंतर असफल होने के बाद नौवीं या कोई इसी तरह की गिनती के पायदान पर सफलता मिली. मैं यहाँ आकर फिर से उलझ जाता हूँ. कि पहले के जो प्रयास असफल रहे वे असफल क्यों थे और एक प्रयास क्यों सफल हुआ.
हम कब तक जी रहे हैं और हम कब न होंगे. आदेश श्रीवास्तव. अलविदा. गीता का संदेश इसी नासमझी का सन्देश है कि कर्म किये जा और फल की इच्छा मत कर.  _____________________
हाथों में आ गया जो कल रुमाल आपका
मेरा पेशा ही इतना मीठा है कि कभी खुद पर रश्क़ होने लगता है. रेडियो स्टेशन…

सुनो [जा]ना, व्यर्थ अभिमाना- 2

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मेरे पास दो रास्ते नहीं है. मेरे पास दो मन नहीं है. मेरे पास दो कुछ नहीं है. मैं रूई का फाहा हूँ. जब तक डाल से बंधा हूँ, डाल का हूँ. जब हवा से मिलूँगा तो उसका हो जाऊँगा. मैं पहले कहाँ था, मैं अब कहाँ हूँ और मैं कल कहाँ होऊंगा, इसकी स्मृति और भविष्य कुछ नहीं है. मैं जब शाख पर खिल रहा था, प्रेम में था. मैं जब हवा से मिला प्रेम में रहा. मैं जब धूल में मिलूँगा तब प्रेम में होऊंगा. मेरा उदय और मेरा अस्त होना एक ही क्रिया की भिन्न अवस्थाएं हैं. 
मैं सुनता हूँ तुम्हारी आवाज़ में एक कोमल धुन. जो इस तरह कोमल है कि फरेब भरी जान पड़ती है. पत्थरों पर पानी तभी तक पड़ा रहता है जब तक धूप का संसर्ग न हो. तुम्हारी भाषा भी कुछ विषयों पर बदल जाती है. मगर मैं जो था वह हूँ, शायद वही रहूँ. कुछ रोज़ से फिर अपनी पढ़ाई के दिन याद आ रहे थे. कुछ रोज़ से एक छूटी हुई पोस्ट याद आ रही थी. आज सुनो आगे की बात....  ______________________
कितने-कितनों को संदेशे भेजे
कितनों के मन की शाखों पर अपने सुख का झूला, झूला.
कितनों की बुद्धि पर झूठे नेह की कलमें रोपी.

सुनो जाना,

आवाज़ों का रेला आता
कर्म-मल गहराता जाता.

संवर के बा…

अपनी अँगुलियों से कह दो

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मौसम किसी उदास परिंदे के बदन सा था. थकन से भरा और अनमना. 
विचित्र छायाओं के स्याह-सुफेद चित्र बनाते हुए बादल ठहर-ठहर कर किसी यात्रा में फिर शामिल हो जाते. हवा ख़याल से अचानक बाहर आये बच्चे की तरह टोह लेकर फिर से अपने आप में गुम हुई जाती थी. तन्हाई की स्याही से बदन के कोरेपन पर शाम लिख रही थी- कोई तुमसा नहीं होगा प्यारे. तुम अकेले ही थे. तुमने अपने असल अकेलेपन से घबराकर सम्बन्धों का चुनाव किया. ये भी हो सकता है कि वह एक चुनाव न होकर किसी हड़बड़ी में कहीं छुप जाना भर हो. घर के छज्जे के नीचे शहतीर पर बैठी नन्हीं चिड़िया की तरह ये चुनाव और बाध्यता में से कुछ भी हो सकता है. हो सकता है कि ये दोनों न हों. 
ज़िदगी ने जो लिखा है उसका पाठ सदा अधूरा था. अधूरा ही रहे कि जिस दिन पढ़ लिया गया उस दिन एक विस्तृत और रंगहीन दृश्य क़ैद कर लेगा. जहाँ कोई अनुभूति न होगी. जहाँ कोई आवाज़. कोई परछाई कोई भय कोई चाहना न बुन सकेगी. ***
हर किसी के जीवन में कितने ही द्वार खुले हैं. कितनी ही चीज़ों का आकर्षण-विकर्षण बसा हुआ है. न वह तुम्हें बताएगा, न वह सब जानकार कुछ लाभ होगा. कुछ भी कहीं क्यों है? ये जानना एक मीठी चाहत …