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Showing posts from 2019

बताशे जितनी पूरी

"आभा दी फुचका" मेरे ऐसा कहते ही आभा मुस्कुराने लगी।
मैंने पूछा- "कुछ याद आई?" आभा ने कहा "हाँ आपकी दोस्त। उनकी क्या ख़बर है?"
मैंने कहा- "पता नहीं। कहीं रंग भरी अंगुलियाँ लिए ड्राइंग बोर्ड के सामने खड़ी होगी या किसी आर्ट गेलेरी में अपनी पेंटिंग्स बेच रही होगी।"
आभा ने कहा- "आपको उनके बारे में पता करना चाहिए।"
कैसे कोई एक बात किसी की हमेशा के लिए याद रह जाती है। उस बात के बहाने उसे हर बार याद किया जाता है। फुचका हमारे लिए नया शब्द था। बांग्ला लोग पानी पूरी को फुचका कहते हैं। हमारे लिए तो पानी पूरी भी एक नया शब्द था। पहले पहल जब भी इसके बारे में सुना तब ये पानी पताशा था।
रेगिस्तान के लोगों के पास मखाणे और बताशे ही केंडी के रूप में हुआ करते थे। इन्हें बरसों बिना किसी विशेष रखरखाव के संभाला जा सकता था। दादी की पेटी में, नाना के कुर्ते के खूंजे में, मेहमानों की थेलियों में, विवाह समारोहों के अवसर पर कट्टों में भरे हुये मखाणे और बताशे मिला करते थे।
ये बताशे ही थे जिनको स्थानीय बोली ने पताशे कर दिया था। पानी पूरी वाली, पूरी भी लगभग बताशे जितनी…

एक पिता होना

एक पिता के लिए सबसे महत्वपूर्ण काम ये है कि वह अपने बच्चों की माँ से प्रेम करे। ~ थियोडोर हेज़बर्ग
ड्राइंग रूम की सेंटर टेबल पर अकसर कैरम जमा रहता। माँ, पापा और भाई माने सब लोग खेलते थे। बोरिक ऐसिड की सफेदी यहाँ वहाँ बिखरी रहती। शाम को ये कैरम बाहर खुले में आ जाता। इस खेल का आनंद बहुत देर तक चलता। कभी मानु आकर कैरम के बीच में बैठ जाती। इसे खेल के बीच का टी ब्रेक मान लिया जाता। खेल फिर से चल पड़ता। इस खेल के समापन का एक रिवाज सा बन गया था कि माँ की टीम हारने लगती तब माँ कैरम को एक तरफ उठाकर सारी गोटियाँ बिखेर देती।
एक ठसक और झूठे रूसने के साथ माँ रसोई की ओर चल पड़ती। पिताजी उनको मनाने के लिए राजसी सम्बोधन लिए पीछे चल पड़ते।
घर के भीतर के इन दृश्यों से इतर बाहर के संसार में पिता एक शिक्षक, सामाजिक कार्यकर्ता और बेहद गंभीर व्यक्ति थे। उन्हें किसी प्रहसन, हंसी-ठिठोली और निंदा में सम्मिलित किसी ने नहीं पाया। वे इस तरह के स्वभाव के व्यक्तियों से यथोचित दूरी बनाए रखते थे।
जब तीनों बच्चों की नौकरी लग गयी। घर में बहुएँ आ गईं तब उन्होने अपनी इच्छा से नौकरी से सेवानिवृति ले ली। अपने प्रिय लोगों के …

बाड़मेर में पकवान दीवाने

सर दो पेग ले लेते हैं।  भाई सुबह से कुछ खाया ही नहीं है।  सर ये गेट के सामने पकवान वाला है, बहुत अच्छे पकवान देता है।  ले आइये।  सर मिर्ची कम या ज़्यादा? मिर्ची अच्छी।  सर मीडियम ठीक रहेगी।  भाई एक पतला सा पापड़। थोड़ी सी दाल और प्याज के चार बारीक टुकड़े। इतना मत सोचो। जैसा अच्छा लगे ले आओ।
बाड़मेर में पकवान दीवाने रहते हैं। लोग सुबह सवेरे पकवान खाने निकल पड़ते हैं। हर पकवान वाले ठेले के पास खड़े होकर आपको इंतज़ार करना पड़ता है। पकवान खाने के दीवाने अधिकतर विस्थापित होकर आए लोग थे। वे ही अपने साथ पकवान लेकर आए। लेकिन जल्द ही ये हर एक का प्रिय होने लगा।
मैंने किसी जाट को पहली बार पकवान खाते हुये देखा, वो हमारा कॉमरेड दोस्त खेताराम था। मैं तब भी पकवान नहीं खाता था। पिताजी को गलियों में चटोरों की तरह खाने की आदतें अच्छी नहीं लगती थी। ये भी एक वजह रही होगी मैं बहुत बार ललचाने के बाद भी आलू-टिक्की, छोले और पकवान जैसे ठेलों के पास भी नहीं गया।
इधर आकाशवाणी के गेट के सामने बिजली विभाग की दीवार के पास एक व्यक्ति ने साल डेढ़ साल पहले पकवान का ठेला लगाया। बिक्री इतनी तेज़ी से बढ़ी कि हाथगाड़े की जगह कबट लगा…

सामूहिक उद्विग्नता - मास हिस्टीरिया

उद्विग्नता माने इज़्तराब माने एंजायटी अनेक कारणों से बचपन से ही हमारे भीतर घर कर लेती है। ये उद्विग्नता जब अनेक लोगों को चपेट में लेती है तो इसे सामूहिक उद्विग्नता अर्थात मास हिस्टीरिया कहा जाता है। सामूहिक उद्विग्नता अक्सर संक्रामक व्याधि की तरह समाज के बड़े हिस्से को अपनी चपेट में ले लेती है। समाज का अधिसंख्य हिस्सा अपनी कल्पना शक्ति से भयावह स्थितियों के दृश्य बुनने लगता है। ईश्वर के रूठने, प्रकृति के कुपित होने, महामारी फैलने या राज्य के नष्ट होने जैसे किसी भी विषय के सामूहिक पागलपन में शामिल हो जाता है।
समाज का ये अस्वस्थ भाग ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए पशु-पक्षियों की बलि यहाँ तक कि नरबलि देने को एकमत हो जाता है। पहाड़ों, नदियों और अलंघ्य विशालकाय मैदानों में अनेक शापों के होने का प्रचार-प्रसार करता है। अनेक आशंकाओं में बाहरी सम्पर्क को समाप्त करता है और भेड़ों के झुंड की तरह मुंह में मुंह डालकर बैठ जाता है। अपने राज्य को नष्ट होने से बचाने के लिए प्रशिक्षित और बुद्धिमान योद्धा बनकर राज्य का स्वयंसेवक होने के स्थान पर विक्षिप्त होकर चिल्लाने लगता है। अपनी क्षति पर रोता है और दूसरे…

प्रेम दिवस पर एक दुआ

वो टाई बांधती है और खींच लेती है  ये कैसे वक़्त उसे प्यार की पड़ी हुई है। ~आमिर अमीर
यूँ कब तक बेरोज़गार फिरोगे। दुआ कि तुम प्यार में पड़ जाओ। हर घड़ी कोई काम तो रहे कि सन्देशा आएगा, कॉल आएगा। मन घबराया रहे कि कोई मैसेज देख न ले, किसका कॉल है कोई पूछ न ले। घर के ओनेकोने में, दफ्तर के सूने गलियारों में कभी बाज़ार के बहाने किसी खाली जगह पर जाकर जल्दबाज़ी के कॉल करेंगे। बातों-बातों में तय कर लेंगे कि कभी मिलेंगे, चूम लेंगे, कहीं बहुत दूर तक घूमने जाएंगे। और फिर ख़ुश होंगे, इंतज़ार करेंगे, उदास रहेंगे, आंसू बहाएंगे, कोसने भेजेंगे। इस तरह कुछ बरस तेज़ी से कबाड़ किए जा सकेंगे। लेकिन ये सब बेकार न जाएगा। कभी दारू पी लेने पर कह उठेंगे "यार थी तो बड़ी बरबादी मगर अच्छी थी।"

आमीन। 😍😘

सूचना सम्पन्न रेगिस्तान

जैसलमेर में फतेहगढ़ में कोडा गांव से लौटते हुए झीझनियाली में ये वैन दिखी। इसमें एक बड़ा स्क्रीन लगा था। जब हमारी कार वैन के पास पहुंची तब स्क्रीन पर राजस्थानी वेशभूषा में कुछ लोग और खलिहान दिखाई दिए। वैन के आगे भारत के मन की बात लिखा था।
इसे देखते ही मुझे फ़िल्म प्रभाग और दृश्य एवं श्रव्य प्रचार विभाग की ओर से अस्सी के दशक में दिखाई जाने वाली फ़िल्म याद आने लगी। एक जीप में कुछ लोग आते। प्रोजेक्टर लगता। सफेद पर्दा लगाया जाता। उस पर कोई देशभक्ति या विकास पर बनी फ़िल्म दिखाई जाती। हम बच्चे कौतूहल से उस दिन का इंतज़ार करते। लेकिन वह दिन बरसों में कभी आता।

मैंने केवल दो फ़िल्म देखी थी। एक थी देव आनंद साहब की हम दोनों दूजी के बारे में ठीक से याद न रहा कि वह किस बारे में थी।
अब हर हाथ में मोबाइल है। सस्ता साहित्य, द्विअर्थी गीत, मार-काट और प्राकृतिक आपदाओं के दृश्य सबकुछ यूट्यूब पर उपलब्ध है। फ़िल्म और टीवी सीरियल का तो कहना ही क्या? वे यूट्यूब पर नहीं तो किसी टोरेंट के मार्फ़त डाउनलोड होकर एक मोबाइल से दूजे मोबाइल में आगे बढ़ते रहते हैं। ऐसे में इस वैन को देखकर मेरे मन में प्रश्न जगा कि क्या सचमुच य…

वेणासर की पाल - भंगभपंग

विज्ञान की कक्षा में पदार्थ के रूप पढ़ाये जा रहे थे। रसायन विज्ञान के माड़सा खूबजी ने बच्चों को सरल भाषा में बताया। "अवीं हंगाता हिय ठोस, अवीं मूत्राता हिय द्रव हिन अवीं टिट हणाता हिय गैस।"
#भंगभपंग - 7
कक्षा नौवीं की आख़िरी से पहली बैंच पर बैठा एक लड़का हंसा। उसकी हंसी के पीछे हंसी की एक लहर आई। लहर के साथ आगे की सब बैंचों के बच्चे बह गए। खूबजी ने कहा- "तुम्हारे लक्षण दिख रहे हैं। इस सेक्शन का एक भी बच्चा डॉक्टर नहीं बन पाएगा।"
कक्षा के पास से जा रहे हनु भा ने इस हंसी पर उपेक्षा भरी दृष्टि डाली। उनको इस बात की चिंता न हुई कि कोई बच्चा डॉक्टर नहीं बन पाएगा और विद्यालय का नाम रोशन न हो सकेगा लेकिन उनको मानव शरीर के अपशिष्टों के प्रति विद्यार्थियों की अरुचि से दुख हुआ।
टिट हणना एक अद्भुत सुखकारी कर्म है। पाद के प्रति अमानवीय सोच रखने वाले गांवों का ज़िक्र विश्व इतिहास में है। लेकिन बाड़मेर के बुजुर्ग पदेलों के लंबे पाद पर कोई नौजवान हंस दे तो पादक उसे उपहास भरी निगाह से देखता। साथ ही आस-पास के लोग भी बच्चों को इस तरह देखते कि बच्चे कई दिनों तक पादकों के आस-पास नहीं फटकते।

जीवन जैसा मिला

कभी महंगे काउच में धंसे रहे, कभी प्लेटफॉर्म पर पड़े रहे। न भला लगा न बुरा लगा। कभी सोए अजनबी बिस्तरों में, कभी घर के लिहाफ़ में दुबके रहे। न अफ़सोस रहा न ख़ुशी रही। कभी बैठे रहे मुंडेर पर, कभी गलियों की खाक पर चलते रहे। न कमतर लगा न बेहतर लगा। कभी मिले तो खो गए रूमान में, कभी बिछड़ गए तो तन्हा बैठे पीते रहे। 
जीवन जैसा मिला उसे जी लिया।

व्हाट टू डू दादी

मैंने दादी से कहा -"राउंड नेक टी और जीन्स में बहुत कम्फर्टेबल रहता हूँ पर दादी जब फॉर्मल कपड़े पहन लेता हूँ तब लगता है दिस इज अ पनिशमेंट। फिर मैं कोट कमीज़ को अलमीरा में टांग देता हूँ। ऐंड दादी व्हाट्स एप पर फोरवर्डेड मेटेरियल और जवाब न देने के बाद भी कमेंट्री की तरह आते मैसेज मुझे बहुत अनकम्फर्टेबल करते हैं। ये सब देखकर झुंझलाहट होने लगती है।" और फिर एक लंबी सांस लेकर कहा- "व्हाट टू डू दादी" 
दादी ने कहा- "टेक इट ईजी। एक्सपेक्ट ट्रबल एज एन इनऐविटेबल पार्ट ऑफ लाइफ एंड पीसफुली इग्नोर देम।" 
"मुझे अच्छा नहीं लगता दादी। प्लीज़ समझो।" मैंने उदास लहज़े और डूबी आवाज़ में कहा। 
दादी ने गाल पर हाथ फेरा और कहा- "इंयों मोलो के पड़े है। ऐड़ो ने मूंडे ई मति लगा। आगा बळण दे।"
"ऐंड दादी यू नो? फेसबुक में कमेंट पर थ्रेड चलाने वाले भी झाऊ चूहे हैं।" 
"मीन्स हेज हॉग?"
मैंने कहा- "हाँ दादी कांटों वाले चूहे" * * *

कभी लगता है

सोचता हूँ कि इस समय गहरी नदी के बीच हिचकोले खाती नाव होता। डूबने और पार उतरने की आशंका और आशा में खोया रहता। जीने की इच्छा के सिवा बाकी यादें कहीं पीछे छूट जाती। मैं मगर सूखी नदी के तट पर पड़ी एक जर्जर नाव हूँ।

कभी लगता है बड़ी उदास बात है और कभी-कभी लगता है इससे अधिक सुंदर बात क्या हो सकती है?

अपने साथ

सात बरस में चेहरा कितना बदल जाता है। मेरे चेहरे पर प्रौढ़ता झलकने लगी। उसके चेहरे से कमसिन भराव जाता रहा।
कच्चेपन से भरी सुंदरता की जगह इस बार वो एक ख़ूबसूरत स्त्री का चेहरा था। मैंने कहा- "तुम बड़ी हो गयी"
मैं ऐसे जब भी कहता, वह अपना निचला होंठ दाँतों में दबाकर मुस्कुराती थी। इस बार उसने ऐसा नहीं किया। बस आँख भर देखा। "ये आपका थैला कितना सुंदर है न?"
मैंने कहा- "तुम ले जाओ"
"पहले से ही कितना कुछ तो रखा है। बुक फेयर के पास, लाइटर, पेन और वे पन्ने जिनपर कुछ न कुछ हर बार लिखवाया" थोड़ा रुककर कहा- "बातें बेवजह फिर से कब तक छप कर आएगी।"
"तुम एडिट करोगी?"
उसने सर हिलाया। जैसे कोई छोटा बच्चा हामी भरता है। मैने कहा- "चलो एडिटर, कॉफ़ी पीते हैं"
फुटपाथ जैसा कुछ बनाने के लिए बनी ईंटों की लकीर पर बैठे थे। कुछ एक बेतरतीब पेड़ खड़े थे। एक नीले रंग का डस्टबिन रखा था। लोग कॉफ़ी लेने के लिए कतार में खड़े थे।
उसने अपने थैले से एक किताब निकाली। मुझे देते हुए कहा- "इस पर मेरे लिए कुछ लिख दो"
मैंने बहुत अचरज से देखा। "ये मेरी लि…

दिल को ऐतबार न हुआ

वो जो बात उसने कही थी। उसे वह ही जानता था। दिल के पास कोई ख़बर न थी, जो उसकी बात को झूठ कह सके। न दिल वहां गया, न दिल ने उनको देखा, न दिल ने जाना कि वहां क्या हो रहा था। इस सब के बाद भी दिल ने उसकी कही बात पर ऐतबार न किया। किसलिए?
नहीं पता।
उसने बार-बार समझाया। उसने रूठकर जाने की बातें कही और बार-बार लौटकर आया। उसने ऐतबार न होने को शक़्क़ी होना कहा। उसकी बातों एक सी-सा झूला हो गई। एक बात वह कहता कि तुम्हारे साथ होना मेरी भूल थी। दूजी बात कहता कि प्लीज़ मान जाइए।
इन दो बातों के बीच अपमान, बेरुख़ी, चाहना और प्रेम की छोटी-छोटी असंख्य बातें बस गई थी। एक के बाद एक उलट बात पड़ती।
दिल पत्थर बना खड़ा रहा।
बरसों बाद सब सच साफ सामने खड़ा था। कि उसकी बातें ऐतबार के लायक न थी। उसने जो कहा वह सब आधा-अधूरा था। उसने जो जीया वह छुपा रखा था।
मैंने एक लंबी सांस ली और देर तक सोचा। बहुत देर तक। आख़िर दिल को बिना जाने कैसे मालूम हुआ। दिल को सच कौन बता जाता है। कौन?
इसके बाद मैं दिल पर भरोसा करने लगा। कुछ तीन चार बरस पहले दिल फिर से अड़ गया। मैंने चाहा कि उसका ऐतबार करूँ। मामूली बातें समझकर सब भुला दूँ। फिर से साथ …

दुःख की पावती

किस रोज़ पहली बार दुःख हुआ था, ये याद नहीं है। उसके बाद के दुःखों का क्या हुआ? ये भी ठीक-ठीक नहीं बता सकता। उन तमाम दुखों के बारे में बहुत छोटी लेकिन एक जैसी बातें याद हैं। दुःख एक विस्मय साथ लेकर आता था। असल में पहले विस्मय ही आता, उसके पीछे छाया की तरह दुःख चल रहा होता। विस्मय मेरे दिल को बींध देता। जैसे पारे से भरी सुई चुभो दी गई है। दिल तेज़ी से भारी होने लगता और मैं डरने लगता कि दिल धड़कना बन्द कर देगा। इसके अलावा मेरे हाथ-पैर शिथिल होने लगते। दिमाग में ठंडा लावा भरने लगता। दिमाग एक बोझ की तरह हो जाता। ये सब अनुभूतियां मिलकर समग्र रूप से एक दुःख के आने की पावती बनती।
दुःखों के आने के प्रति मैं स्वयं को कभी शिक्षित न कर पाया। मेरे मन में उनके आगमन के लिए कोई स्थान न था। मैंने हर एक के लिए ऐसे जीवन की कामना या कल्पना की थी, जिसमें दुखों के लिए कोई स्थान न था। मैं रोज़ देखता था कि दुःख आस-पास तेज़ी से घट रहे हैं लेकिन उनके लिए स्थान कभी न बना सका। दुःख जितनी द्रुत गति से आया, उसके उलट जाने में उतना ही शिथिल रहा। कभी-कभी दुःख महीनों साथ बना रहा। इतने लंबे साथ से वह मेरा अपना हिस्सा हो गय…

कभी प्यार नहीं किया मगर

कभी-कभी मैं सीधे चलता हूँ। जैसे दाएं-बाएं देखे बिना बग्घी का घोड़ा चलता है। मेरे पांवों से टप-टप की आवाज़ आने लगती है। मेरे पांव एक दूजे को काटते हुए पड़ते हैं। मैं एक लंबे बालों वाली प्रेयसी में ढल जाता हूँ। उन बालों को देखे बिना मुझे ऐसा महसूस होता है कि मेरे बाल हवा में उड़ रहे हैं। मैं सोचता हूँ कि उन दो आँखों तक पहुंच गया हूँ। उन तक पहुंचकर मुस्कुराता हूँ कि उनकी आँखों में झांकते हुए मैंने बाइस्कोप देखते बच्चे की तरह अपनी आंखें दोनों हाथों से ढक ली हैं।
मैंने कभी प्यार नहीं किया मगर...

काली रात उकेरने के लिए

नींद जितनी भारी होती जाती, सुबह उतनी ही दूर रह जाती। कभी-कभी हमें पता होता है कि आज नींद नहीं आएगी। हम अपने आपको सुलाने में पहले नाकाम मान चुके होते हैं। ऐसी रातों में अक्सर मैं कुछ काम करने लगता हूँ। जैसे कि छत पर चले जाना। मैं अपने आपको वहीं चारपाई पर छोड़ देता हूँ। जैसे कोई माँ अपने नन्हे बच्चे को बन्द आराम कुर्सी में बिठा कर काम करने लगती है।
मैं भी एक माँ की तरह अपने आप को वहीं छोड़ छत पर थोड़ी दूर टहलता हूँ। जब मैं टहलने निकलता हूँ तो चारपाई पर पड़े मैं को आराम आने लगता है। जैसे मेरे होने से उसे कोई उलझन थी। जैसे वह बन्धन में था। चारपाई पर पड़ा हुआ मैं अब तारे देखने लगता हूँ। कभी-कभी नज़र बहुत दूर तक नहीं जाती तब मैं लैम्पपोस्ट देखने लगता हूँ। अक्सर तो ऐसा होता है कि मैं लैम्पपोस्ट देख रहा होता हूँ मगर असल में देख नहीं रहा होता हूँ।
अचानक चहलकदमी करता हुआ मैं अपने पास वापस आता हूँ तो लगता है कि मेरे होने से मुझे इतनी उलझन तो न थी। मैं अपने लौट आने को भला सा महसूस करता हूँ। इसके बाद मुझे ख़याल आता है कि फिर वो क्या बात थी? मैं क्यों परेशान और उलझन से घिरा था।
नींद उड़ी ही रहती है। मैं उ…

पढ़ते-पढ़ते - मनोज पटेल

पुस्तक मेला से एक किताब खरीदी।
एक ही किताब की चौदह प्रतियां। पांच प्रतियां पुस्तक मेला में बेहद प्यारे दोस्तों को उपहार में दी। तीन प्रतियां एक कैरी बैग में स्टॉल पर टेबल पर रखी थी। एक फ़ोटो खिंचवा कर वापस मुड़ा तब तक कोई इसी प्रतीक्षा में था कि उठा ले। उसने उठा ली। दुःख भरे दिल को तसल्ली दी कि अच्छा है कोई एक बेहतरीन किताब पढ़ेगा और मित्रो को बांटेगा। वह एक अच्छा चोर था कि अच्छी किताब चुरा सका।
छः प्रतियां अपने उन दोस्तों के लिए लाया जो मेला नहीं जा सके थे। अब मेरे पास दो प्रतियां बचीं हैं। इनमें से एक सहकर्मी के लिए है दूजी आभा के लिए।

हिंदी बुक सेंटर के स्टॉल पर मैं बार-बार गया। एक साथ इतनी प्रतियां लेना और उनको अपने पास रखना सम्भव न था। हिंदी बुक सेंटर वालों को बड़ा शुकराना अदा किया। वे भी अचरज में थे कि इस तरह कोई किसी किताब को चाहता है? उसका इंतज़ार करता है?
मनोज पटेल अब हमारे बीच नहीं है। एक तमन्ना थी कि किसी रोज़ उनके साथ बहुत देर तक बैठा जाए। उनसे बात की जाए कि आपके क्लोन कैसे बनाये जा सकते हैं। किन्तु इस दुनिया में कुछ भी एक सा नहीं बनता। सब अपने आप में अनूठे हैं।
हिंदी बुक सेंटर…

बहुत ख़ुश होने पर

एक मैं हॉल में छूट गया था, एक मैं बैंच पर बैठा हुआ था। अंदर छूट गया मैं इंतज़ार से भरा था। निरन्तर किसी को देख लेने के इंतज़ार से भरा। बैंच पर बैठा हुआ मैं उस अंदर छूट गए मैं को देख रहा था। मैं उसके कंधे पर थपकी देना चाहता था। उसके मुड़ते ही गले भी लगाने का सोच रहा था। उससे कहना चाहता था- "चाहना के पास झीने पर्दे भी होते हैं। वे असलियत को ढक देते हैं"
अचानक मुझे लगा कि चेहरों की एक लहर आई। इस लहर में भीतर छूट गया मैं घबरा गया है। वह जिसे देख लेना चाहता है, वह खो गया है।
इस हाल में खड़ा वह देखता कहीं है, सोचता कुछ है और फ़ोटो किसी के साथ खिंचवाता जाता है। बैंच पर बैठे हुआ मैं परेशान होने लगा। मैंने अपने जैकेट की जेब से सिगरेट का पैकेट निकाला।

मैं सिगरेट सुलगा रहा था तभी मुझे याद आया कि कल किसी से कहा था- "बहुत ख़ुश होने पर सिगरेट की तलब होने लगती है"
सिगरेट सुलगाते ही मैंने देखा कि हॉल के भीतर खड़ा मैं उसी के इंतज़ार में है। जिससे मैंने सिगरेट और ख़ुशी की बात कही थी।
इससे पहले कि हॉल के भीतर खड़ा मैं अपने इंतज़ार की अंगुलियां छूते हुए गलियारों में गुम हो जाये, उससे पहले मैं व…

कोई भी नहीं लौट सकता

मैं बैठ जाता तो  मेरे भीतर के आदमी को बेचैनी होने लगती।  इसलिए मैं उठ जाता।  बहुत दूर साथ साथ चलने के बाद  मैं थकने लगता लेकिन भीतर का व्यक्ति  मेरी थकान से अचरज में पड़ जाता।

आखिरकार दिवस की समाप्ति पर  मैं देखता कि इस तरह बेचैन होकर चलने से क्या मिला?  तब मेरे भीतर का व्यक्ति सर झुकाकर बैठ जाता। 
वह कनखियों से कभी-कभी मुझे इस तरह देखता  जैसे कह रहा हो, उस पल वहीं रुक जाते तो अच्छा था।

हम दोनों उस पल तक लौट नहीं पाते। 
कोई भी नहीं लौट सकता। वह केवल एक स्मृति या छवि में देखा जा सकने वाला पल रहा जाता है।

कभी बहुत बड़े आदमी हो जाएंगे

"मैं आपके साथ एक फ़ोटो खिंचवाना चाहता हूँ"
एक नौजवान ने ऐसा कहा तो मैं उसके पास खड़ा हो गया। उसने अपना फ़ोन सेल्फ़ी मोड में किया तो मैंने कहा- "यहां पर बहुत लोग है कोई भी हमारी फ़ोटो खींच देगा।" फ़ोटो हो जाने के बाद उसने मुझसे पूछा- "आप कौन हैं?"
मैं मुस्कुराया।

"मैं किशोर चौधरी हूँ। रेडियो में बोलने की नौकरी करता हूँ। राजस्थान से आया हूँ" उसने कहा- "मैं बहुत देर से आपको देख रहा हूँ। हर कोई आकर गले मिलता है और फ़ोटो खिंचवाता है।"
मैंने कहा- "ये हमारी याद के लिए है। तस्वीरें हमें मुलाक़ातें और चेहरे याद दिलवाती हैं"
उसने पूछा- "आप करते क्या है?
मैं समझ गया कि उसका आशय है पुस्तक मेला में रेडियो वालों को कोई क्यों गले लगाएगा।" मैंने कहा- "मैं कहानियां लिखता हूँ। उधर देखिए। जो ऊपर एक किताब रखी है वह मेरी है"
नौजवान चला गया। थोड़ी देर बाद किताब साथ लेकर आया। "सर इस पर साइन कर दीजिये" मैंने उनका नाम लिखकर साइन कर दिए।" किताब वापस लेते हुए कहा "मैंने सोचा कि आप कभी बहुत बड़े आदमी हो जाएंगे तब मैं आपके …