September 25, 2010

शोक का पुल और तालाब की पाल पर बैठे, विसर्जित गणेश

[4] ये हमारी यात्रा की समापन कड़ी है.

सड़क एक पुल में बदल गई है. यह पुल चार साल पहले आई एक नदी की स्मृति है और सैंकड़ों परिवारों का शोकगीत है. इसे आश्चर्य कहते हैं कि रेगिस्तान में सौ साल में एक बार नदी बहती है. यह आश्चर्य शीघ्र ही दुःख में तब्दील हो जाता है. जब भी यहाँ से गुजरता हूँ तो वही दिन याद आते हैं, रेगिस्तान में बाढ़ के दिन... हम एक हेल्प लाइन प्रोग्रेम कर रहे थे. जिले के आला अधिकारियों और बाढ़ में फंसे हुए लोगों को मोबाइल और रेडियो के जरिये जोड़े हुए थे. लगान फिल्म का भजन बज रहा था कि मेरा फोन चमकने लगा. ये मेरा निजी नंबर था मगर बेसिक फोन्स के ठप हो जाने के कारण इसे ऑन एयर कर दिया गया था. एक श्रोता का फोन था. उसने कहा "मेरे सामने सौ फीट दूर हमारे पड़ोसी का पक्का घर है, उस पर पांच लोग बैठे हैं और वे डूबने वाले हैं... वे नहीं बचेंगे और हम भी कुछ नहीं कर सकते." मैं उनके फोन को कंट्रोल रूम में ट्रांसफर करता हुआ रेडियो पर सहायता दल को लोकेशन के बारे में बताता हूँ. तभी उधर से आवाज़ आती है "वे डूब गए... " मैं ऑन एयर चल रहे फोन का फेडर डाउन कर देता हूँ.

असहाय, हताश और चिंतित उस श्रोता को फोन लगाता हूँ और खैरियत पूछता हूँ. वह कहता है, हम अभी बचे हुए हैं. रेत का पचास फीट ऊँचा धोरा बह गया है और पानी आया तो शायद हम भी मुश्किल में हों. कंट्रोल रूम से फोन आता है कि आपने लोकेशन सही बताई है ? मैं कहता हूँ कि हाँ... उधर से दबी हुई आवाज़ आती है हमारे ऐ डी एम साहब ठीक इसी लोकेशन पर हैं और उनसे संपर्क टूट गया है. वे भी बह गए थे. एक बड़े पेड़ के सहारे से बचे. उन फोन काल्स को सुनना और प्रकृति के सामने बौना हो जाना घोर विवशता थी.

सड़कें टूट गई, बिजली गुल हो गई फोन सेवाएं ठप हो गई थी. एक मात्र नेटवर्क काम कर रहा था लेकिन मोबाइल की बेट्रियाँ जवाब देने लगी. रेगिस्तान की बाढ़ में दो सौ पच्चीस लोग लापता हो गए. वे शव यात्राओं के दिन थे, हर दिन... टेलीफोन के पुराने पोल्स पर जानवरों के शव तैरते हुए अटके थे. बचाव कर्मी डूब गए तो वायुसेना में मातम पसर गया. चार दिन बाद एक दुर्गंध फैलने लगी. महामारी की आशंका के बीच देश भर के बचाव और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के दल पहुँच गए थे. यूपीए की चेयरपर्सन ने देखा और अफ़सोस जताया. सच में ये पुल उन्हीं शोक के दिनों की स्मृति से बढ़ कर कुछ नहीं है.

पुल और मेरा पैतृक घर तीन किलोमीटर के फासले पर हैं. घर को याद करते ही दुखों के आवेग कम होने लगते हैं. हरे खेतों में तना हुआ लाल पीले रंग वाला शामियाना कितना सुंदर दिखता है. यहाँ एक विवाह का भोज है. मेरे बेटे को जीमण का बहुत कोड (चाव) है. वह इस तरह के समारोहों में डट कर खाता है और भोजन के स्वाद की कड़ी समीक्षा करता है. यहाँ आकर हम सुख से भर जाते हैं जैसे शहर की भीड़ में खो गए थे और फिर से ठिकाने लग गए हैं. ग्रामीण आत्मीयता को बहुराष्ट्रीय तेल कंपनी निगल चुकी है फिर भी अपनों के चेहरे देखना सुकून देता है. जाने क्यों मुझे यकीन है कि मैं यहीं पर अपना घर बनाऊंगा. इसी सोच में अपनी पत्नी को देखता हूँ. मारवाड़ी पहनावे में वह कितनी सुंदर दिखती है. पलक झपकते ही, वह घर के आँगन में पचरंगी ओढ़णों से बने रंगों के कोलाज में खो जाती है.

हम लौटते समय उतरलाई नाडी पर रुके. मैं चाहता था कि बेटा इसे करीब से देखे, इसके पानी को छुए. वह तालाब के पानी पर पत्थरों को तैराने की कोशिश करने लगा और मैं चबूतरे पर बैठा रहा कि हवा अच्छी लग रही थी. किनारे पर बहुत सी गणेश भगवान की मूर्तियाँ रखी थी. यहाँ पानी की कीमत है इसलिए गणेश पूजन के बाद विसर्जित की जाने वाली गणेश प्रतिमाओं को स्थानीय ग्रामीण तालाब में डालने के स्थान पर पाल पर रखवा लेते हैं. एयरफोर्स में नौकरी करने वाले मराठी परिवार इस रेगिस्तान में गणेश विसर्जन के लिए समंदर का किनारा नहीं पा सकते लेकिन फिर भी विसर्जन तो होना ही है ताकि भगवान अगले साल फिर से आये. भगवान हमेशा साथ रहें तो उनके आने का रोमांच नहीं रहता.

एक मूषक पर सवार गणेश प्रतिमा को देख कर बेटा पूछता है कि पापा ये चूहा इतना बड़ा क्यों है और भगवान इतने छोटे क्यों हैं ? मैं उसकी गहरी भूरी निश्छल आँखों में झांकते हुए कहता हूँ. बेटा, चूहे को भगवान ने बनाया है और भगवान को इंसान ने...

September 22, 2010

आओ शिनचैन लड़कियों के शिकार पर चलें

[3]
मैंने दादा के घर के बाहर फैली खुली साफ़ सुथरी रेत पर पहली बार एक गुबरैले को देखा था. तब मेरी उम्र पांच सात साल रही होगी. वह मेरे लिए विस्मय का कारक था. खुद उल्टा चलता हुआ गोबर की एक गेंद को लुढ़काता हुआ चला जा रहा था. विस्मय व्यक्ति के सुख और दुखों की तात्कालिक अनुभूति होती है. इसी से सारे रसों का बेहतर स्वाद मिलता है. किसी की सुन्दरता को देख कर जब मैं विस्मित होता हूँ तो मुझे श्रृंगार रस के तत्व याद आते हैं. इक्यानवे-बानवे के दिनों में एक सुंदर सी दिखने वाली लड़की से मिलने की तमन्ना मचलती रहती थी. आख़िरकार हम मिले और मैं विस्मित था. इस पहली मुलाकात का हासिल सिर्फ उदासी थी. इससे उबरने के लिए कई और मुलाकातें जरुरी थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ. मेरा विस्मय निर्जीव होकर ठहर गया. बरसों सोचे गए दृश्यों के उलट तस्वीर देखना भी विस्मित करता है.

बेटे से अविश्वसनीय घटनाक्रम वाली कहानी सुन कर मैं खो गया था. मुझे एकाएक गंभीर अफ़सोस हुआ कि इसके विस्मय को छल लिया गया है. अमेरिकी कार्टून करेक्टरों में नए विस्मयबोध की लालसा में निरंतर रचे गए अतिरंजित हादसों और उनसे उबरने के तरीकों को देख कर मेरे बेटे में स्वभाविक आनंददायी घटनाओं के प्रति रूचि नहीं बची है. आशा के लिए निराशा को रचना एक बाध्यता है. इसी बाध्यता ने कई काल्पनिक शैतानी दुनिया रची और एलियंस को चित्रित किया और उन पर जीत के लिए सुपरमैन को रचा. हम सुपरमैन से ऊब गए तो बैटमैन, शेडोमैन, हीमैन, होलोमैन, स्पाइडरमैन जैसे असंख्य चरित्रों के निर्माण को बाध्य हुए. व्यक्ति एक रहस्यमयी शक्ति चाहता है ताकि वह रोजमर्रा के जीवन में एक अद्भुत रोमांच को तलाश सके. इन्हीं काल्पनिक विराट व्यक्तित्वों की छाया में हमारे आधारभूत सुख और दुःख अनचीन्हे रह जाते हैं और उनेक आगमन के समय हमें विस्मय नहीं होता. तब कोई काल्पनिक चरित्र काम नहीं करता.

दूरदर्शन पर नब्बे के दशक में ऐसा ही एक भारतीय पात्र भी बच्चों के मुख्य आकर्षण का केंद्र था. देश भर में उसे देख कर बच्चों ने अपने घरों की छतों से छलांगे लगा दी थी. मैं जिस स्कूल में पढ़ा करता था, उसके सामने तापड़िया सर का घर था. उनका बेटा भी कथित रूप से इसी धारावाहिक को देखने के बाद अपने पांवों पर बारदाना बाँध कर दो मंजिल से कूद गया था. यह एक सम्मोहन है. अद्वितीय और अलौकिक शक्तियों को प्राप्त करने की आदिम चाह का आधुनिक रूप है. गंभीर किस्म का अफ़सोस ये है कि इसका लक्षित वर्ग बेहद कोमल और कच्चा है.

एक दिन मैंने बेटे से कहा. चलो, अपन दोनों शिनचैन और उसके पापा की तरह लड़कियों के शिकार पर चलते हैं. वह मुस्कुराया नहीं उसकी मुद्रा बेहद गंभीर हो गयी कि मैंने गलत प्रस्ताव दिया है. इस उम्र में उसने इस तरह के कार्यक्रमों के प्रयोजन जान लिए हैं. उसने मेरी इस हरकत पर मुझे एक वरिष्ठ नागरिक की तरह समझाया. सच में आठ दस साल के बच्चों के लिए रचे गए ये जापानी चरित्र उनका सहज बचपन छीनते जा रहे हैं. शिनचैन अपने पापा से कहता है "ओ हो मैंने सोचा आप मेरे साथ कबड्डी खेलोगे मगर आप तो सिर्फ मम्मा के साथ खेलते हो..." इतना कहते ही उसके गालों पर खिलते सूरज जितनी लाली का स्केच बन जाता है.

मुझे आज के दिनों की तुलना अपने बचपन से नहीं करनी चाहिए. समय के आरोहण ने हमें अलग मक़ाम पर लाकर खड़ा कर दिया है लेकिन जो नुकसान हो रहा है वह द्रुतगामी है और संवेदनशील है. मैं बाइक पर पीछे बैठे बेटे से पूछता हूँ, छोटे सरकार कभी खेत में हरे सिट्टों को छू कर देखा है ? वह प्रतिप्रश्न करता है, कैसा लगेगा ? मैं चुप कि एक अपराधबोध भीतर कुनमुनाता है. बच्चों को दिये गए लम्बे भाषण याद आते हैं. ये नहीं करना, वो नहीं करना मगर करना क्या ? इसका हमको भी नहीं पता... ऐसे ही सोच भागी चली जा रही थी और दूर तक काले - पीले सिट्टों से झूमते हुए खेत हमारे साथ भाग रहे थे.

September 20, 2010

हरे रंग के आईस क्यूब्स

[2]
दक्षिण अफ्रीकी देश से आया कोयले का चूरा उड़ रहा है. हर सप्ताह कत्थई लाल रंग के बीस डिब्बों वाली एक रेल गाड़ी आकर उतरलाई स्टेशन पर रुकती है. दूर देश की खदानों का कोयला ट्रकों में लादा जाता है. काले रंग की गर्द रेलवे ट्रेक से होती हुई चारों और बरसने लगती है. ये कोयला हाल ही में रेगिस्तान में उग आये थर्मल बिजली कारखानों तक जाता है. दिन के दो बजने को है, जोधपुर जाने वाली पेसेंजर के निकलने का समय है. उन्नतीस रुपये में दो सौ दस किलोमीटर का सफ़र, डिब्बे भरे हुए और सफ़र से बंधी आशाएं सरपट भागती हुई.

उत्तरलाई स्टेशन से तीन सौ मीटर दूर एक नाडी है. रेल छूटती है और हम एक दिशा में चल रहे हैं. सोचता हूँ कि घर से बाहर आते ही मैं रूपांतरित होने लगता हूँ. पुराने सुख दुखों के बीच नए रंग की कोंपलें मन की धरती को फोड़ते हुए खिलने लगती है. अभी थोड़ी देर पहले पत्नी का इंतजार कर रहा था और सोच रहा था कि क्या वाकई हर व्यक्ति के लिए घर बनाना अनिवार्य है ? मेरे पास बहुत पैसे नहीं है कि घर बना सकूँ. हम दोनों ने सत्रह अट्ठारह साल उस घर के लिए दिये हैं जिसने हमें जीवन दिया है. इन सालों की कमाई से जो बचा वह बस थोड़ा सा प्यार है. मैं अभी तक उसके लिए घर नहीं बना सका, घर तो क्या ज़मीन का एक टुकड़ा भी नहीं खरीद सका जबकि ये उसकी बहुत बड़ी ख्वाहिश है. क्या वो इसके बावजूद भी उतना ही प्यार करती है ?

बेटा कहता है, पापा रेल से आगे निकलें. मैं पूछता हूँ कि क्यों ? वह कहता है मजा आएगा. इसका अभिप्राय हुआ कि किसी को पछाड़ कर आगे निकलने में मजा है. मेरे हाथों में बहुत से हाथ थे वे बारी बारी से मुझे पीछे छोड़ते हुए आगे निकल गए थे, उनको भी बहुत मजा आया होगा ? फिर मैं मन में सोचता हूँ कि सामने की नाडी तक अगर हम पहले पहुंचे तो जो सोचा है, वह हो जायेगा. रेल के पास सैंकड़ों पहिये हैं. इन पर सवार होकर कितने ही सुख सात समंदर पर चले गए हैं और मैं उससे होड़ करने चला हूँ. सड़क के किनारे जिप्सम खोद लिए जाने के कारण चौकड़ियाँ बनी हुई है. उनमे बरसात का पानी भरा है दूर से देखो तो लगता है कि फ्रीज़र में बर्फ जमाने के लिए हरे रंग के पानी की विशाल आईस ट्रे रखी है. सर्दियों तक ये पानी बचा रहा तो हरे रंग के आईस क्यूब्स कितने सुन्दर दिखेंगे.

रेल पास ही है. मैं नॅशनल हाईवे पर रफ़तार नहीं बढ़ाता हूँ कि मैं जबरन नहीं जीतना चाहता. रेल, परी लोक को जाती हुई सी है रंग बिरंगे ओढने खिड़कियों से बाहर थोड़ा सा उड़ते हुए. डिब्बों के दरवाजों पर बैठे हुए लड़के, हत्थियाँ पकड़े हुए नौजवान रेल के साथ उड़े जाते हैं. चौमासा है इसलिए हल्की उमस में बाहर से आती हवा उनके मन को ठंडा करती होगी. मुझे भी गर्मी नहीं लग रही. एक हाथ से बेटे को अपने पास सरकता हुआ कहता हूँ, ध्यान से बैठो. मेरे पापा भी सायकिल चलाते हुए रास्ते भर मुझे हाथ से छू कर टटोलते रहते थे. उनकी नज़र जरूर सामने होती थी लेकिन मन शायद सायकिल के करियर पर ही अटका रहता था. हर आदमी के पास एक सुखों की पोटली होती है. जिसे वह उम्र भर ढ़ोने का साहस रखता है.

अब तक उसे जिप्सम हाल्ट तक पहुँच जाना चाहिए था लेकिन नहीं, रेल पीछे छूट गई थी. नाडी के बाहर बबूल के नीचे बैठे देवताओं के पास से एक जीप होर्न बजाते हुए निकली. छोटू उस रेल को ही देख रहा था लेकिन आश्चर्य कि उसे रेल को हरा देने में मजा नहीं आया. ये कुछ ऐसा ही था जैसे आसमां से बड़े, समन्दरों से अधिक गीले, व्योम से अधिक मटमैले रंग के प्रेम का कोमा में चले जाना. आप जानते हैं मटमैला प्रेम कैसा होता है ? मुझे भी नहीं पता.

हम चौदह किलोमीटर आ चुके थे. जिस घर में मेरे पिता जन्मे, जहाँ मुझे दादी ने गले लगाया, उस तक पहुँचने के लिए अभी भी और पंद्रह माइल स्टोंस पर बैठी चिड़ियाओं को उड़ाना शेष था.

September 19, 2010

मुंह के बल औंधे गिरे हों और लौटरी लग जाये


हम जीवन का आरोहण करते हुये हर दिन बड़े होते जाते हैं। साल दर साल हमारे अनुभव में इजाफा और उम्र की तस्वीर में रेखाओं की बढ़ोतरी होती जाती है। मनुष्य एक आखेटक है। वह अपने रोमांच और जीवन यापन के लिए निरंतर यात्रा में बना रहता है। अगर सलीके से दर्ज़ की जाए तो कुछ बेहद छोटी यात्राएं भी हमें अनूठे आनंद से भर देती हैं। मेरा बेटा ऐसी ही एक छोटी सी यात्रा पर मेरे साथ था। आज के दौर के बच्चे सबसे अधिक सितम बरदाश्त कर रहे हैं। उनको जल्दबाज़ी की दौड़ में माता पिता की लालसा और भय की मरीचिका में दौड़ते जाना होता है। दस साल का बच्चा है और चौथी कक्षा में पढ़ता है। समझदार लोगों से प्रभावित उसकी मम्मा कहती है कि ये एक साल पीछे चल रहा है. मैं कहता हूँ कोई बात नहीं एक साल कम नौकरी करनी पड़ेगी. हम सब अपने बच्चों को अच्छा नौकर ही तो बनाना चाहते हैं. दरिया को पूरी रवानी से बहता हुआ देखने की जगह पर बांधों की नीव बनाने में अधिक दिलचस्पी रखते हैं. फ़िलहाल हम दोनों में ये तय है कि वह जैसे पढ़ और बढ़ रहा है, उसकी मदद की जाये. उसकी तमाम असफलताओं के दोष मेरे हिस्से में डाल दिये जाये बाकी बची हुई सफलताएँ दोनों मिल कर बाँट लेंगे.

मैं जहां रहता हूँ वहाँ से गाँव जाकर लौट आ आने का कुल तीन घंटे का सफ़र था. हम दो बजे निकले और पांच बजे घर में लौट आये.मैं अपनी बाइक पर यह यात्रा करना पसंद करता हूँ। ऐसा हर बार इसलिए करता हूँ कि मैं बहुत सुविधाभोगी हूँ. अपनी इच्छा से जाना और लौट आना चाहता हूँ. आज कल बेटा मेरे साथ रहना पसंद करता है, ऐसा क्यों है ? इसका कारण मुझे पता नहीं है. पहले बेटी ऐसा करती थी अब वह शायद बड़ी हो रही है इसलिए अपनी मम्मा और चाचियों से चिपकी हुई ऐसी यात्राओं में निंदा रस का बड़ा सुख उठाना पसंद करती है। मैंने सोचा कि इस प्रक्रिया से भी स्त्रियाँ थोड़ा चतुर बनती है. वे दूसरों के मंसूबों का आंकलन करने का हुनर सीखती हैं. इस प्रकार के बेहूदा कहे जाने वाले काम से भी संभव है कि लड़कियाँ दूसरे के उपयोग की वस्तु बनने से कई बार बच सकें.

शहर से बाहर निकलते ही एक भोमिया जी विराजते हैं. ये कल्लजी का स्थान है. हमारे गाँव के माली परिवार के एक ट्रांसपोर्टर के बेटे थे और एक शाम शहर से गाँव की ओर लौटते हुए, उनकी आर्मी से डिस्पोजल हुई जोंगा गाड़ी पलट गई थी और उनकी आत्मा ने सामान्य मनुष्य की तरह इस दुनिया को छोड़ने से मना कर दिया था. इस हठ के कारण उन्हें छोटे रूठे देव यानि भोमिया जी का दर्जा देकर शांत किया गया है.

कल्लजी से सम्बंधित जानकारी सतोलिया खेलने के दिनों की है. कवास स्कूल के मैदान में मेरे हमउम्र भाईयों ने बताया कि जिस रात कल्लजी का निधन हुआ, उसके एक महीने बाद से उनके परिवार में अजब अजब वाकये होने लगे. उनमे से एक प्रसिद्द था कि उनकी जोंगा गाड़ी अक्सर गेरेज में अपने आप स्टार्ट हो जाती थी. कुछ का कहना था कि गेरेज का फाटक भी खुलता था और वह बाहर आ जाया करती. इसी तरह की और घटनाओं के बाद कष्टों की मुक्ति के लिए उनसे आशीर्वाद माँगा जाने लगा कि परिवार की रक्षा अब आप ही करो फिर उनके दिवंगत होने के स्थान को, उनके रहने के लिए एक पवित्र स्थल की तरह थापा गया.

कल्लजी को पूजने के लिए बने चबूतरे के पास से गुजरने वाले पत्थरों से भरे ट्रक एक - दो खंडे श्रृद्धा पूर्वक डाल कर आगे जाया करते थे. इस कारसेवा से उस चबूतरे के आस पास कुछ ही सालों में पत्थरों बहुत बड़ा जमावड़ा हो गया. यह स्थान उत्तरलाई एयर फ़ोर्स स्टेशन के ठीक पास है तो वहां कार्यरत वायुसैनिक इस स्थान को पत्थर बाबा कहने लगे. पत्थर बाबा को शराब और सिगरेट से बहुत प्यार था तो प्रसाद के रूप में यहाँ पर यही मिलता भी है. आप चाहें तो नारियल या मखाणे भी चढ़ा सकते हैं. इस जगह पर शाम होते ही भोमिया जी की प्रसन्नता के लिए शराब चढ़ाई जाती है. श्रद्धालुओं के बैठने लिए और प्रसाद ग्रहण करने के लिए उत्तम सुविधाएँ बन गई है. नियमित और शौकिया शराब पीने वालों के लिए यह थान एक ईश्वरीय उपहार की तरह है.

कल जैसे ही मैं कल्लजी के थान के पास पहुंचा, बाइक पर पीछे बैठे हुए बेटे ने कहा "पापा, सोचो कि आप अभी बाइक चलाते हुए मुंह के बल गिर जाओ और आपको ज्यादा चोट नहीं आये फिर आँख खुलते ही आप देखो कि आपके चेहरे पर एक लौटरी का टिकट चिपका हुआ है. उसका नंबर है नौ आठ आठ नौ सात नौ आठ... फिर आप उस टिकट को चेहरे से हटा कर फैंक देते हो और चल देते हो. इतने में आपको मालूम होता है कि उस टिकट पर तो बहुत बड़ा ईनाम खुला है. अब आप क्या करोगे ? क्या लौट कर वापस जाकर उस टिकट को खोजोगे या फिर अपने काम से काम रखते हुए आगे चले जाओगे." ये बहुत कोम्प्लीकेटेड कहानी थी और मैं कल्लजी के ख़यालों में गुम था. बचने के लिए मैंने पूछ लिया कि छोटे सरकार आप क्या करते ?

उसका जवाब था "मैं खोजता फिर भी नहीं मिलती तो मुझे अफ़सोस होता कि एक अच्छा खासा मौका हाथ से निकल गया." ये कहानी या दृश्य एक रूमानी गल्प है. इसमें औंधे मुंह गिरने की वास्तविक सच्चाई है और लौटरी का टिकट मुंह पर चिपक जाना सबसे बुरी स्थिति में भी असामान्य आशा है लेकिन फिर हालात वही है कि टिकिट खो गया है.

इस प्रश्न की ही तरह हम सब हर रोज़ खोयी हुई अतिकाल्पनिक चीजों का अफसोस करते रहते हैं। हमारे सहज मन को जब भी दुनियावी दौड़ से फुरसत मिलती है। हम शेख़ चिल्ली हो जाते हैं। एक खयाली यात्रा से सचमुच की यात्रा सदा बेहतर होती है। जो हमारा इस खूबसूरत और अविश्वसनीय दुनिया से परिचय करवाती है। 

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September 16, 2010

मैं तुम्हारी आँखों को नए चिड़ियाघर जैसा रंग देना चाहती हूँ

डिक नोर्टन को कम ही लोग जानते हैं. मैं भी नहीं जानता. उसके बारे में सिर्फ इतना पता है कि वह एक विलक्षण लड़की का दोस्त था. उससे दो साल आगे पढ़ता था. उस लड़की ने उसे टूट कर चाहा था. वह कहती थी, तुम्हारी साफ़ आँखें सबसे अच्छी है मैं इनमे बतखें और रंग भर देना चाहती हूँ एक नए चिड़ियाघर जैसा... उस लड़की का नाम सिल्विया प्लेथ था. हां ये वही अद्भुत कवयित्री है जिसने लघु गल्पनुमा आत्मकथा लिखी और उसका शीर्षक रखा 'द बेल जार' यानि एक ऐसा कांच का मर्तबान जो चीजों की हिफाज़त के लिए ढ़क्कन की तरह बना है.

प्लेथ ने आठ साल की उम्र में पहली कविता लिखी थी. इसके बाद उसने निरंतर विद्यालयी और कॉलेज स्तर की साहित्यिक प्रतियोगिताएं जीती. उसके पास एक मुक्कमल परिवार नहीं था. वह अकेले ही नई मंजिलें गढ़ती और फिर उन पर विजय पाने को चल देती थी. उसके भीतर एक प्यास थी कि वह दुनिया को खूबसूरत कविताओं से भर देना चाहती थी. वह पेंटिग करती थी. उसे गाने का भी शौक था. उसने कुछ एक छोटी कहानियां भी लिखी. जो उसने हासिल किया वह सब दुनिया की नज़र में ख़ास था किन्तु स्वयं उससे प्रभावित नहीं थी. उसकी कविताओं को अमेरिका की महान कविताओं में रखे जाने की बातें की जाने लगी थी फिर भी डिक नोर्टन के आस पास बीते दिनों के सिवा उसे कोई चीज अपनी नहीं लगी.

वह विद्वता और पागलपन के सी - सा झूले पर सवार थी. कभी उसे पागलखाने में बिजली के झटके लग रहे होते फिर वह दो साल में अपना शोध कार्य पूरा कर के जमा करवाती फिर किसी मनो चिकित्सक से उसका उपचार हो रहा होता और वह सबसे खूबसूरत कविता लिखती.

'द बेल जार' में वह अवसाद के दिनों में भी खूबसूरती से आशाओं को लिखती है. वह जीवन के उच्चतम शिखर पर बैठ कर घाटी में टहलती हुई मृत्यु को देखती है. तीस साल की होते होते एक दिन विदुषी अथवा पागल होने के बीच का बारीक फासला मिट गया. उसने अपने दो बच्चो को गीले टावेल से दूसरे कमरे में ढका, कमरे के दरवाजों के आगे फर्श पर पानी डाला ताकि वे हर संभावित खतरे से सुरक्षित रहें, फिर खुद को रसोई में बंद कर के कार्बन मोनों ऑक्साइड के लिए ओवन को ऑन कर लिया. सुबह साढ़े चार बजे के करीब उसने अपना सर ओवन में रखा और सो गई.

यह भयानक था. ओवन में सर रख कर मर जाने के ख्याल से ही लोगों के रोंगटे खड़े हो गए. डिक के बाद उसके जीवन में आये पूर्व पति द्वारा उसे मारे जाने के कयास लगाये गए. उस कवि पति को आशंका से देखा गया. एक अद्वितीय कवयित्री के प्रशंसकों ने गहन जांच का दवाब बनाया था लेकिन चिकित्सकों ने कहा कि यह एक आत्महत्या का मामला है, क्या मैं इसे एक विलक्षण आत्महत्या कह दूं ?

मेरा नाम डिक नोर्टन नहीं है. मैं प्लेथ की तरह विलक्षण नहीं हूँ इसलिए मेरे खो जाने की चिंता गैर वाजिब है. इन दिनों किसी को याद नहीं कर रहा हूँ मगर डर सिर्फ यही है कि जब से मैंने याद के गमलों को तोड़ना शुरू किया है, मेरी पसंद के फूल फिर से खिलने लगे हैं.

September 10, 2010

दिनेश जोशी, आपकी याद आ रही है.

अब उस बात को बीस साल हो गए हैं. वे फाके के दिन थे. शाही समौसे और नसरानी सिनेमा की दायीं और मिलने वाली चाय के सहारे निकल जाया करते थे. उन्हीं दिनों के प्रिय व्यक्ति दिनेश जोशी कल याद आये तो वे दिन भी बेशुमार याद आये. मैं डेस्क पर बैठ कर कई महीनों से प्रेस विज्ञप्तियां ठीक करते हुए इस इंतजार में था कि कभी डेट लाइन में उन सबको भी क्रेडिट मिला करेगी, जो अख़बार के लिए खबरें इस हद तक ठीक करते हैं कि याद नहीं रहता असल ख़बर क्या थी.

हमारे अख़बार के दफ्तर में ग्राउंड फ्लोर पर प्रिंटिंग प्रेस और ऊपर के माले में एक हाल के तीन पार्टीशन करके अलग चेंबर बनाये हुए थे. एक में खबरों के बटर पेपर निकलते थे दूसरी तरफ पेस्टिंग, ले आउट और पेज मेकिंग का काम होता था. बाहर की तरफ हाल में रखी एक बड़ी टेबल पर तीन चार लोग, जो खुद को पत्रकार समझते थे, बैठा करते थे. मैं भी उनके साथ बैठ जाया करता था.

एक सांध्य दैनिक में काम करते हुए कभी ऐसे अवसर नहीं मिलते कि आप कुछ सीख पाएं, सिवा इसके कि हर बात में कहना "उसको कुछ नहीं आता". इसी तरह के संवादों से दिन बीतते जाते हैं. ऐसे अखबारों के हीरो क्राइम रिपोर्टर हुआ करते हैं. वे बलात्कार, छेड़-छाड़, अपहरण का प्रयास, या जानवरों के साथ इंसान का दुष्कर्म से जुड़ी खबरें खोजते हुए, पुलिस थानों में घूमते रहते हैं बाकी लोग जिन दुकानों के उदघाटन के विज्ञापन आये होते हैं. उनकी खबरें बनाने में दिन काट देते हैं. टेबलायड फार्म में छपने वाले अख़बार हमेशा लोकरंजन की सस्ती खबरों पर ही चला करते हैं, ये सच्ची बात नहीं है मगर वहां ऐसा ही था.

मुझे एक काम मिला कि सोनू खदान से निकलने वाले लाइम स्टोन पर जैसलमेर के संवाददाता बद्री भाटिया एक सीरीज लिखेंगे और मुझे उसको सही करना है. सत्रह कड़ियाँ लिखने के बाद एक सप्ताह बड़ी आपत्तिजनक ख़बर मिली. कुल मिला कर उसमे लिखा था कि न्यायालय का स्थगन आदेश तो कोई भी ला सकता है. दिनेश जोशी मुखिया थे तो उनको मैंने बताया कि ये कुछ ठीक नहीं लग रहा. खैर साहब, प्रबंधन ने वह ख़बर लिखवाई. जोशी जी की समझाईश फ़ैल हो गयी. ख़बर का शीर्षक था "स्टे तो गरीब की जोरू है जो चाहे सो ले आये" मेरे सीनियर जानते थे कि इसका अंजाम क्या है ?

मूल ख़बर पर प्रबंधन ने छापने का आदेश लिखा और अपने हस्ताक्षर किये. मेरे हाथ से लिखे आलेख को तुरंत कम्प्युटर कक्ष से मंगवा कर दिनेश जोशी ने मेरे ही सामने जला डाला. मूल आलेख वे अपने बैग में रख कर घर ले गए. मैं उस अख़बार को छोड़ कर चला गया फिर कुछ दिनों बाद सूचना और प्रसारण मंत्रालय की एक मिडिया यूनिट में भारत सरकार का नौकर हो गया.

उस ख़बर पर राजस्थान उच्च न्यायालय ने कड़ा फैसला सुनाया. पत्रकारों को कारावास की सजा दे दी गई. मेरे लिए ये अप्रत्याशित तो नहीं मगर कोई अच्छी खबर नहीं थी. खबरों के प्रकाशन के लिए उत्तरदायी दिनेश जोशी ने न्यायालय के समक्ष वास्तविक ख़बर का परचा रखा, जिसमे प्रबंधन के निर्देश थे. मैंने सुना कि बद्री भाटिया ने कहा, भाई मेरी कोई नौकरी तो है नहीं मैं तो छः महीने सेन्ट्रल जेल में काटना बेहतर समझूंगा... प्रबंधक शायद अपील लेकर आगे गए थे.

आखिरी बार की मुलाकात के समय जोशी जी भास्कर में कॉपी एडिटर थे... मगर आज बीस साल बाद भी उनकी याद आती है और याद आता है कि सीखने को हर जगह मिलता है.

September 5, 2010

हम तुम... नहीं सिर्फ तुम

अभी बहुत आनंद आ रहा है. रात के ठीक नौ बज कर बीस मिनट हुए हैं और मेरा दिल कहता है कुछ लिखा जाये. खुश इसलिए हूँ कि चार दिन के बुखार के बाद आज सुबह बीवी की डांट से बच गया कि मैंने दिन में अपने ब्लॉग का टेम्पलेट लगभग अपनी पसंद से बदल लिया कि एक दोस्त ने पूछा तबियत कैसी है कि अभी आर सी की नई बोतल निकाल ली है... हाय पांच सात दिन बाद दो पैग मिले तो कितना अच्छा लगता है.

सुबह ख़राब हो गई थी. मेरे समाचार पत्र ने अपने परिशिष्ट का रंग रूप तो बदला मगर आदतें नहीं बदली. यानि वही सांप वाली फितरत कि मध्य प्रदेश में व्यापार करने और अख़बार के पांव जमाने को भारतीय जनता पार्टी को गाली दो लेकिन हिंदुस्तान की खुशनुमा फेमिली के तौर पर भाजपा नेता शाहनवाज हुसैन और उसकी पत्नी का इंटरव्यू छापो. चाचा, कृष्ण के वैज्ञानिक तत्व पर शोध की पोल यहीं खुल जाती है. तुमसे तो कुलिश साहब अच्छे थे कि जो करते थे, वही कहते भी थे. तुम मीर तकी मीर से शाहिद मीर तक को भुला देना चाहते हो और संगीत में अन्नू मलिक को हिंदुस्तान का सिरमौर मनवाना चाहते हो, कि तुम्हें सब भूल जाता है और एक आमिर खान का लास्ट पेज पर पांच सेंटी मीटर का स्टीमर लगाना याद रहता है... और तो कुछ बचा नहीं है उस कौम में जो हिंदुस्तान की होकर भी हिंदुस्तान की नहीं कहलाती.

आज दिन भर मेरे ज़ेहन में बहुत से नाम आते रहे और मैं सोचता रहा कि क्या वाकई उनको प्रकाशन उद्योग मिटा पायेगा, क्या व्यापार इंसान से बड़ा हो जायेगा और क्या महमूद दरवेश का नाम भी फिलिस्तीन के मिट जाने पर मिट जायेगा. उधर चार दिन पहले फ़िडेल कास्त्रो फिर दिखाई दिये थे उन्होंने बोला भी कि दुनिया में जब कुछ न बचेगा तब मज़लूम बचेंगे. मुझे उनको देख कर ख़ुशी होती है कि उनका देश रहमो करम पर नहीं चलता. हम दिल से भूल जाते हैं भोपाल गैस काण्ड के सबक को और नए परमाणु समझौते को सदन में पारित करवा लेते हैं. हम भूल जाते हैं उन लोगों को जो तीन सौ इकहत्तर को समाप्त करने का एजेंडा लेकर आते हैं और राज कर के चलते बनते हैं.

'हम तुम' नहीं सिर्फ तुम...

September 1, 2010

अफीम सिर्फ एक पौधे के रस को नहीं कहते हैं


उसे मरने से बीस दिन पहले अस्पताल में लाया गया था. उसने ज़िन्दगी के आखिरी दिन एक पुलिसकर्मी की परछाई देखते हुए बिताये थे. वह लीवर और ह्रदय के निराशाजनक प्रदर्शन से पीड़ित थी. उसका नाम एलोनोरा फेगन था और बेल्ली होलीडे के नाम से पहचानी जाती थी. वह अमेरिका की मशहूर जोज़ गायिका थी. पैंतालीस साल की होने से पहले ही मर गई. उसे अफीम से बेहद लगाव था. इसके लिए वह कुछ भी कर सकती थी. कुछ भी यानि कुछ भी...इंसान की अपनी कमजोरियां होती है. उसकी भी थी.

मुझे लगता है कि उसकी ज़िन्दगी के आखिरी दिन उस भारतीय आम एकल परिवार जैसे थे. जिसमे पत्नी या पति को विवाहपूर्व या विवाहेत्तर सम्बंधों का पता चल जाये फिर तुरंत रोने -धोने, लड़ने - झगड़ने और आरोप - प्रत्यारोप के बाद अपराधी को अन्य परिवारजनों द्वारा नज़रबंद कर दिया जाये. ऐसे ही लेडी डे के नाम से मशहूर उस स्त्री के हालात रहे होंगे कि वह अपनी कमजोरियों पर बैठे एक पहरेदार को देखते हुए मर गई और ठीक इसी तरह कई परिवार भी तबाह हो गए. नशाखोरी और देहिक सम्बन्धों की चाह सभ्य समाज में अनुचित है, अपराधिक है... मगर है.

हमारा समाज कथित रूप से बहुत ही सभ्य है. सभ्य होने की आकांक्षा में समाज कई बार अमानवीय भी हो जाया करता है. हम प्रेम और उसकी अनुभूतियों को गहराई से जीये जाने से अधिक इसकी चिंता में डूबे रहते हैं कि समाज हमें कितना शिष्ट और शालीन मानता है. हम जरूरी बातें भूल जाते हैं और स्वयं को प्रताड़ित करते हुए एक अच्छे आदमी का चेहरा ओढना अधिक पसंद करते हैं. मैं ऐसा नहीं कर पाता फिर भी मुझे अपराधबोध नहीं होता तो क्या मैं एक दम गया गुजरा आदमी हूँ ? दुनिया के महान लोगों को भी इसलिए मुआफ नहीं किया गया कि उन्होंने अपनी कमजोरियों को स्वीकार कर लिया था. मैं तो महान क्या ख़ास भी नहीं हूँ फिर भला रहम की उम्मीद भी क्यों कर हो. इसलिए जैसा पहले था वैसा अब भी हूँ सिर्फ इस विरोधाभासी बयान के साथ कि किसी को दुःख नहीं देना चाहता हूँ.

मेरी प्रिय पत्नी, मैं नामी आदमी न बन सका लेकिन फिर भी मेरी कमजोरियों पर तुमने अमेरिकी प्रशासन जैसा निर्णय लेकर कोई कोप पहरे पर नहीं बिठाया इसीलिए ज़िन्दा हूँ. हालाँकि मैं अपने आचरण में घुली अफीम से मुक्त नहीं हो पाऊंगा लेकिन आज तुम्हारे जन्मदिन पर फिर से कहता हूँ "तुमसे जब पहली बार मैंने कहा था कि तुम्हारे साथ ज़िन्दगी बिताने को जी चाहता है तो उसका अर्थ भी यही था. मुझे तुम बेहद हसीन लगती थी. अब और ज्यादा हसीन लगती हो. इससे भी बड़ी एक बात थी. मेरे मन में एक विश्वास था कि मेरी गुज़र तुम्हारे सिवा कहीं न हो पायेगी. मैं सही निकला. इस एक सही निर्णय ने मेरे बाकी के गलत निर्णयों को ढक लिया."

वह अगले जनम में मेरे साथ नहीं रहना चाहती... कल रात ऐसा कहते हुए मुस्कुरा रही थी. कभी कभी मुस्काने का अर्थ ये नहीं होता कि वह सीरियस नहीं है, लेकिन जाने दो... हसीन लोगों के बहुत नखरे होते हैं.

के सी

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Kishore Choudhary is a poet and fiction writer from Barmer (Rajasthan). His writing career took a formal leap from his personal journals to make him a hugely popular blogger on two of his blogs- Kahaniyan and Hathkadh.

Having spent most of his formative years in the desert, the life there is his favourite canvas to contextualise his poetry and stories. His followers from across the world vouch for his realistic and authentic portrayal of the desert life and its typical dilemmas, fused beautifully and almost effortlessly with some stunning images of the desert and its folklore.

Kishore in a way pioneered the incorporation of pre-publishing interactions and feedback with his readers on his blogs and across social media platforms in his final works. His style is known for its lucid and unexampled metaphors that he exquisitely uses to express universal feelings like love, loneliness, hope, pain, longing and fantasy. 

His first collection of stories Chaurahe Par Seedhiyan (2012)was such a thumping bestseller that the first issue was sold out within 50 days of its launch.All the stories skilfully bring the rich and exotic background of the desert come alive and make the reader delve deeper into the layers of human emotions.This much sought after collection raised the bar for all contemporary Hindi works of short fiction and brought in a fresh change in the existing status quo for Hindi short stories. 

The second collection titled Dhoop Ke Aaiyne Mein(2013)had an array of short stories that looked at life through a multi-dimensional prism, lending each one of them a distinctive charm. Kishore being a poet first, his stories are more like poetic fiction. Having a great affinity to the stream of consciousness novels by English literary greats like James Joyce and Virginia Woolf his stories defy the conventional rules of a definitive beginning, middle and end. 

Kishore’s first publication was a collection of poetry Baatein Bewajah, an alluring and bewitching series of short poems which capture the vast expanse of human emotions and have images that have a rare haunting quality.

Kishore is a Radio Broadcaster by profession and has a special fondness for classical & folk music. Articles about him and his interviews are available across many major newspapers and websites. Kishore certainly is the Avant-garde flavour in contemporary Hindi writing and his ever expanding avid readership eagerly waits for his next chartbuster.

Kishore's latest is another collection called "Jaadu Bhari Ladki". This collection has his same imitable style of stories but the contexts and places are beyond the desert as well. 
His deep understanding of the complexity of modern relationships and how they play out in our minds, homes and workplaces makes it a very unique almost post-modern work in Hindi Fiction.

http://www.goodreads.com/author/show/7361739.Kishore_Chaudhary

हेंगओवर सिलसिला

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हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने या खूबसूरत स्त्री को इरादतन चूमने जितना ही अवैध है.

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