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Showing posts from 2019

किसी बात का तो है

जब गर्मी बढ़ती है तो हवा गर्म होकर ऊपर उठ जाती है। हवा के ऊपर उठने से खाली हुई जगह को भरने के लिए हवा आने लगती है। जितनी तेज़ गर्मी उतनी ही तेज़ हवा। फिर आंधी आने लगती है। गर्मी तब भी नहीं रुकती तो रेगिस्तान की बारीक धूल आसमान पर छा जाती है। सूरज के ताप और धरती के बीच धूल की चादर तन जाती है। ऊर्जा के अजस्र स्रोत के तेज़ को पैरों तले की धूल भी बेअसर कर देती है।
धूल सांस में घुलने लगती हैं। आंखों में भरने लगती है। दिखाई नहीं देता, सांस नहीं आती। हर शै पर गुबार धूल की चादर तान देता है। लगता है धूल का साम्राज्य स्थापित हो गया है। फिर पानी की चंद बूंदें धूल को बहाकर वापस धरती पर पैरों तले डाल देती है। पैरों की धूल हवा पर सवार होकर ख़ुद को आकाशवासी समझने लगती है लेकिन ये पल भर का तमाशा ठहरता है।

पानी के बरसते ही दबी कुचली घास हर जगह से सर उठाने लगती है। वनलताएँ सारी दुनिया को ढक लेना चाहती हैं। रास्ते मिट जाते हैं। जंगल पसर जाता है। कांटे ख़ुद को जंगल का पहरेदार समझ हर एक से उलझते और चुभते हैं। सहसा हवा की दो एक झांय से कोई चिंगारी निकलती है और जंगल अपने पसार के गर्व को धू धू कर जलता देखता है। ह…

अकेले कब तक बैठे रहोगे

रेत ने हवा से कहा
आओ कुछ रोज़ के लिए
किसी के घर चलें।

यूं बियाबां मैं बैठे-बैठे ऊब होने लगी।
* * *


नीमपागल आदमी का ख़्वाब
उसकी गर्दन पर फिसलता बार-बार।

भरी भरी पीठ पर पड़े
कॉटन के कुर्ते पर सजे फूलों से कहता।

तुम भी अकेले कब तक बैठे रहोगे?
* * *

इच्छा ज़हर है
पूरी होते ही, आप मर जाती है।
* * *

इसके आगे भी बहुत कुछ लिखा। उसे यहाँ नहीं लिख रहा हूँ। अब मुझे अजीब लगता है, असल चाहना का लिखना।

सोशल साइट्स एक फन्दा है

कुछ मित्र कहते हैं वे अनुशासित तरीके से इनका उपयोग करते हैं। मैं अक्सर पाता हूँ कि कहीं भी कितना भी अनुशासित रह लें कुछ अलग नहीं होता।
सोशल साइट्स पैरासाइट है। वे हमारे दिल और दिमाग को खोजती रहती है। एक बार हमारे दिल-दिमाग में घुस जाए तो ज़हर फैलाने लगती है। इसके दुष्परिणाम हमको कम ही समझ आते हैं।
अनिद्रा, थकान, बदनदर्द, चिड़चिड़ापन, अकेलापन जैसी समस्याएं हमको घेर लेती है।

मित्रों से मिल नहीं पाना। उनसे फ़ोन पर बात नहीं कर पाना। अपने कार्यस्थल पर सहकर्मियों के सुख-दुःख सुनने कहने का समय नहीं मिलना। देर से सोना और नींद पूरी होने से पहले जाग जाना। बिस्तर में पड़े रहना कि अभी तो सुबह भी न हुई मगर ध्यान सोशल साइट्स पर ही होना। आख़िर किसी बहाने से फ़ोन उठा लेना। सोशल साइट्स को देखना और अल सुबह हताश हो जाना कि वहां कोई ख़ुशी की ख़बर नहीं है।
ये भयानक है। लेकिन इसे लगातार बरदाश्त किया जा रहा है।
सोचिये हमारे पास कितना ज्ञान है।
कुछ साथ नहीं चलता  तो सोशल साइट्स पर क्या इकट्ठा कर रहे हैं।
अपनी ख़ुशी के लिए दूसरे पर निर्भर न रहो  तो सोशल साइट्स में क्या खोज रहे हो।
गुज़रा हुआ वक़्त वापस नहीं आता  तो इस व…

प्यार में कभी-कभी

ये डव है। वही चिड़िया जो बर्फीले देशों में सफ़ेद रंग की होती है। पहाड़ी और जंगल वाले इलाकों में हरे नीले रंग की होती है। मैदानी भागों में धूसर और लाल मिट्टी के रंग की मिलती है।
ये वैश्विक शांति का प्रतीक है। ईसाई लोग इसे आत्मा और परमात्मा के मिलन की शांति का प्रतीक भी मानते हैं। मुंह में जैतून की टहनी लिए उड़ती हुई डव को विश्व भर में शांति कपोत के रूप में स्वीकारा गया है।

रेगिस्तान में इसे कमेड़ी कहा जाता है। उर्दू फारसी वाले इसे फ़ाख्ता कहते हैं।
इसके बोलने से रेगिस्तान के लोग चिढ़ रखते हैं। असल में इसके बोलने से ऐसा लगता है कि जैसे कह रही हो। "हूँ कूं कूं" हिन्दी में इसे आप समझिए कि ये कह रही होती हैं "मैं कहूँ क्या?" जैसे कोई राज़ फ़ाश करने वाली है। जैसे कोई कड़वी बात कहने वाली है।
लोग इसे घर की मुंडेर से उड़ा देते हैं। इसके बोलने को अपशकुन माना जाता है।
रेगिस्तान की स्थानीय बोली में इसे होली या होलकी कहते हैं। यहाँ दो तरह की कमेड़ी दिखती है। एक भूरे-लाल रंग की दूजी धूसर-बालुई रंग की। मैंने यहाँ कभी सफ़ेद कमेड़ी नहीं देखी।
कल दोपहर लंच के लिए घर जाने को निकला तो ऑफिस में कार…

इसके आगे क्या कह सकता था

हरियल तोते लौट आये। उनकी टीव टीव की पुकार हर वृक्ष पर थी। जाळ पर लगे कच्चे पीलू तोड़ती उनकी लाल चोंच दिखाई दी। वे टीव टीव की पुकार लगाकर जाळ की शाखाओं से लटके हुए कुछ कुतरने लगे। मैं हरी पत्तियों से लदे वृक्ष में कभी-कभी दिखती लाल चोंच में खो गया।
सुघड़ चोंच तीखी थी। किसी कटर के लॉक जैसी। मेरे निचले होंठ को अपने चोंच में दबाये हुए सहन हो सकने जितना ज़ोर लगाया। चोंच खुल गयी वह मेरे गाल को छू रही थी। मैं किसी रूमानी तड़प में उसे बाहों में भींच लेता मगर मैंने अपनी जीभ होंठ के भीतर घुमाई।
क्या कोई यहां था?
कोई न था। तोते पेड़ पर फुदक रहे थे। शाम हो चुकी थी। दफ़्तर से दिन की पाली वाले लोग जा चुके थे। मैंने लोहे की बैंच पर बैठे हुए चारों ओर देखा। तन्हाई थी। उस तन्हाई को देखकर यकीन आया कि जब मुझे काट लेने का ख़याल था। उस समय मेरे चेहरे पर अगर कोई चौंक आई तो उसे किसी ने नहीं देखा।
शायद मैं चौंका भी नहीं था।
एक समय बाद रूमान पर वे बातें हावी हो जाती हैं, जिनसे सम्बन्ध खत्म हुए थे। वनलता जिस तरह पेड़ों को ढ़ककर उनसे रोशनी छीन लेती है। उसी तरह कुछ उदास बातें स्याह चादर बनकर रूमान का गला दबा देती है।
मैं…

बाखळ

ढाणी की बाड़ के अंदर का कुदरती अनिर्मित खुला भाग बाखळ कहा जाता है। गांव से उठकर छोटे क़स्बों में आकर रहने पर अक्सर बाखळ पीछे छूट जाती है। एक बन्द घर जीवन हो जाता है।
ये हमारे घर की बाखळ है। इसमें जो आपको दिख रहा है, वह सब हमको रिफिल करता है। जीवन से जोड़ता है। इसके लिए हमें बहुत नहीं करना पड़ता। बहुत थोड़ा करने पर बहुत सारा मिल जाता है।

हमारे घर मे घटी है। जिसे दो पाट वाली चाकी कहा जाता है। माँ उस पर कभी मूँग, मोठ जैसी दालें, कभी अजवायन जैसे मसाले पीसती हैं। लेकिन अब एक बिजली से चलने वाली छोटी चक्की भी घर में आ गयी है। उस पर गेंहूँ और बाजरा पीसा जाता है।
जब घर पर ही पिसाई होती तो साबुत धान घर पर आता है। गेंहूँ और बाजरा से बहुत थोड़ा सा हिस्सा इन मिट्टी के कटोरों में डाल देते हैं। पक्षी इनको चुगते हैं। अपना गाना सुनाते हैं। हवाई उड़ान के करतब दिखाते हैं और आराम करने लगते हैं।
तस्वीर में एक कटोरे में आपको गिलहरी दिख रही होगी। इस कटोरे में इन दिनों पार्टी होने जैसा माल मिलता है। आभा अक्सर तरबूज, खरबूज, देशी ककड़ी और बीजों वाले फल जब भी लाती है। बीजों को सहेजती हुए कहती है- "गिलहरियां कुटर-…

जातिवाद - कर्क रोगों में सर्वाधिक गंभीर रोग

गिद्धों के स्वप्न में भूख से मरते प्राणी होते हैं। निम्नस्तर की राजनीति में विचारहीन धड़ों में बंटे हुए लोग होते हैं।।
महान चिंतक चाणक्य ने कहा है "जिस प्रकार सभी पर्वतों पर मणि नहीं मिलती, सभी हाथियों के मस्तक में मोती उत्पन्न नहीं होता, सभी वनों में चंदन का वृक्ष नहीं होता, उसी प्रकार सज्जन पुरुष सभी जगहों पर नहीं मिलते हैं।"
किसी भी धर्म और जाति में सब सज्जन हों, ये कामना करना असम्भव सा है। हर स्थान पर ओछे-टुच्चे, नीच-कमीने, लालची-धोखेबाज़ और इसी तरह कमतरी के दोषों से भरे लोग होते हैं।
बाड़मेर में कुछ दिनों से निरन्तर अफवाहें बढ़ती जा रही हैं। जाट और राजपूत नाम से धमकियां ली और दी जा रही है। दिन प्रतिदिन घटित होने वाली घटनाओं को असहज जातिगत रूप देकर प्रस्तुत किया जा रहा है।
बाड़मेर शहर में कुछ एक घटनाओं को लेकर आम चर्चा है। उन घटनाओं का उल्लेख करना असल में उनको हवा देना होगा इसलिए मैं उनका उल्लेख नहीं कर रहा हूँ। लेकिन कुछ रोज़ पहले एक ज़मीन के टुकड़े को लेकर हुए विवाद में एक ही जाति के दो पक्ष लहूलुहान हो गए थे। सोचिये अगर ये सब दो अलग जाति के पक्षों में हुआ होता तो मौकापरस्त इ…

किन्तु एकान्त क्या है?

एकान्त एक निर्जन अथवा सूना स्थान है? अथवा शांत या शोरगुल रहित ऐसा स्थान जहाँ कोई न हो। क्या इसके आस-पास अकेलापन, तन्हाई, निर्जनता, सूनापन जैसे अलग शब्दों को रखा जा सकता है?
इस समय मेरे आस-पास कोई व्यक्ति नहीं है। जिस स्थान पर मैं हूँ उसके दायरे से बाहर ही कोई व्यक्ति है। किंतु इसे एकान्त कैसे कह सकता हूँ। ये सब कितना भरा पूरा है।
मोगरा पर कमसिन कलियां हैं। वे झुक-उठकर झांक रही हैं। मोगरा के पुष्प अपनी सुगंध के मादक जाल के तंतुओं को बुनते जा रहे हैं। मधुमालती के गुच्छों से वनैली गंध आ रही है। चिड़िया के थोड़े जल्दी आ गए कुछ बच्चे हैं। गिलहरियों के दो बच्चे भी हैरत भरी खोज में लगे हैं।

मुझे भाषा और शब्दों का ज्ञान कम है। मैंने कभी गम्भीरता से व्याकरण पढ़ा नहीं। मुझे केवल कहानियां और रोचक गद्य पढ़ना ही लुभाता रहा। ये याद करता हूँ तो लगता है कि एकान्त वह था जब मैं शब्दों में खोया हुआ था। मैं भूल चुका था कि बाहर के संसार में क्या हो रहा है?
सम्भव है एकान्त वह है, जहां आप सबसे अलग किसी ऐसे अंत तक पहुंचें जहां केवल आप रह जाएं। इसमें अगर कोई अन्य उपस्थित है और वह एक ही है तो ये एकान्त समर्पण है।…

अनलर्निंग

मुश्किल कामों में से एक काम है सीखे हुए को भुलाना।
सीखना हमारे भीतर इस तरह पैठ करता है कि हम उम्र ढल जाने तक भी अपने आपको बदल नहीं पाते हैं। हमसे पहले की पीढ़ी या हमारी पीढ़ी के पास सीखे को भुलाने का हुनर कम ही देखने को मिलता है।
अनलर्निंग एक कठिन कार्य है।
माँ को चीज़ें संभाल कर रखने की आदत है। वे ताले जो ख़राब हो चुके या लगभग गायब हो गए हैं उनकी चाबियों से लेकर सागवान की लकड़ी से बने दरवाज़े जो चौखट से उतर चुके हैं को संभाल कर रखती हैं। इस तरह अनगिनत चीजें कबाड़ की तरह जमा है।
ऐसा इसलिए है कि वे उन दिनों बड़ी हुई जब चीज़ों की उपलब्धता लगभग अप्राप्य थी। आप आज की तरह बाज़ार जाकर कुछ भी खरीदकर नहीं ला सकते थे। उन दिनों सहेजी हुई चीज़ें ही हमारे अटके काम निकालती थी। घर में सुई की जगह सुई और कुदाल की जगह कुदाल सहेजी जाती थी।
मैंने दादा के भंडारघर में लोहे की चद्दरों वाली छत के नीचे, दीवार में आलों और ओने कोने में अनेक ऐसी वस्तुएं देखी थी जिनका उपयोग लगभग कभी न देखा गया। बचपन में जिस किसी घर गया वहां मैंने पाया कि बाखल में, बाड़ में और घर के बाहर की तरफ भी अनेक अनुपयोगी चीज़ें लगभग सहेजी हुई पड़ी रहती…

हर चीज़ बदलती है - ब्रेख़्त

हर चीज़ बदलती है।
अपनी आख़िरी सांस के साथ
तुम एक ताज़ा शुरुआत कर सकते हो।
लेकिन जो हो चुका, सो हो चुका। जो पानी एक बार तुम शराब में
उड़ेल चुके हो, उसे विलग नहीं कर सकते।
जो हो चुका, सो हो चुका। वह पानी जो एक बार
तुम शराब में उड़ेल चुके हो
उसे उलीच कर बाहर नहीं कर सकते। लेकिन हर चीज़ बदलती है
अपनी हर अंतिम सांस के साथ
तुम एक ताज़ा शुरुआत कर सकते हो। ~ बर्तोल्त ब्रेख़्त EVERYTHING CHANGES Everything changes. You can make
A fresh start with your final breath.
But what has happened has happened. And the water
You once poured into the wine cannot be
Drained off again.
What has happened has happened. The water
You once poured into the wine cannot be
Drained off again, but
Everything changes. You can make
A fresh start with your final breath. ~Eugen Berthold Friedrich Brecht

बताशे जितनी पूरी

"आभा दी फुचका" मेरे ऐसा कहते ही आभा मुस्कुराने लगी।
मैंने पूछा- "कुछ याद आई?" आभा ने कहा "हाँ आपकी दोस्त। उनकी क्या ख़बर है?"
मैंने कहा- "पता नहीं। कहीं रंग भरी अंगुलियाँ लिए ड्राइंग बोर्ड के सामने खड़ी होगी या किसी आर्ट गेलेरी में अपनी पेंटिंग्स बेच रही होगी।"
आभा ने कहा- "आपको उनके बारे में पता करना चाहिए।"
कैसे कोई एक बात किसी की हमेशा के लिए याद रह जाती है। उस बात के बहाने उसे हर बार याद किया जाता है। फुचका हमारे लिए नया शब्द था। बांग्ला लोग पानी पूरी को फुचका कहते हैं। हमारे लिए तो पानी पूरी भी एक नया शब्द था। पहले पहल जब भी इसके बारे में सुना तब ये पानी पताशा था।
रेगिस्तान के लोगों के पास मखाणे और बताशे ही केंडी के रूप में हुआ करते थे। इन्हें बरसों बिना किसी विशेष रखरखाव के संभाला जा सकता था। दादी की पेटी में, नाना के कुर्ते के खूंजे में, मेहमानों की थेलियों में, विवाह समारोहों के अवसर पर कट्टों में भरे हुये मखाणे और बताशे मिला करते थे।
ये बताशे ही थे जिनको स्थानीय बोली ने पताशे कर दिया था। पानी पूरी वाली, पूरी भी लगभग बताशे जितनी…

एक पिता होना

एक पिता के लिए सबसे महत्वपूर्ण काम ये है कि वह अपने बच्चों की माँ से प्रेम करे। ~ थियोडोर हेज़बर्ग
ड्राइंग रूम की सेंटर टेबल पर अकसर कैरम जमा रहता। माँ, पापा और भाई माने सब लोग खेलते थे। बोरिक ऐसिड की सफेदी यहाँ वहाँ बिखरी रहती। शाम को ये कैरम बाहर खुले में आ जाता। इस खेल का आनंद बहुत देर तक चलता। कभी मानु आकर कैरम के बीच में बैठ जाती। इसे खेल के बीच का टी ब्रेक मान लिया जाता। खेल फिर से चल पड़ता। इस खेल के समापन का एक रिवाज सा बन गया था कि माँ की टीम हारने लगती तब माँ कैरम को एक तरफ उठाकर सारी गोटियाँ बिखेर देती।
एक ठसक और झूठे रूसने के साथ माँ रसोई की ओर चल पड़ती। पिताजी उनको मनाने के लिए राजसी सम्बोधन लिए पीछे चल पड़ते।
घर के भीतर के इन दृश्यों से इतर बाहर के संसार में पिता एक शिक्षक, सामाजिक कार्यकर्ता और बेहद गंभीर व्यक्ति थे। उन्हें किसी प्रहसन, हंसी-ठिठोली और निंदा में सम्मिलित किसी ने नहीं पाया। वे इस तरह के स्वभाव के व्यक्तियों से यथोचित दूरी बनाए रखते थे।
जब तीनों बच्चों की नौकरी लग गयी। घर में बहुएँ आ गईं तब उन्होने अपनी इच्छा से नौकरी से सेवानिवृति ले ली। अपने प्रिय लोगों के …

बाड़मेर में पकवान दीवाने

सर दो पेग ले लेते हैं।  भाई सुबह से कुछ खाया ही नहीं है।  सर ये गेट के सामने पकवान वाला है, बहुत अच्छे पकवान देता है।  ले आइये।  सर मिर्ची कम या ज़्यादा? मिर्ची अच्छी।  सर मीडियम ठीक रहेगी।  भाई एक पतला सा पापड़। थोड़ी सी दाल और प्याज के चार बारीक टुकड़े। इतना मत सोचो। जैसा अच्छा लगे ले आओ।
बाड़मेर में पकवान दीवाने रहते हैं। लोग सुबह सवेरे पकवान खाने निकल पड़ते हैं। हर पकवान वाले ठेले के पास खड़े होकर आपको इंतज़ार करना पड़ता है। पकवान खाने के दीवाने अधिकतर विस्थापित होकर आए लोग थे। वे ही अपने साथ पकवान लेकर आए। लेकिन जल्द ही ये हर एक का प्रिय होने लगा।
मैंने किसी जाट को पहली बार पकवान खाते हुये देखा, वो हमारा कॉमरेड दोस्त खेताराम था। मैं तब भी पकवान नहीं खाता था। पिताजी को गलियों में चटोरों की तरह खाने की आदतें अच्छी नहीं लगती थी। ये भी एक वजह रही होगी मैं बहुत बार ललचाने के बाद भी आलू-टिक्की, छोले और पकवान जैसे ठेलों के पास भी नहीं गया।
इधर आकाशवाणी के गेट के सामने बिजली विभाग की दीवार के पास एक व्यक्ति ने साल डेढ़ साल पहले पकवान का ठेला लगाया। बिक्री इतनी तेज़ी से बढ़ी कि हाथगाड़े की जगह कबट लगा…

सामूहिक उद्विग्नता - मास हिस्टीरिया

उद्विग्नता माने इज़्तराब माने एंजायटी अनेक कारणों से बचपन से ही हमारे भीतर घर कर लेती है। ये उद्विग्नता जब अनेक लोगों को चपेट में लेती है तो इसे सामूहिक उद्विग्नता अर्थात मास हिस्टीरिया कहा जाता है। सामूहिक उद्विग्नता अक्सर संक्रामक व्याधि की तरह समाज के बड़े हिस्से को अपनी चपेट में ले लेती है। समाज का अधिसंख्य हिस्सा अपनी कल्पना शक्ति से भयावह स्थितियों के दृश्य बुनने लगता है। ईश्वर के रूठने, प्रकृति के कुपित होने, महामारी फैलने या राज्य के नष्ट होने जैसे किसी भी विषय के सामूहिक पागलपन में शामिल हो जाता है।
समाज का ये अस्वस्थ भाग ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए पशु-पक्षियों की बलि यहाँ तक कि नरबलि देने को एकमत हो जाता है। पहाड़ों, नदियों और अलंघ्य विशालकाय मैदानों में अनेक शापों के होने का प्रचार-प्रसार करता है। अनेक आशंकाओं में बाहरी सम्पर्क को समाप्त करता है और भेड़ों के झुंड की तरह मुंह में मुंह डालकर बैठ जाता है। अपने राज्य को नष्ट होने से बचाने के लिए प्रशिक्षित और बुद्धिमान योद्धा बनकर राज्य का स्वयंसेवक होने के स्थान पर विक्षिप्त होकर चिल्लाने लगता है। अपनी क्षति पर रोता है और दूसरे…

प्रेम दिवस पर एक दुआ

वो टाई बांधती है और खींच लेती है  ये कैसे वक़्त उसे प्यार की पड़ी हुई है। ~आमिर अमीर
यूँ कब तक बेरोज़गार फिरोगे। दुआ कि तुम प्यार में पड़ जाओ। हर घड़ी कोई काम तो रहे कि सन्देशा आएगा, कॉल आएगा। मन घबराया रहे कि कोई मैसेज देख न ले, किसका कॉल है कोई पूछ न ले। घर के ओनेकोने में, दफ्तर के सूने गलियारों में कभी बाज़ार के बहाने किसी खाली जगह पर जाकर जल्दबाज़ी के कॉल करेंगे। बातों-बातों में तय कर लेंगे कि कभी मिलेंगे, चूम लेंगे, कहीं बहुत दूर तक घूमने जाएंगे। और फिर ख़ुश होंगे, इंतज़ार करेंगे, उदास रहेंगे, आंसू बहाएंगे, कोसने भेजेंगे। इस तरह कुछ बरस तेज़ी से कबाड़ किए जा सकेंगे। लेकिन ये सब बेकार न जाएगा। कभी दारू पी लेने पर कह उठेंगे "यार थी तो बड़ी बरबादी मगर अच्छी थी।"

आमीन। 😍😘

सूचना सम्पन्न रेगिस्तान

जैसलमेर में फतेहगढ़ में कोडा गांव से लौटते हुए झीझनियाली में ये वैन दिखी। इसमें एक बड़ा स्क्रीन लगा था। जब हमारी कार वैन के पास पहुंची तब स्क्रीन पर राजस्थानी वेशभूषा में कुछ लोग और खलिहान दिखाई दिए। वैन के आगे भारत के मन की बात लिखा था।
इसे देखते ही मुझे फ़िल्म प्रभाग और दृश्य एवं श्रव्य प्रचार विभाग की ओर से अस्सी के दशक में दिखाई जाने वाली फ़िल्म याद आने लगी। एक जीप में कुछ लोग आते। प्रोजेक्टर लगता। सफेद पर्दा लगाया जाता। उस पर कोई देशभक्ति या विकास पर बनी फ़िल्म दिखाई जाती। हम बच्चे कौतूहल से उस दिन का इंतज़ार करते। लेकिन वह दिन बरसों में कभी आता।

मैंने केवल दो फ़िल्म देखी थी। एक थी देव आनंद साहब की हम दोनों दूजी के बारे में ठीक से याद न रहा कि वह किस बारे में थी।
अब हर हाथ में मोबाइल है। सस्ता साहित्य, द्विअर्थी गीत, मार-काट और प्राकृतिक आपदाओं के दृश्य सबकुछ यूट्यूब पर उपलब्ध है। फ़िल्म और टीवी सीरियल का तो कहना ही क्या? वे यूट्यूब पर नहीं तो किसी टोरेंट के मार्फ़त डाउनलोड होकर एक मोबाइल से दूजे मोबाइल में आगे बढ़ते रहते हैं। ऐसे में इस वैन को देखकर मेरे मन में प्रश्न जगा कि क्या सचमुच य…

वेणासर की पाल - भंगभपंग

विज्ञान की कक्षा में पदार्थ के रूप पढ़ाये जा रहे थे। रसायन विज्ञान के माड़सा खूबजी ने बच्चों को सरल भाषा में बताया। "अवीं हंगाता हिय ठोस, अवीं मूत्राता हिय द्रव हिन अवीं टिट हणाता हिय गैस।"
#भंगभपंग - 7
कक्षा नौवीं की आख़िरी से पहली बैंच पर बैठा एक लड़का हंसा। उसकी हंसी के पीछे हंसी की एक लहर आई। लहर के साथ आगे की सब बैंचों के बच्चे बह गए। खूबजी ने कहा- "तुम्हारे लक्षण दिख रहे हैं। इस सेक्शन का एक भी बच्चा डॉक्टर नहीं बन पाएगा।"
कक्षा के पास से जा रहे हनु भा ने इस हंसी पर उपेक्षा भरी दृष्टि डाली। उनको इस बात की चिंता न हुई कि कोई बच्चा डॉक्टर नहीं बन पाएगा और विद्यालय का नाम रोशन न हो सकेगा लेकिन उनको मानव शरीर के अपशिष्टों के प्रति विद्यार्थियों की अरुचि से दुख हुआ।
टिट हणना एक अद्भुत सुखकारी कर्म है। पाद के प्रति अमानवीय सोच रखने वाले गांवों का ज़िक्र विश्व इतिहास में है। लेकिन बाड़मेर के बुजुर्ग पदेलों के लंबे पाद पर कोई नौजवान हंस दे तो पादक उसे उपहास भरी निगाह से देखता। साथ ही आस-पास के लोग भी बच्चों को इस तरह देखते कि बच्चे कई दिनों तक पादकों के आस-पास नहीं फटकते।

जीवन जैसा मिला

कभी महंगे काउच में धंसे रहे, कभी प्लेटफॉर्म पर पड़े रहे। न भला लगा न बुरा लगा। कभी सोए अजनबी बिस्तरों में, कभी घर के लिहाफ़ में दुबके रहे। न अफ़सोस रहा न ख़ुशी रही। कभी बैठे रहे मुंडेर पर, कभी गलियों की खाक पर चलते रहे। न कमतर लगा न बेहतर लगा। कभी मिले तो खो गए रूमान में, कभी बिछड़ गए तो तन्हा बैठे पीते रहे। 
जीवन जैसा मिला उसे जी लिया।