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उससे पहले

स्मृतियां गहरे से हल्के रंग की ओर बढ़ती हैं। फिर पीली पड़ जाती हैं। जैसे किसी तस्वीर का कागज़ उम्रदराज़ दिखने लगता है। उसके पीलेपन को देखते हुए लगता है कि एक हलके से मोड़ से टूट जाएगा। उस कागज़ को छूने से अंगुलियां डरती हैं। जाने किस छुअन से एक दरार आ जाये। आँखे चुप बैठी सोचती हैं। वो कितना ताज़ा लम्हा था। वक़्त की धूप छाया तक कैसे चली आती है। बंद कमरे की दीवार को भी धूप किस तरह छूती है। कि कागज़ अपना हरापन खो देता है।

तस्वीर के कागजों की कुछ जड़ें हुई होती तो शायद कुछ और वक़्त तक अपना हरापन सींचती रहती। ऐसे ही स्मृतियां जिन कारणों से बची रहती हैं, वे सब कारण असल में बीत चुके कारण होते हैं। स्मृतियों के अक्स में एक पीलापन अपनी जगह बनाता रहता है। हम एक रोज़ स्मृति को छूने से डरते लगते हैं।

सब स्मृतियां उन कारणों पर खिलती हैं जिनके पाए सम्मोहन होते हैं। ये सम्मोहनों की ही दुनिया है। सम्मोहन अपने भीतर ईर्ष्या और युद्ध के नक्शे लिए होते हैं। ये ऐसे संघर्ष है जिन्हें आप टाल नहीं सकते। इनसे लड़कर ही मुक्त हुआ जा सकता है।

अकेलेपन का अभ्यस्त नित नए सम्बन्ध तलाशने में सुख पाता है। वह व्यक्ति आस पास की जड़ों में अपने पैर फंसाता है। बेल की घुमावदार कोमल जकड़न बनाता है। उसी से उसी को छीनता है, जिसके सहारे उगा हुआ है। इस जीवन जुगत में किसी एक हरेपन को हारना होता है। जीत अक्सर परजीवी की होती है। वह सम्बन्धों का पानी चुरा कर आगे बढ़ जाता है।

कभी ऊँची शाखों पर ज़िद करके घोंसला बनाने वाली चिड़िया अपने साथ कुछ बीज लेकर आती है। पेड़ जानता है कि इन बीजों में से कोई एक कोटर में जा गिरेगा। वह बीज उगकर एक दिन उसे लील लेगा। लेकिन जीवन में समझदारी सिर्फ कहने को ज्यादा होती है। जीवन अक्सर लाचार बंधुआ होता।

हम सब हारने को अभिशप्त होने की जगह अपने से लगने वाले रिश्तों से ही छले जाने की नियति से बंधे होते हैं। सच कहूं तो पेड़ का खिले रहने की कामना में रहना ही कष्ट का सबसे बड़ा कारण है। जिन्हें बार-बार नष्ट होकर उगने का हुनर होता है, केवल वे ही इस प्रक्रिया में शांत और गतिमान रहते हैं।

एक रोज़ कोई गहरा सन्नाटा उस चिड़िया के अंतस को भी भेद देता है। ख़ामोशी में याद किरचों की तरह बिखर जाती है। वो दौड़ता भागता मन चोटिल होकर लम्बी सांसे लेने लगता है। तब कोई हल नहीं होता। अपने किये और जीये हुए के नतीजे उसकी साँस घोट देते हैं। सूखे हुए दरख़्त चिड़िया की बुझी हुई आँखे देखने को नहीं होते। वे उसके मरने से पहले मर चुके होते हैं।

जीन्स पुरानी हो चुकी है कि सिर्फ ज़िंदा चीज़ें ही नहीं मरती।

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मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…